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January 2010
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marichika

अपराजिता के जीवन का यह पहला अवसर था ,जब वह किसी बड़े नेता से मिलने आई थी .उनके ऑफिस में प्रवेश करते समय वह पूर्णतया सहमी हुई थी .मगर बचपन से ही उसमें आत्म-विश्वास कूट-कूटकर भरा था .

ऑफिस के बाहर खड़े दरबान ने कहा ," मैडम, विधायक साहब से मिलना चाहती हो ? साहब बहुत व्यस्त हैं ."

अपराजिता ने विनीत-भाव से उत्तर दिया ," मैं उनसे एक आवश्यक काम के लिए मिलना चाहती हूँ. उन्होंने कहा भी था जब जरुरत पड़े तो मिलने आ सकती हो."

दरबान ने अपराजिता के चेहरे की तरफ देखते हुए कहा ," अच्छा ,ठीक है मैडम ! पर्ची पर अपना नाम ,स्थान एवं काम लिखकर दीजिए. मैं साहब से बात करता हूँ आपके बारे में "

वह मन ही मन घबरा रही थी कि वह गोपाल जी से मिल भी पाएगी या नहीं या वह उसे बाहर से ही लौट जाने को कह देंगे. कुछ देर बाद दरबान जब वापिस आया तो उसने न सिर्फ अन्दर आने को कहा बल्कि इज्जत के साथ बैठक-कक्ष में ले गया . जबकि ऑफिस के बरामदे में मिलने वाले लोगों का तांता लगा हुआ था . वह उस बैठक -कक्ष में बैठकर तरह -तरह के विचारों के उधेड़-बुन में खो गई . वह मन ही मन अत्यंत खुश हो रही थी कि गोपाल जी ने उसे विशिष्ट स्थान प्रदान कर अनुग्रहित किया है. जहाँ उनको मिलने के लिए आम- लोगों को लम्बी-कतार में खड़े होकर दीर्घ प्रतीक्षा करनी पड़ती है ,वहाँ उसे न तो किसी भी प्रकार का इन्तजार करना पड़ा बल्कि उसे बैठक-कक्ष में जाने का इशारा कर आम-लोगों की नज़रों में ऊँचा उठा दिया. वह मन ही मन अपने आप को गौरवान्वित अनुभव कर रही थी कि अवश्य विधायक-साहब कहीं न कहीं उसके प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के किसी न किसी पहलु से प्रभावित हुए है .अब उसे मन ही मन लग रहा था कि वह दिन दूर नहीं है, जब उसके सारे दुर्दिन दूर हो जाएंगे तथा उसकी जिन्दगी में वे सारी खुशियाँ लौट आएगी जिसका उसे एक लम्बे अरसे से इन्तजार था .वह मन ही मन इस बात से फूली नहीं समा रही थी कि गोपाल जी ने उनके घर पर पहली मुलाक़ात में दूसरे लोगों की तुलना में उस पर विशेष ध्यान दिया हैं .

वह उनके सुसज्जित बैठक-कक्ष को ध्यानपूर्वक निहारने लगी .उसने देखा कि बैठक-कक्ष की प्रत्येक वस्तु बहुत ही सलीके से रखी हुई थी. देखते -देखते उसे अपना अतीत याद आने लगा .ऐसी बात नहीं थी कि अपराजिता विधायक साहब को पहले नहीं मिली हो .वह उनको दो-तीन माह पूर्व क्षेत्रीय चुनावी कार्यकर्मों के दौरान मीटिंगों में दो-तीन बार मिल चुकी थी. उसकी संगठन-क्षमता तथा भाषण-शैली से प्रभावित होकर एक बार गोपाल जी ने कहा ,

" अपराजिता , तुम एक अच्छी कार्यकर्ता हो. भविष्य में पार्टी के लिए एक वरदान साबित होगी .अगर तुम्हें किसी भी सिलसिले में मेरी सहायता की जरुरत अनुभव हो,तो बेझिझक मुझसे मिलने आ सकती हो. मेरे घर के दरवाजे हमेशा तुम्हारे लिए खुले मिलेंगे. "

अचानक नौकर को सामने पाकर उसका ध्यान टूटा. नौकर ने शांत भाव से उसके सामने पानी का गिलास रख दिया तथा नम्रतापूर्वक पूछने लगा," मेम साहिब , चाय लेंगी या कॉफ़ी ?"

अनमने-भाव से अपराजिता ने चाय के लिए हामी भर दी .

अपराजिता बचपन से ही कुशाग्र-बुद्धि वाली थी ,साथ ही साथ महत्वाकांक्षी भी. वह बुलंदियों के शिखर को छूना चाहती थी,परन्तु लक्ष्य को पाने के लिए विरासत में मिले संस्कारों को छोड़ना नहीं चाहती थी .उसकी भारतीय संस्कारों में दृढ़ आस्था थी . किसी भी कीमत पर वह उन्हें खोना नहीं चाहती थी . बचपन से ही उसके संस्कारयुक्त मन ने महत्वाकांक्षा के कई हवाई-किलों का निर्माण कर लिया था. परन्तु ज्यों-ज्यों उसकी उम्र गुजरती गई तथा वह जिंदगी के यथार्थ धरातल से परिचित होती गई,एक-एककर उसके सारे सपने चूर चूर होकर टूटते नजर आए. सपनों को टूटता देखकर भी उसने हिम्मत नहीं हारी ,वरन वह अपनी दुगुनी शक्ति के साथ जीवन की कठोरताओं के साथ डटकर संघर्ष करने के लिए तत्पर हो गई.

संघर्ष करते-करते अब उसका जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदल गया था. वह एक मंझे हुए परिपक्व इंसान की भाँति सोचने लगी थी. जब उसकी मुलाक़ात पहली बार गोपाल जी से हुई थी तो उसे लगने लगा था मानो ईश्वर ने उसकी अन्तः-पुकार सुन ली हो तथा उनको उसके लिए एक मसीहा के रूप में अवतरित किया हो . अक्सर वह अपराजिता के सौंदर्य ,प्रतिभा तथा वाक्-कुशलता की भूरी-भूरी प्रशंसा करते थे ,यह भी एक कारण था कि उसके दिल में कमलजी के प्रति एक अलग स्थान था.

तभी कमरे में नौकर ने चाय के प्याले के साथ प्रवेश किया .उसके कदमों की आवाज सुनकर वह अपने अतीत की दुनिया से लौटकर वर्तमान में आ गई . वह सोचने लगी कि जब गोपाल जी कमरे के भीतर प्रवेश करेंगे तो किस तरह उसे उनका अभिवादन करना चाहिए . क्या वह उनके पाँव छुएगी या हाथ जोड़कर प्रणाम करेगी ? किस तरह वह अपनी समस्याओं को उनके समक्ष रखेगी ?उसका तो राजनैतिक क्षेत्र से कभी भी सम्बन्ध नहीं रहा है .वह तो इस क्षेत्र में पूर्णतया अनाड़ी है .उसके मन में अभी भी यह अटूट विश्वास था कि वह अपने ईश्वर-प्रदत किसी देवता के सामने गुहार लगाने आई है ,जो उसकी मुराद को जरुर पूरा करेंगे . उसका मन इस बात की गवाही दे रहा था तभी तो उन्होंने उसे अपने बैठक-कक्ष में बैठने के निर्देश दिए थे . आधा-घंटा बीतने के बाद कमलजी ने बैठक-कक्ष में प्रवेश किया .ज्यों-ही उन्होंने कमरे में प्रवेश किया ,वैसे ही अपराजिता उनके स्वागत में खड़ी हो गई और चरण-स्पर्श करने के लिए आगे की ओर झुकी .गोपाल जी ने हलके-से उसकी पीठ थपथपाई और बीच में अवस्थित सोफे पर जाकर इस तरह बैठ गए मानो एक राजा अपने सिंहासन पर विराजमान हो रहा हो . फिर स्नेहिल-निगाहों से उसकी तरफ एकटक देखने लगे तथा पूछने लगे ," अपराजिता ! यह बताओ, मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ ? अच्छा यह बताओ ,जिन्दगी में क्या करना चाहती हो ?"

अपराजिता तो इसी अवसर की तलाश में थी कि कब गोपाल जी उसे अपनी बात रखने को कहे . बिना रुके एक ही सांस में उसने अपनी बात उनके सामने रख दी .

वह कहने लगी " जी, मैं अपने महाविद्यालय की अच्छी छात्राओं में से एक थी .मुझे अपने आप पर पूर्ण विश्वास है कि अगर ईश्वर ने मुझे एक मौका दिया तो मैं उस पर पूरी तरह खरी उतरूंगी .ऐसे मुझमें एक अच्छे संगठन-कर्ता के अलावा वह सभी गुण भी विद्यमान है जो किसी नेतृत्व करने वाले में होने चाहिए. आप तो इस बात से परिचित भी है कि मैं अपने दायित्वों के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित हूँ .दुःख तो केवल इस बात का है कि आज तक मुझे समझने वाला कोई सच्चा मार्ग-दर्शक नहीं मिला . अब आपके संपर्क में आने से मुझे लग रहा है कि मैं भी समाज के कुछ काम आ सकती हूँ और अपने जीवन को सार्थक बना सकती हूँ ."

इतना बताने के बाद वह एकदम चुप हो गई. कमरे में शान्ति व्याप्त हो गई . गोपाल जी भी कुछ नहीं बोले .वह मन ही मन सोच रही थी कि कैसे उसने अपने मन की बात इतने आत्म-विश्वास के साथ उनके सामने रख दी .वह सोच रही थी कि गोपाल जी की चुप्पी इस बात की प्रतीक है कि उन्होंने कैसे उसकी बात को गंभीरतापूर्वक लिया है. परन्तु ये क्या! गोपाल जी ने अचानक उसके हाथ को अपने हाथ पर रख लिया और उसे बड़े प्यार से सहलाने लगे. उस समय कमरे में उन दोनों के अलावा और कोई नहीं था. अपराजिता की दृष्टि में वह पितृ-तुल्य इंसान थे. हाथ सहलाने से वह सिहर उठी .वह तो भय से अन्दर तक काँप गई . उसकी समझ में कुछ नहीं आया कि माजरा क्या है. उसे लगा मानो उसके पैरों के नीचे की जमीन खिसकती जा रही है वह अपने हाथ को खींचने का प्रयास कर रही थी. कमरे में कुछ देर तक ऐसा सन्नाटा छाया रहा कि अगर एक सुई भी गिरती तो उसकी आवाज भी प्रतिध्वनित होती.

उस समय अपराजिता अपने आप को बहुत लाचार-सा अनुभव कर रही थी . उसे अपने सपनों का महल टूटता बिखरता नजर आ रहा था . वह सोच रही थी कि जिस तरह की उम्मीद गोपाल जी उससे कर रहे है वह पूरी करना उसके बस की बात नहीं है. जीवन-भर के कठोर संघर्षों से जूझते-जूझते वह थक-सी गयी थी . एक उम्मीद की किरण जागी थी . अब उसे अपने सब तरफ अँधेरा दिखाई पड़ रहा था. गोपाल जी के रूप में उसे लगने लगा था कि शायद कोई मसीहा भगवान् ने उसके लिए भेज दिया हो. अब उसे लग रहा था कि काश धरती फट जाए और वह उसमे समा जाए. वह खुद को बेजान-सा महसूस कर रही थी. कुछ देर बाद अपराजिता बहुत हिम्मत बटोरकरबोली, " ऐसी क्या खासियत है मुझमें, और मैं तो उम्र में भी आप से बहुत छोटी हूँ."

पर उनकी आँखों में तो अपराजिता को लेकर अजीब-सी चमक दिखाई दे रही थी. फिर काफी सोच विचारकर के अपनी बुद्धि का उपयोग करते हुए अपराजिता बोली

"आप मेरे से उम्र में भी काफी बड़े है और इतने बड़े आदमी भी है . मैं आपकी बहुत इज्जत करती हूँ और आपका बहुत ऊँचा स्थान है मेरे मन में. मैं तो एक बहुत मामूली-सी औरत हूँ आपकी समाज में इतनी मान प्रतिष्ठा है. मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से उस पर जरा सी भी आंच आए . मैं इतनी जल्दी आपको और क्या कह सकती हूँ ?"

अपराजिता यह भी नहीं चाहती थी कि वह इस समय कोई बेवकूफी करे और जल्दबाजी में कोई जवाब दे . उसे उस समय बात को टाल देना ही बेहतर लगा . वह चाहती थी कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे . गोपाल जी ने भी एक चतुर नेता की तरह अपराजिता का चेहरा पढ़ लिया और कहने लगे,

" अपराजिता, घबराओ मत , मैंने तो सिर्फ अपने मन की बात तुम्हें बताई है , अगर दुनिया में आगे बढना है तो इन छोटी-मोटी बातों की परवाह नहीं करनी चाहिए .फिर भी मैं तुम्हें एक बात का आश्वासन देता हूँ कि मैं हमेशा ही तुम्हारा अच्छा दोस्त बना रहूँगा और तुम्हारी पूरी मदद करता रहूँगा "

.यह बात सुन कर अपराजिता की जान में कुछ जान आई .गोपाल जी कहने लगे कि दोस्ती में उम्र नहीं दिल देखा जाता है .

गोपाल जी को थोडा सहज-सा होते देख अपराजिता भी कुछ ठीक महसूस करने लगी और सामान्य होकर कुछ देर बातें करती रही . इतनी देर में नौकर चाय लेकर आ गया,गोपाल जी ने उसे चाय लेने को कहा .अपराजिता के लिए यह क्षेत्र बिलकुल नया था . उसने तो अपना सारा जीवन पढ़ने -लिखने में ही बिताया था. वह तो राजनैतिकशब्दावली को समझने में असमर्थ थी.किस बात का सही मायने में क्या अर्थ था उसकी समझ से परे लग रहा था ,फिर भी वह खुद को सहज दर्शाते हुए चाय खत्म करने लगी. जैसे ही चाय ख़त्म हुई तो अपराजिता ने बहुत हिम्मत बटोरकर बाहर जाने की इजाजत मांगी. उन्होंने इसी बीच उसे दोपहर के खाने का न्यौता दे दिया वह सिरहिलाकर उठ खड़ी हुई. गोपाल जी भी उसके साथ ही उठ खड़े हुए तो कुछ क्षण वह रुकी और औपचारिकतावश अभिवादन करने के लिए झुकी तो आशीर्वाद देने की जगह गोपाल जी ने उसके अधरों का चुम्बन लेना चाहा तो अपराजिता का मानो काटो तो खून नहीं. वह कमल जी के इस तरह के अप्रत्याशित व्यवहार से सन्न रह गई .. उसने गोपाल जी को इंकार कर दिया .. वह उसके जीवन की सबसे बड़ी अस्वाभाविक घटना थी उसके हाथ पैर काँप रहे थे और सांस उखड़ रही थी. जैसे-तैसे खुद को थोड़ा सहज करके वह बिना इधर-उधर देखे तेज क़दमों से बाहर निकल गई .

गेट के बाहर पहुँच कर भी अपराजिता की सांस उखड़ी हुई थी उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ है.

गेट पर खड़ा दरबान उसे देखते ही मुस्कराते हुए बोला ," मैडम ,चिंता मत कीजिए . आपका काम शत-प्रतिशत हो जाएगा ."

दरबान की बात को अनसुनी कर तरह -तरह के भयानक विचारों के सागर में गोते लगाते हुए वह कब अपने दरवाजे की दहलीज पर पहुँच गई कि उसे पता ही नहीं चला .

वह सुबह जहां से इतने सपने लेकर चली थी उसी जगह वापिस खड़ी थी.उसे भय लग रहा था . उसे लग रहा था कि गोपाल जी को मिलकर अपनी समस्या का निदान पाना महज एक मृग-मरीचिका थी !.

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manjil

प्रतीक्षा के कॉलेज का पहला दिन था, वह अपने पिताजी के साथ डी. ए. वी कॉलेज की ओर बस में जा रही थी. वह मन- ही-मन बहुत खुश थी,बस की खिडकियों से बाहर झाँककर प्रकृति की स्वछंद छटा का आनंद उठा रही थी. वह सोच रही थी कि आज के बाद उसे कभी भी स्कूल में होने वाली प्रातकालीन प्रार्थना में खड़ा नहीं होना पड़ेगा और न ही उसे स्कूल-प्रबंधन द्वारा निर्धारित किसी भी तरह का परिधान पहनना पड़ेगा. आज से वह अपने मन की मालकिन है, वह अपनी इच्छा से मन पसंद कपडे पहन पाएगी. नीले-रंग के सलवार सूट में वह बहुत सुन्दर दिखाई दे रही थी. एक आजाद पखेरू की तरह वह उन्मुक्त गगन की ऊँचाइयों को नापना चाहती थी, तरह-तरह के सपने संजोए हुए नई इच्छाओं,  आंकाक्षाओं तथा उमंगो से सरोबार था उसका मन.

पिताजी बेटी के प्रसन्नचित्त मुख-मंडल को देखकर कहने लगे , " बेटी , आज तुम्हारे कॉलेज का पहला दिन है खूब ध्यान लगाकर पढ़ाई करना. जरूर एक–न-एक दिन हमारे कुल का नाम रोशन करोगी, जब तुम आई. ए. एस बन जाओगी. तुम्हारे कॉलेज ने देश के कई आई. ए. एस अधिकारी पैदा किए हैं ."
वह इस बात को बहुत अच्छी तरह जानती थी कि पिताजी उससे बड़ी-बड़ी उम्मीदें संजोकर रखे हुए हैं . उसे वह दिन याद आ गया जब मैरिट-लिस्ट में उसका नाम पाँचवे स्थान पर आया था . पापा के चेहरे पर हर्षातिरेक के भाव आसानी से देखे जा सकते थे.

जब पड़ोसियों, मित्रों, सगे-सम्बन्धियों ने अपने बधाई-सन्देश दिए तो वह गर्व से फूले नहीं समाए. सबको मिठाई खिलाते-खिलाते एक ही बात दोहरा रहे थे कि मेरी होनहार बेटी है, जिस लगन और मेहनत के साथ वह पढाई करती है एक- न-एक दिन खानदान और इस शहर का नाम जरुर रोशन करेगी. कहते है न 'होनहार बिरवान के होत चिकने पात '
उस दिन पिताजी की आँखों में अजीब-सी चमक थी .आज पिताजी के इस असीम विश्वास और अथाह प्रेम के सागर में गोते लगाते- लगाते कब उसकी आँखें नम हो गई उसे पता ही न चला. रह-रहकर एक ही ख्याल मन के किसी कोने को झिंझोड़ रहा था कि क्या वह पिताजी की इन उम्मीदों पर खरा भी उतर पाएगी .

