रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

June 2010
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोक लोककथा लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

(पिछले भाग 6 से जारी…)

Janpriya lekhak omprakash sharma - जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा

 

क के बाद एक बुलावा।

क्‍या हो गया है राधा को-कहीं बावली तो नहीं हो गयी। कुंवरसाहब ने हंस कर कहा-‘हां हां बाबा, आउंगा।'

-‘जी बाई जी ने कहा है सात बजे से पहले ही ।'

हंसते हुए कुंवरसाहब ने एक कागज पर लिखा-‘मैं कवि सूरज प्रकाश जिसे लोग गलती से कुंवरसाहब कहते हैं, ठीक पौने सात बजे राधा देवी के यहां पंहुचने का वादा करता हूं। रसीद लिख दी है ताकि वक्‍त जरुरत काम आए।'

यूं एक पल भी सोना को छोड़ना अच्‍छा नहीं लगता था, परन्‍तु आज सोना से बाकायदा इजाजत लेकर पौने सात बजे से भी कुछ मिनिट पहले कुंवरसाहब जब राधा के कोठे पर पंहुचे तो राधा को कोठे से नीचे प्रतीक्षा में खड़े पाया।

-‘नमस्‍ते हुजूर . ... .उतरियेगा नहीं। जरा चलना है।'

-‘कहां चलना है?'

-‘शहर में ही, ज्‍यादा दूर नहीं। बस क्‍लब तक।'

-‘क्‍लब किसलिये ?'

कार का दरवाजा खोलकर कुंवरसाहब के निकट बैठते हुए राधा बोली-‘यह वहीं पंहुचकर बताउंगी।'

क्‍लब के द्वार पर कुंवरसाहब और भी चमत्‍कृत हुए। लाॅन में शामियाना लगा था। शामियाने के निकट ही खूबसूरत मचान बना था, मचान पर अनवर शहनाई नवाज अपने साथियों सहित मंगल संगीत गुंजा रहा था।

कुंवरसाहब ने राधा से पूछा-‘किसी की शादी है क्‍या?'

-‘नहीं हुजूर . ... .कार अन्‍दर ले चलो न भौंपू जी।'

ओह राधा . ... .।

कार से उतरकर जब कुंवरसाहब शामियाने में प्रविष्‍ट हुए और गुप्‍ता जी, डाक्‍टर माथुर तथा उनके अनेकों स्‍थानीय मित्रों ने यथा योग्‍य उपहारों और फूल मालाओं से लादकर जन्‍म दिन की बधाई दी तो कुंवरसाहब को सचमुच याद आ गया कि आज उनकी वर्षगांठ है। सदा ही वर्षगांठ पर हवेली में छोटा मोटा आयोजन होता था। परन्‍तु यह काम था रानी मां का, अब की बार अपनी बीमारी के कारण रानी मां को शायद याद नहीं रहा। कौन याद रखता-राधा को याद रहा। आश्‍चर्य !

डाक्‍टर माथुर ने कहा। धीमे से, कोई और न सुन पावे ऐसे-‘कुंवरसाहब, कभी विश्‍वास नहीं हुआ। परन्‍तु सुना था कि कोई ऐसा भी पत्‍थर होता है जिसके छूने से प्रत्‍येक धातु सोना हो जाती है। क्‍या बना दिया है तुमने राधा को, हस्‍पताल आई और कहने लगी कुंवरसाहब की वर्षगांठ मना रही हूं, कोठे पर आना आप पसन्‍द नहीं करेंगे, इसलिये क्‍लब में आइयेगा। सात बजे . ... .तब तक नहीं टली जब तक कि मुझ से हां न करा ली।'

गुप्‍ता जी ने थोड़ी देर बाद कहा-‘मैं ठहरा दुनियादार बनिया, परन्‍तु मानना ही होगा कि राधा बहुत शुभचिन्‍तक स्‍त्री है।'

यह कुंवरसाहब के अतिरिक्‍त किसी ने नोट नहीं किया था कि लोगों ने जब आते ही कुंवरसाहब को फूल मालाओं से लादा था, तब राधा चुपचाप कुछ फूल उनके जूतों पर रखकर व्‍यवस्‍था देखने चली गई थी।

अधिक व्‍यक्‍ति नहीं थे, कठिनता से कुल थे बीस। परन्‍तु अतिथियों के लिये राधा ने नगर के सबसे बढ़िया होटल मैनेजर से व्‍यवस्‍था कराई थी।

जब जाम उठाकर कुंवरसाहब के दीर्घायु होने की कामना की गई तो राधा भी कुछ क्षण के लिये सम्‍मुख आई। परन्‍तु वैसे वह व्‍यस्‍त थी, उसी के द्वारा तो यह आयोजन आयोजित था। देख भाल उसके जिम्‍मे थी, यहां भी वहां भी।

इस बीच कुंवरसाहब ने उसे टोका भी नहीं।

सात बजे आरम्‍भ होकर साढ़े आठ बजे कार्यक्रम समाप्‍त हो गया।

तब जबकि सभी जा चुके थे।

कुंवरसाहब ने कहा-‘अब चलो न?'

-‘कहां?'

-‘अपने घर नहीं जाओगी?'

-‘आपको विदा किये बिना कैसे जाउंगी?'

-‘मुझे साथ नहीं ले चलोगी?'

उस शामियाने में इस समय वह थी और कुंवरसाहब थे। कुंवरसाहब की बांह थाम कर वह तनिक झुकी। उसका माथा कुंवरसाहब की बांह से छू गया।

-‘हुजूर जन्‍मदिन मुबारक हो, अगर हुक्‍म हो, अगर जानबख्‍शी हो तो कुछ अर्ज करुं?'

कुंवरसाहब मुस्‍कराये-‘इतने तकल्‍लुफ के साथ कुछ कहोगी?'

-‘न न, तकल्‍लुफ कैसा। कुछ बातें गुप्‍ता जी से की, कुछ डाक्‍टर साहब से। पता लगा कि आजकल रानी मां बीमार हैं, उनके कारण आप घर से कम निकलते हैं, लेकिन खुशी की बात यह है कि खूब लिख रहे हैं, खुश रहते हैं। कुंवरसाहब आप मुझ से दूर रहें तो कभी शिकायत न होगी। लेकिन खुश रहें-सेहत का ख्‍याल रखें। यूं यह मेरे मन की कमजोरी है कि कभी कभी आप के लिये तड़प उठती हूं। फिर भी जब तक रानी मां ठीक न हो जायेंगी तब तक आप को घर से बाहर ज्‍यादा न ही देखना चाहूंगी।'

कुंवरसाहब के मन में आया कि राधा को सोना के बारे में बता दें।

वह बताना भी चाहते थे लेकिन राधा ने ऐसा अवसर ही नहीं दिया। वह बढ़ी और एक पैग अपने हाथों से बनाकर उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा-‘हुजूर की लम्‍बी उम्र हो। आइये आपको कार तक छोड़ आउं।'

-‘हम चाहते थे थोड़ी देर तुमसे बातें करें।'

-‘फिर किसी दिन, मैंने डाक्‍टर माथुर से वायदा किया था कि नौ से पहले आपको घर पंहुचा दूंगी।'

-‘हुक्‍म है तो चला जाता हूं।'

कार के निकट पहुंचकर कुंवरसाहब ने दूसरी बात उठाई-‘कितना खर्च कर दिया आज?'

परन्‍तु राधा ने कुंवरसाहब का जेब की ओर जाता हाथ रोक दिया।

-‘हुजूर . ... .।'

-‘क्‍या बात है?'

-‘आपने सदा दिया है, वक्‍त होगा तो हाथ पसारकर जितना धन चाहूंगी, मांगूगी भी। लेकिन आज नहीं . ... .।'

-‘क्‍यों?'

वह मुस्‍कराई-‘सभी भक्‍त जानते हैं कि भगवान के पास किसी वस्‍तु की कमी तो होती नहीं, फिर भी पूजा अर्चना की सामग्री कोई भक्‍त क्‍या भगवान से मांगता है?'

-‘यह पागलपन है।'

-‘मेरी खुशी के लिये सह लीजिये न मेरा जरा सा पागलपन।'

-‘अच्‍छा . ... .।' कुंवरसाहब ने राधा के दोनों गालों को हाथों से थपथपा दिया।

सचमुच राधा ने खुशी खुशी उन्‍हें विदा कर दिया।

उस रात . ... .।

उस रात मन में एक सुखद संघर्ष रहा।

राधा और सोना . ... .सोना और राधा।

एक नये गीत की रचना हुई।

नींद में मोहक स्‍वप्‍न देखे।

सोना और राधा।

मालविका बिल्‍कुल याद नहीं आई।

बस सोना और राधा।

0000

अचानक और अनायास ही आज कुंवरसाहब के यहां भारत के प्रसिद्ध कवि अतिथि हुए। वीरेन्‍द्र मिश्र, राजेश दीक्षित और सोम ठाकुर मेरठ के एक कवि सम्‍मेलन में जा रहे थे और अन्‍तिम बस निकल जाने के कारण रात भर के लिए कुंवरसाहब के अतिथि हुए। भारत भूषण और कृष्‍ण सरोज कानपुर से मेरठ लौट रहे थे, गाड़ी लेट हो जाने के कारण सब लाइन की गाड़ी न मिल सकी। संयोग से यह प्रतिभाएं एकत्रित हुईं। और गोष्‍ठी जम गई।

सोम ठाकुर और राजेश दीक्षित ने इस छोटी सी गोष्‍ठी में राष्‍ट्‌ीय कविताएं सुनाईं। वीरेन्‍द्र मिश्र ने ‘वेस्‍ट पटेल नगर सवेरों से दूर', भारत भूषण ने ‘धन्‍यवाद गलिओं चौराहों' शीर्षक से कविताएं सुनाई। अपने रंग से अलग वीरेन्‍द्र मिश्र की कविता में दिल्‍ली के यातायात की दुर्दशा थी और भारत भूषण की कविता में खुशियों का आवरण ओढ़े निराशा थी।

मेजबान कुंवरसाहब ने अपना नम्‍बर आखिर में लिया।

-‘एक गीत सुना रहा हूं।' कुंवरसाहब बोले।

-‘ईश्वर को धन्‍यवाद।' भारत भूषण ने कहा-‘चर्चा तो यह थी कि कुंवरसाहब ने नए गीत लिखना और कवि सम्‍मेलनों मे आना छोड़ दिया है।'

-‘जी आपका हुक्‍म हो तो ऐसा भी कर सकता हूं।'

-‘वाह, मैं ऐसा क्‍यों चाहूंगा। कुंवरसाहब के मंच पर न होने से रौनक नहीं होती, भगवान कसम . ... .।'

-‘गीत सुना रहा हूं . ... .।'

-‘दरवाजे पर एक चिर परिचित सी आहट हुई।

कुंवरसाहब पहचान गए। निश्‍चय ही सोना दरवाजे से लगी खड़ी थी।

कुंवरसाहब ने गीत आरम्‍भ किया।

उनके गले के सभी कायल थे। संगीत की जानकारी स्‍वर को जैसे अलंकृत कर देती है।

गीत सुनो प्‍यार के,

पतझर बहार के,

एक दिल की जीत के,

एक दिल की हार के।

-‘वाह गुरु।' दीक्षित बोले-‘कवि सम्‍मेलन लूट लें ऐसे बोल है।'

-‘बात तो तब है जब मित्र लुटें . ... .।' कुंवरसाहब ने गीत जारी रखा

अधरों के संगम में,

सरगम सुहावने,

अंगड़ाई ले लेकर-

अभिनय लुभावने,

यमुना के तीर के,

गंगा के पार के,

गीत सुनो प्‍यार के !

कृष्‍ण सरोज ने दाद दी-‘खूब गजब ढाया है कुंवरसाहब ।'

गीत जारी था-

आँसू की धार में,

यौवन का जूझना !

पावस में पी को ,

पपीहे से बूझना !

बिरहा के नयनों में,

सपने सिंगार के !

गीत सुना प्‍यार के !

गीत सहज था।

परन्‍तु जैसे छोटे शब्‍दों ने माधुर्य का बड़ा बांध रचा था।

-‘अन्‍तिम है . ... .।' कुंवरसाहब ने कहा

एक रात ढल गई,

जुल्‍फों की छांव में ,

एक रात जल गई,

यादों के गांव में ।

पायल की रुनझुन के,

दिल की पुकार के,

गीत सुनो प्‍यार के।

-‘वाह भई। मान गए। श्रोताओं के हिसाब से हिट गीत है। नौटंकी वाली भी गायें तो श्रोता झूमें।' भारत भूषण बोले।

-‘आपको कोई एतराज है?'

-‘जबरदस्‍त एतराज है। आप तो कुंवरसाहब हैं, हाथी हैं, दुबले हो सकते हैं लेकिन भैंस नहीं। अगर कवि सम्‍मेलनों में पंहुचकर ऐसे हिट गीत मारने लगे तो उन गरीबों का क्‍या होगा जो कुंवरसाहब नहीं हैं।'

इस बात पर कवि मन्‍डली में खूब ठहाका लगा।

खूब लतीफे और कहकहे चले।

कुंवरसाहब जब अपने कमरे में पंहुचे तो रात के बारह बज चुके थे। खाना भी उन्‍होंने कवि मित्रों के साथ ही खाया था।

कमरे में सोना प्रतीक्षा कर रही थी।

-‘आज सुना।' वह बोली।

-‘क्‍या?'

-‘गीत।'

-‘कैसा लगा?'

-‘बहुत अच्‍छा लगा।'

-‘सच?'

-‘बहुत समझ में नहीं आया फिर भी बहुत अच्‍छा लगा।'

-‘झूंठ।' बनते हुए कुंवरसाहब ने मुंह बनाया।

-‘हाय राम, मेरी बात का यकीन नहीं?'

-‘नहीं।'

जैसे अधिकार हो। जैसे बीच में कोई बन्‍धन न हो। सोना ने कुंवरसाहब के गले में बांहें डाल दीं।

-‘यकीन क्‍यों नहीं?'

-‘अब कुछ यकीन हुआ।'

-‘क्‍या?'

-‘ओह तुम नहीं समझोगी मेरी सोना . ... .नहीं समझोगी।'

आज कुंवरसाहब की गोद में सोना ने नई बात कही।

-‘कुंवर जी?'

-‘हां सोना जी।'

-‘हमें पढ़ा दो।'

-‘पढ़ोगी?'

-‘बहुत पढ़ना चाहती हूं।'

-‘पढ़ाउंगा।'

-‘फिर ।'

-‘फिर क्‍या?'

-‘बड़े आदमी देखेंगे न . ... .सबके सामने तब आउंगी जब खूब पढ़ लूंगी।'

-‘अच्‍छा।'

-‘लोग कहेंगे कि कुंवरसाहब की रखेल यूं ही नहीं है ।'

-‘सोना . ... .।' चौंक कर कुंवरसाहब ने सोना के होंठों पर हाथ रख दिया।

चकित रह गई सोना।

व्‍यथा में डूबे से कुंवरसाहब बोले-‘सोना, रखेल अच्‍छा शब्‍द नहीं है। तुम मेरी रखेल नहीं हो। तुम क्‍या जानो काश तुम जान सकतीं तुम मेरी जिन्‍दगी हो सोना। मेरी जिन्‍दगी।'

0000

वह दिन आ गये जब सोना को अग्‍नि की साक्षी में पराई होना था।

रानी मां एक क्षण के लिये भी नहीं भूली थीं कि वह गरीब बिरादरी की लड़की का विवाह कर रही हैं। बड़े छोटे का भेद वह तोड़ना नहीं चाहती थी। इसलिये वधू गृह हवेली नहीं बनी थी बल्‍कि एक मन्‍दिर में विवाह का आयोजन किया गया था।

भौंपू तथा घर के और नौकर चाकर आदि विवाह में लगे थे। मन्‍दिर हवेली से अधिक दूर नहीं था। रानी मां के लिये उठकर जाना सम्‍भव नहीं था कन्‍यादान आदि की रस्‍म गांव के और बड़े बूढ़े कर रहे थे। प्रातः से ही सोना मन्‍दिर में चली गई थी। रानी मां की सेवा के लिए केवल एक नौकरानी थी। सोना के बिना घर सूना था। कुंवरसाहब का मन सूना था।

सांझ हुये बारात आई। प्रजाजन ठहरा, दूल्‍हा बारातियों के साथ कुंवरसाहब और रानी मां के पैर छूने आया। बारात में आये घोड़े का नाच करने वालों ने हवेली के आगे खूब धूम मचा कर इनाम प्राप्‍त किया।

तब जबकि सोना अग्‍नि साक्षी में किसी दूसरे को सौंपी जा रही थी कुंवरसाहब अपने कमरे में अकेले शराब पी रहे थे।

रात में लगभग बारह बजे कुंवरसाहब ने भौंपू को बुलवाया।

-‘आपने याद किया सरकार।'

-‘भौंपू सोना का विवाह हो गया?'

-‘जी !'

-‘यहां आ सकती है?'

-‘जी क्‍यों नहीं।'

-‘जरा बुला लाओ।'

लगभग आधे घण्‍टे बाद भौंपू लौटा। बुझे स्‍वर में बोला-‘सरकार आराम करें।'

-‘सोना कहां है?'

-‘सोना कमीनी है सरकार।'

-‘क्‍या बकते हो?'

-‘सरकार उसमें ठाकुर का खून नहीं है। मैंने कहा तो जानते हैं उसने क्‍या कहा-उसने कहा . ... .कुंवरसाहब को अगर मेरी इज्‍जत का ख्‍याल नहीं है तो अपनी इज्‍जत का ख्‍याल करें।'

अनजाने ही एक सर्द आह निकली-‘भौंपू शायद सोना ठीक कहती है जाओ।'

-‘हुजूर खाना ।'

-‘भूख नहीं है जाओ।'

किसे दिल चीरकर दिखाएं। आज सीमा टूट गई थी। वह पीते रहे और पीते रहे।

रात के तीन बज गये। कुंवरसाहब ने बोतल खाली कर दी। आसपास देखा पानी नहीं था। उन्‍होंने उठना चाहा। उठे लड़खड़ाये। फिर गिर पड़े। इतना देखा कि उन्‍हें खून की उल्‍टी हुई। एक बार पुकारा-‘भौंपू !'

इसके बाद कुछ क्षण के लिए चेतना लौटी तो भोर हो चुकी थी। आंखें खोली तो डाक्‍टर माथुर पास बैठे थे। रानी मां भी थीं और एक ओर सिमटी सी सोना भी खड़ी थी। माथुर झुंझला कर रानी मां से कह रहे थे-‘साफ बात कहते हुए मुझे दुख है रानी मां। अगर कुंवरसाहब इसी तरह बेकाबू शराब पीते रहे तो किसी दिन . ... .किसी भी दिन . ... .इतनी कम उम्र में यह लो ब्‍लड प्रेशर का रोग लगा बैठे हैं ।'

कोई देख न सका कोई जान ने सका। क्षण मात्र के लिए कुंवरसाहब ने आंखें खोली और फिर मूंद ली।

एक लम्‍बा अंतराल।

वह सारा दिन बीता। सोना विदा होकर अपनी ससुराल पंहुच गई। सोना का पति हीरा पहले किसी दूसरे का तांगा चलाता था, रानी मां ने एक घोड़ा तांगा दहेज में दिया।

वह सांझ बीती।

ससुराल में सोना की मुंह दिखाई हो रही थी।

वह रात ! शायद सोना सुहागरात मना रही थी।

कुंवरसाहब की बेहोशी टूटी।

डाक्‍टर माथुर अब भी मौजूद थे। भौंपू तथा अन्‍य नौकर चाकर कमरे में उपस्‍थित थे। एक कौने में कुर्सी डाले गुप्‍ता जी भी बैठे थे। रानी मां आराम कुर्सी पर पड़ी कराह रही थी।

-‘पानी ।'

डाक्‍टर माथुर ने चम्‍मच से मुंह में पानी डाला।

-‘धन्‍यवाद डाक्‍टर। अब मैं ठीक हूं।'

-‘जाहिर है अब आप ठीक हैं, लेकिन सरकार आपने मेरी जान ले ली।' माथुर बोले।

-‘बिल्‍कुल यही बात मुझसे किसी ने सपने में भी कही। हुजूर गुप्‍ता जी भी हैं न . ... .भई शायद मेज की दराज में चाबी पड़ी होगी। सेफ खोल कर एक हजार रुपए डाक्‍टर माथुर को दे दो . ... .।'

दोस्‍तों का यह लहजा डाक्‍टर माथुर को पसन्‍द नहीं आया।

-‘कुंवरसाहब . ... .।'

-‘मैं मजबूर हूं डाक्‍टर साहब। सपने में मुझसे शायद श्‍ौतान ने कहा है कि अगर डाक्‍टर माथुर से मुफत इलाज कराया तो दोजख की थर्ड क्‍लास मिलेगी। न लेंगे तो मुझे तकलीफ होगी डाक्‍टर।'

तकलीफ की बात कुछ ऐसी मार्मिक थी कि गुप्‍ता जी ने उठकर सेफ में से रुपये निकाल दिये और डाक्‍टर ने इच्‍छा न होते हुए भी ले लिए।

रानी मां बड़ी कठिनता से उठकर पलंग पर आ बैठी थी और बेटे का माथा सहला रही थी।

-‘कैसा जी है कुंवर जी।'

-‘अच्‍छा हूं रानी मां।'

-‘बेटा कुंवर जी। तुम्‍हारे सिवा मेरा कोई नहीं है। माथुर भैया कह रहे हैं शराब तुम्‍हारे लिये जहर है।'

-‘नहीं पीयूंगा मां जी।'

-‘जुग जुग जीयो बेटा। दूध पीयोगे मेरे हाथ से ।'

-‘क्‍यों न पीयूंगा?'

रानी मां ने कुछ चम्‍मच दूध कुंवरसाहब के मुंह में डाला।

इस दौर में डाक्‍टर माथुर ने रक्‍तचाप देखा। सन्‍तोष हुआ।

डाक्‍टर की ओर देखकर रानी मां ने कहा-‘कहूं कुंवर जी से?'

