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अशोक जमनानी की कविता - धूप

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धूपधूप है बहुत
तुम याद मत आना
पैर जल रहें हैं
तुम याद मत आना
छाँव दूर है
तुम याद मत आना
मुश्किल भरा सफर है
तुम याद मत आना
वैसे तुम्हारी याद तो
सुकून है मेरा
पर देख नहीं सकता
धूप के सफर में
मुश्किल सी रहगुज़र में
तुम्हारी याद का आना
और उसके नाजुक पांवों में
छालों का पड़ जाना----
अशोक जमनानी
युवा साहित्यकार, होशंगाबाद
www.ashoknaamaa.blogspot.कॉम
(प्रकाशित उपन्यास ; व्यास गादी, बूढ़ी डायरी, को अहम् )

उमेश कुमार चौरसिया की दो कविताएँ

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कविताएंप्‍यारप्‍यार स्पर्श है अहसास हैचलती-रूकती एक श्‍वास है।प्‍यार मिलन है, जुदाई भीप्‍यार अमन है, खुदाई भी।प्‍यार पूजा है इबादत हैकभी बैचेनी कभी राहत है।प्‍यार हकीकत है सपना भीकुछ पराया है तो अपना भी।प्‍यार कुदरत का करिश्मा हैटंगारों में लिपटा सर्द चश्मा है।अनछुआ मनजब जन्‍मी तो सबने कहालड़का होता तो अच्‍छा होताशाला जाने लगी तो टोकारहने दे, घर का काम सीखयुवा सपनों ने हर बार कचोटाउमंगें नहीं विवशता बुनकहने का हक नहीं है तेराजो कहें, सबकी सुनघर-ससुराल-समाजभोगा सभी ने तननारी देह के भीतरअनछुआ रह गया मन।-------उमेश कुमार चौरसियाhttp://umeshkumarchaurasia.blogspot.com

हास परिहास : फ़र्क़ आदमी और औरत में…

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यदि दो आदमी आपस में  अनजाने में टकरा जाएँ तो वो एक दूसरे के ऊपर मुट्ठी तान लेंगे. पहला बोलेगा – ‘ऐ – अंधा है क्या? देख के नहीं चल सकता?’ ‘अंधा तू है कि मैं? खुद तो बिनदेखे चल रहा है. ज्यादा श्यानापण मत दिखा नहीं तो एक मुक्का मारकर आँख सुजा दूंगा’दूसरा प्रत्युत्तर देगा.‘अच्छा, हाथ लगा के तो देख – मैं तेरे दोनों आँख फोड़ दूंगा’ – पहला और गर्म हो जाएगा.एकाध मिनट में दोनों में गुत्थमगुत्था होने लगेगा और दर्शकों में से कुछ को मजा आने लगेगा तो कुछ को जबरन बीच-बचाव करना पड़ेगा, जो आमतौर पर सफल नहीं होगा. इस तरह से प्रायः एक नई पक्की, खानदानी दुश्मनी की शुरूआत हो जाती है.इसके विपरीत यदि दो औरतें टकरा जाएँ तो क्या होगा?‘सॉरी, मैं उधर शॉपिंग विंडो में उस पीले रंग की साड़ी को देख रही थी…’ पहली बोलेगी.‘ओह, कोई बात नहीं, मेरा ध्यान भी उधर काउंटर पर लाल रंग के गाउन पर अटका हुआ था’ दूसरी प्रत्युत्तर देगी. ‘अरे, ये तुमने कितना प्यारा आई शेडो लगाया है. लॅक्मे का है क्या? मेरे पास रेव्लॉन है उसमें तो ऐसा शेड नहीं आता…’ पहली और फ्रेंडली हो जाएगी.‘नहीं, मेरे वो कुवैत से ले आए थे – जाने क्या ईव सें लारेंस…

सारिका अंक 1986 से कुछ ग़ज़लें - मैं किन्हीं खुरदरे सवालों-सा, खूबसूरत जवाब-सी है वो.

