रविवार, 28 नवंबर 2010

संजय दानी की ग़ज़ल – मेरे क़ातिल का मुझे कोई पता दो या उसे मेरी तरफ़ से दुआ दो

सज़ा दो
मेरे क़ातिल का मुझे कोई पता दो,
या उसे मेरी तरफ़ से दुआ दो।

मैं चराग़ों की हिफ़ाज़त कर रहा हूं,
बात ये सरकश हवाओं को बता दो।

बेवफ़ा कह के घटाओ मत मेरा कद,
है वफ़ा की चाह तो ख़ुद भी वफ़ा दो।

छोड़ कर जाने के पहले ऐ सितमगर,
इक अदा सच्ची मुहब्बत की दिखा दो।

जीते जी गर दूरी ज़ायज थी जहां में,
कांधा तो मेरे जनाज़े को लगा दो।

ये किनारे बेरहम हैं बदगुमां हैं,
कश्तियों, मंझधार को अपनी बना लो।

चांदनी से चांद की इज़्ज़त है जग मे,
रौशनी दो या अंधेरों की सज़ा दो।

ज़िन्दगी कुर्बान है कदमों मे तेरे,
ऐ ख़ुदा मरने का मुझको हौसला दो।

प्यार में दरवेशी का आलम है दानी,
मिल सको ना तो तसव्वुर की रज़ा दो।

5 blogger-facebook:

  1. kya khoob likha hai !sunder rachna manmohak andaz--badahai

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  2. ये किनारे बेरहम हैं बदगुमां हैं,
    कश्तियों, मंझधार को अपनी बना लो।
    मुझे सबसे बढ़िया ये शे’र लगा.. दोबारा पढ़ रहा हूं..

    उत्तर देंहटाएं
  3. कश्तियों, मंझधार को अपनी बना लो।
    संजय भाई इस मिसरे में मँझधार के लिए 'अपनी' शब्द बहुत ही सही इस्तेमाल किया है आपने| कुछ लोग यहाँ 'अपना' का ईस्तमाल करते हैं, जो कि ग़लत है|

    चांदनी से चांद की इज़्ज़त है जग मे,
    रौशनी दो या अंधेरों की सज़ा दो।
    वाह वाह वाह, क्या खूब बात बयाँ की है मालिक...........

    मिल सको ना तो तसव्वुर की रज़ा दो।
    ये नहीं तो वो सही........... कमाल है बॉस, कमाल|

    मुझे खुशी होगी अगर आप ओबिओ के दूसरे इवेंट में शिरकत करें| पूरी जानकारी मेरे ब्लॉग पर - पोस्ट के माध्यम से दी हुई है|

    उत्तर देंहटाएं
  4. jeete ji ger doori jaayaj thi jahan me
    kandha to mere janaaje ko laga do.
    छू जाती है ये पंक्तिया..
    बधाई स्वीकार करें.

    उत्तर देंहटाएं
  5. राजीव जी , नवीन जी , विजय वर्मा जी और, भारतीय नागरीक के अलमदार को मेरा धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं

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