रविवार, 19 दिसंबर 2010

प्रमोद भार्गव का आलेख : विज्ञान के संदर्भ में खोजी पत्रकारिता

वैज्ञानिक जागरूकता और जन सशक्‍तिकरण के परिप्रेक्ष्‍य में खोजी विज्ञान पत्रकारिता की महत्‍वपूर्ण भूमिका हो सकती है। लेकिन हम विज्ञान से जुड़े व्‍यक्‍ति और वैज्ञानिकों को ही विज्ञान के क्षेत्र में कुशल मानते हैं। इसलिए जो पत्रकार विज्ञान पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय काम कर भी रहे है तो भी उनकी पत्रकारिता को विश्‍वसनीय कमोबेश कम ही माना जाता है। जबकि दवा परीक्षण (ड्रग ट्रायल), एड्‌स महामारी है अथवा नहीं, नकली दवा पर्यावरण का हृास और स्‍थानीय स्‍तर पर देशी वैज्ञानिकों की जानकारी देने वाले लेखन का सामने आना जरूरी है। भारतीय ज्ञान परंपरा एवं धार्मिक गतिविधियों व आचार-व्‍यवहारों में विज्ञान इस तरह गुंथा हुआ है कि उसे अलग करके देखा जाना असंभव है। जब धनुष पर बाण चढ़ाकर निशाना साधा गया तब यह विज्ञान की एक बड़ी खोज थी। लेकिन धार्मिक माने जाने वाले ग्रंथों में धनुष बाण का उल्‍लेख होने के कारण ऐसी उपलब्‍धियों को विज्ञान के क्षेत्र में स्‍वतंत्र खोज नहीं माना जाता। इसी तरह महाभारत में संजय ने धृतराष्‍ट्र को जिस दिव्‍य दृष्‍टि से कुरूक्षेत्र में चल रहे युद्ध का आंखों देखा हाल बताया वह किस खोज की आधार बिन्‍दु थी, इस ओर गहरा अनुसंधान करना हमारे वैज्ञानिक उचित नहीं समझते, जबकि इन विवरणों को आधुनिक वैज्ञानिक संदर्भों में परखने की जरूरत है। खेती-किसानी के क्षेत्र में भी भारत की ज्ञान परंपरा बेहद समृद्धिशाली रही है। हजारों तरह के बीज हमारे किसानों की जानकारी में हैं। ये बीज हमारी भौगोलिक स्‍थिति व स्‍थानीय जलवायु के हिसाब से पनपे और दीर्घकाल से प्रयोग में लाये जाते रहे हैं। इसके बावजूद हम हैं कि जेनेटिक इंजीनियरिंग के चलते बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के हित में बीजों की कीमियागिरी करने में लगे हैं। जबकि कुदरत सैकड़ों-हजारों वर्षों में जीन परिवर्तित करती है। ये ऐसे विषय हैं जिन्‍हें खोजी विज्ञान पत्रकारिता का हिस्‍सा बनाना चाहिए। लेकिन ज्‍यादातर विज्ञान पत्रकार इन मुद्‌दों पर इसलिए कलम नहीं चलाते क्‍योंकि इन्‍हें जब तक वैज्ञानिक संस्‍थाओं से जुड़े वैज्ञानिक मान्‍यता नहीं देते तब तक इन्‍हें प्रमाणिक नहीं माना जाता।