-‘हां।' डाक्‍टर माथुर तनिक मुस्‍कराये।

-‘क्‍या बात है मां जी?'

-‘कुछ खास बात नहीं बेटा। माथुर बेटा कहते हैं कि रात में तुम्‍हारी देखभाल के लिये एक नर्स रहनी चाहिए। लेकिन . ... .वह राधा है न ?'

कुंवरसाहब चौंके।

-‘सुना तो कई बार था परन्‍तु आज देखा।'

-‘रानी मां . ... .।' कराह उठे कुंवरसाहब।

-‘देखने में मुझे ऐसी नहीं लगी जैसी पतुरिया होती हैं। जाने कैसे उसे तुम्‍हारे बीमार होने की खबर लग गई। तुम्‍हें होश नहीं था बेटा। बेचारी दोपहर में आ गई। कोई बोलचाल के लिए भी तो नहीं था। मूर्ति सी बैठी रही।'

-‘उसकी बात छोड़ो रानी मां।'

-‘परन्‍तु कुंवर बेटा वह तो सत्‍याग्रह किये बैठी है दोपहर से यहां, पानी भी नहीं पिया। बहुत कहा क्‍या यहां आराम करने को जगह नहीं है। बस बुत बनी बैठी है।'

-‘कहंा?'

-‘कमरे के बाहर ही तो बैठी है। क्‍या उससे तुम्‍हारी कोई लड़ाई है बेटा?'

-‘नहीं तो मां।'

-‘मैं भी यही कहती थी। गुप्‍ता जी ने भी यही कहा। परन्‍तु माथुर बेटा कहते थे कि जरुर लड़ाई है। उसी के कारण तुमने इतनी शराब पी ऐसी बात तो नहीं है न बेटा?'

-‘नहीं मां।'

-‘मैं उसे अन्‍दर बुला लूं?'

-‘बुला लो।'

-‘वह अच्‍छी है न बेटा?'

-‘सभी अच्‍छे हैं मां। आपा ही बुरा होता है।'

-‘गुप्‍ता जी कहते हैं वह तुम्‍हारी नर्स से अच्‍छी देखभाल करेगी।'

कुंवरसाहब मुस्‍कराये-‘गुप्‍ता जी और क्‍या कहते हैं रानी मां।'

-‘गुप्‍ता जी हमारा भला ही तो चाहते हैं बेटा . ... .गुप्‍ता जी बुला लो न उस लड़की को।'

गुप्‍ता जी ने दरवाजा खोला-‘आओ राधा।'

राधा ने कमरे में प्रवेश किया। आंखें सूजी हुई, बाल बिखरे से, नर्तकी नहीं जैसे कोई जोगन हो।

-‘अच्‍छे हैं कुंवरसाहब?' निकट पंहुचकर वह बोली।

-‘हां। तुम सबकी शुभकामनायें मेरे साथ जो है।'

रानी मां राधा का सहारा लेकर उठी।

-‘बेटी . ... .।'

-‘हां रानी जी।'

-‘मैं तो जीते जी मर गई बेटी। अंग अंग जैसे टूट गया है। मुझे सहारा देकर कमरे में पंहुचा दे बिटिया। देख . ... .यहां डाक्‍टर हैं, गुप्‍ता जी हैं। इनके सामने कहती हूं। मेरा बेटा बहुत दुखी है, तू मेरा सब कुछ ले ले बेटी। मेरे बेटे को सुखी कर दे। मैं इन पंचों के सामने अपना बेटा तुझे सौंपती हूंू।'

-‘मैं तो दासी हूं रानी जी आपकी भी और कुंवरसाहब की भी।'

-‘रानी मां अपने कमरे में जा रही थीं। अकेली राधा से वह सम्‍भल भी न पातीं। दोनों नौकरानियों ने उन्‍हें थाम लिया।

राधा साथ-साथ थी।

-‘न रहने दे बिटिया। तू इसी कमरे में रह। मेरे कुंवर की देखभाल कर। मैंने तुझे अपना लाल सौंपा है।'

0000

किसी ने देखा नहीं, सुना और पढ़ा ही है कि एक बार मुगल युग में हुमायूं बीमार हुआ। वह क्षण क्षण मृत्‍यु के निकट पंहुच रहा था, तब उसके पिता बाबर ने खुदा से सच्‍चे दिल से प्रार्थना की कि हे परमपिता तू मेरे पुत्र को जीवन दे दे। ऐसा ही हुआ भी। उस क्षण के बाद हुमायूं ठीक होता गया और बाबर मृत्‍यु की मंजिल पर बढ़ चला।

कुछ ऐसी ही प्रार्थना रानी मां ने भी की थी। दोनों नौकरानियों ने सुना। अब जबकि वह रानी मां को बिस्‍तरे पर लिटा रही थीं। रानी मां कह रही थीं -‘मेरे कृष्‍ण कन्‍हैया जी, मुझे उठा लो ! मेरी उम्र कुंवर जी को दे दो। मैंने बहुत कुछ देख लिया उन्‍होंने कुछ नहीं देखा . ... .मेरी विनती सुन ले बांसुरी वाले . ... .।'

और . ... .!

जैसे बांसुरी वाले ने विनती सुन ली।

प्रातः चार बजे रानी मां को खून की उल्‍टी हुई।

डाक्‍टर माथुर आए। प्रातः वह रानी मां को जिला हस्‍पताल ले गये। तुरन्‍त एक्‍सरे हुआ। कई अन्‍य डाक्‍टरों ने देखा। सिविल सर्जन ने भी देखा।

कुछ नहीं हो सकता था। कुछ नहीं किया जा सकता था।

गठिया रोग की पीड़ा दूर करने के लिये जो दवायें रानी मां को दी जा रही थीं उन्‍होंने फेफड़ों को गला दिया था। रानी मां की दशा देखकर आश्‍चर्य किसी को नहीं हुआ। प्रश्‍न केवल यह था कि दवाओं के बल पर उन्‍हें कैसे और कब तक सामान्‍य रखा जा सकता है?

परन्‍तु डाक्‍टर मिलकर भी कोई ऐसी औषधि न खोज पाये। तीसरे पहर वह फिर अपनी हवेली में आ गईं। शाम को उन्‍हें फिर खून की उल्‍टी हुई। डाक्‍टर माथुर ने एक नर्स बुला ली। राधा भी थी। वह तो रानी मां के साथ हस्‍पताल भी गई थी।

दूसरी उल्‍टी के साथ ही रानी मां बेहोश हो गईं। तुरन्‍त ही उन्‍हें आक्‍सीजन देने का प्रबन्‍ध किया गया।

सारी रात और अगले दिन दोपहर तक बेहोश रहने के बाद रानी मां की नींद टूटी।

तीसरे पहर उन्‍हें होश आया। उन्‍होंने पानी मांगा। राधा ने कुुछ चम्‍मच ग्‍लूकोज युक्‍त पानी उनके मुंह में डाला।

कुंवरसाहब के लिये भी आराम कुर्सी रानी मां के पलंग के निकट ही डाल दी गई थी।

राधा के हाथ से पानी पीकर रानी मां ने पूछा-‘कुंवर जी कहां हैं?'

कुंवरसाहब उठकर रानी मां के सम्‍मुख आ गये।

-‘मैं सो गई थी कुंवर जी।' रानी मां ने कुंवरसाहब का हाथ थामकर कहा।

-‘जी हां। आप गहरी नींद सोईं।' आक्‍सीजन यंत्र को झुठलाते हुए कुंवरसाहब झूठ बोले-‘माथुर कहते हैं कि नींद से आप जल्‍दी अच्‍छी होंगी।'

हांफती सी वह मुस्‍कराईं।

-‘कुंवर जी।'

-‘जी।'

-‘हमारी तो पालकी आ गई। अभी अभी की तो बात है। नहीं, हम नहीं मानते कि वह सब सपना था। अभी कुछ देर पहले राजा साहब आये थे। उन्‍होंने हमें हुक्‍म दिया था कि रानी साहिबा पालकी तैयार है, चलो। बस कोई हमारे हाथों में मेहंदी लगा दे . ... .।'

कुंवरसाहब ने मजबूर से खड़े डाक्‍टर माथुर की ओर देखा।

-‘हमारी ओर देखो कुंवर जी।'

-‘जी।'

-‘हमें अब जाना है।'

-‘रानी मां।'

-‘सुन लो कुंवर बेटा ! हमें अब जाना है। हमें आपसे सिर्फ इतना कहना है कि राधा हमें अच्‍छी लगती है। खूब सेवा भी करती है। मान लो हम रात में मर जायें। बाद में आप चाहें जो करें। परन्‍तु हमारे मरने के बाद तेरहवीं तक राधा का घर में रहना ठीक नहीं होगा। तुम्‍हारी बहन, बहनोई आयेंेगे और भी रिश्‍तेदार आयेंगे। ध्‍यान रक्‍खोगे न कुंवर जी? राधा केवल तेरहवीं तक न रहे।'

-‘जी।' कुंवरसाहब ने केवल इतना कहा।

और राधा !

वह शान्‍त खड़ी थी, केवल आंखें डबडबाई हुई थीं।

-‘एक बात और कहनी है कुंवर जी।'

-‘जी।'

-‘वैसे भी सोना को एक बार बुलाना है। लड़की कुछ दिन साथ रही है इसलिये मोह सा हो गया है। आ जाये तो बस सूरत देख लूं।'

-‘मैं भौंपू को गाड़ी लेकर भेज देता हूं।'

कुंवरसाहब ने तुरन्‍त वैसा कर भी दिया।

रानी मां बस इतना कहना चाहती थीं। इसके बाद उन्‍होंने आंखें मूंद लीं।

इसके बाद रात के नौ बजे।

रानी मां को एक उल्‍टी और हुई।

और फिर दस बजे रानी मां का देहावसान हो गया।

नौकरानी और नौकर रो पड़े। राधा ऐसे रोई जैसे उसकी सगी सास चल बसी हों।

शान्‍त कुंवरसाहब उठे-‘तो चल ही दीं रानी मां। अच्‍छा . ... .।' झुककर कुंवरसाहब ने मृत देह के चरण स्‍पर्श किए और अपने कमरे में चले गये।

शेष रात्रि कोई सो न सका। अलबत्‍ता कुंवरसाहब अपने बिस्‍तरे पर लेटे रहे।

सुबह-सुबह ! लगभग चार बजे।

कार हवेली के दरवाजे पर आकर रुकी। भौंपू सोना को लेकर आया था। सोना कार के दरवाजे से निकलते ही जोर से रोई !

तब राधा जो अब तक कभी लाश के और कभी कुंवरसाहब के पास थी, कुंवरसाहब के पास पंहुची।

-‘हुजूर।'

-‘हां।'

-‘शायद रिश्‍तेदार आने आरम्‍भ हो गये हैं।'

-‘राधा . ... .।'

-‘आपकी दासी हूं। चाहें तो खाल की जूतियां बनवालें। परन्‍तु रानी मां की अन्‍तिम साध पूरी करने में मुझे आपकी आज्ञा की आवश्‍यकता है। मुझे आज्ञा दें जाकर भौंपू से कहूंगी कि वह मुझे मेरे कोठे तक पंहुचा दे।'

कुंवरसाहब कुछ कहना चाहते थे परन्‍तु तभी तो कहते जब राधा सुनती।

----

(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

(पिछले भाग 5 से जारी…)

image

रात के दो बज गये थे।

नींद जैसे छलावा थी। रात्रि का दूसरा पहर आया तो रोम रोम में बस गई और फिर रात्रि का तीसरा पहर आते आते निष्‍ठुर प्रिया की तरह रुठ गई।

कमरे में अंधेरा था। अंधेरा जैसे अच्‍छा लगता था।

कुंवरसाहब को लगा जैसे धीरे धीरे कमरे का दरवाजा खुला हो।

क्‍या चोर है?

मन ही मन कुंवरसाहब मुस्‍कराये। कैसा बेवकूफ चोर है? भला यहां उसे क्‍या मिलेगा। रानी मां के कमरे में तिजोरी तोड़ता तो शायद कुछ मिलेगा। जेवर, सोने के बहुत पुराने सिक्‍के। यहां इस कमरे में कमबख्‍त को पूरी अधूरी कविताओं, बोतलों और . ... .और रायफल के अतिरिक्‍त क्‍या मिलेगा?

फिर स्‍पष्‍ट आभास। जैसे कोई कमरे में आ गया हो।

जान बूझकर उन्‍होंने बैड स्‍विच जलाकर रोशनी नहीं की थी।

-‘कुंवर जी . ... .।'धीमा और दबा सा स्‍वर।

धारणा बदली-ऐसी मधुर वाणी तो किसी नौकरानी की नहीं है।

-‘कुंवर जी . ... .।' फिर सम्‍बोधन !लालित्‍यपूर्ण स्‍वर।

अनायास ही उन्‍होंने बैड स्‍विच दबा दिया।

दूसरे ही क्षण उन्‍होंने देखा और देखते ही रह गये।

मंत्रमुग्‍ध से वह उठे।

-‘तुम?'

-‘जी मैं सोना हूं कुंवर जी . ... .।'उत्‍तर मिला।

जैसे बोलती गुड़िया हो। रंग सांवला,परन्‍तु नखशिख ऐसा कि तपस्‍वियों का तप डगमगा जाये। वैसे सर्वांग देहाती। हल्‍की सी गुलाबी रंग की घाघरी, उपर बेतुकी सी कमीज। ओढ़नी रेशमी . ... . परन्‍तु पुरानी। बहुत पुरानी घिसी हुई।

लजाई सी, घबराई और सहमी सी। नवयुवती नहीं लड़की। कठिनता से अठारह वर्ष की।

-‘कुंवर जी मुझे यह कहना था . ... .।'

-‘सुनूंगा। जो तुम्‍हें कहना है वह भी सुनूंगा। पहले मुझे यह बताओ कि तुम कौन हो?'

-‘सोना . ... .।'

-‘नाम है सोना?'

-‘जी कुंवर जी।'

-‘यहां कैसे पंहुचीं।'

-‘रतनपुर से यहां रानी जी ने बुलाया था।'

-‘रतनपुर की हो?'

-‘जी।'

-‘यहां कब आईं?'

-‘महीना होने आया।'

-‘अच्‍छी पहेली है। जानूं तो जब मैं यहां होता हूं तब कहां छुपी रहती हो?'

कुंवरसाहब अचरज से उसकी ओर एकटक देखते रहे।

वह लजाई। फिर दृष्‍टि झुकाकर मुस्‍कराई आपसे डर जो लगता था। सभी कहते हैं आपको गुस्‍सा जल्‍दी आता है।'

-‘सब कहते हैं?'

-‘रानी मां नहीं कहतीं।'

-‘कमरे की सफाई तुम करती हो?'

-‘दो दिन से।'

-‘अच्‍छा तो तुम्‍हें हमसे डर लगता है?'

सोना चुप। दृष्‍टि नीची।

-‘अचरज की बात है। हमसे डर भी लगता है और हमारे सामने भी नहीं आती। जब सामने आती हैं तो रात के दो बजे होते हैं। अब डर नहीं लगा?'

-‘लगा।'

-‘फिर भी आ गईं?'

-‘जी।'

-‘क्‍यों?'

-‘रानी मां की तबीयत बहुत खराब है जी। बदन में ऐसा दर्द है कि रो रही हैं। एक पल को भी नींद नहीं आई। डाक्‍टर बाबू को बुलाने के लिये कहा है।'

-‘हूं . ... .अच्‍छा।'

-‘कुंवरसाहब ने तुरन्‍त ही फोन का रिसीवर उठा लिया। पूरे दस मिनट की प्रतीक्षा के बाद कहीं डाक्‍टर फोन पर आये।

फिर वह सोना के साथ रानी मां के कमरे में चले गये।

डाक्‍टर माथुर आये।

सचमुच रानी साहिबा को बड़ी पीड़ा थी। उनका अंग अंग कांप रहा था, आंखों से आँसू झर रहे थे।

डाक्‍टर माथुर ने इन्‍जेक्‍शन दिया।

एक तेज असर की गोली दी।

लगभग आधे घण्‍टे बाद रानीसाहिबा की हालत कुछ सुधरी। डाक्‍टर अभी बैठे थे।

-‘माथुर बेटा . ... .।' रानी मां ने डाक्‍टर को सम्‍बोधित किया।

-‘मैं यहीं हूं रानी मां।'

-‘बेटा मैं अभी दो महीने नहीं मरना चाहती।'

डाक्‍टर माथुर हंसे-‘मैं आपको बीस वर्ष की गारन्‍टी लिखकर देने को तैयार हूं। आप देखियेगा। तंग आ जायेंगी आप नाती पोतों से। इतनी जल्‍दी आपको स्‍वर्ग का टिकट मिलने वाला नहीं है। निश्‍चिन्‍त रहें।'

-‘बातें बनाना कोई तुझसे सीखे। लेकिन बेटा मेरी सुन, उस लड़की को देखता है न। बेचारी के मां बाप दोनों मर गये। मुझे खबर मिली कि चाचा चाची सताते हैं इसलिये मैंने इसे अपने पास बुला लिया। बिरादरी की है और मेरी प्रजा है। इसके विवाह के लिये लड़का भी ढुंढवा लिया हैं। परन्‍तु अभी दो महीने का मुहूर्त नहीं है। बेचारी अनाथ लड़की है हाथ पीले हो जायें तो निश्‍चिन्‍त होकर मरुंगी।'

-‘अगर आप झगड़ा ही करना चाहती हैं तो आपकी इच्‍छा रानी मां। मैं ऐसा इलाज तो कर सकता हूं कि आप और बीस साल जिन्‍दा रहें। दो महीने में मार देने वाला इलाज मैं नहीं करता। अगर दो महीने में मरना चाहती हैं तो हकीम फज्‍जू खां को बुलवाइए। वह ऐसे इलाज में माहिर हैं . ... .।'

-‘क्‍यों रे, हकीम फज्‍जू खां ने तेरा क्‍या बिगाड़ा है जो हर जगह उनकी बुराई करता फिरता है। जानता है वह राजा साहब के दोस्‍त थे। मेरे देवर लगते हैं।'

-‘मैं नहीं मानता। वह न किसी के दोस्‍त हैं न किसी के देवर। वह तो जहन्‍नुम के एजेण्‍ट हैं। खुदागंज की थर्ड क्‍लास के बुकिंग क्‍लर्क। जाने यह मुसीबत इस शहर से कब दफा होगी। हकीम फज्‍जू खां . ... .।'

इतना कहते कहते डाक्‍टर माथुर ने हकीम फज्‍जू खां की मुख मुद्रा की नकल बनाई। पोपला मुंह। नाक पर बहुत आगे रक्खे चश्‍मे से देखने वाली अदा।

बरबस ही रानी मां हंस पड़ीं।

केवल यही डाक्‍टर माथुर का उद्‌देश्‍य था। हकीम फज्‍जू खां से डाक्‍टर की कोई दुश्‍मनी नहीं थी। सामने पड़ते तो उन्‍हें भी चचा कहकर आदाब बजाना पड़ता था। अक्‍सर रानी मां हकीम फज्‍जू खां की तारीफ के पुल बांधा करती थीं और डाक्‍टर हकीम साहब की उल्‍टी तारीफ करके रानी मां को हंसाया करते थे।

रानी मां को अब नींद आने लगी थी।

डाक्‍टर और कुंवरसाहब दोनों उठकर बाहर आ गए।

-‘आओ डाक्‍टर।'कुंवरसाहब ने कहा-‘सुबह हो रही है कुछ चाय काफी पीकर जाना।'

-‘धन्‍यवाद। मुझे आपसे कुछ कहना है कुंवरसाहब।'

-‘फरमाइये।'

-‘रानी मां परहेज नहीं करती।'

-‘मैं जानता हूं।'

-‘उन्‍होंने जरुर कोई बदपरहेजी की है इसीलिए उनकी यह हालत हुई है।'

-‘यह भी जानता हूं।'

-‘तब यह भी जान लीजिए कि बिना परहेज के गाड़ी चलने वाली नहीं है।'

-‘इससे भी अन्‍जान नहीं हूं। आप अच्‍छी तरह जानते हैं डाक्‍टर कि मैंने इस विषय में कुछ कम प्रयत्‍न नहीं किये हैं। रानी मां परहेज नहीं कर सकतीं। शायद उनके खून का ही असर है कि मुझसे भी नियमों का पालन नहीं होता। जब तक चले . ... .आप जानते हैं कि यह गाड़ी ऐसे ही चलेगी। आइये।'

-‘मैं चलूंगा कुंवरसाहब।'

-‘नाराजगी है?'

-‘जी नहीं सरकार। भला आपसे नाराज होकर कहां रहूंगा। दो बजे आपरेशन थियेटर से लौटा था। कुछ घण्‍टे सोना चाहता हूं।'

-‘चाय काफी कुछ भी नहीं?'

-‘जी नहीं आपसे नाराजगी जो है।'

-‘खैर तो है। मुझसे नाराजगी?'

-‘हां। आपके यहां हम किसी नौकर या नौकरानी द्वारा बनाई गई चाय काफी नहीं पियेंगे। पहले कहीं से पैलेस की रानी को लाइये। तब चाय काफी की बातें होंगी।'

-‘हाथ की लकीरों पर विश्‍वास करते हो डाक्‍टर।'

-‘मुझे विश्‍वास होने लगा है।'

-‘बुजुर्गों ने जाने कितनी स्‍त्रियों को महल में रानी बनाकर रक्‍खा। कितनी स्‍त्रियों को दासी बनाया। फिर वेश्‍याओं की जैसे पूरी फौज पाली। इससे भी बढ़कर बहुत से पाप किये-जो स्‍त्री सुन्‍दर देखी उसे दिन दहाड़े उठवाकर महल में बुलवा लिया। शास्‍त्र कहते हैं कि पाप पुण्‍य का भोग पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता है। मेरे हाथ की लकीरों में शायद ऐसा सुख नहीं है। मेरे हाथ की लकीरों में शायद ऐसा सुख नहीं है। स्‍त्री के नाम पर मेरे भाग्‍य में बस कोठ वाली ही हैं।'

-‘भई कुंवरसाहब आप ठहरे विद्वान कवि। बहस में मैं आपसे जीत सकूं यह मुमकिन नहीं। कहना यह है कि पत्‍थर एक होता है-घड़कर फर्श में लगा दो तो ठोकरें खाता रहे। मूर्ति बनाकर देवालय में लगा दो तो पुजे। हमें तो यह कहना है कि कुछ जल्‍दी में कर ही डालिये। महल में आकर तो राधा भी रानी बन जायेगी और वह देहाती लड़की भी जिसके विवाह की रानी मों को चिन्‍ता है। रानी किसी खास मिट्‌टी से तो नहीं बनती न।'

0000

डाक्‍टर गये तो कुंवरसाहब ने नौकरों को पुकारा-‘ननकू . ... .किरोड़ी . ... .अरे काई है?'

