शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

विजय वर्मा की कविता - जाड़े की धूप है, जरा सेंकने दीजिए...

देखने दीजिये.


इंसानियत के ख्वाब हैं, देखने दीजिये

जाड़े की धूप है ,जरा सेंकने  दीजिये.

 

हम तो आज सच बात ही कहेंगे,

लोग पत्थर फेंकते है, फेंकने दीजिये.

 

उनकी आत्मा तो बहुत पहले बिकी थी.

अब झूठे सपने बेचते है, बेचने दीजिये.

 

आज दिखा हूँ मै आपको जलता हुआ

वर्षों से जल रहा हूँ, जलने दीजिये.

 

ये रास्ता किसी मंदिर-मस्जिद को नहीं जाता

हम इसी पर चलेंगे, हमें चलने दीजिये.

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4 blogger-facebook:

  1. सुन्दर अभिव्यक्ति , बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति , बधाई हो |

    उत्तर देंहटाएं
  3. संगीता स्वरुप जी,डॉ.दानी और साहू जी
    प्रतिक्रिया के लिए धन्वाद.

    उत्तर देंहटाएं

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