गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' के अवधी दोहे

बेटवा जबते बड़ेभे ,दिलु भा रेगिस्तान।
फिरहूँ ममता मातु की ,सींचइ फ़सल सुखान।।


जरिया सारी बेंचि कइ,जीका किहिसि इलाजु।  
धरिसि गड़ांसा  गरे पर, वहइ पुतउना आजु।।   

कुछु मा कुछु लगबइ  करी, रंगु  हमारे अंग।
इउ कहबुइ बेकार हइ, 'का करि सकत कुसंग'।। 

पहिले देखेउ परिस्थिति,तब कीन्हेउ तकरार।  
बड़े-बड़े बिरवा बहे, जो थे बसे कगार।। 


बिरह अगिनि ते हइ कहूँ, कम कविताई पीर।
तपे आगि माँ तब बने,तुलसी,सूर,कबीर।।


चहइ नहावइ नील ते,चहइ मुड़ावइ केस।
जब तक असली चाम नहिं, का बदले भा भेस।।  

मँह गाई की मार मा, बचइ न ध्याला सेस।
जब तक नेता   भ्रस्ट हइँ ,सुखी न होई देस।।


तुम बिंलगे जउ डार-डार हम मछई हर पात।
तुमरेउ घर की पता हइ, हमका सारी बात।


का कीका कुछु मिला हइ, जग मरजादा लाँघ।  
   याक जाँघ की लाज का कहइ न द्वासरि जाँघ।

                -डॉक्टर गंगा प्रसाद शर्मा'गुणशेखर'

4 blogger-facebook:

  1. डाक्टर साहब, नमस्कार ! बहुत दिनों बाद हरदोई- सीतापुर क्षेत्र की बोली में कुछ सुनने को मिला .....क्षेत्रीय बोलियाँ ही हिन्दी की जान हैं ज़ो हिन्दी की अस्मिता....उसके प्राण को जीवित रखे हुए हैं .....प्रयास ज़ारी रखें .....साधुवाद.

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  2. बिरह अगिनि ते हइ कहूँ, कम कविताई पीर।
    तपे आगि माँ तब बने,तुलसी,सूर,कबीर।।
    ....आग में तपकर ही सोना निखरता है ...बहुत अच्छी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  3. लोक मन की सक्षम और प्रभावी अभिव्‍यक्ति.

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut achhha lagaa aisi rachnaye internet par padhkar .... aap vastav me sadhuvad ke haqdaar hai... maine kabhi socha bhi na tha ki itni door videsh me baithkar kabhi is tarah ke dohe padhne ka sukh bhi parpt kar sakunga

    उत्तर देंहटाएं

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