मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

एस के पाण्डेय का व्यंग्य – नास्तिक जी कथावाचक

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नास्तिकजी कथावाचक की अपनी अलग फिलोसोफी है। इनके चेले सर्वत्र व्याप्त हैं। आज के ज्ञानियों की भी अपनी अलग फिलोसोफी होती ही है। खैर कुछ समय पूर्व इनसे परिचय हुआ तो अचानक बिचार आया कि पाठकों से भी इनका परिचय कराया जाय।

नास्तिक जी कथावाचक हमारे एक परिचित के पड़ोसी हैं। इन्हीं परिचित महोदय से इनके सत्संग के बारे में हमें भी कुछ जानकारी मिलती रहती है। अभी हाल में ही पता चला कि सत्यदेव जी भ्रष्टाचारी के यहाँ इनका सत्संग अक्सर होता रहता है।

एक बार नास्तिक जी से हमारी कुछ बात उनके नाम और काम को लेकर हो गई। मैंने कहा कि आप नास्तिक होकर भी लोगों को भगवान की कथा सुनाते हैं। प्रवचन करते हैं। कितना बड़ा विरोधाभास है ? ये बोले कि आज विरोध कहाँ नहीं है ? आभास भले ही न होता हो। पति अपने पत्नी का तथा पत्नी अपने पति का विरोध करती है।

पिता-पुत्र, माँ-बेटी, शिक्षक-विद्यार्थी, गुरु-शिष्य आज विरोध किसके बीच नहीं है। एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी से विरोध रखता है, एक समुदाय व जाति के लोग दूसरे समुदाय व जाति से विरोध रखते हैं। एक देश दूसरे देश का तथा एक प्रदेश दूसरे प्रदेश का विरोध करता है। किसी दूसरी राजनैतिक पार्टी की बात ही जाने दीजिए। अपनी ही पार्टी के नेताओं के बीच विरोध चलता रहता है। विपक्षी दल हर मुद्दे पर सरकार का विरोध करते हैं। और इसलिए ही आज विपक्षी दल विरोधी दल कहलाते हैं। हर विभाग, हर तन्त्र में विरोध है। बताइए विरोध कहाँ नहीं है ? आज जहाँ विरोध नहीं है वहाँ कुछ नहीं है।

और तो और आपके गणित और विज्ञान में भी विरोधाभास है। आप लोग गणित में सही और गलत विरोधाभास से ही सिद्ध करते हैं। मुझे तो पहले से पता था कि किसी नास्तिक को तर्क में पछाड़ना तो दूर अपने तर्क से थोड़ा भी विचलित कर पाना कुत्ते की दुम को सीधा करने वाली बात या चातक को अन्य जल पिलाने वाली बात होगी। धरती में तारे निकल सकते हैं, हथेली में बाल उग सकते हैं, जो कभी नही हुआ शायद वह भी हो सकता हो लेकिन यह कदापि नहीं हो सकता। फिर भी जानबूझकर मैंने यह जहमत मोल लिया था।

मैंने कहा आपकी बात सही है। आज हर व्यक्ति खुद का विरोधी हो गया है।

मन और आत्मा का बिरोध करते-करते लोग जलने लगे हैं। शांति नहीं है।

शांति के लिए अपने अहं का मरहम भले ही लगाते फिरें फिर भी सच्ची शांति कहाँ मिलती है ? कुछ भी हो लेकिन आपके नाम और काम वाले बिरोध तथा अन्य बिरोधों में थोड़ा अंतर है। कैसे निभता है ? लोग कैसे सामंजस्य बिठाते है ? आपको काम मिलता रहता है और आपके चेले दिन-दिन बढ़ते जा रहे हैं।

नास्तिक जी बोले अंतर कुछ भी नहीं है। सिर्फ समझने और समझाने का अंतर है। मैं पूर्ण नास्तिक हूँ और मेरा अपना सिद्धांत है। मैं भगवान को नहीं मानता इसका मतलब यह तो नहीं कि मुझे अपना बिजनेस छोड़ देना चाहिए।