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आशुफ़्ता चंगेजी की ग़ज़लसदाएँ कैद करूं, आहटें चुरा ले जाऊँ,महकते जिस्म की सब खुशबुएँ उड़ा ले जाऊँ.तेरी अमानतें महफूज रख न पाऊंगा,दुबारा लौट के आने की बस दुआ ले जाऊँ.बला का शोर है तूफ़ान आ गया शायद,कहाँ का रख्त-ए-सफर खुद को ही बचा ले जाऊँ.कहा है दरिया ने वह शर्त हार जाएगा,जो एक दिन में उसे साथ में बहा ले जाऊँ.
अभी तो और न जाने कहाँ कहाँ भटकूं,कभी बहाया था दरिया में जो दिया ले जाऊँ.---मुनव्वर खानम की ग़ज़लरात के पिछले पहर हमको सदा देता है कौन,दर्दे दिल के रोग की हम को दवा देता है कौन.पहले तो जलवा दिखाकर छीनकर होशो हवास,रेशमी आंचल से फिर हमको हवा देता है कौन.जिस जमीं में हो चुके हैं बारहा बेबस्त हम,फिर इसी मिट्टी से ये हमको बना देता है कौन.हम तलाशे आदमीयत में हैं सबसे बे-खबर,मन के मंदिर में मगर हमको सजा देता है कौन.हम मुनव्वर दिल के अरमां रखते हैं सब से छुपाए,दिल में आकर चुपके से उनको मिटा देता है कौन.---शिव ओम अंबर की ग़ज़लसच हुए एक ख्वाब-सी है वो,शूलवन में गुलाब-सी है वो.मैं किन्हीं खुरदरे सवालों-सा,खूबसूरत जवाब-सी है वो.इस नजर में खुला हुआ घूंघट,इक नजर में नकाब-सी है वो.छू उसे चोट ह…

प्रमोद भार्गव का आलेख - बीमारियों को महामारी में बदलने का खेल

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भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में साधारण बीमारियों को महामारी में बदलने का खेल चल रहा है। यह खेल बहुराष्‍ट्रीय दवा कंपनियां अरबों-खरबों का कारोबार करने के लिए खेल रही हैं। हाल ही में कुछ ऐसी जानकारियां सामने आई हैं जिनसे खुलासा हुआ है कि संक्रमण रोगों की रोकथाम के लिए पिछले ढाई दशक से चलाए जा रहे टीकाकरण कार्यक्रमों की पृष्ठभूमि में निजी कंपनियों का यह मुनाफे से जुड़ा कारोबार है। जिस स्‍वाइन फ्‍लू को महामारी माना जाकर पिछले एक साल से पूरी दुनिया में हल्‍ला मचा हुआ है, उससे अब तक केवल 60 लोगों के मरने की पुख्‍ता खबर है। जबकि बीते साल अप्रैल में जेनेवा में आयोजित एक आपात बैठक में विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन की महानिदेशक माग्रेट चाम ने कहा था कि स्‍वाइन फ्‍लू के कारण पूरी मानवता खतरे में है। हमारे केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने भारत की एक तिहाई आबादी को इस बीमारी की चपेट में बताते हुए देश के हरेक जिले के लिए दस हजार खुराक दवा खरीद ली थी। एड्‌स, पोलियो हेपेटाइटिस-बी, बर्ड फ्‍लू, एंथ्रेक्‍स जैसी अनेक बीमारियों को जीव जगत के लिए महामारी का सुनियोजित खतरा जताकर दवा कंपनियां और…

