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April 2010
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ashok jamnaee (Mobile)

धूप

धूप है बहुत
तुम याद मत आना
पैर जल रहें हैं
तुम याद मत आना
छाँव दूर है
तुम याद मत आना
मुश्किल भरा सफर है
तुम याद मत आना
वैसे तुम्हारी याद तो
सुकून है मेरा
पर देख नहीं सकता
धूप के सफर में
मुश्किल सी रहगुज़र में
तुम्हारी याद का आना
और उसके नाजुक पांवों में
छालों का पड़ जाना

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अशोक जमनानी
युवा साहित्यकार, होशंगाबाद
www.ashoknaamaa.blogspot.कॉम
(प्रकाशित उपन्यास ; व्यास गादी, बूढ़ी डायरी, को अहम् )

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कविताएं

प्‍यार

प्‍यार स्पर्श है अहसास है

चलती-रूकती एक श्‍वास है।

प्‍यार मिलन है, जुदाई भी

प्‍यार अमन है, खुदाई भी।

प्‍यार पूजा है इबादत है

कभी बैचेनी कभी राहत है।

प्‍यार हकीकत है सपना भी

कुछ पराया है तो अपना भी।

प्‍यार कुदरत का करिश्मा है

टंगारों में लिपटा सर्द चश्मा है।

 

 

अनछुआ मन

जब जन्‍मी तो सबने कहा

लड़का होता तो अच्‍छा होता

शाला जाने लगी तो टोका

रहने दे, घर का काम सीख

युवा सपनों ने हर बार कचोटा

उमंगें नहीं विवशता बुन

कहने का हक नहीं है तेरा

जो कहें, सबकी सुन

घर-ससुराल-समाज

भोगा सभी ने तन

नारी देह के भीतर

अनछुआ रह गया मन।

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---उमेश कुमार चौरसिया

http://umeshkumarchaurasia.blogspot.com

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यदि दो आदमी आपस में  अनजाने में टकरा जाएँ तो वो एक दूसरे के ऊपर मुट्ठी तान लेंगे.

पहला बोलेगा – ‘ऐ – अंधा है क्या? देख के नहीं चल सकता?’

‘अंधा तू है कि मैं? खुद तो बिनदेखे चल रहा है. ज्यादा श्यानापण मत दिखा नहीं तो एक मुक्का मारकर आँख सुजा दूंगा’दूसरा प्रत्युत्तर देगा.

‘अच्छा, हाथ लगा के तो देख – मैं तेरे दोनों आँख फोड़ दूंगा’ – पहला और गर्म हो जाएगा.

एकाध मिनट में दोनों में गुत्थमगुत्था होने लगेगा और दर्शकों में से कुछ को मजा आने लगेगा तो कुछ को जबरन बीच-बचाव करना पड़ेगा, जो आमतौर पर सफल नहीं होगा. इस तरह से प्रायः एक नई पक्की, खानदानी दुश्मनी की शुरूआत हो जाती है.

इसके विपरीत यदि दो औरतें टकरा जाएँ तो क्या होगा?

‘सॉरी, मैं उधर शॉपिंग विंडो में उस पीले रंग की साड़ी को देख रही थी…’ पहली बोलेगी.

‘ओह, कोई बात नहीं, मेरा ध्यान भी उधर काउंटर पर लाल रंग के गाउन पर अटका हुआ था’ दूसरी प्रत्युत्तर देगी.

‘अरे, ये तुमने कितना प्यारा आई शेडो लगाया है. लॅक्मे का है क्या? मेरे पास रेव्लॉन है उसमें तो ऐसा शेड नहीं आता…’ पहली और फ्रेंडली हो जाएगी.

‘नहीं, मेरे वो कुवैत से ले आए थे – जाने क्या ईव सें लारेंस जैसा कुछ अजीब नाम है… तुम्हारे बालों की पर्मिंग बड़ी शानदार है यार… मेरे पतले बाल तो नारियल की जटा जैसे रूखे ही रहते हैं… क्या करती हो अपने बालों के लिए…’ दूसरी दोस्ती का हाथ और आगे बढ़ाती है. और इस तरह एक नई पक्की दोस्ती की शुरूआत हो जाती है.

 

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आशुफ़्ता चंगेजी की ग़ज़ल

 

सदाएँ कैद करूं, आहटें चुरा ले जाऊँ,

महकते जिस्म की सब खुशबुएँ उड़ा ले जाऊँ.

 

तेरी अमानतें महफूज रख न पाऊंगा,

दुबारा लौट के आने की बस दुआ ले जाऊँ.

 

बला का शोर है तूफ़ान आ गया शायद,

कहाँ का रख्त-ए-सफर खुद को ही बचा ले जाऊँ.

 

कहा है दरिया ने वह शर्त हार जाएगा,

जो एक दिन में उसे साथ में बहा ले जाऊँ.

अभी तो और न जाने कहाँ कहाँ भटकूं,

कभी बहाया था दरिया में जो दिया ले जाऊँ.

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मुनव्वर खानम की ग़ज़ल

 

रात के पिछले पहर हमको सदा देता है कौन,

दर्दे दिल के रोग की हम को दवा देता है कौन.

 

पहले तो जलवा दिखाकर छीनकर होशो हवास,

रेशमी आंचल से फिर हमको हवा देता है कौन.

 

जिस जमीं में हो चुके हैं बारहा बेबस्त हम,

फिर इसी मिट्टी से ये हमको बना देता है कौन.

 

हम तलाशे आदमीयत में हैं सबसे बे-खबर,

मन के मंदिर में मगर हमको सजा देता है कौन.

 

हम मुनव्वर दिल के अरमां रखते हैं सब से छुपाए,

दिल में आकर चुपके से उनको मिटा देता है कौन.

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शिव ओम अंबर की ग़ज़ल

 

सच हुए एक ख्वाब-सी है वो,

शूलवन में गुलाब-सी है वो.

 

मैं किन्हीं खुरदरे सवालों-सा,

खूबसूरत जवाब-सी है वो.

 

इस नजर में खुला हुआ घूंघट,

इक नजर में नकाब-सी है वो.

 

छू उसे चोट हर बनी नगमा,

शख्सियत में रवाब-सी है वो.

 

बांच उसको बिखर-बिखर संवरा,

इक मुकद्दस किताब-सी है वो.

 

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इनायत उल्ला खान ‘बेनाम’ की ग़ज़ल

 

रात आई मैं बच्चों को पढ़ाने में लगा हूं,

जो खुद न हुआ उनको बनाने में लगा हूं.

 

दिन भर की मशक्कत से जो लाया हूं कमाकर,

अब भूख मैं बच्चों की मिटाने में लगा हूं.

 

वह शख्स जो रग-रग में छुपा के बैठा है मेरी,

बरसों से गला उसका दबाने में लगा हूं.

 

पत्थर था तो शीशे से मुझे काम पड़ा था,

शीशा हूं तो पत्थर के जमाने में लगा हूं.

 

ऐसे में तो अब सब्र भी मुश्किल हुआ ‘बेनाम’,

सब कहते हैं मैं खुद को मिटाने में लगा हूं.

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(सभी ग़ज़लें – साभार, सारिका 1986, विविध अंक, चित्र – सोनम सिकरवार की कलाकृति)

pramod bhargav

भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में साधारण बीमारियों को महामारी में बदलने का खेल चल रहा है। यह खेल बहुराष्‍ट्रीय दवा कंपनियां अरबों-खरबों का कारोबार करने के लिए खेल रही हैं। हाल ही में कुछ ऐसी जानकारियां सामने आई हैं जिनसे खुलासा हुआ है कि संक्रमण रोगों की रोकथाम के लिए पिछले ढाई दशक से चलाए जा रहे टीकाकरण कार्यक्रमों की पृष्ठभूमि में निजी कंपनियों का यह मुनाफे से जुड़ा कारोबार है। जिस स्‍वाइन फ्‍लू को महामारी माना जाकर पिछले एक साल से पूरी दुनिया में हल्‍ला मचा हुआ है, उससे अब तक केवल 60 लोगों के मरने की पुख्‍ता खबर है। जबकि बीते साल अप्रैल में जेनेवा में आयोजित एक आपात बैठक में विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की महानिदेशक माग्रेट चाम ने कहा था कि स्‍वाइन फ्‍लू के कारण पूरी मानवता खतरे में है। हमारे केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने भारत की एक तिहाई आबादी को इस बीमारी की चपेट में बताते हुए देश के हरेक जिले के लिए दस हजार खुराक दवा खरीद ली थी। एड्‌स, पोलियो हेपेटाइटिस-बी, बर्ड फ्‍लू, एंथ्रेक्‍स जैसी अनेक बीमारियों को जीव जगत के लिए महामारी का सुनियोजित खतरा जताकर दवा कंपनियां और स्‍वास्‍थ्‍य अमला लाभ के धंधे में लगे हैं।

विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की कार्यशैली पर अब सवाल उठने लगे हैं। हाल ही में दिल्‍ली में इस संगठन की संपन्‍न हुई एक बैठक में एक अधिकारी ने खुद यह सच्‍चाई कबूली कि स्‍वाइन फ्‌लू को विश्‍वव्‍यापी महामारी घोषित करने का जो काम विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने किया है, वह झूठा था। ऐसा केवल बड़ी व विश्‍वस्‍तर पर दवा का व्‍यापार करने वाली कंपनियों को लाभ पहुंचाने के नजरिये से किया गया। दरअसल इस बीमारी के जो विशेषज्ञ इसके उपचार के प्रति जवाबदेह होने चाहिए थे, वे इसे महामारी घोषित करने में लगे थे, क्‍योंकि उनके कुछ दवा कंपनियों से व्‍यावसायिक संबंध थे। स्‍वाइन फ्‌लू के विश्‍वव्‍यापी हल्‍ले के बाद अब इस तथ्‍य की पुष्‍टि हो गई है कि इस कथित महामारी से कुल साठ मौंते हुई हैं। अमेरिका में कुल 4298 स्‍वाइन फ्‌लू के रोगी सामने आए, जिनमें से केवल इकत्‍तीस मौंते हुईं। इस रोग के लक्षण पाए तमाम रोगियों को तो बुखार तक नहीं आया। जबकि विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की महानिदेशक मार्ग्रेट चान ने इसे दुनिया की मानवता के लिए खतरा बताया था। इस खौफ के ऐलान के बाद करीब बीस दिन मेक्‍सिको शहर का कारोबार ठप्‍प रहा। हमारे देश के केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री गुलाम नवी आजाद ने भी बीते साल अगस्‍त में चेतावनी दी थी किं भारत की एक तिहाई आबादी इस बीमारी की चपेट में है। मीडिया ने इस बयान को प्रचारित कर पूरे देश को एक काल्‍पनिक बीमारी से डरा दिया था।

भारत में विभिन्‍न बीमारियों के उन्‍मूलन के दृष्‍टिगत राष्‍टव्‍यापी अभियान विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की देख-रेख में चलाए जा रहे हैं। पोलियो के सिलसिले में दावा किया गया था कि 2005 तक पोलियो को निर्मूल कर दिया जाएगा। लेकिन बीस सालों में करीब छह अरब डॉलर खर्चने के बावजूद देश को पोलियो के संक्रमण से छुटकारा नहीं मिला। अब तक पूरी दुनिया में पोलियो की खुराक लेने के बावजूद पोलियो संक्रमण से प्रभावित दो हजार से भी ज्‍यादा मामले सामने आ चुके हैं। भारत के अकेले उत्‍तर प्रदेश में 2005 में एक साथ 66 मामले सामने आए थे। बाद में इनकी संख्‍या बढ़कर 380 तक पहुंच गई थी।

इसी दौरान इस जानकारी की पुष्‍टि हुई थी कि देश के 12 राज्‍यों के 87 जिले पोलियो के बीषाणुओं से ग्रसित हैं। इससे मुक्‍ति के उपायों को तलाशने की बजाय नई अवधारणा गढ़ी गई कि वीषाणु की प्रकृति पर नियंत्रण के लिए तकरीबन 10 खुराक दवा पिलाई जाए। लिहाजा अब पांच साल की उम्र तक के बच्‍चों को दवा पिलाने का अनवरत सिलसिला शुरु हो गया। जबकि जरुरत यह थी कि दवा पिलाने के बाद पोलियो के मामले क्‍यों सामने आ रहे हैं इसकी जड़ों को खंगाला जाए। क्‍योंकि इसी समय पोलियो की दवा बिवकॉल के सिलसिले में इसकी गुणवत्‍ता को लेकर सवाल उठाए गए थे। पोलियो वेक्‍सीन में पंजाब में कीड़े तक पाए गए थे। पंजाब सरकार की चिट्‌ठी के जवाब में केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय ने 24 अप्रैल 2006 के पत्र में हवाला भी दिया था कि बिवकॉल नामक दवा में कीड़े हैं इसलिए उंची गुणवत्‍ता की दवा तैयार कराकर पोलियों की खुराक पिलाई जाए। दवा में कीड़े पाने की असलियत सामने आती इससे पहले बुलंदशहर में दवा का निर्माण कर रही इस कंपनी के दवा नमूनों को ही बदल दिया गया। दिल्‍ली के ओखला क्षेत्र में पेनेशिया नाम की कंपनी भी पोलियो भी दवा बनाने का काम करती है। इन दवा निर्माण कंपनियों के साथ शर्त जुड़ी होती है कि इनके संयंत्र ऐसे क्षेत्रों में लगे हों जहां दो किलोमीटर के दायरे में अन्‍य कोई निर्माण न हो, जिससे इसके विषाणु न पनपें। लेकिन दोनों ही कंपनियों के संयंत्र मानव बस्‍तियों के बीच स्‍थापित हैं। बहरहाल स्‍तरहीन दवा का निर्माण और उसकी खुराक की खपत का सिलसिला जारी हैं।