प्रतीक्षा का जन्म उसकी बड़ी बहिन अनुराधा के पाँच साल बाद हुआ था . जन्म से ही वह बहुत सुन्दर थी गोल-मटोल चेहरा बड़ी-बड़ी आँखें दूसरी लड़की होने के बाद भी माता-पिता ने उसे खूब प्यार दिया था. माँ अक्सर कहती थी कि क्या मेरी यह बेटी किसी लड़के से कम है! उसके जन्म के डेढ़-साल बाद उसका भाई राजीव पैदा हुआ. घर में चारों तरफ ख़ुशी का माहौल था. परन्तु फिर भी उसके माता- पिता ने अपने आजीवन लड़के -लड़की में विभेद नहीं किया था .

इतने अच्छे परिवेश में बचपन के दिन कब बीत गए पता ही नहीं चला देखते-देखते ही वह कॉलेज की छात्रा बन गई और स्कूल का जीवन बहुत पीछे छूट गया. उसके विचारों की तन्द्रा तब भंग हुई ,जब सामने शास्त्री सर्कल का मोड़ आया और पिताजी उसको ख्यालों में डूबा देख कहने लगे

" प्रतीक्षा कहाँ खो गई हो? , क्या सोच रही हो? आधा-घंटा और लगेगा तुम्हारा कॉलेज आने में”. उसने पिताजी की बात को अनसुना कर दिया कोई प्रतिक्रिया ना पाकर पिताजी ने उसे झिंझोड़ा और उसके चेहरे की तरफ देखने लगे .., " अरे ये क्या तुम तो रो रही हो , ऐसा क्या हुआ तबीयत ठीक नहीं है या कोई सामान घर भूल कर आई हो कुछ तो बताओ , क्या हुआ है ?"

पिताजी के एक साथ इतने सारे प्रश्नों को सुन कर वह खुद को संभाल न पाई और फफक- फफककर रोते हुए कहने लगी " पापा मेरी बहुत सारी सहेलियों ने सैंट जेविएर कॉलेज में दाखिला ले लिया है जबकि मै तो पढ़ने में उनसे काफी आगे थी और मैं डी. ए.वी कॉलेज में . मुझे इस बात का डर है कि मैं आपके सपनों को साकार कर पाऊँगी क्या ? कई मेरी कक्षा के विद्यार्थी तो इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज में चले गए हैं . क्या आपकी मेरिट होल्डर बेटी के नसीब में ये सब नहीं था क्या !

मानो उसने पिताजी की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो. एक दार्शनिक की भांति पिताजी उसे सांत्वना देने लगे  " प्रतीक्षा तुम तो जानती हो कि तुम्हारे कमजोर स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए ही नजदीक के कॉलेज में तुम्हारा दाखिला करवाया है ., मैं पूर्णतया आश्वस्त हूँ कि यहाँ भी पढाई करके तुम अपनी मंजिल पा सकती हो. करम करने पर ध्यान दो , फल तुम्हारी झोली में खुद- ब-खुद आकर गिर जाएगा , और कॉलेज से कोई फर्क नहीं पड़ता, पढाई तो खुद ही करनी पड़ती है . पिताजी के नेत्रों में छलकते प्रेम को देख कर प्रतीक्षा का रोना और बढ गया . सिसकते-सिसकते आँसुओं की धारा गालों के ऊपर सर्पिल-नदी की भांति बहते हुए मुँह तथा गले की तरफ जा रही थी.
उसने अपना रुमाल निकाला और आंसू पोंछ के शांत होने का प्रयास किया . लेकिन मन तो मन ही था . एक बार जिस विषय पर केन्द्रित हो गया तो वहाँ से हटने का नाम ही नहीं ले रहा था. रह-रहकर उसे मेरिट की लिस्ट याद आ रही थी और परिजनों की उससे लगी उम्मीदें याद आ रही थी. वह इतनी भावुक हो गई कि एक एक कर बचपन के दोस्तों के चेहरे याद आने लगे .

जो दोस्त उसे डॉक्टर या इजीनियर के रूप में देखना चाहते थे , उनकी कही बातें उसके मानस पटल पर बार- बार आ जा रही थी, वे कहते थे कि प्रतीक्षा तुम्हारे लिए तो बाएँ हाथ का खेल है डॉक्टर या इंजीनियर बनना . उसकी भी बचपन से हार्दिक इच्छा रही थी कि जिन्दगी में कुछ मुकाम हासिल करे , वह बात और थी कि पिताजी ने कभी उस पर अपनी इच्छा का दबाव नहीं डाला था ,वह तो उसकी लगन के मुताबिक ही चाहते थे , कि उनकी बेटी उच्च प्रशासनिक अधिकारी बने ताकि उनका सिर सम्मान से ऊँचा उठ सके. जैसे- जैसे उसको बीते समय की यादें गहराने लगी, वैसे- वैसे फिर से उसकी आँखें नम होने लगी, वह कुछ ज्यादा ही संवेदनशील थी, हर छोटी-सी बात पर भावुक हो जाती थी. जितना प्रयास करती बीती बातों को भूलने का, उतना ही रह-रह कर उसके सामने आ रही थी' बीती ताहि विसार दे आगे की सुधि ले '. आगे की सोच अभी निर्णायक स्तर तक नहीं पहुँच पा रही थी. बार- बार मन में एक ही ख्याल की पुनरावृत्ति हो रही थी कि कैसे सब की उम्मीदों पर खरा उतरे, कैसे वह सब को इतना सुख दे कि सब का सीना फख्र से चौड़ा हो जाए .

इन्हीं सबके बीच सोचते- सोचते वह फिर से अतीत में खो गई . प्रतीक्षा के जीवन में जिस तरह उतार-चढ़ाव आए थे, बचपन से शायद इसीलिए वह ज्यादा भावुक होती गई. बचपन से ही वह मीठा खाने की कुछ ज्यादा ही शौक़ीन थी. जब वह पाँचवी कक्षा में ही थी सिर्फ कि उसके दाँत में दर्द शुरू हो गया अचानक. जरा-सा पानी लगने पर भी वह दर्द से कुलबुला उठती. उस दिन उसके दांत का दर्द कुछ ज्यादा ही बढ गया . उस दिन पिताजी भी कहीं बाहर गए थे और माँ घर के काम काज में व्यस्त थी. माँ ने कहा " प्रतीक्षा,ऐसे कोई दर्द ठीक हो जाएगा क्या , जाओ और दीदी के साथ जाकर सदर अस्पताल में दिखा आओ, डॉक्टर दवाई दे देगा और दर्द झट से ठीक भी हो जाएगा. जब मैं कहती थी कि प्रतीक्षा मीठी चॉकलेट कम खाया करो, तब तो कहना मानती नहीं थी."

वह डॉक्टर के पास जाने से बहुत घबरा रही थी और रोते रोते कहने लगी " माँ अगर डॉक्टर ने दांत को निकाल दिया तो ." माँ ने कहा " तुम तो अभी छोटी हो इतनी जल्दी डॉक्टर दांत थोडा ही निकालेगा "

माँ ने रसोई घर में जाते-जाते कहा .माँ की इन बातों से कुछ तसल्ली पाकर वह अपनी बड़ी बहिन अनुराधा के साथ सदर अस्पताल के लिए चल पड़ी. वहाँ जाकर उसने देखा कि पहले से ही लम्बी- कतार लगी है मरीजों की. काफी समय इन्तजार करने के बाद उसकी बारी आई तो डॉक्टर ने उसका दाँत चेक किया और बोला कि दाँत तो पूरी तरह सड़ चुका है." तब क्या करना होगा डॉक्टर साहिब" ,  दीदी ने आशंकित स्वर में डॉक्टर से पूछा  .यही एक तरीका बचा है कि इन्फेक्टेड दाँत को निकाल देना चाहिए नहीं तो पायरिया होने का डर है. मेडिकल विज्ञान की ये बातें न उसको समझ आ रही थी न उसकी बड़ी बहिन को . कुछ समय सोचने के बाद दीदी ने प्रतीक्षा की तरफ देखते हुए उसकी दाढ़ निकालने की अनुमति दे दी. डॉक्टर ने प्रतीक्षा को मुँह खोल कर रखने को कहा और सुन्न करने वाला इंजेक्शन उसकी दाढ़ में लगा दिया. डॉक्टर ने कहा कि इससे दाँत सुन्न हो जाएगा और फिर दाँत निकालने में दर्द नहीं होगा और बाहर की तरफ इशारा करते हुए कुछ देर इन्तजार करने को कहा.प्रतीक्षा चुपचाप बाहर बेंच पर जाकर बैठ गई और अपनी बारी का इन्तजार करने लगी .उसके चेहरे पर मासूमियत झलक रही थी. जैसे-जैसे दाँत सुन्न हो रहा था वह रुआंसी हो रही थी और कुछ घबराहट भी हो रही थी .बड़ी बहिन पास बैठी उसे हिम्मत देने की कोशिश कर रही थी." प्रतीक्षा कुछ नहीं होगा, घबराओ मत, आज कल तो विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है और इतने बड़े से बड़ा ऑपरेशन बड़ी आसानी से हो जाता है और यह तो एक दांत निकालने की बात है सिर्फ. और तुम तो अभी छोटी हो और यह तो दुधिया दाँत है वापिस फिर से आ जाएगा. मौसी के बारे में तो जानती ही हो कि उन्हें कैंसर हुआ था और ऑपरेशन के बाद ठीक है बिलकुल".

अनुराधा के इतने लम्बे-चौड़े भाषण को वह क्या समझ पाती .दीदी की आँखों को देख कर वह समझ गई कि उसे कोई खतरा नहीं है. सहमति जताने के लिए उसने अपना सर हिला दिया .वह पहले भी घर में बातचीत के दौरान रिश्तेदारों के ऑपरेशन के बारे में सुन चुकी थी .किसी को स्तन कैंसर था तो किसी को गठिया , लेकिन ऑपरेशन के बाद ये बिमारी दूर हो गई थी.

काफी समय बीत गया था पर उनकी बारी नहीं आई थी. डॉक्टर काफी भीड़ होने के कारण दूसरे मरीजों को /देख रहा था . आधा-घंटा लगभग बीत गया था. धीरे-धीरे उसकी निश्चेतन हुई दाड़ में फिर से दर्द- सा होना लगा और चेतना का ऐहसास फिर से होने लगा. जब तक उसकी बारी आई तब तक टीके का असर लगभग ख़त्म ही हो गया था, पर उसे इतनी समझ थोडा ही थी. वह डॉक्टर से क्या बताती और कैसे बताती. डॉक्टर ने उसे एक विशेष-सी कुर्सी पर आराम से बैठने को कहा और लाइट उसकी तरफ घुमा दी और कहा "अच्छा अब मुँह पूरी तरह खोलो, बस एक मिनट लगेगा.”

यह कहते हुए एक तरह के ख़ास औजार से उसकी दाड़ जड़ से निकाल दी . प्रतीक्षा की चीख निकल गई , डॉक्टर ने डाँटते हुए कहा चिल्लाने की क्या बात है , और दाँत में से खून बहने लगा. ,वह दर्द से बिलबिला रही थी , उसकी यह हालत देखकर उसकी बहिन अनुराधा भी घबरा गई  . डॉक्टर साहिब ये क्या, उसके दाँत से तो बहुत खून निकल रहा है. डॉक्टर ने कहा कि घबराने की बात नहीं है और यह कहकर डॉक्टर ने एक बड़ा सा रुई का फ़ौआ उसके दाँत की जगह ठूंस दिया, इसे निकालना मत्त और जल्द ही खून रुक जाएगा. डॉक्टर की थोड़ी सी असावधानी की वजह से आस पास के दांत भी खराब होने शुरू हो गए और उनकी जड़ों में भी इन्फैक्शन फ़ैल गया और मर्ज ठीक होने की बजाय बढता ही गया .प्रतीक्षा के कई दांतों में संक्रमण फ़ैल गया .और उन दांतों को भी निकालने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था . खान-पान की असुविधा होने के कारण उसका स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन बिगड़ता ही गया. एक दो दांत ऊपर के जबड़े से भी निकल जाने के कारण उसकी आँखों की रोशनी भी कम होती गई दिन पर दिन. कक्षा में बोर्ड पर लिखे हुए अक्षर पढ़ने में उसको काफी दिक्कत आने लगी . और छठी कक्षा में ही एक मोटा-सा चश्मा उसकी आँखों पर लग गया .इस चश्मे की वजह से सब उसे चश्मिश कहकर पुकारने लगे और वह मन ही मन अवसाद ग्रस्त होती गई  ..दूध के दांत निकलवाने के बाद वापिस आ गए मगर उसका गिरता स्वास्थ्य , अवसाद ग्रस्त चेहरा तथा आँखों पर लगे मोटे चश्मे ने उसकी सुन्दरता को इस तरह छुपा दिया था मानो किसी काले बादल ने दैदीप्यमान सूरज को ढक लिया हो .अपनी सुन्दरता को खोता देखकर वह दिन- प्रतिदिन हीन-भावना की शिकार होती गई. न तो वह अब ज्यादा किसी से बात करती और न किसी को ख़ास मिलना पसंद करती .वह सबसे कटी-कटी रहने लगी. अगर घर पर कोई भी रिश्तेदार या कोई मित्र आता है तो वह छुप जाती थी .अब उसके पास एक ही लक्ष्य था केवल पढाई और पढाई .सारा दिन किताबों में लीन रहना उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था. इतनी बीमारियाँ छोटी उम्र में और ऊपर से कुछ ज्यादा परिश्रम करने के कारण उसकी प्रतिरोधक क्षमता क्षीण होने लगी और देखते- देखते वह तपेदिक जैसी भयानक बीमारी की चपेट में आ गई. उसको हर समय बुखार रहने लगा और खांसी के साथ बलगम में खून आने लगा .पहले वह बड़ी बहिन के साथ सोया करती थी परन्तु अब माता-पिता ने उसका बिस्तर अलग लगा दिया और बाकी हर रोज इस्तेमाल होने वाला सामान भी सब अलग कर दिया और इस वजह से उसे पहले जैसा प्यार भी नहीं मिल पा रहा था. पिताजी ने उसे हिदायत देते हुए कहा " बेटी खांसते वक़्त मुह पर रुमाल रख लिया करो , यह बिमारी एक संक्रमित आदमी से घर के बाकी सदस्यों को भी हो सकती है खांसी के द्वारा और दूसरे सामानों के इस्तेमाल से भी इस बीमारी के कीटाणु दूसरों तक आसानी से पहुँच सकते हैं अतः बेहतर यही है की तुम अलग कमरे में और अलग बिस्तर पर सोया करो".

पिताजी की ये बातें सुन कर प्रतीक्षा को ऐसा लगा मानो उस पर वज्रपात हुआ हो. इस छूआ-छूत की बीमारी के बारे में बताते-बताते पिताजी दुखी हो गए और उसे सदर अस्पताल के जाने माने डॉक्टर के पास ले गए. डॉक्टर ने बड़ी बारीकी से उसकी बीमारी की जांच-पड़ताल की और दो महीने की एंटीबायोटिक मेडीसिन दी और साथ में चालीस पेंसिलिन के इंजेक्शन भी दिए. दवाइयाँ इतनी कडवी थी और पेंसिलिन की सुइयों का तो कहना ही क्या ! इतने दर्द भरे थे कि बैठते नहीं बनता था. हर रोज का एक इंजेक्शन था जिसे लगातार लगवाना पड़ता था और न चाहते हुए भी वह इस असहनीय दर्द को सहने को मजबूर थी और इतना सब झेलने के बाद वह मानसिक और भावनात्मक तौर पर कमजोर पड़ती जा रही थी. मगर घर वाले हैरान थे और उसके साहस की दाद देते थे कि कैसे प्रतीक्षा ने इतनी छोटी उम्र में भी अपनी बीमारी के साथ लम्बी लड़ाई लड़ी. धीरे-धीरे वह ठीक होती गई और इसकी वजह से वह अपने स्वास्थ्य के लिए काफी सचेत रहने लगी क्योंकि शंका उसके मन के कोने में घर कर गई थी. एकाग्रता के अभाव में नौवीं कक्षा में उसको काफी कम अंक प्राप्त हुए. कम अंको की वजह से उसे काफी दुःख लगा और खुद को असहाय महसूस करने लगी. फिर उसे नर्सरी कक्षा में पढाई गई कहानी "राजा और मकड़ी "याद आ गई ,और उसने अपनी आंतरिक शक्ति को इक्कठा करते हुए दिन दूनी रात चौगुनी मेहनत करना शुरू किया दसवीं कक्षा की परीक्षा के लिए.

आखिरकार अपना नाम दसवीं के बोर्ड की परीक्षा की मेरिट-लिस्ट में अंकित करवाकर न केवल अपनी बुद्धिमता का और साहस का परिचय दिया बल्कि अपने पिता के गौरव को भी अक्षुण रखा. सही भी था कि पूत के पाँव पालने में ही पहचाने जाते हैं . उसकी गौरवमयी सफलता को देख कर पिताजी प्रतीक्षा के प्रशासनिक अधिकारी बनने का दिवा -सपना देखने लगे. और उसकी आगे की पढाई के लिए योजना बनाने लगे. पिताजी ने प्रतीक्षा का मार्गदर्शन किया कि प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए दो सालों तक यानी बारहवीं तक वह साइंस के विषय पढ़ ले तांकि उसका सामान्य-ज्ञान अच्छा हो जाए और उसकी दिनचर्या भी अच्छी बनी रहे .फिर उसके बाद आर्ट्स के विषय लेकर मेन पेपर के लिए अच्छे से दो विषय तैयार कर ले . इस तरह उसके पिता जी ने मन ही मन पूरी योजना हर बात की बना ली. वह मन ही मन सोच रहे थे की उनके खानदान में आज तक कोई भी इतने ऊँचे पद पर आसीन नहीं हुआ है और जब प्रतीक्षा इस पद पर होगी तो उनका सिर फख़्र से सबकी नजरों में कितना ऊँचा हो जाएगा .

तभी बस कंडक्टर ने बस रोकी और कहने लगा कि डी ए वी कॉलेज का स्टॉप आ गया है, यहाँ वाले सब उतर जाएँ , तभी प्रतीक्षा ने सामने देखा अपने नए कॉलेज के बड़े से गेट को ..

