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March 2010
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(देव घनाक्षरी-३३वर्ण, अन्त में दो नगण)

hanu

बाल ब्रह्मचारी पवन पुत्र जब हांक भरें ,

कांपें दुष्ट और कुविचारी थर थर थर ।

सारे लोक मॆं हैं तभी पूज्य अन्जनी के लाल,

रहते हें सदा हर ग्राम नगर घर घर ।

चाहे कलियुग हो या हो शनि दुष्ट ग्रह कोई,

सुमिरे पवन सुत भागें सर सर सर ।

काल सम कराल विकराल ,रवि गाल धर ,

श्याम के निवारें शोक दोष हर हर कर ॥

 

-----डॉ. श्याम गुप्त

सोचो इस धरती का क्या होगा ?

इंसान इंसान का दुश्मन बन गया, ज्वालामुखी फटने वाला है, 

प्रदूषण का दानव आ रहा लगता कितना काला है ?

सज्जन सहमें सहमें से, दुर्जनों की बन आई,

कुदरत भी गुस्से में है देखो काली घटा नभ में छाई!

गर्जन तर्जन नभ में हो रही, तूफान आने वाला है,

बचा सको तो जान बचा लो ज्वालामुखी फटने वाला है ! १ !

देखो हिमालय पिघल रहा है एवरेस्ट बदरंग हुआ,

इंसान की काली करतूतों से जग कर्ता भी दंग हुआ !

जंगल कट गये वन चर मर गये नदियों का पानी सुख गया,

संतुलन बिगड़ गया कुदरत का यह सब इस मानव ने किया !

प्रदूषण का काला जहर अब स्वर्ग तक जाने वाला है,

बचा सको तो जान बचा लो ज्वालामुखी फटने वाला है ! २ !

बुजुर्ग वरगद पीपल आम कह रहे हो गयी है शाम,

अरे वो कुकर्मी इंसान अब तो कर कुछ अच्छे काम !

बसंत में भी पतझर है जंगल का मंगल रूठ गया,

नेता की अचकन टोपी पर काला दाग है नया नया !

ऋषि मुनियों का ये देश बदल रहा है अपना भेष,

जुर्मों की इस दुनिया में नेता पर है हत्या केस !

नील गगन में हल चल मच गई वो अग्नि बरसाने वाला है,

बचा सको तो जान बचा लो ज्वालामुखी फटने वाला है ! ३ !

पानी की मछली तड़प रही पानी में जहर मिलाया है,

अपने ऐश आराम के खातिर वन जीवों को मरवाया है !

इस धरती माँ के सीने पर है हज़ारों टन गोले गिरते,

लाखों ज़ख्मी हो जाते और लाखों तड़प तड़प कर मरते !

जीव जन्तु और परिंदे हर दिन मौत से लड़ते हैं,

रोज रोज जब बेचारे दुर्जन के रस्ते पड़ते हैं !

वो कलंकित इंसान संभल जा अब प्रलय आने वाला है,

बचा सको तो जान बचा लो ज्वालामुखी फटने वाला है ! ४ !

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चलो एक बार फिर से

चलो एक बार फिर से इस धरा को संवार दें, 

दुष्टता अपराध को जड़ से ही हम मार दें ! 

माँ धरा है रो रही और अहिंसा सो रही,

हर तरफ निर्दोष मरता और हत्यारा मौज करता,

हर लहू की बूँद फिर ज़ोर से ये पुकारता,

पाप धरती से मिटाने ये त्रिलोकी क्यों न आता ?

आओ फिर से माँ धरा को शांति का उपहार दें,

दुष्टता अपराध को जड़ से हम मार दें ! १ !

माँ धरा की कोख में पैदा हुए तो संत थे,

पॅंच तत्व का तन लिए पर हज़ारों पंथ थे !

माना की राह अनेक थे खून सबका एक था !

इस धरा पर आने वाले का इरादा नेक था !

निष्कपट लोगों के बीच में कुछ शरारती आगए,

चोला नेता का पहिन कर राजनीति में छा गए !

समाज को बाँटा गया बढ़ गई फिर दूरियाँ,

राह में काँटे बिछाए चल पड़ी फिर छुरियाँ !

अमीर ऊँचा उठ गया रोटी ग़रीब की छीनता

और रहता महल में निर्धन शिला पर लेटता !

एक बेटा माँ धरा पर अपने को कुर्बान करता,

बन सेना का सिपाही देश का इतिहास लिखता !

एक बन आतंकवादी अपने जनों को मारता,

और नेता देश का गद्दार को फिर पालता !

अपराध की इस गंदगी को शुद्ध जल से संवार दें,

और माँ धरती के चरणों में सज्जनता डाल दें ! २ !

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एक कविता

एक कविता रोज बनाता भूल जाता हूँ,

शब्द बिना ही सांझ सबेरे गुनगुनाता हूं,

बिना पंख के नील गगन को छूना चाहता हूँ !

एवरेस्ट की छोटी पर परचम लहराता हूँ !  

चाहता हूँ कुदरत को मैं आँखों में बसा लूँ, 

कल्पना का महल बनाकर सदा सज़ा लूं,

हर की पौडी हरिद्वार में नहाना चाहता हूँ,

शब्द बिना ही सांझ सबेरे गुनगुनाता हूँ ,

बरफीली श्वेताम्बर चोटी जब है मुझे बुलाती,

भाग भाग कर पर्वत चढ़ता बरफ नज़र नहीं आती,

इस बरफीली चादर पर मैं दौड़ लगाता हूँ,

शब्द बिना ही सांझ सबेरे गुनगुनाता हूँ!

बर्फ के गोले बना बनाकर और फिसल जाना,

और फिर मस्ती में आकर उच्छल कूद मचाना,

पवन वेग से नभ मंडल में उड़ना चाहता हूँ,

शब्द बिना ही सांझ सबेरे गुनगुनाता हूँ !

एक नदी के दो किनारे और नदी है गहरी,

पर्वत तोड़ती शोर मचाती बड़े वेग से बहती,

सेतु बना कर दोनों किनारे जोड़ना चाहता हूँ,

शब्द बिना ही सांझ सबेरे गुनगुनाता हूँ !

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चलो अब हम नया घर बसाएँ,

चलो अब हम नया घर बसाएँ,  जिंदगी के शेष दिन संग संग बिताएँ!

विगत की यादें दिल में,उन्हें भूल जाएँ, नये नये राहों में कदम बढ़ाएँ!

कुदरत की वादियों में फिर मुस्कराएँ, चलो अब हम नया घर बसाएँ !

कुछ ऐसा करें, फिर से जुदा हो ना पाएँ, जिंदगी का सफ़र संग संग बिताएँ !

तूफ़ानों के संग संग बहारें भी आएँगी, भूली बिसरी खुशियाँ लौट आएँगी !

आओ फिर से मिलकर वही गीत गाएँ, चलो अब हम नया घर बसाएँ  !

हूँ बैठा अकेला है नैनों में पानी,  बिता दी अकेले ही सैना में जवानी !

बताओ सफ़र अब है कितना बाकी, दिल करता है अब पीने को साकी,

अब तो ये दिल भी जगह पर नहीं है, कहीं तो है मन मेरा और तन कहीं है !

इंतजार की घड़ी होती बड़ी है, बढ़ती ही जाती घटती नहीं है !!

आओ अब हम तुम ऐसा कर जाएँ, जिंदगी का सफ़र संग संग बिताएँ !

भंवरों की टोली जब फूलों पे झूले, पवन वेग चलता तब हौले हौले,

बीते दिनों के वो दिन याद आते, मिल जुल के चलते जब हंसते हँसाते !

चकवा-चक़वी जब जोड़े में चलता, हंसों का जोड़ा हर शाम मिलता,

मिलन की ये लीला इन पक्षियों की दिल के कोने में आह भरता !

दिल करता है मन मंदिर में मन का महल बनाएँ,

जिंदगी का सफ़र संग संग बिताएँ !

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संसद में दंगल

ये दंगल हो रहा है, संसद में अमंगल हो रहा है,

लड़ा करते हैं सांसद आपस में,

की जंगलियों का मंत्री मंडल हो रहा है !

छीने जा रहे हैं माईक, और टूटती हैं कुर्सियाँ,

फूटते हैं नाक किसी के और फटती हैं जर्सियाँ !

सांसदों की इस लड़ाई पर खर्च होते हैं करोड़,

खून पसीना जनता का, उदर में है मरोड़ !

अध्यक्ष ने फटकार मारी, तुम न जीतोगे कभी,

सभ्य लोग आएँगे जब, संसद सुधरेगी तभी !

खूनी लुटेरे और डाकू जब संसद में आएँगे,

अपराधी सज़ा याफ़्ता, मंत्री बनाए जाँएंगे,

क्या हाल होगा, उस देश का प्रदेश का,

जहाँ संसद ही गुंडा बन जाएँगे !  हरि ओम !

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ख़तरा नहीं पशु पक्षी से ख़तरा है इंसान से

ख़तरा नहीं किसी पशु पक्षी से, पर ख़तरा है इंसान से,

यह इंसान ही है गिर जाता है अपने धर्म और ईमान से !

ये कथा एक ब्राह्मण की जो जा रहा था एक जंगल से,

डर रहा था शेर चीते ख़ूँख़ार भालुओं के दंगल से !

देखा उसने एक गहरा कुँआ चार जीव थे उसमें फँसे,

शेर, बंदर, साँप, सुनार ग़लती से थे उसमें गिरे !

हर एक ने उससे कहा भगवन बचा लो इस कूप से,

महरूम हैं हम यहाँ हवा पानी और धूप से !

बचा लो हमें इस नर्क से सहायता करेंगे आप की,

भुगत रहे हैं हम सज़ा पता नहीं किस पाप की,

ब्राह्मण ने पहले निकाले कुंए से शेर बंदर साँप,

साँप बोला इसे मत निकालो इस पर है दुष्टता की छाप !

पर ब्राह्मण था दयालु उसने सुनार को भी निकाला,

और सभी ने विदाई पर गले उसके डाली माला !

ब्राह्मण बहुत ग़रीब था,  भूखा ही सो जाता था,

लेकिन किसी से कभी कुछ माँग कर नहीं खाता था !

एक दिन उसको अपने दोस्तों की याद आई,

तीनों दोस्तों ने सामर्थ से अपनी दोस्ती निभाई !

बंदर ने उसे बहुत सारे फल और मेवे देकर विदा किया,

शेर ने एक बहुत ही कीमती हार दिया !

हार बेचने वह सुनार के पास गया,

जिसने उसे जेल में बंद करवा दिया !

हार राजकुंमार का था जिसे शेर ने मार दिया था,

और उसका हार ब्राह्मण को दान में दे दिया था !

ब्राह्मण को राजकुमार का हत्यारा माना गया था,

उस दुष्ट सुनार ने ब्राह्मण की भलाई का यह बदला दिया था,

ब्राह्मण ने अपने साँप दोस्त को याद किया,

साँप ने ब्राह्मण को बाहर निकालने का रास्ता बतला दिया !

अगले ही दिन महारानी को साँप ने काट दिया,

और ब्राह्मण के मंत्रों ने महारानी को बचा लिया !

राजा को सुनार का षडयंत्र और ब्राह्मण की सच्चाई

उनके सुरक्षा कर्मियों ने बताई !

ब्राह्मण को बहुत सारा धन और सुनार को

जेल की कोठारी दिखाई !

दोस्तों से गद्दारी का नतीजा बुरा होगा,

कोई देखे या न देखे खुदा तो देखता होगा !!

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परिचय

मैं खुशबू हूँ फूलों समाया हुआ, सीतल पवन हूँ झुलाया हुआ !

मासूम बच्चों की मुस्कान हूँ,खुशी दे जहाँ को मैं वह जाम हूँ,

दरिया में बहता हुआ नीर हूँ, दुखी: आत्मा की मैं पीर हूँ ,

झरने में समाया हुआ गीत हूँ, जवान दिल में धड़के मैं वह प्रीत हूँ,

नील गगन सा मैं एक ख्वाब हूँ, प्यासे के मन में बसा आब हूँ,

धरती पे कुदरत का रूप हूँ,  सूरज की किरणों की धूप हूँ,

हूँ बादल का टुकड़ा उड़ाया हुआ,मैं खुशबू हूँ फूलों समाया हुआ !  1 !

बेबस अंधें की लाठी हूँ मैं, फूलों भारी नील घाटी हूँ मैं,

कुदरत का रंगीन चस्मा हूँ मैं, अचरज भरा एक करिश्मा हूँ मैं,

फूलों में भंवरे की गुन गुन हूँ मैं, महफिल में बजती हुई धुन हूँ मैं,

वसन्ती हवाओं में संदेश हूँ, मेरा देश जीते मैं वह रेस हूँ,

आतंकियों का महाकाल हूँ, भारत मेरा देश मैं ढाल हूँ,

ग़रीबों के दिल में बसा राम हूँ, मुरली मनोहर मैं घनश्याम हूँ,

शहीदों का हूँ गीत गाया हुआ, मैं खुशबू हूँ फूलों समाया हुआ ! 2 !

गंगा की बहती हुई धार हूँ,नाविक के हाथों की पतवार हूँ,

रन में लड़े मैं वह रणधीर हूँ, जो दुश्मन को काटे वह शमशीर हूँ,

किसी बेसहारे का सहारा हूँ मैं, जय हिंद का मूल नारा हूँ मैं,

राणा शिवाजी और गाँधी हूँ मैं, दुश्मन को उड़ा दे वो आँधी हूँ मैं,

डरता जिसे पाकी वह नाग हूँ, जला दे ग़द्दारों को मैं वह आग हूँ !

खजाना मैं कुदरत का बिखराया हुआ, मैं खुशबू हूँ फूलों समाया हुआ !! 3 !

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हंस ले इंडिया

जवान बंद पसीना बाहर

भंवरे की तान गुन गुन करता, भाग रहा था हसीना के पीछे,

ठोकर लगी गिर गया सिर जमीन पर

बुक्का हसीना के कदमों के नीचे,

उन्होंने मुड़ कर देखा, बुक्का उठाया और मुझे दे दिया !

कह भी ना पाया कि "रखिए यह आपके लिए ही है "

और वापिस ले लिया !

वह चली गयी और जवां बंद, ज़ोर से पसीना आ रहा था

"एक तरफ़ा मोहब्बत में ऐसे ही होता है"

किसी अजनबी शायर ने कहा था !

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क्या तुम भी अंधे हो ?

इधर से एक आदमी जा रहा था, उधर से महिला आ रही थी,

कदम तोल के दोनों ही चल रहे थे,

सड़क उबड़ खाबड़ दोनों हाथ मल रहे थे !

वैसे दोनों उमर दराज थे, काला चस्मा दोनों ही पहिने थे !

अचानक दोनों टकरा गए, घुटनों के बल ज़मीन पर आ गए

महिला बोली, " दिखाई नहीं देता, अंधे हो क्या ?

अभी चप्पल जमाती हूँ ज़रा खोपड़ी को इधर ला,"

आदमी बोला, "जवान संभाल कर बोल, मेरा चस्मा टूट गया कौन देगा इसका मोल,

अरे मुझे नहीं दिखाई दिया तू तो देखकर चलती,

मेरी आँखें होती तो क्या तू ऐसे गिरती "

महिला बोली, " अरे मैं तो अंधी हूँ ही क्या तुम भी अंधे हो" !

आदमी बोला," शुभ शुभ बोल बेबी, हम दोनों ही अंधे हैं,

मैं कही जन्मों से तुम्हें ही ढूंढ रहा हूँ, आज मुराद पूरे हुई,

ला अपना हाथ मुझे पकड़ा दे, अब खेलेंगे छुई मुई "!

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सादा जीवन उच्च विचार

हम कहते हैं तुम कहते हो, ये जीवन है स्वप्न बयार,

सादा भोजन, सादा जीवन हो मानव के उच्च विचार !

सदा सबेरे उठकर पहले अपने प्रभु को शीश नवा,

और नींम की डंडी तोड़ कर दातों की करले तू दवा !

फिर सीधे ही पार्क में जाओ, हल्की हल्की दौड़ लगाओ,

और शाम के भीगे दलहन धीरे धीरे करके चबाओ !

बादाम पीस कर दूध मिलाओ या गाजर का हलवा खाओ,

अगर मेहनत ना करपाओ, पालक रस का भोग लगाओ !

दाल मूँग की ज़्यादा खाओ, हल्का चावल रोटी पाओ ,

चीनी कम हो नमक हो थोड़ा आधा मक्खन का कटोरा !

दूध घी भी हल्का हल्का हरी सब्जी साथ में मट्ठा,

हरी मिर्च और हरा ही धनिया, अदरक दे जाता है बनिया,

ताज़ा नींबू भी ले आओ पौदीना की चटनी बनाओ,

कभी कभी खा लेना खीर, खाते इसको युद्ध वीर!

ये सारा भोजन है सादा स्वच्छ रक्त का हो संचार,

इसी तरह मानव मन के बन जाते हैं उच्च विचार !

सेब, अंनार, अमरूद और संतरे आलू बुखारा और पपीते,

चीकू नासपाती भी अच्छी और मटर की फली हो कच्ची !

अंगूर भी अच्छा है मेवा, माता पिता की करना सेवा,

स्नान ध्यान कर पुस्तक बाँचो धर्म ग्रंथ का पाठ करो,

मन मंदिर में दीप जलाओ उस प्रकाश का ध्यान करो!

देखो इस गहरे सागर में तायर रहा है ये संसार,

जो तर जाए भव सागर से उसी के समझो उच्च विचार !

गायत्री मंत्र को जो नर नारी जपते सुबह और शाम,

कहे रावत उस मानव के हृदय बसे भगवान !

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भंवरे का इश्क

गुन गुन कर फूलों पर मंडराता,

शहद चोर के ले जाता,

हे भँवरा सच बतला दे मुझको,

यह शहद किसको दे आता !

तू सदा मेरे आगे, मैं तेरे पीछे रहता हूँ,

तेरी हरकत देख कर भी

कभी कुछ नहीं कहता हूँ !

पर याद रखना प्यारे भंवरे,

फूलों से यारी फिर गद्दारी,

बड़ी मंहगी पड़ेगी तुझको,

सुनेगा जब फूलों से गाली !

और एक दिन ऐसा आएगा,

जब तू फूलों से शहद चुराएगा,

तुझको कैदी बनाने को,

फूलों का द्वार बंद हो जाएगा !

-------------.

हरेन्द्रसिंह रावत दिल्ली

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ट्रेन में सफर कर रही एक मुस्लिम महिला का दो वर्ष का बच्चा बहुत परेशान कर रहा था. मां का दूध पीने की जिद कर रहा था. मां बार-बार शीशी का दूध मुंह से लगाती. पर बच्चा शीशी से मुंह नहीं लगाता. महिला झुंझला कर कभी बच्चे को मारती, फटकारती, डराती. धमकाती कभी पुचकार कर बहलाती, पर बच्चा नहीं मानता.

पास ही बैठी एक हिंदू महिला की गोद में भी लगभग दो वर्ष का बच्चा सो रहा था. उसने पूछा, ‘क्यों बहन जी, आपका बच्चा ऊपर का दूध नहीं पीता?’

“कहाँ पीवै है, हमारी हड्डियों को ही चिचोड़े है, जबकि बूंद भर भी दूध न निकले. घर में तभी थोड़ा बहुत पी लेवे है, अब मैं यहाँ कहाँ से कनकटिया बुराऊं. घर में कनकटिया के डर से पी लेवे है.”

“कनकटिया क्या?”

“क्या बताऊँ, मस्जित से पांच टेम अजान की आवाज़ लौड़ स्पीकर में आवे हैं तो हमने उसे कह रखा है कि ये कनकटिया की आवाज है जो बच्चा दूध न पीवे है उसके कान काट लेवै है. सो जैसे ही अजान होवे है अपने आप दूध मांग लेवे है. अब मैं कहाँ से कनकटिया बुराऊं.” महिला फिर झींकने लगी.

हिंदू महिला अनायास हंसती हुई बोली, “हमने भी ऐसे ही डरा रखा है मंदिर में जब शंख बजता है तो हमने इसे कह रखा है ये हउआ की आवाजा है दूध नहीं पिएगा तो पकड़ ले जाएगा. हम तो अपने साथ शंख भी रखते हैं. दूध नहीं पीता तो छुपकर बजा देते हैं, सोई पीने लगता है.”

वार्तालाप सुनकर मुझे खुशी हुई. धर्म का कुछ न कुछ तो सदुपयोग हो ही रहा है.