दरअसल हमारे देश में ऐसी नीतियां अमल में लाई जा रही हैं जो स्‍तरहीन दवा उद्योग को प्रोत्‍साहित करने वाली हैं। इस ऐवज में पिछले कुछ सालों के भीतर भारत सरकार की उन दवा कंपनियों को भी हतोत्‍साहित करने की कोशिश की गई जो पोलियो व अन्‍य महामारियों के उचित गुणवत्‍ता वाले सस्‍ते टीके तैयार करती हैं। इन कंपनियों को बंद कर देने तक की साजिश रची गई। लेकिन कंपनियों में सेवारत कर्मचारियों और संसद में हल्‍ला मचने पर कंपनियों की तालाबंदी रोकी गई। अलबत्‍ता इतना जरुर किया गया कि सरकारी दवा निर्माण कंपनियों में उन टीकों का उत्‍पादन बंद कर दिया गया जिनकी खपत टीकाकरण मुहिम के अंतर्गत देशव्‍यापी होती थी। इसके बाद निजी क्षेत्र की कंपनियों को लाभ पहुंचाने के नजरिये से पांच महामारियों का एक टीका पेंटावेंलेंट बनाने की योजना भी बनाई गई। हालांकि विरोध के चलते अभी इस योजना पर भी अमल संभव नहीं हो सका।

स्‍वाइन फ्‌लू, पोलियो, एड्‌स,, एंथे्रक्‍स और हेपेटाइटिस बी की तुलना में तपेदिक मसलन टीबी एक ऐसी जानलेवा बीमारी है, जिसके प्रभाव से करीब 17 लाख लोग हर साल मारे जाते हैं। टीबी के जीवाणु माइक्रो बैक्‍टीरियम ट्‌यूबरक्‍लोसिस के संक्रमण से ग्रस्‍त करीब एक लाख महिलाओं को उनके पति छोड़ देते हैं। केन्‍द्र सरकार भी इस पर काबू के लिए करीब तीन सौ करोड़ रुपये प्रतिवर्ष खर्च करती है। इसके बावजूद इस वास्‍तविक बीमारी पर रोकथाम के उचित उपायों की बजाय उन काल्‍पनिक बीमारियों को महामारियों में तब्‍दील करने का हौवा खड़ा करते रहते हैं, जिनसे तपेदिक के मुकाबले बहुत ही कम लोग काल कवलित होते हैं। हालांकि अब भारतीय वैज्ञानिकों ने एमटीबी के जीनोम की पहचान कर उन सभी चार हजार कोशिकाओं को चिन्‍हित कर लिया है जो इसकी जड़ में हैं। अब तक केवल एक हजार कोशिकाओं की ही वैज्ञानिकों को जानकारी थी। इस नए अनुसंधान से यह उम्‍मीद जगी है जब दवा क्षेत्र में चल रहे मुनाफे के कारोबार से तपेदिक की दवाओं का निर्माण और उपचार को अलग रखा जाएगा। लेकिन बीमारियों को काल्‍पनिक महामारी बना देने की मुहिम से देश को कैसे छुटकारा मिले, यह सवाल बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों के मजबूत वर्चस्‍व के चलते यथावत है।

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प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है।

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आजकल सभी तरफ छपने छपाने का जो दौर चल पड़ा है,कई बार दिल इतना क्रोधित होता है कि,कुछ कर नहीं पाने पर बस सिर फोड़ने की इच्छा होती है. देश भर के लगभग सभी इलाकों में आजकल जो बात बड़ी जोर पकड़ती जा रही है,वो एक बीमारी के माफिक ही है, साहित्यकार बनाने और बनने की. कुछ गलतफहमी में बन बैठे हैं तो कुछ को इलाके के अनपढ़ अखबारी संवाददाता, बना देते हैं. हमारे इलाके में भी जो पी.एचडी. करने बाबत जरुरत के मुताबिक् मेहनत नहीं कर पाए वे अपनी दिखावटी इज्जत बचाने को प्रोफ़ेसर लिखते है.उन्हें ये मालूम नहीं की कॉलेज वाले ही प्रोफ़ेसर बन जायेंगे तो विश्वविद्यालय वाले कहाँ जायेंगे. खैर. पिछले कुछ दिनों के स्थानीय अखबारों की प्रतियां बांच रहा था. बड़ा ताज्जुब हुआ जब किसी तहसील के छोटे से गाँव में वहाँ के इलाके के साहित्यकारों की बैठक आयोजन की खबर छपी थी. भैया जी, जहां हमारे पूरे मेवाड़ में कहा जाता है कि मीरा के बाद कोई कवि और मुनि जिनविजय के बाद कोई विद्वान् नहीं हुआ, वहां गाँव-गाँव में आजकल साहित्यकार बने मिल जायेंगे.

पिछले दिनों की कहूं तो लम्बे अरसे से मीडिया में लगे लोग भी आजकल अपनी बुद्धि को ताक में रख नज़र आये हैं, या उसे भी बेच खाए हैं. बढिया से बढिया खबर भी विज्ञापन के हिसाब से लगती है.,शहरों में जो कुछ भी आयोजन हो अपने पास-पड़ोस के साथियों को बुलाकर तथाकथित बुद्धिजीवियों की बड़ी ज़मात पैदा कर रहे हैं. कभी पुराने मकान मालिक मुख्य अतिथि हैं,तो कभी नए किरायेदार कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे हैं. अच्छा समझौता है. यहीं से कुछ नासमझ लोगों को साहित्यकार जैसा प्राणी बनने का चस्का लग जाता है. बस फिर क्या, बस और ट्रकों के पीछे लिखे दोहों की तरह की दो चार लाइन रोजाना लिखने ,ज़बरन दोस्तों को सुनाने का ये सिलसिला उन्हें प्रायोजित जानकार या साहित्यकार बना देता है. किसी भी प्रकार का साहित्य हो ऐसे नाम के भूखे और काम के कच्चे लोगों से कुछ असली कामकार भी अखबारों की नज़र में नकली नज़र आते हैं. समाज में पढ़ने वालों का स्वाद बिगाड़ने में इन का पूरा हाथ होता है. लिखावट कम करके भी दिखावट ज्यादा कर लें, यही इनकी फितरत और हाथ की सफाई है.

बीस तक कवितायें इकठ्ठी हो जाए बस फिर क्या शहर के किसी बाबा-तुम्बा को पकड़ कर शुभकामना सन्देश आयात कर किताब छपा देते हैं. उन्हें शर्म तक नहीं आती कि जो हिंदी या किसी और भाषा के इतने जानकार साहित्यकर्मियों को पढ़े नहीं, उनके लिखी एक किताब का नाम तक नहीं जानते, माफ़ करें पढ़ना तो उनके बस का है ही नहीं, क्योंकि उन्हें इतनी फुरसत मिल जायेगी तो फिर शहर के मिलने मिलाने वाले सरकारी टाइप के आयोजन में सांठ-गाँठ करने कौन जाएगा. घर में बैठ किताबें पढ़ने से तो उनका सारा मामला ही गड़बड़ हो जाएगा ना. ये काम उनके लिए बनाया भी नहीं गया है. उन्हें तो बस बड़े नेताओं और अफसरों के आस-पास रहने का मौक़ा चाहिए,भले ही उसके लिए स्वाभिमान जाए भाड़ में.

हाँ तो मामला नज़र में आया गाँव में होने वाली उस साहित्यकारों की बैठक की खबर से,बहाना कुछ चाहे कुछ भी हो मगर ये समस्या पूरे देश की है. ऐसे नादाँ और अधपके पाठकों तक हमारी ये चिंता भरी बात , ये कोशिश पहुंचे बस. विचार तो तब भी आता है जब, खाते पीते घर के लोग भी कम ज्ञान वाले अफसरों के धोक लगाते फिरते है, वे ही ज्यादातर होने वाले समारोह में सम्मानित भी हो जाते हैं. अफसर भी कान में तेल और आँख पर पट्टी लगाए रहते हैं, उन्हें केवल और केवल हजुरिये बन्दे या धोक लगाते छुट भैया ही याद आते हैं. अगर आप भी अपने इलाके में दस बारह लाइन की कविताएं इधर उधर से लिख लें तो बस आपका साहित्यकार बन जाना पक्का समझ लीजिएगा. लोग आपको हर समारोह में बुलायेंगे, यदा कदा ईनाम भी देंगे. उम्र आपकी ठीक-ठाक है तो मुख्यअतिथि का पद तो आपके लिए हमेशा हाज़िर रहेगा.

कुल मिलाकर ये एक खेल की भांति लगा कि आओ मिलकर भाई साहेब-भाई साहेब खेलें. एक दूजे को बड़ा बनाने का बुलाने और आगे की कुर्सियों पर बिठाने का आपसी समझौता हो जाता है. आदमी को पता नहीं चलता कि वो कब बुद्धिजीवी बन गया .ये अलग बात है कि उन्हें कभी किसी गोष्ठी में उद्बोधन को नहीं कहा गया,वरना सुनने वालों और बुलाने वालों की गलतफहमियाँ दूर हो जाती.

चलो हम भी तैयारी करें एक साफ़ सुथरी कविता लिखने की,उसी एक कविता को हर समारोह में गाने की, जिद पर अड़े रहें. जिस किसी बैठक-समागम में हमें वो कविता पढ़ने से मना कर दे,उसमें कभी नहीं जाने की कसम खाएं. जहां भी जाएँ कोई तो स्वार्थ पूरा हो हमारा,फ्री तो हम हैं नहीं ना. आखिर हमें भी साहित्यकार बनना है,मालूम तो हमें ये भी है अभी कि इन्तजार की सूचि बहुत लम्बी है. ज्यादा लम्बी होगी तो मैं शॉर्टकट भी जानता हूँ. ज़माना भी इसी बात का है. बेचारे बहुत से पढाकू तो कमरों में पढ़ते पढ़ते ही मर जायेंगे. वे कब साहित्यकार कहलाने का सुख भोग पायेंगे, ये तो राम ही जाने. कोई जाकर उन्हें भी कह दो ,कि आजकल बाबा-तुम्बा संस्कृति की चलती है,या किसी अफसर को अपना गुरु बनाओ, परिवार सहित धोक लगाओ, जल्दी ही अच्छे परिणाम आयेंगे.

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सादर,
माणिक
आकाशवाणी ,स्पिक मैके और अध्यापन से जुड़ाव
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Deendayal Sharma (WinCE)_thumb[1]

ग़जल की शक्ल में एक रचना

तकाज़ा वक्त का / दीनदयाल शर्मा


चेहरे पर ये झुर्रियां कब आ गई,
देखते ही देखते बचपन खा गई.

वक्त बेवक्त हम निहारते हैं आईना,
सूरत पर कैसी ये मुर्दनी छा गई. 

तकाज़ा वक्त का या ख़फ़ा है आईना.
सच की आदत इसकी अब भी ना गई.

है कहाँ हकीम करें इलाज इनका,
पर ढूँढ़ें किस जहाँ क्या जमीं खा गई. 

बरसती खुशियाँ सुहाती बौछार, 
मुझको तो "दीद" मेरी कलम भा गई.

अध्यक्ष, राजस्थान साहित्य परिषद्, 
हनुमानगढ़ जं. - 335512 
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सृजन : 21 March , 2010, Time : 7:25 AM

सुरेन्द्र अग्निहोत्री की कविता

Surendra Agnihotri-11 (Mobile)

पाने को सियासत अपने भी पराये हुये

जिन्‍हें दी थी कुर्सी वे भी बेगाने हुये

पुत्रमोह में कलंकित की निष्‍ठा चली चाल

फिर झूठो ने गला ली अपनी-अपनी दाल

धूप में जिन्‍हें देते हमेशा हम तो छॉव

वे ही दे गये पीठ में खन्‍जर से घाव

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राज सदन, 120/132, बेलदारी लेन लालबाग लखनऊ

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सतीश कुमार चौहान की दो कविताएँ

satish chauhan (Mobile)

भ्रष्टाचार

हर दफतर का शिष्‍टाचार बन बैठा हैं भ्रष्टाचार
कहता हमसे हाथ मिलाओ, कर देंगे तुम्‍हारा बेड़ा पार ,
मैं भी इतराया ,अपने आप को कर्मयोगी बतलाया,
पर वो भी कहां था मानने वाला,
उसने पुरे प्रजातंत्र को ही कुछ इस तरह खंगाला
बाफोर्स, ताबूत, तेलगी, तहलका, हवाला सब गिना डाला,
बडे गर्व से उसने कहा भ्रष्ट नेता जनता न संभाल पाएंगे,
बन जाओ हमारे ओ हरिश्चंद्र तुम्‍हारे बच्‍चे भी पल जाएंगे,
नेता, अ‍‍भिनेता, पुलिस, कानून,हर कोई साथ मेरे नाचता है
पंडित कुरान तो मुल्‍ला रामायण बांचता है,
अवसरवाद् के दौर में भ्रष्‍टाचार का ही जुनून है
जनतंत्र के शरीर में भ्रष्‍टाचार का ही खून है
मेरा तो स्‍वाभिमान खौल रहा था भ्रष्टाचार सर चढ़ के बोल रहा था,
मुझे कोई तर्क सूझ न रहा था उसे तो गांधी ,बुद्ध भी नहीं बूझ रहा था
हम दोनों के बीच एक अपाहिज मिल गया जिसे देख भ्रष्टाचार भी हिल गया
तिहाड़ से था आया और अपने को भ्रष्टाचार का भाई बतलाया,
बीमार चल रहा था दवाई की मिलावट ने तो और बीमार बनाया,
अब तो भी भ्रष्टाचार कतराने लगा, उसे भी अपना अपना
अपाहिज भविष्‍य नजर आने लगा…
मैंने अपाहिज से हाथ मिलाया उसे संयम,सदाचार और सत्‍य का टानिक पिलाया,
अपाहिज का बुझा चेहरा भी खिल गया,
मुझे भी भ्रष्टाचार का सीधा जबाब मिल गया..

