गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल-गीत


      जैसे को तैसा
 
उस दिन सुबह दादाजी
भोर भ्रमण को निकल पड़े ,
बहुत तेज चलते जाते थे
जैसे जाते उड़े उड़े |
 
बीच सड़क एक कुत्ता आया
उन्हें देखकर गुर्राया ,
पहले भौंका जोर जोर से
फिर फिर गुर्रा डरवाया |
 
दादाजी ने बड़े प्रेम से
उस कुत्ते को पुचकारा ,
फिर भी वह जब न माना तो
घुमा छड़ी सिर पर मारा |
 
डंडा सिर पर पड़ जाने से
तुरंत भौंकना बंद हुआ ,
डर के मारे दादाजी के
पल भर में वह हवा हुआ।

यदि प्रेम से समझाने पर ‌
बात नहीं कोई माने तो ,
कर सकते तुम भी उपाय ‌
खुद अपनी जान बचाने को |
 
एक गाल पर थप्पड़ खाकर
दूजा गाल बताना मत ,
गाँधी का सिद्धांत कभी भी
अपने पर आजमाना मत |
 
समय आजकल वह आया है
जैसे को तैसा करना ,
जब तक हैं हम सही राह पर ‌
फिर बेमतलब क्यों डरना |
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