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(सारिका, मई 88 अंक से साभार)

पानी

किस पाताल में छुप गया पानी

मेघ नहीं सुना रहे कहानी

टूट गये तालाब

चुक गई कुएं की रवानी

टर्र-टर्र की आवाज

बन गई अतीत की कहानी

ऋतु चक्र कहा बहक गया

दिखने लगी तलछट पुरानी

मनुष्यता ठहाके लगाती

खतरे में है प्रकृति

जलचर तक की जवानी।

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सियासत

सियासत में हो गया

चापलूसों का बोलबाला

मानवीय संवेदनाओं को

नहीं कोई पूछने वाला

आतंकी विस्‍फोट में

पैर गंवाने वाले को मिलते पाँच लाख

और सरकारी बस से मौत होने पर

मिलता है एक लाख!

मौत और दुर्घटना में भी

हो रही है सौदेबाजी

अगर शिकार बनना ही है तो

लोग करे प्रकृति से प्रार्थना

मुझे दुर्घटना का शिकार बनाते वक्‍त मेरे खाते में

इतना जरूर लिख देना

जो भी बुरा हो वह विस्‍फोट में हो

नहीं तो सियासत की भेंट चढ़ जाएंगे

मौत पर कम

दुर्घटना पर अधिक मुआवजा पांएगे।

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प्रतिबद्धता

सामान्‍य से कहीं अधिक मजबूत है मेरी प्रतिबद्धता

व्‍यवस्‍था में कुछ काली भेड़ें

भौतिक वस्‍तुओं के माध्‍यम से

राह आसान नहीं होने देती है

पग-पग पर कील और

काटें बोती हैं

छूत और अछूत की माया में

स्‍वेत-श्याम करती है

हवा और पानी पर

कोई रूख तो करे

तभी घर से निकलेगें लोग

तब तक हम चुप क्‍यों रहे

हम अपनी प्रतिबद्धता के कारण लड़ेंगे।

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सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन 120/132, बेलदारी लेन लालबाग, लखनऊ

ramden-a

अर्द्धसत्‍य

इस होली में भइया सुनी है अजब कहानी,

टाप सुरक्षा में आतंकी मांग रहा बिरियानी।


बिरियानी के बाद वह मांगे कुल्‍फी और मलाई,

देश के बच्‍चे दूध को तरसें, उल्‍टे होय पिटाई।


अब तक 36 (करोड़) खरच हो चुके, आगे कब क्‍या होगा?

जब जब वह मुँह खोले भइया मर जाये मेरी नानी।

टाप सुरक्षा में आतंकी मांग रहा बिरियानी॥


कभी तो माँगे मनमोहन को कभी रसगुल्‍ले,

देष के बच्‍चे भूखे बिलखे झूठे करते कुल्‍ले।


बीच बजरिया अगर उसे हम उल्‍टा टंगवा देते,

दहशतगर्दी कम हो जाती, हम भी चैन से सोते।


पर, गल्‍ती मेरी, हमी नपुंसक, हम यह कर ना पाये।

दुनियाँ वाले मटक रहे है देख मेरी नादानी,

कड़ी सुरक्षा में आतंकी मांग रहा बिरियानी॥


रामदीन

जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी,

कृष्णानगर, कानपुर रोड, लखनऊ।

प्रदीप नवीन अपनी खास हास्य व्यंग्य शैली के लिए जाने जाते हैं. उनकी प्रस्तुति भी लाजवाब होती है. उनकी रचनाओं का देख-सुन कर आनंद लें – नीचे दिए गए वीडियो डब्बे पर

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यदि जीवन दुबारा जीने को मिले

: सीमा साहा,

वर्ग : नवम्,

जवाहर नवोदय विद्यालय,

(पश्चिम बंगाल)

जीवन विषम परिस्थितियों का दूसरा नाम है। सुख-दुःख, आशा-निराशा, उत्साह-निरुत्साह आदि क्रमबद्ध रूप से इसके अङ्ग हैं। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में उपर्युक्त परिस्थितियाँ आती ही हैं। मैं भी कोई अपवाद नहीं।

अब तक के जीवन कई भूलें हुईं, कई बार जीवन-पथ पर ठोकर मिले, क ने कहा जीवन व्यर्थ है; पर, क्या जीवन सचमुच व्यर्थ है? मनुष्य तो परिस्थितियों के अधीन होता है। परिस्थितिवश उससे कुछ ऐसा कृत्य हो जाता है, जो बाद में उसके लिए घातक सिद्ध हो जाता है। तो क्या वह गलतियाँ करना छोड़ दे, क्या वह ठोकर न खाए? मैं ऐसा नहीं मानता। ये भूलें, ये गलतियाँ उस व्यक्ति-विशेष के व्यक्तित्व-निर्माण, जीवन-निर्मिति में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। गलतियों से वह सीखता है, ठोकर खाकर संभलता है और इसी बहाने वातावरण से परिचित होता है।

यदि मुझसे कोई पूछे, क्या तुम अब तक के जीवन से सन्तुष्ट हो? क्या तुम्हें तुम्हारा मनचाहा मिल गया? मैं कहूँगा, नहीं। आख़िर कोई कभी सन्तुष्ट हो सकता है भला! मैं भी नहीं हूँ। और जहाँ तक रही इच्छा पूर्ति की बात, तो वह कभी हो भी नहीं सकती। इच्छाओं का पूर्ण होना और सन्तुष्टि प्राप्त करना तो जीवन का अन्त है; और भई, मुझमें तो अदम्य जिजीविषा है।

अतः, यदि मुझे जीवन दुबारा जीने को मिले, तो पुनश्च मैं यही जीवन चाहूँगा, मैं पुनः यही आयुष बनना चाहूँगा। मैं चाहूँगा कि जो दुःख, व्यथा, कष्ट और ठोकर मुझे मिले हैं, वे दुबारा मिलें। क्योंकि, इन सबसे मैंने बहुत कुछ सीखा है। मेरे व्यक्तित्व-निर्माण में, मेरे आचरण-व्यवहार में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। हाँ, एक अतिरिक्त इच्छा अवश्य होगी, यदि जीवन दुबारा जीने को मिले। मैं चाहूँगा कि मेरे कंधे और बलिष्ठ जाएँ ताकि मैं दायित्वों का और अधिक बोझ उठा सकूँ। मैं चाहूँगा कि मेरा हृदय और अधिक विशाल हो ताकि मैं और अधिक दुःख-दैन्य झेल सकूँ। मैं चाहूँगा कि मेरे पादद्वय और अधिक सुदृढ़ हो जाएँ ताकि प्रतिकूल परिस्थितियों के झञ्झावात में भी वे न काँपें। मैं चाहूँगा कि मैं और अधिक स्वप्न देखूँ और उनकी प्राप्ति के निमित्त कठिनतर श्रम कर सकूँ। बस, ये ही कुछ अतिरिक्त कामनाएँ हैं, यदि मुझे जीवन दुबारा जीने को मिले। शेष में कोई परिवर्तन न आए। सुख-दुःख की आँख-मिचौनी, खोले जीवन अपना मुख।[1]


[1] सुमित्रानन्दन पन्त, ‘मैं नहीं चाहता चिर सुख’

मप्र प्रादेशिक लेखक संघ द्वारा आयोजित हास्य व्यंग्य गोष्ठी के अवसर पर मधु सक्सेना द्वारा हास्य व्यंग्य का पाठ किया गया. रेकॉर्डेड वीडियो से हास्य व्यंग्य का आनंद लें-


रघवेन्द्र शर्मा अपने कविता पाठ में पूरी ऊर्जा से निर्मल हास्य – व्यंग्य बिखेरते हैं. एक जलवा देखिए नीचे दिए वीडियो में-


दुनिया या हुसैन हा हुसैन कर रही है. इन सबके बीच जीवन के शतायु को छू रहे हुसैन अपनी कूँची से कला की दुनिया में नित्य नया संसार रच रहे हैं. हुसैन की कला को वरिष्ठ चित्रकार व शिक्षाविद् डॉ. लक्ष्मी नारायण भावसार ने बेहद करीब से देखा-जाना है. हुसैन की कलायात्रा के शुरूआती दौर से ही हुसैन व उनकी कलाकृतियों के साथ व साक्षी रहे एल एन भावसार हुसैन विवाद को एक कलाकार के दृष्टिकोण से देख रहे हैं और बता रहे हैं कि हुसैन तो कला के सागर हैं. विस्तृत साक्षात्कार देखें वीडियो में यू-ट्यूब पर-


जाने माने, सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरि जोशी द्वारा उनके स्वयं के द्वारा किए गए व्यंग्य पाठ  का आनंद लें यूट्यूब वीडियो पर


नुकीले नश्तर युक्त तीखे हास्य व्यंग्य की कविताएँ दीप तलैया की खासियत है. स्मित हास्य से देखें/सुनें उनका हास्य व्यंग्य कविता पाठ -


विजया तैलंग की चुटीली, मजेदार हास्य – व्यंग्य पाठ का आनंद उनके स्वयं के स्वरों से लें. देखें यूट्यूब वीडियो पर -


मनोहर बाथम के बारे में लीलाधर मंडलोई कहते हैं कि वे ऐसे एकमात्र कवि हैं जिनकी कविताओं में सरहद नहीं है, सीमाएँ नहीं हैं. निस्सीम कविताएँ हैं. शायद यही वजह है कि जहाँ अन्य कवियों के कविता संग्रह प्रकाशक का मुंह जोहते रहते हैं, वहीं मनोहर बाथम के एक कविता संग्रह का अंग्रेज़ी समेत दस भारतीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है.

विगत दिवस दुष्यंत कुमार संग्रहालय में अपने कविता संग्रह के लोकार्पण के अवसर पर उन्होंने कविता पाठ किया. रचनाकार के पाठकों के लिए जीवंत प्रसारण प्रस्तुत है :


विगत दिवस दुष्यंत कुमार संग्रहालय, भोपाल में लीलाधर मंडलोई ने अपने किताब के लोकार्पण के अवसर पर जीवन के अपने मार्मिक अनुभवों को भी साझा किया और बताया कि कैसे विदयार्थी जीवन में वे और उनके तीन मित्र एक दफा तीन दिन तक बिना खाए रहे और चौथे दिन भी जो उन तीनों को नसीब हुआ था, वो आधी कटोरी आटे का घोल था. उस वक्त सभी श्रोताओं समेत लीलाधर मंडलोई की आँखें भी नम हो गई थीं. उस अवसर पर उनसे विशेष आग्रह रचनाकार के लिए कविता पाठ के लिए किया गया. प्रस्तुत है उस वक्त सुनाई गई उन्हीं के स्वरों में उनकी कविता-


बच्चों के लिए: लेना-देना

(1)

दिन में जो प्रकाश-पुंज शशि रवि से लेता है ।

रात में वह ही वापस धरती को दे देता है ।।

जल वाष्प रूप में शोषित कर सूरज जो धरा से लेता है ।

घन लेकर उसको धरती पर वापस वर्षा देता है ।।

(2)

लेना-देना, आना-जाना सब संसार चक्र में चलते हैं ।

देकर-लेना, लेकर-देना व्यवहार जगत में मिलते हैं ।।

लाओ ! लेने के चक्कर में लोभी पच-पचकर मरते हैं ।

जो आये काम दूसरों के उसे पर-उपकारी कहते हैं ।

(3)

माता-पिता भी बच्चों पे धन-प्यार निछावर करते हैं ।

बच्चों को खुश रखने हित कष्ट भी सहते रहते हैं ।।

लेकिन कितने हैं ऐसे जो आगे इसे समझते हैं ।

माता-पिता भी बच्चों से कुछ पाने की इच्छा रखते हैं । ।

(4)

जीवन में माँ-बाप सहित हम कितनों के ऋणी होते हैं ।

पा करके सहयोग सभी का जीवन में आगे बढ़ते हैं ।।

माने जो उपकार उसे कृतज्ञ सुजन सब कहते हैं ।

लेकिन देखो आज यहाँ कृतघ्न ही जादा मिलते हैं ।।

(5)

ले-देकर ही देखो हम-सब दुनिया में जीते हैं ।

लेकर के कुछ लोग सदा देने को तत्पर होते हैं ।

लेकिन बहुतेरे ऐसे हैं जो लेकर कभी न देते हैं ।

सच में ही कुछ लोग सदा जगते हुए भी सोते हैं ।

----

- डॉ एस के पाण्डेय,

समशापुर(उ. प्र.) ।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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भारत का बेटा हूं मैं
दिल में ये अरमान है․․․․․․․․․․․․
देश के लिए जियें
देश के लिए मरें
अपना ये ऐलान है․․․․․․․․․

भारत का बेटा हूं मैं․․․․․․․․․․
दिल में ये अरमान है․․․․․․․․․․․․

तीन रंग का अपना तिरंगा
अपनी यही शान है․․․․․․․․․
देश के लिए जियें
देश के लिए मरें
अपना ये ऐलान है․․․․․․․․․

भारत का बेटा हूं मैं․․․․․․․․․․
दिल में ये अरमान है․․․․․․․․․․․․

सारे भारत में गणतन्‍त्र आया
धरती पे आई नई रोशनी
बापू, भगत सिंह, “आजाद“ जैसे
वीरों ने हमको ये दी रोशनी
अमर वो रहेंगे, जन्मों-जन्म तक
कुर्बां हुए हैं, जो देश के लिए
नाम लिखा जाए, स्‍वर्ण अक्षरों में
हंस के हैं मरते, जो देश के लिए
“इण्डिया․․․․ इज द गे्रट“
अपना भारत महान है
देश के लिए जियें
देश के लिए मरें
अपना ये ऐलान है․․․․․․․․․

भारत का बेटा हूं मैं․․․․․․․․․․
दिल में ये अरमान है․․․․․․․․․․․․

गांधीजी सबकी, आंखों के तारे
आये थे बनके वो भगवान न्‍यारे
सत्‍य-अहिंसा के वो पुजारी
आजादी मिली उनके ही सहारे
चोट सह लिया, जवाब नहीं दिया
शान तिरंगे का, ऊंचा किया है
सत्‍य पे चलके, अहिंसा के बल पे
सिर दुश्‍मनों का, नीचा किया है
हम भी हैं भारत के, हमको ये अभिमान है
देश के लिए जियो, देश के लिए मरो
अपना ये ऐलान है․․․․․․․․․․

भारत का बेटा हूं मैं․․․․․․․․․․
दिल में ये अरमान है․․․․․․․․․․․․

- क़ैश जौनपुरी․

Deendayal Sharma (WinCE)_thumb[1]
चेहरे पर ये झुर्रियां कब आ गई,
देखते ही देखते बचपन खा गई.

वक्त बेवक्त हम निहारते हैं आईना,
सूरत पर कैसी ये मुर्दनी छा गई. 

तकाज़ा वक्त का या ख़फ़ा है आईना.
सच की आदत इसकी अब भी ना गई.

है कहाँ हकीम करें इलाज इनका,
पर ढूँढ़ें किस जहाँ क्या जमीं खा गई. 

बरसती खुशियाँ सुहाती बौछार, 
मुझको तो "दीद" मेरी कलम भा गई.



अध्यक्ष, राजस्थान साहित्य परिषद्, 
हनुमानगढ़ जं. - 335512 
http://deendayalsharma.blogspot.com
सृजन : 21 March , 2010, Time : 7:25 AM

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भगवान महावीर

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

भगवान महावीर जैन धर्म के प्रवर्तक नहीं हैं। वे प्रवर्तमान काल के चौबीसवें तीर्थंकर हैं। आपने आत्‍मजय की साधना को अपने ही पुरुषार्थ एवं चारित्र्य से सिद्ध करने की विचारणा को लोकोन्‍मुख बनाकर, भारतीय साधना परम्‍परा में कीर्तिमान स्‍थापित किया। आपने धर्म के क्षेत्र में मंगल क्रान्‍ति सम्‍पन्‍न की। आपने उद्‌घोष किया कि आँख मूँदकर किसी का अनुकरण या अनुसरण मत करो। धर्म दिखावा नहीं है, रूढ़ि नहीं है, प्रदर्शन नहीं है, किसी के भी प्रति घृणा एवं द्वेषभाव नहीं है। आपने धर्मों के आपसी भेदों के विरुद्ध आवाज उठाई। धर्म को कर्म-कांडों, अन्‍ध विश्‍वासों, पुरोहितों के शोषण तथा भाग्‍यवाद की अकर्मण्‍यता की जंजीरों के जाल से बाहर निकाला। आपने घोषणा की कि धर्म उत्‍कृष्‍ट मंगल है। धर्म एक ऐसा पवित्र अनुष्‍ठान है जिससे आत्‍मा का शुद्धिकरण होता है। धर्म न कहीं गाँव में होता है और न कहीं जंगल में, बल्‍कि वह तो अन्‍तरात्‍मा में होता है। साधना की सिद्धि परमशक्‍ति का अवतार बनकर जन्‍म लेने में अथवा साधना के बाद परमात्‍मा में विलीन हो जाने में नहीं है, बहिरात्‍मा के अन्‍तरात्‍मा की प्रक्रिया से गुजरकर स्‍वयं परमात्‍मा हो जाने में है। वर्तमान में जैन भजनों में भगवान महावीर को ‘अवतारी' वर्णित किया जा रहा है। यह मिथ्‍या ज्ञान का प्रतिफल है। वास्‍तव में भगवान महावीर का जन्‍म किसी अवतार का पृथ्‍वी पर शरीर धारण करना नहीं है। उनका जन्‍म नारायण का नर शरीर धारण करना नहीं है, नर का ही नारायण हो जाना है। परमात्‍म शक्‍ति का आकाश से पृथ्‍वी पर अवतरण नहीं है। कारण-परमात्‍मास्‍वरूप का उत्‍तारण द्वारा कार्य-परमात्‍मस्‍वरूप होकर सिद्धालय में जाकर अवस्‍थित होना है। भगवान महावीर की क्रान्‍तिकारी अवधारणा थी कि जीवात्‍मा ही ब्रह्‌म है। आत्‍मा ही सर्वकर्मों का नाश कर सिद्ध लोक में सिद्ध पद प्राप्‍त करती है। इस अवधारणा के आधार पर उन्‍होंने प्रतिपादित किया कि कल्‍पित एवं सर्जित शक्‍तियों के पूजन से नहीं अपितु अन्‍तरात्‍मा के सम्‍यग्‌ ज्ञान, सम्‍यग्‌ दर्शन एवं सम्‍यग्‌ चारित्र्य से ही आत्‍म साक्षात्‍कार सम्‍भव है, उच्‍चतम विकास सम्‍भव है।

भगवान महावीर ने सभी के लिए धर्माचरण के नियम बनाए। आपने ने पहचाना कि धर्म साधना केवल सन्यासियों एवं मुनियों के लिए ही नहीं अपितु गृहस्‍थों के लिए भी आवश्‍यक है। इसी कारण आपने संयस्‍तों के लिए महाव्रतों के आचरण का विधान किया तथा गृहस्‍थों के लिए अणुव्रतों के पालन का विधान किया। धर्म केवल पुरुषों के लिए ही नहीं, स्‍त्रियों के लिए भी आवश्‍यक है।। चन्‍दनबाला को आर्यिका/ साध्‍वी संघ की प्रथम सदस्‍या बनाकर आपने स्‍त्रियों के लिए अलग संघ बनाया । उनके युग में नारी की स्‍थिति सम्‍भवतः सम्‍मानजनक नहीं थी। भगवान महावीर के संध में मुनियों एवं श्रावकों की अपेक्षा आर्यिकाओं / साध्‍वियों एवं श्राविकाओ की कई गुनी संख्‍या का होना इस बात का प्रमाण है कि युगीन नारी- जाति महावीर की देशना से कितना अधिक भावित हुई।

भगवान महावीर का संदेश प्राणी मात्र के कल्‍याण के लिए है। उन्‍होंने मनुय-मनुष्‍य के बीच भेदभाव की सभी दीवारों को ध्‍वस्‍त किया। उन्होंने जन्‍मना वर्ण व्‍यवस्‍था का विरोध किया। इस विश्‍व में न कोई प्राणी बड़ा है और न कोई छोटा। उन्होंने गुण-कर्म के आधार पर मनुष्‍य के महत्‍व का प्रतिपादन किया। ऊँच-नीच, उन्‍नत-अवनत, छोटे-बड़े सभी अपने कर्मों से बनते हैं। जातिवाद अतात्‍विक है। सभी समान हैं। न कोई छोटा, न कोई बड़ा। भगवान की दृष्‍टि समभावी थी- सर्वत्र समता-भाव। वे सम्‍पूर्ण विश्‍व को समभाव से देखने वाले साधक थे, समता का आचरण करने वाले साधक थे। उनका प्रतिमान था - जो व्‍यक्‍ति अपने संस्‍कारों का निर्माण करता है, वही साधना का अधिकारी है। उनकी वाणी ने प्राणी मात्र के जीवन में मंगल प्रभात का उदय किया।