माणिक का व्यंग्य : बारह लाइन लिखकर बन गए साहित्यकार

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आजकल सभी तरफ छपने छपाने का जो दौर चल पड़ा है,कई बार दिल इतना क्रोधित होता है कि,कुछ कर नहीं पाने पर बस सिर फोड़ने की इच्छा होती है. देश भर के लगभग सभी इलाकों में आजकल जो बात बड़ी जोर पकड़ती जा रही है,वो एक बीमारी के माफिक ही है, साहित्यकार बनाने और बनने की. कुछ गलतफहमी में बन बैठे हैं तो कुछ को इलाके के अनपढ़ अखबारी संवाददाता, बना देते हैं. हमारे इलाके में भी जो पी.एचडी. करने बाबत जरुरत के मुताबिक् मेहनत नहीं कर पाए वे अपनी दिखावटी इज्जत बचाने को प्रोफ़ेसर लिखते है.उन्हें ये मालूम नहीं की कॉलेज वाले ही प्रोफ़ेसर बन जायेंगे तो विश्वविद्यालय वाले कहाँ जायेंगे. खैर. पिछले कुछ दिनों के स्थानीय अखबारों की प्रतियां बांच रहा था. बड़ा ताज्जुब हुआ जब किसी तहसील के छोटे से गाँव में वहाँ के इलाके के साहित्यकारों की बैठक आयोजन की खबर छपी थी. भैया जी, जहां हमारे पूरे मेवाड़ में कहा जाता है कि मीरा के बाद कोई कवि और मुनि जिनविजय के बाद कोई विद्वान् नहीं हुआ, वहां गाँव-गाँव में आजकल साहित्यकार बने मिल जायेंगे.पिछले दिनों की कहूं तो लम्बे अरसे से मीडिया में लगे लोग भी आजकल अपनी बुद्धि को ताक में रख नज़र आ…

दीनदयाल शर्मा की ग़ज़ल

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ग़जल की शक्ल में एक रचना तकाज़ा वक्त का / दीनदयाल शर्मा
चेहरे पर ये झुर्रियां कब आ गई,
देखते ही देखते बचपन खा गई.

वक्त बेवक्त हम निहारते हैं आईना,
सूरत पर कैसी ये मुर्दनी छा गई. 

तकाज़ा वक्त का या ख़फ़ा है आईना.
सच की आदत इसकी अब भी ना गई.

है कहाँ हकीम करें इलाज इनका,
पर ढूँढ़ें किस जहाँ क्या जमीं खा गई. 

बरसती खुशियाँ सुहाती बौछार, 
मुझको तो "दीद" मेरी कलम भा गई.

अध्यक्ष, राजस्थान साहित्य परिषद्, 
हनुमानगढ़ जं. - 335512 
http://deendayalsharma.blogspot.com
सृजन : 21 March , 2010, Time : 7:25 AM

चंद चुनिंदा कविताएँ

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सुरेन्द्र अग्निहोत्री की कवितापाने को सियासत अपने भी पराये हुयेजिन्‍हें दी थी कुर्सी वे भी बेगाने हुयेपुत्रमोह में कलंकित की निष्‍ठा चली चालफिर झूठो ने गला ली अपनी-अपनी दालधूप में जिन्‍हें देते हमेशा हम तो छॉववे ही दे गये पीठ में खन्‍जर से घावसुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्रीराज सदन, 120/132, बेलदारी लेन लालबाग लखनऊ-----.सतीश कुमार चौहान की दो कविताएँ
भ्रष्टाचारहर दफतर का शिष्‍टाचार बन बैठा हैं भ्रष्टाचार
कहता हमसे हाथ मिलाओ, कर देंगे तुम्‍हारा बेड़ा पार ,
मैं भी इतराया ,अपने आप को कर्मयोगी बतलाया,
पर वो भी कहां था मानने वाला,
उसने पुरे प्रजातंत्र को ही कुछ इस तरह खंगाला
बाफोर्स, ताबूत, तेलगी, तहलका, हवाला सब गिना डाला,
बडे गर्व से उसने कहा भ्रष्ट नेता जनता न संभाल पाएंगे,
बन जाओ हमारे ओ हरिश्चंद्र तुम्‍हारे बच्‍चे भी पल जाएंगे,
नेता, अ‍‍भिनेता, पुलिस, कानून,हर कोई साथ मेरे नाचता है
पंडित कुरान तो मुल्‍ला रामायण बांचता है,
अवसरवाद् के दौर में भ्रष्‍टाचार का ही जुनून है
जनतंत्र के शरीर में भ्रष्‍टाचार का ही खून है
मेरा तो स्‍वाभिमान खौल रहा था भ्रष्टाचार सर चढ़ …

