पुरुषोत्तम विश्वकर्मा का व्यंग्य – नेताजी की तोंद

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ज चाचा दिल्‍लगी दास के चेहरे पर क्रोध, घृणा, प्रतिशोध के मिले-जुले भाव दृष्‍टिगोचर हुए। और चाचा जब जब भी इस दशा को प्राप्‍त होते है तो उन शाश्‍वत क्षुद्र शब्‍दों का प्रयोग भी खुल कर करते हैं जिनको अपनी शिक्षक लाइफ में प्रायःकर प्रयुक्‍त करते थे। कह रहे थे बुरा हो उन कमीनों का जिन्‍होंने हमारे नेताजी की यह हालत कर दी। काया कभी किसी सूदखोर महाजन की भैंस जैसी थी आज वो किसी तपेदिक के मरीज से भी दुबली हो गई है।

नाक की नोंक जो तोते की चोंच सरीखी थी उसकी नोंक काफी घिस गई साफ-साफ मालूम पड़ रही है पता नहीं कितनों ने कहां-कहां कितनी बार रगड़वायी होगी बेचारे से। और कपड़े किसी वॉशिंग पाउडर की कम्‍पनी के विज्ञापन में दिखाई गई सफेदी से भी ज्‍यादा धवल रहते थे, आज किसी टे्रन यात्री की पोशाक को भी परे बिठा रहे थे, कोहनियों के उपर से कुर्ते व घुटनों के उपर से पायजामें की आस्‍तीनें फटी हुई थी जो चुगली खा रही थी कि पिछले दिनों में से एक भी दिन ऐसा नहीं निकला जिस दिन साष्‍टांग नहीं करना पड़ा हो।

अरे जिस शख्‍स को किसी के नमस्‍कार का प्रत्‍युत्तर देना तक नहीं आता था आज उसे पूरे छः घंटे हाथ जोड़े देखा। चबूतरे पर जमा बुजुर्गों के पांव छुए, कईयों को गले लगाया, कईयों से हाथ मिलाया। आज उनके चेहरे पर ऐसी दीनता पढ़ी गई जैसी तो दुर्योधन के मुंह पर भीम से जीवन दान मांगते समय भी नहीं देखी गई थी। कहते-कहते चाचा की आंखों में आंसू आ गए, जिनको उसने झ झट से चुनाव प्रचार के लिए आये पर्दे से पोंछ लिए।

मैं पूछने वाला ही था कि चाचा क्‍या तुम्‍हारे नसीब में सिर्फ रोना-धोना ही लिखा है, पूरे पांच साल लगातार रोते रहने के बाद आज भी बदस्‍तुर रो रहे हैं और आज के दिन के लिए कुछ आंसू भी बड़ी हिफाजत से सहेज रखे हैं। मगर यकबयक चाचा बुक्‍का फाड़ कर के हंस पड़े और अपने जाने पहचाने लहजे में बोल पड़े। रोये मेरी जूती, थोड़ा रो कर तो यह पर्दा झटक लिया था जिसका माकूल इस्‍तेमाल भी कर दिखाया। अपने नेताजी ने हाथी वाले दांत दिखाए तो जवाब में मैंने घड़ियाली आंसू बहा दिए। अभी तो नेताजी टिकट काटने वालों से निबट कर पत्ता काटने वालों के फेरे में आए हैं। देखना तेरा चाचा क्‍या कर दिखाता है।

लेकिन भतीजे उनकी वर्तमान हालत देख कर तो वाकई उन पर तरस आता है और तरस भी इतना कि एक बारगी दिल करता है कि इस बार और उन्‍हें वोट दे ही दूं। मगर नहीं क्‍यों कि दिल का कहा मानने वाले निरा मुर्ख होते है और पिछली गलती को फिर से दुहराने वालों की फेहरिस्त में तेरा चाचा आने वाला नहीं। मगर तुम्‍हारा चाचा रहम दिल है, संकल्‍प डगमगा भी सकता है।

हां अगर नेताजी को वो तोंद आज भी कायम रहती तो वास्‍तव में कईयों को आगाह करती कि अरे भाषणों की भूल भूलैया में आ जाने वाले छप्‍पन साल के बुढ़ऊओं ये वो तोंद है जिसमें कई सड़क, पुल, विकास योजनाएं ठूसी हुई है। अगर कभी खादी के चोले का कोना हटा कर देखा होता तो तोंद के अंदर न जाने क्‍या क्‍या कुलबुलाता नजर आता। तू निरा मूर्ख है जब जब इस तोंद ने खाया माल पचा कर डकार ली तू तब भी नहीं समझा, केवल अखबारों में आंकड़े देख-देख कर ही रीझता रहा।

कई बार इस तोंद को बदहजमी हुई तब पता चला कि इसने कुछ खाया है, खबरें छपी, तूल पकड़ा मगर आयोगों का आरोग्‍य चूर्ण उपलब्‍ध था सो खाया पिया हजम, बात खतम।

मगर भतीजे तोंद का क्‍या, तोंद का मालिक तो वो ही है। माना कि पिछली दफा खाया था तोंद बढ़ गयी थी, जिसे उगलवा कर उपर वालों ने अपनी-अपनी तोंदों में भर लिया, इनकी तोंद पिचक गयी। जब इनको अवसर मिलेगा सबसे पहले अपनी पिचकी तोंद को ही दुरुस्‍त करेंगे और वो अवसर टिकट में छुपा नहीं वो अवसर हम प्रदान करेंगे, और हमारे नेताजी इतने मूर्ख है कि हमको मूर्ख समझते हैं कि हम इनको फिर अपनी खाली हुई तोंद को भरने का अवसर देंगे। कह कर चाचा उठे और कुछ और चुनाव सामग्री जमा करने की कह कर रुखसत हुए। चाचा बड़े होशियार है लगभग तमाम पार्टियों के पर्दें हथिया लेते है जिनका इस्‍तेमाल कच्‍छा, बनियान, लूंगी, पिलोकवर, व थैले आदि में करते रहते हैं।

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा

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