जब भगवान से यह जिज्ञासा व्‍यक्‍त की गई कि आत्‍मा आँखों से नहीं दिखाई देती तथा इस आधार पर आत्‍मा के अस्‍तित्‍व के सम्‍बन्‍ध में शंका व्‍यक्‍त की गई तो भगवान ने उत्‍तर दिया ः ‘ भवन के सब दरवाजे एवं खिड़कियाँ बन्‍द करने के बाद भी जब भवन के अन्‍दर संगीत की मधुर ध्‍वनि होती है तब आप उसे भवन के बाहर निकलते हुए नहीं देख पाते। आँखों से दिखाई न पड़ने के बावजूद संगीत की मधुर ध्‍वनि बाहर खड़े श्रोताओं को आच्‍छादित करती है। संगीत की ध्‍वनि पौद्‌गलिक (भौतिक द्रव्‍य) है। आत्‍मा अरूपी एवं अमूर्त्तिक है। आँखें अरूपी आत्‍मा को किस प्रकार देख सकती हैं? अमूर्त्तिक आत्‍मा का इन्‍द्रिय दर्शन नहीं होता, अनुभूति होती है। प्रत्‍येक आत्‍मा में परम ज्‍योति समाहित है। प्रत्‍येक चेतन में परम चेतन समाहित है। प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति स्‍वयं में स्‍वतंत्र, मुक्‍त, निर्लेप एवं निर्विकार है। प्रत्‍येक आत्‍मा अपने पुरुषार्थ से परमात्‍मा बन सकती है। शुद्ध तात्‍विक दृष्‍टि से जो परमात्‍मा है वही मैं हूँ और जो मैं हूँ वही परमात्‍मा हैं। मनुष्‍य अपने सत्‍कर्म से उन्‍नत होता है। भगवान महावीर ने स्‍पष्‍ट रूप में प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति को मुक्‍त होने का अधिकार प्रदान किया। मुक्‍ति दया का दान नहीं है, यह प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति का जन्‍म सिद्ध अधिकार है। जो आत्‍मा बंध का कर्ता है, वही आत्‍मा बंधन से मुक्‍ति प्रदाता है। मनुष्‍य अपने भाग्‍य का निर्माता है। मनुष्‍य अपने भाग्‍य का नियंता है। मनुष्‍य अपने भाग्‍य का विधाता है। भगवान महावीर का कर्मवाद भाग्‍यवाद नहीं है, भाग्‍य का निर्माता है। भगवान महावीर ने अहिंसा की परिधि को विस्‍तार दिया। आपकी अहिंसा दया एवं करुणा पर आधारित नहीं है, मैत्री भाव पर आधारित है। आपकी अहिंसा का चिन्‍तन प्राणी मात्र के प्रति आत्‍म -तुल्‍यता एवं बंधुभाव की सहज प्रेरणा प्रदान करता है।

आपने अहिंसा को परम धर्म के रूप में मान्‍यता प्रदान कर, धर्म की सामाजिक भूमिका को रेखांकित किया। आर्थिक विषमताओं के समाधान का रास्‍ता परिग्रह-परिमाण-व्रत के विधान द्वारा निकाला। वैचारिक क्षेत्र में अहिंसावाद स्‍थापित करने के लिए अनेकांतवादी जीवन दृष्‍टि प्रदान की। व्‍यक्‍ति की समस्‍त जिज्ञासाओं का समाधान स्‍याद्‌वाद की अभिव्‍यक्‍ति के मार्ग को अपनाकर किया। प्रत्‍येक वस्‍तु में अनेक गुण धर्म होते हैं। इस कारण हमें किसी वस्‍तु पर ‘एकांत' दृष्‍टि से नहीं अपितु अनेकांत दृष्‍टि से विचार करना चाहिए। अनेकांत एकांगी एवं आग्रह के विपरीत समग्रबोध एवं अनाग्रह का द्‌योतक है। इसी प्रकार ‘स्‍याद्‌वाद' के ‘स्‍यात्‌' निपात का अर्थ है - अपेक्षा से। स्‍याद्‌वाद का अर्थ है - अपेक्षा से कथन करने की विधि या पद्धति। अनेक गुण-धर्म वाली वस्‍तु के प्रत्‍येक गुण-धर्म को अपेक्षा से कथन करने की पद्धति। प्रतीयमान विरोधी दर्शनों में अनेकांत दृष्‍टि से समन्‍वय स्‍थापित कर सर्वधर्म समभाव की आधारशिला रखी जा सकती है।

मानव की मूलभूत भौतिक आवश्‍यकताओं एवं मानसिक आकांक्षाओं को पूरा करने वाली न्‍यायसंगत विश्‍व व्‍यवस्‍था की स्‍थापना अहिंसा मूलक जीवन दर्शन के आधार पर सम्‍भव है। भौतिकवादी दृष्‍टि है - योग्‍यतम की उत्‍तरजीविता। इसके विपरीत भगवान महावीर की दृष्‍टि है - विश्‍व के सभी पदार्थ परस्‍पर उपकारक हैं। भौतिकवादी दृष्‍टि संघर्ष एवं दोहन की वृत्‍तियों का संचार करती है। अहिंसा की भावना पर आधारित विश्‍व शान्‍ति की प्रासंगिकता, सार्थकता एवं प्रयोजनशीलता स्‍वयंसिद्ध है। विश्‍व शान्‍ति की सार्थकता एक नए विश्‍व के निर्माण में है जिसके लिए विश्‍व के सभी देशों में सद्‌भावना का विकास आवश्‍यक है। सह-अस्‍तित्‍व की परिपुष्‍टि के लिए आत्‍म तुल्‍यता एवं समभाव की विचारणा का पल्‍लवन आवश्‍यक है। अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सद्‌भावना के लिए विश्‍व बंधुत्‍व की भावना का पल्‍लवन आवश्‍यक है। आज के युग ने मशीनी सभ्‍यता के चरम विकास से सम्‍भावित विनाश के जिस राक्षस को उत्‍पन्‍न कर लिया है वह किसी यंत्र से नहीं, अपितु ‘अहिंसा-'मंत्र' से ही नष्‍ट हो सकता है। भगवान महावीर ने प्राणी मात्र के कल्‍याण के लिए आत्‍मतुल्‍यता एवं अनेकांतवाद की लेखनी से अहिंसा, सत्‍य एवं अपरिग्रह के पृष्‍ठों पर स्‍याद्‌वाद की स्‍याही से धर्म-आचरण का जो प्रतिमान एवं कीर्तिमान प्रस्‍थापित किया है वह सर्वोद; का कारक बने - मेरी यही मंगल कामना है।

कुछ तो प्रतिदान जरूरी है,

जिन्दा रिश्तों की मजबूरी है.


दिल मेरा नवनीत-नरम है,

बस बातें तेरी छुरी है.


नकली वन में नकली मृग है

नहीं नाभी में अब कस्तूरी  है.


अभी बहुत बातें  कहनी है,

ये बातें अभी अधूरी  है.


फरियादी ना-उम्मीद हो बैठे ,

अभियुक्त के परिजन 'ज्यूरी' है.


खरी-खरी अब किसे है भाती

सब होठों पे जी- हजूरी है.


नफ़रत का दामन मत थामो

प्रीत ही जग की धुरी  है.


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विजय कुमार वर्मा ,डी एम्  डी -३१-बी

डी भी  सी ,बोकारो THERMAL

बचपन

पढ़ते-पढ़ते याद आ गयी

बचपन की यादें फिर से छा गयी.


मेरा रोना और उफ़ करना ,

माँ- पापा का चुप - चुप कहना .


भाई-बहन संग धींगा - मस्ती ,

बचपन की थी अलग ही हस्ती,


बचपन की यादें आती मुझे  ,

वापस बचपन में जाने का ,

अब तो कोई राह ना सूझे .


आसमां में उड़ने का ,

अब भी रखती हूँ मैं हौसला

पर चार-चार टेस्ट लेने का ,

स्कूल का है आया है फैसला

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शेफाली वर्मा ,क्लास -६, डी ,ए भी, कथारा,बेरमो,

कौआ काका

बच्चों देखो कौआ आया
चोंच में अपनी रोटी लाया।

खाली रहना इसका काम
जगत में अमर है इसका नाम।

बड़ा आलसी जीव निराला
काली-काली चोंच वाला।

मेहनत से है यह घबराता
सदा चुराकर रोटी खाता।

गर मेहनत से घबराओगे
कौआ काका कहलाओगे।

डॉ0 राजेश कुमार मिश्र

Image025 (Mobile)

किसी देश के किसी प्रांत की किसी राजधानी में एक विधान सभा थी। विधान सभा वैधानिक कार्यों के लिए थी मगर प्रजातंत्र का आनंद था। सभी तरह के कार्य आसानी से और बिना रोक - टोक के सम्पन्न होते रहते थे। ऐसे ही एक दिन विधान सभा की बैठक के दौरान एक माननीय सदस्य ने एक सुरक्षा कर्मचारी की पैंट उतार कर हवा में उछाल दी। पैंट उछली मानो लोकतंत्र की टोपी उछली, मगर केवल उछली नहीं, पैंट उछल कर आसन की टेबल पर गिरी, मानो प्रजातंत्र की भैंस पानी में पड़ गयी।
मैं इस सम्पूर्ण घटनाक्रम का दूरदर्शी गवाह था। दूरदर्शन के सभी चैनल इस पराक्रमी घटना क्रम को बार-बार दिखा रहे थे। मैं और मेरे जैसे लाखों-करोड़ेां जनमानसों के सिर शर्म से झुक जा रहे थे। समझ में नहीं आ रहा था। लोकतंत्र की लँगोट खोल कर ये जन-प्रतिनिधि क्या दिखाना चाहते हैं।
मैं जन्मजात मूर्ख इस सम्पूर्ण घटनाक्रम पर चर्चा के लिए उतावला था। एक जन-प्रतिनिधि जो अभी-अभी लाउन्ज में आये थे, से पूछ बैठा-'' प्रभु! ये क्या हो रहा है। सभा में लोकतंत्र को नंगा करने के प्रयास क्यों हो रहे हैं ?''
   ''तुम नहीं समझोगे, जो स्वयं नंगा नहीं होना चाहते वो लोकतंत्र को नंगा कर देते हैं।''
   ''आलोचकों का काम आलोचना करना है। हमारा काम सरकार बचाना या सरकार बनाना है। बचाने और बनाने के इस चक्रव्यूह में अभिमन्यु मर सकते हैं, लोकतंत्र नंगा हो सकता है। और ज्यादा आवश्यकता हुई तो सभी सत्ता को लालायित प्रतिनिधि शक्ति का नंगा नाच दिखा सकते हैं, समझे!'' ये कह कर वे वापस भवन के अन्दर चले गये। मैं फिर सोचने लगा, आजादी के इतनें सालों में लोकतंत्र की अर्थी निकालना चाहते हैं क्या ? तभी देखा कि एक मंत्री जी आ रहे हैं, मैंने उनसे भी पूछा-
   ''ये लोकतंत्र की लँगोट क्यों दिखाई जा रही है।''
   ''तुम फिर आ गये । मार्शल इसे बाहर निकालो ।''
मैं अपमानित होकर भागा। इसी बीच मुझे एक गाने के बोल सुनाई दिये। चप्पा-चप्पा चांदी चले । मैंने गाने वालों से कहा, सही पंक्ति इस प्रकार है- ''चप्पा चप्पा चरखा चले।'' लेकिन वो बोल पड़ा।
   'तुम बुद्धिजीवी मूर्ख ही रहोगे। देखते नहीं , हमने चरख़े के स्थान पर चाँदी रख दी है और सभी सत्ताधारी चरखे के बजाय चाँदी काटने में व्यस्त हैं। चरखा कातने में क्या रखा है। सुबह से शाम तक चरखा कातो, एक भी चादर नहीं बनती, लेकिन यदि चाँदी काटो तो कार, कामिनी, कोठी, कंचन सब आ जाता है। अतः तुम भी गाओ।
   '' चप्पा चप्पा चाँदी चले।'' यह कहकर वे चाँदी काटने एक बड़े मंत्री के कक्ष में घुस गये।
लेकिन लोकतंत्र की लँगोट, लुंगी या पैंट पड़ी-पड़ी सिसक रही है। इस देश में लोकतंत्र की साड़ी भी कराह रही है। आजादी के पचास वर्षों में गांधी जी की लँगोट से चल कर हम लोकतंत्र की लँगोट तक पहुंच गये हैं। चरखे से चाँदी तक का सफर हमने तय कर लिया है। क्या लोकतंत्र का यही हश्र होना था। संविधान का यही सत्य है। शायद नहीं, क्योंकि लोकतंत्र का सम्पूर्ण सत्य नहीं है यह, यह तो केवल अर्ध सत्य है और अर्ध सत्य में यथार्थ नहीं होता, लोकतंत्र का सम्पूर्ण सत्य तो जनता के पास है, वह लोकतंत्र को नंगा नहीं देख सकती है। वह लोकतंत्र को वस्त्र पहनायेगी, वापस उसे उच्च स्थान पर आसीन करेगी। लोकतंत्र का पूर्ण सत्य लोक में सुरक्षित है, था और रहेगा । लोकतंत्र की लँगोट खोलने वालों सावधान!

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यशवन्त कोठारी
86, लक्ष्मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर
जयपुर 302002 फोन 2670596

shrimaan shrimati 

श्रीमान श्रीमती

श्रीमती जी सखियों संग बतिया रहीं थीं

पति की सख्ती के किस्से सुना रही थीं.  

कहतीं हमारे वो तो बड़े सख़्त मिज़ाज हैं
सुबह आठ बजे चाहिए उन्हें ब्रेकफ़स्ट है.

कहते हैं सुबह सवेरे झाड़ू पोंछा लगाओ
वरना टिकट तुम अपने मायके का कटवाओ.

अरी इक पल भी मैं चैन से रह नही पाती
उनको तो चाहिए गर्मा गर्म चपाती.

पर जब हमने देखा उनके श्रीमान जी का हाल
तो हमारी आँखों में उतर आया सैलाब.

बेचारे सुबह सुबह झाड़ू लगा रहे थे

आँगन को अपने आँसुओं से नहला रहे थे.

जब थक कर हुए बेहाल तो बोले
श्रीमती जी बज गये हैं बारह
कुछ खाने का प्रबंध करो हमारा.


तो श्रीमती जी बोलीं आकर तैश में
दिखता नहीं बैठे हो बड़ी ऐश में.

अभी अभी पड़ोसन के घर से आई हूँ
पढ़ने को नई नई गृहशोभा लाई हूँ.

सारा दिन निठल्लों की तरह पड़े रहते हो
हर काम मुझे ही करने को कहते हो.

जाओ फ्रिज में रात का खाना पड़ा है खा लो
फिर मेरे लिए एक फ्रेश सैंडविच बना दो.


मेरे पहाड़

इस
तपते धरातल पर
याद आते हैं
मुझे मेरे पहाड़

वहां था जीवन
सुखद और शांत
अपनापन, ईमानदारी
और प्यार

परेशानी में याद आते हैं
वहाँ के लोग
जो सुख बाँटने में
दुख जाते थे भूल

होली में उड़ते

गुलाल
बसंत में फूलों की

बहार
जेठ की गर्मी में

ठंडी हवाएँ
मंदिर की घंटी में

माँ की दुआएं

दीवाली में जलते

जगमग दीप
लोहड़ी पर गाते थे
हम गीत

परंतु सफलता की

दौड़ में
आना पड़ा वो स्वर्ग
छोड़ के
पर लौट के
फिर जाऊंगी वहाँ
अपनों को

मैं पाऊँगी जहाँ

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डॉ. अमिता कौंडल

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कनकलता पैंतालीस-छियालीस साल की एक सुशिक्षित संभ्रात महिला। अच्‍छी मां, सुघड गृहिणी। घर के कामकाज में पारंगत। जैसी नियमित दिनचर्या उसी के अनुरूप सलीके से व्‍यवस्‍थित घर। आदर्श पत्‍नी के रूप में पति की आज्ञाकारी भी वे रहीं, पर भला पति का साथ उन्‍हें मिला ही कितना...., मात्र सात साल। तभी से उनके भावविहीन गौरवर्णी गोल चेहरे पर दुख दर्द की परत ठहरी हुई है। इधर ठहराव के बावजूद कैसे पंख लगाकार फुर्र हो गए बीस-इक्‍कीस साल....।

आज सुबह कनकलता की नजर जब अखबार की मुख्‍य हेडलाइन पर ठहरी ‘95 साल की महिला सती, बेटों ने ही मां को सती होने के लिये उकसाया' तो उनका मस्‍तिष्‍क बुरी तरह परेशान हो गया। सती होने वाली घटनाओं से संबंधित समाचार पढ़कर वे अक्‍सर भीतर तक दहल जाया करती हैं। आज से ठीक बीस साल पहले राजस्‍थान के दिवराला गांव में रूपकुंवर के सती होने की घटना सामने आई थी तब भी वे परेशान हो उठी थीं। कैसे अठारह-उन्‍नीस साल की यौवन ग्रहण कर रही नवौढ़ा रूपकुंवर को पति की चिता के साथ जल जाने के लिये लाखों लोगों के बीच चूनरी रस्‍म का आयोजन किया गया। ढोल धमाकों के बीच सती होने के लिये उकसाकर लाचार बना दी गई देह को लकड़ी के भारी गट्‌ठरों के बीच दाब दिया गया। फिर देवर ने ही जिंदा औरत को मुखािग्‍न दे दी। कहा तो यह जा रहा था कि सती के ‘सत' से आग निकलेगी ? पर सती के सत से कभी आग निकलती है भला ? वह तो पाखंडियों द्वारा आग निकलने का आडम्‍बर रच दिया जाता है। रूपकंुवर के शरीर ने जब आंच पकड़ी तो वह रहम की भीख मांगती हुई मद्‌द के लिये चिल्‍लाई भी थी। पर सती के बहाने हत्‍या के लिये आमादा खडे़ निर्मम पाखंडियों ने रूपकुंवर को लकडियां बिखेरकर चिता कहां फलांगने दी। देखते-देखते सती माता के आकाश चीरतें जयकारों के बीच दया की गुहार लगाती दर्दनाक चीखें खामोश होती चली गईं। एक समूची दुल्‍हन के रूप श्रृंगार से सुज्‍जित स्‍त्री-देह आग की लपटों के हवाले थी। काश रूपकुंवर को रीति-रिवाज और खोखली परंपराओं की निष्‍ठुर आग से बचाने के लिये कनकलता के ससुराल वालों की तरह रूपकुंवर के परिजन भी आड़े आ गए होते ? पर अनायास गौरवशाली जातीय परंपराओं की भावनाओं के वशीभूत कर दी जाने वाली स्‍त्रियां कनकलता की तरह सौभाग्‍यशाली कहां होती हैं ? ज्‍यादातर मामलों में सती हो जाने वाली स्‍त्रियों के परिजन ही सामाजिक मान्‍यताओं और परिस्‍थितियों के दास होकर सती हो जाने का माहौल निर्मित करने में सहायक हो जाते हैं। रूपकुंवर की चूनरी रस्‍म उसके पिता ने ही की थी। और अब पिनचानवें साल की कुरइया देवी को चिता के हवाले उसके चार बेटों ने ही किया।