घनश्याम मौर्य की ग़ज़ल

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ग़ज़लमुझको ज़रा समझा ये माजरा तो दीजिये।इस मौके पर फबता मुहावरा तो दीजिये।
तैयार बाज़ीगर है, खड़े हैं तमाशबीनपर खेल दिखाने को दायरा तो दीजिये।
महफिल में अभी तक नहीं छाया है वो सुरूर,हर शख्‍स के गिलास में सुरा तो दीजिये।
संगीत में तिलिस्‍म अब रहा नहीं भगवान,कोई तानसेन, बैजू बावरा तो दीजिये।
मैं हूँ नयी पीढ़ी का उभरता हुआ शायर,मुझको भी दावत-ए-मुशायरा तो दीजिये।
-घनश्याम मौर्य283/459,गढ़ी कनौरालखनऊ-226011

अरुणा कपूर की कहानी : मोहिनी समाई सागर में...

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मोहिनी! ....पिछ्ले महीने ही मेरे पड़ोस के मकानमेंरहने आगईहै!...नाम भले ही मोहिनी है; उसे सुंदर नहीं कहा जा सकता!... सांवलारंग, मझौला कद, चेहरे पर हर घडी तनाव कीरेखाएं खिची हुई.... उम्र कोई 50 से 55 के बीच की ही होगी!...हां! जब कभी ' वन्सइनए ब्लू मून..' मुस्कुराती है तो आकर्षक लगती है!... दन्त-पक्तियां अभीतकमन मोह लेती है!...लगता है जब मोहिनी युवाहोगी...अवश्य ही लड़कों के आकर्षण काकेन्द्ररही होगी!....अबहमारा आमना सामना तो रोज ही हो रहा है..आज मोहिनी मेरी तरफ देख करमुस्कराई और आगेबढ़ गई!...लगा अब वह शायदजान-पहचान बढ़ाना चाहती है!....लेकिन समय गुजरता गया...बातमुस्कुराहट तक ही रुकी हुईहै!छ्ह महीने हो चले है; बात जहां तक थी, वहीं तकहै...काश कि कुछ एक कदम आगे भी बढें!... मैं दिल्ली में, इसी मकान में 20 साल से रहरहीहूं!... मेरे पड़ोस वाला मकान इस बीच तीन बारबिक चुका है!... पांच-छ्ह किरायेदार भीयहां रहकर जा चुके है!... सुना है कि चौथी बार इस मकान को खरीदने वाले ' प्रमोदभगत' है... जो मोहिनी के पति है! ... 'प्रमोद भगत' की नेम प्लेट तो उनके गेट पर लगीहुई है!... उनकी पत्नी

वीरेन्‍द्र सिंह यादव का आलेख – समकालीनता : और गहन जीवन अनुभवों के क्रांतिदर्शी लेखक मोहन राकेश

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युवा साहित्‍यकार के रूप में ख्‍याति प्राप्‍त डाँ वीरेन्‍द्र सिंह यादव ने दलित विमर्श के क्षेत्र में दलित विकासवाद ' की अवधारणा को स्‍थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्‍त किया है। आपके एक हजार से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्‍ट्र्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की स्‍तरीय पत्रिकाओं में हो चुका है। दलित विमर्श, स्‍त्री विमर्श, राष्‍ट्रभाषा हिन्‍दी में अनेक पुस्‍तकों की रचना कर चुके डाँ वीरेन्‍द्र ने विश्‍व की ज्‍वलंत समस्‍या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्‍तुत किया है। राष्‍ट्रभाषा महासंघ मुम्‍बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्‍व0 श्री हरि ठाकुर स्‍मृति पुरस्‍कार, बाबा साहब डाँ0 भीमराव अम्‍बेडकर फेलोशिप सम्‍मान 2006, साहित्‍य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्‍मान 2008 सहित अनेक सम्‍मानों से उन्‍हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्‍च शिक्षा अध्‍ययन संस्‍थान राष्‍ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आार्थिक नीति एवं दलितों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।समकालीनता ः और गहन जीवन अनुभवों के क्रांतिदर्शी लेखक मोहन राकेशडॉ. वीरेन्‍…

