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February, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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यशवन्त कोठारी का होली विशेष आलेख - कामदेव के वाण और प्रजातंत्र के खतरे

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होली का प्राचीन संदर्भ ढूंढने निकला तो लगा कि बसंत के आगमन के साथ ही चारों तरफ कामदेव अपने वाण छोड़ने को आतुर हो जाते हैं मानो होली की पूर्व पीठिका तैयार की जा रही हो । संस्कृत साहित्य के नाटक चारूदत्त में कामदेवानुमान उत्सव का जिक्र है, जिसमें कामदेव का जुलूस निकाला जाता था । इसी प्रकार 'मृच्छकटिकम्' नाटक में भी बसंतसेना इसी प्रकार के जुलूस में भाग लेती है ।
   एक अन्य पुस्तक वर्ष-क्रिया कौमुदी के अनुसार इसी त्योहार में सुबह गाने-बजाने, कीचड़ फेंकने के कार्य संपन्न किये जाते हैं । सायंकाल सज्जित होकर मित्रों से मिलते हैं । धम्मपद के अनुसार महामूखरें का मेला मनाया जाता है । सात दिनों तक गालियों का आदान-प्रदान किया जाता था । भविष्य पुराण के अनुसार बसंत काल में कामदेव और रति की मूर्तियों की स्थापना और पूजा-अर्चना की जाती है । रत्नावली नामक पुस्तक में मदनपूजा का विषद है । हर्ष चरित में भी मदनोत्सव का वर्णन मिलता है ।
मदनोत्सव
   पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी 'प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद' पुस्तक में मदन पूजा का वर्णन किया है ।
   दशकुमार चरित्र नामक पुस्तक में भ…

राकेश शर्मा का व्यंग्य : कोई जूते से ना मारे मेरे दिवाने को

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जूते का मानव सभ्यता से बड़ा गहरा संबंध रहा है । कहते हैं कि किसी जमाने में किसी नाजुक बदन और तुनक मिजाज़ राजा को बागिचे में टहलते हुए कांटा चुभ गया । फिर क्या था उसने सारी पृथ्वी को चमड़े से मढ़ देने का आदेश दिया । अब इतना चमड़ा आखिर पैदा कैसे हो, तो किसी बीरबल टाइप दरबारी ने एक छोटे से चमडे़ के टुकड़े को काट कर राजा के पांव में पहना दिया और तब से धरती पर जूते का चलन चल पड़ा । अब आदमजात की यह बड़ी अजीब आदत रही है कि वो हर उपयोगी वस्तु का बहुमुखी उपयोग कर लेना चाह्ता है । अब यही उसने जूतों के साथ भी किया । सदा पैर में पड़े जूतों का सम्माननीय उपयोग करते हुए किसी ने शादी-ब्याह में इसे पैसे ऐंठने का माध्यम बनाया तो किसी ने इसकी माला बना स्वागत-सत्कार की पारंपरिक पद्धति को मौलिक आयाम प्रदान किया, तो किसी हत्थकटे ठाकुर ने अपने जूते में कील छिपाकर एक नवीन हथियार का विकास कर अपने दिल के `शोलों’ को शांत किया । परंतु जूते से खोपड़ी तोड़ने के तरीके के ईजाद ने जूते के इतिहास को सदा के लिए बदलकर उसकी गरिमा को एक नई उंचाईं प्रदान की । हिंदुस्तान में तो जूतियाने को सदा से ही एक विशिष्ट ‘हूनर’ का दर्जा दिया गया…

