सोमवार, 13 दिसंबर 2010

एस के पाण्डेय का व्यंग्य : नाले बड़े दिलवाले

“…बिना साली, घरवाली, साले व ताल, तलैया तथा नदियों के तो जिया जा सकता है। मगर आज के समय में नाले व नालियों के बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।… “ – इसी व्यंग्य से.

हिंदुस्तान में कभी गंगा, यमुना और सरस्वती जैसी नदियों का अनोखा सगंम था। इनकी त्रिवेणी आस्था, विश्वास, सभ्यता, संस्कृति, भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की केंद्र हुआ करती थी। कहते हैं कालान्तर में सरस्वती विलुप्त हो गयी। गंगा और यमुना अभी शेष हैं। जानकार बताते हैं कि इतिहास अपने को दुहराता है। शायद फिर दुहराए। लगता है लोगों को उस दिन का इंतजार भी है। आज के युग में नदी सूखे,  बहे या रुके क्या फर्क पड़ता है ?  आज जरूरत है तो सिर्फ नालों और नालियों की।

आज  घरवाली व साली से ज्यादा जरूरत नाली की  होती है। अपनी घरवाली न हुयी तो क्या हुआ ?  कुछ दार्शनिक विद्वानों का मानना है कि जब दूध बाहर मिल जाये तो घर में भैंस रखना मूर्खता है। लेकिन आस-पड़ोस, इधर-उधर चाहे जितनी नालियाँ क्यों ना हों, बिना नाली के निभना मुश्किल है। इसी तरह साले से ज्यादा जरूरत नाले की  है। बहुत लोग जो शादी नहीं भी करना चाहते, अगर पता चले कि साला नहीं है, तो फ़ौरन तैयार हो जाते हैं। बिना साली, घरवाली, साले व ताल, तलैया तथा नदियों के तो जिया जा सकता है। मगर आज के समय में नाले व नालियों के बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।

एक से एक नाले कुछ तो ऐसे जिसमे निरा मल ही बहता है, आकर नदियों में गिरते हैं। नदियाँ नाले और नालियों का रूप लेती जाती हैं। वह दिन दूर नहीं लगता जब नदियों के जगह सिर्फ नाले बहेंगे। बुद्धिजीवियों को उस दिन का बेसब्री से इंतजार है। गंगा के श्वेत और यमुना के श्याम जल में काले-काले नाले गर्जना करते हुए गिरते हैं। कहते हैं कि काले दिलवाले होते हैं। तभी तो  नाले गर्जना करते हुए बहते हैं। दिन-दिन बढ़ते हैं और नदियों को अपने गिरफ्त में लेते जाते हैं। इससे नदियों का बहाव दिन-दिन शिथिल होता जा रहा है। दिलवाले हैं तो बढ़ेंगे ही। गिरफ्त में लेंगे ही वो भी डंके की चोट पर। एक से एक काले-काले विकराल नाले, चाहे हाथी डाल दो तो वो भी ना दिखे। जिन्दा, मुर्दा सब आसानी से समा जाते हैं। इससे हत्यारों को काफी सुविधा हुयी  है ।

दिलवाले गर्जते हैं, तर्जते हैं, गाते हैं। गाना ना गाएं, ऐसा कहीं संभव है। नाले कुछ इस तरह गाते हैं -

गर्जन करके हम सब बहते नदियाँ सिमटी जाती हैं ।

जो भी  देखो उनमें  बहता हम सब  से ही पाती हैं ।।

काले-काले हम दिलवाले देख हमें थर्राती हैं ।

ताल-तलैया नदियाँ बुझदिल हमको गले लगाती हैं ।।

दिलवालों की उमंगें सावन में जवां होती है। नाले नालियाँ भी तो दिलवाले ठहरे। वो भी सावन में और जवां हो जाते हैं। घर, आंगन गली और सड़क पर भी आ जाते हैं। जहाँ देखो वहीं छा जाते हैं। तब लगता है,  जैसे इधर-उधर, सड़कों पर जहाँ-तहाँ आज के दिलवाले गलबहियां डाले बैठे  हैं । मानो घर, आंगन, गली, सड़क ना होकर कोई पार्क या कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय कैम्पस हो ।

अपने पूर्वज बेचारे बिना दिल के ही कैसे जीते रहे  ?  कुछ विज्ञानियों को कोई शोध करना चाहिये । आज शोध के लिए विषय ही नहीं मिल पाता। लेकिन यह विषय बहुत ही काबिले गौर है। नोबेल प्राइज मिलना तय हैं। लेकिन किसी भारतीय को बदा हो तब तो ऐसा शोध करें । दिलवाले तो आज वाले हैं। पहले वाले नहीं थे। यह गुत्थी सुलझ जाय तो सकल मानव जगत का कल्याण हो जाय। इससे कई लाभ होगा। जिनका दिल खराब हो जाये। उनको पुराने हिसाब से जीवित रखा जा सकेगा । दिल बदलने-बदलवाने का चक्कर ख़त्म। खो भी जाये तो कोई झंझट नहीं। कोई ले ले या चुरा भी ले तो रोना नहीं पड़ेगा। ले जाओ हमें दिल की  जरूरत ही नहीं है। जब किसी को दिल की जरूरत ही नहीं रह जाएगी तो लेना-देना, चुराना सब अपने आप बंद हो जायेगा। काश ऐसा हो जाता !

नाले और नालियाँ जो भभके छोड़ते हैं। वह भी वहुत काबिले तारीफ है। इसके बहुत फायदे हैं। लोग इसके आदी हो चुके हैं। बिना इसके जीना दुस्वार हो सकता है। स्वास्थ्य बिगड़ जाने का खतरा ऊपर से। नदियों में ना ही ये गुन था और ना है। इसीलिए तो आज लोग मुंह मोड़ लिए। शहरों में नालों जैसे तालों में पशु और बच्चे भी स्नान करते दिखाई पड़ जाते हैं। लोग कपड़े भी साफ करते दिखते हैं। खैर दिलवालों को तो सिर्फ दिलवाले ही भाते हैं। दिलवालों को ना कोई रोक सका है, और न ही रोक पायेगा । वे गायेंगे, नाचेंगे, गर्जेंगे, तर्जेंगे,  दौड़ेंगे, चढ़ेंगे और बढ़ेंगे वो भी खुलकर व  खोलकर भी। कोई क्या कर लेगा ?

दिलवाले तो दिलवाले ही ठहरे चाहे खुलकर बोलें चाहे खोलकर। अब चूंकि नाले भी दिलवाले हैं,  तो खुलकर बहते हैं और खोलकर कुछ ऐसा कहते हैं -

ताल-तलैया, नदियों की नामो-निशां मिटा देंगे ।

आने वाली पीढ़ी को अपना जौहर दिखला देंगे ।।

गाँव-शहर, घर सभी जगह दिलवाले दिखलायेंगे ।

भूलेंगे सब पिछली बातें नालों के गुन गायेंगे ।।

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- डॉ एस के पाण्डेय,

समशापुर(उ.प्र.) ।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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