मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

मालिनी गौतम की कविता

Image065 (Mobile)

संग दिल इंसान सुधरेगा न आखिर कब तलक

ये दिले नादांन मचलेगा न आखिर कब तलक

 

पेड़ देते मौन आमंत्रण खुले आकाश को

बादलों से मेह बरसेगा न आखिर कब तलक

 

मछ्लियाँ बेबस तड़पती हैं अगर जल ना मिले

जल बिना मछ्ली के तड़पेगा न आखिर कब तलक

 

कर गुज़रने का इरादा हो अगर इंसान में

पत्थरों से नीर निकलेगा न आखिर कब तलक

 

दुखों का सैलाब आँखों से निरंतर बह रहा

ये चमन बरबाद सँवरेगा न आखिर कब तलक

 

शाख से बिछ्ड़े हुए कुछ फूल-पत्तों ने कहा

चार दिन का साथ छूटेगा न आखिर कब तलक

 

हर नज़र हर साँस मे बस इक तेरी ही आस है

तू मेरी हालत पे पिघलेगा न आखिर कब तलक

---

डॉ मालिनी गौतम

मंगलज्योत सोसाइटी

संतरामपुर-३८९२६०

2 blogger-facebook:

  1. ग़ज़ल की शर्तों को पूरी करती एक अच्छी कविता के लिये ्मलिनी जी को मुबारकबाद।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेनामी12:59 pm

    achhi lagi.

    aakhir kab tak..................? kyonki sanso ki bhi ek seema hi hai !!!!!

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------