प्रतीक्षा को उठता देखकर पिताजी ने उसकी तरफ इस तरह देखा मानो अपने अरमानों की चिट्ठी उस तक पहुँचाना चाहते हो. पिता जी प्रतीक्षा की तरफ देख कर कहने लगे जाओ बेटी अपने अरमानों को हासिल करो " वह अपनी अतीत की यादों के थपेड़ों से बाहर निकल कर जिन्दगी के रंगीन सपनों को सार्थक करने के लिए कॉलेज के बड़े से गेट में प्रवेश करने लगी. क्या वह अर्जुन की तरह अपने लक्ष्य को बेध पाएगी उसे लग रहा था उसको ही क्यों इतना सब झेलना पड़ा और इतना संघर्ष क्यों ?

 yashwantkotharinew13

आज मैं सुख की चर्चा करूंगा। एक जमाना था, जब मैं विवाहित नहीं था। फिर कुछ ऐसा चक्कर चला कि गृहस्थ हो गया। अब हालात ये है कि दिन बाद में आता है और नहाना पहले पड़ता है। न नहाने की कला में माहिर लोगों का ख्याल है कि सर्दियों में यदि आप नहाने से बच जायें तो समझिये आप गंगा नहा आये। मगर माफ करिये अब वो सुनहरे होस्टल के दिन कहां रहे, जब बिना नहाये कॉलेज जाया जा सकता था। अब तो 'बिना स्नान सब सून' की स्थिति है।


यह सब याद आने का कारण ये है कि पिछले दिनों लन्दन में एक सर्वेक्षण किया गया कि बिजली की अधिक खपत के कारण क्या हैं ? और आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि इसका एक कारण लन्दन में बसे भारतीय हैं जो रोजाना नहाने के लिये पानी गर्म करते हैं। आखिर हमारा देश स्नान करने की सुदृढ़ परम्परा का देश है।
स्नान वीरों का है ये देश। हम अपनी स्नान करने की संस्कृति को, परम्परा को विदेशों में भी याद रखते हैं। कौन है जो ये कहता है कि हम अपनी जड़ों से कट रहे हैं, अपनी संस्कृति को भूल रहे हैं, मेरे प्यारे दोस्तो, आओ........आओ देखों कि स्नान सुख की संस्कृति को हम कहां भूले हैं। विदेशी धरती पर भी हम अपनी स्नान परम्परा को कायम रखे हुए हैं।

सर्दियों में स्नान करना परम पुरूषार्थ हैं। हमारे देश में तो मासिक स्नानों तक का महत्व है। चैती नहाना या कार्तिक नहाना तो हमारी परम्परा का गौरवशाली हिस्सा रहा है। क्या औरतें, क्या पुरूष और क्या युगल और दम्पत्ति, कोई इस स्नान सुख से वंचित नहीं रहना चाहता। अलबत्ता कुछ नासमझ, नई पीढ़ी के बच्चे और युवा इस स्नान ध्यान को पुराना और दकियानूसी समझने लगे हैं, लेकिन यहां तो स्नान कुम्भों की परम्परा है। कभी पूर्णिमा का स्नान, तो कभी गंगा स्नान तो कभी गंगा सागर में मकर संक्रान्ति का स्नान, क्या आस्तिक क्या नास्तिक, सभी स्नान करने में परम् सुख पाते हैं।


पुराने लोग अनुभव करते हैं कि स्नान के साथ-साथ पाप भी धुल रहे हैं, नये लोग मानते हैं कि स्नान के साथ ही शरीर में स्फूर्ति आ रही है। मैल बहकर जा रहा है और टी.वी. वाली पीढ़ी समझती है कि नहाने के तुरन्त बाद वे फलां तारिका या फलां एक्टर जैसी दिखने लग गई है। क्या स्नान को केवल भौतिक या दैहिक स्तर पर सीमित रख दें। नहीं भाई सर्दी कितनी ही पड़े स्नान का धार्मिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक और आत्मिक सुख भी है, जो अनिर्वचनीय है। अब चाहे आप स्नान हेतु गलता जायें या पुष्कर या मातृ-कुण्ड्या या फिर बाथरूम सिंगर बनकर स्नान सुख प्राप्त करें, एक बात अवश्य है कि स्नान जीवन की अनुभूति देता है।


जो लोग कठौती में गंगा समझते हैं वे तो काक स्नान से भी तृप्त हो जाते हैं और कुछ एक दो लौटे से ही पवित्र हो जाते हैं, लेकिन स्नान के मामले में जो मजा धूप स्नान का है, वो अन्य स्नानों में कहां। विदेशों में ही नहीं, अपने यहां केरल में कोवलम्-बीच, गोवा और बम्बई के समुद्री तटों पर या पांच सितारा होटल के स्वीमिंग पूलों के किनारे पर धूप सेंकते विदेश जोड़े आपको धूप स्नान का महत्व समझाने को काफी है।


स्नान को भारतीय ऋषि वात्स्यायन ने सोलह श्रृंगारों में से एक माना है। इसके अभाव में सभी श्रृंगार व्यर्थ, अनावश्यक और अछूत नजर आते हैं।
बालक के उत्पन्न होते ही स्नान, उपनयन-संस्कार में स्नान, देव पूजन, राज्योरोहण दीक्षा, ग्रहण में स्नान, शादी में स्नान और अन्तिम संस्कार के पहले भी स्नान।
स्नान का ऐसा महत्व अन्य किसी संस्कृति में उपलब्ध है श्रीमान।


गंावों की बात करूं तो त्यौहारों पर ही स्नान होता है, औरतें तालाब, नदी, नालों पर जाकर स्नान करती हैं और मेलों में जाने से पहले भी नहाना परम्परा है। पुष्कर, फतेह सागर, पिछौला, गलता, मातृ-कण्ड्या आदि स्थानों में नहाने का मजा ही अलग है। ये बात अलग है कि घर-घर में नल संस्कृति ने स्नान संस्कृति को कम कर दिया है, फिर भी ग्रहण के बाद स्नान करने भक्त लोग पवित्र झीलों में पहुंच ही जाते हैं।


लेकिन नल संस्कृति से घबराने की तो बात ही नहीं है, भला हो भारतीय जल संस्थानों का जिनकी कृपा से नलों में पानी कम और हवा ज्यादा आती है, यदा-कदा केचुएं, मछलियां भी कृपापूर्वक सर पर गिरती रहती हैं।
सब स्नानों में श्रेष्ठ स्नान है, वर्षा में स्नान। गर्मी में तपती दोपहरी के तुरन्त बाद जो मजा बारिश में नहाने का है, वो अन्य स्नानों में कहां।
लेकिन सर्दी के इस मौसम में वर्षा स्नान के नाम से ही झुरझुरी छूट रही हैं। कर्म-कांड और वेदों में सैकड़ों प्रकार के स्नानों का वर्णन है।
हिन्दुओं के अलावा अन्य जातियों में भी स्नान का महत्व बताया गया है।


रोमनों, मुस्लिमों, जापानियों, ईसाइयों, तुर्को आदि अनेक लोगों ने स्नान के क्षेत्र में एक से बढ़कर एक प्रयोग किये हैं।
समझदारी इसमें है कि संसार को एक समुद्र माना जाये और मानव इसमें रोज स्नान करता रहे।
स्नान सुख की यादें जाती सर्दियों में सुखकर हैं। दो स्नानों के बीच में यह लेख प्रसूत हुआ है, क्योंकि प्रसूति स्नान का भी विशेष महत्व है, अतः मैं पुनः नहाने जा रहा हूं, तब तक के लिए क्षमा।

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    यशवन्त कोठारी
    86, लक्ष्मी नगर,, ब्रह्मपुरी बाहर,,
    जयपुर-302002 फोनः-2670596
ईमेल -      ykkothari3@yahoo.com

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अधिकारी – तिवारी जी, यह पांच वर्ष का लड़का भीख मांगता है? अभी से ही मां बाप भीख मांगने की आदत डाल देते हैं, मैं कभी पैसे वैसे नहीं देता.

बड़ा बाबू – जी सर, मां बाप बड़े निर्दयी होंगे.

अधिकारी – तिवारीजी, इनको कोई डांट भी देता है, लेकिन ये अपनी आदत से बाज नहीं आते, फिर भीख मांगने लगते हैं.

बड़ा बाबू – हाँ, सर, इन लोगों की आदत दुम हिलाने की जो है.

अधिकारी – तिवारी जी, भीख मांगना बुरा है, अपमानित होकर पुनः मांगते रहना तो और भी बुरा.

बड़ा बाबू – बिल्कुल ठीक सर, आपकी एनालिसिस सही है.

अधिकारी – तिवारी जी, आज मंत्रीजी का जन्म दिन है, अभी दस ही बज हैं. चलो फूलों के बढ़िया हार ले चलें. संचालक के पद पर मेरी पदोन्नति शीघ्र हो जाए तो अच्छा.

बड़ा बाबू – हाँ, सर. मैं तो यह राय देना भूल ही गया था. जो कुछ मांगना हो आज ही मांग लीजिएगा.

अधिकारी – तिवारीजी, लेकिन वे कभी-कभी डांट भी देते हैं.

बड़ा बाबू – तो क्या हुआ सर, पुराने मंत्रिमंडल वाले मंत्री भी तो डांट देते थे, लेकिन अपना काम तो उनसे अनुरोध करते रहना है.

अधिकारी – तिवारी जी, उन्होंने तो मुझे पदोन्नति नहीं दी, क्या पता ये भी देते हैं या नहीं. लेकिन मेरे पिताजी कहा करते थे, अपना काम मांगते रहना है. दें तो भी भला, न दें तो भी भला.

बड़ा बाबू – हाँ, सर, मेरे पिताजी भी यही बात कहा करते थे. आखिर अपने अधिकार के लिए प्रयास तो करना ही चाहिए.

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हरि जोशी के व्यंग्य संग्रह – अखाड़ों का देश से साभार

प्रकाशक – राष्ट्रीय प्रकाशन मंदिर, मोतिया पार्क, भोपाल (मप्र)

छिः!

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मूल कहानी: सरोजिनी साहू

हिंदी रूपांतरण: दिनेश माली

( कहानी 'छिः!' कहानीकार की सफलतम नारीवादी कहानीयों में से एक है। इस कहानी में नारी के अंतर्मन के कई गोपनीय पहलुओं पर अति-सूक्ष्मता से प्रकाश डाला गया है । यह कहानी मूल रूप से नब्बे के दशक में लिखी गई थी.। सर्व-प्रथम यह कहानी ओडिया पत्रिका 'झंकार' में प्रकाशित हुई और बाद में लेखिका के कहानी-संग्रह "दुःख अपरिमित" (ISBN : 81-7411-483-1) में संकलित हुई । ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में शोध कार्यरत प्रतिष्ठित लेखिका गोपा नायक ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद Hatred शीर्षक से किया है,जो वेब-पत्रिका Thanal  On  Line  में प्रकाशित हुआ है ।)

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उसके घुँघराले बालों में कंघी करने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी। सर्पिल लटों के गुच्छे के रूप में बाल बिखरकर आँख, कान, नाक के ऊपर गुलदस्ते की तरह झूलने लगते थे। जब भी नानी उनके घर मिलने आती थी, तो अपने साथ बहुत सारी छोटी-मोटी चीजें लेकर आती थी। कभी-कभी अरण्डी का तेल भी साथ लेकर आती थी। रस्सी से बुनी हुई खटिया में बैठकर गोंद जैसे चिपचिपे अरंडी के तेल को लगाकर गाय के सींग से बनी कंघी से जब नानी उसके बाल बनाती थी , तो उसे रोयेंदार भेड़ों के बालों की याद आती थी। उसने एकबार पठानों की बस्ती में बकरियों के साथ भेड़ों की टोली देखी थी। उस टोली में आस्ट्रेलिया या हिमालय पहाड़ के आस-पास के इलाकों में रहने वाली भेडें नहीं थी। वे तो तटीय उड़ीसा की भेडें थी। मलिन पीले वर्ण वाले शरीर में एक-एक इंच ऊन की रोयेंदार गांठे भरी पडी थी। अपने ऐसे बालों के बारे में सोचकर वह बहुत दुःखी हो जाती थी। नानीजी के बोलने का तात्पर्य झट से उसकी समझ में आ जाता था। अरंडी का तेल बालों में लगाते ही सिर पर बाल इस तरह चिपक जाते थे मानो किसी ने गोंद से चिपका दिए हो। कक्षा में पढ़ाते समय अध्यापकगण अक्सर बच्चों को कहते थे कि वे सोते समय अपनी नानी से ध्रुव, प्रहलाद, श्रवण कुमार आदि के बारे में पौराणिक कहानियाँ अवश्य सुनते होंगे। उसकी राय में अध्यापकों की दोनों बातें झूठी थीं । पहली,   इसलिए कि नानी पौराणिक कहानियाँ नहीं सुनाती थी ; दूसरी,  इसलिए कि वह सोते समय तो कभी कहानियाँ नहीं सुनाती थी। वह केवल कंघी करते समय अजीबो-गरीब किस्म की कहानियाँ सुनाती थी, जो उसके कोमल-चित्त पर हमेशा के लिए अंकित हो जाती थी।

उन सब कहानियों में से दो कहानियाँ अभी तक उसे पूरी तरह से याद है।
पहली कहानी इस प्रकार थी।बहुत पुरानी बात थी। पता नहीं, किन राज्यों से मराठा उड़ीसा आए थे। गाँव-गाँव में आक्रमण कर , सारे घरों में घुसकर वे लूटपाट कर सब तहस-नहस कर देते थे। बोलते -बोलते कुछ क्षण के लिए नानी चुप हो गई । इसके बाद एक लम्बी सांस लेते हुए फिर से कहने लगी कि जब वह आँगन की तरफ काम कर रही थी तो कोई जोर से चिल्लाया, “मराठा आ रहे हैं गाँव की तरफ ! भागो ,जल्दी भागो ।”

देखते-देखते ही सारा गाँव सूना हो गया। जिसको जो रास्ता मिला, उसी रास्ते से पहाड़ के ऊपर भाग गया , घर के सारे मवेशी गाय-भैंसे गुवालों के अंदर ऐसे ही बंधे छोड़कर। सब-कुछ ऐसे ही छोड़कर भाग जाते थे; रुपया-पैसा, धान, चावल, मूँग, उड़द। तब किसको ये चीजें याद रहती। तब तो केवल यह एक चीज ही याद रहती ' भागते भूत की लंगोटी भली'। यहाँ तक कि सत्तर वर्षीय बुढ़िया, 'नौलियाँ की माँ' भी अपनी लाठी पकडकर धीरे-धीरे पहाड़ की तरफ चली गई थी। नहीं जा पाई थी तो सिर्फ हलवाई की बहू। जाती भी तो वह कैसे जाती ?  गर्भवती जो ठहरी। उसका नौवां महीना चल रहा था। मराठों के आने की बात सुनकर उसको प्रसव-शूल शुरू हो गया था। पेट में बच्चा था, पहाड़ पर कैसे चढ़ती ? सास-ससुर, पति-देवर, ननद सब कोई उसको अकेले छोड़कर अपने प्राण बचाने के लिए भाग गए थे। आपत्ति-काल में कौन किसको पूछता है ! हलवाई की बहू कैसे जाती ? उसके पेट के भीतर बच्चा बाहर निकलने का प्रयास करने लगा।

वह कहने लगी -“आप लोग जाइए, मेरे खातिर क्यों अपनी जान दोगे ? मराठा मुझे खाकर संतुष्ट हो जाएँगे।”

ऊपरी मन से कह तो दिया था, मगर गाँव के अंतिम छोर से आने वाले घोड़ों के खुरों की टॉप-टॉप आवाज सुनकर भय से प्रसव शूल और बढ़ गया तथा देखते-देखते उसने एक बच्चे को जन्म दे दिया ।वेदना के मारे उसकी आँखों से अश्रुधारा फूट पड़ी । उसका यह पहला प्रसव था। धीरे-धीरे उसने स्वयं उठकर सीपी की सहायता से बच्चे की नाल काटी और बच्चे को साफकर गोदी में लेकर बैठ गई। तभी सदल लूटेरे मराठे उनके गाँव पहुँच गए। उन्होंने इधर-उधर देखा। सारा गाँव निर्जन सुनसान पडा था। क्रोधित होकर उन्होंने उत्पात मचाना शुरु कर दिया.। किसी के बरतन फेंके,तो किसी के घर जला दिए। सब बरबाद करके जब वे उस हलवाई के घर पहुँचे तो उन्होंने उस प्रसूता स्त्री को देखा। आठ-दस खूँखार आदमियों ने उसको चारों तरफ से घेर लिया।

“कहाँ गए गाँव के सारे लोग ?”