........

दो कबूतर

रोज मिलते थे जो शांतिवन के चबूतरों पे,

वर्षों पुराना याराना था, एक का मंदिर

तो दूसरे का मस्जिद की गुम्‍बद पर घराना था ,

रोज की तरह चल रही थी इनकी गुर्टर गुटुर

बीच में आ गिरा एक सफेद घायल कबूतर,

दोनों से उसका दुख देखा न गया,

मिलकर दोनों ने उसकी सेवा जतन किया,

ठीक होते ही वो कबूतर तो फुर्र हो गया,

जाते जाते दोनों में जाने कैसा बीज बो गया,

जो ये कबूतर नशेमन हो गऐ,

पूर्वजों से चल रहे रिश्‍ते लहूलुहान हो गए

एक बूढ़े कबूतर से ये देखा न गया,

पहले उसने सफेद घायल कबूतर का पता लगाया,

फिर इनको उसका राज समझाया

क्‍योंकि वह तो संसद की गुम्‍बद से था आया...

......


सतीश कुमार चौहान
खुर्सीपार भिलाई
--
Satish Kumar Chouhan
RADHA PATHOLOGY LAB
Supela
Bhilai

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ग़ज़ल

मुझको ज़रा समझा ये माजरा तो दीजिये।

इस मौके पर फबता मुहावरा तो दीजिये।


तैयार बाज़ीगर है, खड़े हैं तमाशबीन

पर खेल दिखाने को दायरा तो दीजिये।


महफिल में अभी तक नहीं छाया है वो सुरूर,

हर शख्‍स के गिलास में सुरा तो दीजिये।


संगीत में तिलिस्‍म अब रहा नहीं भगवान,

कोई तानसेन, बैजू बावरा तो दीजिये।


मैं हूँ नयी पीढ़ी का उभरता हुआ शायर,

मुझको भी दावत-ए-मुशायरा तो दीजिये।


-घनश्याम मौर्य

283/459,

गढ़ी कनौरा

लखनऊ-226011

gangubai pithora2 (Mobile)

मोहिनी! ....पिछ्ले महीने ही मेरे पड़ोस के मकान में रहने आ गई है!...नाम भले ही मोहिनी है; उसे सुंदर नहीं कहा जा सकता!... सांवला रंग, मझौला कद, चेहरे पर हर घडी तनाव की रेखाएं खिची हुई.... उम्र कोई 50 से 55 के बीच की ही होगी!... हां! जब कभी ' वन्स इन ए ब्लू मून..' मुस्कुराती है तो आकर्षक लगती है!... दन्त-पक्तियां अभी तक मन मोह लेती है!...लगता है जब मोहिनी युवा होगी...अवश्य ही लड़कों के आकर्षण का केन्द्र रही होगी!

....अब हमारा आमना सामना तो रोज ही हो रहा है..आज मोहिनी मेरी तरफ देख कर मुस्कराई और आगे बढ़ गई!...लगा अब वह शायद जान-पहचान बढ़ाना चाहती है!....लेकिन समय गुजरता गया...बात मुस्कुराहट तक ही रुकी हुई है! छ्ह महीने हो चले है; बात जहां तक थी, वहीं तक है... काश कि कुछ एक कदम आगे भी बढें!... मैं दिल्ली में, इसी मकान में 20 साल से रह रही हूं!... मेरे पड़ोस वाला मकान इस बीच तीन बार बिक चुका है!... पांच- छ्ह किरायेदार भी यहां रह कर जा चुके है!... सुना है कि चौथी बार इस मकान को खरीदने वाले ' प्रमोद भगत' है... जो मोहिनी के पति है! ... 'प्रमोद भगत' की नेम प्लेट तो उनके गेट पर लगी हुई है!... उनकी पत्नी 'मोहिनी' का नाम मुझे मेरी मेहरी' चमेली' ने बताया, जो उनके यहां भी बर्तन सफाई का काम करती है!

....आज का दिन अच्छा रहा!...दोपहर का समय था; डोरबेल बज उठी... दरवाजा खोला तो सामने मोहिनी खड़ी थी!...उसने नमस्ते की!... जवाब में मैंने भी नमस्ते की!

" अंदर आइए न!... बाहर क्यों खड़ी है?' मैंने उसे अंदर आने के लिये कहा!

" नहीं...थैक्यू अनु जी!.... मैं पूछ्ने आई थी कि आज चमेली आई है क्या?" मोहिनी ने बाहर खडे खडे ही पूछा.

" अभी तक तो आई नहीं है.... लगता है आज छुट्टी मार गई है!... कामवालियों का ऐसा ही होता है!... बिना बताएं छुट्टिया कर लेती है!" मैंने जवाब दिया!.. दुबारा उसे अंदर आने के लिये कहना बेकार था!... शक्ल से जिद्दी किस्म की औरत लग रही थी!....मोहिनी चली गई!

.. अब तक उसके बारे में मुझे बहुतसी जानकारी मिल चुकी थी!... मोहिनी का बड़ा बेटा इंजीनियर था; जो नौकरी के सिलसिले में अमेरिका जा बसा था!.. वहीं पर अमेरिकन लड़की से उसने शादी रचाई थी!.. उसके मां-बाप से संबंध अब सिर्फ नाम के थे!... मोहिनी का दूसरा छोटा बेटा सरकारी कर्मचारी था!.. दिल्ली में ही रह रहा था... लेकिन उसकी पत्नी के साथ मोहिनी के आए दिन झगड़े होते थे; इस वजह से मोहिनी के पति प्रमोद ने बेटे से अलग रहने का फैसला लिया...और यह मकान खरीद कर पत्नी के साथ यहां रहने आ गए! ...मुझे मेरी मेहरी ने ऐसा ही सिक्वेन्स बताया था! ....लग रहा था कि प्रमोद और मोहिनी दोनों में कोई ताल-मेल नहीं है!...प्रमोद धार्मिक मानसिकता लिए हुए थे!.. मंदिरों मे और साधु-संतों के प्रवचनों मे जाना उनका खास शौक था!...उनके घर में कभी कोई गुरु तो कभी आचार्य या स्वामी अपने चरणों की धूल डालने आ जाया करते थे!...उनके मित्र भी सभी धरम-करम में रुचि रखने वाले थे!... जब कि मोहिनी हरदम घर के कामों में व्यस्त रहती थी... सोसाइटी में घुमना-फिरना और पास पड़ोस की महिलाओं से बतियाना उसे पसंद नहीं था!

... लेकिन एक दिन मोहिनी मेरे यहां फिर आई!.. न जाने क्यों ...इस बार बहुत देर तक बैठी रही..बहुत बातें की!...उसके बाद हमारा मिलना-जुलना बढ़ता गया!... अब वह मेरी घनिष्ट सहेली बन चुकी थी!

... एक दिन उसने अपने बीते जीवन की किताब मेरे सामने खोल कर रख दी!.. मुझ पर अब उसे पूर्ण विश्वास था! वह मुझे अपनी घनिष्ठ सहेली मान चुकी थी!...अपनी आप-बीती-अनोखी प्रेम-कहानी- उसने मेरे सामने रख दी, बिना कुछ छिपाएं...उसी की जुबानी उसकी प्रेम-कहानी यहां बया कर रही हूं!... मोहिनी कहने लगी....

" ...मै सायन्स ग्रैज्युएट हूं!...गुजरात के धोलका शहर की रहनेवाली हूं!...जब साइंस कोलेज में एड्मिशन लिया तब मेरी उमर सत्रह साल की थी! यह कोलेज सह-शिक्षा समिती का था!.. यहां लडके एवं लड़कियाँ साथ साथ पढते थे!.... तभी पता चला कि शहर के जाने-माने चिल्ड्रन स्पेशियालिस्ट डॉ. मेहता का बेटा 'सागर' भी इसी कॉलेज में एडमिशन ले रहा है!... मेरे अंदर 'सागर' को देखने की उत्सुकता पैदा हो गई!..'सागर' बड़ा प्यारा नाम लगा!... लेकिन कुछ ही दिनों में पता चला कि सागर ने तो अहमदाबाद के गुजरात कॉलेज में एड्मिशन ले लिया!... मेरी उसके तरफ की उत्सुकता और बढ़ गई!... मैंने ठान ही ली कि एक बार ही सही... सागर को एक नजर देख तो लूं!

...मेरी कोशिश रंग लाई और मेरा किसी काम से अहमदाबाद के गुजरात कॉलेज में जाना तय हुआ!... वहां पूछ्ताछ करने पर सागर के बारे में पता चला!... वह वहां बॉयज हॉस्टेल में रह रहा था!... वहां तक मैं जा पहुंची .. और उसे दूर से ही देख लिया!... अब उससे बात करने को जी मचल उठा!... लेकिन बात बनी नहीं!...लेकिन पता नहीं क्यों और कैसे उसे मेरे बारे में पता चल ही गया!...वह भी शायद मुझे देखने के इरादे से ही....मेरे कॉलेज में आया! मुझसे आंखे चार हुई...लेकिन बात इससे आगे नहीं बढी!... मुझे मन की गहराई में उतरने पर ऐसा महसूस हो रहा था कि सागर भी मेरे में गहरी रुचि ले रहा है... लेकिन अभिव्यक्ति का सही मौका न उसे मिल रहा है...न मुझे!

... मैंने मन ही मन हार मान ली... सोचा मनुष्य कितना कुछ चाहता है, उसे उस में से सबकुछ तो नहीं मिलता!....मैं उसे भुलाने की कोशिश में लगी रही!... मैंने बीएससी कर ली!... सागर अब तक मेरे बहुत अंदर तक समा चुका था!.. वह कहां है...क्या करता है..कुछ पता न चला! ...हो सकता है वह अपने पिता की तरह डॉक्टर बन गया हो!

... मैं बडी हो चुकी थी..अब मेरे लिये लड्के देखे जाने लगे... और मेरी शादी भी हो गई!"

" मोहिनी!.. क्या प्रमोदजी के साथ हुई तुम्हारी शादी?" मैंने बीच में ही पूछा.

" नहीं अनु!... चेन्नई के एक डॉक्टर से हुई!... सुनने में अजीबसा लगता है न..कहां मैं गुजरात के छोटे शहर धोलका की रहने वाली और कहां चेन्नई!... मेरा जीवन ऐसा ही है, आगे और भी अजब-गजब सुनने को मिलेगा?... मेरी बात की सत्यता पर है विश्वास अनु?" मोहिनी ने मुझसे सवाल किया!

" मोहिनी!...मनुष्य के जीवन में कुछ भी घटित हो सकता है...तुम आगे सुनाओ!.." मेरा छोटासा जवाब!

मोहिनी आगे सुनाने लगी!... "ठीक कहा तुमने कि मनुष्य के जीवन में कुछ भी घटित हो सकता है! मेरी शादी के सातवे दिन ही मेरे पति चल बसे!"

" ऐसा क्या हुआ मोहिनी?" मैं एकदम से सक्ते में आ गई!

" मुझे भी नहीं पता...उन्होंने आत्महत्या कर ली थी!" मोहिनी ने शून्य में देखते हुए जवाब दिया... इसपर मैंने इस बारे में आगे पूछना ठीक नहीं समझा और मोहिनी अपनी दास्तान आगे बढ़ाती चली.....

" अब मैं फिर मायके आ गई थी!... अब मैं विधवा थी!... यह बात तो मैं और मेरे माता-पिता और ससुराल वाले ही जानते थे कि शादी के लावा-फेरे के अलावा इस शादी के कोई मायने नहीं थे!... न सुहागरात और न तो हनीमून!... जैसी मैं गई थी बिलकुल वैसी ही वापस भी आ गई थी!

... अब फिर दुगुने शोर से 'सागर' की लहरे मेरे दिल के किनारे से टकरा रही थी!.... मैं मन ही मन कोशिश कर रही थी कि मेरे दिल की आवाज सागर के कानों से टकराएं!...पहले मुझे भगवान के अस्तित्व पर हंमेशा शक बना रहता था लेकिन अब भगवान के सामने भी गिडगिडाना मैंने शुरु कर दिया!... मेरी उम्र तब लगभग 24 साल की थी!... मेरे माता-पिता ने मुझे समझाया कि कहीं नौकरी कर लूं..जिससे कि दुःख की तीव्रता कुछ कम हो सके!

...... मेरी पढ़ाई के अनुरुप मैंने अपने आप को बैंक की नौकरी के काबिल समझा और बैंक की नौकरी के लिए फॉर्म भर दिया!... तीन महीने बाद ही साक्षात्कार के लिए बुलावा आ गया!... मुझे साक्षात्कार के लिए वडोदरा जाना था!... पास ही छोटे शहर नडियाद में, मेरे चाचा-चाची रहते थे!..मेरे चाचाजी डॉक्टर थे!..मुझे मन के अंदर से ही ऐसा लगा कि " सागर को मैं इसी जगह पा सकती हूं!"...और साक्षात्कार से चार दिन पहले मैं उनके यहां गई!...

" मेरी जीवनी सुन कर तुम बोर तो नहीं हो रही अनु?" मोहिनी ने मुझसे पूछा.

" अरे नहीं...बिलकुल नहीं..आगे कहो मोहिनी!"... मैंने कहा.

"...और देख तो अनु!... सही में मुझे सागर वहीं मिल गया!.."

" कैसे?" इस समय आश्चर्य चकित हो कर मैंने पूछा.