कथा बाचना मेरा काम है। धंधा है धंधा। जिससे मुझे दाम मिलता है। मैं एक तीर से दो शिकार करता हूँ। एक तो कथा कहकर पैसा कमाता हूँ। दूसरे लोगों को कथा के दौरान ही तर्क देकर समझाता हूँ कि भगवान नहीं हैं। कहीं-कहीं खुद अपने को और कहीं-कहीं यजमान को ही भगवान बना देता हूँ। कल नेता जी के यहाँ कथा हो रही थी तो मैंने कहा कि आपसे बड़ा भगवान कौन है ? सरकार से लेकर कार तक आपके वश में है। आप आसमान में उड़ते हैं। कभी यहाँ तो कभी वहाँ दिखते हैं। लोग भगवान से नौकरी और प्रमोशन आदि की मिन्नत मांगते हैं। लेकिन आप जिससे खुश हो जाते हैं उसे नौकरी, प्रमोशन तो क्या बहुत कुछ क्षण मात्र में ही मिल जाता है। और आपके रुष्ट होने पर ये सब चीजें हवा हो जाती हैं। आप जीवन भले ही न दे सकें, लेकिन ले सकते हैं और कितनों का ले भी चुके है। इसे आपके विरोधी भली भांति जानते हैं।

मैंने उनसे कहा कि नेता की छोडिये, लेकिन जब आप ऐसा समझाते हैं तो अन्य लोग आप से कथा सुनते ही क्यों हैं ? आपसे प्रबचन क्यों कराते हैं ? नास्तिक जी बोले आप क्या समझते हैं कि लोग इसलिए कथा सुनते हैं कि उनको भगवान या उनकी कथा से कोई प्रेम है ? वे भक्त हैं। वे भगवान के दर्शन के भूखे हैं।

ऐसा कुछ भी नहीं है। बहुत से लोगों के लिए कथा अथवा प्रबचन सुनना, सुनने जाना अथवा करवाना भी इन्जोयमेंट का एक तरीका है। लोगों का इससे भी इंटरटेनमेंट होता है। कुछ लोग तो केवल इसलिए कथा अथवा प्रबचन कराते हैं क्योकि उनका पड़ोसी ऐसा करा चुका है। कुछ लोग इसी बहाने अपना रुतबा दिखाते और बढ़ाते हैं। चार लोग इकट्ठा हो जाते हैं, हँसते हैं, बोलते हैं। भाई चारा बढता है। चुहुलबाजी होती है। यह सब क्या कम है ?

नास्तिक जी जब कथा कहते हैं तो भगवान की लीलाओं पर कम और राक्षसों की लीलाओं पर ज्यादा गौर फरमाते हैं। उनके बल, पराक्रम, का बढ़ा-चढ़ाकर बखान करते हैं। भगवान और राक्षस के बीच के सम्वाद को समझाने के लिए यहाँ-वहाँ से तर्क देकर राक्षस के पक्ष को ही जायज ठहराते हैं। कहाँ तक बताएं ? छोड़ना ही बेहतर है।

मैंने जब यह जानना चाहा कि क्या आप किसी कारण बश ऐसा हो गए हैं अथवा आप आरम्भ से ही ऐसे हैं। तब नास्तिक जी ने एक राज की बात बतायी। बोले पहले मैं नास्तिक नहीं था और सनातन धर्म की ही कथा सुनाया करता था। कथा मुझे अच्छी लगती थी और इसलिए ही धीरे-धीरे मैंने लोगों को कथा सुनाने का काम शुरू किया था । लेकिन पहले लोग मुझे इतना महत्व नहीं देते थे। मेरी कथा सबको फीकी लगती थी।

मेरे गुरूजी कहते थे कि बेटा देश के आजादी की लड़ाई में भगत सिंह , सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद आदि ने किसी के कहने से बलिदान नहीं दिया था। बल्कि उनके रक्त में इस भारत देश की माटी से प्रेम था। देश प्रेम था। देश की दुर्दशा देख व सुनकर उनकी रक्त शिराएँ फटने लगती थीं। उनके खून में उबाल आ जाता था। और आज भी देश की दुर्दशा देख-सुनकर जिसका मन खिन्न हो जाता हो, उत्तेजना आ जाती हो, भले ही क्षणिक क्यों न हो, समझना चाहिए उसकी शिराओं में भी किसी देश भक्त का ही रक्त है।

तब मैंने उनसे पूछा था कि इसका मतलब जो भगवान को गाली देते हैं, उनकी कथाओं-लीलाओं का अपमान करते हैं, खुद को भगवान समझते हैं, जिन्हें हरि कथा नहीं रुचती उनमें भी पहले वाले किसी राक्षस का ही रक्त होता है। तब यह सुनकर गुरूजी मुस्करा दिए थे।

यह बताते-बताते नास्तिक जी की आँखे भर आईं । उन्होंने आगे कहा कि जैसे दर्शक जो देखना चाहें वही दिखाना पड़ता है, वैसे ही जैसे श्रोता हों और जो सुनना चाहें वही सुनाना पड़ता है। क्या आप लोगों को विद्यार्थी जो पढ़ना चाहें वही नहीं पढ़ाना पड़ता ?

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एस के पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.) ।
URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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