वह क्या बोलती, उसका शरीर डर से थर-थर काँप रहा था। मुँह की बोलती बंद थी। मुँह से एक भी शब्द नहीं निकल रहा था। ड़री हुई आंखों से वह केवल इधर-उधर देख रही थी। मराठों का मुखिया कहने लगा,
“ऐसे आँख फाड-फाडकर क्या देख रही हो ? चूल्हा जला, हमें जोरों की भूख लग रही है। तेल की कडाही चढ़ा और तुम्हारी गोदी में जो दूधमुँहा बच्चा है, उसको तल-भुनकर दें, हम लोग खाएँगे।”

हलवाई की बहू का पहला नवजात शिशु लड़का पैदा हुआ था, एक पल के लिए भी अपने लाड़ले बच्चे को ढंग से निहार नहीं पाई थी। अभी तक तो उसको स्तन-पान भी नहीं करवाई थी। माँ के मन पर क्या गुजरी होगी ! बड़े ही धैर्य के साथ वह साहसपूर्वक कहने लगी
“बच्चे को खाना चाहते हो, ठीक है। थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए। अपने स्थान पर चुपचाप बैठे रहिए।”

नवजात शिशु को गोदी में लेकर चूल्हा जलाया, तेल गरम किया। तेल जब उबलने लगा। अचानक खड़ी होकर, तेल उबालने वाले जाले से उन पर गरम तेल तेजी से छींटने लगी।
“बापरे ! जल गए, मर गए, मर गए”- कहते-कहते वे लोग भाग खड़े हुए।
नानी कहती थी, यह उनके बचपन की बात थी। अगर पारिजात उम्र में बड़ी होती तो वह समझ पाती कि यह बात नानी के बचपन में घटित हुई होगी। अभी तो वह मराठों के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी। वह तो सोच रही थी कि मराठे देखने में जरूर हाथी, घोड़े , शेर, भालू व राक्षस जैसे होंगे, अन्यथा नर-मांस खाने की मांग क्यों करते ?
नानी की दूसरी कहानी को भले ही वह अविश्वास की दृष्टि से नहीं देखती थी, मगर वह कहानी उसे बहुत दुखी करती थी। मन छिः से भर जाता था। नानी कंघी करते समय अरण्डी के तेल से उसकी पीठ पर मालिश करती हुई कहती थी, “यह तो मेरे सोने की पीठ है ! इसके जन्म के बाद ही घर में पहले बेटे का जन्म हुआ है ।”

वह छोटी-सी कहानी सुनाती थी। कई देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना, मिन्नत-माँगने के बाद जब माँ निराश हो गई थी। तब नानी ने कहीं से एक परीक्षित पुत्रेष्टि उपाय सुनकर आई थी और उसका माँ पर प्रयोग किया। एक दिन पारिजात के मल से उदर-कृमि निकालकर पके केले के अंदर छुपाकर माँ को खिलाया था नानी ने। यह तो शायद संयोग की बात थी। इधर कौए का बैठना हुआ, उधर डाली का टूटना हुआ। इस बार माँ को बहु-प्रतीक्षित बेटा यानि पाराजित का छोटा भाई पैदा हुआ। जिस दिन से नानी ने वह कहानी सुनाई थी, उस दिन से नानी के प्रति उसका मन छिः से भर गया । उसके बाद वह कभी भी नानी के पास कंघी कराने नहीं बैठी। तब से वह नानी को अविश्वास की आँखों से देखने लगी । उसे लग रहा था माँ बुरी तरह प्रताडित हुई है। उसे अपनी माँ पर बहुत दया आ रही थी ।

2

बचपन से ही उसके स्मृति-पटल पर अंकित थी वे अश्रुपूरित दो आँखे। जैसे ही वह शाम को घर में जलते हुए साठ-वाट के बल्ब देखती थी, वैसे ही उसे वे दो आँखे याद आ जाती थी। उसके बाद धीरे-धीरे सफेद ब्लाउज व सफेद साड़ी पहनी हुई अधेड़ उम्र वाली एक औरत आँखों के सामने प्रत्यक्ष दिखाई देने लगती थी। उस औरत की बात में पता नहीं, ऐसी क्या व्यथा थी ! उसकी वे बातें याद आते ही परिजात की समग्र चेतना हिल जाती थी। उस औरत की बातों में इतनी कशिश थी कि सुनने-मात्र से गहरे पानी में डूब जाने जैसा प्रतीत होने लगता था।

बड़ी व्याकुलता से वह कहती थी- “दे, दे, ऐ रीना की माँ ! मेरे बाल-बच्चे सुबह से कुछ नहीं खाए हैं। ऐसे ही भूखे बैठे हैं। किसी के भी पेट में अनाज का एक दाना भी नहीं पड़ा है।”
उसके हाथ में एक झोला था। उसकी वह व्याकुल आवाज पारिजात की माँ के कानों तक नहीं पहुँचती थी। थक-हारकर, वह औरत जमीन पर बैठकर आखों के आँसू पोंछने लगती थी। यह देखकर कुछ समय बाद माँ नाक-भौं सिकोड़कर कहने लगती, “रोज-रोज आओगी, तो कहाँ से दूँगी ? आज शाम को फिर से चली आई हो, मेरा कोई दूसरा काम नहीं है क्या ?”
माँ से फटकार सुनने के बाद भी वह औरत जमीन पर यथावत बैठी रहती थी। उसको ऐसे ही बैठा देख, माँ गुस्से से हाथ में पकडे हुए बरतन फेंक देती थी, नहीं तो, झाडू को धड़ाम से जमीन पर नीचे गिरा देती थी और झन-झन आवाज करती हुई तेजी के साथ घर के भीतर चली जाती थी। फिर कुछ समय बाद, घर के अंदर से एक चक्कर काटकर बाहर लौट आती थी।फिर उस औरत को वहीँ बैठा देख आवेश में आकर वह चिल्लाने लगती थी-

“अब तक तुम नहीं गई हो ? बोली न, मेरे पास चावल नहीं है। कहाँ से लाकर दूँगी ?”

“दे, दें, न, रीना की माँ ! ज्यादा नहीं, एक मुट्ठी चावल दे दें, नहीं तो मेरे बच्चे भूख से तड़प-तड़पकर मर जाएँगे। मेरी बहिन, दे, दें।”

ऐसा कहकर वह माँ का हाथ पकड लेती थी तथा जोर- जोर से गिड़गिड़ाने लगती थी । तब भी माँ का कठोर दिल नहीं पसीजता था।उस समय परिजात को अपनी माँ में एक आदर्श माँ जैसी करुणा नजर नहीं आती थी। तब उसका मन होता था, खुद जाकर चावल के ड्रम में हाथ डालकर दो-चार मुट्ठी चावल लाकर सविता की माँ को दे दें।
उसे तो यह भी मालूम नहीं था, सविता के घर वाले गरीब है अथवा अमीर। परन्तु उसे यह मालूम था कि वह सम्भ्रान्त कायस्थ घर की विधवा थी; इसलिए सफेद ब्लाउज व सफेद साड़ी पहनती थी । उसका माँ के सामने दो मुट्ठी चावल के लिए हाथ फैलाकर एक भीखमंगे की तरह गिडगिडाने वाला दृश्य उसके दिल को कचोटता था । उसे वह दृश्य बड़ा ही दयनीय लगता था। उसका मन कह रहा था कि हर हालत में माँ को चावल दे देने चाहिए। उनके घर में चावल के बोरों के ढेर थे । एकाध मुट्ठी चावल दे देने से क्या फर्क पड़ जाता ? ऐसे भी तो चूहे हर साल एक चतुर्थांश चावल हजम कर जाते थे। हर रोज कटोरे भर-भरकर जूठा भात गायों के कुंड में डालते थे। एक कटोरा भात के लिए किसी मनुष्य की आँखे आंसूओं से डबडबा जाएगी, ऐसा सोचने मात्र से ही उसे खराब लगने लगता था।

वह माँ को कहती थी, “आपने सविता की माँ को चावल क्यों नहीं दिए ? इतना रो-धोकर वह खाली हाथ अपने घर चली गई। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।”

माँ झल्लाकर चिल्लाने लगी, “क्या मेरे यहाँ चावल मुफ्त में आते हैं ? आगे चातुर्मास है, इसलिए धान उबालकर ‘उष्णा’ चावल बनाकर रखी हूँ, जो कोई भी भिक्षा माँगने आएगा, उसमे से मैं दे दूँगी ? उसकी माँ किसी को कुछ भी नहीं देती थी। गिरीयापान सप्ताह में दो बार भीख माँगने आता था। वह बाहर के आँगन में बैठकर भीख माँगता था। उसकी आवाज सुनते ही माँ तुरंत परिजात के हाथों में एक कटोरी चावल देकर भेज देती थी यह कहते हुए

“जा, उसे जल्दी यहाँ से विदा कर।”
लंबे-चौड़े शरीर वाले उस आदमी का बुढापे की वजह से चेहरा भले ही बहुत मलिन दिख रहा था, मगर तब भी उसकी आँखे दहकते हुए अंगारों की भाँति लाल दिखाई देती थी। उसके झोले में चावल डालते समय वह माँ के हालचाल के बारे में पूछता था, पापा टाउन में है अथवा बाहर ? टाउन के बीच उनका घर होने से, क्या उन्हें वाहनों के शोरगुल में नींद ठीक से आती हैं अथवा नहीं  ? आदि बातें पूछता था। माँ कभी भी घर से बाहर नहीं निकलती थी। घर के अंदर से ही बड़बड़ाने लगती थी,

“चाचा, तुम इतनी खोज-खबर क्यों ले रहे हो ?”

माँ की बात सुनकर गिरीयापान अपनी लम्बी लाठी के सहारे खड़ा होकर जाने के लिए तैयार हो जाता था। परिजात के घर के भीतर जाते ही माँ पूछती थी “गिरीयापान क्या पूछ रहा था ?”

“कुछ भी नहीं, आपके और पापा के बारे में।”
माँ डरकर कहने लगती थी
“तुमने कह दिया क्या, पापा दो दिन से घर पर नहीं हैं।”

माँ गिरीयापान से बहुत डरती थी। उसके मन में गिरीया के प्रति एक विचित्र धारणा घर कर गई थी। गिरीयापान भीख माँगने के बहाने घर के अंदर की जानकारी प्राप्त कर किसी बेशकीमती चीज को चतुरता से अपने हाथ की सफाई से साफ करना चाहता है । कहाँ रूपए-पैसे रखे जाते हैं ? कहाँ सोना-चांदी रखी जाती हैं ? सारी गोपनीय जगहों के बारे में गिरीया शायद जानता है। जरूर, एक दिन धावा बोलकर सब लूटकर ले जाएगा।
गिरीयापान पारिजात के ननिहाल का आदमी था। इस वजह से माँ उसे चाचा कहकर पुकारती थी। इसकी वजह श्रद्धा-भाव नहीं, बल्कि डर से वह उसे चाचा कहकर पुकारती थी। वह कभी-कभी भावुकतावश डर से कहने लगती थी ,
“देख, चाचा ! मैं तेरी भतीजी हूँ। एक ही गाँव में हम पैदा हुए हैं। तुम मेरे घर पर कम से कम अपनी कुदृष्टि मत डालना।”

पारिजात को माँ की इस बात पर हँसी आती थी। एक भिखारी डकैत कैसे हो सकता है ? अगर वह डाकू होता तो, क्या दो मुट्ठी चावल के लिए द्वार-द्वार भटकता फिरता ? पारिजात की ये बातें सुनकर उसकी माँ एक जासूसी उपन्यास की तरह गिरीयापान की कहानी सुनाती थी।
“एक बार का समय था । गिरीयापान जब जवान था, तब वह बहुत ही खतरनाक डाकू हुआ करता था। उसके खौफ से न केवल उनका गाँव , बल्कि आस-पास के कई गाँव थर्राते थे। राजा-जमींदारों का समय था वह । प्रत्येक राजा अन्य राजाओं के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। चाहे वे कोई अच्छे काम हो, चाहे वे कोई बुरे काम हो। एक बार उनके गाँव में राजा ने गिरीया को अपने महल में आमन्त्रित किया । चूँकि वह एक दुर्दान्त डाकू था, इसलिए वह राजा के डर से बुलावे पर नहीं गया। वह कुछ समय के लिए भूमिगत हो गया था। एक दिन राजा स्वयं अपने दरबारियों के साथ कुछ कीमती उपहार लेकर गिरीया के घर पहुँचे। गिरीया के आश्चर्य की सीमा नहीं रही। घर से बाहर निकल कर अपनी धृष्टता के लिए क्षमा-याचना करने लगा। उस समय राज-महल में अंग्रेजों का आना-जाना लगा रहता था। राजा गिरीया को महल के अंदर बुलाकर कहने लगे-

“देख, गिरीया ! तुम अगर एक सच्चे पान की औलाद हो, तो एक काम करके दिखाओ ।”

गिरीया की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि क्या काम करना पडेगा। राजा आगे कहने लगे, “तुम मधुपुरगढ़ जाओ, वहाँ रानी के स्नानागार से उसके पहने हुए कपड़े अगर ला पाओगे, तब मैं तुम्हें बहादुर का बच्चा समझूँगा।”

गिरीया ने उत्तर दिया, “बस, इतनी सी बात !”

सचमुच, गिरीया मधुपुरगढ़ किसी गंदे नाले के अंदर से होते हुए, पता नहीं किस चतुराई से, मधुपुर रानी के स्नानागार में पहुँच गया और उसके पहने हुए कपड़े निकालकर बाँस के पोल में छुपाकर ले आया।यह थी गिरिया पान की बहादुरी की कहानी। फिर वह कहने लगी ,
“जानती हो, बेटी ! उसके आँख-कान हर समय सचेत रहते हैं।”
बचपन के उन दिनों में पारिजात को इतनी बुद्धि कहाँ से आई, पता नहीं, माँ के मुख से गिरिया की कहानी सुनकर तपाक से कह उठी “तू डरकर गिरीया को चावल देती है। उसको देते समय तुम्हारा चातुर्मासी चावल खत्म नहीं होता है, पर सविता की दुखियारी माँ को देते समय चावल खत्म हो जाते हैं। आप अच्छी औरत नहीं हो।”

माँ झल्लाकर चिल्ला उठती “क्या बोली ?”
मार खाने के डर से भागकर पारिजात रास्ते की किसी दूर दुकान के बेंच पर जाकर बैठ जाती थी।
उसका मन विद्रोह कर बैठता था, छिः से भर जाता था। विद्रोह या विरोध ? मगर छिः ! किसलिए ?

3

गुसलखाने के पैन पर थप-थप गिर रही थीं खून की बूँदे। सफेद पैन के ऊपर गिरती खून की बूँदे सूर्योदय की लालिमा जैसे सुंदर चित्र तैयार कर रही थी। उस दृश्य को देखकर पारिजात को एक लोकप्रिय कहानी याद आ जाती थी।

एक रानी थी। महल के झरोखे में बैठकर वह एक रुमाल पर अनमने ढंग से कशीदा निकाल रही थी। निसंतान होने की वजह से रानी का मन अशांत रहता था ।राजा की उम्र धीरे-धीरे ढल रही थी। संतान के बारे में सोचते-सोचते, रानी इतनी भाव-विह्वल हो गई थी कि उसकी आँखों से आंसूओं की झड़ी लग गई थी। केवल आंसू ही नहीं, अनमना होने की वजह से उसकी अंगुली में सुई चुभ गई थी। उफ ! आवाज के साथ रानी ने अपनी अंगुली दबा ली, जिससे तरल खून की एक बूँद अंगुली के ऊपर चमकने लगी। धीरे से उसने खून की बूँद को नीचे झटक दिया। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी।। महल के चारों तरफ नरम-नरम रूई के समान बर्फ का आवरण आच्छादित था। खून की बूँद वहां गिरते ही, दूध व अलता जैसे सम्मिश्रित वर्णयुक्त अजीब-सा दृश्य खिल उठा था। उसे देखकर रानी सोचने लगी कि काश ! ऐसी सुन्दर मेरी लडकी होती ! उसी समय एक परी आकाश-मार्ग से गुजर रही थी। उसने रानी के मन की बात को जान लिया। नीचे उतरकर रानी के पास आकर कहने लगी, “तुम्हारी कोख से इतनी सुंदर लडकी का जन्म अवश्य होगा, परन्तु उसके पैदा होते ही तुम्हारी मौत हो जायेगी। क्या तुम्हें यह शर्त मंजूर है ?”

रानी परी की बात सुनकर बहुत खुश हो गई , तथा बिना कुछ सोचे-समझे हाँ कर दी। रानी सोचने लगी, मेरी जिंदगी के बदले अगर महलों के अंदर एक सुंदर अप्सरा तितलियों की तरह घूमेगी-फिरेगी, तो उससे बढ़कर खुशी की और क्या बात हो सकती है ? वह विस्मित होकर पुनः उस स्थान को देखने लगी, जहाँ खून की बूँद गिरकर अभूतपूर्व वर्ण-विभा की सृष्टि हुई थी।इतनी सुंदर लडकी एक दिन धरती पर अवतरित होगी !

पैन में वह खून देखकर रानी की तरह पारिजात विचलित नहीं हुई थी। कुछ महीनों से लगातार इसी तरह रक्त-स्राव हो रहा था। यही सोच कर वह ये बातें किसी को बताती नहीं थी। एकबार अरविंद ने कहा, “,नहीं और नहीं चलेगा, अब डॉक्टर को दिखाने का समय आ गया है । कभी भी किसी बीमारी को ज्यादा पुरानी नहीं होने देना चाहिए।“ समाचार पत्र में प्रकाशित इस संदर्भ में एक डॉक्टर के लेख को पढ़कर अरविंद इतना प्रभावित हुआ था कि पारिजात को लेकर उसके नर्सिंग-होम में पहुँच गया।

वह डॉक्टर जटिल रोगों व उनके सरल उपचार के बारे में बोधगम्य भाषा में लेख लिखा करता था अपने पाठकों के लिए । प्रत्येक बीमारी का कारण अगर आधा शारीरिक है, तो आधा मानसिक, इसी युक्ति को बखूबी से प्रमाणित करते थे । इसी बात को डॉक्टर की दक्षता व योग्यता का प्रमाण मानकर, वे दोनों दोपहर के समय उनके घर पहुँचे थे। उस समय डॉक्टर आराम कर रहा था। उस दिन रोगी को देखने का उनका काम पूरा हो गया था । अरविंद ने कहा, “डॉक्टर के पास समय-असमय क्या है ? आज मैं ऑफिस से भागकर आया हूँ कल भागकर आना मुश्किल हैं।“

अरविंद ने कॉल-बेल बजाई । कुछ समय बाद डॉक्टर खुद बाहर निकला। वह अधेड़ उम्र का स्थूलकाय आदमी था। वह उन दोनों प्रश्नवाचक नेत्रों से देखने लगा।

-“आप डॉक्टर प्रधान हैं ?”

-“जी, कहिए ।“

-“सर, ये मेरी धर्मपत्नी है।“-

फिर अरविन्द ने शुरु से पारिजात की बीमारी के बारे में बताया। दोनों कुर्सी में बैठकर बातें कर रहे थे।

-“आपके पेडू में दर्द है ? मलद्वार में जलन है ? पैन के ऊपर खून गिरता है। अच्छा, अच्छा चलिए, देख लेते हैं।-

अरविंद अपनी कुर्सी में बैठा रहा। डॉक्टर प्रधान पारिजात को लेकर अंदर चले गए । उन्होंने अपने चैम्बर की लाइट ऑन की तथा पारिजात को परीक्षण - टेबल पर लेटने के लिए निर्देश दिया । दो सीढ़ी चढ़कर, पारिजात परीक्षण - टेबल पर लेट गई ।

-“ऊह, ऊपर की तरफ देखकर नहीं, घुटनों के बल उकडू बन कर बैठिए ।“

पारिजात घुटनों के बल उकडू बन कर बैठ गई ।

-“नहीं, ऐसा नहीं, थोड़ा आगे की ओर झुक जाइए, एक चौपाये जानवर की तरह।“

डॉक्टर का कहना मान वह चौपाये जानवर की तरह आगे की ओर झुक गई । डॉक्टर प्रधान ने जाँच करना शुरु की। संकोचवश पारिजात की मांसपेशियां सख्त होने लगी। यह सोचकर अपने आपको ढांढस बँधा रही थी कि वह रोगी है अर्थात् वर्तमान में वह प्रयोगशाला का एक विषय है। जैसे रोगी की कोई जाति नहीं होती है, न कोई धर्म होता है, न कोई लिंग होता है, न कोई उम्र होती है, ठीक उसी प्रकार डॉक्टर की भी न कोई जाति, न कोई धर्म, न कोई लिंग और उम्र होती है। अचानक डॉक्टर प्रधान का हाथ पास वाले स्विच-बोर्ड की तरफ गया तथा उन्होंने परीक्षण-टेबल के ऊपर लगी लाइट को बुझा दिया।

पारिजात ने अपनी छठी इन्द्रिय से अनुमान लगा लिया, डॉक्टर प्रधान कोई भगवान तो नहीं है। वह भी इंसान है तथा आँख , कान, नाक आदि इन्द्रियों के दास है। उनको भी भूख-प्यास लगती है। जिस प्रकार एक लोभी गाय अपनी इच्छा पर कोई नियंत्रण नहीं रख सकती, ठीक उसी प्रकार डॉक्टर प्रधान भी हो सकते हैं सर्वभक्षी । कुछ घटना धटित हो, उससे पूर्व ही वह तेजी से भागकर अरविंद के पास आ गई । अरविंद ने पूछा, -“ डॉक्टर ने जाँच की ?”

