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जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का उपन्यास : पी कहाँ (भाग 7)

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(पिछले भाग 6 से जारी…)एक के बाद एक बुलावा।क्‍या हो गया है राधा को-कहीं बावली तो नहीं हो गयी। कुंवरसाहब ने हंस कर कहा-‘हां हां बाबा, आउंगा।' -‘जी बाई जी ने कहा है सात बजे से पहले ही ।' हंसते हुए कुंवरसाहब ने एक कागज पर लिखा-‘मैं कवि सूरज प्रकाश जिसे लोग गलती से कुंवरसाहब कहते हैं, ठीक पौने सात बजे राधा देवी के यहां पंहुचने का वादा करता हूं। रसीद लिख दी है ताकि वक्‍त जरुरत काम आए।' यूं एक पल भी सोना को छोड़ना अच्‍छा नहीं लगता था, परन्‍तु आज सोना से बाकायदा इजाजत लेकर पौने सात बजे से भी कुछ मिनिट पहले कुंवरसाहब जब राधा के कोठे पर पंहुचे तो राधा को कोठे से नीचे प्रतीक्षा में खड़े पाया।-‘नमस्‍ते हुजूर . ... .उतरियेगा नहीं। जरा चलना है।' -‘कहां चलना है?' -‘शहर में ही, ज्‍यादा दूर नहीं। बस क्‍लब तक।' -‘क्‍लब किसलिये ?' कार का दरवाजा खोलकर कुंवरसाहब के निकट बैठते हुए राधा बोली-‘यह वहीं पंहुचकर बताउंगी।' क्‍लब के द्वार पर कुंवरसाहब और भी चमत्‍कृत हुए। लाॅन में शामियाना लगा था। शामियाने के निकट ही खूबसूरत मचान बना था, मचान पर अनवर शहनाई नवाज अपने साथियों सहित मंग…

जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का उपन्यास : पी कहाँ (भाग 6)

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(पिछले भाग 5 से जारी…)रात के दो बज गये थे।नींद जैसे छलावा थी। रात्रि का दूसरा पहर आया तो रोम रोम में बस गई और फिर रात्रि का तीसरा पहर आते आते निष्‍ठुर प्रिया की तरह रुठ गई।कमरे में अंधेरा था। अंधेरा जैसे अच्‍छा लगता था।कुंवरसाहब को लगा जैसे धीरे धीरे कमरे का दरवाजा खुला हो।क्‍या चोर है? मन ही मन कुंवरसाहब मुस्‍कराये। कैसा बेवकूफ चोर है? भला यहां उसे क्‍या मिलेगा। रानी मां के कमरे में तिजोरी तोड़ता तो शायद कुछ मिलेगा। जेवर, सोने के बहुत पुराने सिक्‍के। यहां इस कमरे में कमबख्‍त को पूरी अधूरी कविताओं, बोतलों और . ... .और रायफल के अतिरिक्‍त क्‍या मिलेगा? फिर स्‍पष्‍ट आभास। जैसे कोई कमरे में आ गया हो।जान बूझकर उन्‍होंने बैड स्‍विच जलाकर रोशनी नहीं की थी।-‘कुंवर जी . ... .।'धीमा और दबा सा स्‍वर।धारणा बदली-ऐसी मधुर वाणी तो किसी नौकरानी की नहीं है।-‘कुंवर जी . ... .।' फिर सम्‍बोधन !लालित्‍यपूर्ण स्‍वर।अनायास ही उन्‍होंने बैड स्‍विच दबा दिया।दूसरे ही क्षण उन्‍होंने देखा और देखते ही रह गये।मंत्रमुग्‍ध से वह उठे।-‘तुम?' -‘जी मैं सोना हूं कुंवर जी . ... .।'उत्‍तर मिला।जैसे बोलती ग…

जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का उपन्यास : पी कहाँ (भाग 5)

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(पिछले भाग 4 से जारी…)कारोबारी आदमी ठहरे-गुप्‍ता जी जिस उद्‌देश्‍य से आए थे उसे प्राप्‍त करके लौट गये। अभी मित्रों को यह जानकारी नहीं थी कि कुंवरसाहब लौट आए हैं। अतएव शान्‍त मन से कुछ सोचने का अवसर मिला।बहुत देर तक कुंवरसाहब गुसलखाने में रहे। जाकर एक कोने में बैठ गये।सोचते रहे-क्लेश किसलिये। दुख क्‍यों? राजकुंवरी मालविका शिष्‍ट है, सुन्‍दर है।परन्‍तु वह संसार की एक मात्र सुन्‍दर स्‍त्री तो नहीं है। देश विदेश में उससे सुन्‍दर स्‍त्री देखी, सम्‍पर्क में आई।आमतौर से इस आयु में व्‍यक्‍ति बूढ़ा होने लगता है। कुंवरसाहब की बत्‍तीस वर्ष की आयु थी और इस आयु में कितनी ही स्‍त्रियों से शारीरिक सम्‍बन्‍ध भी स्‍थापित हुआ।विवाह नहीं किया यह अलग बात है। उन्‍होंने स्‍वयं विवाह करना नहीं चाहा था।वह सोचते रहे और सोचते रहे।उदासी किसलिये? मालविका के लिये शोक क्‍यों? फिर मस्‍तिष्‍क अपने प्रश्‍नों के उत्‍तर स्‍वयं देता है।मालविका काण्‍ड संवेदनशील मन पर एक ताजा घाव है। उसे समय के मरहम की आवश्‍यकता होगी।प्रश्‍न मालविका का नहीं है। मालविका पीड़ा नहीं है। पीड़ा का कारण है।तब पीड़ा क्‍या है? पीड़ा है अपमान की। …

जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का उपन्यास : पी कहाँ (भाग 4)

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(पिछले अंक से जारी…)नींद रुठ गई थी।और एक के बाद एक बीती यादें।चन्‍द्रावती। कुंवरसाहब की छोटी बहन। सुन्‍दर और नटखट, सात वर्ष से विवाहित।परन्‍तु भाग्‍यहीन।एक जागीरदार घराने में ब्‍याही गई। परन्‍तु ग्रेज्‍युएट लड़की को वर अच्‍छा नहीं मिला। असली जागीरदार चरित्र। जागीरदारी चरित्र का भ्रष्‍ट और पतित रुप।सात वर्ष के विवाहित जीवन में चन्‍द्रावती को सन्‍तान नहीं हुई थी। पति ने उसे बांझ करार दिया। वैसे भी दामाद साहब अपने इलाके के अच्‍छे खासे गुण्‍डे थे। यूं न जाने कितनी रखेलें थीं परन्‍तु दूसरा विवाह करने में कानूनी बाधा थी। इसलिए वह चन्‍द्रावती के लिए घर में सौत तो नहीं ला सके अलबत्‍ता छोड़ देने की धमकी दी।बात कुछ और अधिक बढ़ी।और पति ने चन्‍द्रावती से कहा कि या तो वह अपने बाप की जायदाद में से हिस्‍सा ले या चली जाए।बहन मां के पास आकर रोई।बात कुंवरसाहब के पास तक पंहुची। उन्‍होंने बहनोई को बुलवाया।बात हवेली पर नहीं वकील के यहां हुई।बहनोई का नाम था राजसिंह। कुंवरसाहब उन्‍हें ठाकुर साहब कहा करते थे।शान्‍त किन्‍तु दृढ़ स्‍वर में कुंवरसाहब ने वकील के सम्‍मुख पूछा-‘अब कहिए ठाकुर साहब आप क्‍या चाहते है…

जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का उपन्यास : पी कहाँ (भाग 3)

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(पिछले अंक से जारी…)

पुरानी स्‍मृतिओं ने जैसे नींद चुरा ली थी। बीती बात निरन्‍तर याद आ रहीं थीं।
अगले दिन!
तब जबकि वह राजकुंवरी के साथ शिकार पर गये थे। साथ में रावसाहब भी थे और दो पेशेवर शिकारी भी थे।
बताया गया था कि जंगल में एक भेड़िये का उत्‍पात है। जो आते जाते मुसाफिरों को भी परेशान करता है।
यह राह में ही जानकारी मिली कि राजकुंवरी को भी निशानेबाजी का अच्‍छा अभ्‍यास था। एक प्रतियोगिता में वह पुरुस्‍कृत भी हो चुकी थी।
अब आपस में कोई झिझक नहीं थी। एक जीपकार में रावजी और उनके शिकारी साथी थे दूसरी जीपकार में कुंवरसाहब को मालविका के साथ बैठाया गया था।
स्‍वयं मालविका जीप ड्राइव कर रही थी।
राह में कुछ बातें हुईं।
-‘राजकुमारी जी आज सुबह सुना . ... .आप बहुत सुन्‍दर गाती हैं।
-‘आप भी तो बहुत सुन्‍दर कविता करते हैं।'
-‘सुन्‍दर कहां . ... .बस यूं ही कुछ कह लेता हूं।'
-‘हम एक बात कहें कुंवरसाहब।'
-‘कहिये।'
-‘मैं पर्दे की ओट से देख रही थी आपने बहुत शराब पी।'
-‘मैंने कहा था न कि बुजुर्गों की सभी बुराईयां मुझ में हैं।'
-‘अगर मेरी सौगन्‍ध माने तो कहूं अधिक शराब मत पिया क…

जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा का उपन्यास : पी कहाँ (भाग - 2)

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(पिछले अंक से जारी…)

हवेली का नाम था-रतनपुर पैलेस।
जमींदारी उन्‍मूलन से पहले इस हवेली के स्‍वामियों की जागीर इसी नाम से पुकारी जाती थी-अब भी रतनपुर कस्‍बे में किले के प्रकार का बेमतलब महल है।
हवेली में कुल मिलाकर छोटे बड़े पच्‍चीस कमरे हैं। नीचे ग्‍यारह। दस कमरे और बड़ा हाल नुमा कमरा।
इतनी बड़ी हवेली की सफाई कौन करे? इसलिए उपर की मन्‍जिल लगभग बन्‍द रहती है। कभी त्‍यौहार पर ही झाड़-पोंछ होती है। नीचे के कमरे भी सब रोज साफ नहीं किये जाते थे। एक कुंवरसाहब का कमरा, दूसरा बूढ़ी रानी साहिबा का कमरा। इस के अतिरिक्‍त आंगन बरामदे आदि तथा हाल यह रोज साफ होते हैं। नौकर सीमित हैं न!
सर्दियों के मौसम में रानी साहिबा गठिया रोग के कारण अधिक चल फिर नहीं सकतीं। उन्‍हें रानी कहिए या इस हवेली की बन्‍दिनी।
कुंवरसाहब की कार हवेली में प्रविष्‍ट हुई।
लड़खड़ाते से कुंवर साहब कार से उतरे। सीधे मां के कमरे में पंहुचे-प्रणाम करने।
पुत्र को आया देख कराहती सी रानी साहिबा बैठ गईं। पुत्र के सिर पर हाथ फेरा-‘जीते रहो, बहुत उम्र हो। सीधे रानीगढ़ी से आ रहे हो?'
-‘जी।'
-‘राव साहब अच्‍छे हैं?'
-‘सब अच्‍छे …

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