रविवार, 12 दिसंबर 2010

मोहम्मद अरशद खान की कहानी : कूरम बाबा

कूरम बाबा

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डॉ. मोहम्मद अरशद खान

नानी का गांव किसे प्‍यारा नहीं होता। गर्मी की छुटि्‌टयां शुरू हुईं कि जाने की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। पढ़ाई से बंधनों से मुक्‍त होकर मन गौरैया जैसा फुदकने लगता है। बस, यही हाल मेरा भी था। मेरे मन में कभी शिमला-मसूरी जाने की इच्‍छा नहीं हुई। नानी के गांव के आगे सब कुछ फीका था। वहां मैं जी भर खेल सकता था, धूल में लोट सकता था, तालाब में तैर सकता था--जो मन में आए कर सकता था।

गांव में मेरे लिए जो चीज सबसे प्‍यारी थी, वह थे कूरम बाबा। सड़क से ही उनका गोल-मटोल शरीर दिखाई देने लगता था। मैं बेसब्री से अब्‍बू का हाथ छुड़ाकर दौड़ पड़ता। अब्‍बू हंस पड़ते। कहते, ‘‘तू तो लगता है अपने कूरम बाबा से मिलने ही गांव आता है। अरे, पहले चलकर नाना-नानी की दुआएं तो ले ले।'' कहकर अब्‍बू कलाई थाम लेते। मैं घूम-घूमकर कूरम बाबा को देखता चलता रहता।

आप सोच रहे होंगे कि यह कूरम बाबा कौन हैं ? अगर आप उन्‍हें चलने-फिरने, बोलने-बतलाने वाला कोई इंसान समझ रहे हैं तो सचमुच चौंक उठेंगे। कूरम बाबा और कोई नहीं नीम का एक पेड़ थे। पर किसी इंसान से ज्‍यादा बेहतर और प्‍यारे। सारा गांव उन्‍हें प्‍यार करता था, सम्‍मान देता था। इतना सम्‍मान जितना बड़े-बुजुर्गों को दिया जाता है। बहुत पहले जोर की आंधी में यह ढह गया था, मगर फिर भी कुछ जड़ें धरती को मजबूती से पकड़े रह गई थीं। इसलिए यह बचा रह गया था। पर अब इसका रूप बदल गया था। दूर से देखने से लगता जैसे हरे-हरे शैवालों को पीठ पर चिपकाए कोई कछुआ बैठा हो। बस, तभी से लोग इसे कूरम (कूर्म) बाबा कहने लगे थे।

राम प्‍यारे चाचा अक्‍सर हमें बताते, ‘‘एक बार विष्‍णु भगवान ने धरती को बचाने के लिए कूर्म के रूप में अवतार लिया था। यह नीम का पेड़ भी कोई साधारण पेड़ नहीं है। यह भी हर दुख-मुसीबत में हम सबकी सहायता करता है। गर्मियों में गांव के गांव आग की भेंट चढ़ जाते हैं, पर हमारे गांव को एक चिंगारी भी नहीं छूती। बारिश के दिनों में आस-पड़ोस के गांव तालाब बन जाते हैं, हाहाकार मच जाता है, पर यहां झूलों पर कजलियां गूंजती रहती हैं। यह सब इसी वृक्ष की महिमा है। यही हर आफत-विपत्‍ति से गांव की रक्षा करता है। अरे, महामारियों ने कौन सा गांव अछूता छोड़ा है ? चोरी-चकारी कहां नहीं हुई ? कहां झगड़ा-टंटा नहीं मचा ? यह सब कूरम भगवान की दया नहीं तो और क्‍या है ?''

प्‍यारे चाचा की बात सच लगती थी। दूर-दूर तक लहलहाते हरे-भरे खेत और मुस्‍कराते चेहरों को देखकर लगता था जैसे संसार का सारा सुख यहीं सिमट आया है।

गांव की औरतें कूरम बाबा के चरणों पर पानी चढ़ातीं, चरवाहे छाया में बैठकर दोपहर का भोजन करते, राह चलते लोग दो क्षण के लिए थकन मिटाने बैठ जाते। और हम लोगों की बात ही न पूछो। सारा दिन वहीं गुजरता। जब तक मामू की फटकार न मिलती, हम दोपहर का खाना खाने घर न पहुंचते। और भरी दोपहरी में, जब लू के थपेड़ों से धरती तवा बन जाती, लोग किवाड़ बंद करके ऊंघते होते, हम चुपके से कूरम बाबा के पास पहुंच जाते। फिर जब तक सूरज अलविदा न कह देता, आसमान काली चादर न ओढ़ लेता, हमारा खेल खत्‍म न होता।