हरेन्द्र रावत की कविता : जुदाई

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चलो अब चलते है हम बिच्छू डटे हैं, थोड़ा सा हंसकर थोड़ा रो लेते हैं,तुम्हें तो जाना है लंबे सफ़र में, मुझे यहीं रहना है,कह दो तुम अब दिल की बातें जो कुछ तुमको कहना है,पता नहीं कब दिन आए वो जब हम फिर बताएँगे,गिला शिकवा आपस में मिल इक दूजे को बताएँगे,जब आएगी रिमझिम बारिश बच्चे शोर मचाएंगे,गरमी से परेशान सब भीगने बाहर आएँगे,बैठ अकेला एक किनारे मैं यादों की खिड़की खोलूँगा,साथ साथ बीते हर पल, हँसते हँसते रो दूँगा !क्या सचमुच ऐसे ही एक दिन सभी जुड़े होते हैं,चलो अब चलते हैं, हम जुदा होते हैं,  थोड़ा सा हंसकर चक्षु भिगा लेते हैं !रोज सबेरे ब्रह्म मुहूर्त में बजेगी घंटी मंदिर की,याद आएगी प्रिये तुम्हारी जैसे लहरें समुद्र की,दिन गिनता हूँ तुम आओगी सात समुद्र पार से,करूँगा स्वागत अर्धांगिनी का गुल दस्ता और हार से,जुदाई के दिन कट जाएँगे, सुबह का सूरज निकलेगा,होगा मिलन हम दोनों का फिर, मन मयूर फिर हर्षेगा,ये विडंबना है जीवन की मिलके जुड़ा होते हैं,चलो अब चलते हैं हम जुड़ा होते हैं,थोडा सा हँसकर चक्षु भिगा लेते हैं !---(चित्र – मल्लीबाई - झाबुआ की कलाकृति, सौजन्य मानव संग्रहालय, भोपाल)

विवेक रंजन श्रीवास्तव का रेडियो नाटक : लाल सलाम

रेडियो नाटकलाल सलाम ... !लेखक विवेक रंजन श्रीवास्तवअवधि ३० मिनट लगभगपात्र परिचय १. पत्रकार ...२. पप्पू ..एवं...बदरू...बाल नक्सली ३. रजनी युवती नक्सली४. कमांडर आकाश युवा नक्सली नेता ५. एक बुजुर्ग सेवा निवृत व्यक्ति ६. अखबार का हाकर ७. राजू बुजुर्ग का नाती ८. शालिनी बुजुर्ग की नातिन . वाद्य यंत्रो के साथ गायक दल नेपथ्य स्वर हेतु पुरुष व नारी उद्घोषक दृश्य १ करमा गीत पर मादंर की थाप के साथ चलो नाचे जाबा रे गोलेंदा जोड़ा.........करमा तिहार आये है..., नाचे जाबो रे...........। पहली मैं सुमिरौं सरस्वती माई रे...पाछू गौरी गणेश रे .......गोलेंदा जोड़ा ...।। गांव के देवी देवता के पइंया लगारे....गोड़ लागौ गुरुदेव के रे..... गोलेंदा जोड़ा ..।।+=+=+धीरे धीरे करमा नृत्य गीत के स्वर मद्धिम होते जाते हैं . नारी स्वर गूंजता है मैं, बस्तर की आवाज हूं हजारों-हजार साल का जिन्दा इतिहास । जैव विविधता, लोक संस्कृति ,सघन वनो को समेटे हुये , मेरे आगोश में यहां लोग हजारो हजार साल पुरानी संस्कृति भी जीते हैं तो आज की आधुनिकता भी। पहाड़ी मैना भी मेरा ही अंश है तो प्रकृति की देन , केशकाल की घाटी की वह खूबसूरती भी , जि…

डंडा लखनवी की हास्य रचना : लदी जो जेवरों में नित टहलती है निडर हो कर, किया जब खोज तो एस.पी. सिटी की फैमली निकली।।