कोई नहीं बोला। कोई बोलता भी कैसे। अच्‍छी खासी सर्दी थी सभी कहीं दुबके पड़े थे।

दोबारा कुंवरसाहब ने और भी जोर से आवाज दी।

इस बार लजाती सी, सकुचाती सी सोना आई।

-‘तुम . ... . अजीब बात है। वह सब मर गये क्‍या?'

-‘सभी तो सो रहे हैं। मैं जाकर जगाये देती हूं। कुंवर जी जोर से न पुकारें। रात भी तड़पने के बाद रानी मों अब सोई हैं।'

वह मुस्‍कराए-‘जो हुक्‍म। हम जबान भी न निकालेंगे, सोना जी सुनिए।'

-‘जी।'

-‘हम आपको तरकीब बताते हैं कि चाय कैसे बनती है। आप एक प्‍याली चाय बना लायें।'

-‘चाय बनानी मैं जानती हूं।'

-‘ओह, तब तो हमारी जान बच गई।'

सोना ने दृष्‍टि उठाई। नजर भरकर कुंवरसाहब ने सोना को देखा, वह लजाई और चली गई।

कुंवरसाहब चकित रह गये। जाने के बारहवें मिनट वह चाय बनाकर ले आई।

जैसे यह सब जादू के चिराग से हुआ हो। टी पाॅट में बिल्‍कुल ठीक चाय का पानी। दूध खूब गर्म। प्‍याले में गर्म पानी। बर्तन खूब साफ चमकते हुए।

-‘सुनो . ... .।'

-‘जी कुंवर जी।'

-‘यह सब तुमने कहां से सीखा सोना जी?'

-‘यहीं सीखा जी।'

-‘किससे सीखा जी?'

-‘सभी से। ननकू से, किरोड़ी से, इमरती और लछिया से।'

-‘एक गलती रह गई।'

-‘गलती . ... .?'

-‘हां। अगर एक आदमी भी चाय पिये तो प्‍याले दो लाने चाहिए। एक प्‍याला लाना अशुभ होता है।'

-‘जी . ... .।'

जैसे सोना लड़की नहीं हिरनी थी। आंधी की तरह गई और तूफान की तरह लौट आई। दूसरा प्‍याला लेकर।

-‘अब ठीक हो गया।'

-‘मैं तो आपके सामने आते भी डरती थी कुंवर जी। गांव की हूं न कुछ जानती नहीं। कहते हैं जो पढ़ा लिखा नहीं होता वह पशु समान होता है। मुझे पढ़ना लिखना भी नहीं आता। गलती हो तो माफ कर दें।'

चमत्‍कृत से कुंवरसाहब सोना की ओर देख रहे थे।

क्‍या स्‍त्री इतनी सरल भी होती है।

चाय बना कर सोना ने कुंवरसाहब की ओर बढ़ा दी।

-‘फिर गलती . ... .चाय के दोनों प्‍याले एक साथ बनने चाहिये थे।'

वह बोली नहीं। परन्‍तु जिसे तेजी से उसने दूसरा प्‍याला बनाया वह तेजी आश्‍चर्यजनक थी।

-‘अब ठीक है जी?'

-‘हां अब ठीक है। प्‍याला हाथ में उठाओ और चाय पियो।'

-‘लेकिन मैं . ... .?' सोना चौंकी।

-‘प्‍याली उठाओ सोना जी'

-‘मैं कुंवर जी आपकी रैयत हूं। आप राजा हैं।'

-‘यूं ही सही। राजा का हुक्‍म रैयत को मानना चाहिए न? चाय पियो। ऐसे नहीं। बैठकर चाय पियो।'

सोना ने प्रतिवाद नहीं किया।

वैसे वह डरी डरी सी थी। सहमी सहमी सी थी। बड़े ही अजीब ढंग से कुर्सी के छोर पर बैठी चाय पीती रही। ऐसी सर्दी में भी उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं।

मानो कोई कठोर कर्तव्‍य था जो उसे निभाना पड़ा। चाय समाप्‍त करते ही वह उठकर खड़ी हो गई।

-‘चाय और दूं कुंवर जी?'

-‘हां।'

कुंवरसाहब ने देखा सोना के हाथ कांप रहे थे।

-‘सोना जी।'

-‘जी कुंवर जी।'

-‘हमसे कोई गलती हुई?'

-‘नहीं कुंवर जी।'

-‘जरुर हमसे कोई गलती हुई। आपके माथे पर पसीना, आपके कांपते हुए हाथ। बात क्‍या है . ... .?'

सोना चुप।

-‘सोना जी।'

-‘जी।'

-‘बताइये न, बात क्‍या है?'

-‘जान ही तो नहीं पा रही हूं कुंवर जी कि बात क्‍या है।'

-‘कोई बात तो है ।'

-‘एक राजा मुझ गरीब को ऐसा मान दे। जाने यह सपना है या जाग। ऐसा तो मेरा भाग्‍य भी न था।'

-‘बस बस।'

-‘मैं तो आपकी दासी जैसी हूं कुंवर जी।'

-‘आप मेरी दासी नहीं हैं सोना जी। क्‍या हैं, यह बाद में फैसला होगा। अच्‍छा सोना जी . ... .क्‍या रानी मां आपसे यही सब पहनने को कहती हैं जो आप पहनती हैं?'

-‘न न। उन्‍होंने तो मेरे लिए धोती और छोटे छोटे ब्‍लाउज बिल्‍कुल अंगिया जैसे और न जाने क्‍या क्‍या मंगाया था। परन्‍तु मुझे वह सब पहनते अच्‍छा नहीं लगता।'

-‘यह अच्‍छा लगता है?'

-‘जी !'

-‘कोई देखे तो समझे कि रानी मां ने अपनी रैयत को गुलाम बनाकर रख रक्‍खा है ।'

-‘नहीं जी।'

-‘आज से आप यह सब नहीं पहनेंगी सोना जी।'

-‘अच्‍छा जी।'

बरतन समेट कर सोना जाने लगी।

-‘सोना जी ।'

-‘हाथ जोड़ती हूं कुंवर जी। मुझे जी मत कहा कीजिए।'

-‘हम लाख बार यही कहेंगे, आप हमें रोक नहीं सकतीं।'

-‘नहीं जी।'

-‘हमारी जान में जान आई। आपसे डर वाली बात सुनकर हमें खुद डर लगने लगा था। सोचने लगे थे कि हम इन्‍सान हैं या निरे लंगूर।'

होंठों में मुस्‍कराहट दबाये सोना चली गई।

भोर हो रही थी। विश्‍वास हो चला था कि अब नींद नहीं आएगी।

यूं ही कुंवरसाहब लेट गए।

जाने कैसा जादू किया था सोना ने। लेटते ही तो नींद आ गई। सपने में कुंवरसाहब मीलों तक फैला रंग बिरंगा गुलाब का बाग देखा। देखा कलियां मादकता से झूम रही हैं।

जब आंखें खुली तो कुंवरसाहब चौंक पड़े।

ग्‍यारह बज रहे थे।

किरोड़ी उनके जागने की प्रतीक्षा में खड़ा था।

-‘आज तो बहुत सोए हुजूर ! कई दिन की नींद जो रुकी थी। मैंने जगाना मुनासिब नहीं समझा। कलक्‍टर साहब का फोन आया था। आज टाउनहाल में कवि सम्‍मेलन है सरकार। दिल्‍ली से स्‍नेही जी आये हैं, यहां के कई कवि भी बैठे हैं। सभी का चाय पानी करा दिया है सरकार। स्‍नेही जी कह रहे थे कि भोजन आपके साथ ही करेंगे।'

उठते हुए कुंवरसाहब ने पूछा-‘रानी मां की तबीयत कैसी है?'

-‘ठीक है। डाक्‍टर बाबू आ कर देख गये हैं। पहिये की कुर्सी पर धूप में बैठी हैं।'

-‘सोना से कहो कि चाय लाये।'

0000

इसके बाद दो सप्‍ताह बीतते हैं।

कुंवरसाहब के मित्र आश्‍चर्य चकित हैं जैसे कोई रोग था और वह दूर हो गया। वह तेजी से गीत लिख रहे हैं-अच्‍छे और सुन्‍दर गीत! स्‍थायित्‍व पायें ऐसे गीत!

लोग कुंवरसाहब को शाम के समय कवि मित्रों के साथ रेस्‍तरां में देखते हैं। देखते हैं कि खूब कहकहे और चुटकुलों की भरमार रहती है। भौंपू उनकी बाहर प्रतीक्षा करता है परन्‍तु अब लौटते समय कुंवरसाहब मुन्‍शी फारसी की दुकान पर बोतल नहीं खरीदते।

इस दौरान में बाहर के कई कवि सम्‍मेलन उन्‍होंने धन्‍यवाद पूर्वक अस्‍वीकार कर दिये।

इन दो सप्‍ताह में कुंवरसाहब केवल दो बार राधा के कोठे के नीचे रुके। पान स्‍वीकार किया और हर बार एक सौ का नोट दिया।

एक बोतल चलती है चार दिन। भौंपू ले आता है। ग्राहकी बढ़ी है फल वालों की, और हलवाई की।

कुंवरसाहब वास्‍तव में मालविका को भूल गये।

मालविका का स्‍थान सहज किन्‍तु आश्‍चर्यजनक रुप से सोना ने ले लिया है।

कोई कुछ कहता नहीं, परन्‍तु दबे स्‍वर में घर के सभी नौकर कानाफूसी करते हैं।

सोना में सचमुच आश्‍चर्यजनक परिवर्तन हुआ है।

कभी कभी कुंवरसाहब को आश्‍चर्य भी होता है। स्‍त्री कितनी जल्‍दी बदल जाती है?

सोना की सीमा है-वह नई नहीं रानी मां की पुरानी साड़ियां पहनती है। रानी मां के फटे हुए ब्‍लाउज उसने स्‍वयं छोटे करके उपयुक्‍त बना लिये हैं।

और सोना बदल गई। हर क्षण उसमें परिवर्तन हो रहा है।

पहले दिन उसने कुंवरसाहब को आग्रह पूर्वक खाना खिलाया। जाने कितने दिनों बाद ऐसा आग्रह मिला था।

दूसरे दिन . ... .सोना ने विनती की कुंवर जी अधिक शराब मत लिया कीजिये। कुछ पैग उसने अपने हाथों से दिये।

तीसरे दिन दोपहर के खाने के समय कुंवरसाहब ने शराब लेनी चाही। सोना ने बहुत भारी कसम दी। दिन में शराब पीएं तो मेरा खून पिएं।

चौथे दिन जैसे बहुत से बंधन टूट गए। कुंवरसाहब ने आग्रह किया और सोना ने उनके साथ बैठकर कुछ कौर खाए।

पांचवे दिन कुंवरसाहब अपने गीत की कोई कड़ी गुनगुना रहे थे अनायास ही सोना सम्‍मुख आ गई।

-‘सोना जी।'

-‘जी कुंवर जी।'

-‘आज तक तुमने हमारा कोई गीत नहीं सुना?'

-‘रानी मां आपकी किताब में से गीत पढती हैं। सुने क्‍यों नहीं?'

-‘कैसे लगे?'

-‘समझ में नहीं आए। पढ़ी लिखी नहीं हूं न !'

-‘मैं तुम्‍हारे लिये ऐसे गीत लिखूंगा जो तुम समझ सको।'

छठे दिन !

प्रातः नौ बजे उठने वाले कुंवरसाहब के लिये सोना प्रातः पांच बजे ही चाय बनाकर ले आई।

-‘उठिए कुंवर जी। चाय पीजिए और फिर घूमने जाइए। रानी मां का हुक्‍म है। सुबह घूमने जाना अच्‍छा होता है।'

कुंवरसाहब उठना नहीं चाहते थे और सोना जैसे उठाने की प्रतिज्ञा करके आई थी।

झुंझलाकर कुंवरसाहब ने सोना को पलंग पर खींच लिया। उसके कपोलों पर अनगिनत चुम्‍बन अंकित कर दिए।

एक बंधन और टूटा। जीत सोना की हुई। कुंवरसाहब को उठना पड़ा।

सातवें दिन !

हाल में कुंवरसाहब के कवि मित्र जमा थे। यहां के बाद लगभग तीन घण्‍टे रेस्‍तरां में जमना था।

कुंवरसाहब कपड़े बदलने अपने कमरे में आए।

स्‍वयं सोना ने उन्‍हें कपड़े पहनने में सहायता दी थी, परन्‍तु जब कुंवरसाहब ने रुमाल मांगा तो इठला कर वह बोली-‘हम नहीं लाते। किसी और नौकर से मंगा लीजिए।'

तब कुंवरसाहब को सोना अजीब और रहस्‍यपूर्ण लगी।

-‘अरे लाओ न रुमाल।'

-‘हम नहीं लाते।'

-‘क्‍यों?'

-‘बस नहीं लाते।'

-‘बात क्‍या है।'

सोना मौन रही।

उन्‍होंने उसे बाहों में खींच लिया। सोना के कपोलों और होंठों पर चुम्‍बनों की झड़ी लग गई।

-‘नाराज हो क्‍या?'

-‘हां।'

-‘क्‍यों?'

-‘लौटने में आप बहुत देर लगा देते हैं, हमारा मन नहीं लगता।'

कुंवरसाहब को जल्‍दी लौटने का वायदा करना पड़ा।

आठवें दिन।

सुबह पांच बजे।

चाय लेकर आना और जगाना तो सोना का नित्‍य का नियम बन गया था।

सोना चाय लेकर आई। चाय रखकर कुंवरसाहब के पलंग पर बैठ कर उनके वक्ष पर झुकते हुए वह बोली-‘दासी चाय लेकर आई है कुंवर जी।'

और उस दिन !

कुंवरसाहब ने उसे बाहों में जकड़ा तो छोड़ा नहीं।

सोना ने जैसे मात्र दिखावे की आपत्‍ति की।

और !

सोना शरीर से भी कुंवरसाहब की हो गई।

कष्‍ट हुआ।

तुरन्‍त उठ नहीं सकी। कुछ देर निरीह सी पड़ी रही।

फिर उठी। कुंवरसाहब का सहारा लेकर।

चाय ठंडी हो गई थी। दूसरी चाय बनाकर लाई। गिरती पड़ती सी। परन्‍तु इतना सब होने के बावजूद उसने कुंवरसाहब को घूमने भेजा।

जब कुंवरसाहब घूमकर लौटे तो सोना स्‍नान कर चुकी थी और खिले फूल जैसी लग रही थी।

नौंवे दिन।

सोना शरारती भी हो गई थी।

मुंह बिचका, अंगूठा दिखाती हुई सोना भाग गई।

दसवें दिन !

दोपहर का खाना दोनों ने साथ साथ खाया।

ग्‍यारहवें दिन।

तीसरे पहर वह कुंवरसाहब के लिए फल लाती थी। खूब तकल्‍लुफ रहा। कुंवरसाहब ने अपने हाथों से सोना को फल खिलाया।

बारहवें दिन।

कुंवरसाहब पर जैसे वज्रपात हुआ।

सोना की गांव में सगाई भेजी गई। सगाई उसी गांव में भेजी गई जिस गांव का भौंपू रहने वाला था। सारे दिन कुंवरसाहब उदास उदास से रहे।

रात में सोना ने कहा-‘आप क्‍या समझते हैं कि मैं आपके बिना रह सकती हूं। रानी मां बीमार हैं वह जो कहे उन्‍हें करने दीजिए। जानते हैं मैं जिसके साथ ब्‍याही जा रही हूं उसके पास जमीन नहीं है। किसी का घोड़ा तांगा चलाता है। सब कुछ हो जाने दीजिए। घोड़ा तांगा जुड़वाकर उसे यहां ले आउंगी। आपकी हूं और आपकी रहूंगी।'

अपनी इच्‍छा से उस रात सोना ने अपना शरीर अर्पित किया।

जैसे कुंवरसाहब की प्रेम दीवानी हो। उस रात से प्रातः तक वह कुंवरसाहब के गले में बाहें डाले सोती रही।

तेरहवें दिन !

कुंवरसाहब को विश्‍वास सा हो गया कि सोना उनकी है। सोना ने स्‍वयं कहा कि उसे लिपिस्‍टिक चाहिए।

चौदहवें दिन!

कुंवरसाहब के आग्रह पर सोना ने एक पैग व्‍हिस्‍की ली।

और चौदह दिनों में अपरिचित सोना चिर परिचित बन गई थी।

यह सोना और कुंवरसाहब दोनों की मजबूरी थी कि वह हर क्षण उनके कमरे में उपस्‍थित नहीं रह सकती थी। रानी मां की देखभाल भी तो उसी के जिम्‍मे थी।

जब सोना कमरे में न होती तो कुंवरसाहब गीत लिखते।

कभी-कभी डायरी भी लिखते।

चौदहवें दिन उन्‍होंने अपनी डायरी में लिखा-‘अभी अभी राधा का सन्‍देश आया है। उसने बुलाया है। तो आज उसके पास जाना ही होगा। अब मुझे राधा की आवश्‍यकता प्रतीत नहीं होती। परन्‍तु अपने भाग्‍य से डरता हूं। यह भी तो हो सकता है कि भाग्‍य मुझसे सोना को भी ऐसे ही न छीन ले जैसे मालविका को छीन लिया था।'

सोना !

काश भाग्‍य मुझे सोना की भीख दे दे।

---

(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

(पिछले भाग 4 से जारी…)

image

कारोबारी आदमी ठहरे-गुप्‍ता जी जिस उद्‌देश्‍य से आए थे उसे प्राप्‍त करके लौट गये। अभी मित्रों को यह जानकारी नहीं थी कि कुंवरसाहब लौट आए हैं। अतएव शान्‍त मन से कुछ सोचने का अवसर मिला।

बहुत देर तक कुंवरसाहब गुसलखाने में रहे। जाकर एक कोने में बैठ गये।

सोचते रहे-क्लेश किसलिये। दुख क्‍यों?

राजकुंवरी मालविका शिष्‍ट है, सुन्‍दर है।

परन्‍तु वह संसार की एक मात्र सुन्‍दर स्‍त्री तो नहीं है। देश विदेश में उससे सुन्‍दर स्‍त्री देखी, सम्‍पर्क में आई।

आमतौर से इस आयु में व्‍यक्‍ति बूढ़ा होने लगता है। कुंवरसाहब की बत्‍तीस वर्ष की आयु थी और इस आयु में कितनी ही स्‍त्रियों से शारीरिक सम्‍बन्‍ध भी स्‍थापित हुआ।

विवाह नहीं किया यह अलग बात है। उन्‍होंने स्‍वयं विवाह करना नहीं चाहा था।

वह सोचते रहे और सोचते रहे।

उदासी किसलिये? मालविका के लिये शोक क्‍यों?

फिर मस्‍तिष्‍क अपने प्रश्‍नों के उत्‍तर स्‍वयं देता है।

मालविका काण्‍ड संवेदनशील मन पर एक ताजा घाव है। उसे समय के मरहम की आवश्‍यकता होगी।

प्रश्‍न मालविका का नहीं है। मालविका पीड़ा नहीं है। पीड़ा का कारण है।

तब पीड़ा क्‍या है?

पीड़ा है अपमान की। वासना तो एक भूख है। भूख को मिटाने के जब अनेकों साधन हैं तो दिमाग पर बोझ क्‍यों?

इसलिये कि अपमान का कडुवा जहर पीना पड़ा।

इसलिये कि अपमान का कारण थी मालविका।

दुख इसलिए है, क्‍लेश इसलिए है कि यह शरीर जिन पूर्वजों के रक्‍त से बना है वह अपमान सहने के आदी नहीं थे।

फिर भी अपमान सहना ही होगा।

उनकी आराध्‍य है देवी सरस्‍वती ! वह पूर्वजों की लकीर पीटेंगे।

अपने आपको व्‍यवस्‍थित करना होगा। सम्‍भलना होगा और एक भले आदमी की तरह जीना होगा। यह सब तनिक कठिन तो है परन्‍तु असम्‍भव नहीं है।

मन तनिक शान्‍त हुआ।

जब स्‍नान के बाद वह लौटे तो जाना कि गुसलखाने में पूरे दो घन्‍टे व्‍यतीत हो गए। समय ने भला किसी की प्रतीक्षा की है?

और जब वह कमरे में पंहुचे तो चकित हुए।

अभी अभी शायद कमरा धोया गया था। कमरा पूरी तरह व्‍यवस्‍थित था। मेज पर कोरे कागज और पेन एक ओर रखा था।

कमरे के हर गुलदस्‍ते में ताजे फूल महक रहे थे।

आश्‍चर्य हुआ ! इस घर के नौकर इतने समझदार कब से हो गए।

दो नौकर थे-तनकू और करोड़ी ! एक बूढ़ा अफीमची और दूसरा जवान किन्‍तु मूर्ख। पशुओं की देखभाल अधिक अच्‍छी तरह कर सकता था। यूं वह खाना भी बनाता था। कुंवरसाहब उसके बनाए खाने की उपमा पशुओं के रातब से दिया करते थे।

दो नौकरानी थीं। इमरती और लछिया। इमरती प्रौढ़ थी, काम से अधिक बातें करती थी। लछिया करोड़ी के साथ खाना भी बनाती थी परन्‍तु वहां करोड़ी को छेड़कर मनोरंजन अधिक करती थी। इन चारों में से किसी एक को पकड़कर अक्‍सर कुंवरसाहब अपने कमरे तथा हॉल की सफाई स्‍वयं खड़े होकर कराया करते थे।

आज ईश्वर ने किसे इतनी सद्‌बुद्धि दी।

कमरे की व्‍यवस्‍था और सफाई देखकर सचमुच आज प्रसन्‍नता हुई थी। इच्‍छा हुई कि जिसने सफाई की हो उसे पांच रुपये इनाम दे दिये जायें।

उन्‍होंने पुकारा-‘अरे कोई है?'