घर के किवाड़ वजनी और पुराने थे। कोई चाहे कि ठेलकर चुपके से निकल जाए यह संभव नहीं था। ‘चररर...चर्र..'' करके फौरन चुगली कर देते। सच पूछो तो गांव में यही एक चीज थी जिससे मुझे चिढ़ थी। वैसे तो किवाड़ थे बहुत सुंदर। उन पर बेहतरीन नक्‍काशी थी। पर मेरे लिए तो वे शैतान से कम नहीं थे। इन्‍हीं के कारण मुझे मामू की डांट सुननी पड़ती थी। मामू तो वैसे भी बड़ी-बड़ी मूछों के कारण डरावने लगते थे, जब डांटते तो हालत पतली हो जाती। पर अपने कूरम बाबा के लिए मुझे डांट भी मंजूर थी।

कूरम बाबा गांव भर के पंच थे। लोग उनकी कसमें खाकर अपने फैसले किया करते थे। एक बार धनपाल ने झूठी कसम खाकर रामचरन के दो सौ रुपए हड़प लिए। रात में उसे सपना आया कि जोर-जोर से हवाएं चलने लगी हैं और कूरम बाबा तन कर खड़े हो गए हैं। अचानक पूरा का पूरा पेड़ ढह पड़ा और वह उसके नीचे दब गया है। सपना देखकर धनपाल के पसीने छूट गए। वह रात में ही भागकर रामचरन के घर पहुंचा और उसके रुपए वापस कर दिए।

कूरम बाबा पक्षियों के चहेते थे। एक डाल पर कौआ कांव-कांव करता तो दूसरी पर कोयल कूकती। एक तरफ कोटर में तोता रहता था, तो दूसरी ओर कठफोड़ा खुटखुटाता रहता। कठफोड़े की खुटखुट तो ऐसी लगती जैसे कूरम बाबा का हृदय धड़क रहा हो।

बारिश में जब फुंसियां निकल आतीं तो लोग उनकी छाल और पत्‍तियां लेने आते। लड़कियां निमौलियां इकट्‌ठा करके उनका तेल निकालतीं। राम प्‍यारे चाचा बताते, ‘‘बेटा, नीम पूरा हकीम होता है। इसका हरेक अंग उपयोगी होता है। इसकी छाल और पत्‍तियां ही नहीं, फल-फूल और तिनके तक काम में आते हैं।''

चाचा खुद मिट्‌टी के ठीकरे में फूल और तिनके भिगो देते थे और सुबह निहार मुंह उसका पानी पीते थे। कहते इससे रक्‍त शुद्ध होता है।

एक दिन हम लोग कूरम बाबा की गोद में खेल रहे थे कि वहां कुछ लोग आए और उन्‍होंने हमें डांटकर भगा दिया। शक्‍ल-सूरत से वे भले आदमी नहीं लग रहे थे। हमारे साथ आज तक ऐसा नहीं हुआ था। यह बिल्‍कुल नई बात थी। हम लोग दौड़कर राम प्‍यारे चाचा के पास पहुंचे और उनसे सारी बात बताई। चाचा चौंके नहीं, जैसा हम उम्‍मीद कर रहे थे। वह मुंह फेरकर खड़े रहे और बोले, ‘‘यह पेड़ उन्‍हीं लोगों का है।''

‘‘पर आप तो कहते थे कि कूरम बाबा सारे गांव के हैं?'' मैंने कहा।

‘‘कहा होगा।''

‘‘आपने तो कहा था कि कूरम बाबा भगवान का रूप हैं। भला भगवान किसी एक के कैसे हो सकते हैं?''

‘‘कहा न, तंग मत करो। यहां से जाओ।'' चाचा खीझकर पलटे तो उनकी आंखों में आंसू तैर रहे थे। चाचा का व्‍यवहार हमें बड़ा अजब लगा। हम डरकर भाग आए।

इस घटना के कुछ ही दिनों के बाद मुझे लौट आना पड़ा क्‍योंकि स्‍कूल खुल गए थे। नई-नई कापी-किताबों और नए-नए दोस्‍तों के बीच मैं सब कुछ भूल गया। दिन तेजी से बीतने लगे।

इम्‍तहान हुए। मैं आशा के अनुरूप न केवल प्रथम श्रेणी से पास हुआ बल्‍कि क्‍लास में भी अव्‍वल आया। अब अब्‍बू को वायदा निभाना था। थोड़ी ना-नूकुर के बाद वह गांव चलने के लिए तैयार हो गए, पर सिर्फ तीन दिनों के लिए। आफिस में काम होने के कारण उन्‍हें ज्‍यादा छुट्‌टी नहीं मिल पाई थी।

हम सुबह ही तैयार होकर चल पड़े। दोपहर होते-होते बस ने हमें गांव की सड़क पर उतार दिया। उतरते ही मैं आगे-आगे भागा। लेकिन आज सब कुछ जैसे बदला-बदला सा था। हमेशा दूर से ही डालियां हिला-हिलाकर स्‍वागत करने वाले कूरम बाबा आज वहां नहीं थे। मुझे लगा मेरी नजरों को धोखा हुआ है, या मैं दिशा भूल गया हूं। मेरे कदम ठिठक गए। जहां कूरम बाबा होते थे, आज वहां दो-मंजिला इमारत खड़ी थी। मैं हतप्रभ था। समझ में नहीं आ रहा था क्‍या करूं। जी चाहता था जोर-जोर से रोऊं और चीख-चीखकर पूछूं--‘‘ कूरम बाबा, तुम कहां हो...?''

