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आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

अल्का सैनी की कहानी : मरीचिका

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अपराजिता के जीवन का यह पहला अवसर था ,जब वह किसी बड़े नेता से मिलने आई थी .उनके ऑफिस में प्रवेश करते समय वह पूर्णतया सहमी हुई थी .मगर बचपन से ही उसमें आत्म-विश्वास कूट-कूटकर भरा था . ऑफिस के बाहर खड़े दरबान ने कहा ," मैडम, विधायक साहब से मिलना चाहती हो ? साहब बहुत व्यस्त हैं ."अपराजिता ने विनीत-भाव से उत्तर दिया ," मैं उनसे एक आवश्यक काम के लिए मिलना चाहती हूँ. उन्होंने कहा भी था जब जरुरत पड़े तो मिलने आ सकती हो."दरबान ने अपराजिता के चेहरे की तरफ देखते हुए कहा ," अच्छा ,ठीक है मैडम ! पर्ची पर अपना नाम ,स्थान एवं काम लिखकर दीजिए. मैं साहब से बात करता हूँ आपके बारे में "वह मन ही मन घबरा रही थी कि वह गोपाल जी से मिल भी पाएगी या नहीं या वह उसे बाहर से ही लौट जाने को कह देंगे. कुछ देर बाद दरबान जब वापिस आया तो उसने न सिर्फ अन्दर आने को कहा बल्कि इज्जत के साथ बैठक-कक्ष में ले गया . जबकि ऑफिस के बरामदे में मिलने वाले लोगों का तांता लगा हुआ था . वह उस बैठक -कक्ष में बैठकर तरह -तरह के विचारों के उधेड़-बुन में खो गई . वह मन ही मन अत्यंत खुश हो रही थी कि गोपाल जी ने उस…

अल्का सैनी की कहानी : मंजिल

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प्रतीक्षा के कॉलेज का पहला दिन था, वह अपने पिताजी के साथ डी. ए. वी कॉलेज की ओर बस में जा रही थी. वह मन- ही-मन बहुत खुश थी,बस की खिडकियों से बाहर झाँककर प्रकृति की स्वछंद छटा का आनंद उठा रही थी. वह सोच रही थी कि आज के बाद उसे कभी भी स्कूल में होने वाली प्रातकालीन प्रार्थना में खड़ा नहीं होना पड़ेगा और न ही उसे स्कूल-प्रबंधन द्वारा निर्धारित किसी भी तरह का परिधान पहनना पड़ेगा. आज से वह अपने मन की मालकिन है, वह अपनी इच्छा से मन पसंद कपडे पहन पाएगी. नीले-रंग के सलवार सूट में वह बहुत सुन्दर दिखाई दे रही थी. एक आजाद पखेरू की तरह वह उन्मुक्त गगन की ऊँचाइयों को नापना चाहती थी, तरह-तरह के सपने संजोए हुए नई इच्छाओं,  आंकाक्षाओं तथा उमंगो से सरोबार था उसका मन.पिताजी बेटी के प्रसन्नचित्त मुख-मंडल को देखकर कहने लगे , " बेटी , आज तुम्हारे कॉलेज का पहला दिन है खूब ध्यान लगाकर पढ़ाई करना. जरूर एक–न-एक दिन हमारे कुल का नाम रोशन करोगी, जब तुम आई. ए. एस बन जाओगी. तुम्हारे कॉलेज ने देश के कई आई. ए. एस अधिकारी पैदा किए हैं ."
वह इस बात को बहुत अच्छी तरह जानती थी कि पिताजी उससे बड़ी-बड़ी उम्मीदे…

क़ैश जौनपुरी की लघुकथा - निष्काम

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लघुकथा. निष्काम... निष्काम, साईं संध्या, माता की चौकी, कीर्तन, सुन्दरकाण्ड हेतु सम्पर्क करें 98********10 ---- क़ैश जौनपुरी.