किसी नौकर या नौकरानी के स्‍थान पर डाक्‍टर माथुर ने कमरे में प्रवेश किया-‘जी गुलाम हाजिर है।'

-‘वाह ! हम भी क्‍या याद करेंगे कि एक एम.बी.बी.एस. डाक्‍टर गुलाम रखते थे। तशरीफ रखिए डाक्‍टर साहब।'

-‘हां जब आया हूं तो बैठूंगा ही। आज मैं इनाम के काबिल काम करके आया हूं कुंवरसाहब।'

-‘मुन्‍शी फारसी का कत्‍ल कर आए क्‍या?'

इस पर ठहाका लगा। डाक्‍टर और कुंवरसाहब के बीच यह बहुत पुराना मजाक था। जिला हस्‍पताल के मेडीकल सुपरिन्‍टेन्‍डेन्‍ट डाक्‍टर माथुर साहब कुंवरसाहब की काव्‍य प्रतिभा के कारण उनके मित्र थे और इसीलिये फैमिली डाक्‍टर भी थे। अक्‍सर वह कुंवरसाहब को कम पीने की सलाह दिया करते थे और कितनी ही बार उन्‍होंने कहा था-‘ कुंवरसाहब आप शराब इसलिये अधिक पीते हैं कि मुन्‍शी फारसी आपके लिये रात के दो बजे भी बोतल सप्‍लाई कर देता है। आपको शराबी बनाने में बहुत बड़ा हाथ उसका भी है। मैं उस कमबख्‍त को गोली मार दूंगा।'

खूब हंसने के बाद डाक्‍टर माथुर बोले-‘बेशक किसी दिन मुन्‍शी फारसी मेरे ही हाथों से मरेगा। फिलहाल तो आपके लिये रानी मां से वकालत करके आ रहा हूं।'

-‘खुदाखैर करे ! मेरे लिये वकालत?'

-‘जी हां। उन्‍होंने रानीगढ़ी वाले रिश्‍ते की गड़बड़ के बारे में बात चलाई ।'

-‘ओह !'

-‘मैंने कहा . ... .रानी मां। कुंवरसाहब को आपने जन्‍म दिया है। वह आपकी गोद में खेले हैं। स्‍वाभाविक है कि वह आपकी नजर में बच्‍चे ही रहें लेकिन वह बच्‍चे नहीं हैं। इस प्रकार के घरानों में जिस प्रकार के कुंवर होते हैं हमारे कुंवरसाहब वैसे नहीं हैं। आप इन्‍हें आजादी दीजिए कि वह जहां चाहे शादी करें चाहे न करें।'

कुंवरसाहब हंस पड़े।

-‘मुझे ही देखिए। तब मैं मेडीकल कालेज का छात्र था। माता जी बीमार हुईं तो कहा टिक्‍कू का ब्‍याह कर दो, बहू का मुंह देखकर मरुंगी। साहब हम मजबूर हो गए और मुन्‍शी सदासुखलाल की भैंस जैसे रंग और आकृति की कन्‍या हमें गा बजाकर सौंप दी गई। हम भी निहाल हो गये और हमारी मम्‍मी भी। अब साहब उस गलत काम का नतीजा यह हुआ कि हमें नर्स रीटा से प्रेम बढ़ाना पड़ा। अब हालत यह है कि नीचे का पाट मुन्‍शी सदासुखलाल की पुत्री चंचल कुमारी बनीं हैं, उपर का पाट चिर कुंवारी रीटा। इसलिए तो चलती चक्‍की देखकर कबीर जी रो दिये थे। जब दो पाटों के बीच इतने महापुरुष का दलिया हो गया था तो मैं साधारण इन्‍सान माथुर तो खूब बारीक पिस रहा हूं। हमें चंचल कुमारी जी के साथ गृहस्‍थी चलाने में भैंस पालने जैसा मजा आ रहा है।'

यूं वह डाक्‍टर के साथ हंसते रहे।

परन्‍तु मन से वह चाहते थे कि कोई उन्‍हें मालविका की याद न दिलाए।

नौकर का इनाम देने की बात वह भूल गए। डाक्‍टर के बाद वह रानी मां के चरण स्‍पर्श करने गए और लौटकर भौंपू को गाड़ी तैयार करने का आदेश दिया।

वैसे आज मूड कुछ बुरा नहीं था।

पैलेस से कंधे पर रायफल टांग कर चले जरुर परन्‍तु वैसे नया गीत गुनगुना रहे थे-

मैं रात रात भर दहूं और

तू काजल आंज आंज सोए।

तेरे घर केवल दिया जले,

मेरे घर दीपक भी मैं भी।

भटकूं तेरी राहें बांधे ,

पैरों में भी पलकों में भी।

मैं आँसू आँसू बहूं और

तू बादल ओढ़ ओढ़ सोए।

चाहा था कि प्राकृतिक वातावरण में खोकर जो बीत गया और जो दुखदाई है उसे भुलाने का यत्‍न करेंगे। कुंवरसाहब ने मन ही मन निर्णय किया कि वह नित्‍य ही नगर से बहुत दूर अपनी कथित जागीर में जहां पैतृक बाग आज भी उन्‍हीं की सम्‍पत्‍ति था-जाया करेंगे। वहां कुछ लिखने पढ़ने का यत्‍न करेंगे। अगर इच्‍छा हुई तो गंगा के कछार में शिकार के लिए भी जायेंगे।

दोपहर बाद वह बाग में पंहुच गए।

बाग की उजाड़ कोठी में मन नहीं लगा।

जैसे ही चौथा पहर आरम्‍भ हुआ मन जैसे बिलखने लगा। अनार के वृक्ष की हल्‍की छांव में मसनद लगवाई। भौंपू साकी बना। सांझ से कुछ पहले ही दौर शुरु हुआ।

जैसे मन पिंजरे का पक्षी था। व्‍याकुल पक्षी जो पिंजरा तोड़ देना चाहता हो।

बाग में चार माली थे। सीधे सादे व्‍यक्‍ति ऐसे आकर बैठ गये थे जैसे मन्‍दिर में भजन करने आये हों। जानबूझ कर मौन और श्रद्धानत। कुंवरसाहब उनका क्‍या करें ! कह दिया उनसे कि अपने काम में लगें।

भौंपू साकी भी था और साथी भी।

वह खाना भी पास के कस्‍बे से लाया। परन्‍तु उसी ने खाया। कुंवरसाहब पीते रहे और पीते रहे।

आधी रात हो गई।

एक बजा। नींद नहीं आ रही थी।

आज भौंपू भी जाग रहा था। इसलिये कि मालिक जाग रहे थे तो भला वह कैसे सोये। फिर आज सूखा नहीं था, बाकायदा रंगीन था।

बोतल लगभग समाप्‍ति पर थी।

कोठी में लैम्‍प जल रहा था। धीमे प्रकाश में जैसे दमघोंटू वातावरण था।

कुंवरसाहब बहुत पी चुके थे। अन्‍तिम पैग उन्‍होंने अपने हाथ से डाला।

-‘हुजूर . ... .।' भौंपू ने कहा।

उन्‍होंने भौंपू की ओर देखा।

-‘यह पिएं तो मेरा खून पिएं सरकार। आप बहुत पी चुके हैं।'

-‘तुम पी लो।' मुस्‍करा कर कुंवरसाहब ने प्‍याली उसकी ओर बढ़ा दी।

-‘मैं . ... .।'

-‘हमारा हुक्‍म है।'

भला भौंपू हुक्‍म कैसे टालता। भौंपू ने आदाब बजाया और पी गया।

-‘भौंपू।'

-‘सरकार।'

-‘तुमने भी जरुर पिछले जन्‍म में ताल्‍लुकेदार बनकर पाप किये होंगे तभी इस जन्‍म में भोग रहे हो। यहां से चलो भई। सूनापन जैसे काटने को दौड़ता है।'

-‘जो हुक्‍म। गाड़ी तैयार है हुजूर। मैंने पिछले जन्‍म में कोई पाप नहीं किया सरकार। पुण्‍य किया है जो आप जैसे देवता की सेवा करने का मौका मिला है।'

वह हंसंे कहा-‘राक्षस वंश में देवता कैसे जन्‍म सकता है भई?'

-‘आप राक्षस वंश के नहीं राजा वंश के हैं, राजाओं में खूब देवता जनमें हैं। शास्‍त्रों में लिखा है।'

-‘क्‍या कहने। तो अब पण्‍डितों को नया शास्‍त्र पढ़ने तुम्‍हारे पास आना होगा!'

-‘बात हंसी की नहीं है सरकार . ... .।'

-‘अच्‍छा अच्‍छा बात शास्‍त्रों की सही। ज्‍यादह नशा तो नहीं है न? चल सकोगे?'

-‘जरुर सरकार जरुर।'

विधवा जैसी उदास रात की निस्‍तब्‍धता भंग करते हुए कुंवरसाहब की कार वापस दौड़ पड़ी।

तब रात का अन्‍तिम पहर था। तीन बज चुके थे।

-‘रोको भौंपू . ... .।'

कुंवरसाहब के आदेश से कार रुकी राधा के कोठे के नीचे।

आदेश हुआ-‘राधा को जगाओ।'

राधा को जगाया गया। भला कैसे न जागती। जिस व्‍यक्‍ति ने दरवाजा खोला था उसने राधा को झंझोड़ कर जगाते हुए कहा-‘बाई जी . ... .बाई जी . ... .कुंवरसाहब आए हैं।'

अभी एक घन्‍टा पहले ही तो राधा सोई थी। थकान स्‍वाभाविक थी। नाचते नाचते जब अंग अंग टूट जाता था तब कहीं पुलिस की मुजरा खत्‍म करने की आदेशात्‍मक सीटी बजती थी।

अस्‍त व्‍यस्‍त और नींद के नशे में झूमती हुई सी राधा उठी। कुंवरसाहब के लिये नीचे पंहुची।

-‘आदाब अर्ज है हुजूर।' उनींदी सी आंखें कुंवरसाहब पर टिक गईं।

-‘तसलीमात . ... . शायद गहरी नींद में थीं?'

-‘आइए, तशरीफ लाइए न ! नींद क्‍या कुंवरसाहब। अगर मर भी जाउं तो एक बार आपके पुकारने पर उठकर बैठ जाउंगी। आजमाकर जरुर देखिएगा, तशरीफ ले आइए।'

राधा ने कार का दरवाजा खोलकर कुंवरसाहब का हाथ थाम लिया। परन्‍तु शीघ्र ही राधा ने यह जाना कि उसे कुंवरसाहब को सहारा देना होगा।

सचमुच उनके पांव लड़खड़ा रहे थे।

राधा सहारा देकर उन्‍हें उपर ले गई।

परन्‍तु अन्‍दर ले जाकर उसने उन्‍हें मसनद पर नहीं पलंग पर लिटाया जिस पर वह सो रही थी।

-‘हम थोड़ी सी व्‍हिस्‍की लेंगे।'

-‘व्‍हिस्‍की तो हुजूर खत्‍म हो गई। आप लेटिए न . ... .। अभी मुन्‍शी जी के यहां आदमी भेजती हूं . ... .।'

राधा के कोठे पर भला व्‍हिस्‍की की क्‍या कमी। परन्‍तु कुंवरसाहब की हालत देखकर वह जानबूझ कर टालना चाहती थी।

और यह बात कुंवरसाहब भी जानते थे।

राधा उनके निकट बैठकर उन पर झुक गई।

-‘एक बात हमारी मानेंगे कुंवरसाहब !'

-‘जरुरी नहीं कि मानें।'

-‘मेरी कसम।'

-‘न, अब हम किसी के जाल में नहीं फंसेंगे।'

-‘हुजूर।'

-‘जानें तो क्‍या कहना है।'

-‘कुछ देर आराम कर लीजिये।'?

-‘ओह !'

-‘स्‍विच आफ कर दूं?'

कुंवरसाहब कुछ नहीं बोले।

राधा ने मौन स्‍वीकृति समझी।

वह उठी और तेज रोशनी के बल्‍ब का स्‍विच आफ करके हल्‍के प्रकाश का नाइट लैम्‍प प्रकाशित करके लौटी तो कुंवरसाहब उठकर बैठ चुके थे।

राधा लेट गई-‘कुंवरसाहब . ... .।'

-‘हां।'

-‘हमने कसम दी है। आप जागे हुए और परेशान लगते हैं। आराम कीजिए।'

कुंवरसाहब बिना कुछ उत्‍तर दिए उठकर खड़े हो गए।

-‘कुंवरसाहब . ... .।' चौंकती सी राधा उठकर बैठ गई। राधा की ओर देखे बिना ही वह बोले-‘पहले तो मैं तुम्‍हें धन्‍यवाद दूंगा राधा। नए गीत का दूसरा छन्‍द तुमसे प्रेरित होकर बना है। सुनोगी न, सुनो . ... .।'

कुंवरसाहब ने नशे के प्रभाव से लरजते स्‍वर में गीत का एक छन्‍द सुनायाः-

बासी भोरें टूटी सांझें,

कच्‍चे धागों जैसी नींदें,

बैचेन कटीले अंधियारे,

पैनी यादें, तन मन बींधें।

मैं खण्‍डहर खण्‍डहर ढहूं,

और तू अलके गूंथ गूंथ सोए !

स्‍वर जैसे कुंवरसाहब को विधाता का वरदान था। उनकी वाणी में जैसे श्रोता का मर्म वेध देने की क्षमता थी।

गीत की अन्‍तिम पंक्‍ति कहते कहते वह कमरे से बाहर निकल आए।

राधा को जैसे अपनी भूल का एहसास हुआ।

वह तेजी से उठी और सहन में जाते हुए कुंवरसाहब की बांह थामते हुए कहा-‘सरकार माफी चाहती हूं।'

-‘माफी तो मुझे मांगनी चाहिए राधा। मेरी नींद विधाता ने मुझ से छीन ली, परन्‍तु दूसरे की नींद छीनने का तो मुझे अधिकार नहीं है। मैं सभी कुछ कीमत देकर खरीद लेना चाहता हूं, लेकिन मुझे जानना चाहिए कि हर चीज बिकाउ नहीं होती . ... .मैं जा रहा हूं राधा . ... .और यह है तुम्‍हारी कीमत . ... .।'

जेब में लगभग चार हजार रुपयों के नोट थे। कुंवरसाहब जानते थे कि राधा नोट हाथों में नहीं लेगी। उन्‍होंने नोट कमरे में फेंक दिये।

आगे बढ़कर रोती हुई राधा ने सीढ़ियों का द्वार रोक दिया।

-‘नाराज होकर जा रहे हैं। लेकिन तभी तो जाइयेगा जब मैं जाने दूंगी। मैं गाउंगी . ... .नाचूंगी ।'

-‘हटो !' बलपूर्वक कुंवरसाहब राधा को बांह पकड़कर एक ओर धकेल दिया।

इससे पूर्व कि राधा बावली सी सीढ़ियां उतर कर नीचे पंहुचे, कार स्‍टार्ट होकर दौड़ पड़ी थी।

आंखों से सावन भादों की झड़ी बरसाती राधा अपने निजी कमरे में पंहुची। सुबकते हुए उसने बिखरे नोट समेटे और एक संदूकची खोलकर वह नोट उसमें रख दिये।

यह वह कोष था जो कुंवरसाहब के रुपयों से बना था। इन रुपयों को राधा अलग रखती थी और इन पर अपना स्‍वामित्‍व नहीं समझती थी।

0000

शेष रात्रि राधा सो नहीं सकी।

अलबत्‍ता तब जबकि पक्षी चहचहाने लगे थे कुंवरसाहब को नींद आ गई।

भोर होेते ही अपना एक नौकर राधा ने भेज दिया था। नौकर का काम केवल इतना था कि जब कुंवरसाहब जाग जाएं तो वह राधा को जाकर सूचित कर दे।

नौ बजे कुंवरसाहब जागे।

उठकर जब चाय के बाद कुंवरसाहब स्‍नानादि के लिये गये तो उत्‍सुकतावश आप केवल पैंतालीस मिनिट में ही लौट आये।

परन्‍तु आज फिर उत्‍सुकता बढ़ गई।

कमरा बिल्‍कुल साफ था। हर वस्‍तु दमक रही थी। ताजे गुलाब गुलदस्‍तों में महक रहे थे।

कल की भांति ही आज भी कुंवरसाहब कुछ क्षण हतप्रभ से कमरे को निहारते रहे-हे ईश्वर कौन सा नौकर और नौकरानी इतनी समझदार हो गई है !

सचमुच इनाम के काबिल काम है आज जरुर सफाई करने वाले को दस रुपये देने होंगे ।

जैसे सफाई करने वाले के भाग्‍य में दस रुपये पाना ही नहीं था . ... .आज भी तब जबकि वह किसी को पुकारने ही वाले थे दरवाजे की चिक हटाकर कमरे में राधा ने प्रवेश किया।

उसकी आंखें सूजी हुई थीं। मानो रोई थी। बहुत रोई थी। बहुत रोई थी। बाल अस्‍त व्‍यस्‍त थे। साड़ी में जगह जगह सिकुड़न थी।

-‘आदाब अर्ज है कुंवरसाहब . ... .।'

-‘खुदाखैर करे ! क्‍या रुप है, जैसे चाँद हो चौदहवीं का। मगर चाँद कैसे सवेरे सवेरे . ... .।'

-‘माफी मांगने आई हूं सरकार . ... .।'

-‘कैसी माफी?'

-‘मैं आपके बिना, आपकी कृपा के बिना जिन्‍दा नहीं रह सकती। मुझे माफ कर दें। मैं आपकी कसम खाकर कहती हूं आइन्‍दा कभी गुस्‍ताखी नहीं होगी। दरअसल मैं नींद में थी। मुझे आपसे आराम करने के लिये नहीं कहना चाहिए था। मुझे मुजरे के लिये फौरन तैयार होना चाहिए था। यह सरासर आपकी तौहीन हुई है . ... .कुंवरसाहब अगर आपने मुझे क्षमा नहीं किया तो मैं पागल हो जाउंगी मैं . ... .।' वह रो पड़ी।

दयार्द्र होकर कुंवरसाहब ने . ... .राधा को बाहों में भर लिया।

जैसे मन का बांध टूट गया। राधा की रुलाई रुक ही न पा रही थी।

-‘राधा !'

-‘मुझे माफ कर दीजिये कुंवरसाहब।'

-‘सुनो तो राधा।'

-‘कुछ नहीं सुनूंगी। पहले कह दीजिये कि माफ किया।'

-‘हां हां माफ किया . ... .जरा चाँद सा मुखड़ा उपर उठाओ तो।' उन्‍होंने अपने हाथों से राधा के आँसू पोंछे।

राधा को संयत होने में समय लगा।

कुंवरसाहब ने उसे बैठाया। स्‍वयं भी उसके निकट सोफे पर बैठे।

-‘अब हमें कुछ कहने की इजाजत है?'

-‘जी।' नववधू की भांति राधा ने दृष्‍टि झुकाकर कहा।

-‘शराब तुमने भी पी है। शराब के गुण दोष तुम अच्‍छी तरह जानती हो। शराब पीने के बाद आदमी कुछ सनकी सा हो जाता है। दोष तुम्‍हारा नहीं था राधा।'

-‘आप देवता हैं। परन्‍तु मैं अपना दोष पहचान गई हूं।'

-‘तुम्‍हारा दोष नहीं था राधा, विश्‍वास करो।'

-‘मेरा दोष था . ... .।' नम्र किन्‍तु दृढ़ स्‍वर में वह बोली-‘हर चाहत के साथ फर्ज भी तो जुड़ा होता है। मैं कोठे वाली थी और कोठे वाली ही रही। चाहकर भी अपने संस्‍कार नहीं छोड़ सकी ।'

-‘उफ ! मैं तुम्‍हें कैसे विश्‍वास दिलाउं कि उस समय मैं मुजरा नहीं सुनना चाहता था।'

-‘शायद ऐसा ही हो।'

-‘मैं नशे में था। वास्‍तव में मैं बहुत नशे में था। किसी और पर झुंझलाहट थी और वह झुंझलाहट तुम पर उतरी।'

-‘मैं बच्‍ची नहीं हूं कुंवरसाहब ! सब जानती हूं, सब समझती हूं गुस्‍सा मुझ पर ही क्‍यों उतरा, भौंपू पर क्‍यों नहीं उतरा। मुझ पर गुस्‍सा इसलिये उतरा कि आपको जान से ज्‍यादा चाहने के बाद भी मैं कोठे वाली का चरित्र नहीं छोड़ सकी। हो सकता है कि आप मुजरा न सुनना चाहते हों। लेकिन मुझ मुंहजली को यह सोचना चाहिए था कि जिनकी इतनी बड़ी हवेली है क्‍या वह मेरे दो कौड़ी के कोठे पर सोने आयेंगे। मुझ अभागी ने एक बार भी यह नहीं पूछा कि क्‍या पेश करुं। यह न सोचा कि आप से खाने के लिए पूछूं। यह भी न सोचा कि . ... .।'

-‘बस राधा बहुत हुआ।'

-‘कुछ भी तो न हुआ। आप ने मुझे मुआफी दे दी एक तरह से मुझे जिन्‍दगी मिल गई। लेकिन अभी मैंने अपने आपको मुआफ नहीं किया है। मेरे मन ने कहा अभागिन अगर तुझे कुंवरसाहब की ब्‍याहता होने का गौरव प्राप्‍त होता तो क्‍या दरवाजे पर टकटकी लगाये जागती न रहती . ... .जब आप आते तो क्‍या कुछ भी न पूछ कर इसलिये सो जाने को कहती कि मेरी नींद खराब न हो . ... .।'

-‘राधा।'

-‘कुंवरसाहब मैं अच्‍छी बनना चाहती हूं। मैं अच्‍छी बन कर रहूंगी।'

-‘बहुत हुआ राधा। तुमने कहा कि मैं कहूं कि माफ कर दिया वैसा मैंने कह दिया . ... .।'

-‘आप देवता हैं।'

-‘अगर एतराज न हो तो मैं यह कहूं कि राधा मुझे रात की बदतमीजी के लिए मुआफ कर दो।'

-‘मैं आपके दरवाजे पर सिर पटक कर मर जाउंगी कुंवरसाहब।'

-‘बदले में मैं भी कुछ कर सकता हूं। यह ठीक है कि इन्‍सान होने के बावजूद कुंवरसाहब की पूंछ मेरे पीछे लगी है। लेकिन बोलो झगड़ा पसन्‍द है या यह सिर दर्द करने वाली बात अब खत्‍म कर रही हो?'

