रविवार, 12 दिसंबर 2010

संजय दानी की 3 ग़ज़लें

दस्तूरे-इश्क़
अब बेवफ़ाई, इश्क़ का दस्तूर है
राहे-मुहब्बत दर्द से भरपूर है।


बारिश का मौसम रुख़ पे आया इस तरह
ज़ुल्फ़ों का तेरा दरिया भी मग़रूर है।


ग़म के चमन को रोज़ सजदे करता हूं
,पतझड़ के व्होठों में मेरा ही नूर है।


इस झोपड़ी की यादों में इक ख़ुशबू है
महलों के सांसें भी सनम नासूर हैं।


दिल के समन्दर में वफ़ा की कश्ती है ,
आंख़ों के साग़र को हवस मन्जूर है।


चालें सियासत की, तेरे वादों सी
जनता उलझने को सदा मजबूर है।


ग़म के चराग़ो को जला कर बैठा हूं
अब आंधियों का हुस्न बे-नूर है।


दिल राम को तरज़ीह देता है मगर
मन रावणी क्रित्यों में मख़मूर है।


जब से नदी के पास ये दिल बैठा है
मेरी रगों की प्यास दानी दूर है।

--

(2)

सोच के दीप जला कर देखो,
मज़हबी आग बुझा  कर देखो।


दिल के दर पे फ़िसलन है गर,
हिर्स की काई हटा कर देखो।


साहिल पे सुकूं से रहना गर,
लहरों को अपना कर देखो।


ग़म के बादल जब भी छायें,
सब्र का जाम उठा कर देखो।


ईमान  ख़ुदाई  नेमत   है,
हक़ पर जान लुटा कर देखो।


डर का कस्त्र ढहाना है गर,
माथ पे ख़ून लगा कर देखो।


आग मुहब्बत की ना बुझती,
हीर की कब्र  खुदा कर देखो।

वस्ल का शीश कभी न झुकेगा,
हिज्र को ईश बना कर देखो।


डोर मदद की हर  घर में है,
हाथों को फैला कर देखो।


हुस्न  का दंभ  घटेगा  दानी,
इश्क़ का फ़र्ज़ निभा कर देखो।

---

(3)

ग़म की कहानी से मुझे भी प्यार है ,
दिल आंसुओं के मन्च का फ़नकार है।


ऐ दिल भरोसा उस सितमगर पे न कर,
उसको शहादत ही सदा स्वीकार है।


इक झोपडी जब से बनायी है मैंने
बिलडर की नज़रों मे मेरा सन्सार है ।


हम राम की गाथा सुनाते हैं सदा ,
तेरी ज़ुबां में रावणी अशाआर हैं।


दिल के चरागों को, न है डर उसका गो,
वो आंधियों के गांव की सरदार है ।


हां चांदनी फ़िर बादलों के घर चली,
पर चांद की गलियां कहां खुद्दार है।


मासूम हैं इस गांव के लडके सभी
,तेरे नगर की लडकी भी अखबार है।


इज़्ज़त लकीरों की सदा हम करते हैं,
तेरा तो सारा कुनबा ही गद्दार है।


मेरी ग़रीबी की ज़रुरत स्वाभिमान,
दानी अमीरी बे-अहम बाज़ार है।

---

9 blogger-facebook:

  1. tino hi gazale ati sundar...........shubhakamnaye

    उत्तर देंहटाएं
  2. आंख़ों के साग़र को हवस मन्जूर .............
    मन रावणी क्रित्यों में मख़मूर ...............
    हीर की कब्र खुदा कर ................
    दिल आंसुओं के मन्च का फ़नकार .................
    इक झोपडी जब से बनायी है मैंने ....................
    ,तेरे नगर की लडकी भी अखबार ...................

    संजय जी बहुत ही उम्दा शाहकारों से रु-ब-रु कराने के लिए तहेदिल से शुक्रिया|

    उत्तर देंहटाएं
  3. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना कल मंगलवार 14 -12 -2010
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..


    http://charchamanch.uchcharan.com/

    उत्तर देंहटाएं
  4. ग़म की कहानी से मुझे भी प्यार है ,
    दिल आंसुओं के मन्च का फ़नकार है बहुत ही उम्दा

    उत्तर देंहटाएं
  5. अब बेवफ़ाई, इश्क़ का दस्तूर है
    राहे-मुहब्बत दर्द से भरपूर है।

    वाह दानी जी वाह .

    उत्तर देंहटाएं
  6. अना जी, नवीन जी ,संगीता स्वरूप जी ,सुनील जी , व कुंवर जी , आप सबका तहे-दिल आभार ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति.........मेरा ब्लाग"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com/ जिस पर हर गुरुवार को रचना प्रकाशित साथ ही मेरी कविता हर सोमवार और शुक्रवार "हिन्दी साहित्य मंच" at www.hindisahityamanch.com पर प्रकाशित..........आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे..धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  8. बारिश का मौसम रुख़ पे आया इस तरह
    ज़ुल्फ़ों का तेरा दरिया भी मग़रूर है

    वाह दानी जी .. क्या लाजवाब गज़लें कहीं हैं ...
    हर ग़ज़ल में रवानी है ... दिलकश अदा है दानी जी की ... बहुत खूब .

    उत्तर देंहटाएं
  9. सत्यम और नासवा जी का आभार ।

    उत्तर देंहटाएं

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