डॉक्टर अंदर की सब लाइट जलाकर दरवाजा खोलकर अपने टेबल के पास आ गए । अरविंद उनसे पारिजात की बीमारी के बारे में पूछने लगा। वह बोले, -“पेशेन्ट, वेरी सेंसीटिव”

अरविंद कहने लगा, -“औरत है न, इसलिए ।“

डॉक्टर नाक फुलाकर फुंफकारने लगा,-“ऊँह, औरत है या और कुछ ?”

यह सुनकर पारिजात चौंक गई ।

डॉक्टर प्रधान के छः इंच चर्बी वाले मोटे पेट , चिपचिपे तेल से खल्वाट पर रंगे हुए कुछ चिपके बाल, साफ- सुथरे चिकने चहरे को देखकर उसे उबकाइयां आना शुरु हो गई । छिः! छिः! उसने साड़ी के पल्लू को मुँह में दबाकर उबकाइयों को रोकने का प्रयास किया तथा वहाँ से  तुरंत जाने के  लिए तैयार हो गई ।

4

केटरपिलर (इल्ली) की तरह बच्चे बन गए थे ।खाना खाने में तो इच्छा-अनिच्छा का कोई सवाल नहीं उठता था। खाली पेट- भरे पेट का बिल्कुल पता भी नहीं चलता था। जितना भी मिलें, सब-कुछ खाए जाएँ । जहाँ कहीं भी बस रुकती, वहीं पानी की बोतल लेकर उतर जाते थे और मुँह उठाकर सीधे चले जाते थे होटल की तरफ। बेसिन में हाथ- मुँह धोकर एक खाली टेबल पर अपना अधिकार जमा लेते थे । फिर फटाफट खाने की चीजों का आर्डर देने लगते थे। अरविंद और पारिजात की इसमें कोई भूमिका नहीं रहती थी। बहुत सारी चीजें जैसे चिकन, मटर-पनीर, नॉन का आर्डर दे देते थे । बस-स्टैंण्ड के पास का होटल चालू-किस्म का था। तेलीय पदार्थों की चिकनाहट लिए स्टील-गिलास, प्लास्टिक का मैला जग, गंदी पोशाक पहने हुए मनहूस चेहरे-से उदास दिखाई देने वाला लड़का टेबल पर पानी के दो चार गिलास रखकर चला जाता था। घर से लाई हुई पानी की बोतल ज्यों की त्यों बगल में पड़ी रहती थी। बच्चे होटल का पानी पेट भर कर पीते थे। खाना खाते-खाते इन लोगों के चेहरों से पसीने की बूँदे टपकने लगती थी, नाक सुड़सुड़ करने लगता था। इस हालत में भी बड़े चाव के साथ वे खाना खाते थे। उन लोगों का पेट भर जाने के बाद भी खाना बंद नहीं करते थे। पूरी तरह तसल्ली से खाना खाने के बाद एक चुट्की सौंफ लेकर बाहर आते थे। बस-स्टैंड के एक-दो चक्कर काट लेते थे। फिर कोल्ड-ड्रिंक पीना नहीं भूलते। उनके पेट में तो बिल्कुल भी खाली जगह नहीं रहती थी, इसलिए एक-दो घूँट कोल्ड-ड्रिंक पीने के बाद बचा हुआ कोल्ड-ड्रिंक दुकान में जैसे का तैसा छोडकर बाहर चले आते थे। इसके बाद समय बिताने के लिए इधर-उधर की पत्रिका खरीदने की इच्छा होती थी। किताब की दुकान में जाकर सिनेमा से स्पोर्टस तक की सारी पत्रिकाएं टटोलते थे। पसंद आने से एकाध खरीद लेते थे। वहाँ से लौटते समय टॉफी खरीदना नहीं भूलते थे। हर बार यही क्रम था। जब कभी भी बच्चे गाँव जाते थे इसी तरह इल्ली बन जाते थे। बस का दरवाजा नहीं खुलता था। किसी नासमझ राजा की तरह बस खडी रहती थी। ड्राइवर, कंडक्टर, क्लीनर पहले से ही सब यात्रियों को एक-एककर नीचे उतार कर बस में ताला लगाकर, कहीं अंतर्धान हो जाते थे। खाना-पीना पूरा करने के बाद लघुशंका का कार्यक्रम भी समाप्त हो जाता था। इधर-उधर घूम-फिर कर लौट आते थे बस के पास। पर अभी भी बस क दरवाजा नहीं खुलता था। स्टेशन पर बैठनेकी जगह नहीं थी, इसलिए यात्रीगण मक्खियों की तरह इधर-उधर भिनभिनाते रहते थे। ज्यादा घूमने-फिरने से, तथा लंबे समय तक खडा रहने से पैर दुखने लगते थे। शरीर थककर चूर हो जाता था, परन्तु बस टस से मस नहीं होती थी, ब्रह्मर्षि की तरह निर्विकार खड़ी रहती थी।

इस बार बच्चे कुछ ज्यादा ही तंग कर रहे थे। खाना-पीना, पत्रिका खरीदना सब-कुछ पूर्ववत् पूरा हो गया था। कुछ भी शेष नहीं था। वे लोग मक्खियों की तरह इधर-उधर भिनभिना रहे थे। तभी कहीं से एक बूढ़ा उनकी तरफ आया। पता नहीं, किसकी तरफ पहले उसने हाथ फैलाया। यह भी याद नहीं आ रहा है, पहले किसने सिर हिलाकर उसे मना कर दिया था। मगर वह बूढ़ा वहाँ से नहीं खिसक रहा था। यह देखकर अरविंद थोड़ा आगे चला गया। धीरे-धीरे सभी ने उनका अनुसरण किया, यहाँ तक कि उस बूढ़े ने भी। बूढ़े को देखकर अरविंद चिल्लाकर बोला-

-“जा, भाग, यहाँ से।मगर बूढ़ा नहीं गया।“

बेटा बोला, -“दे, दीजिए न कुछ, बाबा!”

अरविंद ने अपनी जेब में हाथ नहीं डाला। पारिजात ने भी अपने बटुए की चैन नहीं खोली। मगर उस बूढ़े ने अपने कमजोर हाथों को जिद्दी बच्चे की तरह उनके सामने फैलाए रखा । वह अपना हाथ आगे बढाए ही जा रहा था, मानो उन चार लोगों के परिवार के व्यूह को तोडने जा रहा हो। अरविंद क्रोधित होकर कहने लगा, -“जाओ, बोला न, आगे जाओ। तुमको कुछ सुनाई नहीं दे रहा है ? आगे हट, अपना रास्ता नाप।“

अरविंद और थोड़ा दूर चला गया, पीछे पीछे वह बूढ़ा भी। वह बूढ़ा बहुत ही बीमार दिखाई दे रहा था। उसके सफेद घुँघराले बाल, पैरों की फूली हुई मोटी नसें स्पष्ट दिखाई दे रही थी, आँखे मृत मछलियों की तरह कांतिहीन दिखाई पड रही थी। उसके पाँव गाय के खुरों की तरह कठोर व भद्दे दिख रहे थे।

इस बार बेटे ने कहा , -“प्लीज, पापा ! कुछ दे दीजिए ना।“

बेटे के इस अनुरोध को सुनकर शायद उस अधमरे बूढ़े को थोडा-बहुत प्रोत्साहन मिल गया हो।

“-दे, दे, देदे, बाबू !”- कहते-कहते उसने अरविंद के शरीर को स्पर्श कर लिया। तत्क्षण चिल्ला उठा अरविंद।

-“ऐ भाग, भाग, बदमाश, दूर भाग !”

चिल्लाते-चिल्लाते लात मारने के लिए एक लात ऐसे उठा ली मानो कि बूढ़ा एक फुटबाल हो और वह उसको जोरदार किक मारकर से बहुत दूर फैंक देना चाहता हो।

अरविंद का यह रौद्र-रूप देखकर डरने के बजाए सभी शर्मिंदगी अनुभव कर रहे थे । जैसे बस-स्टैंड में उपस्थित प्रत्येक आदमी ने उनके मन के संकीर्ण-भाव पढ़ लिए हो । पहले बेटा वहाँ से हटकर दूर चला गया था, उसके पीछे-पीछे बेटी भी। रोते-रोते बूढ़ा कहने लगा, -“मारोगे मुझे, बाबू ! मारो, मारो, और मारो ।“

अरविंद को अपने कुकर्म के लिये कोई पछतावा नहीं था। पारिजात वहाँ से चले जाने के लिए सोच रही थी। दस्यु रत्नाकर का पाप उसका अपना पाप है।पारिजात के मुख से स्वतः निकल आया था, “छिः! छिः!”

अरविंद ने उत्कंठा के साथ पूछा था,-“क्या हुआ तुम्हें ?”

पारिजात ने कोई जबाव नहीं दिया था। उसकी आंखों की भाषा खुद-बखुद समझा दे रही थी- उन छिः ! छिः ! के भावार्थ।

5

प्रकृति के कई रहस्यों पर से पर्दा उठाने के बाद भी विज्ञान अभी तक कई गुत्थियों को सुलझा नहीं पाया है।जैसे- बादलों से रिम-झिम बारिश क्यों होती है? हरपल लहरें समुद्री किनारों पर क्यों टकराती हैं  ? अंधेरी गुफा में असंख्य शुक्राणु दौड़कर एक भ्रूण का निर्माण कैसे करते हैं? मरने के बाद जीव की क्या गति होती है ? सूरज क्यों उगता है ? क्यों इच्छाओं का अंत नहीं होता है, दूब-घास की तरह उखाडने के बाद भी फिर क्यों पैदा हो जाती हैं ? भगवान को थकान क्यों नहीं लगती है ? हवा आराम क्यों नहीं करती है ? कोई भी माँ पुत्र-शोक से उभर क्यों नहीं पाती ? कभी-कभी उनके साथ ऐसा भी होता था। वह अकेली बैठी थी तो किसी कुहासे में खो गई थी, ठीक से उसे पता भी नहीं चला था कि वह कुहासा है या कोई बादल। सब कुछ अस्पष्ट व धुंधला दिखाई देने लगा था। बहुत दूर में नीले-रंग का एक सफारी-सूट दिखाई देता था। वह कुहासे भरे बादल में विचरण करती हुई उस सफारी-सूट को पकडने के लिए हाथ आगे बढ़ाती जाती थी। परन्तु कभी भी उस नीले सफारी सूट को छू नहीं पाती थी। बार-बार नीला सफारी सूट पहने हुए वह आदमी अस्पष्ट दिखाई देता था। वह अरविंद को पहचान लेती थी। तब उसे ऐसा लगता था मानो किसी डूबते हुए आदमी को तिनके का सहारा मिल गया हो। उस अवस्था में पारिजात हाथ बढ़ाकर अरविंद को जकड़ लेना चाहती थी। उसकी आँखों से आँसूओं की धारा फट पड़ती थी तथा आँसू बहकर कान के भीतर तक चले जाते थे। पारिजात के शून्य में तैरते हुए हाथ को अरविंद पकड लेता था। आँसू पोंछने लगता था, और कहता था-
-

“क्या हुआ ? रो क्यों रही हो ? बहुत कष्ट हो रहा है ?”
बिस्तर के पास दो अन्य आदमी खडे थे।

अरविंद को पूछ रहे थे, -“क्या होश आ गया ?”

उस समय तक वह बादलों और कुहासों की दुनिया से लौट कर अपनी यथार्थ की दुनिया में आ गई थी । उसकी समझ में आ गया था कि वह नर्सिंग होम में भर्ती थी। पास वाले बिस्तर पर चौदह या पंद्रह साल की फ्राक पहने हुए लड़की सोई थी।उसके शरीर में सैलाइन लगा हुआ था।

अरविंद पास खड़े किसी आदमी को पूछ रहे थे -“इस लड़की को क्या हुआ है ?”

उस लडकी के पास बैठी हुई देहाती औरत जोर-जोर से रोने लगी। उसके रोने की आवाज से अरविंद और पारिजात दोनो चौंक गए थे। एक भले आदमी की तरह सज्जनता दिखाते हुए कुछ न पूछकर अरविंद चुप रहा। परंतु कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। कुछ समय बाद अरविंद ने उस लड़की के बारे में कहीं से कुछ जानकारी प्राप्त की । पारिजात के कान में कहने लगा –

“वह चौदह साल की लडकी गर्भवती हो गई है, अपने किसी रिश्तेदार मामा के द्वारा । लड़की का पिता उसको जान से मार देना चाहता था, मगर उसकी दादी ने गर्भपात कराने के लिए कुछ घरेलू नुस्खे का इस्तेमाल करते हुए जड़ी बूटी खिला दी। जिसके कुप्रभाव से बच्चा पेट के अंदर मरकर सड़ गया।शरीर में जहर फैलने से अब उस लडकी की हालत गंभीर है। इसलिए यहाँ भर्ती करवाया है । तीन दिनों से सड़ा हुआ मांस टुकडा-टुकडा होकर निकल रहा है।“

यह सुनकर पारिजात की आँखे डर से बंद हो गई। उसके पेट में दर्द हो रहा था, उल्टी करने का मन हो रहा था। वह दो-तीन बार उल्टी करने के लिए बिस्तर से उठकर बैठ गई थी। उसने लडकी की तरफ से अपनी नजरें हटा दी। अरविंद पारिजात के चेहरे की तरफ देख रहा था। बीच-बीच में उसकी पीठ भी सहला रहा था। पारिजात की आँखों से अनायास आँसू टपक कर कान के अन्दर चला जा रहा था । यह देखकर अरविंद डॉक्टर को बुलाने गया था।

एक नर्स आकर पूछने लगी थी-“दर्द हो रहा है क्या ?”
वह पारिजात को दर्द-निवारक गोली देकर चली गई। वह उस बिस्तर पर केवल दो घंटे से थी। देखते-देखते कुहासा, पेट का दर्द, उस लडकी को लेकर कौतूहल, वमन के साथ-साथ वह दर्दनाक क्षण भी स्वतः पार हो गया।

नर्सिंग होम छोड़ने से पहले वह लघुशंका करना चाहती थी। अरविंद उसको हाथ से पकडकर बाथरूम तक ले गया।लेकिन वह कहने लगी, “अभी मुझे ठीक लग रहा है ।मैं अकेली जा सकती हूँ । आप यहीं रूक जाइए । अरविंद उसका हाथ छोडकर बाहर प्रतीक्षा करने लगा।

बाथरूम से लौटते समय अचानक उसकी नजर कामोड के फ्लैश बैसिन पर पड़ी। उसने देखा एक सफेद ट्रे में खून से लथ-पथ चार-पांच इंच का, इंसान का एक भ्रूण पड़ा था जैसे देव-शिशु की तरह वह सो रहा हो। यद्यपि आँख, कान, नाक, हाथ, पैर, लिंग स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रहे थे, फिर भी देखने से ऐसे लग रहा था कि थोडी देर पहले ही अंडा फोडकर बाहर निकल आया हो। एक नीरव तपस्वी की तरह था वह भ्रूण। पता नहीं क्यों ? उस भ्रूण को देखने से उसका दिल हुम-हुम करने लगा। इच्छा हो रही थी ट्रे से उठाकर सीने से चिपका ले। उसे ट्रे में इस तरह छोडकर घर जाने का मन नहीं हो रहा था। बाथरूम का दरवाजा बाहर से कोई खटखटा रहा था। वह दरवाजा खोलकर बाहर निकली तो देखा सामने नर्सिंग होम की दाई 'रुक्मिणी' खड़ी थी। कहने लगी, “बाबू आपको लेने आए हैं । कहीं गुसल-खाने में चक्कर खाकर गिर तो नहीं गई यही सोचकर।“ उसके बाद वह प्रसंग बदलकर बोली थी-“छि: ! ऐसा घिन्न काम कर रही हो ? इससे तो अच्छा -आपरेशन करवा लेना चाहिए।“

बूढ़ी की गुरुजन-सुलभ विरक्ति और उपदेश सुनने के बाद भी पारिजात यह करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई, इस ट्रे में जो देवशिशु पड़ा है, यह क्या मेरा भ्रूण है ?

उस देवशिशु को सीने से लगाकर, मेरे प्यारे कहकर क्षमा माँगती, उससे पहले ही वह सिर झुकाकर बाहर निकल आई। जीवन के उस अक्षम्य-पाप के लिए उसे खुद को घिन्न लग रहा था। खुद को धिक्कार रही थी- छिः छिः ।

6

हल्की-ह्ल्की मूँछें आ रही थी, आँखे स्वच्छ व गोल हो रही थी, नाक सीधी हो रही थी, उस अवस्था में बेटा प्रवेश कर रहा था। तब एक दिन बेटे ने पारिजात को दो फुट की दूरी से कहा , - “छिः ! तुम्हारे शरीर से कितनी गंदी बदबू आ रही है !”

-“मेरे शरीर से बदबू ?”- हँसने लगी पारिजात।

-“बदबू या सुगंध ?”

-“छिः!, आप यहाँ से हटो।“- बेटे ने मुँह फेरते हुए कहा ।

बेटे के चेहरे के बदले हुए रूप को देखने से आसानी से यह पता चलता था कि वह मजाक नहीं कर रहा है। उसके शरीर से बदबू, मगर कैसे ?

सर्दी का महीना था। पसीना निकलने का प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसे भी गर्मी के दिनों में उसके शरीर से बहुत ही कम पसीना निकलता था। और अगर थोड़ा बहुत पसीना निकलता भी था,तो गंधहीन होता था।

अरविंद अक्सर कहता था-“-तुम्हारे शरीर से हर समय मीठी-मीठी मोहक खुशबू कहाँ से आती है ?”

