शनिवार, 4 दिसंबर 2010

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - रिक्शा जीवन

रिक्‍शा जीवन तेरी यही कहानी हाथों में हेण्‍डल पीछे सवारी। मगर कभी सोचा है आपने रिक्‍शा चालक जिन्‍दगी के बारे में क्‍या सोचता है। रिक्‍शा चलाने वाला, ठेले वाला, अॉटो वाला, ट्राली चालक और इसी तरह के अन्‍य लोग जिन्‍दगी से क्‍यों खफा है ? जिन्‍दगी उन्‍हें क्‍या दे रही है ? मुझे यह जानकर सुखद आश्‍चर्य हुआ कि लगभग पचास प्रतिशत रिक्‍शा वाले पढ़े लिखे हैं। अखबार पढ़ते हैं और देश दुनिया के बारे में अपना एक नजरिया रखते हैं। वे ढाबे पर खाते हैं। सस्‍ती शराब पीते हैं और तम्‍बाकू का शोक रखते हैं, घुटके तम्‍बाकू के बिना रिक्‍शा चलाना मुश्‍किल है। रिक्‍शा आम आदमी का आम आदमी के लिए आम आदमी द्वारा चलाये जाने वाला वाहन है। रिक्‍शा है तो परकोटे का जीवन अबाध गति से चलता है। बस डर है तो पुलिस के डण्‍डे का जो गरीब पर अक्‍सर जोर से पड़ता है और अमीर को देखकर दूर भागता है। कार वाले को पिटते हुए मैंने आज तक नहीं देखा है। मगर हर चौपड़ पर रिक्‍शा वाले को मारने, डराने, धमकाने, हांकने, टरकाने वाले पुलिस वाले हर समय मौजूद रहते है। गलती किसी की भी है, अन्‍त में गरीब ही मारा जाता है।

कब सांयकाल आवारागर्दी के दौरान मैने एक रिक्‍शे वाले को पूरे शहर का चक्‍कर लगाने को कहा ताकि कुछ समय व्‍यतीत होता और कुछ बात चीत भी हो सके। मैंने पूछा किस गांव से आये हो। उसने सीधा सा उत्त्‍ार दिया। बाबू जी हर गांव की सड़क रोटी की तरफ जाती है। रात कहां गुजारते हैं। यह पूछने पर उसने मासूम जवाब दिया यह बीस रूपये रोज के किराये वाला रिक्‍शा ही मेरा घर, गृहस्‍थी सब कुछ है। जब भी समय मिलता है किसी पेड़ के नीचे सुस्‍ता लेता हूँ। रेन बसेरे, रेल्‍वे स्‍टेशन, बस स्‍टेण्‍ड या किसी बन्‍द दुकान के बाहर रात गुजार लेता हूँ।

उसने कहा कि वह दसवीं पास है अखबार रोज पढ़ता है। उसे सेज से लगाकर मंत्रियों के भ्रष्‍टाचार की पूरी जानकारी थी। विनम्रतापूर्वक उसने कहा

बाबूजी एक आदमी को पेट भरने और तन ढकने के लिए कितना पैसा चाहिये। हजारो लाखों रूपये प्रतिमाह कमाने वाले और ज्‍यादा भूखे-प्‍यासे क्‍यों हो जाते हैं। उनकी भूख बढ़ती ही क्‍यों जाती है। क्‍या ये दो कमीज या दो पेंट एक साथ पहन सकते है ?

मेरे पास कोई जवाब नहीं था। उसकी भूख केवल रोटी, कपड़े और मकान की थी मगर बड़े लोगों की भूख भी बड़ी होती है, उसमें पूरा देश समा सकता है।

रिक्‍शा चालक अब तक मेरे से घुलमिल गया था, बाबूजी रिक्‍शे से तीन-चार हजार मैं और ढेड़ दो हजार घर वाली बर्तन, झाडू-पोछा करके ले आती है, दो बच्‍चे है। गुजारा हो जाता है। कभी-कभी खुश होकर पी भी लेता हूँ। महीने में एक दो बार सनीमा भी देख लेता हूँ व बच्‍चों को भी छुट्‌टी के दिन घूमा लेता हूं।

मगर बाबूजी, ये बड़ी बड़ी हिरोईने अधनंगा होकर क्‍यों नाचती है ? मैं फिर निरूत्त्‍ार था। रिक्‍शा चलता रहा वो बोलता रहा।

बाबूजी आजादी का लाभ केवल अमीरों के लिए है। एक दिन देखना ये माल, वैश्‍वीकरण के नाम पर भारत फिर गुलाम हो जायेगा। मैं फिर भी चुप रहा। एक घंटे से ज्‍यादा हो गया था, मैंने एक चाय ठेले पर उसे चाय पिलाई, पैसे दिये, कुछ ज्‍यादा दिये तो खुश होकर चला गया। मुझे अशोक चक्रधर की कविता याद आई।

‘‘बाबूजी रिक्‍शा पैर से नहीं पेट से चलता है।'' सचमुच रिक्‍शा पेट से चलता है, बाबूजी।

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2

फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

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