रविवार, 12 दिसंबर 2010

कृष्ण कुमार चन्द्र की कविता – चलता चल

ल कि चल चलता चल, चल,
चल चल चल, थक मत अपने सफर से।
खुद पे यकीं रख मिलेगी मंजिल,
मिलती नदी समंदर से।

राह पे कांटे लाख मिलेंगे,
फूल भी लेकिन खिलते हैं।
धरती और गगन को देखो,
जैसे क्षितिज पर मिलते हैं।
छोड़ के रण भागा नहीं करते,
सैनिक कभी भी डर से।

धरती नापी, सागर नापा,
और भी अब तैयारी है।
नीलगगन में खोजें नवयुग
जिनगी नयी हमारी है।
उठती हैं लीना, लहरें, सुनामी,
लड़ना लहर-कहर से।
चल कि चल...

मौत को भी तू पछाड़ता चल,
जब वो आये सामने।
मांगे मौत मदद जब तुझसे,
हाथ बढ़ाना है थामने।
वीर नहीं पीछे हटना तुम्हें ,
मानवता की डगर से।
चल कि चल...

चलना ही है जिन्दगी और,
रूकना मौत समान है।
चीर के धरती का सीना,
मुसकाये धान, किसान है।
पंछी का साहस तो देखो,
उड़ते हैं अपने पर से।
चल कि चल...

कृष्ण  कुमार चन्द्र

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