कनकलता के मन मस्‍तिष्‍क में यादें के खुलासा करते हुये जीवंत हो उठी है....। इक्‍कीस साल पहले उस दिन संतान सातें थी। और कनकलता अपने मायके भितरवार में थी। भितरवार, बुन्‍देलखण्‍ड के प्रभाव क्ष्‍ोत्र में होने के कारण पारंपरिक पर्व त्‍यौहार, रीति रिवाज और मान्‍यताओं से कहीं गहरा वास्‍ता रखने वाला क्ष्‍ोत्र। संतान सातें यानी अपनी पुत्र संतानों में गुणकारी चरित्र प्रवाहित करने के लिये अलौकिक शक्‍ति से प्रार्थना एवं उपासना का दिन। कनकलता ने दोनों बेटों पियूष और कुणाल की लंबी उम्र और मेधावी बुद्धी के लिये व्रत रखा। वहीं कनकलता के चार बहिनों की पीठ पर इकलौते भाई के लिये उसकी मां ने भी व्रत रखा। उस दिन मां बेटी ने सुबह जल्‍दी उठकर दिनचयाएं निपटाने के बाद श्रृंगार किया। कनकलता ने गहरी नारंगी साड़ी पहनी। मेंहदी महावर रचाया। मांग में चुटकी भर सिंदूर की लंबी रेखा, पति की लंबी आयु के लिये खींची। माथे पर गोल टिकी जड़ी। सवा-सवा तौले की चांदी की चूड़ियां कलाइर्यों में पहनीं। सात और पांच साल के बेटों के लिये कढ़ाही में आसें (पूड़ियां) तलीं। गुड और कठिया गेहूं के चून में सनी आसें। फिर गोबर से लिपे आंगन में चौक (रंगोली) पूरकर पटा रखा गया। पटे पर आले से उठाकर पीतल के छोटे-छोटे भगवान विराजे गए। आसें रखी गईं। कलश में आम के पत्‍तों का झोंरा रख नारियल रखा गया। तब संतान सातें की कथा वांचकर पूजा पूर्ण हुई। नारियल फोड़कर बेटों को तिलक किया और उन्‍हें आसें खिलाईं। कनकलता मां और बहनें आंगन में ही बैठ मंगल गीत-गा रही थीं, तभी यकायक कनकलता के देवर रामगोपाल आंगन में आ खडे़ हुये। चारों बहिनें और मां अगवानी को तत्‍पर। देखा शांत रामगोपाल संपूर्ण संयम बरतते हुए बुद्‌बुदाने की कोशिश तो कर रहे हैं, पर बोल नहीं फूट रहे। फिर बमुश्‍किल बोलें, ‘‘भाभी तत्‍काल मुरैना चलना है।''

मस्‍तिष्‍क में आसन्‍न आशंकाओं के उठते विवर्तों के बीच चैन खो रही कनकलता बोली, ‘‘क्‍यों'' ? और उसने फिर अनुभव किया जैसे देवर लाला भीतर से उठ रहे किसी गुबार को जबरन साधने की कोशिश में लगे हैं।

कनकलता ने फिर उत्‍तर की प्रतीक्षा नहीं की। वह आशंकित हो गई जरूर कोंई अनहोनी घटित हुई है। कनकलता मां से निर्णायक स्‍वर में बोली, ‘‘मैं जा रही हूं मां।''

-‘‘तेरे पिता को तो आ जाने दे।''

-‘‘उन्‍हें भी मुरैना भेज देना।'' रामगोपाल बोले थे।

रामगोपाल पलटकर बाहर हो गए। पीछे-पीछे दोनों बेटों को लगभग घसीटती सी कनकलता थी।

बेचारी कनकलता का भाग्‍य जैसे किसी शरारती घोडे़ की तरह बिदक रहा है। भाग्‍य तो शायद पहले से ही बिदका हुआ था। सनत की वह जब ब्‍याहता बनी थी तब अपने भाग्‍य पर सखी सहेलियों के बीच खूब इतरायी थी। कुमारियां कल्‍पनाओं में जिस राजकुमार के ख्‍वाब देखा करती हंै सनतकुमार उन्‍हीं कल्‍पनाओं के साक्षी थे। एकदम अपेक्षित आकांक्षाओं के भव्‍य और दिव्‍य पुरूष। थे भी इंजीनियर। अच्‍छा वेतन। ऊपरी आमदनी अलग से। सब कुशल था। लेकिन विवाह के सात माह बाद जब कनकलता ने सतमासा बच्‍चा जन्‍मा तो सनत को नई-नई आशंकाओं ने घेर लिया। वे अपने ही अंश से उत्‍पन्‍न पुत्र को अवैध करार देते-देते लगभग बौरा गए। बौराई बुद्धि के उपचार के लिये सासू मां ने जब संदूक से मनोरोग चिकित्‍सक डाॅ. मल्‍होत्रा के पुराने पचोंर् की फाइल निकालकर देवर जी को दी तब कहीं रहस्‍य खुला कि सनत के मन की नम धारा पर मनोविकार के पौधे पिछले कई सालों से गहरी जडें जमाए हुए हैं। और अब जब भी अपनी इच्‍छाओं के विरूद्ध कोई अनहोनी घटित देखते हैं तो मन पर से बुद्धि का नियंत्रण दूर हो जाता है और वे सनक के दायरे में आने वाले ऊटपटांग बकने लगते हैं। विवाह से पूर्व सनत की सनक को कनकलता और उसके परिजनों से छिपाया गया था। बेचारी कनकलता माथा पकड़कर भाग्‍य को कोसती वेबस रह गई। अब सफाई दे भी तो किसे ? और सफाई सुने भी तो कौन ? जिस पति की काबिलियत पर कल तक कनकलता इतराती थी आज उसी की हरकतों को सामान्‍य व्‍यवहार जताकर छिपाने की नाकाम कोशिश करती रहती है। औरत की जिंदगी की विचित्र बिडम्‍बना है यह। लेकिन उसकी भी अपनी स्‍वार्थ भावनाएं हैं जो उसे पुरूष की प्रतिच्‍छाया बनी रहने के लिए मजबूर बनाएं रखती हैं।

कलंक दंश झेलती कनकलता बौराई अवस्‍था में भी पति का साथ निभाती रही। इस बौराई अवस्‍था में भी दैहिक सुख के लिये गोंच की तरह कैसे उसकी देह से चिपटे रहते थे सनत। काम सुख के दौरान पवित्रता-अपवित्रता का सनत की बौराई बुद्धि को भी कहां खयाल रहता था ? डाॅ. मल्‍हौत्रा मैडम के उपचार से सनत साल छह माह के लिये ठीक हो जाते और जब कभी कोई बात कांटे की तरह चुभ जाती तो फिर खिसक जाते। कठिन परिस्‍थितियों से समझौता करती कनकलता चार साल बाद एक और बेटे की मां बनी। नवजात शिशु की शक्‍ल ने जब हुबहू बड़े बेटे की शक्‍ल से मेल खाया तो सनत की शंकाऐं कहीं उन्‍हीं के शरीर में कहीं डूब गईं। कनकलता ने चैन की सांस ली और जीवन फिर पटरी पर आ गया। पर सनत का तबादला जब एकाएक दूरदराज सतना कर दिया गया तो मनस्‍थिति फिर विचलित होकर बौराने लगी। सतना में उनका मन नहीं लगता। बच्‍चों का बहाना लेकर बार-बार भाग आते। पसोंर् ही तो सनत कुतुब एक्‍सप्रेस से सतना गए थे। फिर क्‍या वे लौट आए और लौटने के बाद उन्‍होंने कहीं कुछ कर तो नहीं लिया.....? क्‍योंकि वे अकसर रेल से कटकर मर जाने की धौंस दिया करते हैं।

मुरैना घर के पास पहुंचने पर कनकलता हैरान....., भयभित ! परिचित अपरिचित लोगों की भीड़। मातमी सन्‍नाटा। कनकलता आगे बढी तो लोगों ने गैल छोड़ दी। कनकलता आंगन में पहुंची तो देखा मुंह में पल्‍लू दबाए बैठी औरतों से आंगन ठसा था। सभी औरतें उसे ही विचित्र निगाहों से देखे जा रही थीं। कनकलता समझ गई सनत के साथ कोई न कोई अनहोनी घट चुकी है। खुद को संभालती वह भीतर के कमरे थी। कमरे के कोने में वह दीवार के सहारे खड़ी हुई और फिर दीवार के सहारे ही खिसककर बैठ गई। सासू मां भीतर आई तो कनकलता ने पूछा, ‘‘क्‍या हुआ अम्‍मां ?''

- ‘‘का मुंह से कहूं दतिया बारी तेरे करम फूट गए।'' और सासू मां छाती पीटकर बुक्‍का फाड़ रो पड़ी। उन्‍हें संभालने को बुजुर्ग औरतें दौड़ी आईं। प्रलाप करती हुईं वे बेटे की मौत रहस्‍य भी उजागर करती जा रही थीं, ‘‘सबेरेईं कुतुब से लौटो हतो.......। केततो अम्‍मां मोय कलसेई जा भ्‍यास रई ती कि कनकलता....ए.....और दोनों मोड़ा......ने........काउ ने तलवार से काट दये.......। बाबूजी गोपाल के संग ग्‍वालियर दिखा लावे के इंतजाम में लगेई हते.....,के जाने कब पिछवाडे़ के किवाड़ खोल निकर गओ...। फिर कछु देर में तो खबर...ई....आ गई के सनत रेल से कट मरो.....। कौन बुरी घड़ी आन परी भगवान....रक्षा करिओंं...।''

इतना सब घटने के बावजूद कनकलता बेअसर, शांत। आल्‍ती-पाल्‍ती मारे प्राणायाम की मुद्रा में धीर-गंभीर।

कोई आंसू नहीं। पति का साथ छोड़ देने का रूदन-क्रंदन नहीं। उसका आभामण्‍डल चेहरे की लालिमा से जैसे अलौकिकता लिए दीप्‍त हो उठा हो...। कनकलता की तात्‍कालिक परिस्‍थितियों में निर्लिप्‍त, निर्विकार हालत देख आंगन में बैठी औरतें फुसफुसाई भीं, ‘‘कैसी विचित्र औरत है भर जवानी में आदमी के मर जाने पर भी आंसू नहीं फूट रहे।'' जितने मुंह, उतनी बातें।

लगभग दिव्‍य प्रतिमा में परिवर्तित कनकलता किसी साध्‍वी की तरह बोली, ‘‘हमें मालूम था यही होना है। हम भी जाऐंगे। हमारा उनसे वादा था। हम उन्‍हीं के साथ जाऐंगे। सती होएंगे। हमें वहां ले चलो जहां हमारे परमेश्‍वर का शरीर रखा है। आप लोग रोऐं नहीं, शांत रहें। जल्‍दी करो, हमें पति देवता के पास ले चलो.....।''

कनकलता एकदम उठी और बाहर की ओर दौड़ पड़ी। उसकी सास जिठानी और भतीजियों ने उसे हाथ पकडकर थाम लिया। सास बोली, ‘‘ऐसा नहीं करते बेटी, बच्‍चों की तरफ देख, बाप का साया तो उठ ही गया तेरा और उठ जाएगा तो इन दुधमुंहों को कौन पालेगा..., दुलारेगा...?''

- ‘‘कोई फिकर नहीं अम्‍मां, उनके सब हैं। दादा दादी हैं। नाना-नानी हैं। काका-काकी हैं। इन सब बुजुर्गों का आशीर्वाद उन पर रहेगा ही..., फिर ईश्वर मालिक है। हमें किसी से कोई मोह नहीं...? हम जाऐंगे। हमें जाने दो। अब हमें दुनिया की कोई ताकत सती होने से नहीं रोक सकती। यही इर्श्‍वर इच्‍छा है।''

- ‘‘हमरे तो वैसेई जवान मोडा के भर बुढापे में साथ छोड़ जाने से प्राण हलक में आ अटके हैं। हमरे अब कछु बसकी नई रई। अब तो इर्श्‍वर से एकई प्रार्थना है जल्‍दई प्राण हर ले, तासे बचो-खुचो जो जनम सुधर जाए। बुद्धि संयम से काम ले बहू और बच्‍चों की ओर देख...।'' सासू मां ने खुद को संयत करते हुए कनकलता को समझाइस दी। संवाद प्रति संवादों का दौर जारी रहा।

कनकलता का पति के प्रति अतिरिक्‍त लगाव से सनाका खिंच गया। कुछ महिलाऐं उसे संभाल रही थीं तो कुछ सती की शक्‍ति समझ सहमकर पीछे हट गईं थीं, कहीं सती का श्राप न लग जाए। कुछ ही पलों में कनकलता के सती होने की खबर घर से बाहर आई तो देखते-देखते पूरे कस्‍बा और आसपास के ग्रामों में फैल गई। फिर कनकलता के घर की ओर तमाशाइर्यों का रेला फूट पड़ा। गली-गलियारों में लोग। छतों पर लोग। पेड़ों पर बैठे व लटके लोग। सती माता के जयकारों से आकाश फट पड़ा। ढोल-धमाके, मंजीरे-चीमटों की सुरी-बेसुरी ध्‍वनियों ने जैसे सती मैया को पति की चिता के साथ अग्‍नि स्‍नान कर लेने के लिये संपूर्ण माहौल ही अनायास रच दिया हो।

जवान बेटे की अकाल मौत के गम में भी शव विच्‍छेदन की कानूनी कार्यवाही में लगे पंडित रामनारायण के कानों में बहू के सती होने की रट लगाए जाने की खबर पहुंची तो बेहाल बेचारे कागजी कार्यवाही जस की तस छोड अपने भाइर्यों के साथ घर की ओर भागे। पुलिस बंदोबस्‍त के लिये भी कहते आए।

रामनारायण और उनके भाइर्यों ने घर पहुंचने पर विचित्र माहौल देखा तो हैरान रह गए। जिधर आंख फेरो, उधर ही लोगों का तांता। ढोल-धमाकों के बीच, सती मैया के जयकारे। एक क्षण तो उन्‍हें लगा यह तो 1942 की अगस्‍त क्रांति सी स्‍थिति बन गई। रामनारायण ने भी इस आंदोलन में भागीदारी की थी। अंग्रेजी हुक्‍मरानों की लाठियां खाई थीं। जेल भी गए थे। स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के कारण पूरे इलाके में उनकी साख भी थी और धाक भी। सती प्रथा, बाल विवाह और दहेज जैसी कुरीतियों के वे सदा मुखर व प्रबल विरोधी रहे। स्‍त्री शिक्षा और विधवा विवाह के वे प्रबल पक्षधर थे। वे खुद तो पांचवी जमात तक पढे थे लेकिन बहू-बेटियों को पढ़ाने मंे कभी पीछे नहीं रहे। कनकलता ब्‍याह के वक्‍त केवल हायर सेकेण्‍डरी थी। लेकिन बाबूजी (रामनारायण) के आग्रह के चलते उसने बी. ए. किया और अब संस्‍कृत से एमए कर रही है।

रामनारायण ने घर पहुंचकर परिस्‍थिति को समझा और कुछ ही क्षणों में ठोस निर्णय लेकर ढोल-धमाके बजाने वालों को डांटकर बंद कराया। जयकारे लगा रहे लोगों को भी उन्‍होंने डांटकर चुप कराने की कोशिश की। परंतु भीड़ इतने बडे क्ष्‍ोत्रफल में फैली थी कि रामनारायण की आवाज बिना माइक के सब लोगों के कानों तक नहीं पहुंच सकती थी। बहरहाल माहौल कुछ शांत जरूर हुआ। लेकिन पेड़ों पर बैठे-लटके लोगों का कोई न कोई समूह सती मैया के जयकारे लगा ही देता।

रामनारायण थोडी बहुत स्‍थिति नियंत्रित होती देख सीधे कनकलता के कमरे में दाखिल हुए। चार छह महिलाओं द्वारा जबरन थामे रखी कनकलता उनके समक्ष थी। झूमा-झपटी में उसकी साड़ी का पल्‍लू नीचे सरक गया था। बाल बिखर गए थे। बेजा ताकत का इस्‍तेमाल करने के कारण मांग का सिंदूर माथे से लकीरों में बहकर उसके चेहरे को डरावना बना रहा था।

दीवार बने बाबूजी दहाड़े, ‘‘यह क्‍या नाटक बना रखा है बहू.....? ईश्वर ने जो जीवन दिया है वह अकाल व अनावश्‍यक बलिदान के लिये नहीं है ? तुम जो सोच रही हो वह जीवन का अनादर है। जीवन को मारकर नहीं जीवन को जीकर पति को याद किया जा सकता है....। पति की स्‍मृति में बेटों को अच्‍छा इंसान बनाने का व्रत संकल्‍प लो और यह सती-अती का आडंबर छोड़ो....। सती..., अपराध कर्म है।''

- ‘‘नहीं बाबूजी हम जाएंगे। हमारा उनसे वादा था......।''

- ‘‘वादा जीवितों के संग निभाये जाते हैं बेटी। मरों के संग मरना तो जीवन की हार है। अपने मन को उस दलदल से बाहर निकालो जहां तुमने अपने लिये सोचना ही बंद कर दिया है ?''

- ‘‘नहीं बाबूजी हम कुछ नहीं सुनेंगे..., हम तो सती होएगें। परमात्‍मा की यही इच्‍छा है।''

इस बार रामनारायण कड़क हुए, ‘‘हमारे जीते जी यह अनर्थ नहीं हो सकता। सती ईश्वरीय इच्‍छा होती तो राजा दशरथ की रानियां सती न हुई होतीं ? वे तो तीन-तीन थीं..., एकाध हुई सती ? बहुत हो गया अब त्रिया प्रपंच ! इसे चार औरतों के साथ कमरे में बंद कर के द्वार पर ताला जड़ दो.....। सती में सत होगा तो ताला भी आपसे आप खुल जाएगा और द्वार भी ! हमें भी तो चमत्‍कार से साक्षात्‍कार हों ?''

सती के सत का कोई चमत्‍कार सामने नहीं आया। कनकलता को भी बाद में लगा उसकी सती होने की जिद भी बौराई बुद्धि की तरह एक मतिभ्रम ही थी। बाबूजी इतनी शक्‍ति से पहाड की तरह आडे़ न आए हुए होते तो वह कब की जल मर खप गई होती....। उस वक्‍त उसके अंतर्मन में न जाने कहां से पति की चिता के साथ जल जाने की भावनाऐं एकाएक विकसित हो तीव्र हो उठी थीं। उसे तो लगने लगा था निश्‍चित रूप से किसी अलौकिक शक्‍ति का अनायास ही प्रगटीकरण होगा और बाबूजी समेत सब उसके सतीत्‍व के समक्ष चमत्‍कृत होकर दण्डवत होंगे और वह भीड़ को चीरती हुई पति की चिता पर पहुंचेगी। पति का सिर गोदी में रखेगी और फिर कोई आलौकिक शक्‍ति अग्‍नि बन फूट पडे़गी ?

