बुधवार, 1 दिसंबर 2010

माहिर रतलामी की ग़ज़लें

art8

हज़ार गम थे मेरी ज़िंदगी अकेली थी

खुशी जहान की मेरे वास्ते पहेली थी

 

वो आज बच के निकलते हैं मेरे साए से

की मैं ने जिन के लिए गम की धूप झेली थी

 

जुदा हुई ना कभी मुझ से गर्दिश-ए-दौरां

मेरी हयात की बचपन से ये सहेली थी

 

चढ़ा रहे हैं वो ही आज आस्तीन मुझ पर

कि जिन की पीठ पे कल तक मेरी हथेली थी

 

अब उन की क़ब्र पे जलता नहीं दिया कोई

कि जिन की दहर में रोशन बहुत हवेली थी

 

वो झुक के फिर मेरी तुरबत पे कर रहे हैं सलाम

इसी अदा ने तो "माहिर" की जान ले ली थी

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यूं दोस्ती के नाम को रुसवा ना कीजिए

तर्क-ए-ता'अल्लुक़ात की चर्चा ना कीजिए

 

जुर्म-ओ-सितम का पास भी उलफत में शर्त है

पलकों को आँसुओं से भिगोया ना कीजिए

 

ऐसा ना हो उम्मीद से रिश्ता ही टूट जाए

हर रोज़ मुझसे वादा-ए-फर्दा ना कीजिए

 

हमदर्द जिस को अपना समझते रहे हैं आप

उस का ही ज़िंदगी में भरोसा ना कीजिए

 

"माहिर" वाफ़ुर-ए-गम से ना घबराए कभी

खुद्दारी-ए-हयात को रुसवा ना कीजिए

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(साभार उर्दूपोएट्री.कॉम से लिपि-परिवर्तित)

5 blogger-facebook:

  1. अच्छे ग़ज़लियात , माहिर जी को मुबारक बाद।

    उत्तर देंहटाएं
  2. अब उन की क़ब्र पे जलता नहीं दिया कोई

    कि जिन की दहर में रोशन बहुत हवेली थी

    हमदर्द जिस को अपना समझते रहे हैं आप

    उस का ही ज़िंदगी में भरोसा ना कीजिए


    बहुत खूबसूरत गज़ल कही हैं। गहरे भाव लिए हुए बेहतरीन रचना

    यहां भी आइए
    http://veenakesur.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  3. माहिर जी ये ग़ज़ल बहुत ही सच्चाई बयां करती है.. सुंदर प्रस्तुति...

    .

    .

    उपेन्द्र

    सृजन - शिखर पर ( राजीव दीक्षित जी का जाना )

    उत्तर देंहटाएं

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