" सागर डॉक्टर नहीं बन पाया था!... वह एक जानी-मानी दवाई की कंपनी में रिप्रिझेंटेटिव्ह के तौर पर कार्यरत था!...अपने बिजनेस के सिलसिले में मेरे डॉक्टर चाचाजी से मिलने उनके यहां आया था!... मैंने उसे ड्रॉइंग-रुम में देखा तो भौंचक्की रह गई!.. लगा भगवान का अस्तित्व सही में है...वरना मैं यहां कैसे आती!... रसोई में चाय बनाने में व्यस्त अपनी चाची से मैंने थोड़े से शब्दों में अपनी एक तरफा प्रेम कहानी कही!... सुन कर चाची भी हैरान रह गई...लेकिन चाची ने जल्दी जल्दी में ही एक फैसला ले लिया! वह तुरन्त मुझे साथ ले कर ड्राइंग-रुम में गई!..

... मेरी सागर से आंखें चार हुई!... बातचीत की डोर चाची ने ही संभाली!.. बातों बातों में पता लगाया कि सागर की अब तक शादी हुई नहीं है और वह अहमदाबाद ही में किराए पर फ्लैट ले कर रह रहा है!...यह सब जान कर मेरी बांछें खिल गई!... सागर के चेहरे की मुस्कान देख कर मैंने अंदाजा लगाया कि वह भी इस तरह से अचानक मुझे सामने पा कर बहुत खुश है!.... मेरी उस समय सागर से औपचारिक बातें ही हुई!

....मेरी चाची ने उसे मेरे बारे में बताते हुए कहा कि ..." मोहिनी का बैक की नौकरी के लिए वैसे चयन हो चुका है...सिर्फ इंटरव्यू बाकी है!...दो दिन बाद सोमवार के दिन अहमदाबाद के एक बैंक में इंटरव्यू है!... अनु सुबह आठ बजे की बस से अहमदाबाद पहुंचेगी!"

..इस पर सागर ने कहा " मैं बस स्टैंड पर मोहिनी को रिसीव करने पहुंच जाउंगा!...इंटरव्यू के लिए बैक भी ले जाउंगा!... बैक मैंने देखा हुआ है!"... यह सुन कर मुझे लगा कि अंधा एक आंख मांगता है तो भगवान कभी कभी दो भी दे देता है!... मेरे चाचाजी भी अचंभे में थे कि यह क्या हो रहा है!...बाद में उन्हें मैंने और चाची ने सबकुछ बताया.. वे भी मेरी और सागर की मुलाकात से खुश थे!

... दो दिन बाद मैं अहमदाबाद पहुंची! ..मुझे रिसीव करने बस स्टैड पर सागर आया हुआ था! उसके पास मोटरसाइकिल था!...मै अब उसके पीछे बैठ कर मानों हवा में उड़ रही थी!...सब कुछ एक स्वप्न की तरह घटित हुआ!...हम दोनों एक कॉफी-हाउस गए...इधर-उधर की बातें हुई...फिर मेरे इंटरव्यू के लिए बैंक गए... फिर एक साथ लंच किया और फिर सागर मुझे अपने फ्लैट पर ले गया!... अब लगा कि मैं उसे अपने दिल की बात कहूं.. वह भी जरुर कहेगा!... उसके बाद के जीवन के सुनहरे पलों में मैं खो गई!...

...इतने में सागर ने रेडिओ ओन किया... गाना आ रहा था..

'प्यार हुआ है जब से..मुझ को नहीं चैन आता...छुपके नजर से भी तू...दिल से नहीं जाता!'

...लगा अब कहना सुनना कुछ भी नहीं रह गया है... और इतने में डोर-बेल बज उठी!.. सागर का कोई ऑफिस का कुलीग आया था!... सागर ने '... मेरी कॉलेज की एक दोस्त..' कहकर मेरी उससे जान-पहचान कराई!... वह करीबन आधे घंटे तक रुका रहा!... अब तक शाम हो चली थी..मुझे वापस नडियाद जाना था!...बात यहीं पर समाप्त हो गई!...सागर ने मुझे वापसी के लिए बस में बैठाया!

.....इसके एक महीने बाद ही मुझे वडोदरा के बैंक में जॉइन करने के लिए अपोइंट्मेंट लेटर मिल गया!... मैं खुश थी!... उस समय टेलिफोन बहुत कम हुआ करते थे!...सागर के घर पर भी फोन नहीं था!... मोबाईल फोन का आविष्कार तब हुआ भी नहीं था! ..."

.....मै मोहिनी की आपबीती बड़े ही ध्यान से सुन रही थी! मोहिनी ने आगे कहा...

"....यह खुश खबर सुनाने मैं अहमदाबाद सागर के घर चली गई!..उस समय वह घर पर नहीं था!... उसके सामने वाले फ्लैट में रहने वाली महिला दरवाजे में ही खड़ी थी!...मैंने एक पर्ची पर अपना नाम और पता लिख कर... पर्ची उसे पकड़ाई और सागर को देने के लिए कहा!... साथ में यह भी कहा कि.. जरुर दीजिएगा!’ … इस पर उसने हंसते हुए कहा..' जरुर दूंगी!'

....मैंने बैंक की नौकरी जॉइन कर ली थी!..दो महीने हो चले थे!..सागर की तरफ से कोई खबर आई नहीं मैंने नडियाद जा कर चाचीजी से भी पूछा लेकिन पता चला कि उनके यहां भी सागर गया नहीं था!

...मेरा मन उदास था!.. सागर के सामने वाले फ्लैट में रहने वाली महिला ने सागर को मेरी पर्ची अवश्य दी होगी!.. मेरा यही मानना था!... दूसरी ओर लग रहा था कि शायद सागर को मेरी पहली शादी और विधवा होने की घटना का कहीं से पता लग गया होगा...और इसी वजह से अब वह मेरे साथ कोई संबंध नहीं रखना चाहता!... ऐसे में मेरे पिता के पास मेरे लिए एक रिश्ता आया!.. उम्र में यह मुझसे दस साल बड़ा था! ….लड़का इकलौता था! पिता का अच्छा बिजनेस था!..और तो और उसे मेरे जैसी दुःखी और जवान विधवा से शादी करना पसंद था!...बल्कि ऐसी शादी करके वह समाज में अपनी अच्छी छवि प्रस्तुत करना चाहता था!... यह लड़का दहेज के भी खिलाफ था!... मेरे पिताजी को रिश्ता सही लगा और दुबारा मेरी मांग में सिंदूर भरा गया!... सागर की तस्वीर दिल में लिए मैं नए ससुराल आ गई!... अब मैं वडोदरा से दिल्ली आ गई थी!...प्रमोद भगत...मेरे पति थे!"

"..ओह! मोहिनी...अब तुझे किस बात का दुःख है?...सागर को क्या अब तक तू भूली नहीं है?... पर क्यों?"..मैंने ऐसे ही कई सवाल एक साथ किए!

" अनु!.. बाद में मुझे चाची ने बताया कि सागर उनके घर आया था!.. उसने बताया कि उसके सामनेवाले फ्लैट में रहने वाली महिला उसे मेरी पर्ची देना भूल गई थी!... बाद में याद आने पर दी...इसलिए उसे आने में देर हो गई... चाची ने सागर को मेरे बारे में बताते हुए कहा कि..' अब मोहिनी की दुबारा शादी हो गई है और वह अब बहुत दूर जा चुकी है! ... सागर उदास मन से चला गया और एक महीने बाद उसकी भी शादी होने की खबर चाची ने मुझे दी!

"..ठीक है मोहिनी!...लेकिन अब तू चाहती क्या है?..."

"...मेरे पति प्रमोद सिर्फ नाम के लिए ही मेरे पति है!... उन्होंने कभी मेरे प्रति प्रेम की भावना व्यक्त भी नहीं की!... घुमना-फिरना, फिल्म देखने जाना या किसी पर्यट्न स्थल पर जाना प्रमोद को कभी पसंद नहीं था!... अपना बिजनेस और साधु-संतों की संगत मे ही इनका जीवन अब तक गुजरा है!.. पहले हम छोटे बेटे के साथ ही रहते थे; लेकिन प्रमोद का साधु-संतो का झमेला बहू बरदाश्त नहीं कर पाई... हर रोज झगड़े होने लगे और हम यह मकान खरीद कर, यहां रहने आ गए! उनके लिए धरम-करम और पूजा-पाठ ही सब कुछ है!... भगवान की दया से बिजनेस अच्छा चल रहा है... लेकिन अब वे मुझे यहां छोड़ कर हरिद्वार जाना चाहते है!... वहां बड़ा सा प्लॉट ले कर वे मकान बनवा रहे है!..उनके गुरु का आश्रम वहीं पर है!"

"...तो?.."

"..कुछ दिनों से मुझे लग रहा है कि सागर अब अकेला रह गया है!.. मेरे चाचा-चाची अब गुजर चुके है!..सागर के बारे में जानकारी अब कैसे मिल सकती है? ?...क्या तुम मेरे लिए कुछ कर सकती हूं अनु?.."

.. मैं हंस पडी!

" तुम्हें हंसी आती है?... अपने आप को मेरी जगह रख कर तो देखो!....कितनी टूट सी गई हूं मै!... जी चाहता है कि.."

" बस कर मोहिनी!.... आत्महत्या के सिवाय भी तो बहुत से रास्ते होते है!..मै कुछ न कुछ अवश्य करुंगी...सागर का पता तेरे लिए लगा कर ही रहूंगी!"...

"……लेकिन एक बात बता मोहिनी!" मैंने मोहिनी की आंखों की गहराई में झांकते हुए पूछा.

" क्या? अब और क्या क्या पूछना चाह्ती हो?" मोहिनी की आवाज में झल्लाने का भाव था!

" ...मोहिनी!...तूने यह कैसे समझ लिया कि सागर उसके हालिया जीवन में अकेला रह गया है?... मतलब कि उसकी पत्नी, उसके बच्चे.."

" अनु!... यह बात मेरा अंतर्मन कह रहा है!... मुझे १००% लग रहा है कि ऐसा ही है!" मोहिनी की आवाज में मक्कमता थी! ...मुझे लगा मोहिनी पगला गई है; वरना ऐसी बात मक्कमता पूर्वक कौन भला कह सकता है?

मैंने मोहिनी को दिलासा दे कर वापस घर भेज दिया!.. सिर्फ दिलासा ही ऐसे समय देने की चीज थी! ... और मैंने अपना काम शुरु कर ही दिया!

..मेरी हप्ते भर की मेहनत रंग लाई... एक फ्रैंड्शिप वाली वेब-साईट पर सागर से मिलते--जुलते प्रोफाईल का एक व्यक्ति मिल गया... नाम भी सागर मेहता ही था!...मोहिनी को मैंने तुरन्त बुलावा भेजा और उस व्यक्ति की फोटॉ कंप्यूटर स्क्रीन पर दिखाई!... मोहिनी के मुरझाए चेहरे पर थोड़ी सी रौनक लौट आई!... लेकिन...

"..लेकिन क्या मोहिनी?"

" ...क्या मैं सागर से बात कर सकती हूं?.." मोहिनी के मन में शक था!

"..बिलकुल कर सकती हो!...अगर बात करने भर से तुझे सुकून मिल सकता है तो मैं इसका भी प्रबन्ध कर सकती हूं..पर फिर एक बार सोच ले!

" ...अब मैंने सोच लिया!... मैं उससे बात करुंगी!...आगे जो भी होगा, जिम्मेदारी मेरी होगी अनु! "..मोहिनी ने मक्कमता का परिचय देते हुए कहा!

.... मैंने फोन नंबर जैसे ही मोहिनी को दिया... वह मुझसे एक बच्चे की तरह लिपट ही गई!... उसकी आंखों से अश्रु-धारा फूट पडी!...वह ज्यादा कुछ कहे-सुने बगैर चली गई!..शायद वह एकांत में अपने सागर से बतियाना चाहती थी!

...दूसरे दिन मोहिनी मेरे यहां आई...उसके पास कहने के लिए बहुत कुछ था!...कहने लगी!

"..अनु!..जैसा कि मैंने कहा था; सागर अकेला रह गया है!.. शादी के दो साल बाद ही उसकी पत्नी डिवोर्स ले कर अलग हो गई!...उसके बाद सागर ने अहमदाबाद छोड़ दिया और मुंबई चला गया!.. यहां सागर ने शेअर-दलाली और प्रोपर्टी का बिजनेस किया और करोड़ों कमाए!... दूसरी शादी की... आठ साल पहले ही छोटी सी बीमारी के चलते उसकी दूसरी पत्नी भी चल बसी...एक बेटा और बहू है...जो अलग रहते है!...सागर का हाल मेरे ही जैसा है... जीवन में सुख नहीं मिला!...वह भी हरदम मुझे ही याद करता आ रहा है!...अनु!... मुझे अब क्या करना चाहिए?...प्रमोद मुझे छोड़ कर जाना चाहते है...सागर मुझे बुला रहा है!

" देख मोहिनी!... सागर से मैंने तुझे मिला दिया है!...सलाह तो मैं कुछ भी नहीं दूंगी कि तुझे क्या करना चाहिए!... वैसे प्रमोद का तुझे अकेले छोड़ कर जाना अगर तय ही है तो..." मैंने अपना वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया!

... मोहिनी चली गई!... एक दो बार रास्ते में मिली...बोली कुछ नहीं!...

…. ...अब मुझे कहना पड़ रहा है कि...' मेरे पड़ोस में मोहिनी रहती है नहीं...बल्कि रहती थी!" क्यों कि वह मकान फिर एक बार बिक चुका था! ... कामवाली चमेली से पता चला कि' मोहिनी मेम सा'ब पता नहीं... कहां चली गई है और प्रमोद साहब ने मकान बेच दिया है... और वे हरिद्वार रहने चले गए है!

... पता सिर्फ मुझे ही है कि मोहिनी हमेशा के लिए अपने सागर के पास.... मुंबई चली गई है!... बाकी का जीवन वह सागर के साथ हंसी खुशी बिताएगी! ... कभी कभी संजोग भी कैसे विचित्ररूप धारण कर लेते हैं,.... नहीं?