विज्ञान पत्रकारिता का उद्‌देश्‍य लोगों को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों और खोजों की समग्र जानकारी प्रदान करना है। अनेक ऐसे वैज्ञानिक और वैज्ञानिक खोजें, पद्धतियां, पारंपरिक ज्ञान और नवाचार के प्रयोग तब अज्ञात रह जाते हैं, जब उन्‍हें अखबारों में जगह अथवा कोई मंच नहीं मिलता। ऐसे लोगों में ग्रामीण क्षेत्रों में स्‍थानीय संसाधनों से आविष्‍कारों में लगे लोगों को लिया जा सकता है। जैसा कि हाल ही में अमेरिकी फोर्ब्‍स पत्रिका ने सात ग्रामीण भारतीय वैज्ञानिकों की जानकारी दी है। इन अविष्‍कारकों ने ग्रामीण पृष्‍ठभूमि से होने के बावजूद ऐसी तकनीकें ईजाद की हैं जिससे देश भर में लोगों को जीवन में बदलाव के अवसर मिले हैं। जबकि इनमें से ज्‍यादातर लोग प्राथमिक शिक्षा प्राप्‍त भी नहीं हैं। इनके नामों का चयन आईआईएम अहमदाबाद के प्राध्‍यापक और भारत में हनीबी नेटवर्क के संचालक अनिल गुप्‍ता ने फोर्ब्‍स पत्रिका के लिए किया था। ऐसा ही एक आलेख ‘बेकद्री के मारे देशी वैज्ञानिक' शीर्षक से रविवारी जनसत्ता में इस लेखक ने भी लिखा है। वाकई खोज परख कर विज्ञान पत्रकारिता के माध्‍यम से सामने लाई गई ये जानकारियां बेहद महत्‍वपूर्ण हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में विज्ञान और तकनीकी विषयों से संबंधित जानकारी निर्णय लेने की क्षमता के विकास में भी जिज्ञासु आविष्‍कारकों के लिए मददगार साबित हो सकती है।

विज्ञान के क्षेत्र में खोजी पत्रकारिता लगभग नगण्‍य है, परंतु स्‍वस्‍थ विज्ञान पत्रकारिता के लिए आज इसकी जरूरत है। आमतौर पर विज्ञान पत्रिकाओं के अधिकांश लेखक वैज्ञानिक होते हैं और वे विज्ञान से रोजगार के रूप में जुडे़ हुए हैं। जाहिर है कि इन वैज्ञानिकों द्वारा लिखे गए लेखों से यह बात तो उभर कर आती है कि अमुक विषय क्‍या है ? इसकी उपलब्‍धियां क्‍या हैं या हमारे देश में इस विषय पर क्‍या हो रहा है ? परंतु जब उस विषय पर हो रही खोज या खोज करने वालों के तौर तरीकों का प्रश्‍न आता है, तो वैज्ञानिक लेखक मौन रह जाता है और आलोचना से बचता है। अलबत्ता लेख केवल विषयनिष्‍ठ रह जाता है। निष्‍पक्षता का उसमें प्रायः अभाव रहता है। ऐसे लेख केवल विषय की प्रशंसा भर करते हैं। पाठक इस एकपक्षीय प्रस्‍तुतिकरण से संतुष्‍ट नहीं हो पाता। वह सिक्‍के का दूसरा पहलू भी जानना चाहता है। पाठक आविष्‍कार की मनुष्‍य के लिए उपयोगिता क्‍या है, यह भी परखने की ललक रखता है। इसलिए वैज्ञानिकों द्वारा लिखे गए एक पक्षीय लेख उसकी जिज्ञासा का शमण नहीं करते।

आज हमारे देश में जो विज्ञान लेखन हो रहा है वह अधिकतर विभिन्‍न विषयों के विवरणात्‍मक पहलुओं और उनकी प्रशंसा तक ही सीमित है। हमारे देश में अधिकतर विज्ञान लेखन और विज्ञान पत्रिकाएं राज्‍य पोषित अनुदान से प्रकाशित हो रहीं हैं, जिनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि विज्ञान का आलोचनात्‍मक पहलू प्रस्‍तुत करें। अधिकतर शोध कार्य भी सरकारी प्रयोगशालाओं में किया जा रहा है। वैज्ञानिक इन प्रयोगशालाओं में क्‍या कुछ कर रहे हैं, यह जानकारी भी इन पत्रिकाओं में नहीं होती है। बल्‍कि इन पत्रिकाओं में मंत्रियों, संपादकों और क्षेत्रीय सांसदों व विधायकों के ऐसे प्रशंसा पत्र बेवजह पृष्‍ठ घेरे होते हैं, जिन्‍हें विज्ञान की जानकारी देकर उपयोगी बनाया जा सकता है। इसलिए इन विज्ञान पत्रिकाओं में विज्ञान के उन तीन सोपान परिलक्षित नहीं होते है जो खोज, शोध और बोध से जुड़े होने चाहिए।

