रविवार, 26 दिसंबर 2010

डी.एल. खन्‍ना ‘प्‍यासा' की कविताएँ

तलाक

प्रश्न चिन्ह जब सम्‍बंधों पर लग जाते हैं,

सात जन्‍म के जीवन साथी पल में दूर चले जाते हैं।

शंका के अंकुश से उपजे,

बीज कहां फल पाते हैं।

सदियों के संस्‍कार हमारे,

पल में रूप बदल जाते हैं।

सात जन्‍म के जीवन साथी...

मन पर हावी इच्‍छाएं,

जब हो जाती हैं।

सही गलत की सब सीमाएं,

जाने कहां खो जाती हैं।

सात जन्‍म के जीवन साथी...

विश्‍वासों की आधारशिला,

जब हिल जाती है।

एक नीड़ के दो पंछी,

अलग दिशा को उड़ जाते हैं।

सात जन्‍म के जीवन साथी...

 

आशादीप

दुःख अक्‍सर सिरहाने आकर,

चुपके से कह जाता है।

जिस पत्‍थर ने ठोकर मारी,

गले उसे लगाकर देख।

दुःख के बादल जब घिर आये,

साथ अपनों ने छोड़ दिया।

जीवन की आपाधापी में,

गैरों को तू अपनाकर देख।

उम्‍मीदों के अंधियारे में,

आशादीप जलाकर देख।

मंजिल कितनी दूर हो तेरी,

पंखों को फैलाकर देख।

सागर तट से टकराकर,

लहरें, हरदम ये समझाती हैं।

पीछे हटने वाले मुसाफिर,

आगे कदम बढ़कर देख।

 

बचपन

ऐ लौट के आ बचपन मेरे,

जब तारों को गिनते गिनते,

बेसुध होकर सो जाते थे।

छोटी छोटी बातों पर हम,

कभी हसंते थे कभी रोते थे।

ऐ लौट के आ बचपन मेरे...

जब दर्द दवा का पता ना था,

मां की झोली बस दुनिया थी।

चंदा को मामा कहते थे,

तारों में हम खो जाते थे।

ऐ लौट के आ बचपन मेरे...

जुगनू का पीछा करते करते,

घंटों हम भागा करते थे।

गुडडे गुड़िया की शादी में,

दिन रात जश्‍न मनाते थे,

ऐ लौट के आ बचपन मेरे...

रिश्‍तों की दुनिया छोटी थी,

हर रिश्‍ते से प्‍यार निभाते थे।

तेरे मेरे का भेद ना था,

मिल बांट के सब कुछ खाते थे।

ऐ लौट के आ बचपन मेरे...

 

आदमी और जानवर

चिड़िया अपने नवजात को,

शेरनी अपने शावक को,

जलचर, थलचर, नभचर सभी,

सिखाते हैं, अपनी संतानों को,

शिकार के गुर, बचाव के उपाय,

जीवित रहने के लिए,

वंश और परम्‍परा को जीवित सौंपते हैं,

एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को,

बिना किसी विद्यालय के,

शिक्षण या प्रशिक्षण के,

एक मनुष्‍य को छोड़कर।

 

मनुष्‍य संतानों के लालन पालन में,

भूल जाता है उनको सिखाना,

समाज के नियमों को,

कर्तव्य को, दायित्‍व को,

प्रेम को, बलिदान को,

और उसकी भूल जन्‍म देती है।

स्‍वार्थी को, भ्रष्‍टाचारी को,

अपराधी को, आतंकी को,

मानवता रहित मानव को।

 

जीवन क्रम

'

बचपन गुजारा

खेले में, मेले में,

मां की झोली में

बाप की बाहों में

यौवन गुजारा

प्‍यार की मस्‍ती में

वंश की वृद्धि में

आर्थिक समृद्धि में

अधेड़ अवस्‍था गुजारी

बच्‍चों के विवाह में

उनके परिवार में

घर के संसार में

वृद्धावस्‍था गुजारी

अवहेलना में, उपेक्षा में

दर्द में इलाज में

गुजरे हुए इतिहास में

भूल गये हम

नश्‍वर संसार को

प्रभु के नाम को

मृत्‍यु के सत्‍य को

जीवन के अंत को

मोक्ष की राह को

 

प्‍यार

प्‍यार का कोई भी मजहब नहीं होता

प्‍यार की कोई भी भाषा नहीं होती

प्‍यार में कुछ भी असंभव नहीं होता

प्‍यार में कोई भी बंधन नहीं होता

प्‍यार मौत से कभी डरता नहीं

प्‍यार मौत से कभी मरता नहीं

प्‍यार में लुट जाती है सल्‍तनतें

प्‍यार में बन जाते है ताजमहल

प्‍यार जीवन का सुरीला गीत है

प्‍यार सांसों का मधुर संगीत है

प्‍यार यौवन का मधुमास है

प्‍यार ईश्वर का एक वरदान है

 

मैंने देखा है

धर्म के नाम पर मैंने

धर्म को ही मिटते देखा है

जातिवाद के विषधर को मैंने

देश की अखंडता को डसते देखा है

एक संतान की चाहत में मैंने

रात भर, बांझ को, सिसकते देखा है

आतंक की दहशत में मैंने

बंद तालों में खौफ देखा है

ताजमहल के कब्रखाने में मैंने

हथकटे मजदूरों की रूहों को देखा है

सात फेरों की पवित्र कसमों को

व्‍यापार में बदलते देखा है

देश के रहनुमों के हाथों मैंने

देश को ही बिकते देखा है

गुनाह की दुनिया के दरिंदों को

ऊंची कुर्सियों पर बैठे देखा है

मेहनतकश फौलादी हाथों में मैंने

मेरा भारत महान देखा है

 

हम तुम न बन सके

हम तुम न बन सके

तुम हम न बन सके

फासलों की दूरियाँ कभी न कम हुईं

ना तुम बदल सके, ना हम बदल सके

वफा तेरी पे हम

गिला न कर सके

वफा मेरी पे तुम यकीं न कर सके

ना हम तुम्‍हें समझ सके, ना तुम हमें समझ सके

यूं जिंदगी भर हम

साथ साथ चले

विश्‍वास के आधार को शक ने निगल लिया

ना तुम संभल सके, ना हम संभल सके

समझौतों का प्‍यार

कभी न टिक सका

प्‍यार की दूरियाँ कभी ना कम हुईं

ना तुम निभा सके, ना हम निभा सके

 

पक्षी

चल पंछी कहीं दूर चलें

आदमी जिस बस्‍ती में रहता हो

चैन से तुम कहां रह पाओगे

जड़ से ही जब काट देंगे पेड़ को

घोंसले तेरे कहां बच पायेंगे

हर पल कोलाहल हो जहां

प्‍यार के फिर गीत कहां गा पाओगे

बंधनों में आ गये एक बार तुम

फिर कहां आजाद तुम रह पाओगे

सीख लोगे शैतानियत इंसान से

मासूमियत वसीयत में नहीं दे पाओगे

मजहबी सरहदों में बंट गया जंगल तेरा

चैन से तुम मर भी नहीं पाओगे

---

-सम्‍पर्क सूत्र

5/3 तेग बहादुर रोड, देहरादून

1 blogger-facebook:

  1. "आशा दीप" लहरें अक्सर समझाती , दो कदम आगे बढ के देख्।
    सुन्दर रचना , बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

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