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कुछ उम्दा कविताएँ

—निरंजन कुमार ‘निराकार’, रतलाम

जरूरत के जबड़े में

आदमी के सामने—

जरूरत का विशाल पहाड़ खड़ा है।

आदमी परेशान है

जरूरत की एक पूर्ति के बाद

दूसरी सिर उठाती है।

टक्कर लेने इसे

नित्य तनाव भरी दौड़ में व्यस्त।

संताप पाले/गाफिल रहता है आदमी/

जरूरत /सुरसा का मुँह खोले।

आदमी को भस्मसात करने में व्यग्र/तत्पर

बेहतर यही है/अच्छी समझ के आदमी के लिए

कठोर निर्णय ले/निर्ममता से कुचले/

धकेले/धकेलता जाये— ‘जरूरत’

संयम/धैर्य सादगी के शस्त्र से

विवेक शून्य न हो—

भौतिकता की चकाचौंध में

जरूरत के/ जबड़े में फंसा आदमी

पछाड़ खा, कहीं का न रहता है।

वजूद अपना

खो देता है/ आदमी।

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मान भी लो

— बाबुभाई हरिभाई कापड़िया, रतलाम

बंद हो अब ये तकरार

सच्चाइयों को करें, स्वीकार

साठ साल बीत गए कल

अब छोड़ो...

बचपन वाली वैसी चाल

अब बात कुछ यों बनी है—

सिर्फ बात तीनों जजों की होगी

फैसला तीनों ने, तीनों का दिया

तारीख ३० में, तीन को गिनो

आगे कदम का अन्तराल भी माह तीन है

अतः मामला अब एक—दो—तीन करो

जरा सोचो—

फैसला है विधि और विधान का

तीसरा है विद्वान का

तो—अब मान भी लो

या कहीं, ऐसा न हो कि—

जो पाया—वो भी खो बैठो

और अभी जो मिला , वह भी तो तुम्हारा नहीं

उदारता का अर्थ अपनाओ

मानवता का मर्म पहचानो

अपने ग्रंथों की बात को जानों

इतिहास बनाओ नाम कमाओ

इबारत के पन्नों को स्याही चूस न बनाओ

हम रोशन रहें, रोशनी हो पहचान हमारी

बनी रहे बुनियाद तवारिख में

करें दुआ हम ऐसी,

कामयाब बात हो हमारी।

‘अमन की जुस्तुजू’

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— फरीद खान, रतलाम

चमन को

चमन ही रहने दो,

इस चमन में

अमन रहने दो,

अमन से ही

चमन का वजूद है,

बहारें ठहर नहीं पाएंगी

अमन के बिना

इस चमन में,

न गुल खिलेंगे

न फ़िजा महकेगी

न बुलबुलें रहेंगी

न चमन की जीनत बचेंगी

न पंछियों की महफिलें सजेंगी

वीरान हो जाएगा चमन

अमन के बिना,

अमन के दुश्मन

चमन को उजाड़ने वाले,

और सैयाद ही बचेंगे

इस वीराने चमन में

अमन के दुश्मनों से

बचालो, इस चमन को

हरा—भरा, फूलता—फलता

रहने दो,

इस गुलिस्तान को

मेरे हिन्दुस्तान को।

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— वीरेन्द्र जैन, मंदसौर

वोट परस्ती जिनकी फितरत,

कुर्सी के हित करते कसरत !

अमन चैन की उड़ा धज्जियाँ,

करते रहते बेजा हरकत।

उनकी बेजा करतूतों से,

कैसे मिले चमन को बरकत?

ढ़ंग बदलते, दलबदलू ये,

जैसे रंग बदलता गिरगट।

अपने सत्ता सुख की खातिर,

बना रहे, हर बस्ती मरघट।

उनका नाम, मुलायम जानो,

सोच में जिनके, कूड़ा—करकट ।

ऐसे छुटभैयों को क्योंकर

मिल जाता, जनता का बहुमत ?

घृणा द्वेष फैलाने वालों,

वतन कर रहा तुमसे नफ़रत।

हमें चैन से, अब जीने दो,

हो जाओ धरती से रूख़सत।

मन में हो संकल्प शक्ति तो...

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—श्याम झँवर ‘श्याम’, नीमच

ईश्वर में विश्वास बढ़ा है, जीवन में प्रतिघातों से,

कुछ हमने भी सीख लिया है, दुनिया में संतापों से।

जीवन का उद्देश्य हो गया, भागो पैसे के पीछे,

सुधरा नहीं एक भी अब तक, भाषण, मंचों नारों से।

कैसे हैं संस्कार, कहाँ है दोष, समझ न पाये हम,

दादा—दादी हुए तिरस्कृत, आज यहाँ परिवारों से।

हुए नहीं हैं बन्द अभी भी, सब दरवाजे पुण्यों के,

ईश्वर प्राप्त नहीं होते हैं, माला मनकों जापों से।

कुछ भी मिलता नहीं मुफ्त में, दुनियाँ का दस्तूर यही,

कुछ पाया है ठोकर से तो, कुछ — कुछ मिला दुलारों से।

कोई नहीं समझ पाया है, यह दुनियाँ किस ओर चली,

सदाचार—सद्भाव खो गये, कर्मों और जुबानों से।

मन में हो संकल्प शक्ति तो, कर सकते हो कुछ भी तुम,

कोई फर्क नहीं पड़ता है, दुनियाँ के अंगारों से ।

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सर्वशक्तिमान

— लालबहादुर श्रीवास्तव, मंदसौर

सूरज तुम ना

दम्भ भरो

शक्ति का अपनी

ना भरो स्वांग

अपने तेज का

तुम तो देते हो

केवल दिनभर

रोशनी धूप की

पर नन्हें दीपक

को भी ना कम

आंको अपने से

जब तुम सो जाते हो

थककर, चूर—चूर होकर

नील गगन में

तब एक अकेला

नन्हा दीपक

‘सर्वशक्तिमान’

बनकर लड़ता है

निरन्तर

अंधियारे से ....

---

 

सोचो... खूब.... सोचो

— संजय परसाई, रतलाम

क्या तुमने महसूस की

अपनों की पीड़ा ?

तुम देख सकते हो

अपनों की मौत ?

यदि नहीं

तो क्यों करते हो वार

अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी से।

क्या तुमने सोचा है ?

जब नहीं रहेंगे पेड़

तो तुम भी बच पाओगे

सोचो.. खूब.. सोचो

पेड़ों के बारे में न सही

अपने बारे में।

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जीने का हौंसला

— जनेश्वर

दमघोंट हवाओं में जीते हुए

जहर कराए दिए पानी को

पीते हुए लगातार

महामारियों से लड़ते

जूझते हुए जीवन—रक्षक

दवाओं के ऊँचे दामों से

हर क्षण सीखते हुए

आत्महत्याओं के कारगर नुस्खे

वह शताब्दियों तक

जीने का हौंसला रखता है।

--

साभार - साप्ताहिक उपग्रह , दीपावली विशेषांक से.

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