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हास्य          भयानक खलबली  निकली                -डा0 डंडा लखनवी
मुखौटा देख कर  उसका, अचानक खलबली  निकली।
मेरी तकिया के नीचे से, मियाँ जब, छिपकली निकली।। कचहरी में  पहुँच  कर मैं  भी  धोखा खा  गया ऐसा,
जिसे जज़ साहबा समझा,  वो उनकी अर्दली निकली।। बुढ़ापा  छा  गया उनपे,  बना  पाए  न  इक  रिस्ता-
हुए आखि़र  फ़िदा  जिसपे वो लड़की मंगली निकली।। इधर  कुछ  चाय से  उनका हुआ  ऐसा  एफैक्शन है,
कराया  एक्सरे  जब  तो  उदर  में केतली निकली।। लदी  जो  जेवरों  में  नित  टहलती है निडर हो कर,
किया जब खोज तो एस0पी सिटी की फैमली निकली।। बड़ी   उम्मीद  ले  कर  सेंधमारी  किया   चोरों  ने,
मगर  घर से  मेरे केवल गज़ल की पोटली निकली।। किया दादी औ दादा ने,  अजी  होली में  तब डिस्को,
जब उनके  सन्निकट से नौजवां  की मंडली निकली।।                                सचलभाष-09336089753

ब्लॉग जगत के ग़ज़ल गुरू पंकज सुबीर को ज्ञानपीठ पुरस्कार

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बहुमुखी प्रतिभा के धनी, हिन्दी ब्लॉग जगत के लोकप्रिय ग़ज़ल गुरू – माट्साब – पंकज सुबीर को उनके उपन्यास ‘यह वो शहर तो नहीं’ पर ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार प्राप्त हुआ है. इस संबंध में प्रतीकात्मक तरीके से उन्होंने आज अपने पोस्ट में घोषणा भी की है. पंकज जी की इस विनम्रता को सलाम व उन्हें बधाई.

सतीश कुमार चौहान का आलेख - महंगाई

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मंहगाई दस पैसे कप चाय तीस पैसे का दोसा से दादाजी का नाश्‍ता हो जाता था आज ये सच्चाई जितनी सुखद लगती है, उतनी ही दुखद लगती है कि हमारा पोता बीस रुपये कप चाय पीकर दो सौ रुपये का दोसा खाएगा, बात साधारण सी इसलिए हो जाती है क्योंकि आज जिस वेतन पर पिताजी सेवानिवृत हो रहे हैं. बेटा आज उस वेतन से अपनी सेवा की शुरुआत कर रहा है, सन् 1965 में पेट्रोल 95 पैसे लीटर था चालीस सालों में पचास गुना बढ़ गया तो आश्‍चर्य नहीं की 2050 में भी अगर हम इसके विकल्प को न तलाश पाए तो 2500 रुपये लीटर आज जैसे ही रो के या गा के खरीदेंगे, मंहगाई के नाम पर इस औपचारिक आश्‍वासन से किसी का पेट नहीं भरता पर कीमत का बढना एक सामान्य प्रक्रिया जरुर है, पर ये सिलसिला पिछले कुछ सालों से ज्यादा ही तेज हो गया है. जहां आमदनी की बढोतरी इस तेजी की तुलना में अपेक्षाकृत कमजोर महसूस कर रही है वही से शुरू होती हैं मंहगाई की मार, दरअसल मंहगाई उत्पादक व विक्रेता के लिए तो मुनाफा बढाने का काम करती है पर क्रेता की जेब कटती जाती है.देश में तेजी से बढ़ती मंहगाई पर राजनेताओ की लम्बे समय से खामोशी समझ से परे है. बस कैमरे के सामने आपस में कोस क…

अशोक गौतम का व्यंग्य - साहित्य में दस्युवाद!

