सोमवार, 29 नवंबर 2010

राजीव श्रीवास्तवा की कविताएँ - नतीजा आया और खुद को वो एच .आई .वी पॉज़िटिव पाया!

बाल विवाह -एक बेईमानी

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गुड़ियों के संग खेलती,

चिड़िया सी चहक रही,

माँ -बापू की लाड़ली,

फूलों सी महक रही!

छोटे-छोटे हाथों से,

मिट्टी का घर बना रही,

साजो-समान रख,

रंगों से सज़ा रही!

आज खूब सजी-धजी,

फिर भी रो रही,

सखियाँ बता गयी,

की उसकी शादी ही रही!

माँ का आँचल पकड़,

उससे प्रश्न कर रही,

क्या खता हो गयी,

जो आज विदा हो रही!

बापू के पांव पकड़,

प्रार्थना वो कर रही,

ना भेजो घर दूजे,

फूट-फूट रो रही!

मासूम सी कली,

आज कैसी ढल गयी,

खेलने के दिन थे,

खुद खेल बन गयी!

अग्नि के चहुं दिशा,

सात बार घूमती,

कुंड में स्वाह हो रहे,

बचपन को ढूंढती!

विवाह की रीति से,

अबोध अंजानी है,

रोक दो ये शादी,

ये शादी बेईमानी है!

---

एच . आई .वी- पॉज़िटिव

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अशांत मन,खुद से घृणा

ग्लानि,भय,अफ़सोस और

ऐसे कई सारे भाव से लिप्त

एक युवक,प्रयोगशाला के द्वार

पर बैठा,एक नतीजे का इंतज़ार

कर रहा था!

कुछ समय पूर्व मतिभ्रष्ट

पदभ्रष्ट होकर ,यौवन की

आँधी में बहकर, परिणाम

से बेख़बर एक दुष्कर्म

कर बैठा था!

आज पहली बार प्रभु से

विनती कर रहा था,की

इस परिणाम में असफल

हो जाए,पर नतीजा आया

और खुद को वो एच .आई .वी

पॉज़िटिव पाया!

एक पल मे मानो ,जिंदगी

हाथ से फिसलती प्रतीत

हो रही थी!अंधकार ही अंधकार

किससे बताए,कहाँ जाए ,

कहे तो कैसे कहे,

यही सवाल उसे सता रहे थे और

उसकी भूल का अहसास दिला रहे थे!

सौभाग्य से एक व्यक्ति

फरिश्ता बन कर आया!

और उसने ऐ. आर .टी*

सेंटर का पता बताया!

जहाँ गोपनीय ढंग से उसकी

पुनः जाँच हुई!इस बीमारी

की विस्तृत जानकारी मिली

और मुफ़्त इलाज की शुरूआत हुई!

ऐसे ही कई युवक रोज अज्ञानता के

कारण इस बीमारी का शिकार

हो रहे है! अपने अनमोल जीवन

को यू मुफ़्त में ही खो रहे है!

सुरक्षित यौन संबंध ही इस बीमारी

से बचा सकती है!यौन शिक्षा ही

अज्ञानता को दूर भगा सकती है!

एच आई वी एक संक्रामक रोग है!

असुरक्षित यौन संबंध ,गैर क़ानूनी

रक्त दान ,संक्रमित सुई से संपर्क

पीड़ित माँ से अजन्मे बच्चे को, यही

इसके फैलने के स्रोत है!

इस बीमाऱी के खिलाफ मिल कर लड़ना है !

इसे जड़ से समाप्त कर आगे बढ़ना है !

मानव जीवन प्रभु की अनमोल रचना है!

हमें इस बीमारी से हर हाल में बचना है!

--

*Anti retroviral treatment center

---

सर्दी-हाइकु

लो सर्दी आई

निकाल लो रज़ाई

ठिठुर रहे!

 

सर्दी की धूप

बरामदे में बैठे

चाय पिएँगे !

 

गर्म कपड़े

बाहर निकाल लो

धूप दिखाओ !

 

ओस की बूँद

कोहरे की चादर

दिखता नहीं !

 

काँपते हाथ

ठिठुरता बदन

उफ़ ये सर्दी !

 

घना कोहरा

छुप गया सूरज

धूप गायब !

 

लकड़ी जली

सब हाथ तापते

बातें करते !

 

मुख से धुआँ

सबके निकलता

बच्चों की मस्ती !

 

अंधेरा जल्दी

सब घर भागते

सड़कें सूनी !

 

बढ़ती सर्दी

ग़रीब की आफ़त

जान भी जाती !

 

-

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

4 blogger-facebook:

  1. बाल विवाह व एड्स ( एच आई वी) पर कविता अच्छी लगी , बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. तीनों ही रचनायें एक से बढकर एक हैं…………पसन्द आयीं।

    उत्तर देंहटाएं
  3. "एच आई वी एक संक्रामक रोग है"-गलत है----एच आई वी ..कोई रोग नहीं है डा राजीव...????

    उत्तर देंहटाएं
  4. गुप्ताजी एड्स सक्रामक रोग नही ये आप किस आधार पर कहरहे

    उत्तर देंहटाएं

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