नन्दलाल भारती का लघुकथा संग्रह एहसास - पीडीएफ़ ईबुक में मुफ़्त डाउनलोड कर पढ़ें

नन्दलाल भारती का लघुकथा संग्रह रचनाकार पर पढ़ें स्क्रिब्ड ईपेपर पर यहीँ या मुफ़्त में डाउनलोड कर या प्रिंट कर पढ़ें. डाउनलोड हेतु नीचे दिए गए डाउनलोड कड़ी का प्रयोग करें. बड़े आकार में पढ़ने के लिए फुलस्क्रीन कड़ी पर क्लिक करें.
Ehsaas Short Stories Book by Nandlal Bharti

एस. के. पाण्डेय की बाल कविता - बच्चों के लिए : जंगल में कोहराम

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(१)पशु, पक्षी आदिक एक बार ।जंगल में सब करें विचार ।।बढ़ता मानव अत्याचार । क्या होगा इसका उपचार  ?   (२)पेड़, बगीचे सारे काट ।ताल, तलैया डाले पाट ।।नदियों का कर डाला गति ।किसने मारी इनकी मति ।।   (३)गाँव-शहर से चैन न आये ।जंगल में भी घात लगाये ।।अन-जल से अब नहीं अघाए ।पकड़-पकड़ के हमको खाए ।।    (४)चूहा बोला बिल्ली बदनाम ।मानव भी खाए गुमनाम ।।बीछी, सांप भी बात बताये ।कभी सुना न आज सुनाएँ ।।मानव जिन्दा हमें चबाये ।मोर कहे जग हमें लगाये ।।   (५)मेंढ़क बोला किसे सुनाएँ ।माँस से मतलब जो पा जाये ।।कच्चा-पक्का उसे चबाये ।मानव मानव को जब खाए ।।दूर नहीं दिन सही बताएं ।ऐसा कह सबको समझाये ।।   (६)केंकड़ा बोला मुझे चबाएं ।चूजा बोला रस पी जाएँ ।।कुत्ता बोला मुझको मारें ।बिल्ली बोली किसे पुकारें ।।   (७)लोमड़ी, साही रो-रो बतलाएं ।मार, भूज के हमको  खाएं ।।हाथी बोला दांत दिखाए ।मुझे मार इसको ले जाएँ ।।चीता कहता खाल उतारें ।बचा नहीं जिसको न मारें ।।(८)जीव सकल जो जगत में जाये ।तजि मानव थे बाकी आये ।।बारी-बारी से दुःख गाए ।अपनी-अपनी दशा सुनाये ।।(९)मानव दानव सा व्यवहार ।करन लगे सब नहीं बिचार ।।कौन सुनेग…

माणिक की कविता - आदमीजात

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आदमीजातजीत जाता है हरदम वो ही, अबला हारी, हारी है, देख आईना ताज़ा ताज़ा, लिख रहा हूं सच्चा मुच्चा, फ़िर से अनुभव भारी है, बेईमानी उसकी सब जानते हैं, नकाब लगा के कई सारे, वो घूमता है आस - पास ही, बातें करता बडी बडी, मेज़ की बातें अखबार में छप जाय, गोष्ठियाँ नारीवाद लेख तक सिमटे, यही ईष्ट है और बनी चाह ये, कंगूरे की ईच्छा वाला, कितना विलग है ये आदमी, पड़ोस में अबला पीटी जाती, तब लेखक चुप रहते हैं, उसका आदर, चिंतन उसका, गायब गायब लगते हैं, हैरान करती है ये अदाकारी, आदमीजात के आदमी की, चिल्लाकर लोग लिखते हैं बस, कोई छपने को, कोई बिकने को, सम्मेलन के मण्डप नीचे, गूढ भाव से नारी चिन्तन, लेख, किताबें और पत्रिकाएं, भरी पडी है, उफ़न रही हैसबला - सबला कागज़ रंगे, पर समाज़ में, अबला, अबला है, उपर से फ़िर, जोर लगाकर लिखता, आदमीजात का आदमी, बरसों की मेहनत देखूं यूं, मोटे आखर में साफ़ लिखी है, किस्मत उसकी कुछ ऐसी हीचोका - चूल्हा, और मज़ूरी, खेती - किसानी की हिस्सेदार सी, लगती है उसे वो कभी कभी, बिना सींग की गाय सीकम इच्छाओं वाली, सादी इंसान, बीच के रास्ते वाले घरों में, प्यार की अदाकारी तक उसकी, नस…