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खुद को पता नहीं आज फिर क्यों खुशी देख बल्लियां उछल रहा था कि वे सामने से चेहरा लटकाए आते दिखे तो आधी खुशी हवा हो गई। आजकल अपनी खुशी तो जैसे छुपाने की चीज हो गई है। मैंने अपने इधर उधर देखा कि कहीं कोई मेरे दांए बांए अनहोनी तो नहीं हो गई। अजीब से दौर में जी रहा हूं साहब इनदिनों। पर अपने को चारों ओर से खुश पा लगा कि अगर अब इनकी उदासी में शरीक न हुआ तो पता नहीं क्या क्या कह डालेंगे सो अपनी खुशी को वहीं लगाम दे उनके उदास चेहरे के साथ अपने चेहरे को उदास करने की रिहर्सल करने लगा। मुझ तक पहुंचते पहुंचते उनका चेहरा उदासी से रोने के कगार पर आ पहुंचा था। उनका रोना निकालने के लिए मैंने ही उन्हें गले लगाते पूछा,' क्या हो गया साहब जो वसंत के आने पर भी रोना पूरे के पूरे चेहरे पर पोते हो।' मैं भी चाहता था कि मेरे ये पूछने पर वे फूट फूट कर रो पड़ें और मेरे मन में दनादन लड्डू फूटें। और मजे की बात कि मेरे मन की मुराद पूरी हो गई। अपने गले से वे अपने रोने को उम्र के चरम तक ले जाते बोले,' क्या बताऊं यार! पहली बार तो मौलिक रचना लिखी थी। छपने को भेजी थी।''तो छप तो गई होगी? मौलिक आजकल लिख ह…

श्वेता सुधांशु की कविता : मैं

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मैंकभी-कभी लगता हैजैसे मैं, मैं नहींऔर यह कैसा इत्तफ़ाक़ हैंकि ऐसा तब होता हैंजब मैं पूरी तरह से होती हूँ-'मैं'.वजूद की तलाशअपने नये अभियान परचलते हुए मेरे क़दमों कोअचानक दिख पड़ी एक नदीजिसमें सोया पड़ा थासारा का सारा आकाशचुपचाप गहरी नींद मेंकिनारे खड़ी देखती रहीकुछ देरफिर चुहल सूझीचाहीचुरा लूँ थोड़ा-सा आकाशमेरे ही इशारे पर बढ़े दो हाथऔर ले लियाउसका एक टुकड़ाकिंतु यह क्या?देखते-देखतेवह टुकड़ा फैल करबन गया एक विस्तृत आकाशमेरे दो लघु हाथों मेंएक 'विस्तृत आकाश'-उड़ते बगुलों की पंक्तियाँतैरते सफेद मेघ खंडपूरा का पूरा हवाई जहाज़चमकता हुआ सूरजरात के अँधेरे मेंबादलों से झाँकता चाँदऔर जलते बुझते तारेजो दिख रहे थे अब तक नदी मेंदिख पड़े मेरे भी हाथों मेंमुझे लगा समस्त आकाशकालचक्र की गतिऔर सारा संसार(मेरे सहित)समा गया मेरी हथेलियों मेंइस तरह अपने वजूद को ढूँढने काजो अभियान मैंने किया था शुरूमिला मुझे अपने ही हाथों में.---(चित्र – प्रदीप भारावी की कलाकृति)

आर. के. भारद्वाज की दो कविताएँ

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तलाश
मुझे तलाश है,
न आग की, न पानी की
न धूप की, न छांव की
सिर्फ एक अदद गांव की, लहलहाती फसलें हो, सोना उगलते खेत
कलकल बहती हो नदिया और किनारे रेत
बैठ किनारे नदी रेत पर हास करूं परिहास करूं,
वाद करूं, विवाद करूं और न कभी परिवाद करूं केश हों, कंघी हो, कमर में कृपाण हो
मस्जितद से अजान हो
मन्दितर से जयकार हो
वाहे गुरू की ललकार हो
बच्चों की पाठशाला हो,
हर धर में गौशाला हो न कोई लाचार हो, न कोई मजबूर हो,
औरत की मांग में सिंदूर हो
राम हो, रहीम हो
बलजीत हो, इब्राहीम हो,
मीरा हो,गीता हो, टेरेसा हो, हरप्रीत हो
अमन चैन के गीत हों , पंचायत का राज हो, सुसंस्कृ त समाज हो
डामर की डगर हो, गांव लगता नगर हो,
सुख हो, सुविधा हो, मन में न कोई द्वुविधा हो
बिरहा हों, आल्हा उदल के गीत हो,
पक्षियों का कलरव हो, कोयल का संगीत हो । कौन देगा ऐसा गांव
नेताओं के थके हैं पांव
नीति निर्माता नशे में चूर हैं
मेरे सपनों का गांव अभी दूर है ।
आदमी तुम आदमी बन जाओं
किसी ने एक दिन कहा था मुझे
मैं सोच रहा था कि कैसे बनूं आदमी
क्या  उस आदमी जैसा बन जाऊं…