विज्ञान के क्षेत्र में जो भी भला या बुरा, उचित या अनुचित हो रहा है, वह सामने आना चाहिए। तभी विज्ञान पत्रकारिता का सर्वांगीण रूप स्‍पष्‍ट होगा। वह केवल विज्ञान और वैज्ञानिकों की स्‍तुति भर नहीं रह जाएगी। बल्‍कि यह सजग प्रहरी और जागरूक सलाहकार के रूप में विकसित हो सकेगी। ऐसा तब हो सकता है जब देश के वैज्ञानिक अपने कार्यकलापों को निष्‍पक्षता से जांचें, परखें तथा अपनी आलोचना व विश्लेषण स्‍वयं करें। इसके साथ ही देश में विज्ञान संचारकों का ऐसा वर्ग विकसित हो, जो विज्ञान पत्रकारिता को व्‍यवसाय के रूप में अपनाए। यह विज्ञान पत्रकार वर्ग ही प्रयोगशाला में घुसकर वैज्ञानिक अनुसंधान कार्य की खोज कर सकता है और उसे संचार माध्‍यमों के द्वारा आम आदमियों तक पहुंचा सकता है। विज्ञान पत्रकारिता सुदृढ़ हो, इसके लिए जरूरी है कि समाचार पत्र और समाचार चैनल विज्ञान की खोजी पत्रकारिता के लिए अलग से संवाददाताओं की तैनाती करें और विज्ञान खबरों के लिए जगह दें। यहां यह भी जरूरी हो जाता है कि खोजी पत्रकारिता का मतलब सिर्फ गड़बड़ियों की खोज खबर करके उसे प्रकाशित करना ही नहीं है बल्‍कि विज्ञान ने जो नए अनुसंधान किए हैं और जो अज्ञात हैं, उन्‍हें भी सामने लाना है। दूसरी ओर विज्ञान के क्षेत्र में भी पारदर्शिता, विज्ञान पत्रकारिता द्वारा लाई जा सकती है। इसकी खोज करने पर ही इनके कारणों का पता चल सकता है और उनके समाधान के उपाय ढूंढे़ जा सकते हैं। हमारे देश में अनेक प्रकार का पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विशाल भंडार है। अनेक ऐसी जानकारियां हैं जो स्‍थानीय स्‍तर पर तो प्रचलित हैं, लेकिन इन जानकारियों को भी लोगों के सामने लाया जा सकता है। यह ध्‍येय विज्ञान पत्रकार का होना चाहिए। अंधविश्‍वास दूर करने के क्षेत्र में भी वैज्ञानिक पत्रकारिता की उपयोगिता सिद्ध की जा सकती है।

कुछ लोग खोजी पत्रकारिता को भ्रमवश सनसनीखेज पत्रकारिता से जोड़ते हैं। जबकि दोनों परस्‍पर भिन्‍न है। संतुलित विज्ञान पत्रकारिता के लिए खोजी विज्ञान पत्रकारिता का भरपूर विकास किया जाना जरूरी है। यदि हम अपने चारों ओर नजर दौड़ाकर देखें तो हमारे आसपास ऐसे बहुत से विज्ञान विषयक सूत्र बिखरे मिलेंगे, जिन्‍हें यदि हम पकड़ने की दृष्‍टि हासिल कर लें तो एक सफल विज्ञान पत्रकार बन सकते हैं। दरअसल, वैज्ञानिक दृष्‍टिकोण का महत्‍वपूर्ण पहलू है खोज करना, जांच करना और उपलब्‍ध जानकारियों के माध्‍यम से अज्ञात जानकारियों की तह में जाकर विज्ञान सम्‍मत तथ्‍यों को ढूंढ़ निकालना। फिर यदि हम इन्‍हें कल्‍पनाशील शैली में प्रस्‍तुत करने में दक्षता प्राप्‍त कर लेते हैं तो विज्ञान पत्रकारिता के लिए यह एक उपलब्‍धि होगी।

