सोमवार, 31 मई 2010

यशवन्त कोठारी का आलेख : आदिवासी असंतोष : कारण-निवारण

आदिवासी-चार अक्षरों का एक छोटा सा नाम, लेकिन सामाजिक व्यवहार के रूप में अनेक समुदाय, जातियां और किस्मों में बंटा संसार और इस संसार की अपन...

विजय वर्मा की कविता : तत्वमसि

तत्वमसि                     तत्वमसि! तत्वमसि! तत्वमसि! दूर गगन में फटती पौ-सी दीपक की एक मद्धिम लौ-सी किसी योगी के अपने ही रौ-सी ...

रविवार, 30 मई 2010

दामोदर लाल जांगिड़ की हास्य-व्यंग्य ग़ज़ल

  रुतबा भी सरकारी अजीमों शान सरकारी । मेरा कुछ भी नहीं छोड़कर पहचान सरकारी॥ बहुत बौना हूँ मैं अब भी यदि तुलना करुं तुमसे, बढ़ा पा...

शनिवार, 29 मई 2010

चंद चुनिंदा शेरो – शायरी

  अब भी कुछ नहीं बिगड़ा प्यारे पता करो लोहारों का धार गिराना काम नहीं है लोहे पर सोनारों का - नीरज कुमार ------. अपने मंसूबों को ...

श्याम गुप्त की पुस्तक समीक्षा : अमेरिकी प्रवासी भारतीय:हिदी प्रतिभाएं

पुस्तक- समीक्षा पुस्तक- -अमेरिकी प्रवासी भारतीय : हिन्दी प्रतिभाएं ( प्रथम व द्वितीय भाग ),  लेखिका -डा ऊषा गुप्ता , प्रकाशक -न्यू रायल...

शुक्रवार, 28 मई 2010

संस्कृता मिश्रा की कविता : घूंघट के पीछे

चार हाथ घूँघट के, पीछे, कैसा है तेरा संसार जो तुमने इसमें छुपकर, लाखों जीवन दिए गुज़ार.. वो नभ का सुथरा नीलापन, मैला सा लगता होगा वो...

विजय कुमार वर्मा की हास्य व्यंग्य कविताएँ : ३ x साढ़े तीन

हास्य कविता [१] दो करोड़ घूस  लेते धराये एम सी आई अध्यक्ष, पैसा लेकर मान्यता  प्रदान करने का था लक्ष्य गुणवत्ता  अब गौण हो गयी,म...

मुकुल ‘सरल’ की ग़ज़लें - मैं हूं कि मैं कि तू है, तू है कि तू ही तू - छूकर तुझे तस्दीक मैं करता हूं कि मैं हूं

***ग़ज़लें*** (1) करें क्या शिकायत अँधेरा नहीं है अजब रौशन है कि दिखता नहीं है ये क्यों तुमने अपनी मशालें बुझा दीं ये धोखा है ...

अशोक गौतम का व्यंग्य : श्री संतन की सेवा

वैसे पूछें तो सभी के पास होती हैं। क्‍या जानवर, क्‍या आदमी। क्‍या उच्‍च वर्ग, क्‍या मध्‍यम वर्ग। पर जो जानवरों से अपने को जरा सभ्‍य मानते...

गुरुवार, 27 मई 2010

यशवंत कोठारी का आलेख : बच्चों की छुट्टियों का सदुपयोग करें

शीध्र ही बच्चों की गर्मी की छुट्टियां शुरू होने वाली हैं। इन लम्बी छुट्टियों में मध्यम वर्गीय परिवार के लोग न तो लम्बे समय के लिए पर्यटन ...

यशवंत कोठारी का आलेख : कैसा हो बच्चों का साहित्य

पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी व भारतीय भाषाओं में प्रचुर मात्रा में बाल साहित्य का प्रकाशन हुआ है। अंग्रेजी के साहित्य से तुलना करने पर हिन...