संजय ग्रोवर का व्यंग्य : पौट्टू जी का दूसरों से प्रेम

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पौट्‌टू जी खासे प्रगतिशील आदमी थे। प्रगतिशील इसलिए कि उन्‍हें लगता था कि प्रगतिशील दिखना अच्‍छी बात है। इसलिए भी कि प्रगतिशीलता का फैशन है। सबसे ज्‍यादा इसलिए कि मौक़े के मुताबिक़ प्रगतिशील दिखना हमारी परम्‍परा है।अपने इसी प्रगतिशीलता के शौक़ के तहत पौट्‌टू जी काफी किताबें वगैरह भी खरीदा करते थे। जब खरीदने से फुरसत मिलती तो पढ़ते भी थे। एक दिन ‘किताबें खरीदते हुए प्रगतिशील दिखने‘ के फैशन के तहत पौट्‌टू जी एक बुक-स्‍टॉल पर खड़े थे कि उनकी नज़र एक किताब पर पड़ी। शीर्षक था ‘हाऊ टू लव अदर्स ः दूसरों से प्रेम करने के 301 उपाय'। इधर कई दिनों से टी.वी. के देसी-विदेशी चैनलों और रंगीन पत्र-पत्रिकाओं में घुस कर पौट्‌टू जी खोज लाए थे कि दूसरों से प्रेम करते हुए प्रगतिशील और परम्‍परा-पकड़ू दोनों साथ-साथ दिखा जा सकता है।क़़िताब की जिन बातों से पौट्‌टू जी ज्‍यादा प्रभावित हुए, उनमें से एक थी कि प्रेम तो रस्‍सी की तरह दूसरों को बांध लेता है। पौट्‌टू जी उन लोगों में से थे जो हर बात की व्‍याख्‍या अपनी समझ से, अपने स्‍तर पर करते हैं। सो पौट्‌टू जी ने अर्थर् निकाला कि अगर प्रेम रस्‍सी की तरह है तो ज…

गिरीश पंकज का व्यंग्य : रामलुभाया…बजट आया

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रामलुभाया जाग। छोड़ आलस का राग।
देख बजट आ गया। क्या तुझे भा गया। नहीं भाया तो भायेगा।
बेटे, बच कर कहाँ जाएगा?
अरे, देश का आम जनता। तेरे बिना सरकार का कभी काम नहीं बनता।
माना कि रेल बजट मे किराया नहीं बढ़ता मगर समस्या तो हर बार बढ़ जाती है।
हमारे पास आते-आते ही हर दाल सड़ जाती है।
चावल में कंकर और पानी में कमल की जगह कीड़े खिल जाते हैं। बेचारे मनुष्यों से हिल-मिल जाते हैं।
सरकार अपनी ओर से ममता दिखाती है। लेकिन बात नहीं बन पाती है।
और एक रेल चलते-चलते दूसरे पर चढ ज़ाती है।
रामलुभाया, सबसे ज्यादा तेरी दुर्गति होती है। तू जनता है न, घर में बैठे-बैठे रोती है।
लेकिन कोई बात नहीं। यही तेरा नसीब है। हर व्यवस्था जनता की रकीब है। इसलिए जो होता है, जनता के लिए होता है। ये और बात है, कि जन का कुछ नहीं होता है। ये तो अच्छा हुआ कि चैनलों की भरमार है और अपुन को टेंशन मिटाने के लिए मनोरंजन की दरकार है। चैनलों के कारण कोई फर्क नहीं पड़ता है, कि कैसा है बजट, और कैसा होना चाहिए। जैसा है ठीक है। यह तो पुरानी लीक है। खराब होगा तो क्या होगा? हमारे कहने से कौन-सा ठीक हो जाएगा…