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(चित्र – गंगूबाई पिथोरा की कलाकृति)

clip_image002 युवा साहित्‍यकार के रूप में ख्‍याति प्राप्‍त डाँ वीरेन्‍द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्‍थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्‍त किया है। आपके एक हजार से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्‍ट्र्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की स्‍तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्‍त्री विमर्श, राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी में अनेक पुस्‍तकों की रचना कर चुके डाँ वीरेन्‍द्र ने विश्‍व की ज्‍वलंत समस्‍या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्‍तुत किया है। राष्‍ट्रभाषा महासंघ मुम्‍बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्‍व0 श्री हरि ठाकुर स्‍मृति पुरस्‍कार, बाबा साहब डाँ0 भीमराव अम्‍बेडकर फेलोशिप सम्‍मान 2006, साहित्‍य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्‍मान 2008 सहित अनेक सम्‍मानों से उन्‍हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्‍च शिक्षा अध्‍ययन संस्‍थान राष्‍ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आार्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।

समकालीनता ः और गहन जीवन अनुभवों के क्रांतिदर्शी लेखक मोहन राकेश

डॉ. वीरेन्‍द्र सिंह यादव

वरिष्‍ठ प्रवक्‍ता, हिन्‍दी विभाग

दयानन्‍द वैदिक स्‍नातकोत्‍तर महाविद्यालय, उरई

जीवन सम्‍भावनाओं का दूसरा नाम है और मनुष्‍य है अनगिनत सम्‍भावनाओं की बैसाखियों के सहारे थम-थम कर चलने वाला हिम्‍मतवर सैलानी। जन्‍म के प्रारम्‍भिक क्षण से लेकर मृत्‍यु के अन्‍तिम क्षण तक की सारी यात्रा अनेक रूचियों, भावों और प्रतिक्रियाओं की एक ऐसी परिणति है जिसकी गहराइयों में सब कुछ ऐसे समा जाता है मानो जन्‍म मिला ही इसलिये है कि उसे अपने लिये सब कुछ समेटकर उसी में विला जाना है। औद्योगीकरण, नगरीकरण और वैज्ञानिक अन्‍वेषणों के पार्श्‍व में खड़ा जीवन बाहर से ही नहीं, भीतर से भी बदला है। आजादी ने हमें जितना दिया है, उससे अधिक हम से ले भी लिया है। हमें सिर्फ आजादी मिली जो तीन थके हुये रंगों का नाम है। कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि ‘स्‍वतंत्रता और संस्‍कृति एक अल्‍पसंख्‍यक वर्ग-विशेष को ही मिली है।' सामान्‍य मनुष्‍य तो अभी भी आजादी को टोह रहा है। आजादी राष्‍ट्रीय स्‍तर पर जितनी अहम उपलब्‍धियाँ लेकर आई है, वैयक्‍तिक स्‍तर पर उतना और वैसा कुछ भी नहीं हस्‍तगत हुआ है। ‘‘व्‍यक्‍ति की मनोव्‍यथा बढ़ी है क्‍योंकि महानगरों में भीड़ बढ़ी है। मनुष्‍य पहले से अधिक अकेला हुआ है क्‍योंकि उसे अस्‍तित्‍व नहीं मिला है। उसकी ऊब दुगुनी हुई है क्‍योंकि मानवीय सम्‍बन्‍ध बिखर गये हैं। मनुष्‍य बेरोजगार होता गया है क्‍योंकि गाँव और नगर पीढ़ियाँ उगल रहे हैं। निराशा का रंग दिन-प्रतिदिन गाढ़ा होता गया है क्‍योंकि मनुष्‍य की स्‍थिति अनपहचान होती गई है।'' महानगरों में भीड़ का दबाव बढ़ा है तो उसी अनुपात में जीवन यांत्रिक और एक रस होता जा रहा है। नतीजा यह है कि छोटे नगरों में जीवन के अभाव और विषम परिस्‍थितियाँ इतनी अधिक तेजी से बढ़ रही हैं कि व्‍यक्‍ति के मन में ‘एलियनेशन' और ‘बोरडम' की भावना ने डेरा सा डाल लिया है।

उपयुक्‍त साधनों का अभाव, जीवन स्‍तर में उत्‍पन्‍न बाधाएँ, अव्‍यवस्‍था व अनुपयोगी शिक्षा, बेकारी, जनसंख्‍या की बढ़ोत्‍तरी, वैज्ञानिक सुविधाओं का अधकचरापन और बीमारी, गन्‍दगी व भुखमरी के कारण देश का आम आदमी पीड़ित है। उसका रक्‍तचाप या तो ऊँचा है, या काफी नीचा है। वह ‘नार्मल' नहीं रह गया है। युवक-युवतियों को अपनी समस्‍याएँ हैं। अप्राकृतिक यौन सम्‍बन्‍ध, उन्‍मुक्‍त प्रेम, समलैंगिक विवाह, नशीले पदार्थों का सेवन, तलाक, हड़ताल, भ्रूण हत्‍या और नंगे-अधनंगे शरीरों का नृत्‍य आदि जीवन को जिस हवा के साथ बहाये जा रहा है वहाँ ठहरकर सोचने का अवकाश ही किसको है ? नयी पीढ़ी समाज की सड़ी-गली परम्‍पराओं को तोड़ रही है। लीक से हटकर अपने अनुसार लीक बना रही है। वह ‘वाइफ स्‍वैपिंग' के खेल खेलती है। फैशन का नया दौर सामने से गुजर रहा है। ‘टापलेस' और ‘मिनी स्‍कर्टस' का फैशन जोरों पर है। फैशन का बाजार गर्म है। एक तरह का डिजाइन आ नहीं पाता कि दूसरा आकर उसे पुराने खाते में धकेल देता है। हिप्‍पी व वीटनिक संस्‍कृति ने देश के महानगरों का जीवन क्रम ही बदल दिया है। वर्तमान जीवन में कालेजों और विश्‍वविद्यालयों का जीवन भी अनाकर्षक अव्‍यवस्‍थित और असन्‍तोषपूर्ण होता जा रहा है। युवा बुद्धिजीवियों के सामने भविष्‍य का रूप स्‍पष्‍ट नहीं है और आज की नारकीय जिन्‍दगी की धकापेल में कर्तव्‍य का ज्ञान ही हवा हो गया है। अतः विगत वर्षों में हमारा जीवन जितना बदला है, उसमें जो अव्‍यवस्‍था, दरार और बिखराव आया है, उतना पिछले सैकड़ों वर्षों में भी नहीं आ पाया था। मध्‍यवर्गीय व्‍यक्‍ति एक ओर तो पुराने संस्‍कारों की जकड़न से बाहर आना चाहता है और दूसरी ओर ‘टेबूज' व रूढ़ियों की जंजीरों को तोड़ डालने पर आमादा है, किन्‍तु करे क्‍या ? उसके हाथों की ताकत गायब है। वह आधुनिक विदेह हो गया है। उसकी संकल्‍पी मनोवृत्‍ति नीचे दब गई है। अतः विवश है, अभिशप्‍त जीवन जी रहा है। इस विवशता ने उसके मानस में कुंठा, एकाकीपन, अजनबीपन, घुटन, निरूद्देश्‍यता, नपुंशक आक्रोश और अकेलेपन के बोध को गहरा दिया है। इस स्‍थिति से केवल पुरूष गुजर रहा हो ऐसी बात नहीं है, स्‍त्रियाँ भी इसी स्‍थिति और परिवेश में जी रही हैं। उनका शरीर रीतिकालीन नायकों के द्वारा तो उन्‍मथित ही हुआ था। आज तो वह बार-बार नापा जा रहा है। वासना के फीते के सामने वह छोटा पड़ गया है। अंग-प्रत्‍यंग पर वासना के नीले निशान हैं और उसकी परिणति भ्रूण हत्‍या, एबार्शन और भोग की दीवारों से सिर पटकने में ही रह गई है। कहने का तात्‍पर्य यह है कि आधुनिक परिवेश का मानचित्र काफी भयावह त्रासद और घिनौना है। उसमें समस्‍याओं के पहाड़ हैं, अतृप्‍तियों व विक्षुब्‍ध मनः स्‍थितियों की सरिताएँ हैं, अकेली शैलमालाओं और समूचे मानचित्र में न कोई रंग है, न रौनक। वह विकृत, हाशियाहीन, सीमाहीन और लिजलिजा सा हो गया है। इतना ही नहीं उसमें अंकित प्रत्‍येक नगर अजनबीपन का भार लिये अपनी जगह पर खड़ा भर है। यों उसके आसपास, छोटे बड़े नगरों की भीड़ है, उसका दबाव है, परन्‍तु फिर भी वह अकेला है। ऐसे परिवेश में लिखा गया आधुनिक साहित्‍य इससे अलग कैसे हो सकता था ? नहीं न। अतः उपरिसंकेतित परिवेश से प्रभावित साहित्‍य का रूप रंग भी तदनुकूल ही है।

समूची मानवता, मानवीय सम्‍बन्‍धों और मूल्‍यों का अपने ढंग से पुनरूवेषण करती है, अपने लिये एक मार्ग चुनती है, उसे केवल उसकी जन्‍म विवरणिका के माध्‍यम से कैसे समझा जा सकता है। उसकी पहचान उसकी व्‍यक्‍तिगत रूचियों, आदतों और प्रतिक्रियाओं से तो होती ही है उसे उसके परिवेश और सृजन के सहारे से भी समझा जा सकता है। व्‍यक्‍ति वह नहीं जो वह बाहर से दिखता है, अपितु असली व्‍यक्‍ति वह है जो आदमीनुमा शक्‍ल का खोल ओढ़कर अपने भीतर एक आदमी को लिये चलता है। यह तथ्‍य सामान्‍य व्‍यक्‍ति से लेकर कलाकार तक पर लागू होता है। आधुनिक जीवन की विसंगतियाँ तो इस तथ्‍य को और भी प्रमाणित कर देती हैं। मनुष्‍य लाख कोशिश करे, परन्‍तु वह आन्‍तरिक संवेदना को छुए बिना न तो जीवन की विचित्रताओं से परिचित हो सकता है और न उसके मूल में कार्य कर रही शक्‍तियों से। कलाकार तो यों भी ‘मूड़ी' होते हैं और फिर मोहन राकेश जैसा कलाकार तो और भी सशक्‍त प्रतिमानों से ही माना जा सकता है।

मोहन राकेश समकालीन लेखकों और बुद्धिजीवियों के बीच ऐसा लेखक था जिसने पुरानी मान्‍यताओं, रूढ़ियों और विचारों पर तीखा प्रहार किया है। आज का आदमी अपने आसपास के अनेक सवालों से टकराता, टूटता और निर्वासित हो रहा है। क्‍योंकि मनुष्‍य वैज्ञानिक उपलब्‍धियों को अपने जीवन में जाने-अनजाने स्‍वीकार कर रहा है और वैज्ञानिक विचारधारा ही आधुनिकता की धारणा बन गई है। अतः आधुनिकता ने वार्तालाप के दायरे को नितांत सीमित और संकुचित कर दिया है। व्‍यक्‍ति अकेलेपन से निकलने और परिवेश से जुड़ने के लिये छटपटा रहा है। वह जीने के लिये नये सम्‍बन्‍धों और नयी मान्‍यताओं की तलाश करता है ताकि अपनी खोई हुई दिशा को प्रकाशित कर सके और जीवन को नये सम्‍बन्‍धों और सन्‍दर्भों से जोड़ सके। राकेश आधुनिक कम रोमान्‍टिक अधिक थे। राकेश जीवन में सवाल उठा सकते थे लेकिन उसका फतवा कहीं नहीं देते थे। राकेश ने जीवन में जो कुछ भोगा वही लिखा। राकेश जब प्रयोग के धरातल पर उतरे तो उन्‍होंने सामने वाली वस्‍तु को न देखकर अपितु उसकी असली नाड़ी की परख करके ही झुंठलाया। स्‍वीकार और अस्‍वीकार, ग्रहण और त्‍याग तथा विरोध और सामंजस्‍य की यह प्रक्रिया रेल की समानान्‍तर पटरियों की तरह राकेश के जीवन और साहित्‍य में देखी जा सकती है। वस्‍तुतः राकेश एक ऐसा कलाकार था जिसमें एक सांस में ही सब कुछ को नकारने की क्षमता थी तो बहुत कुछ को एक साथ ही ग्रहण करने की शक्‍ति भी थी। उसकी यह क्षमता निरन्‍तर अन्‍वेषणरत होकर प्रयोग करती रही। कहने की आवश्‍यकता नहीं कि ऐसे राकेश के जीवन की कहानी विचित्र भी है और अकल्‍पनीय भी। कभी-कभी लगता है कि राकेश की जिन्‍दगी का यह वैचित्रय बोध, यह अन्‍वेषणी स्‍वभाव ही उनके व्‍यक्‍तित्‍व का समर्थ पहलू भी है और यही उसकी दुर्बलता भी। आधुनिक बोध का यथार्थवादी चितेरा, कहानियों और उपन्‍यासों का थका हारा, किन्‍तु सम्‍भावनाकुल व्‍यक्‍ति और नाटकों में अर्न्‍तमुख भाव वलयित चेहरे वाला मोहन राकेश आधुनिक युग का मोहन भी था और राकेश भी।

