रविवार, 12 दिसंबर 2010

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा का व्यंग्य -- राजनीति के लिए शैक्षणिक योग्‍यता

चाचा दिल्‍लगी दास राजनीतिज्ञों की न्‍यूनतम शैक्षणिक योग्‍यता तय करने के बारे में किसी के विचार पढकर भड़क उठे। आते ही गरज पड़े, बोले ये बुद्धिजीवी इस देश का बंटाधार करके ही छोड़ेगे । लो कह रहे है कि इन राजनीतिज्ञों की भी न्‍यूनतम योग्‍यता तय होनी चाहिए। पहली बात तो लाख प्रयासों के बघद भी ऐसा कानून बन ही नहीं सकता। अगर बन भी गया तो हरगिज पारित नहीं होने वाला। कोई भी अपने पैरों पर कुल्‍हाङी नहीं मारना चाहेगा। इस बिल के पक्ष में मतदान करके देख लेना पक्ष और विपक्ष अपनी आपसी रंजीशें भुलाकर इस मामले में सब एक राय हो जाएंगे। इस बिल की भी वहीं किरकिरी होगी जो महिला विधेयक की होती रहीं है।

भतीजे जब अंगूठा छाप नेता भी इतनी हेरा फेरी कर लेते हैं तो कल्‍पना करो जब ये पढे लिखे होंगे और नियम कायदों के जानकार, तो क्‍या क्‍या कर लेंगे। फिर इन्‍हें बिचौलियों की क्‍या जरुरत पड़ेगी ? विदेशी कम्‍पनीज से सीधा सौदा करेंगे और आना पाई सहित पूरा का पूरा कमीशन खुद ही डकारेंगे।

फिर बेचारे इन सचिवों को कौन पूछेगा। जब हमारे शिक्षित नेता हिन्‍दी बोल लेंगे और आंग्‍ल भाषा समझ लेंगे। फिर ये सचिव द्वारा लगाए निशान पर आंख मूंद कर दस्‍तखत कभी नहीं करेंगे। मेरे ख्‍याल से तो सारी की सारी प्रजातांत्रिक व्‍यवस्‍था ही गड़बड़ा जाएगी।

चाचा बोले- मगर भतीजे! इस माहौल में कानून बनाने से पूर्व में कभी कुछ हुआ है न आगे कभी कुछ होने वाला। तुमने सुना नहीं, तकरीबन सौ के आसपास आपराधिक प्रवृति वाले लोगों ने चुनाव में भाग लिया। वे कहीं न कहीं से तो निरपराध होने का प्रमाण पत्र लाए होंगे। फिर इस मुई शैक्षणिक योग्‍यता का प्रमाण पत्र लाना तो और भी आसान बात हैं। शैक्षणिक योग्‍यता मध्‍यमा तय की गई तो लोग शास्‍त्री का सर्टिफिकेट ले आएंगे। अगर स्‍नातक की डिग्री मांगे तो ये किसी विश्‍व विघालय से मानद ही सही, डाक्‍टे्रट की उपाधि ला कर अपने कमरे में फ्रेम में जड़वा कर टांक लेंगे। कानून बगलें झांकता रह जाएगा। इतना ही नहीं इनमें से कई तो ‘केम्‍ब्रिज' का नाम भी जानते हैं जिसका नाम लेकर चला लेंगे। तभी तो कह रहा हूं, मुझे ऐसे बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर अक्‍सर तरस आता है जब ये भारी चिन्‍तन कर के अपनी जुबान खोलते हैं।

हां यह बात नहीं कि ये बीमारी कोई लाइलाज है, अगर सही मायनों में जमहूरियत कायम रखनी है तो शैक्षणिक योग्‍यता मतदाताओं की तय कर देनी चाहिए। हर मतदाता ‘जेड प्‍लस ' की सुरक्षा मुहैया करवा देनी चाहिए, मतदान अनिवार्य कर देना चाहिए इससे दो फायदे एक साथ हो जाएंगे। देश में प्रजातंत्र तो नींद से जागेगा, चंद वर्षों में अशिक्षा भी दूर हो जाएगी। किसी भी जनप्रतिनिधि के चयन का आधार उसकी शिक्षा, निरपराध पृष्‍ठभूमि, कुशल नट कला, आर्थिक सम्‍पन्‍नता, बेदाग चरित्र नहीं होने चाहिएं। उसके चयन का आधार होना चाहिए वह त्‍याग जो उसने अपनी गली, मोहल्‍ले, गांव ,क्षेत्र के सर्वसाधारण व्‍यक्‍ति के लिए किया हैं। तब जाके ही मुल्‍क में सही मायनों में प्रजातंत्र पनप पाएगा।

अब तक चाचा अपनी काफी भड़ास निकाल चुके थे और कुछ कुछ सहज भी होते जा रहे थे। मगर जुबान अब भी कैंची की तरह चल रही थी। बोले इन बुद्धिजीवियों के विचार मात्र ‘लेबोरेटरी टेस्‍टेड'फार्मूले साबित होते हैं। जब इनको फील्‍ड में आजमाया जाता है, तो नकारा मालूम लगते हैं अब जन प्रतिनिधियों की शैक्षणिक योग्‍यता के शगूफे को ही लो। मुल्‍क में आधी से ज्‍यादा जनसंख्‍या अंगूठा छाप है और जो साक्षर है उनमें भी बाकायदा शिक्षितों की संख्‍या कम ही है । ऐसे में शिक्षित प्रतिनिधि अपने से कई गुणा ज्‍यादा बडे़ तबके का सच्‍चा प्रतिनिधित्‍व सपने में ही नहीं कर सकेगा। अतः यथा स्‍थिति के साथ छेड़ खानी करना कत्तई जरुरी नहीं है अब तक तो लोग केवल सरकारी नौकरियों पाने के लिए ही दौड़ धूप करते थे। अब राजनीति में आने के इच्‍छुक भी शिक्षण संस्‍थाओं के चक्‍कर काटने लगेंगे तो डिग्रियां और महंगी हो जाएगी।

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