पर अब लगता है धार्मिक अंधविश्‍वासों के चलते सती के सत से चिता में आग पकड़ लेने का रहस्‍य विधवा स्‍त्री के विरूद्ध एक सामाजिक षडयंत्र के अलावा कुछ नहीं है ? वाकई जीवन की सार्थकता सती के बहाने मर जाने में नहीं थी बल्‍कि संपूर्ण जीवटता और सामाजिक सरोकारों के साथ दायित्‍वों का निर्वहन करते हुए ही जीने में थी। कनकलता फिर स्‍मृतियों में......।

रात नौ बजे कनकलता के कमरे के द्वार खोले गए। कुछ औरतों ने भीतर जाकर सूचना दी दाह संस्‍कार हो गया। कनकलता के कानों तक भी खबर पहुंची। शायद उसे सुनाने के लिये ही खबर पहुंचाई गई थी। कनकलता बुदबुदाई, ‘‘बाबूजी ने हमारे साथ अच्‍छा नहीं किया। कम से कम हमें अंतिम दर्शन तो कर लेने देते। परिक्रमा तक नहीं कराई......?'' फिर जैसे-जैसे उसके अंतर्मन में यह विश्‍वास पुख्‍ता होता चला गया कि वाकई पति का अंतिम संस्‍कार हो चुका है तो उसकी आंखें डबडबा आईं और वह फूट पड़ी। कमरे में मौजूद अनुभवी औरतों ने जैसे चैन की सांस ली और कनकलता को जी भरकर रोने के लिये अपने हाल पर छोड़ दिया। पौर में कुटुम्‍बियों के साथ बैठे रामनारायण के कानों में बहू के कर्कश रूदन-क्रंदन ने टंकार दी तो हथेलियों से चेहरा छिपाते उनका साहस भी जैसे टूट गया, ‘‘बड़ा अनर्थ कर दिया रामजी...? अब विपदा संभालने की ताकत भी तू ही देना....।''

और फिर बिलखते-सुबगते कर्मकाण्‍ड की तैयारियों व निवृतियों में पहाड़ सा समय बीतने लगा। तीसरे दिन अस्‍थि संचय के बाद कनकलता ने बच्‍चों के साथ इलाहबाद संगम पर जाकर पति के फूल विसर्जन की इच्‍छा जताई तो बाबूजी ने इजाजत दे दी। कनकलता के मन को संतोष हुआ। उसका टूटा धीरज बंधने लगा। बेटों के प्रति भी वह आकर्षित हुई। कनकलता की जिजीविषा पल प्रति पल चैतन्‍य हो रही थी और उसके भीतर अनायास यह भाव उभरने लगे थे कि वह जिऐगी....। बच्‍चों को अच्‍छा पढ़ा-लिखाकर लायक बनाएगी....।

असमय पति की मौत के दंश ने कनकलता की चंचलता लगभग हर ली थी। खामोशी की भाषा ही जैसे उसके आचरण व्‍यवहार, इच्‍छा-अनिच्‍छा को व्‍यक्‍त-अव्‍यक्‍त करने का प्रमुख आधार बन गई। श्‍वसुर रामनारायण ने बहू को कभी सहारे का अभाव या आश्रय की कमी नहीं खटकने दी। बेटे की तेरहवीं के बाद वे बहू को लेकर ग्‍वालियर पहुंचे और शिक्षा विभाग में अनुकंपा नियुक्‍ति के लिये अर्जी लगवा आए। कुछ दिन की भाग दौड़ के बाद सरकारी विद्यालय में कनकलता को सहायक शिक्षिका के पद पर अनुकंपा नियुक्‍ति भी मिल गई। बाबूजी ने अपनी ही बिरादरी के एक मित्र के मकान में कनकलता को दो कमरे किराये से दिला दिए और दोनों बेटों के साथ कनकलता को ग्‍वालियर रख दिया।

कनकलता ने सरकारी नौकरी के आर्थिक आधार और बाबूजी के वरदहस्‍त के चलते जीने की शुरूआत की तो फिर न तो उसने कभी पीछे पलटकर देखा और न ही कभी बिरादरी समाज में कमजोर साबित हुई ? विद्यालय के वरिष्‍ठ शिक्षक भगवान स्‍वरूप शर्मा का उसे विशेष सहयोग प्राप्‍त होता रहा। सरकारी काम से लेकर घरेलू कार्यों तक जब कभी भी कनकलता को मदद की जरूरत पड़ती तो वे हमेशा ही निर्लिप्‍त, निर्विकार भाव से तत्‍पर रहते। घनी दाढ़ी में छिपे दार्शनिक चेहरे के भावों केा पढ़ते हुए कनकलता अक्‍सर अनुभव करती कि शर्मा उसकी भावनायें किसी भी स्‍तर पर आहत न हों इसका बड़ा ख्‍याल रखते हैं। उनके व्‍यवहार में कनकलता की लाचारगी के प्रति हमेशा ही दया भाव बना रहता। जिसका अहसास भर कनकलता को संबल प्रदान करता रहता। शर्मा एम. एस - सी. होने के साथ विश्‍व विद्यालय प्रावीण्‍य थे। लिहाजा वे कनकलता के बेटों के लिए जरूरत पड़ने पर उचित मार्गदर्शन भी देते। ऐसे तमाम सहयोगी कारणों के चलते शर्मा कनकलता के पारिवारिक शुभचिंतक की भूमिका में थे। कनकलता के बेटे भी उन्‍हें परिवार के वरिष्‍ठ सदस्‍य की तरह मान सम्‍मान देते।

किस्‍मत कहिए या संयोग उसके दोनों बेटे पढ़ने में इतने अब्‍बल निकले कि बडा न्‍यूरो सर्जन बन लंदन में बस गया। डाॅक्‍टर लड़की से ही उसने शादी रचा ली। छोटा बेटा इनफारमेशन टैक्‍नोलॉजी में इंजीनियरिंग कर बैंग्‍लौर स्‍थित बहुराष्‍ट्रीय कंपनी में अच्‍छी सेलरी पर जॉब पा गया। उसने भी सजातीय इंजीनियर लडकी से शादी कर ली।

उम्र के प्रौढ़ पड़ाव पर कनकलता के समक्ष जैसे-जैसे वैभव अठखेलियां करने को आतुर हो रहा था..., वैसे-वैसे उसे आशंका हो रही थी कि उसके भाग्‍य का घोड़ा फिर से भटकने को बेताव हो रहा है...। कनकलता संस्‍कृत से एमए करने के बाद यूडीटी हो गई थी और फिर कुछ सालों बाद ही पदोन्‍नत होकर लेक्‍चरर। उसके सहयोगी भगवान स्‍वरूप शर्मा उसी विद्यालय में प्राचार्य हो गये थे। उसके दोनों बेटों ने आठ-आठ लाख रूपये मिलाकर माधवनगर में आलीशान मकान खरीदकर उसके जन्‍म दिन पर उपहार में दे दिया था। लेकिन अकेली कनकलता घर में क्‍या करे ? बेटे-बहुऐं नाती-पोते होते तो दुलारते-पुचकारते, डांटते-डपटते दिन फुर्र...र्र से गुजर जाता। पर अकेले में तो खाली दिन जैसे काटने को दौड़ता है। स्‍कूल के बाद रिक्‍तता दिन भर जैसे उसे निचोड़ती रहती है। समय गुजारने के लिये टीवी आॅन करती तो स्‍क्रीन पर उभरती उत्तेजक तस्वीरें बीस-इक्‍कीस साल से वैधव्‍य की गांठ से बंधे मन की चाहतों को जैसे रेशा-रेशा कर केशौर्य की अल्‍हड़ता की ओर धकेलने लगतीं। उम्र के इस दौर में तीव्र बैचेैनी के साथ अपने आप में ही वह खुद को तलाशने लगती ? वैधव्‍य ढोते-ढोते सामाजिक मर्यादा और बंधनों की औपचारिकता में उसके अवचेतन में ही स्‍त्री दब कर कहीं लुप्‍त हो गई थी। एक आदर्श स्‍त्री के भीतर छिपी एक और स्‍त्री। जिसे शरीर में ही उभरते वह कई दिनों से अनुभव करती, शर्मा के बेहद निकट पा रही थी। कनकलता ने जब उस स्‍त्री का पिछले शनिवार को प्रगटीकरण कर अभिव्‍यक्‍त्त किया, तब जैसे विद्यालय में भूचाल आ गया.....।

शनिवार को महिला दिवस था। इस अवसर पर महिला संबंधी किसी भी विषय को चुनकर विचार गोष्‍ठी आयोजित किये जाने के निर्देश लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा दिये गये थे। कनकलता के विद्यालय में भी गोष्‍ठी आयोजित होनी थी। विषय चयन किया गया ‘‘बढ़ती सती की घटनायें और समाज'' कनकलता से इस विषय पर बोलने के लिए विशेष आग्रह किया गया। क्‍योंकि सब जानते थे कनकलता भी अपने पति की मृत्‍यु के समय सती होने की जिद के दौर से गुजरी है। ऐसे में उसकी तात्‍कालिक मानसिकता, स्‍थितियां और उनसे उबरने की जीवटता का वास्‍तविक चित्रण करने की अपेक्षा जरूरी थी। हांलाकि कनकलता बहस-मुवाहिशा, चर्चा-परिचर्चा और भाषण-संभाषण से हमेशा ही बचे रहने की फिराक में रहती। पता नहीं मंच से बोलते-बोलते वाणी से नियंत्रण कब हट जाए और मुंह से अनायास ही कुछ ऐसा-वैसा मुंह से निकल जाए जो बेवजह बवेला खड़ा कर देने का सबब बने। पर इस मर्तबा प्राचार्य शर्मा से लेकर ज्‍यादातर शिक्षकों की जिद थी कि कनकलता का तो भाषण जरूरी है। बहरहाल न-नुकुर करती कनकलता ने भी विचार व्‍यक्त करने की हामी भर ली।

सभाकक्ष ठसाठस। बतौर मुख्‍य अतिथि क्ष्‍ोत्रीय विधायक, विशिष्‍ट अतिथि संयुक्‍त संचालक शिक्षा और अध्‍यक्षता का दायित्‍व जिला शिक्षा अधिकारी संभाल रहे थे। वक्‍तव्‍यों का दौर शुरू हुआ तो ज्‍यादातर वक्‍ता सामाजिक उदारता और प्रगतिशील विचारों से परे सामाजिक कट्‌टरता, रूढ़ियों के खोखले आडंबरों को महिमामंडित करने के साथ वैचारिक पिछड़ेपन को उभारने का उपक्रम करते हुए सती हो जाने के लिए किसी हद तक स्‍त्री को ही दोषी ठहराने की कोशिश करते रहे। जैसे सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के मूल्‍यों को पुर्नस्‍थापित करने की होड़ में लगे हों। पर जब कनकलता की बारी आई तो जैसे स्‍त्री के प्रति वैचारिक क्रांति के शंखनाद ने आकाश भेद दिया हो, ‘‘लाचारी की अवस्‍था में स्‍त्री की लाचारगी को लेकर बहुत गहरे विचार व्‍यक्‍त करते हुए पीड़ा जताने की जरूरत नहीं है। क्‍योंकि शुभचिंतकों से बतौर सहानुभूति पीड़ा जताए जाने के मायने हैं स्‍त्री को और ज्‍यादा कमजोरी के दायरे में लाना। सती की घटनायें तो अब अपवाद स्‍वरूप ही घटित होती हैं लेकिन दहेज के अभाव में नवविवाहिताऐं रोज आत्‍महत्‍यायें कर रही हैं। मेरा ऐसा अनुभव और विश्‍वास है, जब एक स्‍त्री के तिल.....तिल प्राण निकल रहे होते हैं तब निर्णायक घड़ी में उसे बचा लेने के ठोस उपाय हम कहां कर पाते हैं....? हां मर जाने के बाद जरूर मुड़े-तुड़े पत्रों में कहीं दहेज प्रताड़ना की चंद पंक्‍तियां खंगालते हुए पुलिस कार्यवाही के लिए जितने बेचैन होते हैं, उतने पहले ही हो गए होते तो शायद एक जा रही जान को बचाया जा सकता था। जैसा कि आप में से ज्‍यादातर जानते हैं एक बुरे दौर में, मैं सती होने की जिद के दौर से गुजरी हूं। उस वक्‍त यदि मेरे श्‍वसुर कहीं गहरे आंसू बहाने में ही लगे रह गये होते तो मैंने भी पति की चिता में कूदकर आत्‍महत्‍या कर ली होती। यदि हर विवाहिता को मेरे स्‍वर्गवासी ससुर जैसा आशीर्वाद मिले तो न स्‍त्रियां सती हों और ना ही दहेज के लिए जलाई जाएं अथवा आत्‍महत्‍यायें करें ? मुझे तो अपने पितातुल्‍य श्‍वसुर पर इतना विश्‍वास था कि यदि मैं पुर्नविवाह की इच्‍छा जताती तो वे निश्‍चित मेरा पुर्नविवाह करने के लिए समाज की कोई परवाह किए बिना आगे आ जाते...? चूंकि हम परंपरावादी सोच और आदर्श छवि के छिलकों से ढंके हैं इसलिए खुद को इर्मानदारी से अभिव्‍यक्‍त करने में इतनी सतर्कता बरतते हैं कि कहीं लांछनों के घेरे में ना आ जायें ? अंत में मेरा उन सब महानुभावों से, प्रगतिशीलों से यही विनम्र विनती है कि मरने की स्‍थितियों से जूझ रही स्‍त्री को बचाने के लिए सही घड़ी पर सर्तक हो जाइए। घड़ी चूक गई तो तय मानकर चलिए एक और स्‍त्री की जान गई....।

कनकलता के क्रांतिकारी भाषण से बैठे लोग स्‍तब्‍ध रह गए। यह कनकलता क्‍या बोल गई, इसके वक्‍तव्‍य का क्‍या अर्थ लगाया जाए, यही कि कनकलता के मन में पुर्नविवाह के लिए भी कहीं दबी इच्‍छा थी ? अथवा है ? लोग सोचने लगे, यह कनकलता नहीं, उसके भीतर से इक्‍कीसवीं सदी की आधुनिक नारी बोल रही थी ? भगवान स्‍वरूप शर्मा के मन में भी कनकलता की अंदरूनी भावनाओं को लेकर तमाम सवाल उभर रहे थे। जिनके उत्‍तर पाकर वे जिज्ञासाओं पर विराम लगा देना चाहते थे। उन्‍होंने रात नौ बजे के करीब कनकलता को फोन लगाया, ‘‘तुमने तो आज स्‍त्री मन के भेद का उद्‌घाटन कर क्रांतिकारी भाषण दे डाला....। बड़ी चर्चा है...।''

- ‘‘न जाने क्‍यों लोग स्‍त्री से अपेक्षा करते हैं कि वह देह की कारा से मुक्‍त होने की बात सोचे ही नहीं... ? अब आपसे क्‍या छिपाऊँ शर्मा जी..., पति के मर जाने से स्‍त्री का मन थोड़े ही हमेशा के लिए मर जाता है.....।'' और कनकलता ने फोन काट दिया। शर्मा की जिज्ञासाओं पर विराम लगने की बजाय रहस्‍य और गहरा गया लेकिन

उधर कनकलता खुद को अभिव्‍यक्‍त कर संपूर्ण संतुष्ट थी। बीस-इक्‍कीस साल के विधवा जीवन में आज जैसी संतुष्‍टि की अनुभूति उसे शायद पहली बार हो रही थी।

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लेखक परिचय:

नाम ः प्रमोद भार्गव

पिता का नाम ः स्‍व. श्री नारायण प्रसाद भार्गव

जन्‍म दिनांक ः 15 अगस्‍त 1956

जन्‍म स्‍थान ः ग्राम अटलपुर, जिला-शिवपुरी (म. प्र.)

शिक्षा ः स्‍नात्‍कोत्तर (हिन्‍दी साहित्‍य)

रूचियां ः लेखन, पत्रकारिता, पर्यटन, पर्यावरण, वन्‍य जीवन तथा इतिहास एवं पुरातत्‍वीय विषयों के अध्‍ययन में विशेष रूचि।

प्रकाशन ः प्‍यास भर पानी (उपन्‍यास), मुक्‍त होती औरत, पहचाने हुए अजनबी, शपथ-पत्र एवं लौटते हुए (कहानी संग्रह), शहीद बालक (बाल उपन्‍यास) सोन चिरैया सफेद शेर, चीता, संगाई, शर्मिला भालू, जंगल के विचित्र जीव जंतु (वन्‍य जीवन) घट रहा है पानी(जल समस्‍या) इन पुस्‍तकों के अलावा हंस, समकालीन भारतीय साहित्‍य,वर्तमान साहित्‍य, प्रेरणा, संवेद, सेतु, कथाबिंब परिकथा, धर्मयुग, जनसत्ता, नवभारत टाइम्‍स, हिन्‍दुस्‍तान, राष्‍ट्रीय सहारा, नईदुनियां, दैनिक भास्‍कर, दैनिक जागरण, लोकमत समाचार, राजस्‍थान पत्रिका, नवज्‍योति,पंजाब केसरी, दैनिक ट्रिब्‍यून, रांची एक्‍सप्रेस, नवभारत, साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान, कादम्‍बिनी, सरिता, मुक्‍ता, सुमन सौरभ, मेरी सहेली, मनोरमा, गृहशोभा, गृहलक्ष्‍मी, आदि पत्र पत्रिकाओं में अनेक लेख एवं कहानियां प्रकाशित।

सम्‍मान ः 1. म.प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा वर्ष 2008 का बाल साहित्‍य

के क्षेत्र में चंद्रप्रकाश जायसवाल सम्‍मान। 2. ग्‍वालियर साहित्‍य अकादमी द्वारा साहित्‍य एवं पत्रकारिता के लिए डॉ. धर्मवीर भारती सम्‍मान।

3. भवभूति शोध संस्‍थान डबरा (ग्‍वालियर) द्वारा ‘भवभूति अलंकरण'।

4. म.प्र. स्‍वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकरी संगठन भोपाल द्वारा ‘सेवा सिंधु सम्‍मान'।

5. म.प्र. हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन, इकाई-कोलारस (शिवपुरी) साहित्‍य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में दीर्घकालिक सेवाओं के लिए सम्‍मानित।

6. भार्गव ब्राह्मण समाज, ग्‍वालियर द्वारा साहित्‍य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में सम्‍मानित।

अनुभव ः जनसत्ता की शुरूआत से 2003 तक शिवपुरी जिला संवाददाता।

नईदुनियां ग्‍वालियर में 1 वर्ष ब्‍यूरो प्रमुख, शिवपुरी।

उत्तर साक्षरता अभियान में दो वर्ष निदेशक के पद पर।

संप्रति ः जिला संवाददाता आज तक (टी.वी. समाचार चैनल)

संपादक -शब्‍दिता संवाद सेवा, शिवपुरी

दूरभाष ः 07492-232007 मोबा. 09425488224

संपर्क ः शब्‍दार्थ, 49 श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी (म. प्र.)

ईमेल - PramodSVP997@rediffmail.com

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नकटू अब दस साल का हो गया था। अपने नाम के ही अनुरूप वह बेशरम था, बल्‍कि यों कहा जाए कि उसका नाम उसके जन्‍म के कारण ही नकटू पड़ गया था तो ज्‍यादा व्‍यावहारिक होगा। वह अपनी विधवा मां का नाजायज पुत्र था। मां ने गांव के लोगबागों के गिले शिकवे और विष बुझे वाणों की भार से घायल होते रहने से हमेशा के लिए निजात पाने के लिए खारे कुंए में कूद कर आत्‍महत्‍या कर ली थी। घर में नकटू की नानी के अलावा और कोई था नहीं। नानी ने ही जैसे-तैसे उसे पाला पोसा, बड़ा किया। नकटू का पिता कौन है ठीक-ठीक किसी को ज्ञात नहीं है। बताते हैं एक बार उसकी मां का देवर यानि कि उसका काका अपनी विधवा भाभी भुर्रो की सुधबुध लेने के बहाने गांव आया था और अर्से तक रूका था। उसके जाने के बाद से ही भुर्रो के शरीर में परिवर्तन शुरू हो गए थे और पूरे गांव में यह काना-फूंसी होने लगी थी कि भुर्रो के पैर भारी हो गए हैं।

अवैध संतान होने के कारण ही उसे उच्‍च जाति का होने के बावजूद जाति-बिरादरी सगे-संबंधी, नाते-रिश्‍तेदारों और गांव में वह आदर नहीं मिला जिसका वह हकदार था। जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया, नानी की पकड़ से बाहर होता चला गया था। ब्राह्मणों की बस्‍ती उपरेंटी के बच्‍चे उसके साथ इसलिए नहीं खेलते क्‍योंकि उनकी मांओं ने बच्‍चों को जता दिया था कि यह नकटू नासमिटा पाप की औलाद है। कुछ बच्‍चे उसे पाप की, औलाद कहकर चिढ़ाते भी। हालाँकि नकटू यह नहीं समझता था कि 'पाप की औलाद‘ के मायने क्‍या होते है ? लेकिन अपने प्रति हम उम्र बच्‍चों की हीनता देख उसका बाल सुलभ मन यह जरूर ताड़ गया था कि पाप की औलाद कोई बुरी बात होती है, जिसके चलते गांव के लागे उससे नफरत करते हैं और हिकारत भरी नजरों से देखते हैं। जबसे उसमें इस समझ का अंकुरन हो आया था कि पाप की औलाद होना एक तरह की गाली है, तब से उसने आक्रामक रूख अपना लिया था। अब, जब भी कोई बच्‍चा उसे पाप की औलाद कहकर चिढ़ाता, वह उसे पीटने लग जाता। उसमें बला की फुर्ती थी। शरीर में उम्र से ज्‍यादा ताकत थी। उसके स्‍वभाव में भरपूर निडरता थी। उसके द्वारा आक्रामक रूख अपनाने के बाद से बच्‍चे उससे भय खाने लगे थे। अब उनकी हिम्‍मत उसके मुंह पर पाप की औलाद कहने की न होती।

चूंकि उच्‍च वर्ग नकटू उपेक्षित था इसलिए वह सहराने के बच्‍चों में ज्‍यादा हिलमिल गया था। सुबह वह सायकल का पुराना टायर दौडा़ता हुआ तलैया पर पहुंच जाता। वहीं सहरियों के बच्‍चे आ जाते। उन्‍हीं के साथ वह गुल्‍ली-डंडा, सितोलिया, होलक-डंडा खेलता रहता। कभीकभा वे पिड़कुलए मारने, पठार से नीचे जंगल में भी उतर जाते। पिड़कुलए मारने के लिए उन्‍होंने गिलोलें बना ली थीं। नकटू की कुछ किरार के लड़कों और चमारों के लड़कों से भी दोस्‍ताना हो गया था। चूंकि इस दल का संगठक नकटू था और नकटू का कहा ही सब मानते थे इसलिए वह एक तरह से दल का अघोषित नेतृत्‍वकर्ता बन बैठा था।