नाटकों के परिप्रेक्ष्‍य में देखें तो वर्षां में उसका जो विकास हुआ है साथ ही उसमें जो नई प्रतिमाएं बनी हैं और जो संदर्भ आये हैं वे राकेश के सहारे अधिक गतिमान हुये हैं। गतिमानता की इस प्रतिक्रिया में राकेश का योगदान अप्रतिम है। अपने भाव से विचार और विचार से सूक्ष्‍म संवेदनात्‍मक स्‍तरों की खोज की है। इस खोज में व्‍यक्‍ति का भीतरी व्‍यक्‍तित्‍व ही अधिक विश्‍लेषित हुआ है। नाटक को रंगमंच से घनिष्‍ठता और अनिवार्यता संपृक्‍त मानकर राकेश ने अनेक नये मार्गों का उद्‌घाटन व प्रवर्तन किया है। इतना ही क्‍यों नाटक के क्षेत्र में राकेश की प्रयोग धर्मिता के इन्‍द्र धनुष भी झिलमिलाते दिखलाई देते हैं। बीजनाटक और पार्श्‍वनाटक जैसे नामों केवल नामों ही नहीं कथ्‍य और शिल्‍प की ताजगी में भी, के सहारे राकेश ने अपनी प्रयोगशीलता का परिचय दिया है। वस्‍तुतः राकेश अन्‍वेषक थे और इसी वजह से उनका समस्‍त साहित्‍य एक सजग प्रहरी और अन्‍वेषक का साहित्‍य प्रतीत होता है।

कहानीकार के रूप में राकेश हिन्‍दी की नयी कहानी के सशक्‍त हस्‍ताक्षर हैं। उनकी कहानियों की उपलब्‍धि अप्रतिम है। वे क्‍लासिक महत्‍व की कहानियाँ है। उनकी कहानियों में प्रायः अकेले पड़े उस मनुष्‍य का चित्रण हुआ है जो आज के समाज में परिवर्तित मूल्‍यों और सम्‍बन्‍धों की यंत्रणा को अपने अकेले क्षणों में झेलते जाने के लिये अभिशप्‍त है। हाँ, यह एक सच्‍चाई है कि इनका अकेलापन अपने समाज से कटे हुये व्‍यक्‍ति का अकेलापन नहीं है, वरन समाज के बीच रहकर छटपटाते घुटते और निरन्‍तर खाली होते जाते मनुष्‍य का अकेलापन है। मोहन राकेश के कहानी साहित्‍य की उपलब्‍धि कथ्‍यपरक तो है ही, वह अपनी शैल्‍पिक ताजगी के कारण भी नयी पीढ़ी के लिये एक चुनौती है। उसकी सबसे बड़ी उपलब्‍धि समकालीन विसंगतियों और मानवीय रिश्‍ते की त्रासदी का सजग और आत्‍मीय शिल्‍प में अभिव्‍यंजन है। कथ्‍य जितना दमदार और यथार्थ है, शिल्‍प भी उतने ही दम से युक्‍त है। उसमें आत्‍मीय और विश्‍वसनीय शैली का प्रयोग हुआ है।

राकेश जी के उपन्‍यास उनकी कहानियों में निरूपित कथ्‍य के ही विस्‍तार हैं। वे कहानियों में जिस त्रासदी, पीड़ा, आकुलता और जटिलता बोध को अभिव्‍यक्‍त करते रहे वही अधिक गहनता और धनता के साथ उपन्‍यासों में अभिव्‍यक्‍त करता है। ‘अंधेरे बंद कमरे' यदि हरबंश और नीलिमा की कहानी भर बनकर रह गया होता तो यह उसकी कमजोरी होती। यह तो दिल्‍ली के परिवेश में साँस लेते विविध वर्गों वाले पात्रों की जीवन्‍त गाथा है। इसमें आकर समकालीन जीवन विशेषकर समकालीन परिस्‍थितियों की जटिलता में घुटते और हताश होते स्‍त्री-पुरूष के सम्‍बन्‍ध अपनी स्‍थिति के अभिव्‍यंजन के लिये जुबान भी पा गये हैं। ‘न आने वाला कल' अस्‍तित्‍व की चिन्‍ता और उसकी सुरक्षा-भावना को लेकर लिखा गया उपन्‍यास है। ‘अंतराल' में फिर एक बार राकेश ने कुमार और श्‍यामा के सम्‍बन्‍धों और उनके सम्‍बन्‍धों के अन्‍तराल को चित्रित किया है। ध्‍यान से देखें तो राकेश की अधिकांश कहानियाँ और उनके सभी उपन्‍यास मानवीय सम्‍बन्‍धों-विशेषकर दाम्‍पत्‍य सम्‍बन्‍धों में आई कटुता, पीड़ा और विसंगतियों के विशद शब्‍द चित्र हैं। गत दो दशकों में सामाजिक जीवन और व्‍यक्‍ति का जीवन कितना बदला है, परिवेश कितना तल्‍ख हुआ है ? और मानव-मन खालीपन से कितना ,कहाँ तथा किन स्‍थितियों में भरता गया है, इसकी जानकारी के लिये राकेश की कहानियाँ और उपन्‍यास सर्वाधिक प्रमाणिक हैं। यह बहुत बड़ी उपलब्‍धि है कि एक रचनाकार अपने समय और परिवेश को पूरी ईमानदारी से अपने साहित्‍य में अंकित करता हुआ उसे विश्‍वसनीय बना दे। राकेश ऐसे ही सर्जक थे।

नाटक, कहानी और उपन्‍यास लेखक राकेश ने गद्य की विविध विधाओं पर भी लेखनी चलाई है। उनके निबन्‍धों में समकालीन विषयों व जीवन की चर्चा है। वे अपनी शैली की अभिनवता के कारण निश्‍चय ही लोकप्रिय हैं इसमें कोई सन्‍देह नहीं है। अन्‍य विधाओं को भी राकेश ने छुआ है जैसे डायरी, जीवनी, आत्‍मकथा, रेखाचित्र और रिपोर्ताज, किन्‍तु इस दिशा में वे सक्रिय नहीं रहे। अन्‍य विधाओं में उनका ध्‍यान यदि कहीं केन्‍द्रित हुआ है तो वह यात्रा वृतांत है। ‘आखिरी चट्टान तक' यात्रा संस्‍मरण है-यात्रा-वृतांत है। इसमें प्रकृति की अनाध्रात छवियां हैं, सौन्‍दर्य की तरंगें हैं, सांस्‍कृतिक संदर्भ हैं और इन सबको वाणी प्रदान करने वाली अद्‌भुत शैली है। यात्रापरक साहित्‍य के इतिहास में राकेश की कृति सदैव एक ऐसी उपलब्‍धि बनकर जियेगी जिस पर वर्तमान पीढ़ी को नाज होगा और भावी को इससे प्रेरणा मिलेगी।

मोहन राकेश का साहित्‍य युग साहित्‍य है। उसमें समकालीन युग-जीवन की अभिव्‍यंजना है। उसमें मनुष्‍य के राग-विराग, आसक्‍ति-अनासक्‍ति, स्‍वीकार-अस्‍वीकार, ग्रहण और त्‍याग, जीवन के गुह्य और जटिल संदर्भ, युग-त्रासदी और उससे उत्‍पन्‍न विभिन्‍न मनः स्‍थितियों का यथार्थ, विश्‍वसनीय और सही अंकन हुआ है। राकेश के साहित्‍य का सर्वप्रमुख गुण है। अनुभूति की ईमानदारी और अभिव्‍यक्‍ति की निश्‍छल प्रसन्‍नता और सबसे बड़ी उपलब्‍धि है। समकालीन जीवन की समग्र पहचान-पकड़ और सूक्ष्‍म संवेदनात्‍मक अभिव्‍यक्‍ति। यदि विधाता ने इस मनीषी सर्जक को कुछ मोहलत और बख्‍श दी होती तो साहित्‍य और समकालीन जीवन का अव्‍याख्‍येय उपकार होता।

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Ehsaas Short Stories Book by Nandlal Bharti

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(१)

पशु, पक्षी आदिक एक बार ।

जंगल में सब करें विचार ।।

बढ़ता मानव अत्याचार ।

क्या होगा इसका उपचार  ?

   (२)

पेड़, बगीचे सारे काट ।

ताल, तलैया डाले पाट ।।

नदियों का कर डाला गति ।

किसने मारी इनकी मति ।।

   (३)

गाँव-शहर से चैन न आये ।

जंगल में भी घात लगाये ।।

अन-जल से अब नहीं अघाए ।

पकड़-पकड़ के हमको खाए ।।

    (४)

चूहा बोला बिल्ली बदनाम ।

मानव भी खाए गुमनाम ।।

बीछी, सांप भी बात बताये ।

कभी सुना न आज सुनाएँ ।।

मानव जिन्दा हमें चबाये ।

मोर कहे जग हमें लगाये ।।

   (५)

मेंढ़क बोला किसे सुनाएँ ।

माँस से मतलब जो पा जाये ।।

कच्चा-पक्का उसे चबाये ।

मानव मानव को जब खाए ।।

दूर नहीं दिन सही बताएं ।

ऐसा कह सबको समझाये ।।

   (६)

केंकड़ा बोला मुझे चबाएं ।

चूजा बोला रस पी जाएँ ।।

कुत्ता बोला मुझको मारें ।

बिल्ली बोली किसे पुकारें ।।

   (७)

लोमड़ी, साही रो-रो बतलाएं ।

मार, भूज के हमको  खाएं ।।

हाथी बोला दांत दिखाए ।

मुझे मार इसको ले जाएँ ।।

चीता कहता खाल उतारें ।

बचा नहीं जिसको न मारें ।।

(८)

जीव सकल जो जगत में जाये ।

तजि मानव थे बाकी आये ।।

बारी-बारी से दुःख गाए ।

अपनी-अपनी दशा सुनाये ।।

(९)

मानव दानव सा व्यवहार ।

करन लगे सब नहीं बिचार ।।

कौन सुनेगा बात हमार ।

रो-रो कहते सभी पुकार ।।

  (१०)

धर्म की माने नहीं लगाम ।

दाम, नाम बन गये मुकाम ।।

पाप बढ़े तो आते राम ।

जंगल में ऐसा कोहराम ।।

एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.) ।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

_____________________________________

aadamijat -

आदमीजात

जीत जाता है हरदम वो ही,

अबला हारी, हारी है,

देख आईना ताज़ा ताज़ा,

लिख रहा हूं सच्चा मुच्चा,

फ़िर से अनुभव भारी है,

बेईमानी उसकी सब जानते हैं,

नकाब लगा के कई सारे,

वो घूमता है आस - पास ही,

बातें करता बडी बडी,

मेज़ की बातें अखबार में छप जाय,

गोष्ठियाँ नारीवाद लेख तक सिमटे,

यही ईष्ट है और बनी चाह ये,

कंगूरे की ईच्छा वाला,

कितना विलग है ये आदमी,

पड़ोस में अबला पीटी जाती,

तब लेखक चुप रहते हैं,

उसका आदर, चिंतन उसका,

गायब गायब लगते हैं,

हैरान करती है ये अदाकारी,

आदमीजात के आदमी की,

चिल्लाकर लोग लिखते हैं बस,

कोई छपने को, कोई बिकने को,

सम्मेलन के मण्डप नीचे,

गूढ भाव से नारी चिन्तन,

लेख, किताबें और पत्रिकाएं,

भरी पडी है, उफ़न रही है

सबला - सबला कागज़ रंगे,

पर समाज़ में,

अबला, अबला है,

उपर से फ़िर,

जोर लगाकर लिखता,

आदमीजात का आदमी,

बरसों की मेहनत देखूं यूं,

मोटे आखर में साफ़ लिखी है,

किस्मत उसकी कुछ ऐसी ही

चोका - चूल्हा, और मज़ूरी,

खेती - किसानी की हिस्सेदार सी,

लगती है उसे वो कभी कभी,

बिना सींग की गाय सी

कम इच्छाओं वाली,

सादी इंसान,

बीच के रास्ते वाले घरों में,

प्यार की अदाकारी तक उसकी,

नसीब नहीं घर को,

जी भरकर मान लिया है उसने,

भोली, अनजान और सरल उसको,

बे - पहचान के रिश्तों में उलझा,

आदमी बन गया है अभिनेता सा,

बच्चे खुद के बाट जोहते,

बड़े बुज़ुर्ग से ओझल हैं वो,

रंग बदलेगा आदमीजात का कभी,

सपना टूट गया सा लगता है,

मशगूल बना फ़िर,

गप्पबाज़ी में रोज़मर्रा की तरह,

उठने लगे कि नया दोस्त आ बैठा,

लो चाय पर चाय,

यानि फ़िर चलेंगे,

नारीवादी विमर्श के झू्ठे दौर ......... झूठे तर्क ..........

