गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

राकेश शर्मा की कविता - ओ गौरैया

Gauraiya

 

ओ गौरैया.....

ओ गौरैया
नहीं सुनी चहचहाहट तुम्हारी
इक अरसे से
ताक रहे ये नैन झरोखे
कुछ सूने और कुछ तरसे से।
फुदक फुदक के तुम्हारा
हौले से खिड़की पर आना,
जीवन का स्वर हर क्षण में
घोल निडर नभ में उड़ जाना।
धागे तिनके और फुनगियां
सपनों सी चुन चुन कर लाती,
उछलकूद कर इस धरती पर
अपना भी थी हक जतलाती।

खो गई तुम कहीं गौरेया

भौतिकता के अंध-जाल में

मानव के विकट स्वार्थ और

अतिवाद के मुख कराल में।
सिमट गई चिर्र-मिर्र तुम्हारी
मोबाइल के रिंग-टोन पर,
हँसता है अस्तित्व तुम्हारा
सभ्यता के निर्जीव मौन पर।

मोर-गिलहरी जो आंगन को
हरषाते थे सांझ-सकारे,
कंक्रीट के जंगल में हो गए
विलीन सभी अवशेष तुम्हारे।
तुलसी के चौरे से आंगन
हरा-भरा जो रहता था,
कुदरत के आंचल में मानव
हँसता भी था और रोता था।
भूल गये हम इस घरती पर
औरों का भी हक था बनता,
मानव बन पशु निर्दयी
मूक जीवों को क्यों हनता।

(The cheerful, gregarious house sparrows, once commonly seen flitting around the neighborhood, are in real trouble and are vanishing from the center of many cities and rural areas. Their recent decline has put them on the International Union for the Conservation of Nature (IUCN) Red List category)

प्रस्तुति : डॉ. राकेश शर्मा

डॉ. राकेश शर्मा

हिंदी अधिकारी

राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान

दोना पावला, गोवा-403004

6 blogger-facebook:

  1. बहुत सुन्दर रचना ...वाकई बहुत चिंता की बात है आम पशु पक्षी दुलर्व होते जा रहे है ...जो बचे है उन्हें बचाया जाये घर की छत पर रोज़ पानी का बर्तन भरे हम सभी जिस से प्यास से मरते कुछ पक्षी बच सकते हैं....

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी और समसामयिक कविता.
    इस मुद्दे पर गंभीर विचार जरूरी है.
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  3. कभी गौरैया की वजह से घर आंगन में चूं चूं की आवाज सुनाई देती थी, घर में जगह जगह घोंसले मिलते थे, छत पर अनाज सुखाना मुश्किल होता था, आज वही गौरैया देखने को नहीं मिलतीा बहुत सुन्‍दर कविता लिखी है आपनेा वैसे गौरैया पर एक स्‍वरचित कविता मैनें भी अपने ब्‍लॉग पर पोस्‍ट की थी जिसे पढ्ने के लिए इस लिंक पर जा सकते हैं http://gmaurya.blogspot.com/2010/03/blog-post.html

    उत्तर देंहटाएं
  4. Sundar rachana! Sach,is concrete ke jungle me ham qudrat ko kho baithe hain.

    उत्तर देंहटाएं
  5. भूल गये हम इस धरती पर ,
    औरों का भी हक़ था बनता।

    सुन्दर अभिव्यक्ति, बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुन्दर कविता...भावों की अतिषय अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं

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