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : स्नान-सुख

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आज मैं सुख की चर्चा करूंगा। एक जमाना था, जब मैं विवाहित नहीं था। फिर कुछ ऐसा चक्कर चला कि गृहस्थ हो गया। अब हालात ये है कि दिन बाद में आता है और नहाना पहले पड़ता है। न नहाने की कला में माहिर लोगों का ख्याल है कि सर्दियों में यदि आप नहाने से बच जायें तो समझिये आप गंगा नहा आये। मगर माफ करिये अब वो सुनहरे होस्टल के दिन कहां रहे, जब बिना नहाये कॉलेज जाया जा सकता था। अब तो 'बिना स्नान सब सून' की स्थिति है।
यह सब याद आने का कारण ये है कि पिछले दिनों लन्दन में एक सर्वेक्षण किया गया कि बिजली की अधिक खपत के कारण क्या हैं ? और आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि इसका एक कारण लन्दन में बसे भारतीय हैं जो रोजाना नहाने के लिये पानी गर्म करते हैं। आखिर हमारा देश स्नान करने की सुदृढ़ परम्परा का देश है।
स्नान वीरों का है ये देश। हम अपनी स्नान करने की संस्कृति को, परम्परा को विदेशों में भी याद रखते हैं। कौन है जो ये कहता है कि हम अपनी जड़ों से कट रहे हैं, अपनी संस्कृति को भूल रहे हैं, मेरे प्यारे दोस्तो, आओ........आओ देखों कि स्नान सुख की संस्कृति को हम कहां भूले हैं। विदेशी धरती पर भी हम अपनी स्नान…

हरि जोशी का व्यंग्य : भीख

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अधिकारी – तिवारी जी, यह पांच वर्ष का लड़का भीख मांगता है? अभी से ही मां बाप भीख मांगने की आदत डाल देते हैं, मैं कभी पैसे वैसे नहीं देता.बड़ा बाबू – जी सर, मां बाप बड़े निर्दयी होंगे.अधिकारी – तिवारीजी, इनको कोई डांट भी देता है, लेकिन ये अपनी आदत से बाज नहीं आते, फिर भीख मांगने लगते हैं.बड़ा बाबू – हाँ, सर, इन लोगों की आदत दुम हिलाने की जो है.अधिकारी – तिवारी जी, भीख मांगना बुरा है, अपमानित होकर पुनः मांगते रहना तो और भी बुरा.बड़ा बाबू – बिल्कुल ठीक सर, आपकी एनालिसिस सही है.अधिकारी – तिवारी जी, आज मंत्रीजी का जन्म दिन है, अभी दस ही बज हैं. चलो फूलों के बढ़िया हार ले चलें. संचालक के पद पर मेरी पदोन्नति शीघ्र हो जाए तो अच्छा.बड़ा बाबू – हाँ, सर. मैं तो यह राय देना भूल ही गया था. जो कुछ मांगना हो आज ही मांग लीजिएगा.अधिकारी – तिवारीजी, लेकिन वे कभी-कभी डांट भी देते हैं.बड़ा बाबू – तो क्या हुआ सर, पुराने मंत्रिमंडल वाले मंत्री भी तो डांट देते थे, लेकिन अपना काम तो उनसे अनुरोध करते रहना है.अधिकारी – तिवारी जी, उन्होंने तो मुझे पदोन्नति नहीं दी, क्या पता ये भी देते हैं या नहीं. लेकिन मेरे पित…

सरोजिनी साहू की कहानी : छिः!

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छिः!मूल कहानी: सरोजिनी साहू हिंदी रूपांतरण: दिनेश माली( कहानी 'छिः!' कहानीकार की सफलतम नारीवादी कहानीयों में से एक है। इस कहानी में नारी के अंतर्मन के कई गोपनीय पहलुओं पर अति-सूक्ष्मता से प्रकाश डाला गया है । यह कहानी मूल रूप से नब्बे के दशक में लिखी गई थी.। सर्व-प्रथम यह कहानी ओडिया पत्रिका 'झंकार' में प्रकाशित हुई और बाद में लेखिका के कहानी-संग्रह "दुःख अपरिमित" (ISBN : 81-7411-483-1) में संकलित हुई । ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में शोध कार्यरत प्रतिष्ठित लेखिका गोपा नायक ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद Hatred शीर्षक से किया है,जो वेब-पत्रिका Thanal  On  Line  में प्रकाशित हुआ है ।)1उसके घुँघराले बालों में कंघी करने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी। सर्पिल लटों के गुच्छे के रूप में बाल बिखरकर आँख, कान, नाक के ऊपर गुलदस्ते की तरह झूलने लगते थे। जब भी नानी उनके घर मिलने आती थी, तो अपने साथ बहुत सारी छोटी-मोटी चीजें लेकर आती थी। कभी-कभी अरण्डी का तेल भी साथ लेकर आती थी। रस्सी से बुनी हुई खटिया में बैठकर गोंद जैसे चिपचिपे अरंडी के तेल को लगाकर गाय के सींग से बनी कंघी से जब…