किसी तरह दिलासा देते हुए अब्‍बू मुझे घर की ओर ले चले। मैं घर में बैठा रो रहा था कि गांव के एक लड़के ने आकर कहा, ‘‘अब्‍दुल, राम प्‍यारे चाचा तुम्‍हें बुला रहे हैं।''

मैं थके कदमों से चाचा के घर की ओर चल पड़ा। चाचा खाट पर लेटे हुए थे। उनकी आंखें भीतर धंस गई थीं। दाढ़ी बढ़ आई थी, गाल पिचक हुए थे। वह बीमार थे। मैंने आदाब किया तो अटकते हुए बोले, ‘‘सदा सुखी रहो मेरे बच्‍चे! बेटा, अच्‍छा किया तुम आ गए। देखने का बड़ा मन हो रहा था। ...बेटा, कूरम बाबा हमें छोड़ गए।'' कहकर चाचा बच्‍चों की तरह फूट-फूटकर रोने लगे। मैं भी अपनी रुलाई न रोक सका। चाचा ने मुझे सीने से चिपटा लिया और कहने लगे, ‘‘ कूरम बाबा रोज सपने में आते हैं...मुझे बुलाते हैं...अब मैं यहां नहीं रहूंगा। उन्‍हीं के पास चला जाऊंगा...।''

मैं सिहर उठा।

बाद में मामू ने बताया कि ठाकुर सूर्यपाल सिंह ने कूरम बाबा को कटवा डाला। वह पुराने जमींदार हैं। वैसे तो जमींदारी खत्‍म हो गई है पर अभी भी उनके पास सैकड़ों बीघे खेत, कई तालाब और दर्जनों बाग हैं। यह पेड़ उन्‍हीं की जमीन में था। इसे कटवाकर उन्‍होंने नया मकान बनवाया है। अब उनके नव-विवाहित बेटा-बहू इसमें रहते हैं। हम लोगों ने उन्‍हें रोकने की बहुत कोशिश की पर हमारी किसी ने नहीं सुनी। हमारे पास न तो इतनी ताकत थी और न इतना पैसा कि उन्‍हें रोक पाते।''

मेरी जिद पर अब्‍बू को दूसरे दिन ही वापस लौटना पड़ा। अब मेरे लिए गांव में कुछ नहीं बचा था। यही वह गांव था जिसके आगे दुनिया की सारी खुशी फीकी मालूम पड़ती थी। पर अब मुझे वहां हर तरफ शमशान-सा सन्‍नाटा और भय महसूस हो रहा था। मैंने दोबारा गांव न जाने का संकल्‍प ठान लिया।

लेकिन बहुत साल बाद जब नानी बीमार पड़ीं तो मां को लेकर गांव जाना पड़ा। अब गांव में काफी बदलाव आ गया था। मुख्‍य रास्‍ते पर खड़ंजा बिछ गया था। एक-दो जगह सरकारी नलकूप लगे हुए थे। बिजली के खंभे भी दिखाई पड़ रहे थे। लेकिन वह दो-मंजिला इमारत गायब थी। लोगों से पूछा तो पता चला पिछले दिनों गांव में जबर्दस्‍त भूकंप आया था। कच्‍चे घरों का तो खास नुक्‍सान नहीं हुआ, पर दो-मंजिला मकान ऐसा ढहा जैसे बालू का घरौंदा। इस घटना के बाद मकान-मालिक गांव छोड़कर चले गए। प्‍यारे चाचा बीमार रहने लगे थे। कूरम बाबा के कटने के कुछ दिनों बाद वह भी स्‍वर्ग सिधार गए।

अरसे बाद मैं आज फिर राम प्‍यारे चाचा की झोपड़ी के पास खड़ा था। लाख कोशिशों के बाद भी आंसू नहीं थम रहे थे। बार-बार आंखें के सामने चाचा की स्‍वागत भरी मुस्‍कान नाच जाती थी। उनके आशीष भरे शब्‍द कानों में गूंज रहे थे। पर अब वहां कुछ भी नहीं बचा था। झोपड़ी के सामने लगा रहने वाला नल टूट चुका था। क्‍यारियों में, जहां गेंदा और गुलाब उगा करते थे, बड़ी-बड़ी घास उगी हुई थी। नल के पास जमी ईंटें गांव वाले उखाड़ ले गए थे; जो बची थीं वो घास और सूखी पत्‍तियों से ढकी हुई थीं। समय की मार न सह सकने के कारण झोपड़ी की कच्‍ची दीवारें मिट्‌टी का ढूह बन गई थीं।

तभी मेरी नजर उस ढूह के ऊपर जा टिकी। उसके बिल्‍कुल ऊपर एक नन्‍हा-सा नीम का पौधा हवा से लहरा रहा था, मानो मुस्‍कराकर मेरा स्‍वागत रहा हो। मैं थोड़ी देर उसे देखता रहा फिर वापस लौट आया।

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