आर के भारद्वाज की कहानी : केयर टेकर

  प्रातः कालीन भ्रमण मेरा शौक है, सुबह की हवाखोरी से मुझे दिन भर ताजगी, स्‍फूर्ति मिल जाती है, सुबह के दौरान मैं कई अपने जैसे लोगों को भी ...

रवींद्र नाथ टैगोर 150 वीं जयंती वर्ष पर यशवंत कोठारी की विशेष प्रस्तुति

मैं अपने परिवेश के प्रति बहुत ही सतर्क रहता हूं ! -रवीन्द्रनाथ टेगौर - - तथा श्रीमती सत्यवती देवी ने रवींद्रनाथ ठाकुर से उनकी रचना प...

बुधवार, 26 मई 2010

रचनाकार के नित्य के नियमित पाठकों की संख्या प्रतिदिन 2000 से ऊपर पहुँची

हिन्दी साहित्य को समर्पित ब्लॉग के लिए यह आंकड़ा मायने रखता है. जहाँ हिन्दी की किताबें अधिकतम 250 – 500 की संख्या में छप रही हों, हिन्दी पाठ...

संस्कृता मिश्रा की कविताएँ

समय के पदचिह्न ये पदचिह्न समय के आरंभ यही है अंत यही,और बीच का सफ़र यही हर एक बीतती घटना का, कर्ता ये आधार यही इनकी चलती...

हास-परिहास – 30 साल पहले और आज

~~~~~~~~~~~ 30 साल पहले - स्कूल बैग. आज - ऑफ़िस बैग. 30 साल पहले - नोटबुक आज - नेटबुक 30 साल पहले - हीरो रेंजर आज - हीरो ...

मंगलवार, 25 मई 2010

हरीश चंदर : झुग्गी नं. 208 से निकला आईएएस

  दिल्ली की झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले दिहाड़ी मजदूर के बेटे हरीश चंदर ने पहले प्रयास में तय ...

एस. के. पाण्डेय की बाल कविता – दो गीध

बच्चों  के लिए :      दो गीध (१) जटायु सम्पाती नामके   दो भाई गीध थे रहते । सूरज के वो पास जा पहुँचे     एक दिन उड़ते-उ...

सोमवार, 24 मई 2010

सुरेंद्र सिंघल की ग़ज़लें

ग़ज़ल    (1) ख़ुदा गर मैं ख़ुदा होता ख़ुदा गर मैं ख़ुदा होता न आदम से ख़फ़ा होता वो जो भी चाहता, खाता ये उसका फ़ैसला होता वो ...

सुकरात मृदुल की कविता – मैं रावण हूँ…

मैं रावण हूँ मैं रावण हूँ मैं इसमें हूँ मैं उसमें हूँ मैं हर बुरे जिस्म में हूँ मैं रावण हूँ मैं रावण हूँ अब रावण नहीं राम मरेगा ...

रविवार, 23 मई 2010

श्याम गुप्त की ग़ज़ल की ग़ज़ल

              शेर मतले का न हो तो कुंवारी ग़ज़ल होती है | हो काफिया ही जो नहीं,बेचारी ग़ज़ल होती है। और भी मतले हों, हुश्ने तारी ग़ज़...

बंशीधर मिश्र का आलेख : ज्ञान पर पाखंड भारी

भाषा भी क्या चीज है। आदमी को जानवर से इन्सान बना देती है। जब मनुष्य को बोलना नहीं आता था तो वह संकेतों से संवाद कर लेता था। उसके आंसू बता...

शुक्रवार, 21 मई 2010

सुभाष राय का आलेख : वक्त की आवाज हैं शब्द

साहित्य-चिंतन --------------- वक्त की आवाज हैं शब्द डा. सुभाष राय  अगर आप किसी पत्रकार, लेखक या  साहित्यकार से पूछें कि वह  आखिर ...

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