राधा चुप !

-‘अजीब होती हो तुम औरतें। तो झगड़ा ही करना है?'

मौन राधा ने कुंवरसाहब के दोनों हाथ थामकर मुस्‍कराते हुए अपने कपोलों से सटा लिये।

और फिर सुलह हो गई।

दोपहर में कुंवरसाहब राधा के साथ घर से निकले। तीसरा पहर राधा के साथ शहर घूमने में बिताया। लगभग साढ़े चार बजे पीनी आरम्‍भ की।

आज मन भटका भटका सा नहीं था।

आज . ... .।

सात बजे वह वापस लौट आये।

कोठी से चलते हुए उन्‍होंने कहा था-‘राधा बहुत शीघ्र ही मैं तुम्‍हारे लिये नई कालोनी में कोठी बनवाउंगा। उस कोठी का नाम रखूंगा-पी कहां। नाचना, गाना और आधी रात के बाद तक जागना, यह सब छोड़ देना। मैं जानता हूं कि यह थका देने वाला काम है।'

राधा ने पूछा था-‘परन्‍तु उसका नाम पी कहां क्‍यों होगा? मेरे पी तो मेरे पास होंगे।'

चलते चलते कुंवरसाहब ने कहा था-‘इसका जवाब फिर दूंगा।'

राधा से कुंवर साहब ने यह कह कर विदा ली थी कि आज नींद आ रही है वह सोयेंगे।

अपने कमरे में पंहुचकर लेटने से पहले उन्‍होंने अपनी डायरी में लिखा -‘राधा पूछती है कि कोठी का नाम ‘पी कहां' क्‍यों होगा? मेरे पी तो मेरे पास होंगे। मैंने उसे जवाब देना उचित नहीं समझा मुझे लगा है कि मालविका की स्‍मृति मुझे जीने नहीं देगी और तब वियोगी पपीहे को ‘पी कहां' सार्थक हो जायेगी। वियोगी पपीहे की भूमिका निभाने को आरम्‍भ में निस्‍सन्‍देह राधा को कुछ कष्‍ट होगा। मैं जानता हूं कि राधा केवल कोठे वाली नहीं है।'

----

(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

(पिछले अंक से जारी…)

janpriya lekhak omprakash sharma

 

नींद रुठ गई थी।

और एक के बाद एक बीती यादें।

चन्‍द्रावती। कुंवरसाहब की छोटी बहन। सुन्‍दर और नटखट, सात वर्ष से विवाहित।

परन्‍तु भाग्‍यहीन।

एक जागीरदार घराने में ब्‍याही गई। परन्‍तु ग्रेज्‍युएट लड़की को वर अच्‍छा नहीं मिला। असली जागीरदार चरित्र। जागीरदारी चरित्र का भ्रष्‍ट और पतित रुप।

सात वर्ष के विवाहित जीवन में चन्‍द्रावती को सन्‍तान नहीं हुई थी। पति ने उसे बांझ करार दिया। वैसे भी दामाद साहब अपने इलाके के अच्‍छे खासे गुण्‍डे थे। यूं न जाने कितनी रखेलें थीं परन्‍तु दूसरा विवाह करने में कानूनी बाधा थी। इसलिए वह चन्‍द्रावती के लिए घर में सौत तो नहीं ला सके अलबत्‍ता छोड़ देने की धमकी दी।

बात कुछ और अधिक बढ़ी।

और पति ने चन्‍द्रावती से कहा कि या तो वह अपने बाप की जायदाद में से हिस्‍सा ले या चली जाए।

बहन मां के पास आकर रोई।

बात कुंवरसाहब के पास तक पंहुची। उन्‍होंने बहनोई को बुलवाया।

बात हवेली पर नहीं वकील के यहां हुई।

बहनोई का नाम था राजसिंह। कुंवरसाहब उन्‍हें ठाकुर साहब कहा करते थे।

शान्‍त किन्‍तु दृढ़ स्‍वर में कुंवरसाहब ने वकील के सम्‍मुख पूछा-‘अब कहिए ठाकुर साहब आप क्‍या चाहते हैं?'

राजसिंह हो हो करके हंस दिया।

-‘मैं साफ साफ बात करना चाहता हूं ठाकुर साहब !'

-‘अपनी बहन को सम्‍भालिए।'

-‘क्‍या मतलब?'

-‘मैं तलाक देना चाहता हूं।'

-‘सचमुच यह एक अच्‍छा सुझाव है ! परन्‍तु मजबूरी यह है कि रानी मां और चन्‍द्रा इसे नहीं मानेंगी। क्‍या कोई और रास्‍ता नहीं है?'

-‘रास्‍ता तो है . ... .।'

-‘कहिए।'

-‘कानून है कि लड़की को उसके बाप की जायदाद में हिस्‍सा मिले।'

उत्‍तर में कुंवरसाहब के वकील ने कुछ कहना चाहा पर कुंवरसाहब ने उसे रोक दिया।

-‘हूं ! कितना हिस्‍सा आप चाहते है।?'

-‘मैंने आपकी जायदाद पांच लाख रुपये की कूती है बहुत कम . ... .।'

-‘ओह !'

-‘एक लाख रुपये में मैं विवाह माने लेता हूं।'

-‘ठीक।'

-‘समझौता एक लाख नगद पर हो सकता है।'

-‘हूं।'

-‘मैं साफ आदमी हूं और साफ बात पसन्‍द करता हूं। उम्‍मीद है कि आप भी साफ बात ही कहेंगे।'

वकील ने फिर बोलना चाहा और कुंवरसाहब ने उसे फिर रोक दिया।

-‘एक शर्त के मुझे आपका सुझाव स्‍वीकार है ठाकुर साहब।'

ठाकुर जैसे आसमान से गिरा।

झल्‍ला कर वकील साहब ने कहा-‘कुंवरसाहब आप मेरी भी तो सुनिये।'

-‘प्‍लीज वकील साहब . ... .यह मेरी जिन्‍दगी का सवाल है। जी हां, अगर मेरी बहन मेरे होते दुखी हो तो मेरी जिन्‍दगी क्‍या अच्‍छी हो सकेगी। ठाकुर साहब मैं आपको एक लाख रुपया दे सकता हूं। शर्त जरुर है।'

-‘कहिए।'

-‘नम्‍बर एक आपको लिखकर देना होगा कि आपने हिस्‍सा ले लिया है।'

-‘लिख दूंगा।'

-‘नम्‍बर दो आपको लिखकर खेद प्रगट करना होगा कि आपका अब तक मेरी बहन से बर्ताव अच्‍छा नहीं था और अब हिस्‍सा मिलने के बाद आप अच्‍छा व्‍यवहार करेंगे।'

-‘यह मैं अपने वकील से सलाह करके बताउंगा।'

-‘तीसरी और अन्‍तिम शर्त यह कि रुपया मैं आपको नहीं अपनी बहन को दूंगा और वही उसकी स्‍वामिनी होगी।'

उस समय समझौता नहीं हो सका।

ठाकुर चन्‍द्रावती को वहीं छोड़कर लौट गया।

उदास चन्‍द्रावती को देखकर कुंवरसाहब उदास हो जाते थे।

उधर ठाकुर के लिए भी एक लाख का प्रलोभन कुछ कम नहीं था और रिश्‍तेदारों के जरिए उसने खत्‍म बात को फिर चलवाया।

कुंवरसाहब अपनी बहन के प्रति मन के स्‍नेह से मजबूर से थे। इसलिये वह अपने प्रस्‍ताव से पीछे नहीं हटे।

रिश्‍तेदारों की खासी पंचायत सी हुई।

और ठाकुर ने कुंवरसाहब का प्रस्‍ताव मान लिया।

कुंवरसाहब ने तीनों बातें लिखाकर उस पर पंचों के हस्‍ताक्षर करा कर एक लाख रुपया चन्‍द्रावती के नाम से बैंक में जमा करवा दिया।

उनके चेहरे पर न रंज था न मलाल।

बात उन्‍होंने न मालविका से कही थी न रावसाहब से, परन्‍तु रिश्‍तेदारों के द्वारा बात वहां भी पंहुची थी।

जैसे एक लाख रुपया वरदान थे।

समाचार मिला था कि चन्‍द्रावती को दिन चढ़े हैं।

रानी मां ने खुश होकर कुंवरसाहब को ढेरों सौगातें वहां लेकर भेजा था।

वैसे भी बहन की ससुराल में कुंवरसाहब कई हजार रुपया अपने मन से खर्च कर आए। ठाकुर की हवेली में उन्‍होंने बहन की सुविधा के लिए आधुनिक ढंग का गुसलखाना चन्‍द्रावती के कमरे के निकट ही बनवाया। कमरे का फर्श नए ढंग का बनवाया।

लजाते हुए चन्‍द्रावती ने स्‍वीकार किया था कि अब ठाकुर साहब का व्‍यवहार अच्‍छा है।

और कुंवरसाहब खुशी से भर गये थे।

उन्‍हें लगा था जैसे उनके बुजुर्गों ने जो पाप किए थे उनका कुछ निवारण हो गया हो।

बहन के यहां से वह सीधे रानीगढ़ी गये थे।

बहुत प्रसन्‍न थे वहुत ही प्रसन्‍न।

गये थे विवाह का मुहूर्त निकलवाने।

खास तौर पर दिल्‍ली होकर गए थे। मालविका के लिए बहुत सी सौगातें लेकर।

और रानीगढ़ी में !

जैसे उनकी नींद रानीगढ़ी में किसी ने चुरा ली थी।

कुंवरसाहब रानीगढ़ी पंहुचे तो रावसाहब चुप चुप से थे।

सदा की तरह उन्‍होंने कुंवरसाहब को गले लगाकर गर्मजोशी से स्‍वागत नहीं किया। बुझा बुझा सा प्रति नमस्‍कार का उत्‍तर मिला।

फिर एक चोट। नौकर को बुलाकर उन्‍होंने मरदाने हिस्‍से में ही बैठक से लगे मेहमानखाने में कुंवरसाहब का सामान रखवा दिया। कहा-‘लोग शिकायत करते हैं कि में पर्दे का ख्‍याल नहीं करता। आप मेहमान खाने में ही आराम करें। आपको किसी भी प्रकार का कष्‍ट नहीं होगा।'

पर्दे का ख्‍याल ! तब कुंवरसाहब को साधारण सन्‍देह ही हुआ। दिन के तीसरे पहर का समय था। रावसाहब ने चाय के लिये पूछा। कुंवरसाहब ने ना कर दी।

उन्‍होंने रावजी के नौकर से कहा कि वह उपहार की वस्‍तुएं अन्‍दर पंहुचा दे। थके से थे, स्‍वयं लेट गये। दो घन्‍टे गहरी नींद सोये।

उठ कर देखा तो उपहार की वस्‍तुएं उनके निकट ही रक्‍खी हैं।

-‘भौंपू।' उन्‍होंने आवाज दी।

-‘जी सरकार।' भौंपू बाहर से आया।

-‘यह सब चीजें तो मैंने राव साहब के नौकर से अन्‍दर भिजवाने के लिये कहा था। यह सब यहां कैसे?'

-‘राव साहब के हुक्‍म से।'

-‘क्‍यों?'

-‘क्‍या जानूं सरकार। रावसाहब के तेवर कुछ बदले से लगते हैं।'

-‘राव साहब बैठक में हैं?'

-‘नहीं। कहीं गए हैं।'

-‘आएं तो बताना।'

रात हो गई। नौकर आकर खाना रख गया।

कुंवरसाहब समझ नहीं आ पा रहे थे कि बेरुखी किस लिये।

रात में लगभग दस बजे राव साहब लौटे।

-‘राव साहब . ... .।' कुंवरसाहब बैठक ही में गये।

-‘ जी कुंवरसाहब।'

-‘मुझे रानी मां ने भेजा है।'

-‘जी किस लिए?'

-‘विवाह की तिथि निश्‍चित करने के लिये।'

-‘ओह। मुझे अफसोस है कुंवरसाहब यह रिश्‍ता नहीं हो सकेगा।'

कुंवरसाहब जैसे आसमान से गिरे।

-‘क्‍यों?'

-‘राजकुंवरी को रिश्‍ता पसन्‍द नहीं है।'

-‘क्‍यों?'

-‘इसीलिये कि वह रानीगढ़ी की राजकुंवरी है। आराम में पली है-दानी हरिश्‍चन्‍द्र के साथ वह गुजारा न कर सकेगी।'

-‘सीधी बात कहें तो कृपा होगी।'

-‘बहनोई को एक लाख नगद दिया है न?'

-‘जी।'

-‘हमसे पूछा?'

-‘जी दरअसल ।'

-‘राजकुंवरी से पूछा?'

-‘जी नहीं।'

-‘एक लाख रुपया बहुत होता है कुंवरसाहब।'

-‘जी।'

-‘जो एक लाख इतनी आसानी से दान कर सकता है वह सब कुछ दान करके एक दिन कंगाल भी हो सकता है।'

-‘शायद आपने ठीक सोचा है।'

-‘आप बिरादरी के हैं। कवि और विद्वान हैं। महल आपका है हमें आपके आगमन से सदा खुशी होगी। लेकिन यह रिश्‍ता नहीं हो सकेगा।'

-‘हूं।'

-‘अब आप विश्राम करें।'

-‘क्‍या मैं राजकुमारी से भेंट कर सकता हूं।'

-‘नहीं।'

-‘ओह ! राव साहब कृपा होगी अगर आप रानी मां के लिये इसी आशय का एक पत्र लिख दें।'

-‘लिख दूंगा।'

-‘कृपया लिख दें।'

-‘हां हां ! आप विश्राम कीजिये, सुबह लिख दूंगा।'

-‘कृपा होगी अगर अभी लिख दें तो। मेरा ख्‍याल है तीसरे पहर से अब तक की नजरबन्‍दी भी भुगत चुका हूं। रिहाई पाकर मुझे प्रसन्‍नता होगी।'

-‘अभी आपका जाना नहीं होगा।'

-‘मैं एक मिनट के लिए भी जेल भुगतने को तैयार नहीं हूं।'

-‘लेकिन कुंवरसाहब राह में जंगल पड़ता है। जंगली जानवर . ... .।'

-‘राव साहब मेरी रायफल कार में है।'

-‘फिर भी . ... .।'

-‘अगर आप लिख कर नहीं देना चाहते तो न सही।'

-‘नहीं मैं लिखे देता हूं।'

रावजी ने पत्र लिखकर कुंवरसाहब को दे दिया। पत्र पाते ही कुंवरसाहब ने पुकारा-‘भौंपू।'

-‘हुजूर।'

-‘कार तैयार है?'

-‘बिल्‍कुल तैयार है हुजूर।'

-‘चलो . ... .।'

तभी रावजी ने अपने नौकर को बुलाकर कहा-‘देखो कुंवर जी जा रहे हैं। मेहमान खाने से सभी वस्‍तुएं लाकर हिफाजत से कार में रख दो।'

बात कुंवरसाहब समझ गये। वह इस स्‍थिति में भी उपहार लौटाकर नहीं ले जाना चाहते थे परन्‍तु जवाब में कुछ कह न सके। और कुंवरसाहब कार में बैठ गये।

लग रहा था जैसे लुट गए हों। बरबाद हो गये हों।

कार चल पड़ी।

कुंवरसाहब ने एक बार मुड़कर महल की ओर देखा। तब तक देखते ही रहे जब तक कि महल की बुर्जी आंखों से ओझल न हो गई।

परन्‍तु रानीगढ़ी से उस रात जाना न हो सका।

तब जबकि उनकी कार पैट्रोल पम्‍प पर खड़ी थी उनकी ही जागीर का एक लड़का जमील वहां दिखाई पड़ गया।

वह एक सरकारी जीप में था। जीप से कूदते हुये उसने उन्‍हें देखकर चौंकते हुए कहा-‘हुजूर कुंवरसाहब !'

कुंवरसाहब को लगा जैसे उस व्‍यक्‍ति को कहीं देखा है।

-‘पहचाना हुजूर?'

-‘भई तुम्‍हें देखा जरुर है . ... .।'

-‘हुजूर मैं आपकी प्रजा हूं। जमील, हकीम शकीलउद्‌दीन का लड़का। आपने मेरी इन्‍टर की फीस दी। बी.ए. और एम.ए. की फीस और किताबों के लिए जब मैंने आपको लन्‍दन खत लिखा था, आपने वहां से पैसा भेजा।'

-‘ओह जमील . ... .वही बाग का दुश्‍मन।'

-‘जी हां। आपके बाग का एक चोर। आपकी रैयत . ... .।' झुक कर जमील ने कुंवरसाहब के पांव पकड़ लिये।

-‘जीते रहो,खुश रहो। भई यहां कैसे?' जमील को गले से लगाते हुए कुंवरसाहब ने पूछा।

-‘इसी जिले में मजिस्‍ट्रेट हूं। दौरे पर था, आपके दर्शन हो गये। कहीं जा रहे थे हुजूर?'

-‘हां घर जा रहा हूं ।'

-‘भला यह कोई जाने का वक्‍त है हुजूर। आज रात खादिम के साथ डाक बंगले में रहिए . ... .पिछले साल शादी की थी। आपको खुद दावतनामा देकर आया था, लेकिन वायदा करके भी आप नहीं आए। आपका बधाई पत्र मैंने फ्रेम करवा कर बंगले में टांग रक्‍खा है। रात में जाना हरगिज नहीं हो सकेगा हुजूर। डाक बंगले में दुल्‍हन भी हैं हुजूर। उसे आशीर्वाद दिये बिना . ... .।'

-‘क्‍या कहते हो भौंपू . ... .।'

-‘सरकार भला मैं क्‍या कहूं। आप भी राजा हैं और जमील साहब भी राजा हैं। बड़ों के बीच मैं कैसे बोलूं।'

जमील कह उठा-‘ड्राईवर साहब खबरदार। हमें अपनी बेइज्‍जती बर्दाश्‍त नहीं होगी। यह हमारे राजा हैं और हम इनकी रैयत हैं। कुछ हैं नहीं लेकिन कुछ भी हो जायें फिर भी इनकी रैयत ही रहेंगे। यह दिल का रिश्‍ता है और उम्र भर नहीं बदलेगा।'

बहुत स्‍वागत सत्‍कार किया जमील ने।

उसकी दुल्‍हन बेपर्दा होकर सामने आई। अपने राजा का आशीर्वाद लेने।

जमील उनकी आदतों से परिचित था। जाने कहां से वह आधी रात को व्‍हिस्‍की की बोतल जुटा लाया।

तौबा टूट गई।

रात के लगभग तीन बजे तक कुंवरसाहब जमील के साथ पीते रहे।

यह कल रात की ही तो बात है। कुछ घन्‍टे उन्‍हें नींद भी आई।

सुबह वह सभी उपहार जो मालविका के लिए थे, सभी दुल्‍हन के सम्‍मुख रख दिये।

-‘इतना सब . ... .।'

आगे वह कुछ न कह सकी। कुंवरसाहब बोले-‘हम तुम्‍हारे राजा हैं दुल्‍हन। अगर हम दर-दर भीख भी मांगने लगे तो तुम लोगों के राजा ही कहलायेंगे। हुक्‍म उदूली हमें बरदाश्‍त नहीं होगी।'

वह रात अच्‍छी कट गई थी, परन्‍तु आज की रात!

और रात समाप्‍त हो गई।

यूं वातावरण में अभी अंधेरा था। परन्‍तु पक्षियों का कलरव भोर की सूचना दे रहा था।

और कुंवरसाहब को नींद आ ही गयी।

0000

प्रातः नौ बजे गुप्‍ता जी ने कुंवरसाहब से गुप्‍ता जी का खुला नाता था। कोई छुपाव नहीं था। बात चली तो कुंवरसाहब ने सब बातें बता दीं।

गुप्‍ता जी व्‍यापारी आदमी थे। बोले-‘अगर आप कहें तो मैं रानीगढ़ी जाकर कोशिश करुं।'

सुनकर कुंवरसाहब जोर से हंसे

फिर बोले-‘यह सही है गुप्‍ता जी मालविका जैसे नस-नस में बस गई थी। लेकिन मैं आपसे कितनी ही बार कह चुका हूं कि बुजुर्गों की सब बुराइयों से मैं पीछा नहीं छुटा हूं। टूट सकता हूं झुक नहीं सकता। मालविका के लिए तड़प कर मर जाना मंजूर है लेकिन मालविका से अब समझौता नहीं होगा।'

गुप्‍ता जी जानते थे यही उत्‍तर मिलेगा।

उन्‍होंने अपनी बात को मनवाने की कोशिश नहीं की बल्‍कि एक नई बात छेड़ी-‘कुंवरसाहब आप राजा हैं और मैं अदना बनिया हूं। चार आदमियों के सामने जब आप मुझे अपना मित्र मानते हैं तो स्‍वयम्‌ अपने भाग्‍य से ईर्ष्‍या होती है। मान लीजिए कि मुझे कुछ रुपयों की जरुरत पड़ जाये तो आप दोस्‍ती के नाते मुझे कितने रुपये तक दे सकते हैं?'