उसमें बहस-मुवाहिसा करने का माद्‌दा था। प्रबल हठी था। अपने दोस्‍तों के प्रति उसका समर्पित भाव था। कोई साथी अगर गलत काम कर दे, झूठी बात कह दे तो भी वह खुलकर उसी का साथ देता। सद्‌गुणों और दुर्गुणों का उसके चरित्र में अनुपातिक सम्मिश्रण था। वह पढ़ने में भी होशियार था। स्‍कूल रोजाना जाता और सब विद्यार्थियों में पढ़ने में अव्वल रहता। पढ़ाई में अव्वल होने के कारण गांव के जो समझ रखने वाले लोग थे वे नकटू के प्रति दया और स्‍नेह का भाव रखते थे।

गर्मियों की छुटि्‌टयां हो गईं थीं। गांव की एक मात्र हवेली जो पूरे साल वीरान पड़ी रहती थी, उसकी साफ-सफाई शुरू हो गई थी। चौकीदार पहरा देने लगा था और उसने गांव के बच्‍चों को हवेली की लंबी-लंबी दहलानों में खेलते रहने पर रोक लगा दी थी। गोधूलि वेला के समय दहलानों में आइस-पाइस खेलना बच्‍चों की दिनचर्या थी। नकटू भी खेलता था पर अब वह भी वंचित हो गया था।

हवेली की रंग-बिरंगी सभी बत्‍तियां जलने लगी थीं। तीन दिन में ही हवेली राजमहल के माफिक जगमगा उठी थी। सिंधिया स्‍टेट के जमाने में अटलपुर के जमींदार की यह हवेली राजमहल सा ही वैभव भोगती थी। पर वे जमाने लद गए, अब न राजे-रजवाड़े रहे न जमीदार और जागीरें। अटलपुर के जमीदार ने जागीरें खत्‍म होने के तत्‍काल बाद ही मुंबई और इंदौर में व्‍यापार खोल लिए और अपने दोनेां लड़कों को वहीं जमा दिया। व्‍यापार अच्‍छा चल निकला जमीदारी में लखपती थे तो व्‍यापार में करोड़पति हो गए। सामंतशाही के दौर में जो रूतबा था वह लोकतंत्र में भी बरकरार रहा। जमींदारी नहीं रहने के बावजूद उनके पास बावन कमरों की हवेली थी और एक हजार बीघा का लंबा-चौड़ा कृषि फार्म था। अटलपुर वे साल में एक मर्तबा ही आते, गर्मियों में। यह पूंजीपति परिवार अपने देवताओं से बड़ा खौफ खाता था। इसलिए वे प्रत्‍येक वर्ष बेनागा देवताओं पर सत्‍य नारायण भगवान की कथा कराने के बहाने यहां आते और पंद्रह बीस दिन रूककर लौट जाते।

तीन गाड़ियों में लदकर वे अटलपुर आए। परिवार के सदस्‍य वातानुकूलित गाड़ी में थे बाकी दो गाड़ियों में सामान था। उनके आते ही गांव के लोगों की हवेली के सामने भीड़ जुट गई। बड़े बुर्जुग उन्‍हें झुककर प्रणाम करने लगे। कईयों ने जमींदार साहब के पैर छूते हुए अपने छोटे-छोटे बच्‍चों से भी जमींदार साहब के पैर छुलाए। नकटू भी गांव वालों के साथ था लेकिन उसने न जमींदार साहब के पैर छुए और न ही नमस्‍कार! वह उनके साथ आए उस गोरे-चिट्‌टे भरे हुए बदन वाले लड़के को देखता रहा जो उसकी ही उम्र का था। वह जमींदार साहब के छोटे लड़के का लड़का था। उसका नाम डिंपल था। कईयों ने जमींदार साहब को अन्‍नदाता और माई-बाप कहते हुए उनके चरणों में सिर रखकर आशीर्वाद लिया तो कई बेवजह जमींदारों के जमाने में सुखचैन बरपा रहने का गुणगान करते हुए उनकी तारीफों के पुल बांधने लगे। नकटू चुपचाप सब देखता-सुनता रहा। उसे जमींदार साहब को अन्‍नदाता व माईबाप कहना अटपटा लग रहा था। वह यह अच्‍छी तरह जानता था कि किसानों के अन्‍नदाता तो खेत हैं, खलिहान हैं, गाय-बैल हैं, नदी-नाले हैं। जमीदार अन्‍नदाता कैसे हो गए ?

डिंपल के गांव में आने के साथ ही अजब परिवर्तन होना शुरू हो गए थे, जो नकटू के लिए नागवार थे। डिंपल जब भी हवेली से उतरता तो अजीबो-गरीब खेल-खिलौनों के साथ प्रगट होता। उसकी पेंट और शर्ट की जेबें तरह-तरह के बिस्‍किट्‌स और चॉकलेट पैकेटों से भरी होती। हवेली के द्वार पर उसके लिए सवारी सजी रहती। कभी वह बैटरी वाली कार, कभी तीन पहिए, दो पहिए और चार पहिए की सायकल पर सवार होकर हवेली के सामने वाले गलियारे में अपनी सवारी दौड़ाता। दौ नोकर आजू-बाजू उसके साथ होते। अटलपुर के आभिजात्‍य मोहल्‍ले के उच्‍च जातियों के बच्‍चे विस्मयपूर्वक डिंपल की सवारियों, कपड़ों और बिस्‍किट्‌स चॉकलेट्‌स की चर्चा करते हुए डिंपल की खुशामद-मलामद करते हुए उसे घेर लेते। इस वक्‍त उनके मुखों में लार होती और वे थूंक का घूंट गटक रहे होते। जब कुछ बच्‍चों की डिंपल से निकटता बढ़ गई तो वे उसकी सवारी में धक्‍का लगाने का अधिकार प्राप्‍त कर गए। क्रमानुसार एक-एक लड़का उसकी सायकल में धक्‍का लगाता हुआ बंसी सेठ की हवेली तक ले जाता और फिर वहां से लौटकर हवेली के दरवाजे तक छोड़ देता। धक्‍का लगाने का चांस जिस लड़के को मिल जाता वह अपने को धन्‍य समझता। अन्‍य लड़के उसे भाग्‍यशाली कहते। डिंपल को जिस लड़के का धक्‍का लगाना सुखदायक लगता उसे वह इनाम स्‍वरूप एक-दो बिस्‍किट्‌स या एक-दो चॉकलेट दे देता। पुरस्‍कृत लड़का इनाम पाकर पुलक उठता उसका चेहरे प्रगल्‍भता से भर जाता। बहुत देर तक वह उस चीज को निहारता रहता। अपने मित्रों को दिखाता। फिर दौड़ी लगाता हुआ घर पहुंचकर मां-बहनों को दिखाता। चॉकलेट कहीं छिन न जाए इसलिए वह धीर गंभीर इत्‍मीनान के साथ उसकी पन्‍नी उतारता और पन्‍नी को संभालकर पाठ्‌य पुस्‍तक के पन्‍नों में छिपा देता। डिंपल का बिस्‍किट्‌स का डिब्‍बा जब खाली हो जाता तो वह आनंद के लिए उसे बच्‍चों के बीच उछाल देता। बच्‍चे उस डिब्‍बे को लूटने के लिए कटी पतंग की तरह झपट पड़ते। जो लड़का डिब्‍बा पा जाता वह उसे छाती से चिपकाये घर की ओर दौड़ी लगा देता। और डिंपल अपने वाहन पर उछल-उछल कर इस खेल का आनंद ले रहा होता।

यह सारा मन बहलाने का खेल नकटू दूर खड़ा तमाशे की तरह देखता और मन ही मन ईर्ष्‍यावश चिढ़ता रहता। उसके भी मुंह में कैडबरी चॉकलेट्‌ और पारले बिस्‍किट्‌ देखकर लार आ जाती। जीभ चखने के लिए मचलने लगती। ऐसा ही हाल उसका तब होता जब वह सरपंच के यहां टीवी में विज्ञापन देख रहा होता। टीवी की यह विज्ञापनी दुनिया उसे स्‍वप्‍न की तरह छलावा लगती। वह सोच ही नहीं पाता था गांव की चाहर दीवारी के बाहर वास्‍तव में ही ऐसी ही थिरकती हुई मनमौजी बच्‍चों की दुनिया है। कभी-कभी वह सोचता टीवी के पर्दे पर पत्‍थर मारे और उछलते-कूदते लड़के के हाथ से बिस्‍किट पैकेट छुड़ाकर ले भागे। लेकिन वह जानता था इस बक्‍सानुमा डिब्‍बे में लड़का-बड़का कोई नहीं होता यह तो सब पर्दे पर विज्ञान का करतब भर है। किंतु जबसे डिंपल गांव आया था तब से उसे यह विश्‍वास हो गया था कि गांव के बाहर शहरों में एक दुनिया बच्‍चों की जरूर ऐसी है जो टीवी के बच्‍चों की तरह मनमौजी है। अल्‍हड़ है। यदि नहीं होती तो यह डिंपल कहां से खा पाता कैडवरी.....पारले.......? कहां घूम पाता सायकल और बैटरी वाली गाड़ी पर.....? नकटू की तरह ही उसके सहराने और चमराने वाले मित्रों को डिंपल की शान पर विस्‍मय होता।

ऐसे ही एक दिन चम्‍पेबारी की दल्‍लान में बैठा नकटू डिंपल की सायकल का इधर से उधर, उधर से इधर आना जाना देख रहा था कि एकाएक नकटू के सामने बीच गलियारे में डिंपल ने सायकल रोक दी और धक्‍का लगाने वाले व बेवजह पीछे दौड़ते रहने वाले बच्‍चे वाडीगार्डो की तरह डिंपल के दाएं-बाएं खड़े हो गए। डिंपल सगर्व ललकार भरे लहजे में बोला, '' अबे.....नकटू इधर आ.....‘‘

नकटू को अव्वल तो डिंपल के बोलने का लहजा एकदम असहनीय लगा लेकिन वह डिंपल का मंतव्‍य समझने के लिए चुपचाप आगे बढ़कर डिंपल की सायकल के पास खड़ा हो गया और बोला‘‘ का......?‘‘

डिंपल का विनम्र अनुनय होता तो नकटू कुछ सोचता भी ? किंतु वह तो हुक्‍म था और नकटू यह बखूबी समझता था कि हुक्‍म का पालन एक तो नौकर करते हैं दूसरे चमचे। जबकि नकटू डिंपल का न नौकर है और न ही चमचा! फिर वह इस रईसजादे की सायकल में धक्‍का क्‍यों लगाए ?

''जल्‍दी कर वे.......‘‘ इस बार डिंपल थोड़ा गर्जा था।

नकटू को काटो तो खून नहीं। नाक पर गुस्‍सा चढ़ाए रखने वाले नकटू को इतना सहन कैसे होता ? और उसने

पूरी ताकत से सायकल में एक लात दे मारी। दाएं-बाएं खड़े लड़के दूर छिटक गए और डिंपल औंधे मुंह गिरा धूल खा रहा था। सायकल उलटकर डिंपल के पैरों पर थी। डिंपल अंग्रेजी में गालियां बकता हुआ रोने लगा था। नकटू अगला मोर्चा संभालता इससे पहले हवेली के द्वार पर खड़े दरबान दौड़े-दौड़े आए और नकटू के दोनों हाथ पकड़कर हवेली की ओर घसीटते हुए ले गए। नकटू हाथ-पैर पटकता हुआ छुड़ाने का असफल प्रयास करता रहा। एक दरबान ने डिंपल को उठाया। उसके कपड़ों से धूल झड़ाई और उसे गोदी में लादकर हवेली की ओर ले गया। धक्‍का लगाने वाले लड़के पीछे-पीछे सायकल धकियाते हुए चल दिए।

डिंपल के रोने की आवाज सुनकर उसकी मम्‍मी, उसके बाबा और हवेली के सभी नौकर-नौकरानियां दौड़े-दौड़े, क्‍या हुआ ? क्‍या हुआ कहते हुए नीचे आए और डिंपल को घेरकर उसकी सुध लेने लगे। नौकरों और चाटूकारों ने सारा माजरा कह सुनाया। लड़कों ने सोचा नकटू बेटा आज बड़ी मुश्‍किल से अंटी में आया है इसलिए इसे आड़े हाथों लेकर क्‍यों न पुरानी कसर निकाल ली जाए। फिर क्‍या था, प्रतिद्वंद्वियों ने कुढ़नवश सारा दोष नकटू के सिर मढ़ दिया।

डिंपल की मम्‍मी ने आव देखा न ताव और चार-छैः चांटे नकटू के गालों पर जड़ दिए। क्रोधांध मम्‍मी और भी मारती किंतु प्रतिकार स्‍वरूप नकटू ने गालियां बकते हुए उनकी ओर लातें फेंकना शुरू कर दी थीं। और वे प्रत्‍युत्‍पन्‍न मति से काम लेते हुए नकटू कुछ ऐसी-वैसी हरकत न कर दे जिससे उनकी जग हंसाई हो, इस अनुभूति के साथ चार कदम पीछे हट गई थीं।

जब मम्‍मी हट गईं तो डिंपल के बाबा नकटू के सामने आकर बोले, '' तूने क्‍यों मारा बच्‍चे को‘‘ ?

'' मैंने डिंपल को नहीं मारा। खाली सायकल में लात दी थी, वह गिर पड़ा तो मैं क्‍या करूं ?‘‘

नकटू के दोनों हाथ नौकर पकड़े हुए थे। वह अपने वजूद के पूरे रौब के साथ छाती ताने खड़ा था। उसकी आंखों में न आंसू थे और न ही पछतावा था, न भय था और न ही बेइज्‍जती हो जाने की शर्म थी।

''तूने सायकल में लात क्‍यों मारी ?‘‘

'' उसने मुझसे नौकरों की तरह क्‍यों कहा कि मेरी सायकल में धक्‍का लगा ? मैं क्‍या उसके बाप का नौकर हूं या उसका दिया खाता हूं ? मैं क्‍यों लगाऊं धक्‍का ? ‘‘

अटलपुर जागीर के भूतपूर्व जमींदार उस लड़के के दो टूक जवाब को सुनकर सन्‍न रह गए। अस्‍सी वर्ष की उम्र में उनकी इतनी बेइज्‍जती अंग्रेज अधिकारियों के अलावा किसी ने नहीं की थी। वे सोचने लगे काश आज जमींदारी का जमाना होता तो वे इस लड़के को हाथी के पैर के नीचे कुचलवाकर, लाश तलैया पर चील-कौवों को खाने डाल देते। किंतु वे विवश थे अब न अटलपुर जागीर थी और न वे जमींदार। इस बीच काफी भीड़ इकठ्‌ठी हो गई थी। बच्‍चों से लेकर किशोर, जवान प्रौढ़ और बुजुर्ग। गांव के एक प्रौढ़ शिक्षक आगे आकर बोले, ''बेटा जरा धक्‍का लगा देता तो तेरा क्‍या जाता.....बदले में बिस्‍किट, गोली खाने को मिलती.....‘‘

-'' मैं क्‍या बिस्‍कुट चॉकलेट का भूखा हूं जो धक्‍का लगाऊं....? खाने को इतनी ही जीभ लपलपा रही है तो तुम्‍हीं धक्‍का लगाओ माटसाब.....।‘‘

मास्‍टर साहब की एक झटके में ही बोलती बंद हो गई। फिर लोगों में यह खुसर-फुसर होने लगी कि वह थोड़े ही किसी की मान रहा है, वह तो नम्‍बर एक का बेशरम है तभी तो उसका नाम नकटू पड़ा। कहें भी तो किससे कहें डुकरिया भी बेचारी परेशान रहती है।

इस बीच डुकरिया (नानी) को भी खबर लग गई। वह बेचारी हाथ में खजूर की टान लिए भागी-भागी आई। उसने आते ही नकटू को नौकरों के हाथ से छुड़ाया और उसकी गालियां देते हुए सुतउअल पिटाई लगाना शुरू कर दी, ''धुआंलगे, नासमिटे, नकटा! तू का मेरे करमन में लिखो तो.....? जाने मुरहू कौन पापी को बीज जनके अपन तो चलती भई और मेरे प्राण खावे जाए छोड़ गई।‘‘

नानी जब पीटकर लस्‍त हो गई तो जमींदार साहब के पास जाकर हाथ जोड़कर बोली, ''महाराज जो तो ऐसोई पापी है, जाए माफ कर देईओ....., मैं तुमरे पांव पड़तों।‘‘ और नानी ने जमींदार के पैरों में सिर रख दिया था।

उस दिन जैसे-तैसे नानी द्वारा मिन्‍नत चिरौरी करने से मामला सुलट गया था। किंतु नकटू के अंदर आहत सर्प की तरह प्रतिहिंसा रह-रहकर प्रज्‍वलित होती रही थी। उसने अंतर्मन में संकल्‍प ले लिया था कि वह अपनी बेइज्‍जती का बदला जरूर लेगा। दूसरे दिन से ही वह मौके की तलाश मं रहने लगा कि डिंपल को कब मजा चखाया जाए ? हालांकि नकटू के पीटे जाने के बाद से डिंपल का रूतबा थोड़ा बढ़ गया था फिर भी डिंपल नकटू की सकल देखते ही सहम जाता और नकटू से दूर रहने का प्रयास करता। हालांकि उस घटना के बाद से डिंपल ने कंधे पर नकली बंदूक लटकाना शुरू कर दी थी और वह अपने दोस्‍तों में यह कहकर रौब पेलता कि अबकी मर्तबा बोलेगा तो साले में गोली मार दूंगा।

नकटू की सार्वजनिक तौहीन हो जाने की वजह से उसके सहराने और चमराने के मित्र भी उससे कन्‍नी काटने लगे थे। उन्‍हें यह भय सताने लगा था कि यदि वे नकटू का साथ देंगे तो नौकर उन्‍हें पकड़कर भी डिंपल की मम्‍मी के हाथों पिटवा सकते हैं। किंतु उन्‍होंने अपनी असलीयत नकटू पर जाहिर नहीं की थी। दिखाने को तो वे नकटू के भी दोस्‍त बने रहे और नकटू के साथ डिंपल को पीटने की मोर्चाबंदी साधने में भागीदारी भी करते रहे। दरअसल वे कुटिल बुद्धि से काम लेते हुए नकटू के भी साथ थे और डिंपल के भी।

वह दिन भी आया जब देवताओं पर कथा हुई। आज के दिन हवेली के सभी नौकर, पंडितों और गांव के सवर्ण जाति के लोगों को खान-पान की व्‍यवस्‍था में लगे थे। बारह बजे के करीब कथा समाप्‍त हुई। कथा में डिंपल देवताओं के सामने जिजमान बनकर बैठा। उसी के हाथ से पंडित को दक्षिणा दिलाई गई और नारियल फुड़वाया गया। प्रसाद बंटने के बाद भोज संपन्‍न हुआ। डिंपल और उसके साथियेां ने तुरत-फुरत भोजन किया और चुपचाप सायकल घुमाने के लिए चल दिए। आज डिंपल के हाथ में एक बड़ा बिस्‍कट्‌स का पैकेट था जो उसने अभी खोला नहीं था।

देवताओं का स्‍थान गांव से बाहर हवेली के पिछवाड़े की ओर था। वहां से थोड़ी दूर चलकर तलैया थी और तलैया के पीछे पठारी जंगल था। डिंपल ने आज अपने मित्रों से तलैया तक घूम आने की इच्‍छा प्रकट की। उसके दोस्‍त सायकल धकियाते हुए तलैया की आर चल दिए।

नकटू अपने सहराने के मित्रों के साथ बरगद के नीचे होलक-डंडा खेल रहा था। सायकल की चींची चर्र....चर्र की आवाज सुनकर एकाएक वे चौंके और कान खड़े करके गैल की तरफ देखने लगे। डिंपल की सायकल पर नजर पड़ते ही नकटू धीरे से बोला, ''छिप जाओ डिंपल का बच्‍चा इधर ही आ रहा है। नौकर भी कोई नहीं है। अब देखता हूं बकरे की अम्‍मा कब तक खैर मनाएगी।‘‘

