मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

विजय वर्मा की हास्य व्यंग्य कविता : हम गधे हैं

हम गधे हैं.

हमारे देश आकर

सबके उल्लू सधे हैं,

हाँ ,जी ,हाँ !हम गधे हैं.

 

'अंकल सैम'भी आयें

अपना व्यापार बढ़ाएं

जबतक W T C नहीं गिरा था

आतंकवाद पर कुछ कह नहीं पायें

यहाँ आकर सबने सिर्फ

मीठे-मीठे भाषण पढ़े हैं.

हाँ ,जी,हाँ! हम गधे हैं.

 

तुम भी आओ,! जिआबाओ

अपनी डिप्लोमेसी दिखलाओ.

बिना कुछ ठोस वादा किये

१०० अरब तक व्यापार बढाओ .

हम पर तो 'अतिथि देवो भव;'के

कब से नशे चढ़े हैं.

हाँ ,जी ,हाँ!हम गधे हैं.

 

एक staple वीसा का तो

मसला अब तक हल हुआ नहीं

उनके होठों पर इस देश की खातिर

रहती है कभी दुआ नहीं.

शह देना हो या शस्त्र-नाभकिये

दुश्मन को तो भरपूर दिए

इनकी शह पर ही तो

दुश्मनों के हौसले बढे हैं.

हाँ,जी,हाँ! हम गधे हैं.

 

छीनी जिसने हजारों मील जमीन

भूल गए ,यह वही है चीन

इसने ही मानचित्र पे गलत

कश्मीर के नक़्शे गढ़े हैं

हाँ,जी,हाँ! हम गधे हैं

 

'६५' के आक्रमण की जिम्मेवारी

हमारे सर पर मढ़े हैं.

हाँ,जी हाँ!हम गधे हैं.

 

हे! निति-निर्धारक नेतागण

गाँठ बाँध लो अपने मन

जिसने इस पर विश्वास किया--

उसके आगे बस गड्ढे हैं.

हाँ,जी,हाँ! हम गधे हैं.

.--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,btps
vijayvermavijay560@gmail.com

6 blogger-facebook:

  1. बिल्कुल सही कह रहे हैं, हम गधे हैं जो गधों पर भरोसा करते हैं...

    उत्तर देंहटाएं
  2. बिल्कुल सही कह रहे हैं, हम गधे ही हैं ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. एक समसामयिक अच्छी रचना , बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  4. anshubhai ,indian citizen ,डॉ.दानी और रमेश जी
    आप सब का बहुत-बहुत आभार.,

    उत्तर देंहटाएं

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