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - वे और अकादमी

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वे एक मामूली हिन्दी अध्यापक थे। महान् बनना चाहते थे, सो अकादमी में घुस गये। वे अब महान् साहित्यकार हो गये। अकादमी भी उनको पाकर धन्य हो गई। उन्होंने कविता लिखी। कविता महान् हो गई। उन्होंने सम्पादन किया। सम्पादकी महान् हो गई। उन्होंने आयोजन किये। आयोजन कृतार्थ हो गये।
मगर मैंने महसूस किया उनके अकादमी में घुसने से एक हलचल हुई। थोड़े दिनों बाद उनके सौभाग्य और अकादमी के दुर्भाग्य से उपाध्यक्ष का निधन हो गया। उन्होने अपनी बंसी टेरी और वे अकादमी के उपाध्यक्ष हो गये। कुछ दिनों के बाद अकादमी के दुर्भाग्य और उनके सौभाग्य से अकादमी अध्यक्ष भी स्वर्ग सिधार गये, अब वे अकादमी के अध्यक्ष हो गये। जैसे उनके दिन फिरे, किसी के नहीं फिरे। अब वे महान् साहित्यकार, प्रबुद्ध अध्यक्ष, चिन्तक, विचारक, कवि सब कुछ एक साथ हो गये। वे किसी प्रकाशक की दुकान पर चढ़ जाते। प्रकाशक महान् हो जाता। वे किसी नवोदित के सिर या पीठ पर हाथ रख देते, नवोदित महान् हो जाता। उन्होने एकाध महिला को मित्र बनाया महिलाएं महान् हो गई।
उन्होंने साहित्यिक समारोह में वक्तव्य और अकादमी की रपटें पढ़ी, रपटें महान् हो गई। जो उन्होंने लिखा सो म…

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - चिकने कवर पर खुरदरे सत्य

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बाजार में जब से पुरानी साहित्यिक-सामाजिक पत्रिकाएं गायब हुई हैं । पुस्तक-पत्रिकाओं के स्टालों पर जाने का मन ही नहीं करता। कहाँ गये वे खूबसूरत धर्मयुग, सारिका, दिनमान, पराग, सण्डे मेल,सण्डे ओबजरवर, कहानी वाले दिन। इनके स्थान पर चिकने कागज पर शानदार माडलो, हिरोईनों, हीरो के नयनाभीराम, दर्शनीय कवर दिखाई देने लग गये हैं। सत्यकथाओं, हत्याओं, बलात्कारों फिल्मी कहानियों की पत्रिकाएँ छा गई हैं। इनसे यदि आप बच कर निकल भी जाये तो धर्म, अध्यात्म, बाबाओं की सचित्र पत्रिकाएँ आपको आमन्त्रण देती हैं। समाचारों की सचित्र पत्रिकाएँ समाचार कम रोपित समाचार ज्यादा देती है और अक्सर गासिप कालमों का मजा देती है। पत्रिकाओं में से साहित्य, कविता, संस्कृति का स्थान सिलाई, कढ़ाई, बुनाई साहित्य ने ले लिया है। पकवान बनाने पर पूरी पत्रिका उपलब्ध हो जाती है। कुत्तों, अन्य जानवरों, अन्य व्यवसायों पर ढेरों पत्रिकाएँ चिकनी, सुन्दर, मनमोहनी अदाओं के साथ आपका ध्यान आकर्षित करने को उद्यत है नजर हटाना आसान नहीं है श्री मान। हिन्दी और भारतीय भाषाओं की पत्रिकाओं में अब सजने संवरने, ब्यूटी पार्लर जाने की एक नई विद्या विकसित हो…

अशोक गौतम का व्यंग्य - काश! ये पेट न होता सर!!