अक्‍सर यह देखने में आता है कि हमारे समाचार पत्र-पत्रिकाओं में ज्‍यादातर रचनाएं, विदेशों से आने वाली फीचर प्रचार सामग्री पर आधारित होती हैं। एक तरह से इनके प्रकाशन में कोई बुराई नहीं है। लेकिन यदि इसके साथ ही हम देश में विकसित वैज्ञानिक जानकारियों, तकनीकों और वैज्ञानिक गतिविधियों को प्राथमिकता दें तो यह ज्‍यादा अच्‍छा होगा। इसके लिए आवश्‍यक है कि विज्ञान लेखक और पत्रकार स्‍वयं इस प्रकार की जानकारियां एकत्र करें। इस प्रकार जब वे प्रयोगशालाओं, विज्ञानकर्मियों, विज्ञान नीति-निर्माताओं के संपर्क में आएंगे तो उन्‍हें कुछ ऐसे सूत्र हाथ लगेंगे जिनको लेकर खोजी विज्ञान पत्रकारिता की राह पर वे आगे बढ़ सकते है।

हालांकि हमारे देश में केवल स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी पत्रिकाएं एवं स्‍तंभ पढ़ने की जिज्ञासा पाठक में सबसे ज्‍यादा है। क्‍योंकि स्‍वास्‍थ्‍य जीवन की लंबी उम्र से जुड़ा है। यदि आज चिकित्‍सा विज्ञान इतनी उपचार विधियों व दवाओं के आविष्‍कार में सक्षम नहीं हुआ होता तो मनुष्‍य का औसत जीवन 40 की उम्र पार नहीं कर पाता। 1900 में एक अमेरिकन व्‍यक्‍ति की औसत आयु 30 वर्ष थी जो आज बढ़कर 80 साल हो गई है। अमेरिका में दस परिवारों में से एक परिवार जरूर वैज्ञानिक पत्रिका पढ़ता है। अमेरिका में वैज्ञानिक लेख नहीं लिखते। विज्ञान पत्रकार ही लेख लिखते हैं। लेख की निष्‍पक्षता के लिए पत्रकार को जरूरी है कि वह दो वैज्ञानिकों से संबंधित विषय की जानकारी हासिल करे और किसी भी प्रकार के पूर्वग्रह से मुक्‍त रहे। तभी स्‍वस्‍थ व जनहितकारी विज्ञान पत्रकारिता सामने आएगी।

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pramodsvp997@rediffmail.com

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार हैं ।

3 blogger-facebook:

  1. "महाभारत में संजय ने धृतराष्‍ट्र को जिस दिव्‍य दृष्‍टि से कुरूक्षेत्र में चल रहे युद्ध का आंखों देखा हाल बताया वह किस खोज की आधार बिन्‍दु थी, इस ओर गहरा अनुसंधान करना हमारे वैज्ञानिक उचित नहीं समझते,"
    लेख तो अच्छा है ,विषय भी मौजू है मगर दृष्टि की विसंगति भी परिलक्षित है -
    उद्धृत अंश के सम्बन्ध में इतना ही कहना है कि प्रश्नगत किस्म की संकल्पनाएँ हमारे पूर्वजों की उर्वर कल्पनाशीलता की और इंगित करती हैं और आज प्रौद्योगिकी इन उर्वर कल्पनाओं को साकार करने में सक्षम है ....ऐसी संभावनाशील कल्पनाएँ करना कोई कम उपलब्धि थोड़े ही है !

    उत्तर देंहटाएं
  2. "अक्‍सर यह देखने में आता है कि हमारे समाचार पत्र-पत्रिकाओं में ज्‍यादातर रचनाएं, विदेशों से आने वाली फीचर प्रचार सामग्री पर आधारित होती हैं।"----बिल्कुल सही आकलन...बधाई....सिर्फ़ नकल करके आलेख लिखदेना काफ़ी नहीं है ...उस ग्यान का तादाम्य स्वदेशी ग्यान से होगा तभी अपनी स्वयं की प्रगति होगी...

    ---संजय की दिव्य-द्रष्टि..को सिर्फ़ कल्पना मानना ..हमारा यही अन्ध्विश्वास( विदेशियों द्वारा हमारी नकल करके हमारे ही ग्यान को अपना बनाकर, हमारे ग्यान को अन्धविश्वास कहना...)...हमें सिर्फ़ नकल पर जीने को मज़बूर कर रहा है और प्रगति में बाधक है...

    उत्तर देंहटाएं

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