गुरुवार, 2 दिसंबर 2010

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

ART BY NIVEDITA SHRIVASTAVA (Custom)

ग़ज़ल

क्‍या देखा क्‍या भोगा तुमने आकर दुनियादारी में।

हाथ बंटाने वाले कम हैं दुखः की सांझेदारी में।

 

हानि लाभ तलाशा जाता मदद के लेने देने में,

रिश्‍ते रोग विहीन रहे ना स्‍वार्थ की बीमारी में।

 

उसने उँचा मोल वसूला उसने वजन में कम तौला।

सब ने घाटा भरती करली अपनी अपनी बारी में।

 

अतुल त्‍याग मां का बेटों ने कर्जा मान उतारा तो,

फटा पुराना मां का आँचल फफक पड़ा लाचारी में,

 

रिश्‍तों का असतित्‍व बोध अब लेन देन से होता हैं,

लेनदेन क्‍या श्‍ोष भला रहता हैं टूटी यारी में।

 

जीवन रुपी नाम नकल मत पन्‍ने बरबाद करो,

नहीं वसूली हो पायेगी बेचा अगर उधारी में।

 

कृष्‍ण सुदामा का याराना इसी लिऐ मशहूर हुआ,

गर्जमंदको दे देने का सद्‌गुण था गिरधारी में

 

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ग़ज़ल

वो मुझको समझाने बैठा ।

अब की तीर निशाने बैठा।

 

कल तक अश्क पराये पौछे,

आखिर अश्क बहाने बैठा।

 

फिर कालिख तैयार करेगा।

जो कि दीप जलाने बैठा।

 

जो कल तो खुद ही मिट जाते,

वो ही वर्ण मिटाने बैठा ।

 

एक अबूझ मुअम्‍मा हैं जो,

वो उसको सुलझाने बैठा।

 

सूदखोर बस मूल चुका कर,

गिरवी सांस छुड़ाने बैठा।

 

अहसानों से हासिल की उस,

शोहरत पर इतराने बैठा।

 

सपनों के बुनकर से कह दो,

भोर तेरे सिरहाने बैठा ।

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ग़ज़ल 8

वो अपनी पर अड़ा हुआ है।

सिर के बल ही खड़ा हुआ है॥

 

कद तो ज्‍यादा नहीं हैं लेकिन

बस बौनों में बड़ा हुआ है।

 

लगे सामना हुआ हैं सच से,

चेहरे का रंग उड़ा हुआ है।

 

अध जल घघरी सा छलके है,

तिस पर चिकना धड़ा हुआ है।

 

सिर पर चढ़ने की ठानी थी,

पर कदमों में पड़ा हुआ है।

 

संदेहों का मारा है वो,

किस किस से वो लड़ा हुआ है।

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दामोदर लाल जांगिड

पो0लादड़िया

नागौर-राज0

1 blogger-facebook:

  1. shandar gazalen shaya karane ke liye bhai raviratalami ko dhanyawad rajesh vidrohi,Ladnun Raj

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