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माणिक
आकाशवाणी,स्पिक मैके और अध्यापन से जुड़ाव
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yashwant kothari new (Mobile)

वे एक मामूली हिन्दी अध्यापक थे। महान् बनना चाहते थे, सो अकादमी में घुस गये। वे अब महान् साहित्यकार हो गये। अकादमी भी उनको पाकर धन्य हो गई। उन्होंने कविता लिखी। कविता महान् हो गई। उन्होंने सम्पादन किया। सम्पादकी महान् हो गई। उन्होंने आयोजन किये। आयोजन कृतार्थ हो गये।
मगर मैंने महसूस किया उनके अकादमी में घुसने से एक हलचल हुई। थोड़े दिनों बाद उनके सौभाग्य और अकादमी के दुर्भाग्य से उपाध्यक्ष का निधन हो गया। उन्होने अपनी बंसी टेरी और वे अकादमी के उपाध्यक्ष हो गये। कुछ दिनों के बाद अकादमी के दुर्भाग्य और उनके सौभाग्य से अकादमी अध्यक्ष भी स्वर्ग सिधार गये, अब वे अकादमी के अध्यक्ष हो गये। जैसे उनके दिन फिरे, किसी के नहीं फिरे। अब वे महान् साहित्यकार, प्रबुद्ध अध्यक्ष, चिन्तक, विचारक, कवि सब कुछ एक साथ हो गये। वे किसी प्रकाशक की दुकान पर चढ़ जाते। प्रकाशक महान् हो जाता। वे किसी नवोदित के सिर या पीठ पर हाथ रख देते, नवोदित महान् हो जाता। उन्होने एकाध महिला को मित्र बनाया महिलाएं महान् हो गई।
उन्होंने साहित्यिक समारोह में वक्तव्य और अकादमी की रपटें पढ़ी, रपटें महान् हो गई। जो उन्होंने लिखा सो महान् बाकी सब कूड़ा -करकट। यहां तक कि गांधी और नेहरू पर लिखा भी कूड़ा कचरा साबित कर दिया उन्होंने। धन्य है वे। जब अध्यक्ष हो गये तो अपने प्रकाशक के लिए भी कुछ करना था क्योंकि अध्यक्षता अस्थायी चीज है, प्रकाशन लाभप्रद व्यवसाय है, सो उन्होने अपने प्रकाशक को अकादमी प्रकाशनों का एकमात्र वितरक नियुक्त कर दिया। प्रकाशक धन्य हुआ। अध्यक्ष जी के चेले चाटे बन गये। वे मठाधीश हो गये। अपने मठ में बैठते । चेलों से समाचार लिखवाते, चीफों के लिए दावतें करते और मुझे देखकर मुंह बिचकाते। मैं नमस्कार की कोशिश करता, वे पीठ फेर लेते। मैं एक घटिया कलम घिस्सू, गैर हिन्दी वाला, वे महान् स्वयं के लेखन से स्वयं आक्रान्त।
मैं बचकाना, बच्चा लेखक, मेरा लेखन कूड़ा करकट, उनका लेखन कालजयी क्लासिक। उनकी मूछें बड़ी और ऊंची मेरी बात छोटी और मूछें नीची।
वे राजधानी आते। राजधानी महान् और कृतार्थ हो जाती। वे सचिवालय जाते सचिवालय धन्य हो जाता। महानता के इस मुखौटे के नीचे उनका घटिया और तृतीय श्रेणी का राजनीतिक व्यक्तित्व। वे साहित्यकारों में नेता और नेताओं में साहित्यकार। लिखा कम। छपा उससे भी कम। मगर चर्चित ज्यादा करवाया। चर्चित होने के सभी नुस्खों का भरपूर उपयोग किया। सम्पादकों, अफसरों, मित्रों, रिश्तेदारों, परिचितों, भाई, भतीजों को खूब रेवड़ियां बांटी और रेवड़ियां खा खाकर वे इनकी विरूदावलि गाने लग गये। वे हमेशा चर्चा के केन्द्र में रहे। स्थानीय से प्रान्तीय, प्रान्तीय से राष्ट्रीय, राष्ट्रीय से अन्तराष्ट्रीय स्तर तक उठते चले गये। लेखन गौण रह गया। पीछे छूट गया। स्तर उठता गया। मानवता मरती गयी। वे संसार के किनारे पर पहुंच गये। अब सोचने लगे। मगर अब क्या हो सकता था।
मैंने एक बार फिर कोशिश करने के लिहाज से उन्हें पुनःनमस्कार किया। इस बार वे मुस्कराये। मैं कृतार्थ हो गया। बातचीत शुरू करना ही चाहता था कि उन्होंने मेरी ओर से पीठ फेर ली। मैं अपमानित होकर पुनःव्यंग्य की शरण में आ गया।
उनका एक शिष्य यह देख रहा था। उसने चारों तरफ मेरी उपेक्षा का ढिंढोरा पीट दिया। सबकेा ज्ञात हो गया कि अध्यक्ष जी मुझे पसन्द नहीं करते। सब मेरे से घृणा करने लग गये।
मैं अपना अस्वीकृत सखेद अभिवादन लिये अकादमी के द्वार पर खड़ा हो गया। शायद कभी ये बंद दरवाजे खुलें, मैं अन्दर घुस सकूं। मगर बंद गली के दरवाजे कभी नहीं खुलते।

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यशवन्त कोठारी
86,लक्ष्मी नगर ब्रहमपुरी बाहर,जयपुर-302002
फोनः-0141-2670596

ykkothari3@yahoo.com

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बाजार में जब से पुरानी साहित्यिक-सामाजिक पत्रिकाएं गायब हुई हैं । पुस्तक-पत्रिकाओं के स्टालों पर जाने का मन ही नहीं करता। कहाँ गये वे खूबसूरत धर्मयुग, सारिका, दिनमान, पराग, सण्डे मेल,सण्डे ओबजरवर, कहानी वाले दिन। इनके स्थान पर चिकने कागज पर शानदार माडलो, हिरोईनों, हीरो के नयनाभीराम, दर्शनीय कवर दिखाई देने लग गये हैं। सत्यकथाओं, हत्याओं, बलात्कारों फिल्मी कहानियों की पत्रिकाएँ छा गई हैं। इनसे यदि आप बच कर निकल भी जाये तो धर्म, अध्यात्म, बाबाओं की सचित्र पत्रिकाएँ आपको आमन्त्रण देती हैं। समाचारों की सचित्र पत्रिकाएँ समाचार कम रोपित समाचार ज्यादा देती है और अक्सर गासिप कालमों का मजा देती है।

पत्रिकाओं में से साहित्य, कविता, संस्कृति का स्थान सिलाई, कढ़ाई, बुनाई साहित्य ने ले लिया है। पकवान बनाने पर पूरी पत्रिका उपलब्ध हो जाती है। कुत्तों, अन्य जानवरों, अन्य व्यवसायों पर ढेरों पत्रिकाएँ चिकनी, सुन्दर, मनमोहनी अदाओं के साथ आपका ध्यान आकर्षित करने को उद्यत है नजर हटाना आसान नहीं है श्री मान।

हिन्दी और भारतीय भाषाओं की पत्रिकाओं में अब सजने संवरने, ब्यूटी पार्लर जाने की एक नई विद्या विकसित हो रही है। पाठक को रिझाने के लिए पत्रिकाएँ कुछ भी करने को तत्पर है और पाठक है कि ध्यान ही नहीं दे रहा। इन्टरनेट पर भी पत्रिकाएँ आ रही है मगर पूरी चमक-दमक के साथ। हिन्दी के पाठक को अपनी और करने के लिए पत्रिकाएँ अधनंगी हो रही है। अश्लील सामग्री परोस रही है। फिल्मों के गोसिप कालमों के सहारे जी रही है। हिन्दी पत्रिका का पाठक पैसा फेंक तमाशा देख में विश्वास रखता है। वो पैसा फेंकता है और एक गदराये यौवन वाली चिकनी पत्रिका को अपने बगल में दबाकर खिसक लेता है कहीं कोई देख न ले।

बाजार में खड़ी पत्रिका भी पाठक के मन केा समझ कर झूठ, नकलीपन, बेशर्मी का पूरा सहारा लेती है उसे भी तो बाजारवाद, उपभेाक्ता वाद, खुली अर्थव्यवस्था में जिंदा रहना है। यदि विदेशी प्लेबाय जैसी पत्रिकाएँ यहां छपने लग गई तो बेचारी भारतीय पत्रिकाओं का क्या होगा। उन्हें तो पूरा नंगा होना पड़ेगा।

हम सब जानते है पत्रिका निकलती ही बन्द होने के लिए है। एक न दिन हर पत्रिका को बन्द होना है, उसे मरना है। सम्पादक-लेखक, पत्रकार यह सब जानते है। सम्पादक अब ब्यूटीपार्लर पर काम करने वाला मेकअपमेन हो गया है। उसके सब सरोकार बाजार में नंगी पत्रिका बेचने तक सीमित रह गये है। पत्रिका नहीं हुई एक सी ग्रेड की पत्रिका हो गई। सम्पादक को भी अपने बच्चे पालने हैं, सेठजी की मिल के लिए लाइसेंस जुटाना है और सबसे उपर जिंदा रहना है। चिकने चेहरे चिकने कवर पर यदि ये सब हो जाता है तो परेशानी क्या है ? आप क्यों प्रलाप कर रहे है ? क्यों आलाप ले रहे हैं ? आपका कहना ठीक है, मगर रहा नहीं जाता। सहा नहीं जाता।

पत्रिका है तो कवर होगा। कवर होगा तो उस पर कुछ तो छपना है। देशी माल नहीं चलेगा। विदेशी चेहरा लाओ।

लेकिन इन चिकने कवरों के खुरदरे सत्य भी है, जो दिखाई देने लगे है। खूब चिकने कवर भी कुछ समय बाद रद्दी की भेंट चढ़ जाते है। मुख पृष्ठ पर छपी मुख मुद्रा भी असहनीय हो जाती है। प्रकाशक पूरी ताकत से नंगा हो कर नंगी पत्रिका छाप कर भी दिवालिया हो जाता है। पूरी पत्रिका का कलेवर एक चिकने चेहरे और चिकने कवर में बन्द हो जाता है। कविता और कवि बेचारे कहीं हाशिये पर चले जाते है। पत्रिकाओं के बाजार में हसीना का चेहरा ही सब कुछ है सर जी। इसे खूब ध्यान से देखो फिर मत कहना निगाहें चूक गई।

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यशवन्त कोठारी
86.लक्षमीनगर ब्रहमपुरी
बाहर  जयपुर . 302002 
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सच्‍ची को, नौकरी तो साली बाप की भी बुरी होती है। और ये ठहरी सरकार की जो चौथे रोज बदली होती है । सरकार की भी काहे की, उनकी। आज की डेट में सरकारी मुलाजिम जनता के नौकर नहीं, आकाओं के नौकर हैं। जनता जाए भाड़ में साहब! जनता के पास है ही क्‍या देने को? वह तो खुद दाने- दाने को मोहताज है। अब तो बस उनके जो भी आदेश, सिर माथे। टके- टके के आगे सिर झुकाना पड़ता है। शुरू शुरू में बुरा लगा। अब आदत हो गई है। स्‍कूल में कभी ये आ रहा है तो कभी तो वो। अपना तो हे खुदा ,मरना भी उनके हाथ है तो जीना भी ।

अबके उनको पता नहीं क्‍या सूझी कि उन्‍होंने अपने विभाग से आदेश जारी करवा दिए कि सरकार चाहती है कि हर शहर के बालिग, नाबालिग कुत्‍तों का पंजीकरण किया जाए ताकि सरकार को पता चले सके कि देश में कितने कुत्‍ते अवैध रूप से रह रहे हैं।

मैं ठहरा घैंठ स्‍कूल मास्‍टर! सच कहूं! मैं सरकार के सारे काम करता हूं पर बच्‍चों को पढ़ता नहीं। पढ़ाऊं तो तब जो मौका मिले। जनगणना हो तो मास्‍टर जी सबसे आगे। चुनाव हो तो मास्‍टर जी के बगैर मजाल जो चुनाव पूरे हो जाएं। वोटर लिस्‍ट बननी हो तो चलो मास्‍टर जी। वे आने हों तो लाओ मास्‍टर जी बच्‍चों को इकट्‌ठा करके। देश में गधे गिनने हों तो चलो मास्‍टर जी उठाओ झोला और हो लो फील्‍ड में। देश में उल्‍लू गिनने हो तो चलो मास्‍टर जी, हो जाओ आगे। कई बार तो लगता है मैं पेशे से बस मास्‍टर नहीं हूं और सबकुछ हूं।

इधर उन्‍होंने चाहा उधर सभी ने अबके फिर हट फिर कर मास्‍टर जी के सिर आदेश दे मारे। अब मैं आगे आदेश कहां करता? इस देष के साथ सबसे बड़ा पंगा यही है कि आदेशों को मानना उसी की मजबूरी होती है जो उन्‍हें औरों पर मढ़ने में असमर्थ हो।

सबके प्रकोप से बचने लिए मैं निकल पड़ा शहर के कुत्‍तों का पंजीकरण करने के लिए आवेदन पत्रों को झोले में डाल। पत्‍नी ने हिदायत दी,‘संभल कर कुत्‍तों का पंजीकरण करना। उनसे भिड़ना मत। तुम्‍हारे साथ एक यह भी पंगा है कि खुद को बुद्धिजीवी मान हर कहीं भिड़ जाते हो। जबकि सच यह है कि तुममे बुद्धि नाम का कोई तत्‍व है ही नहीं। अगर होता तो मास्‍टर न होते।' अगर मैं लेखक- वेखक होता तो सच कहूं आज को कभी का तुलसीदास हो गया होता।

पत्‍नी की हिदायतों को गांठ में बांध बंदा चला पड़ा सरकारी मिशन पर। पेसोपेश में था कि शुरूआत कहां से करूं? कुत्‍ते आज की डेट में कहां नहीं? एक घर की सांकल ठनकाओ तो बीस भौंकते हुए बाहर आएंगे। पड़ोसी के घर से शुरू करने की सोची , पर डर लगा। शुरू में ही काट खाया तो??? ये घर लास्‍ट के लिए रखता हूं।

मुश्किल से बीस कदम ही घर से चला था कि सामने से भाई की तरह अकड़ाता कुत्‍ता आता दिखा तो मैं डरा। क्‍या हट्‌टा कट्‌टा कुत्‍ता साहब! जनता तो उसके आगे कुछ भी नहीं साहब! मैंने उसे पूरी विनम्रता से दोनों हाथ जोड़ उसका अभिवादन किया तो वह चौड़ा होते बोला, ‘कौन?'

‘मैं संपत लाल,राजकीय प्राइमरी स्‍कूल का इकलौता मास्‍टर सर!'

‘तो यहां क्‍या कर रहे हो? बच्‍चों को स्‍कूल में खिचड़ी कौन बनाएगा?'