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सच्‍ची को, नौकरी तो साली बाप की भी बुरी होती है। और ये ठहरी सरकार की जो चौथे रोज बदली होती है । सरकार की भी काहे की, उनकी। आज की डेट में सरकारी मुलाजिम जनता के नौकर नहीं, आकाओं के नौकर हैं। जनता जाए भाड़ में साहब! जनता के पास है ही क्‍या देने को? वह तो खुद दाने- दाने को मोहताज है। अब तो बस उनके जो भी आदेश, सिर माथे। टके- टके के आगे सिर झुकाना पड़ता है। शुरू शुरू में बुरा लगा। अब आदत हो गई है। स्‍कूल में कभी ये आ रहा है तो कभी तो वो। अपना तो हे खुदा ,मरना भी उनके हाथ है तो जीना भी । अबके उनको पता नहीं क्‍या सूझी कि उन्‍होंने अपने विभाग से आदेश जारी करवा दिए कि सरकार चाहती है कि हर शहर के बालिग, नाबालिग कुत्‍तों का पंजीकरण किया जाए ताकि सरकार को पता चले सके कि देश में कितने कुत्‍ते अवैध रूप से रह रहे हैं।मैं ठहरा घैंठ स्‍कूल मास्‍टर! सच कहूं! मैं सरकार के सारे काम करता हूं पर बच्‍चों को पढ़ता नहीं। पढ़ाऊं तो तब जो मौका मिले। जनगणना हो तो मास्‍टर जी सबसे आगे। चुनाव हो तो मास्‍टर जी के बगैर मजाल जो चुनाव पूरे हो जाएं। वोटर लिस्‍ट बननी हो तो चलो मास्‍टर जी। वे आने हों तो लाओ मास्‍टर जी बच्…

आर. के. भारद्वाज की कहानी – सः मम प्रिय

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वयोवृद्ध चुनाव आयोग ने चुनावी शंखनाद किया, शंखनाद के उपरान्‍त विभिन्‍न राजनैतिक दलों ने भी अपनी अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार शंखनाद किया, कुछ कमल लेकर, कुछ साइकल पर, कुछ हाथ का पंजा, कुछ लालटेन, कुछ हाथी पर, कुछ दराँती हसिया आदि विभिन्‍न अस्‍त्र शस्‍त्र (चुनाव चिन्‍ह) लेकर चुनावी दंगल में शंखनाद करने लगें, मतदाता को अपनी अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार रिझाने लगे, मतदाताओं को अपनी अपनी ओर आकर्षित करने के लिये तथा अपनी सेना में बुलाने के लिये विभिन्‍न प्रलोभन दिये जाने लगें, मतदाता किंकर्तव्‍यविमूढ़ थे...................दृष्‍टवेंम स्‍वजंन कृष्‍ण युयुत्‍सुं समुपस्‍थित ।सीदन्‍ति मम गात्राणी मुखं च परिशुष्‍यति ॥विभिन्‍न मतदाताओं के मुख सूख चुके थे, उनकी कई समस्‍याओं और शंकाओं का समाधान तो हो चुका था, क्‍योंकि पिछले कई चुनावी महायुद्धों में वह विभिन्‍न राजनैतिक दलों को वीरगति प्राप्‍त होते देख चुके थे, लेकिन कुछ प्रश्‍नों के उत्‍तर अभी भी अनुत्‍तरित थे, ऐसे में मतदाता भ्रमित दशा में था, उसने अपने प्रश्‍नों का उत्‍तर पाने के लिये अपने प्रभु नेताजी को ही अपना दिग्‍दर्शक समझा और नेताजी के पास जाकर बोलाः…

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तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

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