सोमवार, 20 दिसंबर 2010

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता - नटों के लिए नहीं आया फरमान

nat-23

नटों के लिए नहीं आया फरमान,

अधूरे रह गये बस सभी अरमान,

खेल प्रतिभा को नहीं मिली पहचान,

जिन्‍दगी ठोकर खाने को हलकान,

किलों की फतह के लिए सेंधमारी,

चस्‍पा ताजिन्‍दगी की बनी लाचारी,

पेचीदगी भरा कला बाजी का खेल,

सामंती सोच से नहीं खा पाया मेल,

जो नहीं थे खेल में कभी शामिल,

उन्‍हें सुविधा के लिए माना काबिल॥

--

surender agnihotri (Custom)

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन-120/132 बेलदारीलेन, लालबाग, लखनऊ

2 blogger-facebook:

  1. बधाई! लिखो,लिखो,खूब लिखो!
    इतनी सुंदर रचना सायास नहीं हो सकती। मैं भी लखनऊ का ही हूँ। मुझे बहुत सारी खुशी हुई तो थोड़ी-सी जलन भी वह इसलिए कि तुकबंदी करके लखनऊ की नाक जो कटा रहा हूँ।
    आपका ही(एक पाठक/शुभचिंतक)
    डाक्टर गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------