कृष्ण मुरारी प्रसाद का व्यंग्य : साहब

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साहब  कोई काम नहीं करते हैं , उन्हें केवल आदेश देना होता है. साहब के सारे काम उनके मातहतों को करना होता है चाहे वो ऑफिस का काम हो या घर का. जो साहब ऑफिस में खुद अपने हाथ से कुछ काम करते हैं उन्हें निकम्मा समझा जाता है, खास कर बड़े साहब की नज़र में. साहब हमेशा सही होते हैं. गलत उनके मातहत को ही होना होता है. ये मातहतों  की जिम्मेवारी होती है कि अपनी गलती माने. साहब गलती खोजने तथा डांटने में  एक्सपर्ट होते हैं. साहब तुनुकमिजाज होते हैं. दूसरों के सामने डांटने में वे  ज्यादा अच्छा महसूस करते हैं क्योंकि सामने वाला उस परिस्थिति में कुछ बोल नहीं पाता  है. इसी बहाने अन्य लोग भी डरते हैं. कभी-कभी एक कड़े प्रशासक की छवि बनाने के लिए  भी झूठ-मूठ दूसरों को डांटना पड़ता है. जिस दिन साहब किसी को नहीं डांटते उस दिन  उनका हाजमा बिगड़ा रहता है. इन परिस्थितियों में साहब को बार –बार बाथरूम जाना पड़ता है. यही कारण है कि अगर साहब घर में भी हों तो फोन पर कम बाथरूम में ज्यादा पाए  जाते हैं. “साहब बाथरूम में हैं”—ये तकिया-कलाम साहब के घर बालों के जुबान पर स्वाभाविक रूप से चढ़ा रहता है. ऑफिस में शेर बने रहन…

रामभरोसे मिश्र की समीक्षा : राजनारायण बोहरे का उपन्यास - मुखबिर

समीक्षा-चम्‍बल का प्रमाणित आख्‍यान-मुखबिरचम्‍बल घाटी का नाम फिल्‍मी दुनिया से लेकर लोकप्रिय साहित्‍य तक और राजपथ से जनपथ तक ; डकैतों, बीहड़ों , समर्पणों और मुठभेड़ों के लिए जाना जाता है, लेकिन सचाई यह है कि चम्‍बल के डकैतों पर सिवाय अखबारी रिपोर्ताजों और सतही व पापुलर किस्‍म के उपन्‍यासों के रूप में सामग्री मिलती है, जो न तो यथार्थ है न सही विश्‍लेषण । सच तो यह है कि इस सम्‍बंध में रामकुमार भ्रमर के बाद किसी ने गंभीरता से नहीं लिखा । हां इस सन्‍दर्भ में पिछले दिनों पहली बार इस इलाके को कथाभूमि बनाकर कुछ कहानियां लिखी गई। हिन्‍दी कथासाहित्‍य की पांचवी और छठवीं पीढ़ी के लेखक महेश कटारे , ए0 असफल , राजनारायण बोहरे और प्रमोद भार्गव ने यानी उन लेखकों ने जो ठेठ इन बीहड़ों में रहते और यहां की त्रासदी को भोगते है उनके द्वारा इस इलाके की परत दर परत पड़ताल करता कथा साहित्य लिखा गया तो पाठकों का ध्‍यान आकृष्‍ट किया। महेश कटारे की कहानी ‘पार' , ए0असफल की ‘ लैफ्‌ट हैंडर' और प्रमोद भार्गव की ‘ मुखबिर ' नामक कहानी ने चम्‍बल के उस रूप को प्रकट किया जो आज बीहड़ों में दिखाई दे रहा है। इसी स…