‘वे अब खुद बनाने लगे हैं। मुझे तो उससे जरूरी काम सौंपा है सरकार ने।'

‘क्‍या काम सौंपा है ,' कह वह वो लाल पीला हुआ कि मेरी तो हलक सूख गई,‘ सरकार ने चाहा है कि देश के कुत्‍तों का पंजीकरण किया जाए ताकि सही-सही पता चल सके कि देश में अपने कुत्‍तों की संख्‍या कितनी है। सो उस बारे... अगर आप के पास फुर्सत हो तो....' मैंने डरते डरते बैग में फार्म के लिए हाथ डाला।

‘ ये सरकार भी पता नहीं क्‍या- क्‍या करती रहती है। देष में कुत्‍ते ही कुत्‍ते तो हैं। मैं तो कहता हूं कि पंजीकरण करना है तो इंसानों का करो। बजट भी बचेगा और काम भी जल्‍दी होगा। पर इनको कौन समझाए? जब हम सत्‍ता में आएंगे तो देखेंगे,' कह वह गुर्राया तो मेरे हाथ पांव फूले।

‘आप भी सत्‍ता में आ सकते हैं क्‍या?'

‘लोकतंत्र है। यहां कोई भी आ सकता है। देख नहीं रहे हो? यार मास्‍टर होकर भी आंखें बंद रखते हो।'

‘ पर अभी तो उनका नौकर हूं। जब आप आएंगे तो आपको ढो लूंगा। सो प्‍लीज, मेरी हेल्‍प कीजिए।' पता नहीं कैसे वह एक सरकारी कर्मचारी की मजबूरी को भांप गया सो सहयोग देने के लिए राजी हो गया,‘ कहो? क्‍या करना है मुझे ?' मेरी जान में जान आई, मैंने झोले से फार्म निकाला और उसे भरना षुरू किया,‘ सर आपका नाम?'

‘कुत्‍तों का कोई नाम नहीं होता। वे हर हाल में कुत्‍ते होते हैं बस।'

‘पर कागज में कुछ न कुछ तो लिखना ही पड़ेगा', मैंने बहुत आग्रह किया तो वह अपना नाम बताने को राजी हुआ,‘ लिख दो- ए बी सी लाल।'

‘आप सर रहते कहां हैं?'

‘यत्र तत्र सर्वत्र हम ही तो हैं।' कह वह खुजलाने लगा।

‘सर प्‍लीज कुछ तो पता दो।'

‘तो लिख दो गुंडा नगर , गली नंबर चार सौ बीस।'

‘ आपकी डेट ऑफ बर्थ?'

‘ जिस दिन समाज बना हम उसी दिन पैदा हो गए थे। बट फार यूअर ब्‍लाइंड इनफारमेशन, हम पैदा होने, मरने से ऊपर उठे होते हैं। हम अजर हैं, अमर हैं। हमारी कोई डेट ऑफ बर्थ नहीं होती।'कह उसने एक बार जो सिर ऊंचा करना षुरू किया तो ऊंचा करता ही चला गया। घमंडी कहीं का!

‘पर सर कालम है तो कुछ न कुछ तो लिखना ही पड़ेगा न!'

‘तो लिख दो इस देश में हम आजादी के बाद पैदा होने षुरू हो गए थे।'

‘आपके परिवार में और कौन- कौन हैं सर?'

‘पूरा ब्रह्‌माण्‍ड ही मेरा परिवार है।'

‘अर्थात्‌?'

‘ ब्रह्‌माण्‍डैव कुटुंबकम्‌। और कुछ ? जल्‍दी जल्‍दी पूछो जो पूछना है। अब मेरा मन काटने को कर रहा है। कह उसने जीभ लपलपाई तो मैं अलर्ट हुआ,' बस सर! बहुत हुआ। मुझे कोआपरेट करने के लिए आपका बहुत- बहुत आभार।' कुत्‍ते के काटने के इंजेक्‍शन के साइज की याद आते ही मेरे रोंगटे खड़े होने लगे।

काश! ये पेट न होता!!

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डॉ. अशोक गौतम

गौतम निवास, अप्‍पर सेरी रोड, सोलन-173212 हि.प्र.

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वयोवृद्ध चुनाव आयोग ने चुनावी शंखनाद किया, शंखनाद के उपरान्‍त विभिन्‍न राजनैतिक दलों ने भी अपनी अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार शंखनाद किया, कुछ कमल लेकर, कुछ साइकल पर, कुछ हाथ का पंजा, कुछ लालटेन, कुछ हाथी पर, कुछ दराँती हसिया आदि विभिन्‍न अस्‍त्र शस्‍त्र (चुनाव चिन्‍ह) लेकर चुनावी दंगल में शंखनाद करने लगें, मतदाता को अपनी अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार रिझाने लगे, मतदाताओं को अपनी अपनी ओर आकर्षित करने के लिये तथा अपनी सेना में बुलाने के लिये विभिन्‍न प्रलोभन दिये जाने लगें, मतदाता किंकर्तव्‍यविमूढ़ थे...................

दृष्‍टवेंम स्‍वजंन कृष्‍ण युयुत्‍सुं समुपस्‍थित ।

सीदन्‍ति मम गात्राणी मुखं च परिशुष्‍यति ॥

विभिन्‍न मतदाताओं के मुख सूख चुके थे, उनकी कई समस्‍याओं और शंकाओं का समाधान तो हो चुका था, क्‍योंकि पिछले कई चुनावी महायुद्धों में वह विभिन्‍न राजनैतिक दलों को वीरगति प्राप्‍त होते देख चुके थे, लेकिन कुछ प्रश्‍नों के उत्‍तर अभी भी अनुत्‍तरित थे, ऐसे में मतदाता भ्रमित दशा में था, उसने अपने प्रश्‍नों का उत्‍तर पाने के लिये अपने प्रभु नेताजी को ही अपना दिग्‍दर्शक समझा और नेताजी के पास जाकर बोलाः-

एवं सततयुक्‍ता ये भक्‍तास्‍तावां पर्युपासते ।

ये चाप्‍यक्षरव्‍यक्‍तं तेषां के योगवित्‍तमा ॥

मतदाता ने पूछा.......... '' जो आपकी सेवा में सदैव तत्‍पर रहते हैं या जो अव्‍यक्‍त (केवल मतदान ही करते है) इन दोनों भक्‍तों में आप किसे अधिक पूर्ण (सिद्ध) मानते है। अथवा आपको इन दोनों में से कौन अधिक प्रिय है'' ।

नेताजी ने कहाः-.............'' जो लोग अपने मन-शरीर को मेरे में साकार रूप में एकाग्र करते है और अत्‍यन्‍त श्रद्धा पूर्वक मेरी पूजा (चमचेबाजी) मुझे ही मानते है वे मेरे परम भक्‍त है और मुझे प्रिय हैं।''

लेकिन जो लोग बिना कोई स्‍वार्थ रखे मुझमें समभाव रखकर मुझे ईश्‍वरीय कल्‍पना के अर्न्‍तगत पूजते हैं, श्रद्धा रखते है, तथा मै ही अचल,अटल सत्‍य हूं तथा लोगों को मेरे में ही श्रद्धा करवाते हैं वह मुझे प्रिय है।

जिन लोगों के मन शरीर, कर्म, सहायता, आर्थिक मदद किसी अन्‍य राजनैतिक या सामाजिक संस्‍था में लगी हुई है और मुझे नगण्‍य समझते हैं उन मतधारियों का (मतदाताओं) की प्रगति कर पाना अत्‍यन्‍त कष्‍टप्रद है, उन मतधारियों की उस क्षेत्र में (चुनावी क्षेत्र) में प्रगति कर पाना सदैव दुष्‍कर है।

जो अपने सारे कार्यों (पत्‍नी,पति, पुत्र, व्‍यवसाय, धार्मिकता, सामाजिकता, चल अचल सम्‍पत्‍ति को) मुझमें अर्पित कर देता है तथा निष्‍काम भाव (मुझसे कुछ भी याचना की दृष्‍टि से नहीं मांगता) मेरा चुनाव प्रचार करता है तथा अपने चित्‍त को मुझमें स्‍थिर करके निरन्‍तर मेरा चुनाव प्रचार करता है। हे! मेरे प्रिय मतदाता वह मुझे अत्‍यन्‍त ही प्रिय है।

अतः हे मतदाता, हे आम आदमी, तुम मुझमें अपने चित्‍त (कार्यों को, सम्‍पत्‍ति को) स्‍थिर करो अपनी सारी बुद्धि मुझमें लगाओ, इस प्रकार निसन्‍देह तुम सदैव मुझे अपने पास ही पाओगे।

हे मतदाता यदि तुम निर्धन हो, तुम्‍हारे पास मुझे देने को न तो समय है, न मानव शक्‍ति है, न तुम्‍हारी पारिवारिक, सामाजिक स्‍थिति ही ठीक है तो भी अविचल भाव से अपना मत तो मुझे दे ही सकते हो, तुम्‍हारे दिये हुये मत से ही मेरी पूजा हो जायेगी तथा तुम मेरे प्रिय भक्‍त हो जाओगे, इस प्रकार तुम मुझे ही प्राप्‍त करोगे।

हे मतदाता, हे निर्धन व्‍यक्‍ति यदि तुम इन विधि विधानों को भी पालन करने में भी असमर्थ हो तो मेरे चुनाव प्रसार में बढ़ चढ़ कर हिस्‍सा लो, क्‍योंकि मेरे लिये कर्म करने से तुम निर्विवाद रूप से मेरे प्रिय हो जाओगे ।

लेकिन यदि तुम इन उपरोक्‍त कर्मों को करने में भी अपने को असहाय पाते हो तो तुम सभी कर्मों के फल को भूल जाओ (मुझसे कुछ भी आशा मत रखो, केवल अपना मत ही दो) तो अपने को मुझमें ही पाओगे, ऐसा भक्‍त मुझे बहुत ही प्रिय है।

यदि तुम यह अभ्‍यास भी नहीं कर सकते तो चुनाव के अनुशीलन में लग जाओ। लेकिन मत प्रचार से श्रेष्‍ठ मुझे मत देना है, यदि तुम मत देने बाद निश्‍चिन्‍त हो जाओगे तो तुम्‍हें मानसिक शान्‍ति प्राप्‍त होगी और मानसिक शान्‍ति से बढ़कर इस युग में कुछ भी नहीं है।

जो मुझसे द्वेष नहीं रखता, तथा चुनाव प्रचार के समय अपने शत्रुओं और मित्रों के प्रति दयालु हो जाता है, जिसे अन्‍य मतदाताओं के सुख दुख से कुछ भी लेना देना नहीं होता, केवल मुझे ही मत दिलाकर आत्‍मतुष्‍ट रहता है तथा जिसे यह निश्‍चय हो जाता है कि इस चुनाव में उनके द्वारा प्रचारित मत मुझे ही (नेताजी को) मिले हैं तथा उनकी मन, बुद्धि निश्‍चित है कि हमारे नेता जी ही विजयी होंगे ऐसा मतदाता मुझे बहुत ही प्रिय है।

जो मतदाता (भक्‍त) चुनाव के समय मेरे विरूद्ध मत डालने वाले को कष्‍ट पहुंचाता है तथा मेरे दल के लोगों के हित चिन्‍तन में (उन्‍हें खिलाना, पिलाना, दूरभाष पर बात करवाना, उनके आवागमन का बन्‍दोबस्‍त करवाना, अन्‍य दलों के कार्यकर्ताओं को भय तथा चिन्‍ता में डालता है) वह मतदाता मुझे सर्वप्रिय है।

ऐसा भक्‍त (मतदाता) जो सामान्‍य कार्य कलापों तक ही आश्रित नहीं (अपितु बूथ कैप्चरिंग, हिंसा करवाना ,फर्जी मत डलवाना आदि के कार्यों में दक्ष है) तथा चिन्‍ता रहित है कि हमारे नेता जी ही सिंहासन पर बैठने वाले है और स्‍वयं के लिये कुछ भी नहीं चाहता ऐसा कार्यकर्ता/मतदाता मुझे अतिशय प्रिय है।

जो मतदाता मित्रों और श़त्रुओं को भी मुझे ही मत दिलवाने के लिये बाध्‍य करता है तथा अन्‍य दलों द्वारा दिये गये मेरे सुख तथा दुख, यश तथा अपयश में समभाव रखता है (लेकिन अन्‍तःकरण में मेरी हितैषणा तथा दूसरे दल के लिये वितैषणा) रखता है तथा बुरी संगति में डूबे हुए लोगों (अफीम-गांजा, शराब, धन व्‍यय कर) मुझे ही मत दिलवाता है वह मुझे अत्‍यन्‍त प्रिय है।

जो मतदाता सदैव मौन रहता है तथा मेरे द्वारा (चुनाव के समय दी जाने वाली सुविधा यथा धन, मदिरा, वाहन, अस्‍त्र शस्‍त्र, छदम वोटर लिस्‍ट इत्‍यादि वस्‍तुओं से सन्‍तुष्‍ट रहता है तथा गोपनीय ढंग से उनका उपयोग करता है) व्‍यवस्‍था से सन्‍तुष्‍ट रहता है तथा अपने घर बार की परवाह न करते हुये मुझे जिताने में सतत प्रयत्‍नशील है वह भक्‍ति भाव समर्पण से पूर्ण मतदाता मुझे अत्‍यन्‍त ही प्रिय है।

हे मतदाता जो मेरे द्वारा बताये गये उपरोक्‍त सभी बिन्‍दुओं को अपना चरम लक्ष्‍य बनाकर मुझे विधान सभा या संसद में पहुंचा देता है उस भक्‍त को मैं निरन्‍तर याद करता हूं और वह भी मुझे अत्‍यन्‍त याद करता रहता है ऐसा भक्‍त/मतदाता मुझे अत्‍यन्‍त प्रिय है।

उपरोक्‍त वचनों को सुनाकर नेताजी ने कहा........... '' हे मतपुत्र यह निर्वाचन क्षेत्र ही असली कर्मक्षेत्र है और इस क्षेत्र को जाने वाला ही असली जानकार है।

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RK Bhardwaj

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