गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

संजय दानी की ग़ज़ल - बस प्यार है

 

प्यार बस प्यार है

प्यार बस प्यार है दोस्तों,
ज़ीस्त का सार है दोस्तों।

चांदनी बेवफ़ा है अगर,
चांद की हार है दोस्तों ।

मुल्क में मूर्खों का राज गर,
ग्यान बेकार है दोस्तों।

इश्क़ के हाट में सुख नहीं,
गम का बाज़ार है दोस्तों।

मेरे मन की ये गलती नहीं,
दिल गुनहगार है दोस्तों।

दोस्त हूं लहरों का, साहिलों,
को नमस्कार है दोस्तों ।

फ़िर शहादत पतन्गों की क्यूं,
शमअ गद्दार है दोस्तों।

हुस्न की चाकरी क्यूं करूं,
इश्क़ खुद्दार है दोस्तों।

गर कहे लैला जां दे दो तो,
मज़नूं तैयार है दोस्तों।

प्यार मजबूरी है दिल की,
हम, सब समझदार हैं दोस्तों।

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6 blogger-facebook:

  1. बहुत अच्छी ग़ज़ल .......

    दोस्त हूं लहरों का, साहिलों,
    को नमस्कार है दोस्तों ।

    हुस्न की चाकरी क्यूं करूं,
    इश्क़ खुद्दार है दोस्तों।

    अच्छी पन्तियाँ......

    उत्तर देंहटाएं
  2. मुल्क में मूर्खों का राज गर,..........ग्यान बेकार है .............मेरा वोट तो आपको संजय भाई, एकदम सच बात बोली है आपने|
    शमअ गद्दार है .................. सचं ये बात कहने के लिए बहुत बड़ा कलेजा चाहिए होता है|
    हम, सब समझदार हैं दोस्तों............... सही है, दिल तो बच्चा है जी|

    वाह वाह संजय भाई, मज़ा आ गया| इवेंट के लिए आपने कमर कस ली अब तो| जनवरी ३ से ५ के दरम्यान मित्र मंडली सहित आनंद उठाईएगा|

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. दोस्त हूं लहरों का, साहिलों,
    को नमस्कार है दोस्तों ।
    बहुत खूब!

    उत्तर देंहटाएं
  5. मन्जूला जी , नवीन भाई , सदा जी व अनुपमा जी का आभार व आप सबको नववर्ष की शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  6. jitna chhota meeter hai gazal ka bate apne utni hi badi kahi h ander ..

    Har sher apne aap me anootha hai

    Maja a gaya...

    उत्तर देंहटाएं

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