गिरीश पंकज का व्यंग्य : शाम को उसे ‘टच’ मत करना

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बहुत दिनों से इच्छा थी कि  गपोडूराम के घर  जा कर  मिलूँ, कुछ बतियाऊं. कुछ उसकी सुनूं, कुछ अपनी सुनाऊँ, लेकिन टीवी देखने से मुझे फुरसत मिले तब न।
जब से टीवी ने टीबी की  बीमारी की तरह जोर पकड़ा है, तब से न तो किसी के घर  जाना अच्छा लगता है और न किसी का अपने घर पर  आना। ये ससुरे चैनल चैन नहीं लेने देते। इस चैनल के चक्कर में लोग बेचैन होने लगे हैं। लेकिन दिल है कि मानता नहीं। लगता है पुराने दोस्तों से मिल लिया जाय।
मैंने मित्र हपोड़ूराम से कहा- ‘‘चलो यार, आज शाम गपोड़ूराम के घर चलते हैं।’’
इतना सुनना था कि मित्र बोला- ‘‘अरे... अरे, उसे शाम को  ‘टच’ मत किया  करो। कभी दिन में, हाँ, छुट्टी वाले दिन मिलने चलेंगे न ।’’
मैं समझ गया कि गपोड़ू भी शाम को मेरी तरह टीवीबाजी में व्यस्त हो जाता होगा, इसलिए भाई हपोड़ू मना कर  रहे हैं।
कुछ दिन बाद फिर मेरी इच्छा  ने जोर मारा।
मैंने क हा- ‘‘चलें आज, गपोड़ू भाई के घर ?’’
मित्र  ने मुस्कराते हुए कहा- ‘‘शाम को  उसे ‘टच’ करना ठीक नहीं ।’’
मैंने झल्ला कर कहा- ‘‘अरे यार, तुम अपने मित्र को  इस टी.वी.फ़ोबिया से मुक्त करो। ये क्या  तमाशा है कि…

हरिहर झा का आलेख : बूमरैंग – ऑस्ट्रेलिया से कवितायें

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१५ जनवरी २०१० को दिल्ली के स्थानीय हिन्दी भवन सभागार में ऑस्ट्रेलिया के अप्रवासी भारतीय कवियों की कविताओं का संग्रह ’बूमरैंग’ का लोकार्पण किया गया था । यह पुस्तक रेखा राजवंशी द्वारा संपादित है जिसमे उनके द्वारा ऑस्ट्रेलिया में बसे ११ भारतीय कवियों की कविताओं का संग्रह किया गया है । “द इंडियन डाउन अंडर” व अक्षरम द्वारा प्रायोजित इस कार्यक्रम में श्री अशोक चक्रधर व कन्हैया लाल नन्दन ने प्रवासियों द्वारा की गई हिन्दी-सेवा की प्रशंसा की । श्री अशोक चक्रधर ने कहा कि ये कवितायें नस्ली(!) नहीं असली हैं ।साहित्यकार श्री लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने बताया कि ये सारी कवितायें हिन्दी साहित्य को समृद्ध करती है । इस पुस्तक में भारत के प्रति चिन्ता नज़र आती है । लेखिका अनामिका ने बताया कि इन कविताओं में वतन का दर्द अभिव्यक्त होता है । मंच की संचालिका अल्का सिन्हा के अनुसार स्मृतियां जीवन का आधार होती हैं जिसे कवियों ने कविता के माध्यम से तराशा है । बूमरैंग फैंकने पर वापस लौट आता है और यह भारतवंशी साहित्यकारों की भावनाओं का , वृत्तियों का, इच्छाओं का प्रतीक है जो बार बार भारत की ओर उन्मुख होता है । पर ऐसा…