उस समय वह या तो नींद से उठकर आती होती है या किचन के अंदर से।उस मीठी खुशबू को सूँघकर अरविंद मंत्र-मुग्ध हो जाता था। पारिजात उस खुशबू को सूँघने के लिए खुद ही अपना शरीर सूँघने लगती थी, मगर वह खुशबू नहीं मिलती थी।

बेटे की शिकायत दिन-ब-दिन बढती जा रही थी। अंत में ऐसा होने लगा पारिजात को सामने से आता देख वह दूर चला जाता था। यह देख पारिजात ने अपने शरीर पर पाउडर लगाना शुरू कर दिया । कभी-कभी इत्र-फुलैल का भी उपयोग करने लगी । फिर भी बेटा उससे दूरी बनाए रखता था। धीरे-धीरे यह बात उसके लिए दुःख का कारण बन गई। दुःख बढ़कर विरक्ति में परिणति हो गया। कभी-कभी इस बात को लेकर झगड़ा भी होने लगता था। वह यह बात समझ नहीं पाती थी, ये सब कैसे हो जाता है। इसके बाद बेटे को सामने से आता देख वह खुद एक अछूत की भाँति साइड़ में खड़ी हो जाती थी अपने शरीर को सिकोड़कर।

खाने के टेबल पर भी वह बेटे के पास वाली कुर्सी पर नहीं बैठती थी, इस प्रकार वह उससे दूरी बनाए रखती थी। जितना वह खुद को सिकोड़ने का यत्न करती, उतना ही उसके मन की नाराजगी भी बढ़ती जाती। वह रोते-रोते कहने लगती थी, -“-तुम मेरे शरीर का एक अंश हो। मेरी अस्थि-मज्जा और रक्त से बने हुए हो। यह देख तेरी नाक मेरी नाक जैसी है। तेरी हँसी मेरी हँसी जैसी है। जब तुम मुझसे इतनी नफरत करते हो, तब मुझे बड़ा ही कष्ट होता है। तुम इस बात को नहीं समझ पाओगे कि तुम्हारे सामने आने से पहले मुझे कितनी हिचकिचाहट होती है।“

उसका रोना देखकर बेटा द्रवित हो जाता था , -“प्लीज, रोओ मत। प्लीज, दुखी मत होओ ।“

परन्तु उसके स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता था,पहले की भाँति दूर-दूर रहने लगता था। यह देखकर अरविंद बेटे से कहने लगता था,-“-ये तुम्हारा नया नाटक शुरु हुआ है। कहाँ से बदबू आ रही है ? बताओ तो”- कहते-कहते श्वान की तरह पारिजात के पूरे शरीर को सूँघने लगता, फिर वह कहने लगता,-“नहीं, कहीं बदबू नहीं है।“

पारिजात सोच रही थी शायद अरविंद अभी बोलेगा, तुम्हारे शरीर से महकी-महकी मधुर-मधुर खुशबू आ रही है, मगर अरविंद कुछ भी नहीं बोला। उसका मन दुःखी हो जाता था। यह सोचकर कि अभी वह खुशबू कहाँ गायब हो गई ? शरीर से बदबू या किसी दुर्गंध का निकलना अर्थात् बुढ़ापे की तरफ अग्रसर होने का प्रतीक।

नानाजी के शरीर से ऐसी ही अजीब-सी गंध निकलती थी। ठीक से यह नहीं कहा जा सकेगा, किस तरह की गंध ?- जिस प्रकार से पुरानी चीजों में पड़े-पड़े दुर्गन्ध आनी शुरू हो जाती है, जैसे पुराने केदारगौरी मंदिर के अंदर घुसने से एक विशिष्ट गंध की अनुभूति होती है, ठीक वैसी ही।

नानाजी का शरीर बूढ़ा हो गया था, नानाजी चार किलोमीटर का रास्ता पैदल तय कर आते थे। उनके पाँव की अंगुलियाँ सूजी हुई व लाल दिखाई देती थी। उनकी टाँगे पतले पाईप की तरह दिखाई दे रही थी। वे बाल-कॉमिक्स के चाचा चौधरी की तरह नहीं दिख रहे थे। वे मितभाषी थे। कहानी सुनाना तो दूर की बात, बच्चे लोगों के साथ बात भी नहीं करते थे। उनकी आँखों में चमक नहीं थी, चावल के मांड की तरह निस्तेज हो गई थी । वे बिल्कुल निरीह प्राणी की तरह दिख रहे थे। वे कृशकाय थे, इसलिए बैठते समय उनकी रीढ़ की हड्डी मुड़ जाती थी। देखने से अंग्रेजी के "जी" की तरह प्रतीत होते थे। प्रायः जब वे घर आते, पारिजात स्कूल जाने की तैयारी कर रही होती। माँ अपने काम में व्यस्त रहा करती थी। नानाजी अपने पाँवों में मोची द्वारा बनी टायर वाली चप्पलें पहना करते थे। चप्पलें खोलकर बिना किसी आवाज के ड्राइंग-रुम में आकर बैठ जाते थे। नानाजी के आने से उन लोगों को न तो कोई खुशी होती थी आरै न ही कोई दुःख। केवल माँ को सुनाई दे, इतने ही ऊँचे स्वर में वे लोग चिल्लाकर खबर दे देते थे, -“ नानाजी आ गए हैं !”

अपना काम छोड़कर माँ दौड़कर कभी भी मिलने नहीं आती थी। नानाजी बैठकर पुराने अखबार, किताबें , यहाँ तक कि पुराने कागजी पैकेटे, जो कुछ भी हाथ में आता था, उसी को उठाकर पढ लेते थे । बिना किसी चश्मे की मदद से अंग्रेजी अखबार के महीन-महीन अक्षर भी पढ़ रहे थे। पारिजात अपनी चोटी गुंथते-गुंथते भागकर बायें हाथ से चूल्हे पर चाय की केतली रख देती थी। जब तक दोनों तरफ की चोटियाँ बन जाती थी,चूल्हे पर चाय भी गरम हो जाती थी। बिना कुछ बोले नानाजी चुपचाप अखबार पढ़ने में लीन रहते थे,

पारिजात भी बिना कुछ बोले नानाजी के सामने चाय रखकर चली जाती थी। किसी भी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त किए बिना उस गरम चाय को वे पी लेते थे। पारिजात का स्कूल जाने का वक्त हो जाता था। वह माँ के पास जाकर कहने लगती थी,-“-माँ, नानाजी आए हैं न।“

-“ आए हैं, तो आए हैं।“- निस्पृहता से उत्तर देती थी माँ।

-“आपके पिताजी आए हैं, आप इतना कड़वा क्यों बोल रही हो ।“- पारिजात को माँ के इस व्यवहार पर क्रोध आता था। माँ फुसफुसाकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करती थी । ,

-“उनको अफीम चाहिए, इसलिए बार-बार मेरे घर चले आते हैं। कहाँ से लाऊँगी इतना पैसा?”

-“धीरे बोल, कहीं वे सुन न लें।“- चिढ़कर कहने लगती थी पारिजात अपनी माँ को।

माँ भनभनाकर कहने लगती थी,-“इतना इतर क्यों रही है? जा, छत पर मेरी गीली साड़ी सूख रही है। उसके पल्लू में दो रुपए बंधे हुए है। लाकर दे, दे।“

पारिजात के स्कूल का समय हो जाता था, वह दौड़कर जाती थी छत पर। माँ की गीली साड़ी के पल्लू से खोलकर दो रुपए लाकर नानाजी के पास रख देती थी। नानाजी बिना कुछ बोले रुपए अपनी जेब में रख लेते थे। थोड़ी देर बैठते थे। फिर उठकर अपने टायर वाली चप्पलें पहनकर चले जाते थे। पारिजात का मन माँ के इस दुर्व्यवहार पर विद्रोह कर बैठता था । ऐसा लगता था, माँ निष्ठुर व कठोर हृदय वाली है।यह सोचते हुए छाती से अपनी किताबें चिपकाकर चली जाती थी वह।

इसी तरह बेटे को भी कई चीजे अच्छी नहीं लग रही थी। पारिजात की गोल-गोल पुष्ट बाहें, किसी भी विषय पर वाकपटुता के साथ अपनी राय देने का ढ़ंग, बाथरुम या रसोईघर में धीमे-धीमे गीत गुनगुनाने की आदत, इन सभी चीजों से उसे चिढ़ होने लगती थी ।

बेटे का मन रखने के लिए उसे देहाती औरतों की तरह बुद्धू होकर जीना चाहिए , जिसे वह कर नहीं सकती थी। जीजाबाई की तुलना में यशोदा जैसी माँ को वह पसंद करता था। माँ कहती थी, नानाजी कर्तव्य-परायण पिता नहीं थे, वे दायित्वहीन बाप थे। बच्चों के के लिए जीवन भर उन्होंने कुछ भी नहीं किया। जब स्वाधीनता-संग्राम चल रहा था, उसमें शामिल हो गए । नानीजी खेती-बाड़ी का सारा कार्य भार सँभालती थी , खेतों में मजदूर लगवा कर काम करवाती थी। शहर में जो घर था, उसको भाड़े पर दे रखा था । भाड़े के रुपए भी वह खुद लेने जाती थी । जब देश स्वाधीन हो गया, तब भी नानाजी ने कुछ नहीं किया। न तो नौकरी की, न ही कोई दुकानदारी , न खेती सँभाली , न ही राजनीति में कूदे। सिर्फ दारु पीते थे। यहाँ तक कि किराये में मिलने वाले रुपयों को नानीजी से माँगकर दारु में उड़ा देते थे। यह बात अलग है कि दारु पीकर कभी उन्होंने असंयत व्यवहार नहीं किया, न कभी अपने आपे से बाहर हुए । दारु पीने के बाद चुपचाप रसोई घर में नानीजी के पास आकर बैठ जाते थे। आस-पडोस में किसी को भी पता नहीं चलता था, नानाजी कब आए और कब चले गए। धीरे-धीरे जब नानी कमजोर हो गई, उनके हाथ-पाँव काम करना बंद कर दिए । अब वह खेत में खड़ी होकर काम नहीं करवा पाती थी, न ही किरायेदार से रुपए वसूलने शहर जा पाती थी। उस अवस्था में शहरवाले घर पर ताला झूलने लगा। नानाजी ने दारु के स्थान पर अफीम का सेवन शुरु कर दिया। पर नानीजी के गुजर जाने के बाद अफीम के लिए भी पैसों का जुगाड़ कर पाना असंभव सा हो गया था.

नानाजी ने कभी भी माँ से मुँह खोलकर पैसे नहीं माँगे थे। यह बात पारिजात भी जानती थी। उनके आने से पारिजात व माँ को यह ज्ञात हो जाता था, वह क्यों आए हैं? उन्हें देखते ही माँ चिड़चिड़ा जाती थी। माँ के लिए नानाजी क्या अनावश्यक बोझ बन गए थे, जिस तरह पारिजात अपने बेटे के लिए ?

7

पारिजात खुद अनजान होकर बहती चली जा रही थी , जैसे किसी स्रोत में तिनके या फूल बह जाते हैं । अच्छे -बुरे  , पाप-पुण्य किसी भी तरह के विचार नहीं आ रहे थे उसके मन में। किस क्षण में, किस विधि-विधान से, अच्छे दिन या बुरे दिन में यह सब घटित हो गया, उसे बिलकुल पता ही नहीं चला। वह केवल बहती ही जा रही थी। अपने वास्तविक स्थान को छोडकर आगे और आगे। जब वह उफनती नदी के मध्य में पहुँची, तब उसे चेतना आई। उसे याद हो आया कि उसका अपना घर-संसार है, बाल-बच्चे हैं, सपने हैं, सुख-दुख हैं, ऐसे समय में संसार से विमुख होता है कोई ? मगर उसने संसार से मुँह मोड़ लिया था। वह अब अपने खुद के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी। पारिजात का मन पूर्णतः पूर्णतया अस्थिर था।एक बार बेटे की साइकिल से दुर्घटना हो गई। इस दुर्घटना में उसके घुटनों पर गहरा घाव हो गया। पर उसने ऊफ तक नहीं की। भाग-दौडकर लोगों को इकट्ठा नहीं किया। उसके हिसाब से शायद दुनिया की हर अच्छी-बुरी लिस्ट में इस दुर्घटना का भी नाम अंकित था । एकबार जब अरविंद का ऑफिस में अपने बॉस के साथ झगड़ा हुआ, तब भी उसने पास बैठकर उनको किसी भी प्रकार की सांत्वना देने का प्रयास नहीं किया । बेटी ओडिया साहित्य में अनुतीर्ण हुई, उसने पास बुलाकर उसको लंबा-चौडा भाषण नहीं दिया। ‘जिसके हृदय में मातृभूमि, मातृभाषा के प्रति प्यार नहीं, वह नर नहीं निरा पशु समान है’- उपदेश वाली उक्तियां नहीं सुनाई। देखते -ही- देखते वह अशोच्य बातों पर मनन कर खुश होने लगी। किसी को भी उसका सुराग नहीं मिल पाता था। उसे ऐसा लग रहा था, जैसे उसकी उम्र कम होती जा रही हो। खुद दर्पण के सामने खड़ी होकर बार-बार अपना चेहरा देखना पसंद करती थी।

"प्रेम और अध्यात्म में कुछ भी अंतर नहीं है।" वह अरविन्द से गंभीरतापूर्वक अपनी बात कह रही थी।-"दोनों में मुख्य-भाव होता है संसार से विमुखता। दोनों में प्राप्ति होती है एक परम आनंद की, एक प्रचंड पागलनपन की। दोनों में एकात्म होने की प्रवणता ही प्रमुख रहती है। दोनों का रास्ता काँटों से भरा, टेढ़ा-मेढ़ा, परन्तु दोनों की उपलब्धि और अनुभूति एक समान।"-
उसकी ये बातें सुनकर अरविंद हँसते हुए कहता था, -“किसी प्रेमजाल में पड़ गई हो क्या ? या फिर प्रेम और अध्यात्म-विषय पर शोध करने की सोच रही हो। तुम्हारी मंजिल प्रेम है या तुम उससे बहुत आगे बढ़ गई हो। कौन जाने, आगे जाकर तुम द्वितीय ओशो न बन जाओ ?”
अरविंद की इन बातों का पारिजात ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। मगर अरविंद भी चुपचाप नहीं बैठा। अवसर पाते ही एक दिन कहने लगा,

-“आजकल तुम्हारे गाल गुलाबी दिखाई दे रहे है, आखिर बात क्या है ?”

पारिजात ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की,

“-आलतू-फालतू की बात मत बोलो। ढलती उम्र के साथ-साथ जहाँ शरीर पर झुर्रियाँ पड़ने लगती है ,चहरे की रोनक ख़त्म होने लगती है । वहाँ गुलाबी गाल...? क्या मजाक है !”

अरविंद कहने लगा,”-मगर तुम्हारा यह परिवर्तन मेरे लिए एक आश्चर्य की बात है। तुम्हारा स्वभाव पहले जैसा चिडचिडा भी नहीं रहा है। यह बात दूसरी है कि तुम बताना नहीं चाहती हो। पर एक दिन कुछ न कुछ तो जरुर बताओगी ।“-

पारिजात को मन -ही -मन भय होने लगा था कि कहीं अरविंद उस पर संदेह तो नहीं कर रहा है। संदेह, पर क्यों ? चार पहर-चौबीस घंटे लट्टू की तरह वह उसके घर-संसार के लिए घूमती रहती है, सभी का ध्यान रखती है। अपने लिए एक सेकेण्ड समय भी नहीं दे पाती है। जब इन सभी बातों का अंतर्मन से विश्लेषण करने लगती है, तब उसको अपना गोपनीय संबंध अधिक अर्थपूर्ण लगने लगता था। वह इस संबंध को जीवन भर सहेज कर रखना चाहती थी।

एक दिन अरविंद उसे खूब प्यार जताने लगा। उसके कोमल शरीर को जहाँ-तहाँ सहलाने लगा। अरविंद के इस रूप को देखकर पारिजात को आश्चर्य हो रहा था। इधर-उधर की पुरानी बातें करते-करते वह कहने लगा,

”-मैं तुम पर किसी भी प्रकार का शक नहीं कर रहा हूँ। ऐसे ही पूछ रहा हूँ, दुखी मत होना। जिंदगी में सब-कुछ संभव है। आकस्मिकता में किसका हाथ है ? बोलो तो ! भाग्य से ज्यादा और कौन प्रबल है ! इतने वर्षों तक हमने अपना घर-संसार सजाया, अब तक एक-दूसरे के संपूरक हो गए हैं। एक पल भी एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते हैं। अतः कोई अनहोनी घटना अगर तुम्हारे साथ घटित हुई हो, तो ऐसा मत सोचना कि हम एक दूसरे से अलग-थलग हो जाएँगे । सिर्फ इस बात को जानना चाहता हूँ कि मुझे छोडकर कोई अन्य .....”