और सभी लड़के बरगद के पीछे छिप गए। नकटू के हाथ में होलक खेलने का बांस का डेढ़ हाथ लम्‍बा तेल पिलाया डंडा था। जैसे ही सायकल बरगद क्रास करके तलैया की ओर बढ़ी कि नकटू सायकल की ओर झपट पड़ा। नकटू को देखते ही डिंपल के दोस्‍त सायकल छोड़ गांव की ओर भाग खड़े हुए। अविलंब नकटू ने डिंपल की गिरेबान पकड़कर उसे सायकल से खींच लिया। डिंपल के हाथ से बिस्‍कुट का डिब्‍बा छीनकर नकटू ने एक मित्र को दे दिया। और फिर वह डिंपल पर पिल पड़ा। डिंपल के पौदों, टखनों में दस बीस डंडे मारे जब वह रोता बिलखता मम्‍मी....मम्‍मी.... चिल्‍लाता धरती पर लोटपोट होने लगा तो उसमें लातें, घूंसे मारने लगा। नकटू के दोस्‍तेां ने जब देखा कि अब बाजी पूरी तरह नकटू के हाथ में है तो वे भी बहती गंगा में हाथ धोने के बहाने डिंपल में लाते मारने लगा। डिंपल के मुंह और नाक से जब उन्‍होंने खून बहता देखा तो वे सहम गए और वे सब डिंपल को वहीं छोड़कर पठारी जंगल की ओर भाग निकले। नकटू ने जब पीछे पलटकर देखा तो देखा गांव की तरफ से डिंपल के नौकर बेसाख्‍ता भागे चले आ रहे हैं।

नौकर डिंपल को लादकर भागे-भागे हवेली जाए। डिंपल की मम्‍मी और उसके बाबा ने नौकरेां को जलीकटी सुनाते हुए गालियां दीं, चांटे भी मारे। फिर फौरन डिंपल को कार में लिटाकर उपचार के लिए इंदौर रवाना हो लिए।

इधर नकटू और उसके मित्र पठारी जंगल पार कर सिआंखेड़ी गांव के गेंत भी पार कर गए थै यहां से भरखा का जंगल शुरू होता था। यहां रूककर वे सुस्‍ताए फिर बिस्‍किटों को चार बराबर हिस्‍सों में बांटा। बिस्‍किुटों का स्‍वाद लेते ही उनकी दौड़ने की थकान जाती रही। सिआंखेड़ी के टपरों पर रहने वाले सहरिए अटलपुर के सहरियों के नातेदार थे। अतः नकटू अपने मित्रों के साथ सहरियों के टपरों में रूक गया।

जब चार दिन गुजर गए तब उन्‍होंने गांव की सुध ली। अटलपुर के पठारी जंगल में पहुंचने पर उन्‍हें अटलपुर के ग्‍यारें (ग्‍वाले) मिल गए। ग्‍यारें सब सहराने के सहरिए थे। यह सुनकर उन्‍हें तसल्‍ली हुई कि डिंपल उसकी मम्‍मी, उसकी बाबा उसके नौकर सब माल-असवाब गाड़ियों में लादकर उसी दिन अटलपुर से कूच कर गए थे। नकटू अब पूरी जिंदादिली के साथ निर्भय होकर गांव में घूमता। ब्राह्मण और बनियों के जो लड़के उससे कतराते थे वे अब डिंपल के हुए हश्र से सहमकर उसकी चिरौरी में अपनी भलमनसाहत समझने लगे। नकटू जैसे-जैसे उम्र के सोपान चढ़ रहा था, वैसे-वैसे जिंदादिली के साथ उसमें अद्‌भुत नेतृत्‍व क्षमता का उभार होता जा रहा था।

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लेखक परिचय:

नाम ः प्रमोद भार्गव

पिता का नाम ः स्‍व. श्री नारायण प्रसाद भार्गव

जन्‍म दिनांक ः 15 अगस्‍त 1956

जन्‍म स्‍थान ः ग्राम अटलपुर, जिला-शिवपुरी (म. प्र.)

शिक्षा ः स्‍नात्‍कोत्तर (हिन्‍दी साहित्‍य)

रूचियां ः लेखन, पत्रकारिता, पर्यटन, पर्यावरण, वन्‍य जीवन तथा इतिहास एवं पुरातत्‍वीय विषयों के अध्‍ययन में विशेष रूचि।

प्रकाशन ः प्‍यास भर पानी (उपन्‍यास), मुक्‍त होती औरत, पहचाने हुए अजनबी, शपथ-पत्र एवं लौटते हुए (कहानी संग्रह), शहीद बालक (बाल उपन्‍यास) सोन चिरैया सफेद शेर, चीता, संगाई, शर्मिला भालू, जंगल के विचित्र जीव जंतु (वन्‍य जीवन) घट रहा है पानी(जल समस्‍या) इन पुस्‍तकों के अलावा हंस, समकालीन भारतीय साहित्‍य,वर्तमान साहित्‍य, प्रेरणा, संवेद, सेतु, कथाबिंब परिकथा, धर्मयुग, जनसत्ता, नवभारत टाइम्‍स, हिन्‍दुस्‍तान, राष्‍ट्रीय सहारा, नईदुनियां, दैनिक भास्‍कर, दैनिक जागरण, लोकमत समाचार, राजस्‍थान पत्रिका, नवज्‍योति,पंजाब केसरी, दैनिक ट्रिब्‍यून, रांची एक्‍सप्रेस, नवभारत, साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान, कादम्‍बिनी, सरिता, मुक्‍ता, सुमन सौरभ, मेरी सहेली, मनोरमा, गृहशोभा, गृहलक्ष्‍मी, आदि पत्र पत्रिकाओं में अनेक लेख एवं कहानियां प्रकाशित।

सम्‍मान ः 1. म.प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा वर्ष 2008 का बाल साहित्‍य

के क्षेत्र में चंद्रप्रकाश जायसवाल सम्‍मान। 2. ग्‍वालियर साहित्‍य अकादमी द्वारा साहित्‍य एवं पत्रकारिता के लिए डॉ. धर्मवीर भारती सम्‍मान।

3. भवभूति शोध संस्‍थान डबरा (ग्‍वालियर) द्वारा ‘भवभूति अलंकरण'।

4. म.प्र. स्‍वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकरी संगठन भोपाल द्वारा ‘सेवा सिंधु सम्‍मान'।

5. म.प्र. हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन, इकाई-कोलारस (शिवपुरी) साहित्‍य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में दीर्घकालिक सेवाओं के लिए सम्‍मानित।

6. भार्गव ब्राह्मण समाज, ग्‍वालियर द्वारा साहित्‍य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में सम्‍मानित।

अनुभव ः जनसत्ता की शुरूआत से 2003 तक शिवपुरी जिला संवाददाता।

नईदुनियां ग्‍वालियर में 1 वर्ष ब्‍यूरो प्रमुख, शिवपुरी।

उत्तर साक्षरता अभियान में दो वर्ष निदेशक के पद पर।

संप्रति ः जिला संवाददाता आज तक (टी.वी. समाचार चैनल)

संपादक -शब्‍दिता संवाद सेवा, शिवपुरी

दूरभाष ः 07492-232007 मोबा. 09425488224

संपर्क ः शब्‍दार्थ, 49 श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी (म. प्र.)

ईमेल - PramodSVP997@rediffmail.com

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प्रमोद भार्गव

शाही निवास, शंकर कॉलोनी

शिवपुरी (म.प्र.) 473-551

 

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फरियादिया का बयान

              - मेरा नाम विमला है हुजूर । स्‍वर्गीय मास्‍टर जी गोविंद सिंह मेरे पति थे । मेरी उम्र पच्‍चीस साल नौ महीने है ।

              - जी हां, इन सब लोगों को अच्‍छी तरह से जानती हूं मै । ये सब मेरे ही गांव के लोग है ।

              - जी हां मैंने या किसी दूसरे आदमी ने इन लोगों को मेरे पति पर हमला करते नहीं देखा ।

              - जी हां, इन लोगों की मेरे पति से रंजिश थी और गांव के सरपंच पद के पिछले चुनाव से यह लोग मेरे पति को परेशान करते रहते थे ।

              - कारण तो यही था जज साहब, कि मेरे पति चुनाव में खुद उम्‍मीदवार थे, और इन लोगों को ये बात नागवार गुजरी थी, क्‍योंकि दलपत सिंह पिछले बीस वर्ष से इस गांव के तानाशाह सरपंच थे, मेरे पति ने उन्‍हें पहली बार चुनौती दी थी ।

              - जी नहीं, और कोई कारण नहीं था ।

              - ये गलत है हुजूर, इन लोगों में से किसी भी आदमी से मेरे कोई संबंध नहीं रहे हैं ।

              - जी हां, हम लोग यहां के रहने वाले नहीं है । मेरे पति बहुत दूर के रहने वाले थे । उन्‍होंने घरवालों की मर्जी के बिना मुझसे ब्‍याह किया था, इसलिये अपना गांव छोड़कर यहां आ गये थे । अपने गांव में वे बच्‍चों को पढ़ाते थे । इसलिये यहां आकर उन्‍होंने स्‍कूल डाला था । सारे गांव वालों से मेरे पति के अच्‍छे संबंध थे, बस दलपत के आदमी उनको अपना दुश्‍मन मानते थे ।

              - मैंने बताया न मुख्‍य कारण तो वहीं सरंपची का चुनाव था । हुजूर इनके सताये लोग मेरे पति के पास आकर दुखड़ा रोते थे, तो वे उन्‍हें सही रास्‍ता बताते थे, इस कारण भी उनसे दलपत वगैरह ने बैर बांध लिया था । इसी वजह से एक दिन.............

              (टीप - इसके बाद फरियादी बिलख-बिलख कर रो उठी थी और उससे आगे बयान लेना संभव नहीं था - प्रथम श्रेणी जज)

              - जी हाँ मेरे पास आज की तारीख में कोई सम्‍पत्ति नहीं बची है क्‍योंकि मेरे पति ने कभी इतना नहीं कमाया कि वे जोड़ कर रखते । मैं गाँव छोड़ते वखत अपने सारे गहने-गुरिये और थाली बासन संग में लेती आई थी । एक-एक करके वे ही तो बेच रही हूँ नहीं तो मैं और मेरे दोनों बच्‍चे भूखों मर जाते हुजूर ।

              - जी नहीं मेरा यहाँ कोई रिश्‍तेदार नहीं है मैं तो एक धर्मशाला में ठहरी हूँ बस आपसे न्‍याय की फरियाद है ।

              - जी हाँ कल क्‍या होगा ? इसका मुझे कोई पता नहीं । अब तो राम ही रखवाला है ।

        (टीप - फरियादी इतना कहकर फिर से रो पड़ी थी और चुप हो गई थी  - प्रथम श्रेणी जज)

 

 

मुल्‍ज़िम का बयान

              -मेरा नाम दलपत सिंह तनय गिरवर सिंह है सरकार । मेरी उम्र पचपन वर्ष है । मेरा धंधा खेती पाती करना है सरकार ।

              -जी हां मैं मास्‍टर गोविंद सिंह को जानता था सरकार । ईश्‍वर झूठ न बुलवाये, वे चाल- चलन के अच्‍छे आदमी नहीं थे । गाँव की औरतें उनसे दूर रहतीं थीं । इस औरत को भी मास्‍टर भगा के लाया था ।

              -जी नहीं सरकार मैं किसी औरत के बयान नहीं करवा सकता । भले घर की औरत अदालत काहे आयेगी ।

              -मेरी विनती सुने सरकार, मेरे कहने का मतलब अदालत की तौहीन करना नहीं था ।

              -यह गलत है सरकार । मेरी मास्‍टर से कोई अदावत और रंजिश नहीं थी । एक छोटे से मास्‍टर से मेरी क्‍या लड़ाई होती । मैं बीस बरस से गाँव का निर्विरोध सरपंच था, और मास्‍टर मेरी झूठी सच्‍ची शिकायतें करता रहता था मेरे खिलाफ चुनाव में उसकी कोई हैसियत नहीं थी, उसकी तो जमानत जब्‍त हो जाती ।

              -अब मैं किसका नाम लूं सरकार, मास्‍टर के घर पर गाँव भर के उचक्‍के लड़के इकटठे होते थे, सुना है उनमें से कुछ लोगों के साथ मास्‍टर की भीतर वारी के गलत सम्‍बंध थे । उनमें से ही किसी ने मास्‍टर को बीच से हटा दिया होगा ।

यह भी हो सकता है सरकार कि मुझ निरपराध बूढ़े के साथ जिन छः लोगों को मुल्‍जिम बनाया गया उनमें से किसी के साथ इस बदचलन औरत की ऑखें लड़ गई हो । पुलिस से भी पूछ सकते हैं हजूर ।

              -जी नहीं सरकार इन छः लोगों में सिर्फ सिमरन सिंह से मेरा रिश्ता है, यह मेरा बेटा है । बाकी से मेरा कोई रिश्ता नहीं है । न ये मेरे नौकर हैं न साझीदार । यह पाँचों लोग मेरे गाँव के सीधे-सादे लोग हैं । ये लोग मेरे लठैत नहीं हैं सरकार ।

              -अब बड़ी बड़ी मूँछे रख लेने ओर गठीले बदन वाला हो जाने से कोई लठैत या गुण्‍डा तो नहीं हो जाता सरकार । वे चाकू और फरसा तो पता नहीं कहां से पुलिस उठा लाई थी ।

हाँ ज्‍यों ही मुझे पता लगा कि मास्‍टर की किसी ने हत्‍या कर दी है तो में अपने मामा सिरदार सिंह के घर से तुरंत गाँव लौट पड़ा । मेरा बेटा और ये पांचों भी मेरे मामा के यहाँ नाती का जन्‍म होने के मौके पर खुशी मनाने गये थे । गाँव से लौटते में ही पुलिस ने हम लोगों को गिरफ्तार कर लिया और बहुत पीटा हुजूर ।

              -हाँ सरकार मास्‍टर ने हमारे गाँव में बहुत पैसा कमाया । हो सकता है इस लुगाई ने कुछ गहने गुरिया बनवा लिये हों ।

              -यही अर्जी है हुजूर कै हम बेगुनाहों को छोड़ दिया जाये ।

 

बचाव पक्ष के गवाह का बयान

              -मेरा नाम सिरदार सिंह तनय कीरत सिंह है सरकार मैं अस्‍सी बरस का हूं । खेती करता हूं ।

जी हां मेंरे पु़त्र गोपाल सिंह की घर वाली के शादी के बारह साल बाद बेटा हुआ था और उसी दिन मेरा भांजा दलपत सिंह अपने बेटे और इन छह भले आदमियों के साथ मेरे घर आया था सरकार ।

              -अब मुझे क्‍या पता सरकार, कै इन लोगों को मेरे घर उसी दिन नाती होना है यह अंदाज कैसे लग गया ।

हां सरकार इन लोगों में से मेरा भांजा दलपतसिंह बन्‍दूक लिये था और बाकी सब लोग फरसा या लाठी लिये थे ।

              -जी नहीं किसी के पास चाकू नहीं था ।

              -हथियार ले के तो इस लिये चले होंगें सरकार कै कोई जंगली जानवर टकरा जाये या मौका देख के कोई बैरी दुश्‍मन इन पर हमला कर देय तो अपनी रक्षा कर सकें ।

 

 

तफ्‍तीश अधिकारी का बयान

मेरा नाम राम अवध सिंह है सर में इस प्रकरण का जांच अधिकारी हूं । मैं पुलिस में सब इंसपेक्‍टर के पद कर कर्यरत हूं सर ।

              -जी सर पहली बार में हमको मृतक की पत्‍नी ने यही बताया कि मास्‍टर गोविंद सिंह की हत्‍या सरपंच दलपत सिंह ओर उसके लठैतों ने कर दी है इसलिये हमने उन्‍हें गिरफ्तार करके बयान लिये थे ।

              -जी सर, सत्‍य तो ईश्‍वर जाने, पर सरपंच दलपत सिंह का पुराना कोई अपराध का रिकॉर्ड मेरे थाने में मौजूद नहीं है हुजूर ।

              -जी सर, गाँव के कुछ लोगों ने दबे स्‍वर में शंका प्रकट की थी कि मास्‍टर की पत्‍नी के अनेक प्रेमी हैं । हो सकता है उनमें से ही किसी ने मास्‍टर का कत्‍ल कर दिया हो । इस औरत का चरित्र ठीक नहीं है सर । यह औरत अपने माँ-बाप की मर्जी के खिलाफ इस मास्‍टर के साथ भाग कर आई थी । ये भी पता नहीं कि इन्‍होंने बाकायदा ब्‍याह किया है या नहीं ।

              - नहीं सर मैं अपने प्रतिवेदन से पलट नहीं रहा । भाग के प्रेम विवाह करने का मतलब बदचलनी नहीं होता और यह भी सही है सर कि पुराना चरित्र कोई साक्ष्‍य नहीं होता । मैं तो यही कहूँगा सर कि प्रमाण तो ऐसे ही मिले हैं कि हत्‍या मिल-जुल कर की गई है । जुर्म सरपंच पर आयद होता है ।

              - जी सर, उस रात दलपत के मामा के यहाँ नाती पैदा हुआ था और जब हमने इन सातों को गिरफ्‍तार किया था । उस वक्‍त ये लोग उसी गाँव में थे । गाँव लौटकर गवाहों के समक्ष इन लोगों ने सूखे नाले से चाकू और फरसा बरामद कराये थे ।

यह थे वो बयान, जिन्‍हें चंड प्रद्योत सिंह शाम से लिये बैठे थे । शायद बयानों में से कहीं फरियादी की भावनाओं में और, आहत मन में प्रकरण की सच्‍चाई खोलते से । प्रकरण का यथार्थ ढूंढते से । उनके सामने प्रकरण के सारे कागजात फैले पड़े थे और वे कहीं भीतर ही भीतर गुम थे ।

अजित जब उनके पास पहुँचा तो छुट्‌टी होने के बावजूद वे व्‍यस्‍त दिखाई दे रहे थे । उन्‍हें गुम-सुम देखकर अजित भी सन्‍न रह गया - ऐसा तो कभी नहीं हुआ । उन जैसा जज ऐसा चुप्‍पा बनकर बैठ जाये यानि जरूर कोई बड़ी बात है ।

चंड प्रद्योत सिंह तो उसके आदर्श हैं ।

चंड प्रद्योत सिंह, यानि कि जिले के मसीहा ।

चंड प्रद्योत सिंह, यानि कि कानून के रखवाले ।

चंड प्रद्योत सिंह, यानि कि डी.जे. अर्थात डिस्‍ट्रिक्‍ट जज, उर्फ जनपद न्‍यायाधीश ।

चंड प्रद्योत सिंह यानि देश सेवा को समर्पित एक चिर कुंवारे दार्शनिक । अजित नया नया वकील था अदालत में, पर सिंह साहब बहुत कृपालु थे उस पर, और उसे इस बात की अनुमति थी कि वह टाइम बे टाइम कभी भी उनके बंगले पर आ जा सके, इस कारण उसे कम डर लगता था, अन्‍यथा तो हालत यह थी कि घर की बात दूर इजलास में भी फौजदारी का जो मुकदमा चंड प्रद्योत सिंह की अदालत में आता, वकीलों व अपराधियों के दिलों में धड़कने बढ़ जातीं । झूठे या होस्‍टाइल (अदालत में बदलने वाले गवाह) उनके सामने पेश होने से थर्राते थे । पुलिस के कर्मचारी इजलास में प्रवेश करने से पहले ठण्‍डा पानी पीते थे। लोग कहते हैं कि सिंह साहब के पास एक तीसरी आंख भी है, जिसे खोलकर वे अपने सामने मौजूद मुकदमे की असलियत जान जाते हैं । यहां इस जिले में आते ही बड़े अदभुत काम किये हैं उन्‍होंने । तिवारी और शर्मा बन्‍धुओं के बीच विरासत का मुकदमा पिछले चालीस साल से अदालत में चल रहा था । स्‍वर्गीय दाताराम तिवारी पुत्र हीन रहकर स्‍वर्ग सिधारे थे । उनकी दो पुत्रियों और छोटे भाई के दो पुत्रों के बीच एक करोड़ की अचल सम्‍पत्‍ति के उत्तराधिकार का यह दिलचस्‍प मुकदमा शहर में लम्‍बे अरसे से चर्चित था और सुप्रीम कोर्ट तक हो आया था और अब फिर से जिला न्‍यायालय में विचाराधीन था ।

अपनी अदालत में कार्यभार संभालते ही चंड प्रद्योत सिंह जी ने सबसे पहले इसी मुकदमे को हाथ में लिया । दूसरे ही दिन सारे पक्षों को बुलाया और दरवाजे बन्‍द करवा दिये । वकील बाहर थे । उन्‍होंने दोनों पक्षों को सख्‍त भाषा में समझा दिया कि बहुत हो गया अब इस मुकदमे में उलझा कर वे लोग अदालत का कीमती समय नष्‍ट न करें । बेहतर होगा कि वे तीन दिन में आपसी राजीनामा कर लें, अन्‍यथा सारी सम्‍पत्ति राजसात कर ली जायेगी ।

