मालिनी गौतम की कविता

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संग दिल इंसान सुधरेगा न आखिर कब तलक

ये दिले नादांन मचलेगा न आखिर कब तलक

 

पेड़ देते मौन आमंत्रण खुले आकाश को

बादलों से मेह बरसेगा न आखिर कब तलक

 

मछ्लियाँ बेबस तड़पती हैं अगर जल ना मिले

जल बिना मछ्ली के तड़पेगा न आखिर कब तलक

 

कर गुज़रने का इरादा हो अगर इंसान में

पत्थरों से नीर निकलेगा न आखिर कब तलक

 

दुखों का सैलाब आँखों से निरंतर बह रहा

ये चमन बरबाद सँवरेगा न आखिर कब तलक

 

शाख से बिछ्ड़े हुए कुछ फूल-पत्तों ने कहा

चार दिन का साथ छूटेगा न आखिर कब तलक

 

हर नज़र हर साँस मे बस इक तेरी ही आस है

तू मेरी हालत पे पिघलेगा न आखिर कब तलक

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डॉ मालिनी गौतम

मंगलज्योत सोसाइटी

संतरामपुर-३८९२६०

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2 टिप्पणियाँ "मालिनी गौतम की कविता"

  1. ग़ज़ल की शर्तों को पूरी करती एक अच्छी कविता के लिये ्मलिनी जी को मुबारकबाद।

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  2. बेनामी12:59 pm

    achhi lagi.

    aakhir kab tak..................? kyonki sanso ki bhi ek seema hi hai !!!!!

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