गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का संस्मरण - मैं झंडूबाम हुई डार्लिंग तेरे लिये

दो मित्रों में वार्तालाप जारी था। पुराने लंगोटिया यार थे और कई दिनों के बाद मिले थे इसलिये बिना किसी औपचारिकता के बातचीत कर रहे थे। एक ने पूछा..

"क्या करते हो आजकल"

"लिखता हूँ" दूसरे ने जबाब दिया।

"क्या लिखते हो"

"कविता कहानी वगैरह"

"परंतु करते क्या हो" पहले ने करते शब्द पर जोर देकर पुन: पूछा।

"कहा न लिखता हूँ"

"अरे भाई वह तो ठीक है कि लिखते हो किंतु अपने पेट के लिये क्या करते हो?बीवी बच्चे इनका खर्च....."

ऐसे वार्तालाप अक्सर सुनने को मिलते रहते हैं ।लिखना भी कोई काम है छि छि इससे भी कहीं पेट भरता है\

लोगों की आम धारणा तो यही है कि लिखना निट्ठल्लों सिरफिरों और नालायकों का काम है। वैसे भी हमारे देश में जब लोगों के पास कोई काम नहीं होता तो वे इश्क करने लगते हैं या लिखने लगते हैं। आजकल नालायकों और निक्खटुओं के लिये राजनीति में अच्छे स्कोप हैं। किंतु हर नालायक राजनीति में सफल हो जरूरी नहींहै। आम तौर पर लेखक को भी कोई अच्छी द्र्ष्टि से नहीं देखता। दूसरों की द्रष्टि तो ठीक हैहमारी श्रीमती जी ने भी इस खाकसार के लेखन पर कुदृष्टि ही डाली है मेरा प्रारंभिक लेखन जो यदा कदा डायरी के पन्नों जो छोटे छोटे पुरचों में होता था उनकी कुदृष्टि का शिकार होता रहा। उन दिनो मेरे घर में गैस चूल्हा नहीं था, शुद्ध देशी चूल्हे अथवा सिगड़ी पर भोजन पकता था। मुझे लगता है कि मेरे इन पुरचों में लिखीं कविताएं कहानियाँ यदि चूल्हे के हवाले नहीं होतीं तो शायद मैं बहुत बड़ा साहित्यकार बन गया होता। संपादकों को रचनायें भेजकर मैं इधर उधर थोड़ा थोड़ा छपने लगा था किंतु इससे भी श्रीमती जी के मन में मेरे प्रति कोई भाव जागृत हुये हों मुझे ऐसा कभी नहीं लगा। आखिर मैंने सोचा चूल्हे चक्की और गृहस्थी में खपने वाली महिला में साहित्य के कीटाणु किसी मस्कुलर या इनटरविनस इंजेक्शन द्वारा भी प्रविष्ट कराना भी संभव नहीं दिखता तो क्यों न उन्हें यश का लालच दिया जाये।

और् गहन मंथन के बाद मैंने उनके लिये कविता लिखने का मूड बन लिया। किंतु सवाल ये था कि क्या लिखूं और कैसा लिखूं कि ऐसा लगे कि यह कविता किसी महिला ने लिखी है। उन दिनों छायावाद का भूत उतार पर था महादेवी और् जयशंकर किताबों के भीतर ही उछल कूद रहे थे।

हां नई कविता छंद मुक्त उफान पर थे। फिल्मों में उबाल आ रहा था। श्रंगार एवं प्रेम में पगी हीर रांझा लैला मजनू जैसी फिल्मों का बाजार गर्म था। फिर क्या है मैंने अपने भीतर एक काल्पनिक महिला के पात्र को आत्मसात किया और लिख दी चंद पंक्तियाँ। फिर क्या था दो कविताएं तैयार थीं, उन्हें ताबड़तोड़ सविता श्रीवास्तव के नाम से नवभारत जबलपुर में छपने भेज दीं। मेरा सौभाग्य कहिये कि मेरी आत्मा की आवाज संपादकजी के कानों तक पहुंच गई और दोनों कवितायें" स्पर्श"..15/2/1990 को और"छूलो मुझकॊ" 11/4/1991 को छप गईं। सनद रहे और वक्त पर काम आवे इस जुमले की रक्षार्थ मैने दोनों अखबार सुरक्षित रखे हैं। और जब ये छपकर आईं तो मैने उन्हें दिखाया । प्रसन्न होना स्वाभाविक था, और कविता के प्रति नकारात्मकता कुछ कम भी हुई। अखबारों में नाम छपने की जो आनंदानुभुति होती है उन्हें भी हुई और राजाश्रय में कवियों को जैसा संरक्षण प्राप्त होता था थोड़ा बहुत मुझे भी अपने घर में मिला परंतु श्रीमतीजी को मैं कविता के प्रति समर्पित नहीं करा सका। फिर भी प्रयोग कुछ सफल तो रहा ही। दोनों कवितायें नीचे प्रस्तुत हैं।

स्पर्श ...

हवा चले जब हौले हौले/

कोई मुझे तो छू लेना/

अंबर भले छोड़ देना तुम

बस हरियाली भू लेना/

कल की बातें पड़ी अधूरीं/

धीरे धीरे कर लें पूरी

तन तो कोसों दूर खड़ा है /

मन की बस बित्ते भर दूरी/

सब कुछ चाहे मुझसे लेलो /

मुझको मगर मधु देना।

केश उड़ रहे मेरे काले /

ठौर ढूंढ़ते कंधेवाले /

अधर किनारे ढूंढ़ रहे हैं/

मिले जगह तो पाँव टिकाले।

लगे गुदगुदी स्प्न्दन की/

वह स्पर्श मुझे देना।

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छूलो मुझको...

पलकें मूंद रात सोई/

अब उसे जगाये न कोई /

स्मृति कलश छलके छलके

सपनों में आ हलके हलके/

हौले से आस पीठ थपके/

रसवंती से मधूरस टपके /

अधरों की छुअन महकती है

यादों की हँसी खनकती है /

इच्छा की फसल अभी बोई /

अब उसे रोंधना न कोई

कुछ कहता आंचल ढल ढलके /

वादे कर लो पूरे कल के /

लेलो हिसाब पल प्रतिपल के/

प्यासी है शाम बिना जल के

रंगों के अंग सुगंधित हैं/

बस तुमसे ही अनुबंधित हैं/

हुई छुई मुई खोई खोई

छूलो आकर मुझको कोई।

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काश आज का समय होता तो श्रीमतीजी को गाने का मौका अवश्य मिल जाता की मैं झंडू बाम हुई डार्लिंग तेरे लिये।

ये यादें जीवन में गुदगुदाने के लिये क्या किसी चुटकले से कम हैं?

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1 blogger-facebook:

  1. सुंदर कविताएं है | और संस्मरण भी बहुत बढ़िया है |

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