चमत्‍कार हुआ ।

तीन दिन के भीतर उस प्रकरण का पटाक्षेप हो गया था जो चालीस साल में नहीं निपट पाया था । दोनों पक्ष वकीलों के लाख समझाने के बावजूद जिद पर अड़ गये थे और उनने बैठकर आपस में राजीनामा लिख लिया था । अदालत की चहारदीवारी के बाहर यह बात उछली थी और सारे शहर में फैल गई थी । जज साहब का नाम कुछ ही दिनों में शहर में चर्चित हो गया था । लोगों को न्‍याय की दुनिया का यह नया अनुभव था । मुकदमे को छोटे-छोटे मुद्‌दों पर लटकाने के बजाये कोई जिला जज आपसी रजामन्‍दी से निपटाने के लिए खुद पहल कर रहा था - यह तो गाँधी जी के सपने जैसा था ।

बाद के छः महीनों में जज साहब ने कई अजीब फैसले दिये - हत्‍या के अंधे केस में मुल्‍जिमों को सजा देने से लेकर कई राजनीतिज्ञों के विरूद्ध दिये गये उनके फैसलों ने शहर में हड़कम्‍प मचा दिया था । हर हफ्‍ते नये प्रकार के फैसले आते रहते थे उनके ।

शहर में व्‍याप्‍त अतिक्रमण को लेकर जिला उपभोक्‍ता फोरम के अध्‍यक्ष के रूप में उन्‍होंने नगर पालिका के सी.एम.ओ. व नजूल इन्‍सपेक्‍टर को दंडित किया था, तो खम्‍भों के बल्‍ब खराब होने से शहर के कुछ हिस्‍सों में रात को हो जाने वाले अंधेरे को लेकर प्रस्‍तुत एक प्रकरण में उन्‍होंने विद्युत मण्‍डल पर जुर्माना ठोंक दिया था । जिले में जहां भी अन्‍याय था, भ्रष्‍टाचार था, वहां चंड प्रद्योत सिंह अप्रत्‍यक्ष रूप से मौजूद थे । आम आदमी को उन पर इतना विश्‍वास जम गया कि लोगों ने चिट्‌ठी लिखकर उन्‍हें अपना दुःख-दर्द बताना शुरू कर दिया था और यह सच भी था कि लोग तकलीफों से निजात पाने भी लगे थे। जिला उपभोक्‍ता फोरम से लेकर जिला न्‍यायालय तक, जहां भी वे उपयुक्‍त समझते, लोगों की चिटिठयों को वाद-पत्र मानकर प्रकरण खोल देते थे ।

अजित से उनने ज्‍यादा बातचीत नहीं की, बस हाँ हूँ करते रहे । अजित समझ गया कि आज वे किसी गहरे अंतर्द्वन्‍द्व में हैं । वह उनसे अनुमति लेकर घर लौट आया ।

रात बीतती जा रही थी, पर सिंह साहब की आंखों में नींद न थी, मास्‍टर जी की हत्‍या का जो मुकदमा उनके इजलास में था उसका कल फैसला सुनाना था । वे एक बार फिर फाइल में उलझ गये।

इस हत्‍याकांड के सातों मुलजिमों ने शुरू में अपने बयान में इस हत्‍या के बारे में साफ अनभिज्ञता जाहिर की थी । उनके मतानुसार मृतक की पत्‍नी का चरित्र संदिग्‍ध था और यह हत्‍याकांड विमला के किसी प्रेमी का ही काम है । हत्‍या वाले दिन सातों मुल्‍जिम अपनी उपस्‍थिति दूसरे गांव में दलपत सिंह के मामा के यहां एक शादी में दर्शा रहे थे । जज साहब ने देखा कि हालांकि पुलिस और शासकीय अभियोजक के क्रॉस-एग्‍जामिनेशन में वे लोग बिखर से गये थे, न तो विमला के किसी प्रेमी का वे नाम बता पाये थे और न ही दलपत के मामा का यह बयान विश्‍वस्‍त था कि सरपंच दलपत सिंह और उसके आठों गुर्गे शादी में मौजूद थे और फिर गोविंद सिंह के शव पर पाये गये डेढ़-डेढ़ इंच की गहराई के सत्‍तावन घाव यह बताते थे कि यह कत्‍ल किसी एक व्‍यक्‍ति का काम नहीं है,  बल्‍कि मिल कर कई लोगों ने यह जघन्‍य हत्‍या की है । पिछले साफ रिकॉर्ड के कारण जज साहब को शुरू में मुल्‍जिमों को जमानत पर छोड़ना पड़ा था । इस कारण मुलजिम सीना ताने घूम रहे थे । हालांकि पुलिस के वकील ने शंका जाहिर की थी - सरपंच साहब आप लोग ज्‍यादा न उछलें, इस जज का भरोसा नहीं, पता नहीं कब क्‍या फैसला दे दे ।

इस समय जज साहब के मस्‍तिष्‍क में जो बात फनफनाती घूम रही थी वो यह थी कि छब्‍बीस साल की मासूम, सीधी और अनाथ इस विमला का भविष्‍य क्‍या होगा ?

उन्‍हें हरिपुर का मानसिंह हत्‍याकांड खूब याद है । उन दिनों प्रथम श्रेणी जज थे वे । हरिपुर के चौकीदार मानसिंह की हत्‍या गांव के ताकतवर जमींदार ने कर दी थी । वह केस दो वर्ष तक चला था। चौकीदार की विधवा पत्‍नी चम्‍पा दो साल तक खूब भागती-दौड़ती रही थी थानों-अदालतों में और इन दो सालों में चम्‍पा को खूब सारे प्रलोभन दिये गये थे धमकियाँ दी गई थी । न मानने पर उत्‍पीड़ित किया गया तो अंततः वह टूट गयी थी ।

वे तो यह देखकर चकित रह गये थे कि चम्‍पा उस दिन तक बिल्‍कुल बदल चुकी थी, जिस दिन उसके पति के कत्‍ल के मुकदमे का फैसला होना था। अदालत में वह खूब सज-धज कर आयी थी । न चेहरे पर दुःख की छाया थी और न बातचीत में कातरता । बाद में पता चला कि गांव में अब उसका चरित्र भी संदिग्‍ध हो चुका है । फरियादी की ढील व पुलिस की लापरवाही से अपराधी बेदाग छूट गये थे

तब उन्‍होंने तय किया था कि अदालती लेट-लतीफी के कारण अपना वश चलते वे अब किसी को चम्‍पा की तरह बर्बाद नहीं होने देंगे ।

हालांकि अदालती लेट-लतीफी के शिकार तो सक्‍सेना बाबू भी हुए थे । सक्‍सेना जी किसी दफ्‍तर में बाबू थे और कहीं बाहर पदस्‍थ थे । कस्‍बे का अपना खानदानी मकान, उन्‍होंने एक आदमी को किराये से रहने को दिया था । बाद में वह आदमी मकान पर ऐसा काबिज हुआ था कि किराया देना तो दूर मकान ही खाली करने से इन्‍कार कर दिया था । बेचारे सक्‍सेना रिटायर होकर अपने कस्‍बे में लौटे तो रहने को जगह भी नहीं मिली । परिणाम यह हुआ कि किरायेदार ठप्‍पे से मकान में जमा रहा । सक्‍सेना जी खुद किराये के मकान में रहकर मुकदमा लड़ते रहे और अंततः किराये के मकान में ही चल बसे थे ।

चंड प्रद्योत सिंह के संपर्क में आकर अजित ने जाना था कि अदालती ताम-झाम और न्‍यायिक गरिमा के घटाटोप के भीतर एक उजला-उजला निष्‍पाप सा मन जज साहब के भीतर आज भी मौजूद है । बचपन में उन्‍होंने अदालती झंझटों की जाने, कौन सी पीड़ा सही थी कि उनके मस्‍तिष्‍क में यह बात पूरी तरह से बैठ गयी थी, कि देर से न्‍याय मिलना अन्‍याय के समान है ।

जब वे मुक्‍त मन से बातचीत करते, तो अजित को समझाते- ‘‘देखो अजित आज हर वकील व्‍यावसायिक दिमाग का हो गया है । जो जितने ज्‍यादा समय तक मुकदमा खींचेगा, उसको उतनी ज्‍यादा फीस मिलेगी । पर मानवता के नाते यह गलत है । आज जो पारस्‍परिक झगड़े और हिंसा बढ़ रही है न हमारे समाज में, इसका मूल कारण अदालतों की, न्‍याय की लेट-लतीफी है । भला आज के जमाने में इतना सबर है किसके पास कि वो दस-पांच साल न्‍याय का इंतजार करे सो आदमी कानून हाथ में ले लेता है । इसलिये यदि वकालत के धंधे में ही तुम सारी जिंदगी गुजारना चाहते हो, तो मेरी एक बात गांठ बांध लो, कि हर मुकदमा जित्‍ती जल्‍दी हो सके निपटाने का यत्‍न करना।''

कुछ संकोच और कुछ दुविधा में फंसा अजित हां-हूं करता । पर वे अपनी धुन में जाने क्‍या-क्‍या कहते रहते । अपने मन की प्रायः हरेक बात वे उससे कहते ।

अजित ने देखा था कि जब अदालत में वकीलों की गर्मा-गर्म बहस चल रही होती, सिंह साहब गहरी नजरों से फरियादी और मुल्‍जिम को घूर रहे होते । अपनी ओर से वे दोनों पक्षों से अनेक सवाल पूछा करते थे, मसलन उन लोगों का रोजगार क्‍या है? परिवार में कितने लोग हैं ? वे कहां तक पढ़े-लिखे हैं, वगैरह-वगैरह ।

गोविंद सिंह हत्‍याकांड में उन्‍होंने फरियादी विमला से जब यह सब पूछा, तो वह फूट पड़ी थी और बताती चली गई थी । अदालत ने उसकी मुंह जुबानी पिछला इतिहास जाना था ।

मास्‍टर गोविंद सिंह दरअसल पिछड़ी जाति में से थे, और उनका स्‍वभाव शुरू से ही बड़ा उदार और मस्‍त था । विमला के पिता शिक्षा विभाग के अधिकारी थे सो इनके परिवार में उनका आना-जाना था । विमला से परिचय हुआ, दोनों में प्रगाढ़ता बढ़ी और दोनों ने साथ-साथ जिंदगी बिताने का निर्णय ले लिया । घर वालों ने अनुमति नहीं दी, तो उन्‍होंने अपना कस्‍बा छोड़ दिया और इस गांव में आकर रहने लगे । गाँव में मास्‍टर की लगातार बढ़ती लोकप्रियता से दलपत सिंह को खुटका हुआ तो उसने गोविंद सिंह को रोका था कि वह अपने घर पर गांव के आवारा लड़कों को इकट्‌ठा न किया करें, क्‍योंकि नयी नवेली दुल्‍हन घर में रहती है । वहाँ भीड़ लगाना उचित नहीं है । तो गोविंद सिंह ने खुले मन से कह दिया था कि उसके यहां सब उम्र के लोग इकट्‌ठे होते हैं, नया और आवारा कोई लड़का नहीं आता, इसलिये सरपंच साहब बेफिक्र रहें । तो दलपत चिढ़ गया था । सरकारी धन के गबन की शिकायतें भी मास्‍टर साहब ने दलपत के खिलाफ कराई थीं । फिर खुद भी चुनाव लड़ बैठे थे ।

पंचायत चुनाव के तीन दिन पहले की बात है । गोविंद सिंह पास के गाँव से जनसम्‍पर्क करके लौट रहे थे, कि दलपत और उसके आदमियों ने उन पर कातिलाना हमला बोल दिया और गोविंद सिंह के बदन में ऐसे घाव हो गये थे कि वे मौके पर ही खत्‍म हो गये ।

कल जज साहब ने गौर से विमला को देखा था । एक पुरानी सूती साड़ी में अपने तन को ढके वह अपने दो बच्‍चों के साथ पेशी पर मौजूद थी । छब्‍बीस साल की उम्र में भी वह पचास साल की प्रौढ़ा लगने लगी थी । उसकी आँखों में निराशा का गहरा समंदर लहराता दिखा था जज साहब को, पर उन्‍हें इस बात की हल्‍की सी खुशी हुई कि न्‍याय के नाम पर अब भी विमला के मन में आशा का दीप टिमटिमा रहा है ।

उन्‍होंने विमला से पूछा कि इस समय वह क्‍या कर रही है तो उसने बताया कि वह गांव छोड़ते वक्‍त अपने हाईस्‍कूल के सर्टिफिकेट ले आई थी जिनको लेकर यहाँ वह तमाम स्‍कूलों में हो आई है - किसी नौकरी के लिये । पर हर जगह निराशा ही मिली उसे । अब एक ही रास्‍ता बचता है कि वह कहीं मजदूरी करे । उसने अपने पिता के घर लौटने का सोचा तो उसे विश्‍वास नहीं हुआ था कि ऐसी स्‍थिति में पिता उसे आसरा देंगे ।

अजित से सीधा प्रश्‍न किया था सिंह साहब ने कि ‘‘बताओ अजित, यदि इन सातों मुल्‍जिमों को मैं सजा-ए-मौत भी दे दूं तो विमला को क्‍या मिलेगा ? ''

अजित ने तपाक से कहा था - ‘‘ न्‍याय ''

              ‘‘इस न्‍याय को विमला ओढ़ेगी कि बिछायेगी  ? भला उसे और बच्‍चों को क्‍या फायदा होगा इस सजा से ?''

              ‘‘तो'' अजित ने प्रश्‍न उछाला था और इस ‘‘तो'' का जवाब वे नहीं दे सके थे ।

अदालत में विमला के साथ हर पेशी पर आने वाले उसके दोनों बेटों को उन्‍होंने कई बार देखा था । पांच और सात वर्ष के वे नन्‍हें बालक भयाक्रांत हरिण-छौनों की तरह मां की गोद में बैठे रहते थे और सजल नेत्रों को झुकाये विमला, हर पेशी पर कैसी दारूण यातना झेलती होगी, इसका कुछ अंदाजा भी उन्‍होंने लगाया था । हर पेशी उसे पीड़ा देती थी और हर पेशी पर अदालती कार्यवाही के विवरणों के कारण उसका पति एक बार फिर कत्‍ल होता था,  ।

गांव में विमला जिस मकान में पति के साथ किराये में रहती थी, वह किराये का था । उनके पास कोई अचल संपत्ति नहीं थी और पति का अब तक का जोड़ा थोड़ा सा पैसा भी खर्च में चुक गया था अपने एक आवेदन में विमला ने उन्‍हें यह लिखकर दिया था जो फाइल में लगा हुआ था ।

सातों मुल्‍जिमों की तरफ से शहर के कई बड़े और नामी वकील मौजूद थे, जबकि विमला व सरकार की तरफ से मात्र सरकारी वकील प्रकरण में अभियोजन पक्ष का प्रतिनिधित्‍व कर रहा था । सरकारी वकील यानी कि राजनैतिक दल का कार्यकर्ता ! यानि कि अनप्रोफेशल प्‍लीडर । केस अंधा था ।

वे देर रात तक जागते रहे, बल्‍कि यूं कहें वे आधी से ज्‍यादा रात तक वे जागते रहे । डेढ़ बजे वे बिस्‍तर पर पहुंचे ।

जज साहब ने ठीक पहचाना, वह विमला ही थी जो रेड लाइट एरिया के एक कोठे के दरवाजे पर सस्‍ते से मेकप में लिपी-पुती खड़ी थी । उसे देखकर वे अपना आपा नहीं रख पाये और नाराज होते हुये उसे डांटने के लिए उधर ही लपके । अभी वे सीढ़ियों पर ही थे कि सारा दृश्‍य धुंधला उठा । उनकी नींद टूट रही थी । उफ, तो सोते समय भी वे इस मुकदमे के मानसिक दबाव से मुक्‍त नहीं हो पाये ।

वे उठे और सिर थाम कर बैठ गये । बैठे-बैठे देर तक अपने-आपको उन्‍होंने यह समझाने का यत्‍न किया कि ये राजकाज है और उन्‍हें नौकरी की समस्‍याओं में अपने-आपको इस सीमा तक लिप्‍त नहीं करना चाहिये कि रात की नींद और दिन का चैन हराम हो जाये ।

उन्‍होंने वेलियम-5 की एक गोली ली और पानी के साथ गटक गये । थोड़ी ही देर में उन्‍हें सुस्‍ती सी आ गयी थी और तन्‍द्रा में डूबे हुये वे पुनः बिस्‍तर पर लेट गये ।

स्‍वप्‍न ने अब भी पीछा नहीं छोड़ा था, विमला और उसके दोनों बच्‍चे इस बार भिखारियों के रूप में दिखे थे उन्‍हें और उनका स्‍वप्‍न जल्‍दी ही टूट गया था । नींद भी जल्‍दी ही आ गयी थी । ताज्‍जुब कि तीसरी बार विमला उन्‍हें दलपत की हवेली में दिखी थी - चम्‍पा जैसी सजी-धजी । सपने में ही झुंझलाते हुये उन्‍होंने उसे डांटने का यत्‍न किया तो फिर से नींद खुल गयी थी और इस बार उनको सिर में हल्‍का सा दर्द महसूस हुआ था । घड़ी देखी तो पता चला कि चार बज रहे हैं ।

कुछ देर बैठे रहकर उन्‍हें फिर नींद आती लगी, तो वे लुढ़क गये, और इस बार उन्‍हें सचमुच नींद आ गई ।

सुबह वे देर तक सोते रहे ।

उस दिन वे कुछ विलम्‍ब से अदालत पहुँचे, पर डाइस बैठते ही पहला मुकदमा उन्‍होंने गोविंद सिंह हत्‍याकांड का लिया ।

आवाज लगी । मुल्‍जिम आये । वकील आये ।

पुलिस आयी । विमला आयी। दोनों बच्‍चे भी आये ।

अदालत में सन्‍नाटा था और जज साहब ने अपना फैसला पढ़ना शुरू कर दिया । लोग दत्तचित्त होकर सुनने लगे ।

एक पंक्ति के फैसले में जज साहब ने सातों मुल्‍जिमों को उम्र कैद की सजा सुनायी और चुप हो गये । फिर उनने वहाँ मौजूद लोगों पर एक नजर डाली और वे अगला पैराग्राफ पढ़ने लगे - ‘‘अदालत सातों मुल्‍जिमों पर पच्‍चीस हजार रूपये प्रति व्‍यक्‍ति के हिसाब से अर्थदण्‍ड भी आरोपित करती है । यह राशि अदालत खुद वसूल करेगी और मृतक की विधवा को सौंप देगी, ताकि वह अपना और बच्‍चों का अगला जीवन सुरक्षित और निश्‍चित तरीके से गुजार सके । ''

वकीलों की कानाफूसी ने सन्नाटा भंग कर दिया ।

ये फैसला किस धारा के तहत है ? पत्रकार लोग अपनी निगाहों में प्रश्‍न लिये एक-दूसरे को ताकने लगे थे और मुल्‍जिमों पर तो जैसे साँप लोट गया था ।

जज साहब संतुष्‍ट थे, जबकि विमला अपने दोनों बच्‍चों के साथ दूर से उनकी आसंदी को प्रणाम करती हुयी रोये जा रही थी । उसे कहाँ विश्‍वास था कि इतनी महंगी न्‍याय प्रणाली, वकीलों के अनाप-शनाप खर्चे, लम्‍बी-लम्‍बी तारीखें और पुलिस के बदल जाने वाले तफ्‍तीश अधिकारी तथा गवाहों के धुरंधर कागजी युद्ध में उस जैसी निहत्‍थी, गरीब, ईमानदार अबला को न्‍याय मिलेगा ।

और यह हुआ । बीसवीं सदी का अन्‍त हो रहा था । माननीय उच्‍च न्‍यायालय और सर्वोच्‍च न्‍यायालय अपने सीधे निर्देशों के द्वारा लोकतन्‍त्र की रक्षा में जुटे हुए थे । तमाम राजनैतिक घोटालों ने कार्यपालिका पर लगातार विश्‍वास कम किया था । लेकिन न्‍यायपालिका के सर्वोच्‍च मंच से लेकर चण्‍ड प्रद्योत सिंह की जिला अदालत ने भी न्‍याय को कायम रखा था । यह कम नहीं था । एक आश्‍चर्य ही तो था । विमला का भीतरी विश्‍वास और ताकतवर हो उठा । अब वह इस समाज के दुष्‍टों से जूझ ही लेगी ।

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