शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

राजीव श्रीवास्तवा की कविताएँ और गीत

clip_image001

बरखा तेरे कितने रूप

नभ के आँचल से

पानी की फुहार जब,

धरा को अपने आगोश में,

लेती है,तो बरखा कहलाती है,

बरखा कई रूपों में आती है!

 

"प्रेम"रूप में बरखा

पिया मिलन की चाह,

जागती है, मन में प्रेम धुन,

बज उठती है, और जी करता है,

घर की मुंडेर पे, पी संग बैठ कर,

आस्मां से गिरते मोतियों को ,

घंटे निहारते रहे,

ये है"आनंदमयी बरखा"

"नटखट" रूप मैं बरखा

बच्चों को पुकारती है,

और बच्चे ,नंगे पांव बाहर आ जाते हैं,

और बरखा की बूँदों के साथ खेलते हैं,

उनके चेहरे पे जो भाव आते हैं,

वो बरखा ही ला सकती है,

ये है "एक प्यारी दोस्त बरखा"!

 

"उम्मीद" के रूप में बरखा

किसानों की आशाओं को,

पूरा करती है,उनकी मेहनत को

अंजाम देती है,उनका महीनों का इंतज़ार

ख़तम होता है,और हर तरफ बारिश के गीत

फ़िज़ा में घुल जाते हैं,

ये है"अन्नपूर्णा जैसी बरखा"!

 

'आनंद के रूप में बरखा,

तपती गर्मी से निजात दिलाती है,

परिवेश में हर तरफ शीतलता,

और मन में सुकून का अहसास,

आँखें आसमान को देख

सुकून के लिए शुक्रिया करती है,

और फिर "चाय और पकौड़े"

इनका बारिश के साथ,कुछ

और ही आनंद है,

ये है"राहत भरी बरखा"!

 

"चिंता" के रूप मे बरखा

घर में क़ैद कर देती है,

जिसका गम कई लोगों के

चेहरे पे साफ दिखता है,

और वो हर तरफ कीचड़

उफ़ ये बरखा ,अब बंद भी हो

जाओ ना,बहुत हो गया,

ये है"परेशान" करती बरखा"!

 

"भय" के रूप में बरखा

आँखें आस्मां पे टिकी रहती है

और रोज बढ़ रहा जलस्तर

बेचैनी बढ़ा देता है, मन में हर पल

ख़तरे का अहसास, वो बेघर हो जाने

का डर,बरखा ऐसा गजब मत करना!

ये है "खौफ़नाक' बरखा!

 

"काल" के रूप में बरखा

एक भयावह मंज़र ले कर आती है

और शुरू होता है तांडव

हर तरफ त्राहि-त्राहि, हर

तरफ चीख -पुकार, सब

कुछ तहस-नहस

,पानी से डर लगता है, और एक ही प्रार्थना

प्रभु रहम करो, रोक दो इस विनाश को,

नहीं चाहिए कभी बरखा,

ये है "दैत्यरूपी" बरखा!

 

जिस तरह जिंदगी खुशी

और गम लिए आती है

उसी तरह बरखा भी कई

रूपों में आती है!

---

सज़ा --मौत-(भ्रूणहत्या)

clip_image001[4]

कोख रूपी कटघरे में बैठी ,

एक अर्धविकसित बच्ची लाचार,

बाहर आने का बेसब्री से

कर रही थी इंतज़ार!

 

इंतज़ार एक नयी दुनिया ,

में अपनी आँख खोलने का,

इंतज़ार कुछ नये चेहरों ,

से अपना रिश्ता जोड़ने का!

पर जनम से पहले ही,

हो गयी ये बेचारी बर्बाद,

किसी ने इसका लिंग बताया,

और कर दिया अपराध!

 

समाज के इस कोर्ट में,

आज मुक़र्रर होगी सज़ा,

खुदा की इस देन पे,

इंसान देगा अपनी रज़ा!

 

माँ कर रही खूब प्रयास,

इसके मन में है एक आस,

कहा की ये जननी है,

इससे ही श्रृष्टि चलनी है!

 

कुछ लोगों ने ज़ोर लगाया,

स्त्री को एक बोझ बताया,

ग़रीबी और बेबसी बतलाई,

दहेज-प्रथा की याद दिलाई!

कभी जिंदगी जीत रही थी,

कभी मौत हावी हो रही,

अंत में माँ -बाप का टूटा हौसला,

और सज़ा-ए-मौत का किया फ़ैसला!

 

इस तरह एक और कन्या,

भ्रूणहत्या का हो गयी शिकार,

तरह-तरह के प्रयास कर रही,

फिर भी बेबस दिख रही सरकार!

----

मेरी जान मुझको गले से लगा लो एक गीत !

मेरी जान मुझको गले से लगा लो

बहुत हो चुका अब मुझे अपना लो !

 

कुंदन के कंगन में आशा के मोती

लिए बैठा हूँ अरमानों के ज्योति

उठा लो इन्हें हाथों में सज़ा लो !

मेरी जान मुझको गले से लगा लो

बहुत हो चुका अब मुझे अपना लो !

 

ये माथे का टीका है चंदा सरीखा

इसमें धड़कता है एक दिल किसी का

ये टीका उठा के माँग सज़ा लो !

मेरी जान मुझको गले से लगा लो

बहुत हो चुका अब मुझे अपना लो !

 

गजरे में लिपटी ये चंपा -चमेली

तुम बिन रहती है ये भी अकेली

इन्हें तुम उठा के केशों में छुपा लो !

मेरी जान मुझको गले से लगा लो

बहुत हो चुका अब मुझे अपना लो !

 

पायल की छम-छम से निकले मेरा दम

कही इनकी सरगम ना हो जाए अब कम

इन्हें पैरों में जगह दो,मेरा घर सज़ा लो !

मेरी जान मुझको गले से लगा लो

बहुत हो चुका अब मुझे अपना लो !

 

ये दीवाने की तड़प है ,हँसी में ना लेना

इस बार भी ना ये दिल तोड़ देना

अब मेरे नाम से अपनी माँग सज़ा लो !

मेरी जान मुझको गले से लगा लो

बहुत हो चुका अब मुझे अपना लो !

----


डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

2 blogger-facebook:

  1. "उम्मीद" के रूप में बरखा

    किसानों की आशाओं को,

    पूरा करती है,उनकी मेहनत को

    अंजाम देती है,उनका महीनों का इंतज़ार

    ख़तम होता है,और हर तरफ बारिश के गीत

    फ़िज़ा में घुल जाते हैं,

    ये है"अन्नपूर्णा जैसी बरखा"!

    ...................

    गजरे में लिपटी ये चंपा -चमेली

    तुम बिन रहती है ये भी अकेली

    इन्हें तुम उठा के केशों में छुपा लो !
    .................
    ये पन्तिया अछि लगी..

    कन्या भ्रूणहत्या इंसानियत के नाम पर कलंक की तरह है ...पर सायद समझ उस समय आईगी जब लडको की शादी के लिए लडकिय कम पड़ने लगेगी ......

    उत्तर देंहटाएं
  2. बरखा तेरे कितने रूप , अच्छी लगी। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------