पृथ्वीराज चौहान, सुकीर्ति भटनागर व शिवराज भारतीय की बाल कविताएँ

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पृथ्वीराज चौहान की कविता -मांसुबह खुद जल्दी उठकरहमें उठाती है मांपास अपने बिठाकरभजन सुनाती है मां।नहलाकर हमेंसुन्दर बनाती है मां।भूख लगने परदूध पिलाती है मां।खाना बनाकरटिफिन तैयार करती है मां।प्यार भरी बातों सेदिल बहलाती है मां।हमारे भीतरप्यार जगाती है मां।अच्छी-अच्छी बातेंसिखाती है मां।साक्षात् देवी है मां।हमको भाती है मां।----पृथ्वीराज चौहानमु.पो. जानकीदासवालातह. सूरतगढ़, जिलाः श्रीगंगानगरराजस्थान, ---सुकीर्ति भटनागर की कविता सूरजमुखीसूरजमुखी मैं सूरजमुखीदेख मुझे पहचानो।मैं हूं दिखता सूरज जैसामानो या मानो।।सूरत मेरी सूरज जैसीरंग भी मेरा वैसा।उस दाता की माया देखोमेल मिलाया कैसा।।जिधर-जिधर सूरज जाता हैउधर-उधर मैं जाता।देख करिश्मा ऐसा सुन्दरमन ही मन इतराता।।सांझ ढले सूरज दादाजीअपने घर को जाते।अगले दिन आने की बातेंचुपके से समझाते।।खड़ा रात भर देखा करताउसी दिशा की ओर।कब आएगा सूरज नभ परहो जाएगी भोर।।----सुकीर्ति भटनागर,, अरबन एस्टेट,फ़ेज-प्रथम, पटियाला, पंजाब---शिवराज भारतीय की कविता -मांलाड़-प्यार का मंदिर मांमोह-ममता का मंदिर मांअच्छी-अच्छी बात बतातीलोरी गाए सुलाए मांधमकाती जब करें शरारत…

गिरीश पंकज का व्यंग्य - डबलरोटी में 'ग्रीस' : जीने की बख्शीश

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एक खबर किसी अखबार में छपी, कि डबलरोटी के पैकेट में 'ग्रीस' मिला (गिरीश नहीं)।
यह ग्रीस कपड़े में लिपटा हुआ था। अब इसे मिलावट का मामला तो कह नहीं सकते। हाँ, लापरवाही का एक उदाहरण जरूर मान सकते हैं। और यह भी कि देख लो डबलरोटी खानेवालो, तुम्हारी डबलरोटियों को कैसी-कैसी उबकाई पूर्ण प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। फिर भी हमारी हिम्मत देखो, हम कुछ नहीं बोलता। कल को लोहे का टुकड़ा मिले, या बीड़ी का, कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क इसलिए भी नहीं पड़ता कि आखिर कौन पंगा ले। शिकायत कहाँ करे, कार्रवाई होगी भी कि नहीं? व्यवस्था को अपनी जेब में रखकर घूमने का दावा करने वाले लोग शिकायतकर्ता को भी शिकार बना डालें तो? इसलिए हमारे कने (यहाँ) की जनता बड़ी गऊ है। उसे मिलावट के ऐसे-ऐसे भयानक दुष्परिणाम झेलने पड़े हैं, कि कुछ पूछो मत लेकिन मजाल है कि जनता ने किसी दूकानदार की कालर पकड़ी हो। बापू का देश है भइया। फिर हमारे यहाँ की कानून-व्यवस्था भी तो ऐसी गजब की है कि का कहें। आप किसी मिलावटखोर की कालर तो पकड़ लीजिए। वह थाने में जाकर रिपोर्ट लिखा देगा कि 'आपने जान से मारने की धमकी दी'.., 'हमे…

श्याम गुप्त की ग़ज़ल – माँ शारदे!