इतना घूमा-फिराकर बातें न करके,अरविंद सीधा सवाल कर सकता था। अरविंद अपनी सज्जनता दिखाने के बजाय सीधे-शब्दों में पारिजात को यह प्रश्न पूछ सकता था। तभी घर का कॉल-बेल बजने लगा, अतः उस नाटक का वहीँ पटाक्षेप करते हुए पारिजात उत्सुकतापूर्वक दरवाजा खोलने लगी। पडोस वाले मिलने आए थे। वे ड्राइंग रूम में आकर बैठ गए थे। उसके बाद वह घरेलू कामों में व्यस्त हो गई। उस दिन अरविंद का प्यार दूसरे दिनों की तरह नहीं था। बच्चों को कभी प्यार से पुकारकर, कभी डांट-फटकारकर, कभी थप्पड़ मारकर बात निकलवाने के उद्देश्य से प्रतिपल अरविंद का स्वभाव परिवर्तित हो रहा था। उनके मन में समाहित संदेह ने विरक्ति का रूप धारण कर लिया था। छोटी-छोटी बातों में वह झगडने लगता था। जितना हो सकता था पारिजात खुद को नियंत्रण में रखती थी। उसका मन ग्लानि से भर जाता था, उसे ऐसा लगता था मानो वह अस्पृश्य, घृणित वेश्या बन गई हो। कई बार सोच रही थी, ये सारी बातों का राज खोल दें । मगर किसको बोलेगी ? कौन उसकी बातों पर विश्वास करेगा ? वह कहाँ से शुरु करेगी ? वह समझ नहीं पा रही थी। क्या वह यह कह पाएगी कि, रात होते ही उसका मन अधीर होने लगता है। हर पल उसे भारी लगने लगता है। जब सब सो जाते हैं। आधी रात को दबे पांवों वह आते हैं। उनके शरीर की महक पारिजात को सम्मोहित कर देती हैं। उस महक से सारा घर सुवासित हो उठता है। वह उसके नजदीक में आकर खडे हो जाते हैं। बिस्तर में घुटनों के बल बैठकर उसके होठों पर प्यार भरा चुंबन कस देते हैं। उत्तेजनावश पारिजात अपना शरीर उनको समर्पित कर देती है तथा कामक्रीड़ा के लिए तैयार हो जाती है। दीवार-घड़ी की टिक्-टिक् ताल के साथ उनका ताल मिल जाता है। शरीर और मन सुख से सुखातीत स्तर की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इतने दिनों के वैवाहिक जीवन में जो सुख उसे नहीं मिला, वह सुख उनसे प्राप्त करती है। लग रहा था जैसे यह सुख प्राप्त नहीं होने से उसका जीवन व्यर्थ हो जाएगा। जाने से पूर्व वह होठों पर अपने होठ चिपका लेते थे, अपनी जीभ को उसके मुख-विवर के भीतर घुसा देते थे।उसके पतले होठों से रसपान कर लेते थे। इसी रतिक्रिया में कब सुबह हो जाती थी, पता ही नहीं चलता था।

कभी-कभी शाम से ही पारिजात का मन अस्थिर हो जाता था। उसे ऐसा महसूस होने लगता था, वह आज नहीं आएंगे। यह सोचने मात्र से उसकी आँखों में आँसू आ जाते थे। जब वह पूर्व रात्रि की अनुभूति के बारे में सोचने लगती थी,  तभी उसकी नाभि के नीचे से एक सिरहन पैदा हो जाती थी ।

ये सारी बातें सुनने के बाद अरविंद का धैर्य कहीं जवाब तो नहीं दे देगा ? कहें या न कहें सोच-सोचकर इतने दिन बिता दिए थे पारिजात ने। अचानक एक दिन उसे लगा, ये सारी बातें और छुपाने से कोई फायदा नहीं है, अब वह समय आ गया है उसे बोल देना चाहिए, ताकि रोज-रोज के झंझट से उसे मुक्ति मिल जाएगी। अरविंद पहले-पहल ये सारी बातें सुनकर खूब हँसा था। बाद में गम्भीरतापूर्वक कहने लगा,- “साइकिक ।” - पारिजात को अपने कॉलेज जीवन की बात याद आ गई । ‘साइकिक’  वे लोग रीना मोहंती को कहते थे । वे दोनों लेडीज हॉस्टल के रूम नं. तेईस में रहा करती थीं । उसका स्वभाव पारिजात व अन्य लड़कियों की तरह नहीं था। ज्यादातर समय वह चुपचाप व गंभीर रहती थी। अपने बिस्तर पर सफेद चादर फैलाकर रखी थी। उसी बिस्तर में डेढ़ फीट ऊंची त्रिभंगी कृष्ण भगवान की मूर्ति को भी रखती थी। टेबल पर कभी पढ़ाई नहीं करती थी, बिस्तर ही उसकी पढ़ाई का स्थान था। रात में उन्हीं कृष्ण भगवान की मूर्ति के साथ वह सोती थी, कभी भी यह नहीं बताती थी कि कृष्ण के साथ उसका क्या संबंध है। लड़कियां उसे मीरा पुकारकर चिढ़ाती थीं। दूसरे रूम की लड़कियां पारिजात से पूछती थी,-सच-सच बता तो, रात को वह कृष्ण भगवान की मूर्ति के साथ सोती है?”
प्रायः रीना डाइनिंग हाल में खाना नहीं खाती थी। बिस्तर पर प्लास्टिक की चादर बिछाकर खाना खाती थी मानो उसके साथ कृष्ण भगवान भी खाना खा रहे हो। उस निर्जीव मूर्ति के साथ रीना के प्रेम संबंध को देखकर पारिजात को बड़ा अच्छा लगता था। उसे कभी-कभी आश्चर्य भी होता था। हॉस्टल गेट के पास अनेक लडके-लडकियों का सजीव प्रेम, उनका प्रेमालाप, उनका हँसी-मजाक देखने के बाद रीना का यह निर्जीव प्रेम उसे बड़ा ही हास्यास्पद लगता था। दो साल से हॉस्टेल में एक साथ रहते हुए भी रीना ने केवल अपनी एक-दो गोपनीय बातें ही प्रकट की थी। पहली,  यह कि वह शादी नहीं करेगी। दूसरी, यह कि जिस चीज के लिए औरतें शादी करना चाहती हैं, वह चीज उसे ऐसे ही मिल जाती है, इसलिए विवाह करने की उसे कोई आवश्यकता नहीं है।

पारिजात रीना को ‘साइकिक’  सोच रही थी। दूसरी लडकियाँ भी उसे पागल समझ रही थी। पारिजात की उपर्युक्त सारी कथा सुनने के बाद गंभीर होकर अरविंद ने उसको मनोरोगी का नाम दिया था। अरविंद पारिजात के संबंध में जो कुछ विचार रखते थे, उससे ज्यादा उसकी उत्सुकता पारिजात के प्रेमी के बारे में जानने की थी। अतः हर सुबह उठते ही पहला सवाल यही पूछता था, रात कैसे गुजरी ? हर रात को वह नहीं आते थे, इसलिए पारिजात बोलती थी,-

“अच्छी नहीं, वह नहीं आए।“
-“तुम्हारा प्रेमी कैसा दिखाई देता है ? बातचीत करता है ? उसको सबसे ज्यादा क्या चीज पसंद है ?” पूछता था अरविंद। अरविंद के अलावा एक अन्य पुरुष पारिजात के जीवन में आ चुका था; उसने बड़े ही स्वाभाविक रुप से इस संबंध को स्वीकार कर लिया था।

कुछ भी अनहोनी घटना नहीं घटती थी बल्कि अंतरंग समय में वह प्रेमी पुरुष अरविंद के शरीर में समा जाता था, और पारिजात अरविंद के शरीर में अपने प्रेमी पुरुष को पाकर खुशी से झूम उठती थी।

सब-कुछ सुचारू रूप से चल रहा था। अरविंद के उपहास अथवा दोनों की कानाफूसी या फिर पारिजात की युवती-सुलभ चंचलता को देखकर बेटी को मानो कुछ सुराग मिल गया था कि उनके चार जनों के परिवार में कोई एक और जन भी मौजूद है। जब भी डाकिया कोई चिट्ठी देकर जाता था, बड़ी सावधानी के साथ उसका पता तथा हस्ताक्षर देखने लगती थी कि कहीं किसी नए आदमी का पता व हस्ताक्षर तो नहीं है  ? फोन की घंटी बजते ही वह चुपके से रिसीवर उठाकर पुनः रख लेती थी, फिर भी उसको पता नहीं चल पाता था। वह पाँचवा आदमी कौन है, जो उनके घर में श्वास-प्रश्वास ले रहा है ?

वह कौन है, जो माँ-पिताजी के शयनकक्ष में प्रवेश कर सकता है ?

पारिजात ने एक दिन देखा कि किसी ने उसकी मोइस्चराइजर बोतल में पानी डाल दिया है, फेस-पैक ट्यूब को दबाकर सारा फेस-पैक निकाल दिया है, दीवार पर लिपस्टिक से तरह-तरह की आकृतियाँ बना दी है। एक के बाद एक बहुत कुछ घटित हो रहा था। एक दिन उसने देखा कि उसकी प्योर सिल्क साड़ी का किनारा किसी ने काट दिया है। वह गुस्सा होकर रोने लगी थी। परन्तु दोषी के बारे में उसे पता नहीं चल पाया था। पता नहीं क्यों उसका मन कह रहा था जरुर,यह सब उसकी बेटी ही कर रही है। यह सोचने के पीछे एक कारण था, दिन-ब-दिन उसका बदलता व्यवहार। जब भी उसे कुछ बोला जाता था,  किसी बड़े का बिना यथोचित लिहाज किए तुरंत अंट-शंट उत्तर दे देती थी। वह पारिजात की कोई भी बात सुनना नहीं चाहती थी। यहाँ तक कि, जो बात या जो काम पारिजात को अच्छा नहीं लगता था,जानबूझकर बेटी उसी बात या काम को करती थी, पारिजात को चिढ़ाने के लिए। उसको यह बात समझ में आ गई थी कि किसी कारण से बेटी क्षुब्ध है। एक बार क्रोधित होकर कुछ अनर्गल भी बोलने लगी थी वह, -“तुम क्या सोच रही हो ? मुझे कुछ भी पता नहीं। मुझे तुम्हारी हर बात मालूम है।“- डर गई थी पारिजात। नहीं, नहीं करते हुए भी बहुत कुछ गोपनीय बाते रहती हैं हर मनुष्य के जीवन में, मरते दम तक जिसको वे कह नहीं पाते हैं। मरने के बाद चिता पर उसी के साथ जल जाती है वे सब बातें। बेटी ऐसी कौनसी बातें जानती है, सोचकर पारिजात को डर लगने लगा था।

उसे चेताने या किसी दूसरे कारण से, बेटी ने एक दिन कहा, -“तुम्हारी आँखों के नीचे बड़े-बड़े काले धब्बे हो गए हैं।“ उसके बाद वह विद्रूप-हँसी हँसने लगी, उस हँसी को पारिजात कैसे भूलती ? बार-बार दर्पण के सामने खड़ी होकर ध्यानपूर्वक आँखों के नीचे काले धब्बों को देखने लगी । पारिजात अपने चेहरे पर की गई अपमानजनक टिप्पणी से दुखी हो रही थी। यह बात बेटी को अच्छी तरह से समझ मे आ गई थी , इसलिए जानबूझकर चिढाने या दुःख पहुंचाने के दृष्टिकोण से बोलती थी, -“, तुम्हारे चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ रही है,  तुम बूढ़ी जैसी दिखाई दे रही हो। तुम्हारे शरीर का रंग भी एकदम काला-कलूटा हो गया है।“-

एक बार पारिजात के बालों में से एक सफेद बाल उखाड़कर उसकी आँखों के सामने झुलाकर बेटी जोर-जोर से हँसने लगी थी।

बेटी के इस प्रकार के अशोभनीय व्यवहार ने उसको भीतर से बुरी तरह तोड़ दिया था, हालांकि उसकी बातों में कोई अतिरंजन नहीं था। कभी-कभार पारिजात अपने आपको समर्पित करते हुए कहने लगती थी, -“हाँ बेटी, अब मैं बूढ़ी हो गई हूँ।“- फिर भी उसके मन से क्षोभ दूर नहीं होता था। क्षोभ क्यों ? पारिजात का उसमें क्या दोष है ?

एक दिन उसने बेटी को पास बुलाया और कहने लगी, -“तुम्हें अपनी माँ के बारे में जितनी शिकायतें है, उन्हें सीधे-सीधे बता दो । मुझे तुम्हारा इस प्रकार का दुर्व्यवहार सहन नहीं होता है। एक चीज याद रख, तेरा जीवन तेरा है, मेरा जीवन मेरा है। मैं तुम्हारी जिंदगी में और दखलन्दाजी नहीं करूंगी और तुम मेरे जीवन में कोई हस्तक्षेप नहीं करोगी।“- वह गंभीर हो गई थी। कुछ देर बाद बेटी तिरस्कार भाव से कहने लगी,-“छिः !”-

पारिजात ने पूछा था- -“छिः ! क्यों ?”
बेटी गुस्से से तमतमाकर कहने लगी, “मेरा मुंह मत खुलवाओ। मुझे विवश मत करो कि मैं अपना मुँह खोल दूँ ।

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पृथ्वीराज चौहान की कविता

-मां

सुबह खुद जल्दी उठकर

हमें उठाती है मां

पास अपने बिठाकर

भजन सुनाती है मां।

 

नहलाकर हमें

सुन्दर बनाती है मां।

 

भूख लगने पर

दूध पिलाती है मां।

 

खाना बनाकर

टिफिन तैयार करती है मां।

 

प्यार भरी बातों से

दिल बहलाती है मां।

 

हमारे भीतर

प्यार जगाती है मां।

 

अच्छी-अच्छी बातें

सिखाती है मां।

 

साक्षात् देवी है मां।

हमको भाती है मां।

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-पृथ्वीराज चौहान

मु.पो. जानकीदासवाला

तह. सूरतगढ़, जिलाः श्रीगंगानगर

राजस्थान,

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सुकीर्ति भटनागर की कविता सूरजमुखी

सूरजमुखी मैं सूरजमुखी

देख मुझे पहचानो।

 

मैं हूं दिखता सूरज जैसा

मानो या मानो।।

 

सूरत मेरी सूरज जैसी

रंग भी मेरा वैसा।

 

उस दाता की माया देखो

मेल मिलाया कैसा।।

 

जिधर-जिधर सूरज जाता है

उधर-उधर मैं जाता।

 

देख करिश्मा ऐसा सुन्दर

मन ही मन इतराता।।

 

सांझ ढले सूरज दादाजी

अपने घर को जाते।

 

अगले दिन आने की बातें

चुपके से समझाते।।

 

खड़ा रात भर देखा करता

उसी दिशा की ओर।

 

कब आएगा सूरज नभ पर

हो जाएगी भोर।।

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-सुकीर्ति भटनागर,

, अरबन एस्टेट,

फ़ेज-प्रथम, पटियाला, पंजाब

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शिवराज भारतीय की कविता

-मां

लाड़-प्यार का मंदिर मां

मोह-ममता का मंदिर मां

 

अच्छी-अच्छी बात बताती

लोरी गाए सुलाए मां

 

धमकाती जब करें शरारत

रूठें तब पुचकारे मां

 

मनुज भले बूढ़ा हो जाए

उसे समझती बच्चा मां

 

मां कहने से मुंह भर आता

हृदय नेह सरसाए मां

 

सारे तीरथ-धाम वहीं पर

जिस घर में मुस्काए मां

 

मां सम नहीं जगत में दूजा

परमेश्वर भी पूजे मां।

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राजस्थानी से अनुवाद-

राजेश्वरी पारीक ‘मीना’

मूल कवि-शिवराज भारतीय

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तीनों कविताओं के प्रेषकः दीनदयाल शर्मा,

साहित्य संपादक,

टाबर टोल़ी,

हनुमानगढ़ जं., राज.

girish_pankaj

एक खबर किसी अखबार में छपी, कि डबलरोटी के पैकेट में 'ग्रीस' मिला (गिरीश नहीं)।
यह ग्रीस कपड़े में लिपटा हुआ था। अब इसे मिलावट का मामला तो कह नहीं सकते। हाँ, लापरवाही का एक उदाहरण जरूर मान सकते हैं। और यह भी कि देख लो डबलरोटी खानेवालो, तुम्हारी डबलरोटियों को कैसी-कैसी उबकाई पूर्ण प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। फिर भी हमारी हिम्मत देखो, हम कुछ नहीं बोलता। कल को लोहे का टुकड़ा मिले, या बीड़ी का, कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क इसलिए भी नहीं पड़ता कि आखिर कौन पंगा ले। शिकायत कहाँ करे, कार्रवाई होगी भी कि नहीं? व्यवस्था को अपनी जेब में रखकर घूमने का दावा करने वाले लोग शिकायतकर्ता को भी शिकार बना डालें तो? इसलिए हमारे कने (यहाँ) की जनता बड़ी गऊ है। उसे मिलावट के ऐसे-ऐसे भयानक दुष्परिणाम झेलने पड़े हैं, कि कुछ पूछो मत लेकिन मजाल है कि जनता ने किसी दूकानदार की कालर पकड़ी हो। बापू का देश है भइया।

फिर हमारे यहाँ की कानून-व्यवस्था भी तो ऐसी गजब की है कि का कहें। आप किसी मिलावटखोर की कालर तो पकड़ लीजिए। वह थाने में जाकर रिपोर्ट लिखा देगा कि 'आपने जान से मारने की धमकी दी'.., 'हमें नीची जाति का बोला', आदि-आदि।


मिलावटखोर का पूरा चरित्र चूँकि अजीबोगरीब खुराफातों की मिलावट से तैयार होता है इसलिए कोई बड़ी बात नहीं, कि वह आपके खि़लाफ़ ही कुछ फर्जी सबूत इकट्ठा  करने के लिए कहीं से एक अदद चाकू भी ले आए। और हमारी पुलिस? बस, उसकी कमाई का मीटर ऐसे ही कुछ पावन अवसरों पर शुरू हो जाता है। पूरी घटना से उसको क्या लेना-देना? वह तो सीधे-सीधे रिपोर्ट लिखेगी कि आपने उस गऊ व्यापारी को जान से मारने की धमकी दी गई। लो, लग गई धारा 506-बी। आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास। आपने मिलावट करने के कारण गुस्सा दिखाया और मामला कहाँ से कहाँ पहुँच गया। इसलिए हर समझदार (डरपोक कहना ठीक नहीं है) आदमी जब भी कोई ऐसा मामला सामने आता है, तो पतली गली से फूट लेता है। मिलावट हो रही है, होने दो, महँगाई बढ़ रही है, बढऩे दो। किसी की इज्ज़त लुट रही है, तो लुटने दो। अपनी तो नहीं लुट रही है न? बस। अपनी लुटती तो 'बचाओ-बचाओ'' चिल्लाते भी। अपने ऊपर कोई संकट नहीं, मतलब दुनिया भर में शांति है।


डबलरोटी में 'ग्रीस' मिलने के बाद हमने एक ज्ञानी सज्जन से पूछा- ''आप क्या सोचते हैं इस बारे में?''


ज्ञानी सज्जन मुसकराते हुए बोले- ''भई, यह तो प्रयोगों का ज़माना है। तरह-तरह के प्रयोग हो रहे हैं। इसे भी प्रयोग का एक हिस्सा समझ लीजिए। जेम-जेली या बटर के साथ, या और भी कई तरीकों से आप डबलरोटी की 'सेंडविच' बनाकर खाते रहे हैं। अब इसमें बटर की बजाय 'ग्रीस' लगाकर खाकर देखने में क्या बुराई है? इसे भी आजमा लिया जाए। हो सकता है, आने वाले दौर में आपको सिर्फ डबलरोटी ही मिले। न बटर रहे साथ में, न जेम-जेली। तब क्या मिलाएँगे, डबलरोटी में? दूध का भी संकट हो, तब क्या करेंगे? इसलिए भविष्य में ख़ौफऩाक दौर की तैयारी अभी से शुरू कर दें। अब 'ग्रीस'' में कोई स्वाद तो होने से रहा। फिर भी 'ट्राई' करने में क्या बुरा है? मिलावटखोर लोग अपुन को हर तरह से मजबूत कर देना चाहते हैं। सरसों तेल में मिलावट की। कुछ लोग मर गए। कुछ ऐसे भी रहे होंगे, जो मिलावट का जहर पचा गए।''


मैंने कहा- ''इसका 'मतबल' तो यह हुआ, कि ये महानुभाव कलयुगी नीलकंठ हैं। उनका नागरिक अभिनंदन होना चाहिए। ''


महोदय हंसते हुए बोले- ''व्हाई नाट..''
हम क्या कर सकते थे, सिवाय सर पीटने के..?


