सोमवार, 27 दिसंबर 2010

नागेश पांडेय 'संजय' का गीत - कौन आया

नागेश

कौन आया ?

 

द्वार पर आहट हुई है,

देख तो लो, कौन आया ?

 

तड़पते मन की कसक की

गंध शायद पा गया वह,

उसे आना ही नहीं था

मगर शायद आ गया वह।

मुझे घबराहट हुई है,

देख तो लो, कौन आया ?

 

ज्योति यह कैसी ? बुझाने पर

अधिक ही जगमगाई।

यह फसल कैसी ? कि जितनी

कटी, उतनी लहलहाई।

प्रीति अक्षयवट हुई है,

देख तो लो, कौन आया ?

 

थम गईं शीतल हवाएँ,

दग्ध उर बेहाल हैं जी।

प्यास अब भी तीव्रतम है,

पर नदी पर जाल है जी।

आस सूना तट हुई है,

देख तो लो, कौन आया ?

 

क्यों जगत की वेदनाएँ

पल रहीं मन के निलय में ?

मधुर सपनों की चिताएँ

जल रहीं जर्जर हृदय में।

जिंदगी मरघट हुई है,

देख तो लो, कौन आया ?

 

जिंदगी की देहरी पर,

मौत को रोके खड़ा हूँ।

नयन तुझको देख भर लें,

बस इसी जिद पर अड़ा हूँ।

एक ही अब रट हुई है,

देख तो लो, कौन आया ?

dr.nagesh.pandey.sanjay@gmail.com>

--
डॉ. नागेश पांडेय "संजय"
शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश (भारत) - 242001.

2 blogger-facebook:

  1. सुन्दर कविता ....


    तड़पते मन की कसक की

    गंध शायद पा गया वह,

    उसे आना ही नहीं था

    मगर शायद आ गया वह।

    मन को छूती पन्तियाँ ......

    उत्तर देंहटाएं
  2. नयन तुझको देख भर ले,
    बस इसी ज़िद पर अड़ा हूं।

    अच्छी कविता , बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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