शनिवार, 4 दिसंबर 2010

रंजन विशद की कविता – प्यार की मेरी ये परिभाषा है संसार के सामने…

dr_ranjan (Custom)

कह रही है जहाँ की कथाएँ सभी,

विश्‍व झुकता रहा प्‍यार के सामने।

क्‍या कुटी क्‍या महल टिक न पाये कोई,

बह गये प्रीति की धार के सामने।

 

जिन्‍दगी के क्षितिज पर कभी भोर में,

फूटती चाह की जब लजीली किरन।

बस्‍तियाँ छोड़ कर वन में मीलों तलक,

चौकड़ी भरने लगता है मन का हिरन।

पांखुरी बन के बिछते रहे हैं हृदय,

प्रिय चितवन के अधिकार के सामने।

 

रूप पर मुग्‍ध होकर तपस्‍वी डिगे,

बादशाहों ने भी गदि्‌दयां छोड़ दीं।

रोकने के लिए दो दिलों का मिलन,

जो भी जंजीरें बांधी गयी तोड़ दी।

हारती ही रही ही हनक हर हनक,

मस्‍त पायल की झंकार के सामने।

 

जब विधाता ने खुद प्‍यार बांटा यहां,

हर नगर हर डगर हर सड़क हर गली।

उसकी मुस्‍कान की ही मदिर गंध से,

है सुगन्‍धित लता हर सुमन हर कली।

फिर भला शूल बोता है राहों में क्‍यों,

प्रश्‍न मेरा है संसार के समाने।

 

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डॉ. रंजन विशद

कवि

44 उमंग, पार्ट-2,

महानगर, बरेली उ.प्र. 09412679349

3 blogger-facebook:

  1. bahut sunder geet....
    bhav,pravah, laybaddhta,saralta , sahajta,sampreshankshamta sab kuchchh ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर प्रस्तुति के
    लिए आपको आभार एवं रंजन जी को बधाई

    पंकितियाँ जो अच्छी लगीं.--

    रूप पर मुग्‍ध होकर तपस्‍वी डिगे,

    बादशाहों ने भी गदि्‌दयां छोड़ दीं।

    रोकने के लिए दो दिलों का मिलन,

    जो भी जंजीरें बांधी गयी तोड़ दी।

    - विजय तिवारी 'किसलय '
    सकारात्मक एवं आदर्श ब्लागिंग की दिशा में अग्रसर होना ब्लागर्स का दायित्त्व है : जबलपुर ब्लागिंग कार्यशाला पर विशेष.

    उत्तर देंहटाएं

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