तो मिलावट की घटनाएँ हमें कठिन समय के लिए तैयार करती रहती हैं। इसलिए कई बार अपुन के जैसा सिरफिरा जीव यहीच्च सोचता है कि मिलावट करने वालों को एक तो वैसे भी हम दंडित नहीं कर पाते तो, दंडित करें ही क्यों। बेहतर यही है कि उनका सम्मान करें कि हे महान आत्माओं, तुम्हारे कारण हम लोगों की पाचन-शक्ति बढ़ रही है और हम 'खाना' के साथ 'वाना' भी पचा रहे हैं। इसी तरह मिलावटखोरी करते रहें और देश को मजबूत बनाने की दिशा में भिड़े रहें। एक दिन आपको मिलावट का नोबल पुरस्कार (अगर शुरू हुआ तो) जरूर मिलेगा।''


फिलहाल डबलरोटी में ग्रीस मिलने को हम खेल भावना की तरह ही लें और यह मानकर चलें कि हम जिस तरह का जीवन जी रहे हैं, कठिन जीवन, उसकी बख्शीश है यह। चंद पंक्तियाँ पेशेखि़दमत है-


कान के परदे फटे हैं, शोर जिंदा है,
हो चुका है आदमी ये बोर जि़दा है।
मर नहीं सकती है दुनिया और जीएगी
जब तक कोई मिलावटखोर ज़िंदा है॥

--
गिरीश पंकज
संपादक, " सद्भावना दर्पण"
सदस्य, " साहित्य अकादमी", नई दिल्ली.
जी-३१,  नया पंचशील नगर,
रायपुर. छत्तीसगढ़. ४९२००१

माँ शारदे

saraswati
है चाह,  तेरी शान में,   कह दूं ग़ज़ल माँ  शारदे !
कुछ कलम कारी का मुझे भी ज्ञान दो माँ शारदे !


वन्दना के स्वर ग़ज़ल में,  कह सकूं माँ शारदे  !
कुछ शायरी के भाव का भी, ज्ञान दो माँ शारदे !


माँ की कृपा यदि हो न तो, कैसे ग़ज़ल साकार हो,
मैं भी ग़ज़ल स्वर कह सकूं, वर हस्त धर दो  शारदे !


मैं जीव,   माया- बंधनों में,  स्वयं को भूला हुआ,
नव स्वर लहरियों से हे माँ !, हृद तंत्र को झंकार दे |


मैं स्वयं को पहचान लूं,उस आत्म तत्व को जान लूं,
अंतर में,  अंतर बसे  उस, पर- ब्रह्म को गुंजार दे |


हे श्वेत कमलासना माँ ! हे शुभ्र वस्त्र से आवृता ,
वीणा औ पुस्तक कर धरे,नत नमन लो माँ शारदे !


मैं बुद्धि हीन हूँ,काव्य-सुर का, ज्ञान भी मुझको नहीं ,
उर ग़ज़ल के स्वर बह सकें, कर-वीणा को टंकार दे |


ये वन्दना के स्वर सुमन, अर्पण हें माँ ! स्वीकार लो,
हो धन्य जीवन श्याम का, कर दो कृपा माँ शारदे !


                 ----डा श्याम गुप्त .

सरस्‍वती आराधना

saraswati

करके कृपा मुझ दीन को ।

कुछ दान दो वरदायिनी॥

 

करना क्षमा गर त्रृटि हो ।

नादान हूं वरदायिनी॥

 

कर दूर मेरे अंह और ।

अभिमान को वरदायिनी॥

 

इच्‍छा यही है बन सकूं।

तेरे चरण का दास मैं॥

 

ना तोड़ना तॅूं यूं मेरे।

अरमान को वरदायिनी॥

 

लौटा तेर दरबार से खाली।

अगर पद्‌मासिनी॥

 

होगा तेरे सम्‍मान का ।

अपमान यॅूं वरदायिनी॥

---

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अस्तित्व

सच कहूं बिन तुम्हारे,

मेरा अस्तित्व ही कहाँ है,

मेरी पूर्णता ही केवल

संग तुम्हारे,

 

कहो कहीं देखा है सूरज,

बिन किरण बिन रोशनी के

कहीं देखा है गुलाब बिन शूल के

दोनो ही हैं पूरक,

 

एक दूसरे के

सच कहूं बिन तुम्हारे,

मेरा अस्तित्व ही कहाँ है,

मेरी पूर्णता ही केवल,

 

संग तुम्हारे,

सच कहो कभी सुना,

दिल धडकते ,

बिन धडकनों के

 

न ही कभी कोई धुन बनी है,

बिन लय के,

दोनो ही हैं पूरक

एक दूसरे के

 

कहो कभी देखी है,

बिन पानी के झील,

अपार जलराशि से,

आकार लेता समुन्दर

 

भर रही हो तुम मुझे

नित नई संकल्पनाओं,

स्वप्न व आशाओं से

सच कहूँ हम ही हैं,

 

पूरक एक दूसरे के

बिन तुम्हारे,

मेरा अस्तित्व ही कहाँ है.

----

 

रिश्ते बनाम व्यापार

 

पता नहीं क्यों लोग रिश्तों को

संजीदगी से नहीं लेते,

जब मन चाहा कपड़ों सा,

बदल लेते हैं-.

 

रिश्तों पर लगता है,

स्वार्थ हावी हो गया है ,

निर्मल- निश्चल प्रेम तो वैसे

गाया सा हो गया है-

 

मधुर भाषियों को लोग,

शक से देखते हैं,

सोचते हैं जरूर कुछ काम होगा

इसलिए सादर सलाम होगा

 

हर शख्श दूसरे को तौलता है

रिश्तों के लाभ मोलता है

फिर होता है रिश्तों का आगाज

संबंधों को मिलती है नई परवाज

 

हर आदमी अपने तरीके से

सोचता है,

शक्तिशाली की बात ही छोड़िए,

आदमी आदमी को तोड़ता है.

 

लाभ के इस खेल में

संवेदनाएं भावनाएं मर जाती हैं,

नैतिकता चरित्र इत्यादि

बातें बेमानी हो जाती हैं

 

जीत जाते हैं स्वार्थी-धूर्त

सिसकते है ईमानदार

रिश्ते -संबंध टूट जाते हैं कहीं दूर

बचा रह जाता है केवल व्यापार

किसी दूसरे रिश्ते की तलाश में

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srg

हमारा कोई न कोई रोल मॉडल या नायक अवश्‍य होता है जो हमारे जीवन की दिशा निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हमारे समाज, हमारे राष्‍ट्र और हमारे समय के भी रोल मॉडल होते हैं। कुछ ऐसे रोल मॉडल होते हें जो अपने समय और समाज की भौगोलिक सीमाएँ लांघ जाते हैं। उनकी सदी समाप्‍त हो जाने के बाद भी लोग उनका अनुसरण करते हैं।

ज़्‍यादातर रोल मॉडल एक संकुचित दायरे में अपना प्रभाव डालकर समाप्‍त हो जाते हैं इसलिए हमें सोच-समझकर ही अपने रोल मॉडल का चुनाव करना चाहिये। लेकिन क्‍या ये इतना सरल है? सरल बेशक न हो लेकिन असंभव बिलकुल नहीं। यदि हमसे पूछा जाए कि हमारा रोल मॉडल कैसा हो तो हम असमंजस में पड़ जाएंगे। इतिहास भरा पड़ा है अनेक नायकों से। लेकिन वास्‍तविक नायक कौन है ?

गुरुग्रंथसाहिब में लिखा है, ‘‘जो लरै दीन के हेत सूरा सोई।'' सच्‍चा योद्धा वो जो दूसरों की रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा दे। सच्‍चा दानी वो जो दूसरों की भूख मिटाने के लिए ख्‍ुद भूखा रह जाए। जो अपने हाड़-मांस के शरीर की स्‍थूलता का विस्‍तार करने की बजाय दधीचि ऋषि की तरह किसी की रक्षा के लिए अपनी अस्‍थियाँ तक दान में दे दे वही है सच्‍चा दानी तथा वास्‍तविक नायक। इतिहास भरा पड़ा है ऐसे वास्‍तविक नायकों से।

गीता में एक श्‍लोक है ः

यद्यदाचरति श्रेष्‍ठस्‍तत्तदेवेतरो जनः ।

स यत्‍प्रमाणं कुरुते लोकस्‍तदनुवर्तते ॥

महापुरुष जो जो आचरण करता है सामान्‍य व्‍यक्‍ति उसी का अनुसरण करते हैं। वह अपने अनुसरणीय कार्यों से जो आदर्श प्रस्‍तुत करता है सम्‍पूर्ण विश्‍व उसका अनुसरण करता है अर्थात्‌ श्रेष्‍ठ व्‍यक्‍तियों द्वारा प्रस्‍तुत आदर्श विश्‍व के तमाम लोगों के आदर्श बन जाते हैं।

एक बार गाँधीजी से जब कोई संदेश देने के लिए कहा गया तो उन्‍होंने कहा कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। चीन के प्रसिद्ध दार्शनिक कन्‍फ्‍यूशियस ने भी कहा है कि अच्‍छे लोग अपने आचरण से दूसरों को उपदेश देते हैं, मुख से नहीं। वास्‍तव में संसार को वही लोग ऊपर उठाते हैं तथा जीवन प्रदान करते हैं जो कोई ग्रंथ लिखने की अपेक्षा अपना जीवन ग्रंथ पीछे छोड़ जाते हैं। बुद्ध, महावीर, नानक और कबीर से लेकर गाँधी, मदर टैरेसा और बाबा आमटे तक एक विस्‍तृत सूची हमारे सामने है महान योद्धाओं अथवा नायकों की।

मृत्‍यु के बाद भी हमें अपने शरीर से बेहद लगाव होता है। कई लोग तो जीते जी अपना श्राद्ध करने तथा अपनी मूर्तियाँ स्‍थापित करवाने से भी परहेज़ नहीं करते। पाश्‍चात्‍य देशों में अनेक लोग मृत्‍यु से पहले ही अपने कफ़न-दफ़न का चुनाव कर लेते हैं। अपनी देख-रेख में महँगी से महँगी डिज़ायनर शव-पेटिका बनवाकर रख लेते हैं। मृत्‍यु के बाद कुछ लोग शव का दाह-संस्‍कार करते हैं (जलाते हैं) तो कुछ उसे सुपुर्दे-खाक कर देते हैं (ज़मीन में गाड़ते हैं) लेकिन पारसी लोग मृत शरीर को किसी ऐसे ऊँचे स्‍थान पर रख देते हैं जहाँ दूसरे जीव-जंतु उसे खाकर अपनी भूख मिटा सकें।

मरने के बाद भी हमारा शरीर दूसरों के काम आ सके हमारे यहाँ तो यह भी कम क्रांतिकारी विचार नहीं और इस प्रकार का निर्णय कोई बहादुर व्‍यक्‍ति ही ले सकता है। आज हमारे देश में न जाने कितने लोग दृष्‍टिदोष के कारण देख नहीं पाते। किसी के गुर्दे खराब हैं तो किसी के फेफड़े। अनेक लोग अस्‍थिदोषों से पीड़ित हैं। यदि हम मरने के बाद अपनी आँखों को दान में दे सकें तो असंख्‍य लोग जो देख नहीं पाते इस सुंदर संसार को देखने में सक्षम हो सकें, बिना किसी के सहारे के सामान्‍य जीवन जी सकें।

हिन्‍दी लेखक विष्‍णु प्रभाकर ने तो अपना शरीर ही दान करने की घोषणा कर दी थी ताकि उनके पार्थिव शरीर से दूसरों को जीवनदान मिल सके। विष्‍णु प्रभाकर का आदर्श काल्‍पनिक आदर्श नहीं था। मन, वचन और कर्म तीनों से ही वे आदर्शवादी थे इसीलिए जाते-जाते जीवन के आदर्श को यथार्थ में बदल गए। उनका देहदान करने का संकल्‍प एक बार फिर हमें दधीचि ऋषि की याद दिला देता है। उन्‍होंने जाते-जाते जीवन के जो अक्षर लिखे वही अक्षर जीवन का वास्‍तविक संदेश हैं तथा उन्‍हें महान योद्धा अथवा नायक बनाने के लिए पर्याप्‍त भी। ऐसे ही महान योद्धाओं अथवा नायकों का जीवन हम सब के लिए अनुकरणीय होना चाहिए। जो अपने लिए सही रोल मॉडल का चुनाव करना सीख गया उसका जीवन सार्थक हो सकेगा इसमें संदेह नहीं।

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सीताराम गुप्‍ता

ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,

दिल्‍ली-110034

srgupta54@yahoo.co.in

साभार ः ‘‘द स्‍पीकिंग ट्री'' नवभारत टाइम्‍स, नई दिल्‍ली,

दिनाँक ः 26 जनवरी 2010

छब्बीस जनवरी का त्यौहार ----------

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छब्बीस जनवरी का त्यौहार फिर से आया रे |

मैली कुरसी में नूतन, कवर चढ़ाया रे ||

 

चौराहों पर सुबह सुबह, फ़िल्मी गाने बजने लगे |

खादी की टोपी कुरता से, नेताजी सजने लगे ||

 

पिछले भाषण के पन्ने में पैच लगाया रे ------

मैली कुरसी में नूतन, कवर चढ़ाया रे -------

 

गुडमोर्निंग नहीं आज बोलना, जयहिन्द से विश करना है |

असली चेहरा छुपा रहे, रंग में ऐसे  रंगना है ||

 

नौटंकी के मंझे खिलाडी, जन-गण गाया रे -----

मैली कुरसी में नूतन, कवर चढ़ाया रे -------

 

तिरसठ साल से सुपर पवार के कैसेट बजाते हैं |

झंडे बेच के कुछ बच्चे, रोटी आज भी खाते हैं ||

 

ख्वाबों में जीने वालों ने ख्वाब सजाया रे ------

मैली कुरसी में नूतन, कवर चढ़ाया रे -------

 

सुजान पंडित,

शंकर विला, कांटा टोली चौक, ओल्ड एच. बी. रोड, रांची - 834001 (झारखण्ड)

दूरभास - 099343 70408

--

(चित्र – सौजन्य : अनुज नरवाल रोहतकी)

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1

हाय! गुन्‍डे-मवाली लोग सियादत1 कर रहे हैं

कैसे-कैसे लोग यहां सियासत कर रहे हैं

 

बिठाकर इनको अपनी सर-आँखों पर हम

क्‍यों खराब इनकी आदत कर रहे हैं

 

ये सियादत की कमी नहीं है तो क्‍या है

समझाओ,लोग क्‍यों बगावत कर रहे हैं

 

कैसे हो यकीं उनकी वतन-परस्‍ती पर

वे तो दहशतगर्दों की हिमायत कर रहे हैं

 

दीमक जैसे होते हैं ये सियासी लोग भी

बयां हम सच्‍ची हिकायत2 कर रहे हैं

 

हमें नहीं लगता कि शिकायत दूर होगी

हम उन्‍हीं से उनकी शिकायत कर रहे हैं

 

‘अनुज' हिंदुस्‍तां कर्ज़दार है उन मां‘ओं का

जिनके लाल हमारी हिफ़ाजत कर रहे हैं

 

1.नेर्त्‍तव,सरदारी 2.कहानी

..........................................................................

2

क्‍या था और क्‍या हो गया हिन्‍दुस्‍तान, बापू देखने चले आओ

कैसे -कैसे हाथों में है तेरे देश की कमान, बापू देखने चले आओ

सत्‍य-अहिस्‍सा,त्‍याग-तपस्‍या की दी थी आपने हमको शिक्षा

इसपे अमल करना छोड़ गया क्‍यूं इन्‍सान, बापू देखने चले आओ

पश्‍चिमी हवा चल रही है बापू , हर चीज यहां की बदल रही है बापू

हर दिन हो रहा है छोटा नारी का परिधान, बापू देखने चले आओ

शहीदों की तस्‍वीरें लगी मिलती नहीं अब किसी घर की दीवारों पर

ले लिया अब फिल्‍म स्‍टार,क्रिकेटरों ने इनका स्‍थान, बापू देखने चले आओ

ईमानदारी धीरे-धीरे दम तोड़ रही है बापू संस्‍कार धीरे-धीरे मर रहे हैं

महिलाओं की कदर है न यहां बुर्जुगों का सम्‍मान, बापू देखने चले आओ

अफसोस! वतन के लिए वक्‍त है ही नहीं आज कल के आदमी के पास

खुद तक ही महदूद हो गया क्‍यूं आज का इंसान, बापू देखने चले आओ

.....................................................

3

अगर मैं अपनी जुबान से जाउं

यार मिरे अपनी जान से जाउं

 

होने लगे अगर खुद पे गुमान

यार मैं अपनी पहचान से जाउं

 

दिल रोक लेता है परदेस जाने से

जब भी सोचूं कि हिंदुस्‍तान से जाउं

 

तमन्‍ना है लिपटा हो तिरंगा मुझपे

जब भी मैं इस जहान से जाउं

 

जो यहां है वो कहां मिलेगा

घर छोड़ू क्‍यूं हिंदुस्‍तान से जाउं

 

वतन के काम न आउं तो खुदा

मान से अपने सम्‍मान से जाउं

 

अनुज करूं गर दुखी किसी को

खुदा करे मैं मुस्‍कान से जाउं

 

.............................................................................

4

दिल किसी से प्‍यार, ना कर

उम्‍मीदें तार-तार, ना कर

 

ना कह दी तो दिल टूटेगा

ऐसा कर इजहार, ना कर

 

आते हैं कब जाने वाले

किसी का इंतजार, ना कर

 

इश्‍क करके किसी से तू

जीवन को दुश्‍वार, ना कर

 

सादा-सादा रख खुदको

ज्‍यादा हुशियार, ना कर

 

हरेक पर यकीं करने की

गलती बार-बार, ना कर

 

दिल में रख दिल की बातें

आँखों को आबसार, ना कर

 

जहां तो हैं तमाशबीनों का

खुद से यूं तकरार, ना कर

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डॉ.अनुज नरवाल रोहतकी

dr.anujnarwalrohtaki@gmail.com

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