-‘मेरा इम्‍तिहान ले रहे हैं गुप्‍ताजी?'

-‘यूं ही समझ लीजिए।'

-‘तो चाहे जब आजमा लीजिये। इस हवेली के अतिरिक्‍त मैं अपनी सारी पूंजी आपको दे सकता हूं। रानी मां के होते मेरी मजबूरी है कि मैं हवेली आपको नहीं दे सकता।'

-‘मुझे दस हजार रुपयों की जरुरत है।'

-‘बस ! अरे कमबख्‍त कुछ तो मांगते।'

-‘छोटा आदमी हूं भला बड़ी बात कैसे कहूं।'

-‘दस हजार रुपये आपको आज ही मिल जायेंगे।'

-‘पक्‍का वादा है न?'

-‘अरे बाबा अभी चैक ले लो। हो असली बनिए।'

-‘मेरी बात का जवाब दीजिये कुंवरसाहब। वादा पक्‍का है न?'

-‘तुम्‍हारी जान की कसम गुप्‍ता जी।'

-‘अब सुनिये। मैं साहूपुर गांव का मुकदमा लड़ना चाहता हूं। कोर्ट फीस के लिये मुझे रुपयों की जरुरत है।'

-‘लानत है गुप्‍ताजी आप पर। रहे आप बनिये ही . ... .।'

-‘जी हां बनिया तो हूं ही। लेकिन आप वादा कर चुके हैं . ... .।'

साहूपुर था कुंवरसाहब की पैतृक जमींदारी का एक गांव। वह गांव पैतृक जमींदारी में है इसके बहुत से पुख्‍ता सबूत कुंवरसाहब के पास थे।

उसी गांव में कुंवरसाहब के पूर्वजों के पुरोहित रहते थे। एक बार फसल बहुत खराब हो गई थी तो पुरोहित जी के कहने से कुंवरसाहब के प्रपिता ने उस गांव की मालगुजारी अपने पास से जमा करा दी थी और भविष्‍य में ऐसी व्‍यवस्‍था करा दी थी कि गांव पंचायत सीधे सरकारी लगान जमा करा दे। जमींदारी भाग सदा के लिये क्षमा कर दिया गया था।

अपना हक नहीं छोड़ा था कुंवरसाहब के बुजुर्गों ने। परन्‍तु कुछ वर्ष लगान की रसीद गांव पंचायत के नाम से कट गई और सीधे मामले में कुछ घपला पड़ गया।

जब जमींदारी समाप्‍त हुई तो कुंवरसाहब बालिग नहीं थे और किसी कुसूर पर पुराने कारिन्‍दे को रानी मां ने नौकरी से निकाल दिया था।

यह बात तब खुली जब लन्‍दन से पढ़कर लौटे।

लगभग चार लाख का मामला था। परन्‍तु कुंवरसाहब ने न रानी मां का कहा माना न मित्रों का।

कुंवरसाहब ने कहा-‘भई घी कहां गया, खिचड़ी में। उसका मुआवजा अंग्रेज तो अपने साथ ले नहीं गए। गवर्नमेन्‍ट के पास ही तो है, रहने दो। अगर हमें जो कुछ मिला है वह भी कांग्रेस ले लेती तो हम क्‍या कर लेते।'

परन्‍तु आज गुप्‍ता जी ने दोस्‍ती के नाम पर कुंवरसाहब को फांस ही लिया था।

-‘एक बात पूछें गुप्‍ताजी?' कुंवरसाहब बोले।

-‘बात हजार पूछिए। लेकिन आप वादा कर चुके हैं।'

-‘हां जनाब हम वादा कर चुके हैं। परन्‍तु यह तो कहिए कि आज यह फितूर कहां से आया। रानी मां से मिले हैं क्‍या?'

-‘हां उन्‍हें तो प्रणाम करके आया हूं। लेकिन इस मामले में उनसे कोई बात नहीं हुई।'

-‘तब कहां से लाये यह लतीफा?'

-‘रानीगढ़ी से।'

-‘गुप्‍ता जी ।'

-‘यह कहने की मुझ में हिम्‍मत नहीं है कुंवरसाहब कि आप रानीगढ़ी के रावजी को राजी करने की कोशिश करें। लेकिन रुपये की क्‍या ताकत है यह आपको जानना ही होगा।'

-‘ओह ! उपदेश के लिये धन्‍यवाद गुप्‍ताजी।'

-‘सवाल उपदेश का नहीं है। कुंवरसाहब मैं तो सिर्फ इतना चाहता हूं कि इस तरह की कोई और घटना फिर न घटे। सबको सब सबूत और मुकदमें का प्रतिनिधित्‍व मुझे देना ही होगा।'

-‘ठीक है। हम अपना वादा नहीं तोड़ेंगे। लेकिन हम समझते हैं कि हमारा धन शापग्रस्‍त है। यह किसान के खून की कमाई है और हमें सदा दुख देगी।'

-‘मैं आपकी बात से सहमत नहीं हूं।'

-‘आपकी असहमति हमें तथ्‍य से नहीं भटका सकती। बहुत संभव है कि रानी मां के बाद आप एक दिन यह सुनें कि हम सब कुछ छोड़ कर बैरागी हो गए।'

-‘ऐसा मैं कभी नहीं सुनूंगा। यहां तक तो संभव है कि आप मित्रों के बंधन तोड़ दें। परन्‍तु क्‍या राधा को भुला कर सन्‍यासी हो सकेंगे?'

कुंवरसाहब मुस्‍करा भर दिये। उन्‍होंने गुप्‍ता जी की बात का कोई उत्‍तर नहीं दिया।

गुप्‍ताजी फिर बोले-‘यह बात दूसरी है कि आप अपने साथ को भी वैरागिन बना लें तब मैं आपको गुरु मान कर बाकायदा दीक्षा लूंगा और चेला बनकर साथ रहूंगा।'

-----

(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

(पिछले अंक से जारी…)