वीरेन्द्र जैन का संस्मरण : बैंकिंग जैसी ज़रूरी सेवा में मानवीय सम्बन्ध बदले हैं

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मैंने सन 1971 में जिस बैंक मैं नौकरी शुरू की थी उसका नाम हिन्दुस्तान कमर्सियल बैंक था जो आज़ादी के पूर्व एक बड़ा बैंक हुआ करता था किंतु देश के विभाजन से उसकी अनेक शाखायें पाकिस्तान में डूब गयीं थीं और घाटा होने के कारण के इसकी अनेक शाखाओं को बन्द करना पड़ा था। उस दौर में सभी बड़े औद्योगिक घराने अपना बैंक चलाते थे यूको बैंक बिड़ला का था, सेंट्रल बैंक टाटा का था, पंजाब नेशनल बैंक डालमियाँ का था उसी क्रम में हिन्दुस्तान कमर्सियल बैंक सिंघानियाँ[जेके] औद्योगिक घराने का था। राष्ट्रीयकरण के पहले बैंकों के लेन देन के आंकड़ों के आधार पर ए,बी.सी ग्रेडिंग हुआ करती थी उस के अनुसार हिन्दुस्तान कमर्सियल बैंक –बी ग्रेड में आ गया था जो 1975 में जाकर फिर से –ए ग्रेड- बन पाया। 1969 में श्रीमती इन्दिरा गान्धी ने राजनीतिक दबाव में जिन 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था वे सभी –ए ग्रेड के बैंक थे। बाद में 1986 में इस बैंक का विलय पंजाब नेशनल बैंक में हो गया था। मैंने जब बैंक में बतौर क्लर्क नौकरी ज्वाइन की थी तब मेरा मूल वेतन कुल 180/- रुपये था और कुल वेतन लगभग 270/- रुपये मिलते थे किंतु जब मैंने 29 साल की नौकर…

शीबा असलम फ़हमी का आलेख – जेंडर जिहाद : शरीअत का हौआ

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(शीबा का ब्लॉग – खयाल यहाँ पढ़ें)जेंडर जिहादशरीअत का हौआपरदा इधर : परदा उधर शीबा असलम फ़हमी[शीबा असलम फ़हमी का अत्यंत लोकप्रिय व चर्चित स्तंभ – जेंडर जिहाद हिन्दी की लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ में पिछले कुछ अंकों से सिलसिलेवार जारी है. वैसे तो हंस अब पीडीएफ रूप में मई 2009 से नेट पर फिर से उपलब्ध हो गया है, मगर यूनिकोड में नहीं होने से बात नहीं बनती. रचनाकार के पाठकों के लिए खासतौर पर यह स्तंभ सिलसिलेवार रूप में यूनिकोडित कर, साभार प्रस्तुत किया जा रहा है. पेश है जुलाई 2009 का आलेख.  जून 2009 का आलेख सब धान बाइस पंसेरी यहाँ तथा  मई 2009 का आलेख संविधान और क़बीला  यहाँ पढ़ें] इस स्तंभ में पिछले पाँच अंकों से भारतीय मुसलमान महिलाओं की स्थिति पर चर्चा और पाठकों के उठाए प्रश्नों का विश्लेषण करते हुए, जिस एक मुद्दे को सबसे अधिक बार उठाया गया है वह है 'शरीअत क़ानून' मुसलमान, ग़ैर-मुसलमान, स्त्री-पुरूष, बु़द्धिजीवी व साधारण पाठक वर्ग सभी ने इस विषय पर न सिर्फ़ चिंता जताई है बल्कि इनका यह भी मानना है कि शरीअत-क़ानूनों के चलते ही मुस्लिम समाज में औरतों की दशा दयनीय है. अधिकतर प्रतिक्…

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रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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