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माँ शारदे
है चाह,  तेरी शान में,   कह दूं ग़ज़ल माँ  शारदे !
कुछ कलम कारी का मुझे भी ज्ञान दो माँ शारदे !
वन्दना के स्वर ग़ज़ल में,  कह सकूं माँ शारदे  !
कुछ शायरी के भाव का भी, ज्ञान दो माँ शारदे !
माँ की कृपा यदि हो न तो, कैसे ग़ज़ल साकार हो,
मैं भी ग़ज़ल स्वर कह सकूं, वर हस्त धर दो  शारदे !
मैं जीव,   माया- बंधनों में,  स्वयं को भूला हुआ,
नव स्वर लहरियों से हे माँ !, हृद तंत्र को झंकार दे |
मैं स्वयं को पहचान लूं,उस आत्म तत्व को जान लूं,
अंतर में,  अंतर बसे  उस, पर- ब्रह्म को गुंजार दे |
हे श्वेत कमलासना माँ ! हे शुभ्र वस्त्र से आवृता ,
वीणा औ पुस्तक कर धरे,नत नमन लो माँ शारदे !
मैं बुद्धि हीन हूँ,काव्य-सुर का, ज्ञान भी मुझको नहीं ,
उर ग़ज़ल के स्वर बह सकें, कर-वीणा को टंकार दे |
ये वन्दना के स्वर सुमन, अर्पण हें माँ ! स्वीकार लो,
हो धन्य जीवन श्याम का, कर दो कृपा माँ शारदे !
                 ----डा श्याम गुप्त .

रामकृष्ण ''देहाती'' की कविता – सरस्वती आराधना

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सरस्‍वती आराधनाकरके कृपा मुझ दीन को ।कुछ दान दो वरदायिनी॥करना क्षमा गर त्रृटि हो ।नादान हूं वरदायिनी॥कर दूर मेरे अंह और ।अभिमान को वरदायिनी॥इच्‍छा यही है बन सकूं।तेरे चरण का दास मैं॥ना तोड़ना तॅूं यूं मेरे।अरमान को वरदायिनी॥लौटा तेर दरबार से खाली।अगर पद्‌मासिनी॥होगा तेरे सम्‍मान का ।अपमान यॅूं वरदायिनी॥---

हर्षकांत शर्मा की कविताएँ

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अस्तित्वसच कहूं बिन तुम्हारे,मेरा अस्तित्व ही कहाँ है,मेरी पूर्णता ही केवलसंग तुम्हारे,कहो कहीं देखा है सूरज,बिन किरण बिन रोशनी केकहीं देखा है गुलाब बिन शूल के दोनो ही हैं पूरक,एक दूसरे केसच कहूं बिन तुम्हारे,मेरा अस्तित्व ही कहाँ है,मेरी पूर्णता ही केवल,संग तुम्हारे,सच कहो कभी सुना,दिल धडकते ,बिन धडकनों केन ही कभी कोई धुन बनी है,बिन लय के,दोनो ही हैं पूरकएक दूसरे केकहो कभी देखी है,बिन पानी के झील,अपार जलराशि से,आकार लेता समुन्दरभर रही हो तुम मुझेनित नई संकल्पनाओं,स्वप्न व आशाओं सेसच कहूँ हम ही हैं,पूरक एक दूसरे केबिन तुम्हारे,मेरा अस्तित्व ही कहाँ है.----रिश्ते बनाम व्यापारपता नहीं क्यों लोग रिश्तों कोसंजीदगी से नहीं लेते,जब मन चाहा कपड़ों सा,बदल लेते हैं-.रिश्तों पर लगता है,स्वार्थ हावी हो गया है ,निर्मल- निश्चल प्रेम तो वैसेगाया सा हो गया है-मधुर भाषियों को लोग,शक से देखते हैं,सोचते हैं जरूर कुछ काम होगाइसलिए सादर सलाम होगाहर शख्श दूसरे को तौलता हैरिश्तों के लाभ मोलता हैफिर होता है रिश्तों का आगाजसंबंधों को मिलती है नई परवाजहर आदमी अपने तरीके सेसोचता है,शक्तिशाली की बात ही छोड़िए,आदम…

सीताराम गुप्ता का आलेख : जब हम अपने लिए कोई रोल मॉडल चुनते हैं

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हमारा कोई न कोई रोल मॉडल या नायक अवश्‍य होता है जो हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हमारे समाज, हमारे राष्‍ट्र और हमारे समय के भी रोल मॉडल होते हैं। कुछ ऐसे रोल मॉडल होते हें जो अपने समय और समाज की भौगोलिक सीमाएँ लांघ जाते हैं। उनकी सदी समाप्‍त हो जाने के बाद भी लोग उनका अनुसरण करते हैं।ज़्‍यादातर रोल मॉडल एक संकुचित दायरे में अपना प्रभाव डालकर समाप्‍त हो जाते हैं इसलिए हमें सोच-समझकर ही अपने रोल मॉडल का चुनाव करना चाहिये। लेकिन क्‍या ये इतना सरल है? सरल बेशक न हो लेकिन असंभव बिलकुल नहीं। यदि हमसे पूछा जाए कि हमारा रोल मॉडल कैसा हो तो हम असमंजस में पड़ जाएंगे। इतिहास भरा पड़ा है अनेक नायकों से। लेकिन वास्‍तविक नायक कौन है ?गुरुग्रंथसाहिब में लिखा है, ‘‘जो लरै दीन के हेत सूरा सोई।'' सच्‍चा योद्धा वो जो दूसरों की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा दे। सच्‍चा दानी वो जो दूसरों की भूख मिटाने के लिए ख्‍ुद भूखा रह जाए। जो अपने हाड़-मांस के शरीर की स्‍थूलता का विस्‍तार करने की बजाय दधीचि ऋषि की तरह किसी की रक्षा के लिए अपनी अस्‍थियाँ तक दान में दे द…

सुजान पंडित का व्यंग्य गीत : छब्बीस जनवरी का त्यौहार

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छब्बीस जनवरी का त्यौहार ----------छब्बीस जनवरी का त्यौहार फिर से आया रे | मैली कुरसी में नूतन, कवर चढ़ाया रे ||चौराहों पर सुबह सुबह, फ़िल्मी गाने बजने लगे |खादी की टोपी कुरता से, नेताजी सजने लगे ||पिछले भाषण के पन्ने में पैच लगाया रे ------मैली कुरसी में नूतन, कवर चढ़ाया रे -------गुडमोर्निंग नहीं आज बोलना, जयहिन्द से विश करना है |असली चेहरा छुपा रहे, रंग में ऐसे  रंगना है ||नौटंकी के मंझे खिलाडी, जन-गण गाया रे -----मैली कुरसी में नूतन, कवर चढ़ाया रे -------तिरसठ साल से सुपर पवार के कैसेट बजाते हैं |झंडे बेच के कुछ बच्चे, रोटी आज भी खाते हैं ||ख्वाबों में जीने वालों ने ख्वाब सजाया रे ------मैली कुरसी में नूतन, कवर चढ़ाया रे -------सुजान पंडित, शंकर विला, कांटा टोली चौक, ओल्ड एच. बी. रोड, रांची - 834001 (झारखण्ड)दूरभास - 099343 70408--(चित्र – सौजन्य : अनुज नरवाल रोहतकी)

अनुज नरवाल रोहतकी की गणतंत्रिया ग़ज़लें

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1हाय! गुन्‍डे-मवाली लोग सियादत1 कर रहे हैंकैसे-कैसे लोग यहां सियासत कर रहे हैंबिठाकर इनको अपनी सर-आँखों पर हमक्‍यों खराब इनकी आदत कर रहे हैंये सियादत की कमी नहीं है तो क्‍या हैसमझाओ,लोग क्‍यों बगावत कर रहे हैंकैसे हो यकीं उनकी वतन-परस्‍ती परवे तो दहशतगर्दों की हिमायत कर रहे हैंदीमक जैसे होते हैं ये सियासी लोग भीबयां हम सच्‍ची हिकायत2 कर रहे हैंहमें नहीं लगता कि शिकायत दूर होगीहम उन्‍हीं से उनकी शिकायत कर रहे हैं‘अनुज' हिंदुस्‍तां कर्ज़दार है उन मां‘ओं काजिनके लाल हमारी हिफ़ाजत कर रहे हैं1.नेर्त्‍तव,सरदारी 2.कहानी..........................................................................2क्‍या था और क्‍या हो गया हिन्‍दुस्‍तान, बापू देखने चले आओकैसे -कैसे हाथों में है तेरे देश की कमान, बापू देखने चले आओसत्‍य-अहिस्‍सा,त्‍याग-तपस्‍या की दी थी आपने हमको शिक्षाइसपे अमल करना छोड़ गया क्‍यूं इन्‍सान, बापू देखने चले आओपश्‍चिमी हवा चल रही है बापू , हर चीज यहां की बदल रही है बापूहर दिन हो रहा है छोटा नारी का परिधान, बापू देखने चले आओशहीदों की तस्‍वीरें लगी मिलती नहीं अब किसी घर की दीवारों परल…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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