पुरानी स्‍मृतिओं ने जैसे नींद चुरा ली थी। बीती बात निरन्‍तर याद आ रहीं थीं।
अगले दिन!
तब जबकि वह राजकुंवरी के साथ शिकार पर गये थे। साथ में रावसाहब भी थे और दो पेशेवर शिकारी भी थे।
बताया गया था कि जंगल में एक भेड़िये का उत्‍पात है। जो आते जाते मुसाफिरों को भी परेशान करता है।
यह राह में ही जानकारी मिली कि राजकुंवरी को भी निशानेबाजी का अच्‍छा अभ्‍यास था। एक प्रतियोगिता में वह पुरुस्‍कृत भी हो चुकी थी।
अब आपस में कोई झिझक नहीं थी। एक जीपकार में रावजी और उनके शिकारी साथी थे दूसरी जीपकार में कुंवरसाहब को मालविका के साथ बैठाया गया था।
स्‍वयं मालविका जीप ड्राइव कर रही थी।
राह में कुछ बातें हुईं।
-‘राजकुमारी जी आज सुबह सुना . ... .आप बहुत सुन्‍दर गाती हैं।
-‘आप भी तो बहुत सुन्‍दर कविता करते हैं।'
-‘सुन्‍दर कहां . ... .बस यूं ही कुछ कह लेता हूं।'
-‘हम एक बात कहें कुंवरसाहब।'
-‘कहिये।'
-‘मैं पर्दे की ओट से देख रही थी आपने बहुत शराब पी।'
-‘मैंने कहा था न कि बुजुर्गों की सभी बुराईयां मुझ में हैं।'
-‘अगर मेरी सौगन्‍ध माने तो कहूं अधिक शराब मत पिया कीजिये। भाई कुंवर जी अधिक शराब पीने के कारण ही मर गये थे . ... .तब से . ... .।'
-‘जब आप मालकिन बनकर घर आयेंगी तब जैसा आप का हुक्‍म होगा मानूंगा।'
-‘इससे पहले भी आप मेरी सौगन्‍ध का ध्‍यान रखेंगे।'
-‘जो हुक्‍म . ... .।'
-‘यह हुक्‍म नहीं दासी की प्रार्थना है।'
दोनों की दृष्‍टि मिली।
यकायक जीप को ब्रेक लग गये।
-‘बस इतना ही मुझे आपसे कहना है कुंवर जी। मैं मन और तन से आपकी हो चुकी हूं।'
दृष्‍टि मानों एक दूसरे के मुख से हटना ही नहीं चाहती थी।
कुंवरसाहब ने अपने दोनों हाथ मालविका के कपोलों पर रख दिए।
विभोर हो राजकुंवरी ने आंखें मूंद लीं।
और कुंवरसाहब ने अपनी मंगेतर का माथा चूम लिया।
जीपकार फिर दौड़ने लगी।
जैसे रात, भोर और दोपहर की पहचान वर्षों की पहचान बन गई हो।
इसके बाद एक शिकार यात्रा आरम्‍भ हुई।
मचान आदि का कोई तकल्‍लुफ नहीं था। आगे आगे कुत्‍तों सहित पेशेवर शिकारी चले। फिर कुंवर और रावजी।
भेड़िये के स्‍थान का पूर्व अनुमान था।
उस स्‍थान को चारों कोनों से घेरा गया। दो कोनों पर शिकारी थे। एक कोने पर राव साहब और एक कोने पर कुंवरसाहब और मालविका।
शिकारी पोशाक बहुत फब रही थी मालविका पर।
भेड़िये को आड़ से निकालने के लिये शोर मचाया गया।
अतिथि के नाते पहला फायर करने का अवसर कुंवर जी के लिये था।
लगभग बीस मिनिट तक प्रतीक्षा करने के बाद भेड़िया मांद से निकला।
कुंवरसाहब को जैसे निशाना लगाने की प्रतीक्षा थी।
यूं भेड़िये पर चार रायफलें तनी हुई थीं।
-‘धायं . ... .।'
कुंवरसाहब ने पहला फायर किया।
सचमुच सभी ने निशानेबाजी का कमाल देखा। कुंवरसाहब द्वारा चलाई गई गोली भेड़िये का कपाल फोड़ गई।
मालविका तो जैसे निशाना देखकर दीवानी हो गई।
भेड़िया गोली खाकर कई फिट उंचा उछला और फिर धराशायी हो गया।
उसी क्षण मालविका सुध-बुध भूलकर अमरलता की तरह कुंवरसाहब से लिपट गई।
-‘बधाई है।'
सभी ने उन्‍हें मुक्‍त कंठ से बधाई दी। भेड़िया पास के उस गांव में भिजवा दिया गया जहां उसने एक बच्‍चे को जख्‍मी किया था। इस सूचना के साथ कि यह रावसाहब के भावी दामाद की रायफल का शिकार बना। प्रजा को दामाद साहब की भेंट।
शाम तक पिकनिक रही। बार बार खूबसूरत आंखों का उनकी ओर निहारना-कोई कैसे भूल जाए।
और फिर दूसरी रात।
कुंवरसाहब ने रात में राव साहब से कहा-‘मैं शराब नहीं पीयूंगा।'
-‘क्‍यों?'
-‘यंू ही।'
राव साहब मुस्‍कराए। केवल इतना कहा-‘ठीक है, यह तो जनाब पीने वालों की महफिल है। आप शौक से आराम करें।'
इसका अर्थ था साथ साथ भोजन के लिये भी आग्रह नहीं है। कुंवरसाहब ने कुछ देर अपनी सास से बातें की और उपर अपने कमरे में चले आए।
कमरा जैसे बदला बदला था।
सोफों के गिलाफ और बिस्‍तरे की चादर तथा सभी पर्दे बदल दिए गए थे।
कल सभी कुछ हरा था, आज गुलाबी।
मेज पर गुलाबी मेजपोश। दो शराब के प्‍याले और सोने की छोटी सी सुराही।
कमरे का रंग गुलाबी, मालविका का परधिान गुलाबी।
-‘बहुत खूब।' कुंवरसाहब मालविका की ओर देखकर मुस्‍कराए।
-‘क्‍या खूब?'
-‘गुलाबी बहार।' कस्‍तूरी मृग अपनी ही नाभी में छुपी कस्‍तूरी की गंध से व्‍याकुल होकर धैर्य खो देता है। वन में खोजता फिरता है कि गंध स्‍थल कहां है। शायद जीवन भर गंध स्‍थल नहीं जान पाता। हम कस्‍तूरी मृग जैसे अबोध नहीं हैं। कुछ देर बहार की तलाश में भटके जरुर परन्‍तु फिर बहार को पा ही लिया-हम महल में भटक रहे थे और बहार इस कमरे में थी।'
-‘तशरीफ रखिये।'
-‘ओह हां। लेकिन यह सब किस लिए?'
-‘आपके लिये।'
-‘क्‍या कहने हैं, जब मैं जीता हूं तो यह कहते हैं कि मरना होगा-और जब मैं मरता हूं तो कहते हैं कि जीना होगा। हुजूर मैंने तो राव साहब से भी इन्‍कार कर दिया कि मैं नहीं पियूंगा।'
-‘ठीक किया।'
-‘लेकिन अब?'
-‘आप सिर्फ दो पैग लेंगे। हमारे साथ, हमारे हाथों से।'
-‘हुक्‍म बजा लाउंगा। वैसे मैंने यह तय किया था अब नहीं पियूंगा।'
-‘कैसे कहें कुंवरसाहब कि हमारी सौगन्‍ध का इतना आदर करके आपने हमें बिना मोल खरीद लिया है।'
-‘बिक तो हम गए सरकार।'
दृष्‍टि मिली और दोनों हंस पड़े।
तभी छम छमा छम की आवाज सुनकर दोनों चौंक पड़े।
दासी केतकी आई थी। भला दासी को क्‍या शर्म और झिझक। कमरे में प्रविष्‍ट होकर कुंवरसाहब को आदाब बजाया और अपनी घाघरी घुटनों तक उठाकर बोली-‘राजकुंवरी जी देखिए मैले घुंघरु आपको पसन्‍द नहीं थे न-आज इन्‍हें सुनार से उजलवा लिए हैं। कहिए तो बांध दूं पांवों मेंं कुंवरसाहब भी जान लेंगे कि आप कितना अच्‍छा नाचती हैं। कोई मजाक है! धन्‍नो बाई ने सिखाया है।'
-‘हट यहां से।' आंखें तरेर कर मालविका बोली-‘रख कर आ इन्‍हें ।'
कुंवरसाहब ने टोका-‘शायद आप हमारे सामने नाचना पसन्‍द नहीं करेंगी। हम आपको मजबूर नहीं करेंगे। लेकिन घुंघरु बंधवाने में क्‍या हर्ज है। चलेंगी तो छनछनाएंगे। हमें अच्‍छा लगेगा।'
मालविका आग्रह टाल नहीं सकी थी।
दासी केतकी ने तुरन्‍त ही मालविका के पांवों में घुंघरु बांध दिए। फिर शरारत से मुस्‍कराती हुई चली गई।
इसके बाद दो दो पैग हुए। कुंवरसाहब को मालविका ने अपने हाथों से पिलाई, स्‍वयं ने कुंवरसाहब के हाथों से पी।
मालविका का रंग और निखरा। उसने कुंवरसाहब से खाने का अनुरोध किया।
-‘हमें भूख नहीं है।'
-‘यह क्‍या बात हुई।'
-‘कुछ नाराजगी भी है। बेहतर यह हो कि आप हमसे खाने के लिए न कहें और हम आपसे न गीत सुनाने को कहेंगे और न नाचने को।'
-‘आप बड़े वो हैं।' वह इठला उठी।
-‘अब जो हैं वहीं हैं। कैसे बदल जाएं। सही बात यह है कि हम रुठ गए हैं।'
-‘हम मना लेंगे।'
-‘हमारी शर्त है।'
-‘मान लेंगे सरकार आपकी शर्त भी। आपके हाथों बेदाम बिक जो गए हैं।' मालविका उठकर खड़ी हो गई।
ठीक कुंवरसाहब के सम्‍मुख खड़ी होकर वह बोली-‘आपका वर्षा गीत . ... .।'
-‘वही गीत क्‍यों? क्‍या बहुत अधिक पसन्‍द है?'
-‘बहुत ही अधिक . ... .सुनिये . ... .।'
साज बने चांदी के उजले घुंघरु। ताल बने नृत्‍यमग्‍न पांव मालविका ने गाया-
लाज लजीली नवल वधू सी ओढ़े हरी चुनरिया,
ले अंगड़ाई धरती जागी ढलती देख दुपहरिया ।
जब जब सावन भादों बरसे पवन चली पुरवाई,
जब जब पड़ी फुहार आंगना याद तुम्‍हारी आई।
नृत्‍य सहित मालविका ने गीत का एक छन्‍द गाया और कुंवरसाहब मोहित हो गए। नाचती मालविका को आवेश वश उन्‍होंने अपनी बांहों में भर लिया।
परन्‍तु दूसरे ही क्षण चौंक कर उन्‍होंने पूछा-‘क्‍या हमसे गलती हुई?'
-‘नहीं तो।' मादक मालविका ने कहा।
0000
क्‍या वह चेहरा भूला जा सकेगा?
मलविका का चेहरा!
तब जब कुंवरसाहब प्रथम बार रानी गढ़ी से लौट रहे थे।
मालविका उनके साथ राजस्‍थान की सीमा तक साथ आई थी। उसकी कार पीछे-पीछे ड्राईवर लेकर आ रहा था। और कुंवरसाहब के साथ बैठ कर आई। राजस्‍थान की सीमा रेखा थी।
-‘बस कुंवरसाहब।'
-‘गाड़ी रोको भौंपू।'
कुंवरसाहब ने आदेश दिया था।
यह दिन का तीसरा पहर था। मालविका फलास्‍क में चाय तथा तीसरे पहर के नाश्‍ते के लिये सभी वस्‍तुएं तैयार कर लाई थी।
सीमा चौकी के निकट ही एक पेड़ के नीचे चाय आदि का आयोजन हुआ।
-‘अब हमें इजाजत दीजिए राजकुंवरी जी। आधी रात के बाद घर पंहुचना होगा।'
कुंवरसाहब की बात सुनकर मालविका ही आंखें डबडबा आईं थीं।
-‘राजकुंवरी।'
वह रो पड़ी थी।
-‘राजकुंवरी जी।'
-‘जाइए, नमस्‍कार।' इतना कहकर दोनों हाथों से मुंह ढांपकर वह सड़क से दूर वृक्षों के कुंज की ओर चली गई।
पीछे पीछे जाकर कुंवरसाहब ने अपने हाथों से मालविका के आंसू पोंछे।
-‘कब आइएगा?'
-‘जब आपका हुक्‍म होगा।'
-‘आप हमें बहुत याद आएंगे।'
-‘क्‍या कहें . ... .मजबूरी जो है। आपके ही तो पण्‍डित जी कहते हैं कि इस वर्ष विवाह न हो सकेगा।'
-‘पण्‍डित जी को आप गोली नहीं मार सकते?'
-‘जरुर मार सकता हूं। लेकिन उसके हिमायती रावसाहब हैं उनका क्‍या करुं?'
-‘हमें अभी अपने साथ ले चलिए।'
-‘मुझे कब इन्‍कार है।'
अनायास ही राजकुंवरी मुस्‍करा दी-‘आपके इलाके में यह होगा कि कुछ लोग कहेंगे कुंवरसाहब राजस्‍थान से एक स्‍त्री को भगा लाए हैं। हमारे इलाके में लोग कहेंगे राजकुंवरी भाग गई।'
-‘बेशक कहेंगे। लेकिन राजकुंवरी जी इस बदनामी में भी खास मजा रहेगा।'
-‘जाइए मैं नहीं बोलती। आपको हंसी सूझ रही है। कुंवरसाहब सचमुच एक साल की लम्‍बी प्रतीक्षा तो हमें घुला घुला कर मार देगी।'
-‘हम राजकुंवरी साहिबा के हुजूर में दो महीने बाद फिर आयेंगे।'
-‘सच?'
-‘हम वायदा करते हैं कि साल में छः बार आपके हुजूर में हाजिर होंगे।'
-‘सच कह रहे हैं न?'
-‘बिल्‍कुल सच। छः बार आने का हमारे पास बाकायदा बहाना है।'
-‘बहाना क्‍या है हम भी तो सुनें।'
-‘देखिए अब है अक्‍तूबर का महीना। गर्व की बात नहीं है हमारी भूमि गंगा मां की भूमि है। वहां आपका एक बाग है।'
-‘ओह!'
-‘नवम्‍बर में अमरुद पकेंगे। बहाना है कि नवम्‍बर में अमरुद की सौगात लेकर आपकी खिदमत में हाजिर हुए हैं। अमरुद की खास पौध इलाहाबाद से मंगवाई थी, आप पसन्‍द करेंगी।'
-‘बहुत खूब। नवम्‍बर के बाद जनवरी!'
-‘जनवरी में आपके कालेज का कवि सम्‍मेलन होता है।'
-‘वाकई . ... .फिर मार्च।'
-‘मार्च में राजा के बाग में बेर लगते हैं वह सौगात लेकर आयेंगे।'
-‘फिर मई?'
-‘मई में हमारे खेतों में खरबूजा पकता है।'
-‘लाजवाब! फिर जुलाई।'
-‘राजा के बाग में अट्‌ठाइस प्रकार के आम हैं।'
-‘इसके बाद सितम्‍बर!'
-‘कश्‍मीर का सीजन है। वहां मुलाकात होगी।'
-‘दिल को चैन मिला।'
-‘सितम्‍बर के बाद फिर नवम्‍बर की बात सुने बिना कैसे चैन मिलेगा राजकुंवरी जी। नवम्‍बर में आकर हम रावजी से कहेंगे कि ।'
-‘क्‍या कहियेगा।'
-‘आप ही कहिए।'
-‘नहीं आप कहिए।'
-‘कहेंगे कि वर्ष भर की कैद पूरी हो गई अब तो हमारी अमानत हमें दे दीजिये।'
-‘ओह!'
-‘अब इजाजत है?'
-‘जी।'
-‘आइए।'
कुंवरसाहब ने मालविका का हाथ थाम लिया।
उधर दोनों कारों के ड्राईवर आतुर थे। विशेषकर भौंपू उसे तो अभी बहुत दूर जाना था।
पहले कुंवरसाहब ने मालविका को गाड़ी में बैठाया था।
तब हवा तेज चल रही थी। मालविका के यत्‍न से संवारे हुए केश अस्‍त व्‍यस्‍त हो गए थे। बार-बार चेहरे पर लटें झूल झूल जाती थीं।
वह आकुल चेहरा!
क्‍या वह चेहरा भूला जा सकेगा।
मलविका ने जैसे कुंवरसाहब पर जादू कर दिया था।
लौटकर कुंवरसाहब ने जब शराब छोड़ देने की बात रानी मां से कही थी तो वह सुनकर सुखद आश्‍चर्य से कुछ क्षण पुत्र को निहारती रही थीं।
गुप्‍ता जी तो विश्‍वास ही न कर सके थे।
और कुंवरसाहब के कवि मित्र ।
सबसे अधिक पीड़ा हुई कुंवरसाहब के मित्रों को। पहले तो रतनपुर पैलेस में कवियों के लिये सुरा सरिता बहती थी। एक कवि ने तो कह दिया-‘कुंवरसाहब आपने तो तौबा कर ली। यह तो कहिए कि हम जैसे बिना झोली के फकीर अब कहां जायें?'
और कुंवरसाहब ने अपनी गलती सुधार ली। कवि मित्रों के पीने की व्‍यवस्‍था कर देते थे।
शराब छोड़ देना कुंवरसाहब के जीवन में बहुत बड़ा इन्‍कलाब था।
लेकिन पूरे वर्ष में कुंवरसाहब ने चार बार मालविका के हाथ से शराब पी बस!
अपने वायदे के अनुसार वह प्रति दूसरे माह रानीगढ़ी जाते रहे।
0000
तब शायद रात के बारह बजे थे, या बारह से कुछ अधिक। कुंवरसाहब के कमरे की पश्‍चिमी खिड़की से चांद झांक रहा था।
यादों की नींद ने जैसे करवट ली।
-‘कोई है ?'
-‘हाजिर हुजूर!' नौकर बाहर से ही बोला।
नौकर आया। उसकी ओर देखे बिना ही उन्‍होंने कहा-‘भौंपू को बुलाओ।'
भौंपू सो चुका था। आने में देर हुई। परन्‍तु अपने मालिक की वह जितनी इज्‍जत करता था उतना ही स्‍नेह भी।
जब आया तो बाकायदा तैयार होकर। वर्दी से लैस।
-‘बाजार चले जाओ। मेरा मतलब है राधा के कोठे पर। उससे कहना कि कुंवरसाहब ने कार भेजी है। फौरन बुलाया है।'
तभी जैसे दीवार घड़ी ने टोका-टन !
साढ़े बारह बजे थे।
-‘सुनो भौंपू ।'
-‘सरकार।'
-‘रहने दो। शायद इस वक्‍त वह सो चुकी होगी। जगाना और बुलाना, नहीं रहने दो।'
-‘जैसे हुजूर मुनासिब समझें।'
-‘हम कुछ समझ ही तो नहीं पा रहे हैं भौंपू। हमारा तो समझ लो कि दिमाग खराब हो गया है। नींद नहीं आ रही है और शायद आएगी भी नहीं लेकिन जाओ भौंपू। इस समय राधा को बुलाना ठीक नहीं होगा। जाओ . ... .।'
-‘भौंपू लौट गया।'
कुंवरसाहब ने लाइट बुझा कर सोने का उपक्रम किया।
परन्‍तु नींद तो निष्‍ठुर प्रिया की भांति रुठ गई थी।
वही बीते अतीत की बातें।
मस्‍तिष्‍क के दृश्‍य पर एक के बाद एक।
मालविका के लिये कुंवरसाहब ने शराब छोड़ दी थी।
प्रत्‍येक दूसरे दिन कुंवरसाहब मालविका को पत्र लिखते थे।
शराब छूट गई और बहुत कुछ छूट गया परन्‍तु राधा नहीं छूटी।
कुंवरसाहब ने मन से राधा को छोड़ना चाहा था, परन्‍तु राधा के स्‍नेह और आदर के बंधन इतने मजबूत थे कि उन्‍हें तोड़ा नहीं जा सका।
राधा !
जैसे वह निगरानी रखती थी कि कुंवरसाहब कब बाहर से नगर में आए।
एक दिन वह लौटे तो राधा के सन्‍देशवाहक ने आकर कहा-‘हुजूर कुंवरसाहब राधा ने सलाम भेजा है। कहा है कि दीदार को आंखें तरस गईं।'
सन्‍देश वाहक को टालते हुए कह दिया-‘आएंगे।'
अगले सप्‍ताह सन्‍देश फिर मिला।
कुंवरसाहब ने फिर टाल दिया।
चौथे दिन संदेश वाहक फिर आया। अबकी बार वह राधा का पत्र लाया था। लिखा था-हुजूर क्‍या ऐसे ही तड़पाते रहिएगा। यहां आने में हिचक हो तो बन्‍दी को पैलेस में आकर सलाम बजाने का हुक्‍म मिले !
कुंवरसाहब ने लिखा-जरुर आएंगे।
परन्‍तु कुंवरसाहब गये नहीं और एक दिन !
खबर मिली कि बाहर सड़क पर रिक्‍शा खड़ी है। राधा आई है।
और जैसे कुंवरसाहब की तपस्‍या भंग हो गई।
उन्‍होंने राधा को बुलवा लिया। राधा दोपहर को आई थी और आधी रात को लौटी, उस रात कोठे पर मुजरा नहीं हुआ।
दस बजे के बाद कुंवरसाहब राधा को सैर के लिए ले गए। इससे पहले और बातें ही होती रही थीं। महत्‍वपूर्ण बातें क्‍लब की फुलवारी में हुईं।
-‘कुंवरसाहब . ... .।'
-‘जी साहब।'
-‘हमें कुछ कहना है।'
-‘जरुर कहिए।'
-‘कल हमने बेशर्मी साधकर गुप्‍ता जी की दुकान में पांव रक्‍खा। उनसे आपकी नाराजगी की वजह जाननी चाही। वह कह रहे थे कि आपने अपनी दुल्‍हन से वायदा किया है कि शराब नहीं पियेंगे, कोठे पर नहीं जायेंगे।'
कुंवरसाहब मौन रहे।
-‘बताइए न, क्‍या गुप्‍ता जी ठीक कह रहे थे।'
-‘किसी हद तक।'
-‘अब हम अपनी तरफ से कुछ कहने की इजाजत चाहेंगे।'
-‘कहो।'
-‘क्‍या हमने कभी हाथ बढ़ाकर आपसे रुपया पैसा मांगा है?'
-‘बात बेमतलब है।'
-‘बात का मतलब है कुंवरसाहब। किस्‍मत से कौन लड़े। किस्‍मत में ही तो लिखा है कि हम कोठे पर बैठें। बाजारु औरत कहलाएं। यह सब किस्‍मत की बातें हैं।'
-‘ठीक कहती हो।'
-‘लेकिन एक औरत हमेशा औरत ही रहती है। घर की रानी बने चाहे कोठे की नाचने वाली। औरत हर हालत में औरत ही रहती है। वह बे जबान गाय नहीं बन सकती। औरत के भी दिल और दिमाग होता है। वह भी कुछ चाहती है और कुछ नहीं चाहती।'
-‘अच्‍छा . ... .अच्‍छा राधा। अब यह सब पुराण बन्‍द भी करो।'
-‘आज मुझे कह ही लेने दीजिए न ! अपनी अपनी नजर ही तो है। मैंने आपको कुंवरसाहब के रुप में कभी नहीं देखा। मैंने आपको देखा है कवि के रुप में। आप कवि के रुप में मेरे यहां आएं।'
-‘आउंगा राधा, आउंगा।'
-‘आपके कवि रुप में मेरी पुरानी दोस्‍ती है। जायज बात कर रही हूं नाजायज नहीं। मैंने आपके गीत गाए हैं . ... .और . ... .।'
कुंवरसाहब को ऐसा लगा जैसे राधा एक शक्‍तिशाली चुम्‍बक है जो निरन्‍तर उन्‍हें अपनी ओर खींचने की क्षमता रखती है। कुंवरसाहब को आने का वादा करना पड़ा। यूं ही नहीं, राधा के सिर पर हाथ रखकर उन्‍होंने उससे वादा किया।
और वह अक्‍सर जाते रहे। अक्‍सर राधा भी पैलेस में आती रही।
लोग कहते थे कि राधा कुंवरसाहब को दोनों हाथों से लूट रही है। परन्‍तु वास्‍तविक परिस्‍थिति कुछ और ही थी।
यह कुंवरसाहब की शान के खिलाफ था कि वह राधा के कोठे पर जाएं और कुछ दें नहीं।
दूसरी ओर जब भी कुंवरसाहब उसे कोठे पर कुछ देते तो वह लेने से इन्‍कार कर देती और वह नोट फेंक कर चले आते। परन्‍तु कोठे से नीचे या कहीं और जब वह कुछ देते तो वह इन्‍कार नहीं करती-कुंवरसाहब की इज्‍जत का भी तो सवाल था।
जब भी कुंवरसाहब रानीगढ़ी से लौटते तो कई दिन राधा के कोठे पर नहीं जाते थे। परन्‍तु जब चार पांच दिन बीत जाते तो अधीर हो जाते !
एक बार नहीं कई बार राधा ने कुंवरसाहब के लिए अग्‍नि परीक्षा दी थी और खालिस कुन्‍दन बनकर निकली थी।
एक बार नुमाइश में !
राधा शहर के बहुत बड़े रईसजादे के साथ नुमाइश में आई थी। यकीनन वह कुंवरसाहब से कई गुना बड़ा आसामी था। चीनी मिल और न जाने क्‍या क्‍या उसकी सम्‍पत्‍ति थी।
एक कवि ने राधा को उस रईसजादे के साथ देख लिया।
उसने कुंवरसाहब से कहा-‘कुंवरसाहब राधा को तो आपके डेरे में होना चाहिये। वह उसके साथ . ... .।'
कुंवरसाहब ने ड्राईवर भौंपू को भेज दिया-‘जाओ राधा को बुला लाओ।'
भौंपू ने सन्‍देश राधा को दिया।
राधा ने रईसजादे से इजाजत मांगी।
रईसजादे की कुंवरसाहब से कुछ लगती भी थी। उसने पूछा-‘जाना चाहती हो?'
-‘हां।'
-‘एक फैसला करके जाना होगा।'
-‘हां। आज से तुम्‍हारा किसी एक के साथ सम्‍बन्‍ध रहेगा . ... .मेरे साथ या कुंवरसाहब के साथ।'
राधा ने एक क्षण भी नहीं सोचा। मुस्‍करा कर बोली-‘तो फैसला हो गया। मैं जा रही हूं।'
और राधा कुंवरसाहब के डेरे पर पंहुच गई।
डेरे में कुंवरसाहब के कई और मित्र भी थे। राधा वह सब बातें कुंवरसाहब को नहीं बतानी चाहती थी, परन्‍तु भौंपू तो भौंपू ठहरा उसने वहां हुई सब बातें बता दीं।
-‘यह तुमने अच्‍छा नहीं किया राधा।'
-‘क्‍या अच्‍छा नहीं किया?'
-‘भई हम तो गए जमाने के आदमी हैं। ऐसे कुएं का पानी पीते हैं जिसके स्‍त्रोत बन्‍द हो चुके हैं। चन्‍दनलाल तो बहती नदी हैं।'
-‘जी।' शरारत की सी मुद्रा में वह मुस्‍करा दी
-‘तुम्‍हें नहीं आना चाहिए था।'
-‘सलाह के लिए शुक्रिया।'
-‘हमने तो यहां तक सुना था कि वह तुम्‍हारे लिए नई कालोनी में कोठी बनवाने का इरादा रखते हैं।'
-‘अब बस भी कीजिए हुजूर।'
-‘लेकिन कोठी?'
-‘हमें हमारा कोठा मुबारक।'
यह बातें अकेले में तो हुई नहीं थीं, कुंवरसाहब के कई और मित्र भी डेरे में थे। राधा के बारे में अब तक जो सभी ने सुना था और सुन कर जो विचार बनाये थे उन्‍हें यह सुनकर आश्‍चर्य हुआ।
वहां एक और भी कुंवर उपस्‍थित थे, कुंवर दलजीत सिंह ! शिकार के बहुत प्रेमी थे। और कुंवरसाहब की ननिहाल के रिश्‍ते से भाई लगते थे।
उन्‍होंने टोका-‘बाई जी ।'
-‘राधा कहिए न . ... .।'
-‘यूं ही सही। राधा जी हम बात फिर उठाने को मजबूर हैं। शायद आपको हमारी बात पसन्‍द न आए। लेकिन हमने जमाना देखा है। जब कुंवरसाहब आपको खुद मौका दे रहे हैं तो आपको उन साहब के पास चले जाना चाहिए।'
-‘क्‍यों?'
-‘इसलिए कि मैं मुंह देखी नहीं साफ बात कहने का आदी हूं।'
-‘तो कहिए न !'
-‘पहले आप अपनी हकीकत जानिए। जानती हैं तो समझिए।'
-‘आप समझाइए।'
-‘आपने माना है कि आप कोठे वाली हैं।'
-‘जवानी चार दिन की होती है।'
-‘ठीक।'
-‘जब तक जवानी है सभी कच्‍चे धागे में बन्‍धे खिंचे चले आते हैं। जवानी न रहेगी तो ग्राहक भी न रहेंगे, जिन्‍दगी का क्‍या पता। जिन्‍दगी बिताने के लिए चाहिए पैसा, और जहां से पैसा मिले बटोरना चाहिए-जवानी साथ नहीं देगी, जिन्‍दगी रहेगी तो पैसा साथ देगा।'
-‘कुछ और?'
-‘क्‍या आप हमारी बात को गलत साबित कर सकती हैं?'
-‘जी हां।'
-‘कैसे?'
-‘मैं कोठे वाली हूं, थोड़ी सी दौलत शायद बिखेर सकती हूं इज्‍जत नहीं।'
-‘ठीक।'
-‘मीरा ने जिस कृष्‍ण की साधना की वास्‍तव में वह पत्‍थर की मूर्ति थी।'
-‘क्‍या मतलब?'
-‘क्‍या कोई कह सकता है कि कृष्‍ण भक्‍ति में मीरा को आनन्‍द नहीं मिला।'
-‘भक्‍तों और तपस्‍वीयों की बात और होती है।'
-‘भक्‍ति और तप पर किसी का इजारा नहीं होता। मीरा ने जिस कृष्‍ण की भक्‍ति की थी वह तो मूर्ति थे, मैं मनुष्‍य रुपी कृष्‍ण की भक्‍त हूं।'
-‘घाटे में रहोगी।'
-‘भक्‍ति व्‍यापार नहीं है। सुख की व्‍याख्‍या नहीं की जा सकती। कभी-कभी महलों में भी सुख नहीं मिलता। अगर महलों में सुख होता तो रानी पिंगला और राजा भृतहरि को कोई न जानता। सुख होता है मन के सन्‍तोष से। कौन कहता है कि मखमल से लदा राजा सुखी है और कौन कह सकता है कि चिथड़ों में लिपटा बैरागी दुखी है . ... .।'
कुंवर दलजीत तो हतप्रभ रह गया। कोठे वाली इतनी गूढ़ बात इतने सहज ढंग से कह जाएगी उसने सोचा भी न था।
दलजीत की स्‍थिति भांपते हुए कुंवरसाहब बोले-‘छोड़ो भाई . ... .कहां किस बहस में पड़ गए। राधा तो पागल है।'
राधा मुस्‍कराई-‘पागल नहीं हूं कुंवरसाहब, दीवानी हूं किसी की दीवानी।'
-‘जो भी हो रहो, हमें एतराज नहीं है। हमने झोंक में तुम्‍हें बुला जरुर लिया- सच्‍ची बात तो यह है कि जब यहां सभी लोग इकट्‌ठे होते हैं तो मजुवा के दही बड़े और रामू की पकौड़ी जरुर खाते हैं।यह खायेंगे और तुम देखती रहोगी।'
-‘मैं क्‍यों देखती रहूंगी?'
-‘तेल और खटाई की चीजें हैं न, इन्‍हें खाने से क्‍या आवाज खराब नहीं होती?'
राधा हंस दी।
कुंवरसाहब भी तो बहस को टालना ही चाहते थे।
राधा बोली-‘कुंवरसाहब एक बात का हमें पक्‍का विश्‍वास है, आप अगर अपने हाथ से हमें जहर भी देंगे तो अमृत हो जाएगा। जो खिलाइएगा हम सभी कुछ खा लेंगे . ... .अगर अपने हाथ से खिलाएंगे तो . ... .।'
एक कवि बोले-‘यह भी होगी, कुंवरसाहब आज यह भी होगी।'
और फिर बातचीत का यह विषय बदला गया।
हंसी दिल्‍लगी की और बातें चल पड़ीं। गीत और गजल के चर्चे होने लगे।
इसके बाद . ... .।
रईसजादे ने राधा से सम्‍बन्‍ध समाप्‍त कर दिया। कुंवरसाहब ने किसी से यह कभी नहीं सुना कि राधा को उस सम्‍बन्‍ध के टूटने का मलाल है।
यह बात थी मार्च की। मई में कुंवरसाहब को मौसमी बुखार हुआ। कई दिन तेज बुखार में रहे। दिन में नौकरों की देखभाल रहती थी और रात में राधा आ जाती थी, सारी रात जागती थी।
बुखार के बाद स्‍वास्‍थ्‍य लाभ करके कुंवरसाहब जब कोठे पर पंहुचे तो तीसरा पहर था। उस समय दिल्‍ली के एक व्‍यापारी के लिए मुजरा चल रहा था।
-‘अब मुजरा नहीं होगा।'
शायद इस जिद के कारण काफी आर्थिक हानि हुई राधा को। यहां तक कि कुंवरसाहब ने भी कहा कि मुजरा जारी रहे परन्‍तु राधा अपने नाम की एक ही जिद्‌दी थी।
कुंवरसाहब ने पूछा-‘यह तुम्‍हें क्‍या हो गया है राधा?'
-‘शायद कुछ हो ही गया है . ... .नाम राधा है न। इसीलिए राधा का भाग्‍य लेकर जन्‍मी हूं। सतयुग की राधा तो बांसुरी की धुन दूर से ही सुनकर सुधबुध खो देती थी। मैं कल युग की राधा जब निकट से अपने कृष्‍ण को देखूं तो मुझे कैसे कुछ न हो?'
मालविका और राधा !
मालविका के लिए शराब तो छूट गई थी परन्‍तु राधा नहीं छूटी थी।
शायद इसलिये कि राधा में कुछ गुण थे। गुणों के समूह ने मिलकर चुम्‍बक का निर्माण किया था।
राधा . ... .मालविका !
मालविका . ... .राधा !!
केवल राधा।
मालविका तो अब सपना हो गई थी।

--
(क्रमशः अगले अंकों में जारी….)

(पिछले अंक से जारी…)

हवेली का नाम था-रतनपुर पैलेस।
जमींदारी उन्‍मूलन से पहले इस हवेली के स्‍वामियों की जागीर इसी नाम से पुकारी जाती थी-अब भी रतनपुर कस्‍बे में किले के प्रकार का बेमतलब महल है।
हवेली में कुल मिलाकर छोटे बड़े पच्‍चीस कमरे हैं। नीचे ग्‍यारह। दस कमरे और बड़ा हाल नुमा कमरा।
इतनी बड़ी हवेली की सफाई कौन करे? इसलिए उपर की मन्‍जिल लगभग बन्‍द रहती है। कभी त्‍यौहार पर ही झाड़-पोंछ होती है। नीचे के कमरे भी सब रोज साफ नहीं किये जाते थे। एक कुंवरसाहब का कमरा, दूसरा बूढ़ी रानी साहिबा का कमरा। इस के अतिरिक्‍त आंगन बरामदे आदि तथा हाल यह रोज साफ होते हैं। नौकर सीमित हैं न!
सर्दियों के मौसम में रानी साहिबा गठिया रोग के कारण अधिक चल फिर नहीं सकतीं। उन्‍हें रानी कहिए या इस हवेली की बन्‍दिनी।
कुंवरसाहब की कार हवेली में प्रविष्‍ट हुई।
लड़खड़ाते से कुंवर साहब कार से उतरे। सीधे मां के कमरे में पंहुचे-प्रणाम करने।
पुत्र को आया देख कराहती सी रानी साहिबा बैठ गईं। पुत्र के सिर पर हाथ फेरा-‘जीते रहो, बहुत उम्र हो। सीधे रानीगढ़ी से आ रहे हो?'
-‘जी।'
-‘राव साहब अच्‍छे हैं?'
-‘सब अच्‍छे हैं?'
-‘विवाह की तारीख तय हुई?'
-‘नहीं।'
-‘क्‍यों?'
-‘अब विवाह नहीं होगा।'
रानी बोली-‘हम देख रहे हैं कि आज आप शराब के नशे में हैं। जाइये, हम सुबह बात करेंगे।'
-‘जो हुक्‍म, लेकिन रानी मां मैं . ... .मैं . ... .मैं वहां से सम्‍बन्‍ध तोड़ आया हूं।'
-‘ कुंवरसाहब . ... .।' रानी मां ने डांट कर कहा।
-‘राव साहब की नजर में हम भिखारी हो गये हैं। वह राजकुमारी मालविका को भिखारी के हाथों ब्‍याहने के लिये तैयार नहीं हैं।'
-‘हम समझ नहीं रहे हैं कुंवरसाहब।'
-‘जीजा जी वाली बात राव साहब तक पंहुच गई है।'
-‘तो इससे क्‍या?'
-‘राव साहब का ख्‍याल है कि मुझे अपनी बहन से मुकदमा लड़ना चाहिये था। एक लाख रुपया देने का प्रस्‍ताव नहीं करना चाहिये था।'
रानी मौन रही। अलबत्‍ता चेहरे से वह व्‍याकुल सी लगती थी।
कुंवरसाहब फिर बोले-‘राव साहब ने आपके नाम एक पत्र भी दिया है। हुक्‍म हो तो पढ़ कर सुनाउं।'
-‘सुनें तो क्‍या लिखा है?'
कुंवरसाहब ने जेब से एक कागज निकाला।
पत्र पढ़ना आरम्‍भ किया।
रानी साहिबा को राम राम बंचना।
आगे हाल यह है कि आपने दामाद जी की धमकी से घबरा कर उन्‍हें जो लाख रुपये नकद दिये वह मुनासिब नहीं है। मामला मुकदमा करके भी लड़की जायदाद में इतनी आसानी से हिस्‍सा नहीं पा जाती। खैर आपका मामला था, आप जानें। मैं कुंवरसाहब से राजकुमारी की मंगनी तोड़ रहा हूं। इसलिए कि मुझे यह स्‍वीकार नहीं है कि मेरी बेटी आप जैसे दानी हरिश्‍चन्‍द्र के घराने में ब्‍याही जाये और जिन्‍दगी कंगाली में बिताये।
राघव राजा भरतसिंह।
सुनकर रानी की आंखें छलछला उठीं-‘मैंने तो पहले ही आपसे कहा था कुंवर जी। आपको चाहिए था कि दामाद जी को मुकदमा करने देते। एक लाख बहुत होते हैं ।'
-‘एक लाख कितने होते हैं मैं जानता हूं रानी मां। परन्‍तु मुकदमा लड़कर मैं बहन की जिन्‍दगी को नरक नहीं बना सकता था।'
रानी ने निश्‍वास ली-‘अब क्‍या करें?'
-‘मुझे कुछ कहने की इजाजत है रानी मां?'
-‘क्‍या?'
-‘मैंने तो देखा नहीं। आपके मुंह से ही सुना है जो किसान बेगार से इन्‍कार करता था दादा जी उसे हाथी के पांव से बांधकर खिंचवाते थे। किसान से लगान वसूल न हो तो बांधकर बेंतों से पिटवा देना पूज्‍य पिताजी के लिये मामूली बात थी . ... .यह पाप था ।'
-‘कुंवरसाहब।' चीखती सी रानी बोलीं-‘जो बुजुर्ग मर गए हैं उन्‍हें कोसना आपको शोभा नहीं देता।'
-‘उनके पाप मुझे भरने होंगे रानी मां। आप खूब जानती हैं कि अब हम कुछ नहीं हैं। लकीर पीटना मुझे पसन्‍द नहीं है इसलिये आपको मुझसे वादा करना होगा कि आप किसी भी राजा प्रकार के खानदान में मेरे विवाह की बात नहीं चलाएंगी।'
-‘तो क्‍या हमारे कुंवर भिखारी खानदान में विवाह करेंगे?'
-‘मुझे एतराज नहीं होगा।'
-‘जाकर आराम कीजिये . ... .शायद आपको नशा ज्‍यादह है।'
-‘जी।'
कुंवरसाहब साहब झुके। रानी मां के चरण स्‍पर्श किये और लौट पड़े।
वह सीधे अपने कमरे में पंहुचे।
नौकर आया-‘खाना बनाउं हुजूर?'
-‘नहीं।'
-‘दूध लेंगे?'
-‘नहीं।'
नौकर लौटने लगा। कुंवरसाहब ने आदेश दिया-‘कार में बोतल रखी है उसे ले आओ।'
नौकर बोतल मेज पर रख गया।
सूट पहने ही कुंवरसाहब बिस्‍तर पर लेट गये।
फिर उठे। बोतल से मुंह लगाकर उन्‍होंने कुछ घूंट व्‍हिस्‍की ली।
अब वह सो जाना चाहते थे।
परन्‍तु मन बार-बार रानीगढ़ के महल पर मंडराने लगा था।
एक के बाद एक स्‍मृति!
रानीगढ़ी, राव साहब और मालविका।
राजकुमारी मालविका।
0000
नशा कुछ तेज था।
और जिस मनोव्‍यथा को भूल जाने के लिये नशा चल रहा था वह मनोव्‍यथा घट नहीं रही थी।
आज ही तो यह चार लाइनें रची गईं थीं ः
जिन्‍दगी क्‍या है, क्‍या बताउं मैं,
एक गूंगे का ख्‍वाब हो जैसे ।
या किसी सूद खोर बनिए का,
उलझा उलझा हिसाब हो जैसे ।
क्‍या करें!
किससे मन का दुख कहें। किसी से कहें भी तो क्‍या होगा। शीशा टूट जाता है तो जुड़ता नहीं।
जो नहीं होता उसके लिये तो मात्र खेद ही होता है, परन्‍तु जो पास होता है, वह छिन जाये तो, खो जाये तो . ... .ओह!
मस्‍तिष्‍क से पाप पुण्‍य की समीक्षा होने लगती है।
एक अभिशाप!
एक जागीरदार घराने में जन्‍म।
एक ऐसी व्‍यवस्‍था का अन्‍तिम चिराग जो मिट चुकी है और जिसे मिट जाना चाहिये भी था।
जिन्‍दगी चल रही थी, अथवा घिसट रही थी। बुरी नहीं थी।
हां, वह जिन्‍दगी भी बुरी नहीं थी।
कुंवरसाहब के गीत रेडियो पर, कवि सम्‍मेलनों में गूंजते थे, सराहे जाते थे।
साथी नम्‍बर एक थी शराब . ... .। पीते थे, झूमते थे, लड़खड़ाते थे और बेहोशी के आलम में खो जाते थे।
साथी नम्‍बर दो थी राधा। लोग जाने क्‍या क्‍या कहते थे, परन्‍तु इससे क्‍या जब वह बाहों में होती थी तब सुख मिलता था।
इसके बाद ।
एक सब्‍ज बाग।
उस सब्‍ज बाग ने कुंवरसाहब को लुभा लिया।
शराब जो मुद्‌दत से साथी थी छूट गई, राधा छूट तो न पाई परन्‍तु राधा से रिश्‍ता मानो औपचारिक रह गया था।
सभी मित्र कहते थे- कुंवरसाहब में जबरदस्‍त सुधार आया है।
परन्‍तु . ... .।
जैसे कि ताश का एक महल था जो ढह गया।
ताश का महल ढह गया और शेष रह गया सन्‍ताप।
यूं हर इन्‍सान की मन्‍जिल एक है-हर इन्‍सान की कहानी समाप्‍त होती है। मृत्‍यु पूर्ण विराम है।
परन्‍तु कहते हैं जीवन अमूल्‍य है।
आत्‍महत्‍या पाप है।
परन्‍तु ऐसा भी होता है ।
जब जिन्‍दगी बोझ बन जाती है, जब इन्‍सान जीवन के बोझ से कराह उठता है।
जिन्‍दगी की जरुरत है, भूख और प्‍यास।
हां, जरुरत मुख्‍य रुप से दो ही हैं।
परन्‍तु भूख और प्‍यास के प्रकार बहुत से हैं। पेट की भूख के अतिरिक्‍त मस्‍तिष्‍क की भूख भी तो है, शरीर की भूख भी तो है। प्‍यास के भी प्रकार हैं।
शराब और वेश्‍या।
शुभचिन्‍तक और मित्र सभी कुंवरसाहब को सलाह देते हैं।
शराब छोड़ दो, वेश्‍या का साथ छोड़ दो।
क्‍यों? यह प्रश्‍न कुंवरसाहब ने कभी सीधा नहीं किया।
दुनिया की जानी मानी बात है।
शराब तबाह कर देती है-शराब को मुंह लगाना तबाही को निमन्‍त्रण देना है। आज से नहीं युगों युगों से कहा जाता है।
और वेश्‍या ।
हां, यह भी तो कहा जाता है। वेश्‍या . ... .वेश्‍या तो वेश्‍या ही है। तबाही का रास्‍ता।
कही सुनी बातें तो ठीक हैं।
लेकिन कुछ सवाल हैं . ... .।
इन्‍सान क्‍यों शराब या किसी नशे की शरण में जाता है?
कहा जाता है क्षणिक आनन्‍द के लिये। तो क्‍या इसका अर्थ यह समझा जाये कि सामान्‍य जीवन में क्षणिक आनन्‍द पाने का दूसरा मार्ग नहीं है।
और वेश्‍या?
पुरुष क्‍यों इस तबाही के रास्‍ते पर जाता है। रुप और लावण्‍य की पिपासा शान्‍त करने के लिये।
रुप और लावण्‍य क्‍या वेश्‍या की बपौती है . ... .।
और क्‍या वेश्‍या जीवन सदा ही फूलों की सेज है।
वह सदा ही उठते ही रहने वाले प्रश्‍न हैं, इन प्रश्‍नों के उत्‍तर योगी महात्‍माओं को प्राप्‍त हुए हों तो हुए हों, जनसाधारण स्‍त्री पुरुषों में पीढ़ी दर पीढ़ी से चर्चा में हैं।
और कुंवरसाहब . ... .एक कवि ।
आज ।
अपने आपको मिटा देने के लिए इच्‍छुक . ... .।
क्‍यों?
एक वर्ष पहले।
जब रिश्‍ता पक्‍का करने रावसाहब भरत सिंह आये थे।
पूरी हवेली शानो शौकत से जगमगा उठी थी। पुताई, रंग रोगन और सजावट।
पूरी एक रात उत्‍सव सा रहा।
बहुत ही दबी जुबान से कुंवरसाहब ने कहा था-‘मैं अपनी भावी पत्‍नी को एक बार देख लेता तो . ... .।'
जब यह बात कुंवरसाहब ने कही तो राव साहब उनके सामने बैठे थे और कुंवरसाहब की रानी मां पर्दे के पीछे थीं।
सुनकर राव साहब ठहाका मारकर हंसे थे।
-‘एक बार . ... .अजी कुंवरसाहब एक बार नहीं सौ बार देखिये। आप क्‍या समझते हैं कि हम पुराने जमाने से चिपके रहने वाले इन्‍सान हैं। हमने राजकुंवरी को अंग्रेजी पढ़ाई है साहब . ... .आप हमारे साथ चल रहे हैं। कुछ दिन हमारी गढ़ी में मेहमान रहेंगे। कुछ और सुनिये . ... .हमने आपके यहां आने से पहले आपका फोटो राजकुंवरी को दिखाया था। कैसी हैरत की बात है कि उन्‍होंने आपको देखा है। आप भी चौकेंगे। अजी साहब आप उनके कालेज में हुए कवि सम्‍मेलन में जा चुके हैं। तो साहब आप चल रहे हैं हमारे साथ और आपको अपने कवित्‍त भी सुनाने होंगे। एकदम अनपढ़ हम भी नहीं हैं।'
और फिर रानीगढ़ी की प्रथम यात्रा!
हरे भरे प्रदेश से दूर सूखा सूखा मरुस्‍थल दिखाई पड़ने वाला राजस्‍थान।
प्राचीन वैभवपूर्ण इतिहास की प्रतीक बड़ी गढ़ी और किले। साथ ही दरिद्रता में डूबे से गांव।
रानीगढ़ी तक कार का सफर।
टीले जैसी उंचाई पर बना रानीगढ़ का किला और अन्‍दर महल। प्राचीन वैभव की गवाही और टूटे से वर्तमान में केवल एक महल का ड्‌योढ़ीदार!
रात की महफिल में दरबारी नहीं कुछ सरकारी अफसर . ... .और . ... .।
रात के खाने के बाद!
परम्‍परागत महफिल में शराब के दौर भी चले थे, कुंवरसाहब ने भी खासी पी थी। खाने के बाद सरकारी अफसर विदा हुए। कुंवरसाहब को उनके कमरे तक पंहुचाने स्‍वयं रावसाहब आये और इस कमरे में उपस्‍थित एक दासी सहित राजकुंवरी मालविका को देखकर कुंवरसाहब चौंक पड़े।
-‘लीजिए कुंवरसाहब। यह है आपका कमरा। मैंने राजकुंवरी से कहा था कि स्‍वयं कमरे का इन्‍तजाम सम्‍भाले। अब आप लोग बात कीजिए मैं जरा चलूंगा।'
दोनों ही जैसे एक दूसरे को सम्‍मुख पाकर स्‍तब्‍ध से हो गये थे।
परस्‍पर अभिवादन भी नहीं हुआ।
राजकुंवरी मालविका दृष्‍टि झुकाए खड़ी थी और कुंवरसाहब उसे एक टक देख रहे थे।
ऐसे जैसे रेगिस्‍तान में गुलाब खिला हो।
ऐसे जैसे निर्जीव पत्‍थरों के महल में वीणा के स्‍वर झंकृत हो उठे हों।
राजकुंवरी मालविका सचमुच सुन्‍दर थी।
शरीर पर मोतियों के कुछ आभूषण।
स्‍वच्‍छ श्‍वेत साड़ी और नितम्‍बों पर झूलते मोहक केश।
यह मौन तुड़वाया दासी ने। दोनों को चुपचाप खड़े देखकर वह खिलखिला कर हंसती हुई बोली-‘हाय! जोड़ी को नजर न लगे। मैं वारी जाउं-आमने सामने नहीं जरा बराबर खड़े हों तो आरती उतार लूं।'
तब राजकुवरी ऐसे चौंकी थी जैसे मधुर स्‍वप्‍न में यकायक जाग हो गई हो।
-‘नमस्‍कार कुंवर जी।' अस्‍फुट स्‍वर में वह बोली।
-‘नमस्‍कार।'
-‘विराजिए।' राजकुंवरी मालविका ने चांदी मढ़ी कुर्सी की ओर संकेत किया।
-‘आप भी ।'
कुंवरसाहब बैठे। सकुचाती सी मालविका भी।
फिर मौन!
दासी ने फिर मौन तोड़ा-‘हुजूर कुंवरसाहब। आपने तो विलायत देखी है। जो विलायत देख ले, वहां की मेम देखले, समझा जाता है कि हीरे की खान देख ली-कहिए तो जरा हमारी राजकुंवरी कैसी लगीं।'
-‘हीरों में कोहेनूर।'
लाज से मालविका की दृष्‍टि और भी झुक गईं।
-‘राजकुंवरी जी . ... .।' दासी ने मालविका को सम्‍बोधित किया।
चौंकती सी राजकुंवरी ने दासी की ओर देखा।
-‘कुंवर जी कैसे लगे?'
मालविका ने दासी की ओर देखा। फिर चोर की सी दृष्‍टि कुंवरसाहब पर डाली। तनिक होंठ हिले और फिर लजाकर दृष्‍टि झुका ली।
अब कुंवरसाहब बोले-‘राजकुंवरी जी . ... .।'
-‘जी।' धीमा स्‍वर।
-‘कहिए न कि हम कैसे लगे?'
-‘जैसे . ... .जैसे . ... .।'
-‘हां हां कहिए न।'
-‘जैसे मन्‍दिर में देवता।'
कैसा भोलापन था, कैसी सादगी थी। कुंवरसाहब के मन में जैसे मालविका की तस्‍वीर खिंच गई।
फिर धीरे धीरे संकोच टूटा।
मालविका ने कुंवरसाहब को अतिथिशाला की सुविधाओं के विषय में बताया कि दासी केतकी बराबर के कमरे में ही रात भर आदेश की प्रतीक्षा में रहेगी और पुकारते ही हाजिर होगी।
फिर पूछा-‘आप सुबह किस समय जागते हैं?'
-‘बहुत सुबह।'
-‘बिस्‍तर पर चाय लेते हैं?'
-‘जरुर।'
-‘पिताश्री कह रहे थे कि कल दोपहर बाद आपको शिकार पर ले जाएंगे।'
-‘आप नहीं चलेंगी?'
-‘हुक्‍म होगा तो जरुर चलूंगी . ... .लेकिन आप . ... .बुरा न मानिएगा आप शिकार करते हैं?'
-‘आपको कोई एतराज है?'
-‘आप कवि हैं बहुत कोमल भाव होते हैं आपके। क्‍या ऐसे कोमल भाव वाला व्‍यक्‍ति शिकार कर सकता है?'
-‘मैं कुछ कहूं!'
-‘जी।'
-‘आपकी बारी है . ... .मैंने बुरा नहीं माना तो आपको भी बुरा नहीं मानना होगा . ... .वायदा है न?'
सहजभाव से राजकुंवरी मुस्‍कराई-‘पक्‍का वायदा है।'
-‘खून का असर इन्‍सान में से तुरन्‍त नहीं चला जाता। या यूं कहिए कि संस्‍कार आसानी से नहीं मिटते। मुझ में वह सभी बुराई हैं जो मेरे बुजुर्गों में थी।'
-‘बुराई ही क्‍यों . ... .बुजुर्गों की अच्‍छाइयाँ भी तो होंगी?'
कुंवर मुस्‍कराये-‘हमारे . ... .मेरा मतलब है आपके और मेरे बुजुर्गों में कोई अच्‍छा संस्‍कार नहीं था। उनकी शानों शौकत इन्‍सानों का लहू पीती रही, वीरता के नाम पर वह निरीह पशुओं को मारते रहे और सदा अंग्रेज प्रभुओं के जूते चाटते रहे। वंश परम्‍परा से वह नाम राजा रामचन्‍द्र और हरिश्‍चन्‍द्र का लेते रहे और वास्‍तव में काम जयचन्‍द का करते रहे।'
-‘उफ!' मुस्‍कराती सी मालविका ने दोनों कानों पर अपने हाथ रखकर कहा-‘आप तो . ... .आप तो साक्षात ज्‍वालामुखी हैं . ... .मैं तो डर गई हूं जी।'
फिर कुछ और बातें हुईं। कुछ झिझक खुली।
और इसके बाद राजकुंवरी को लौट जाना पड़ा।
कुंवरसाहब को ऐसा लगा जैसे उस कक्ष से बहार लौट गई हो।
रात सुखद सपनों में बीती।
और . ... .और।
कुंवरसाहब की बड़े ही सुखद वातावरण में नींद खुली।
एक परिमार्जित नारी कंठ उनके वर्षा वियोग गीत की कड़ी गुनगुना रहा था।
किसी राधिका के मनहर की बाज उठी बांसुरिया
पंथ निहारत बिरहन कोई छलकत नयन गगरिया।
जब जब पंख पखेरु लौटे नीड़ सांझ घिर आई
जब जब गाएं कृषक मल्‍हारें याद तुम्‍हारी आई ।
कुंवरसाहब ने आंखें खोलीं!
देखा मेज पर चाय का सामान रक्‍खा है। साथ ही ताजे फूलों का एक गुलदस्‍ता भी। गीत गुनगुना रही थी राजकुमारी मालविका। यह खुली खिड़की के सहारे दूर आकाश में फैली उषा को निहार रही थी।
उस सुखद भोर की स्‍मृति . ... .।
उठते हुये कुंवरसाहब ने कहा था-‘ओह ईश्वर! यह सपना है या सत्‍य?'
सुनकर मालविका चौंकी थी।
हाथ वन्‍दना की मुद्रा में जुड़े थे-‘क्‍या बात है कुंवर जी?'
कुंवरसाहब एक टक राजकुमारी मालविका की ओर देख रहे थे।
कुछ समझ में नहीं आता?
कुंवरसाहब कुछ ऐसे अजीब ढंग से मालविका को देख रहे थे कि बेचारी सहम गई। उसे इस स्‍थिति से बचाने के लिए कुंवरसाहब पुनः लेट गये और आंखें मूंदते हुये कहा-‘जरुर सपना है।'
वह बेचारी घबरा गई।
घबराहट में नेह से दोनों हाथ कुंवरसाहब के गालों पर रखते हुए बोली - ‘कहां है सपना . ... .भोर हो चुकी है। उठिये न . ... .।'
कुंवरसाहब ने तब फिर आंखें खोली थीं-‘आप . ... .!'
-‘मैं आपकी . ... .मैं आपकी मालविका हूं . ... .आप . ... .।'
-‘ओह क्षमा करना राजकुंवरी जी, पहचान नहीं पाया था, देखा और डर गया . ... .सोचा जरुर सपना है।'
-‘क्‍या कह रहे हैं आप . ... .।'
-‘आंख खुली तो देखा सूर्योदय हो रहा है।'
-‘सो तो हो ही रहा है।'
-‘फिर कमरे में देखा . ... .।'
-‘क्‍या?'
-‘पूनम का चांद।'
-‘जी! पूनम का चांद?'
-‘जी हां, यह कैसे मुमकिन है कि सूर्योदय के समय पूनम का चांद भी दमक रहा हो।'
-‘लेकिन कहां?'
-‘यहां।' कुंवरसाहब ने मालविका की नाक को उंगली से छू दिया।
बेचारी मालविका!
पहले आवेश दमकी और फिर लाज से ढलकी तो कुंवरसाहब के वक्ष से उसके होंठ छू गये।
वह उठी।
दृष्‍टि झुकाए ही बोली-‘चाय बनाउं न?'
-‘नहीं।'
-‘क्‍यों?'
-‘यह अच्‍छा नहीं लगता कि आप तकलीफ करें।'
-‘हमें अच्‍छा लगता है ।'
प्रेयसी का स्‍थान मन के मर्म में होता है इसीलिये तो मालविका को देखते आंखें न थक रही थीं।
-‘राजकुंवरी जी . ... .।'
-‘जी।'
-‘अब भी हम सोच रहे हैं कि दिन में दमकता चांद कहीं सपना तो नहीं है।'
-‘हुजूर ।'
-‘फरमाइये।'
-‘आपके मजाक ने हमें डरा दिया है।'
-‘मजाक?'
-‘नहीं तो क्‍या . ... .हम सचमुच समझ बैठे कि आप पर सपने का प्रभाव है।'
-‘अब भी है।'
दोनों की दृष्‍टि मिली। लाज भरी मुस्‍कान सहित वह बोली-‘जाइये।'
-‘कहां जायें?'
फिर दोनों की दृष्‍टि मिली। लाज भरे नयन तनिक शोख हुये।
सामने थी मालविका।
बीच में मेज थी . ... .मालविका ने चाय की प्‍याली कुंवरसाहब की ओर बढ़ाई।
फिर दृष्‍टि मिली।

---
(क्रमशः अगले अंकों में जारी…)

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

लोककथाएँ

[लोककथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget