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July 2010
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ग़ज़ल

रोज चीखते अखबार तो, सरकार क्‍या करे।

पसरे हैं भ्रष्‍टाचार तो, सरकार क्‍या करे॥


डिप्‍लोमा, डिग्रियां लिये, तादाद में इतने,

बैठे हैं जो बेकार तो, सरकार क्‍या करे।


सियासत के हर शोबे में मुजरिमान की ऐसे,

हैं हो गयी भरमार तो, सरकार क्‍या करे।


जम्‍हूरियत के नाम से अब मुल्‍क में मेरे,

वो करते कारोबार तो ,सरकार क्‍या करे।


गर खास मोहरों को बचाने में मुल्‍क का ,

होता है बंटाढ़ार तो, सरकार क्‍या करे।


भोपाल गैस काण्‍ड से होते हैं फैसले ,

गर आदिल हैं लाचार तो, सरकार क्‍या करे।


दामोदर लाल ‘जांगिड‘

sukhnandan

सुखनंदन एडवोकेट

सिविल कोर्ट, आजमगढ़, उ.प्र., 276001

दिनकर हिन्‍दी के उन कुछ एक साहित्‍यकारों में से हैं, जिनकी प्रतिभा का लोहा चिन्‍तन के क्ष्‍ोत्र में भी माना जाता है। उनकी इस असाधारण ख्‍याति का कारण है उनकी रचना ‘संस्‍कृति के चार अध्‍याय'। संस्‍कृति से संबंधित अध्‍ययनों में इस पुस्‍तक को एक अनिवार्य पठनीय संदर्भ ग्रंथ के तौर पर मील के पत्‍थर की हैसियत प्राप्‍त है। दिनकर के रचना संसार के संस्‍कृति के चार अध्‍याय की स्‍थिति अन्‍य काव्‍य रचनाओं से कुछ अलग सी है। न केवल इसमें अभिव्‍यक्‍ति के रूप (गद्य) की भिन्‍नता है, बल्‍कि इसमें उनका स्‍वर भी और उनके निष्‍कर्ष भी भिन्‍न हैं। यह भिन्‍नता बहुत मानीखेज है और दिनकर की वास्‍तविक छवि का निर्माण करते हुए इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। दिनकर पर विचार करते समय इस भिन्‍नता का इसलिए बढ़ जाता है क्‍योंकि यह दिनकर प्रेमियों और पाठकों को दो भिन्‍न दिशाओं में प्रेरित करती है।

भारत के स्‍वाधीनता आंदोलन को हिंदी कविता में सर्वश्रेष्‍ठ अभिव्‍यक्‍ति देने वाले रामधारी सिंह दिनकर, विशाल जन समुदाय की आकांक्षा को अपनी ओजस्‍वी वाणी से मुखरित करने वाले अद्वितीय कवि हैं। पुरातन विपथगामी परम्‍पराओं और प्रवृत्‍तियों पर उन्‍होंने प्रगतिशील संभावनाओं का वज्राघात किया था। जीवन और जगत के दमनकारी यथार्थ को बदलने और मानवीय उत्‍थान के नए शिखर की ओर द्रुत गति से बढ़ते जाने की अदम्‍य भावना दिनकर के काव्‍य का प्राणतत्‍व है। शोषण-दमन और प्रगति की राह में आने वाली बाधाओं से समझौता हीन संघर्ष दिनकर के काव्‍य का स्‍थाई भाव है। उनके लिए अत्‍याचार करने वाला ही नहीं अहिंसक बनकर प्रतिरोध करने वाला भी पाप का भागी है। ‘प्रणभंग' में भीष्‍म पितामह जैसे ज्ञान वृद्ध पात्र के माध्‍यम से दिनकर की मान्‍यता है-

छीनता हो स्‍वत्‍व कोई, और तूं

त्‍याग तप से काम ले यह पाप है

पुण्‍य है विच्‍छिन्‍न कर देना उसे

बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है।[1]

अपनी कविताओं में दिनकर ने न तो भारतीय संस्‍कृति और अतीत का महिमामंडन किया और न ही वर्तमान व्‍यवस्‍था से उन्‍होंने कोई झूठी उम्‍मीद पाली। उन्‍होंने धर्म-जाति और लैंगिक भेदभाव पर आधारित संस्‍कृति की निर्मम आलोचना की और मौजूदा व्‍यवस्‍था में व्‍याप्‍त गैरबराबरी और शोषण के कटु यथार्थ को उसके नग्‍न रूप में सामने रखा- स्‍वानों को मिलते दूध-वस्‍त्र, भूखे बच्‍चे अकुलाते हैं/ मां की हड्‌डी से चिपक, ठिठुर जाड़ों की रात बिताते हैं/ युवती के लज्‍जा वसन बेच जब ब्‍याज चुकाये जाते हैं।[1]

समाज में फैली इस भीषण दरिद्रता का कारण मुट्‌ठी भर ‘देवताओं' द्वारा अपनी विलासिता के लिए खड़ा किया गया स्‍वर्ग है और बिना इस स्‍वर्ग की संपत्‍ति को बलपूर्वक हासिल किए, यह दरिद्रता नहीं मिटने वाली। दिनकर ने यह जिम्‍मेदारी खुद उठाते हुए चुनौती दी- हटो व्‍योम के मेघ पंथ से, स्‍वर्ग लूटने हम आते हैं/ ‘दूध-दूध' ओ वत्‍स, तुम्‍हारा दूध खोजने हम जाते हैं।[1] शोषक और शोषितों के बीच किसी काल्‍पनिक समन्‍वय से इस समानता का समाधान यहां होने वाला है। उसके लिए व्‍यवस्‍था से संघर्ष अनिवार्य है। युगों-युगों से अन्‍याय और दमन की सत्‍ता के शिकार जनगण को प्रतिशोध में उठ खड़े होने और इस व्‍यवस्‍था को बदल देने के लिए दिनकर आह्‌वान करते हैं-

पिलाने को कहां से रक्‍त लाएं दानवों को?

नहीं क्‍या स्‍वत्‍व है प्रतिशोध का हम मानवों को?

जरा तूं बोल तो, सारी धरा हम फूंक देंगे;

पड़ा जो पंथ में गिरि कर उसे दो टूक देंगे।

कहीं जो पूछने बूढ़ा विधाता आज आया;

कहेंगे, हां, तुम्‍हारी सृष्‍टि को हमने मिटाया।[1]

सत्‍ताधारियों ने अपने वर्चस्‍व की निरंतरता के लिए समूचे समाज को धमोंर्-संप्रदायों, जातियों, मत-मतांतरों में विभाजित किया था, जिसका कोई भी प्राकृतिक आधार नहीं है। समाज में मौजूद गैर बराबरी और भेद-भाव प्राकृतिक या ईश्वरकृत नहीं है, यह इस सामाजिक व्‍यवस्‍था का परिणाम है ‘नीचे हैं क्‍यारियां बनीं तो बीज कहां जा सकता है?' इस व्‍यवस्‍था का विरोध करते हुए दिनकर मनुष्‍य को उसके कर्म और गुणों से पहचानने का आग्रह करते हैं। विभेदात्‍मक संस्‍कारों से ग्रसित प्राणी स्‍वाधीन राष्‍ट्र और जनवादी व्‍यवस्‍था को कुत्‍सित करता है। स्‍वतंत्र भारत में इस प्रवृत्‍ति का दिनकर ने खुल कर प्रतिवाद किया है-

घातक है जो देवता सदृश दिखता है

लेकिन कमरे में गलत हुक्‍म लिखता है

जिस प्राणी को गुण नहीं, गोत्र प्‍यारा है

समझो उसने ही हमें यहां मारा है।[1]

स्‍वाधीनता आंदोलन की उमंगों में होश संभालने वाले दिनकर ने जो कुछ अपनी प्रौढ़ावस्‍था में देखा, अत्‍यंत विक्षुब्‍धकारी था। स्‍वाधीनता आंदोलन के कर्णधार ही भारत के भाग्‍यविधाता बने थे। दिनकर के शब्‍द उस कुटिल विसंगति को उजागर करते हैं, जिसमें आस्‍था की आड़ में देव मूर्तियों की तश्‍करी होती है और ‘मंदिर का देवता, चोर बाजारी में पकड़ा जाता है।'

‘हुंकार', ‘रेणुका', ‘कुरुक्ष्‍ोत्र', ‘रश्‍मिरथी', ‘उर्वशी' जैसी रचनाओं से दिनकर हिंदी काव्‍य जगत में शीर्षस्‍थ यशस्‍वी कवि के रूप में प्रतिष्‍ठित हुए। कवि सम्‍मेलनों के माध्‍यम से उन्‍हें जबरदस्‍त लोकप्रियता प्राप्‍त हुई। असाधारण प्रतिष्‍ठा पाकर भी दिनकर ने यहीं विराम नहीं लिया। सामाजिक परिवर्तन और राष्‍ट्र निर्माण की दिशा और दृष्‍टि की सुस्‍पष्‍टता के लिये उन्‍होंने ‘संस्कृति के चार अध्‍याय' की रचना की। यह महाग्रंथ उनके गहन अध्‍ययन, वैचारिक सहिष्‍णुता और राष्‍ट्रीय बंधुत्‍व की भावना को सुदृढ़ पृष्‍ठभूमि देने की महत्‍वाकांक्षा से अनुप्राणित सृजनशीलता का सुपरिणाम है। हिंदी साहित्‍य के इतिहास में पहली बार किसी कवि ने इतिहास, परम्‍परा, धर्म, दर्शन जैसे साहित्‍येतर क्ष्‍ोत्रों में इतना सशक्‍त हस्‍तक्ष्‍ोप प्रस्‍तुत किया। यशस्‍वी कवि और संवेदनशील राष्‍ट्रवादी चिंतक के रूप में दिनकर ने राष्‍ट्रीय एकता एवं सांस्‍कृतिक समन्‍वय का जो स्‍वप्‍न देखा संस्‍कृति के चार अध्‍याय उसका मूर्तरूप है।

दिनकर की कविताओं में मानवतावादी आदर्श, न्‍यायपूर्ण व्‍यवस्‍था की कामना तथा ओज एवं पौरुष की उन्‍मुक्‍त उड़ान है। अपनी स्‍वतंत्र प्रवृत्‍ति के कारण दिनकर का काव्‍य न केवल उन्‍हें हिंदी का शीर्षस्‍थ कवि सिद्ध करता है बल्‍कि भारत की सीमाओं को पार कर विश्‍व के काव्‍य जगत में प्रतिष्‍ठा पाने में समर्थ है। यह भविष्‍य निर्णय करेगा कि विश्‍व के श्रेष्‍ठतम कवियों की पंक्‍ति में दिनकर का स्‍थान कौन सा है। दिनकर ने ‘संस्‍कृत के चार अध्‍याय' की रचना में अपनी कविताओं की रचना प्रक्रिया से नितांत भिन्‍न पद्धति का अनुसरण किया है। उन्‍होंने फूंक-फूंक कर कदम रखते हुए एक-एक विषय को लिया और चुन-चुन कर संदर्भों के साथ अपनी विवेचना प्रस्‍तुत की है। अपनी दिशा और दृष्‍टिकोण के अनुरूप दिनकर ने वेद, उपनिषद, कुरान, बाइबिल तथा विभिन्‍न धर्म ग्रंथों एवं समाज सुधारकों और मनीषियों आदि के साक्ष्‍य के आधार पर अपना यह ग्रंथ निर्मित किया है।

दिनकर की गद्य रचनाओं में ‘संस्‍कृति के चार अध्‍याय' न केवल आकार में विशाल है वरन धार्मिक तथा दार्शनिक ग्रंथों में निहित प्रमुख तत्‍वों के गहन अध्‍ययन-विश्‍लेषण के जरिये मानवतावादी जनवादी मूल्‍यों का प्रतिपादन है। संस्‍कृत, बंगला, फारसी, उर्दू आदि भाषाओं के ग्रंथों तथा विभिन्‍न विचारकों के उद्धरणों और व्‍याख्‍याओं तथा सटीक निष्‍कर्षों की प्रस्‍तुति के कारण यह ग्रंथ हिंदी पाठकों के लिये अद्वितीय है। जिन बुद्धिजीवियों-पाठकों को लक्ष्‍य बनाकर यह ग्रंथ लिखा गया- उन्‍होंने उत्‍सुकतापूर्वक इसका समादर भी किया। भारत भूमि पर वैदिक काल से लेकर अपने युग तक के इतिहास को दिनकर ने चार क्रांतियों के आधार पर चार अध्‍यायों में विभाजित किया है, जिसे 1962 के द्वितीय संस्‍करण में अंतिम रूप ।

इस ग्रंथ का प्रथम अध्‍याय, भारत के मूलवासियों से आयों के ‘मिलन' से संबंधित है, जिससे ‘भारत की बुनियादी संस्‍कृति बनी।'[1] महावीर और गौतम बुद्ध का यज्ञवाद और उपनिषदों की चिंतन धारा के विरुद्ध विद्रोह दूसरे अध्‍याय का विषय है। विजेताओं के धर्म के रूप में इस्‍लाम का हिंदुत्‍व के साथ संपर्क तीसरे अध्‍याय का तथा भारत में यूरोपीयों के आगमन का हिंदुत्‍व और इस्‍लाम दोनों पर प्रभाव चौथे अध्‍याय के विषय हैं। भारत व्‍यापी विविध परम्‍पराओं, मान्‍यताओं, तथा विद्वानों की स्‍थापनाओं से उन्‍होंने संवाद के साथ जहां-तहां असहमति, छेड़-छाड़ और प्रतिवाद भी किया है। प्रथम अध्‍याय में कतिपय रोचक संदर्भ दर्शनीय है-

‘‘आर्य शब्‍द की व्‍युत्‍पत्‍ति ऋ धातु से बताई जाती है जिसका अर्थ गति होता है। आर्य कदाचित्‌ गत्‍वर (घुमक्‍कड़) लोग थे। एशिया के रेगिस्‍तानी इलाकों से निकलकर जब वे भारत में पंहुचे, यहां की उर्वरा धरती ने उनके घुमक्‍कड़ स्‍वभाव को बदल दिया...।''[1]

‘‘जिन लोगों को आयों ने दास-दस्‍यु, निषाद, अनास और शिश्‍नदेवा कहा है, उनसे आयों की मुठभेड़ केवल भारत आकर हुई, यह बात बहुत समीचीन नहीं दिखती।...आयों का संघर्ष इन सभी लोगों से हुआ था, जिसकी प्रतिध्‍वनि वैदिक साहित्‍य में अत्‍यंत परिवर्तित रूप में सुनाई देती है।''[1]

‘‘जब आर्य यहां आए, उससे पहले ही सभ्‍यता का विकास यहां हो चुका था और धर्म तथा संस्‍कृति के अंग रूप ग्रहण कर चुके थे। आयों ने इन सबको लेकर आर्य धर्म का संगठन किया।''[1]

‘‘उन्‍होंने इसी वेद-पूर्व सभ्‍यता को भारतीय सभ्‍यता का आधार बनाया।''[1]

दिनकर की दृष्‍टि में समाज का ध्‍यान मानव उत्‍पीड़न से हटाकर धर्म के सूक्ष्‍म तत्‍वों की ओर ले जाना उपनिषदकारों का उद्‌देश्‍य था। सारी सृष्‍टि के ब्रह्ममय होने और मोक्ष जैसा समाधान मनुष्‍य की असली समस्‍याओं के निवारण के लिए था, जिसमें जीवन-मरण की समस्‍या भी है।[1] इस चिंतन धारा में बहने वाले वैरागियों और सन्‍यासियों की संख्‍या उतरोत्‍तर बढ़ी गई थी। ‘‘अज्ञात रूप से वेदों के इषत विरुद्ध सोचना उपनिषदकारों ने आरम्‍भ किया था और जनता के मन पर से वेदों के प्रभुत्‍व को उखाड़ फेंकने की सच्‍ची कोशिश महावीर और बुद्ध ने की।''[1]

अहिंसा, सत्‍य, अस्‍तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे पंचव्रत पर आधारित कर्मवादी जैनधर्म परिष्‍कृत तथा उन्‍नत जीवन बनाने का माध्‍यम है। जैनधर्म की भांति, बौद्ध धर्म भी यज्ञ विरोधी, पशुहिंसा विरोधी, वेदों की प्रामाणिकता को अस्‍वीकारने वाला, प्रचलित जनभाषा में उपदेश देने वाला था। जैन धर्म से बौद्ध धर्म की भिन्‍नता तो विशेषकर क्षणिकवाद, नैरात्‍मवाद, शून्‍यवाद और विज्ञानवाद आदि एकांतिक दृष्‍टिकोण से थी। बुद्ध ने तप और भोग के बीच से मध्‍यम मार्ग का अनुसरण किया।[1] बुद्धदेव ने (1) जातिप्रथा को चुनौती दी, (2) शास्‍त्रों का तिरस्‍कार किया और (3) मनुष्‍य की स्‍वतंत्र बुद्धि को स्‍फुरण प्रदान किया।[1] दिनकर के अनुसार तथागत बुद्ध द्वारा घोषित चार आर्य सत्‍य तथा अष्‍टांगिक मार्ग जीवन में उतारने योग्‍य हैं। ‘यह धर्म का बड़ा ही व्‍यावहारिक रूप था' इस कारण ‘‘समाज में जो वर्ण ब्राह्मण से जितना ही दूर था, वह बौद्ध धर्म की ओर उतने ही वेग से खिंचा।''[1] अपनी लोकप्रियता के कारण ही बौद्ध धर्म विश्‍वधर्म बन गया। आगे चलकर जब जैन और बौद्ध धर्म स्‍थापित हो गए तो स्‍वयं संघ संपत्‍ति और विलासिता के केंद्र बन गए जिसके चलते उन्‍हें ब्राह्मणों तथा उनके समर्थक शासकों के प्रहार झेलने पड़े। वेद-उपनिषद, ब्राह्मणग्रंथों, गीता, जैन-बौद्ध धर्मों, वैष्‍णव, शैव, शाक्‍त सम्‍प्रदायों तथा संत परम्‍पराओं के सटीक विवेचन के साथ संस्‍कृत के चार अध्‍यायों में से दूसरा संपूर्ण होता है।

तीसरा अध्‍याय ‘हिंदू संस्‍कृति और इस्‍लाम' है। इस्‍लाम का जन्‍म धर्म के रूप में हुआ था किंतु परिस्‍थितियों ने उसे राजनीतिक रूप दे दिया। खलीफा मुसलमानों के राजा भी थे और धर्मगुरू भी। आचार और विचार में सरल इस्‍लाम ने समानता की शिक्षा से अत्‍याचार से पीड़ितों को एकताबद्ध किया और धर्म विजय के नाम पर खड़गवाद ने 100 वर्षों में दुनिया का सबसे शक्‍तिशाली राज्‍य स्‍थापित किया।

मुसलमान आक्रामक पहले लूटपाट के लिए भारत में आते थे किंतु पृथ्‍वीराज चौहान और जयचंद की पराजयों के बाद स्‍थापित मुसलमानी हुकूमत ने हिंदू शासकों की शासन परम्‍परा को चकनाचूर कर दिया। उस समय भारत में धार्मिक संप्रदायों, जातियों में विभाजित, शोषण उत्‍पीड़न के शिकार बहुसंख्‍यक किसान, शिल्‍पी और दासों को भांति-भांति के कर देने अतिरिक्‍त शासन और राज्‍य व्‍यवस्‍था में दखलंदाजी का कोई हक नहीं था। ‘कोउ नृप होइ हमहिं का हानी' की तर्ज पर शासक बदलने पर भी उपज का 1/2 से 1/5 तक देना ही था। परिणामस्‍वरूप कुछ हजार मुसलमानों की सेना दिल्‍ली, अवध, बिहार, बंगाल, उत्‍तर से दक्षिण भारत तक अबाध गति से विजय पर विजय प्राप्‍त करती गई थी। शासन व्‍यवस्‍था में मुसलमान हिंदू राजाओं से भी ज्‍यादा निरंकुश थे। अपना धर्म बचाये रखने के लिए मुसलमान शासन में जजिया कर देना पड़ता था। तब भी हिंदू धर्म की जड़ता का आलम यह था कि मनु और याज्ञवल्‍क्‍य जैसी ‘‘स्‍मृतियों में जाति भ्रष्‍ट मनुष्‍य को जाति में लाने का कोई प्रबंध नहीं था।... हिंदू यही मानते थे जिसके शरीर पर मुसलमान के छूए हुए पानी का छींटा पड़ गया, वह किसी प्रकार हिंदू नहीं रह सकता है।''[1]

इस्‍लाम के अनुयायियों में संकीर्ण कट्‌टरतावादी ही नहीं, संवेदनशील मानवतावादी न्‍यायप्रिय भी होते रहे हैं। शियों में एक उग्र संप्रदाय ने ‘हुलूल' और ‘तकसीर' की घोषणा की। अर्थात मनुष्‍य ईश्वर कोटि का बन सकता है और ईश्वर मनुष्‍य।[1] मोतजली संप्रदाय के चिंतकों ने बुद्धिवाद के क्षितिज को अधिक विस्‍तार दिया। अल गजाली (1051 से 1120 ई.) धर्म मीमांसा करते हुए, धर्म पर सोचते-साचते हुए वे नास्‍तिकता पर पहुंचे और धर्म मात्र से उनका विश्‍वास उठ गया।[1] मुक्‍त चिंतकों में उमर खैयाम और अबुल अका (1057 ई.) का बड़ा नाम है। इब्‍नसीना यूनानी दर्शन के प्रेमी थे। सूफी मत को दिशा इन्‍हीं दार्शनिकों ने दी।[1] अपनी आस्‍था के लिए ‘अनल हक' (अहम्‌ ब्रह्मोस्‍मि) पुकारते हुए 922 ई. में मंसूर सूली पर चढ़े थे।

सूफियों में इस्‍लाम कठमुल्‍लावाद और ब्राह्मणों के पाखण्‍ड का निर्मम विरोध कबीर जैसे संतों ने किया। इस्‍लाम और हिंदुत्‍व में यह समन्‍वय की धारा थी। विवेकसंगत समन्‍वय की धारा ने संकीर्णतावाद के विरुद्ध संघर्ष किया है। भारत में आकर इस्‍लाम ने खान-पान, आचार- विचार, सामाजिक व्‍यवस्‍था में बहुत कुछ बदला और भारतीय समाज को भी प्रभावित किया। रहीम, रसखान, अकबर, नानक, कबीर समन्‍वय की धारा के प्रतीक हैं। राष्‍ट्रीय स्‍वाधीनता संग्राम में नजरुल इस्‍लाम, जोश, अकबर इलाहाबादी, चकबस्‍त, जमील मजहबी आदि की रचनाओं ने ओज और स्‍फूर्ति दिया था, साम्‍प्रदायिकता से मुक्‍त एकता और समन्‍वय को दृढ़ता दी थी।

‘भारतीय संस्‍कृति और यूरोप' शीर्षक चौथे अध्‍याय में भारत की खोज 1498 ई. करने वाले वास्‍कोडिगामा से लेकर ब्रिटिश साम्राज्‍य से मुक्‍ति के बाद के भारत का विस्‍तृत विवरण दिनकर जी ने प्रस्‍तुत किया है। स्‍वार्थों के संघर्ष में कई लड़ाइयों के बाद अंग्रेजों ने भारत में अपना शासन स्‍थापित कर लिया। यूरोपवासियों ने अपने व्‍यापार और शासन के दौरान शस्‍त्रास्‍त्र तथा युद्धकला ही नहीं, धर्म दर्शन, साहित्‍य और शिक्षा के क्ष्‍ोत्रों में आर्श्‍चयजनक प्रगति की ओर भारतीयों को आकर्षित किया। 18वीं सदी के अंतिम दशकों में अंग्रेजों ने भारत में पश्‍चिमी शिक्षा पद्धति की नींव डालनी आरम्‍भ की। 1857 के बाद तो शिक्षा के क्ष्‍ोत्र में बड़े काम हुए, एक के बाद एक विश्‍वविद्यालय खुलने लगे।

ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियों ने जहां भारतीयों में शिक्षा का लोकप्रिय बनाया, वहीं उनमें से अनेक स्‍वयं प्राच्‍यविद्या में पारंगत होते गए। अंग्रेजों और अंग्रेजी शिक्षा के संपर्क में आने वाले जागरूक भारतीयों में विद्या के प्रति अनुराग बढ़ता गया था। इन शिक्षित भारतीयों में अपनी संस्‍कृति के प्रति अटूट आस्‍था थी। स्‍वामी रामकृष्‍ण परमहंस, स्‍वामी विवेकानंद, लोकमान्‍य तिलक, महायोगी अरविंद, महात्‍मा गांधी, सर इकबाल जैसे मनीषियों के व्‍यक्‍तित्‍व, कृतित्‍व एवं उनके सामाजिक प्रभाव का विशद विवेचन दिनकर जी ने किया है।

‘संस्‍कृति के चार अध्‍याय' की रचना एवं प्रकाशन ऐसे संक्रमण काल में हुआ था जब सांस्‍कृतिक विरासत को राष्‍ट्र हित में सजोना था, उस राष्‍ट्र के हित में जिसका नेतृत्‍व में स्‍वाधीनता संग्राम के महानायक नेहरू कर रहे थे। भारतीय धार्मिक मान्‍यताओं, दार्शनिक दुरूहताओं, सांस्‍कृतिक मूल्‍यों तथा भारतीय विचारकों की मानवीय संवेदनाओं को आत्‍मसात किए बिना ऐसे ग्रंथ की रचना संभव नहीं है। संस्‍कृति के चार अध्‍याय जैसे श्रम साध्‍य ग्रंथ की रचना कर के दिनकर ने हिन्‍दी साहित्‍य के एक अभाव को संपूरित किया। इस अध्‍ययन में चिंतन, मनन और लेखन की प्रक्रिया में ज्ञान की गंगा में गोता लगाते-लगाते वे स्‍वयं भी निखरते गए। उनका लेखकीय उद्‌देश्‍य पाठकों में नया प्राण फूंकना था। उन्‍हें विश्‍वास रहा है कि इस ग्रंथ में ‘‘अर्द्ध सत्‍य और अनुमान चाहे जितने रहे हो, किंतु जो प्रतिमा इस पुस्‍तक में खड़ी की गई है, वह निर्जीव नहीं है।[1]

‘संस्‍कृति के चार अध्‍याय' के प्रकाशन ने हिन्‍दी पाठकों को आकर्षित किया था। संवेदनशील पाठकों ने अपने उद्‌गारों को मंचों से उद्‌घाटित किया, समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त की और करीब तीन सौ पत्र दिनकर को प्राप्‍त हुए। इनमें दिनकर का ‘प्रबल समर्थन' करते हुए उनकी ‘भूरी-भूरी' प्रशंसा थी किंतु दूसरी ओर कुछ पत्रों में ‘लेखक अज्ञानी और मूर्ख है', कहते हुए ‘कठिन विरोध' भी किया गया था। दिनकर जी को जल्‍दी ही ज्ञात हो गया था कि ‘मेरी स्‍थापनाओं से सनातनी भी दुखी है और आर्यसमाजी तथा ब्रह्मसमाजी भी।' पुराणपंथी और यथास्‍थितिवादियों की नाराजगी का स्‍पष्‍टीकरण दिनकर जी ने तीसरे संस्‍करण की भूमिका (1962) में दिया। किंतु वे उन लोगों की चर्चा के प्रति मौन साध गए जिन्‍हें दिनकर से बड़ी अपेक्षाएं थी।

दिनकर के अनन्‍य मित्र और सहयोगी मन्‍मननाथ गुप्‍त ने संस्‍कृति के चार अध्‍याय को ‘गागर में सागर' मानते हुए लिखा कि मुझे पता नहीं कि ‘‘भारतीय भाषा में इतनी ठोस सामग्री कहीं एक जगह एकत्र भी है?'' या नहीं। गुप्‍त जी के शब्‍दों में- इस पुस्‍तक के पहले दिनकर हिन्‍दी के एक श्रेष्‍ठ कवि के रूप में प्रसिद्ध थे, पर इस पुस्‍तक के प्रकाशन के बाद से वह एक गहन चिंतक तथा सुपठित मनीषी के रूप में हिंदी संसार में ही क्‍यों भारतीय साहित्‍य में आ गए।''[1]

धर्मग्रंथों द्वारा पोषित वैषम्‍य, परंपरा में व्‍याप्‍त अमानवीय दुराचरण के नंगे सत्‍य को आधुनिक युग में आदर्शवादी सुधारकों की अतिमानवीय सद्‌भावनाओं के साथ चार अध्‍यायों की प्रांजल भाषा में दिनकर जी ने ‘सामासिक संस्‍कृति' को प्रस्‍तुत किया है। किंतु उनकी यह प्रस्‍तुति उनका सर्वस्‍व नहीं है, उनके पास बहुत कुछ शेष था। विदेशी शासन में दिनकर का कवि, उन्‍मुक्‍त था, उन्‍हें विश्‍वास था पदच्‍युत होकर जनता में पद और प्रतिष्‍ठा दोनों मिलेगी। उनकी गर्जन और तर्जन के पीछे समूचा देश और गांधी का प्रभाव था। ‘‘सोचता हूं मैं कब गरजा था? जिसे लोग मेरा गर्जन समझते हैं वह असल में गांधी का था, उस आंधी का था जिसने हमें जन्‍मा था।''[1] दिनकर के मन की कसक अकारण न थी, राजनीति और दिल्‍ली का सम्‍मोहन संभव है ‘संस्‍कृति के चार अध्‍याय' की रचना के कारक रहे हों, अन्‍यथा दिनकर का घोषित मत था-

वैभव की दीवानी दिल्‍ली

कृषक मेघ की रानी दिल्‍ली

अनाचार, अपमान, व्‍यंग्‍य की

चुभती हुई कहानी दिल्‍ली[1]

सत्‍ताधारियों और उनके शुभचिंतकों द्वारा प्रतिष्‍ठित शास्‍त्र और साहित्‍य में व्‍यक्‍त अभिजात वर्गीय भारतीय संस्‍कृति को दिनकर जी ने ‘संस्‍कृति के चार अध्‍याय' में इस कुशलता से अभिव्‍यंजित किया है कि उसे भारतीय वांगमय का संक्षिप्‍त ज्ञानकोश कहना समुचित होगा, कम से कम हिंदी में तो वह अद्वितीय है ही। पर क्‍या यही राष्‍ट्र कवि से अपेक्षित था? शायद बिलकुल नहीं! कविताओं में दिनकर जी का राष्‍ट्रवाद विशाल जनता के पक्ष में मुखरित हुआ है। किसान, मजदूर, दलित, नारी आदि युगों के उत्‍पीड़ितों के हित में दिनकर का स्‍वर सदैव आक्रोश भरा रहा है। यह उत्‍पीड़न तथोक्‍त चार अध्‍यायों के कारण ही संभव हुआ था। अपनी कविताओं में दिनकर ने समन्‍वय की नहीं संघर्ष की वकालत की है। उन्‍होंने परम्‍परा में मौजूद रूढ़ियों पर प्रहार किया है, एक निश्‍चित पक्षधरता के साथ यथार्थ की कटुता को अभिव्‍यक्‍त किया है; जबकि चार अध्‍यायों का वर्णन करते हुए उनकी मूल चिंता उस ज्ञान में से ‘सत्‍य का अंश' खोजने की रही है ‘जिसका विकास पिछले छः हजार वर्षों में हुआ है।'[1] अपनी कविताओं में दिनकर ने ‘जो है' के साथ-साथ जो ‘हो सकता है' और जो ‘होना चाहिये' उस पर लगातार जोर दिया है। दिनकर जी का यह कवित्‍व पांचवें अध्‍याय की अपेक्षा करता है जो संभावित है। यह पांचवां अध्‍याय वह संस्‍कृति है जो जनता के जनवाद द्वारा निर्मित होगी। वर्तमान संस्‍कृति ने जो देश को दिया है उस संस्‍कृति ने देश में एक से एक रेशमी नगरों का निर्माण जारी रखा है, जो दिनकर जी को अभीष्‍ट न था उन्‍होंने अपने संपूर्ण ओज से चेतावनी दी थी-

होश करो दिल्‍ली के देवों होश करो

सब दिन तो यह मोहनी न चलने वाली है

होती जाती हैं गर्म दिशाओं की सांसे

मिट्‌टी फिर कोई आग उगलने वाली है

भावी संस्‍कृति के निर्माताओं को दिनकर जी ने न सिर्फ पहचाना बल्‍कि उनके भवितव्‍य की घोषणा करते हुए मौजूदा व्‍यवस्‍था के पोषकों को सिंहासन खाली करने का आदेश दिया-

आरती लिये तू किसे ढूढ़ता है मूरख

मंदिरों, राज प्रासादों में, तहखानों में?

देवता कहीं सड़कों पर गिट्‌टी तोड़ रहे,

देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में...

दो राह, समय के रथ का घरघर नाद सुनो

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।[1]

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1. तलाश


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मौसम साफ होने पर
कोई भी बाढ़ के खिलाफ
पोस्टर लगा सकता है
बिजली को गालियाँ
बक सकता है
तूफान के खिलाफ
दीवारों पर नारे
लिख सकता है

जब हवा शीतल हो
धूप मीठी हो
कोई भी क्रांति की
कहानियाँ सुना सकता है
लेनिन और माओ की
तस्वीरें टाँग सकता है
घर की दीवारों पर

लेकिन जब मौसम
बिगड़ता है
गिने-चुने लोग ही
घर से बाहर निकलते हैं
बिजलियों की
गरज से बेखबर
बाढ़ के खिलाफ
बांध की तरह
बिछ जाने के लिए

ऐसे कितने लोग हैं
धरती उन्हें
चूमना चाहती है प्यार से

2. आदमी होना


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उस पर इलजाम थे
कि वह झूठ नहीं बोलता
कि वह अक्सर
खामोश रहता है

उसे देखने को
लालायित थी भीड़
बहुत दिनों से कोई
दिखा नहीं था इस तरह
सच पर अडिग

वह बिल्कुल दूसरे
आदमियों जैसा ही था
हाथ, कान, आँख
सब औरों की ही तरह

भीड़ में घबराहट थी
कुछ उसे पागल
ठहरा रहे थे..
आत्महत्या पर उतारू है
बेवकूफ, मारा जायेगा

कुछ को याद आ रहीं थीं
ऐसे मरजीवों की कहानियाँ..
एक और आदमी
पगलाया हुआ
निकल आया था सड़क पर
सच की सलीब पर
खुद को टांगे
हिम्मत से बढ़ा था
पर उसकी हिम्मत से बड़ा
निकला था एक खंजर
लपलपाता हुआ
उसके सीने में उतर गया
वह सच बोलते-बोलते रह गया

कुछ युवक भी थे
भीड़ में से उचकते हुए
उस आदमी तक पहुंचने
उसे छू लेने को व्याकुल
उन्होंने पढ़ा था
झूठ हमेशा हारता है
उन्हें अभी तय करना था
सच की राह चुनें या नहीं

जैसे ही वह बोलने
को तैयार हुआ
चारों ओर सन्नाटा छा गया
वह बोलता तो
भूख और मौत की नींव पर
खड़ी की गयीं इमारतें
भरभराकर ढह जातीं
निरपराधों के खून से
सींचकर उगाया गया
ऐश्वर्य द्वीप डूबने लगता
वह बोलता तो
आदमी के चेहरे लगाये
भेड़िये पहचान लिये जाते

पर हर बार की तरह
इस बार भी वही हुआ
उसके इशारे से पहले ही
एक सनसनाती हुई गोली
उसके शब्दों को
वेधती हुई निकल गयी
वह पहाड़ की तरह गिरा
सच को सम्हाले

वह मर गया
पर सच जिंदा था
कल फिर कोई निकलेगा
आदमी होने का
एलान करते हुए
सच उजागर होने तक
बार-बार मरकर भी
उठ खड़ा होगा मरजीवा

3. कहां है आदमी


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आदमी है कहां, किधर
कोई बतायगा मुझे
चुप क्यों हैं सब के सब
कोई बोलता क्यों नहीं

अपने बच्चों का ध्यान
तो जानवर भी रखते हैं
अगर तुमने भी इतना ही
सीखा अभी तक
तो तुम उनसे अलग कैसे

भैंसे बंधती हैं
जिसके खूंटे से
दूध देती हैं उसे
तुम भी अगर किसी के
खूंटे से बंध गये हो
क्योंकि वह तुम्हें
डाल देता है चारा
जो वह चबा नहीं पाता
और बदले में दूहता
रहता है तुम्हें
तो तुम पालतू से
ज्यादा क्या समझते हो
अपने-आप को
कैसे मान लूं कि तुम
अब कभी दहाड़ सकोगे
निर्भय वनराज की तरह

जिनकी मूंछें बड़ी हैं
जिनकी आवाज में
कुछ भी कर गुजरने का
झूठा ही सही पर
सधा हुआ दर्प है
जो बड़ा से बड़ा अपराध
करके भी हथकड़ियों में
कभी नहीं बंधते
जिनके लिए थाने
घर की चौपाल की तरह हैं
जिन्हें अपनी कुर्सियाँ सौंप
देते हैं सरकारी अफसरान
डर से ही सही
जिनका प्रवचन
सभी लगाते हैं सर माथे
जिनकी गुलामी बजाती हैं
गैरकानूनी बंदूकें

मैंने देखा है
बार-बार उनके दरबार में
दुम हिलाते हुए
पूंछ दबाकर करुणा की
भीख मांगते हुए
निहुरे, पांवों में गिरे हुए
चारणों की जमात को
गिरवी रख चुके खुद को
निजता से हीन, दीन
मिमियाते, घिघियाते
हुक्म बजाते

इन्हें आदमियों में आखिर
क्यों गिना जाय
सिर्फ इसलिए कि ये
आदमी जैसे दिखते हैं
दो पांवों पर चलते हैं
कभी-कभी मनुष्य की
आवाज निकाल लेते हैं

इन मरे हुओं के हुजूम में
मैं ढूंढ रहा हूं उन्हें
जिनमें आदमीयत बाकी है
कोई बतायेगा इनमें
वो कहां है, जिसने
बचाया था मासूम लड़की को
जिस्मफरोशों के चंगुल से
वो कहां है जिसने
पड़ोसी के घर में घुसे
आतंकवादी को अपनी
भुजाओं में जकड़ लिया था
और उसकी बंदूक मरोड़ दी थी
और वो कहां है
जो अपाहिज हो गया
बलात्कारियों से जूझते हुए
जिसने गांव की
इज्जत से खेलने वाले
बदमाश को बाइज्जत जमानत
मिलते ही कोर्ट के बाहर
ढेर कर दिया था

मुझे उन कायरों की
कोई दरकार नहीं है
जो सड़क पर लहूलुहान पड़े
बच्चे के पास से गुजर जाते हैं
फिर भी आंखें पसीजतीं नहीं
मुझे उन हतवीर्यों से क्या लेना
जो चाकू हाथ में लहराते
मुट्ठी भर बदमाशों को
ट्रेन का पूरा डिब्बा लूटते देखते हैं
और इस झूठी आस में
कि शायद वे लुटने से बच जायें
अपनी बारी आने तक
जुबान और हाथ
दोनों बंद रखते हैं
मुझे उन बिके हुए लोगों
की भी जरूरत नहीं है
जो चोरों, बेइमानों का
रात-दिन गुणगान करते हैं
सिर्फ इसलिए की उन्हें
सरकारी ठेके मिलते रहें
कमीशन बनता रहे

देखो, पड़ताल करो
कोई तो जिंदा बचा होगा
किसी की तो सांस
चल रही होगी
कोई तो अपने
लहूलुहान पांवों पर
बार-बार खड़ा होने की
कोशिश कर रहा होगा
कोई तो अनजान डरे हुए
बच्चे को बांहों के
घेरे में संभाले
जूझा होगा अपहर्ताओं से
ढूंढो शायद कोई
मंजुनाथ घायल पड़ा हो
कोई सत्येंद्र तुम्हारे आने के
इंतजार में हो

--
डॉ. सुभाष राय
ए-१५८, एम आई जी, शास्त्रीपुरम, बोदला रोड, आगरा

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उन्हें-

पड़ोस की वह

छोटी सी बिटिया बहुत अच्छी लगती थी।


वह उसे-

बिटिया ही कहते थे

सुंदर, लाडली, मासूम बिटिया।


और बिटिया-

‘बिटियों’ के साथ ’बिटिया’ नहीं,

’बड़े’ के साथ ’बड़ा’ बन जाना चाहती थी।


बड़े सपने, बड़ी बातें, बड़ा सोचना,

बड़ा सुनना, बड़ा सुनाना, बड़ा देखना

बड़ा दिखना, बड़ी कहानी, बड़े गीत

बड़ा राजा, बड़ी रानी

हां... एक छोटी सी राजकुमारी बस्स...

’बड़े’ का तो मुंह ही

’बड़ा’ कर देती थी।


बड़े खड़े होते तो-

कमर के आस-पास के कद को

पंजों पर उचकाती,

देखो न, मैं बड़ी हो गई हूं।


और बड़े-

उसे, अपने शांत आलिंगन में समेटकर

बस्स, चूमते ही चले जाते।


या कि, तुम गोद में बैठी रहो,

न, मैं तो न बैठती

अब बड़ी हो गई हूं, देखो।


अपनी झालरदार फ्रॉक पकड़ती

और, झूमने लगती,

बड़े, एकटक निहारते रहते।

बिटिया कभी-कभी

छोटी सी बात भी कह देती,

आप, मेरे पापा से अच्छे हैं,

आप, मेरे पापा होते

मेरे पास रहते

मुझे प्यार करते।


कि, बड़े सकपका जाते

बड़ी-बड़ी बातें सिखाने लगते।

मम्मी कहती-

बिटिया, अधिक न जाया करो वहां।

कि, ऊं हू मम्मी

आप और पापा का घर आफिस

और मेरा!

मम्मी सकपका जाती।


एक रात-

एक अंधेरे कोने में दुबकी

सिसक रही थी,

उसकी झालरदार फ्राक,

और चड्डी, मुंह में ठुंसी

मना रही थी मातम

लाज न बचा पाने का।


बड़ी-बड़ी आंखें, बड़ी-बड़ी

बिटिया वाकई बड़ी हो गई।

और बड़े-

लापता हो गए थे।

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द सुनील संवेदी

उपसंपादक, हिंदी दैनिक जनमोर्चा

54, सिविल लाइंस, बरेली,यूपी

email-

bhaisamvedi@gmail.com

suneelsamvedi@rediffmail.com

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जिम्मेदार कौन ?

नेता ने जनता से बोला ये रोना-धोना छोड़

बात पुरानी बोझ बन गई उसको ढोना छोड़

बाढ़ प्रभावित क्षेत्र हैं कारण कहा हाथ को जोड़

तू मंहगाई का कोई ठीकरा मेरे सिर मत फोड़ ॥ १॥


अनाज सड़े गोदाम से बाहर किसको सुध है भाई

नाम,पता गोदाम का लेकर ट्रक में शराब है आई

अब सरकारी गोदामों में अवैध माल संभलेगा

राशन की दूकान पर लिखा "चीनी नहीं है आई"॥ २॥


धरती छोटी बड़ी आबादी,प्रजनन की आजादी

कंक्रीट के जंगल देखो और खेतों की बर्बादी

दूध,अनाज,फल जहर मिले हैं मरने की आजादी

दोष नहीं यह सरकारी है व्यवसायिक आजादी ॥ ३॥


फैशन के इस दौर में नकली अब सामान मिलेगा

अजी पैसे भी तब देने होंगे जब सामान मिलेगा

बाजारवाद की महिमा को तब तुम भी समझोगे

तेरे ही घर की बाजारों में अमेरिका,जापान मिलेगा ॥ ४॥


आतंकवाद है एक खिलौना मिलकर सब खेलेंगे

दद्दा ने ही हुक्म दिया है इसे अब की हम झेलेंगे

विकासवाद की इस थ्योरी को भारत जब पढ़ लेगा

जब दद्दा का आदेश मिलेगा तब और लोग खेलेंगे॥ ५॥


शोभा गुप्ता
जनकपुरी,नई दिल्ली
३० जुलाई २०१०   

मुंशी प्रेमचंद (1880-1936) को वर्णवादी आलोचक साहित्य जगत का बरगद मानते आ रहे हैं। बरगद तक पहुँचाने में उनकी कितनी ही खामियाँ ढंक-दबा दी गईं। यह ठीक वैसे ही रहा जैसे मूर्ति की महिमा ही गाई जा सकती है, प्रतिकार अक्षम्य है।

इस तथ्य से कितने रूबरू हैं कि प्रेमचंद ग्राम्य जीवन और लोक परंपराओं से नितांत अनभिज्ञ थे। वे घोर ईश्वरवादी, भाग्यवादी और वर्णवादी थे तथा छुआछूत और जातपांत में उनका अटूट विश्वास था। यहाँ यह तथ्य भी पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है कि प्रेमचंद- साहित्य में श्लीलता का प्रायः अभाव है और उनकी भाषा में लियाकत नहीं होने के कारण पाठक मन को कचोटती है। विशेषतः दलितों के बारे में वे जिस भाषा-शैली का प्रयोग करते हैं, वह हृदय ही चीर डालती है।

बावजूद इसके मार्क्सवादी सोच का यह मानना है कि प्रेमचंद ने उस समय दलितों के बारे में लिखा, जब लोग उनकी छाया से भी दूर भागते थे। क्या यह तर्क इस दायरे में नहीं आता कि कोई किसी अछूत को थप्पड़ मार दे और यह तर्क दे कर उसकी प्रशंसा की जाये देखो, ‘उसने ‘अछूत’ को छुआ तो सही, दूसरे लोग तो उसकी छाया से भी दूर भागते हैं।’

कहना होगा कि प्रेमचंद-साहित्य में न दलित नेतृत्व है, न दलित चरित्र। उनकी रचनाओं के कथानक धर्मशास्त्रों के सूक्तों से ऊपर नहीं उठ पाये हैं। शास्त्र, जो अपने अंतस में पूर्वाग्रह समाये होने के कारण शूद्रों के लिये ‘‘शस्त्रों’’ से भी ज्यादा मारक साबित हुये हैं, प्रेमचंद की कलम ‘‘शास्त्र बनाम शस्त्र’’ के गिर्द घूमती है।

बतौर उदाहरण- ‘‘भंगी तो भंगी ही रहेंगे, उन्हें आदमी नहीं बनाया जा सकता है।’’ (दूध का दाम)

‘‘जो अपना धर्म पाले वही ब्राह्मण है और धर्म से मुंह मोड़े वही चमार है।’’ (गोदान) ‘‘चमारों को जानते हो, एक ही हत्यारे होते हैं, इसी हरिहर ने मेरी दो गऊएँ मार डालीं।’’ (मुक्तिमार्ग)

मुंशी प्रेमचंद और उनकी विचारधारा को समझने के लिये कतिपय तथ्य समीचीन जान पड़ते हैं। इनमें विचारधारात्मक अन्तर्द्वन्द्व भी है और विरोधाभास भी।

तुलसीदास सगुणधारा या द्वैतवाद के अग्रणी भक्त कवि हैं। उन्होंने ‘‘रामचरित मानस’’ जैसा ग्रन्थ प्रणीत कर दशरथ पुत्र राम को ईश्वर-रूप प्रदान किया है। तुलसीदास का यह कार्य हिन्दुत्व की सूखती धारा को पुनर्जीवित करने में अविस्मरणीय योगदान कहा गया है। तुलसीदास कट्टर हिन्दू थे और उन्होंने हिन्दूधर्म शास्त्रों का ध्येय अपने सृजन में समावेश किया। इसके चलते मार्क्सवादी विचारक उनको धर्मनिरपेक्षता में बाधक मान कर तुलसी जयंती में शामिल नहीं होते हैं।

सच्चा हिन्दू होने के कारण प्रेमचंद तुलसीदास को अपना आदर्श मानते रहे। उनके प्रति अपनी अनन्य आस्था के चलते वे तुलसीदास मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिये बड़े चिंतित थे। जुलाई 1933 में लिखे अपने लेख- ‘‘तुलसी स्मृति तिथि कैसे मनाये?’’ जो वर्तमान में प्रेमचंद के विचार भाग दो में संकलित है, में उनकी यह व्यग्रता व्याकुलता की जद तक पहुंच जाती है।

वे अपने इस लेख में हिन्दू महासभा, जिसके वे प्रचारक जैसे रहे और बड़े प्रशंसकों में थे, का आह्वान करते हैं - ‘‘तुलसीदास जी ने हिन्दू धर्म और हिन्दू जाति का जो उपकार किया है, उसके वर्णन का यहाँ स्थान नहीं है। उन्होंने हिन्दू सभ्यता और हिन्दू संस्कृति की बड़ी रक्षा की है। हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज उनके उपकार भार से कभी मुक्त नहीं हो सकता। इसलिये हिन्दू जाति का प्रतिनिधित्व करने वाली हिन्दू महासभा का भी कर्त्तव्य है कि वह इस दिशा में अपनी कुछ शक्ति लगावे।’’

तुलसीदास की स्तुति में लिखे गये अपने इस लेख में प्रेमचंद हिन्दू, हिन्दू धर्म, हिन्दूजाति, हिन्दूसमाज, हिन्दूसाहित्य, हिन्दूसंस्कृति और मूर्तिपूजा पर केन्द्रित रहे हैं। यहाँ उन्होंने मानव जाति या मानव धर्म की कहीं चर्चा नहीं की है।

इसी लेख में वे आगे बूझते हैं - ‘‘काशी में अन्यत्र तुलसीदास जी का एक मंदिर भी है, जिसके विषय में कहा जाता है कि वह काशी नरेश की सहायता से बना है। उसमें गोस्वामी जी की एक शुभ्र प्रस्तर - मूर्ति स्थापित है, जो उनके असली चित्र के आधार पर तैयार की गई है। सुनते हैं, उसी असली चित्र को काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने प्रकाशित किया है। लेकिन हमने आज तक उस मंदिर को तीर्थ का रूप नहीं दिया। अस्सीघाट के तुलसी मंदिर में जो खडाऊ तुलसीदास जी की रखी हैं, उसकी ओर हमारा ध्यान नहीं गया।’’

अब यहां पाठक की एक बहुत बड़े विरोधाभास से मुठभेड़ होती है। वह यह कि मार्क्सवादी प्रेमचंद जयंती मनाना अपने कर्त्तव्यबोध की शुमार मानते हैं, विपरीत इसके तुलसीदास के विचारों को वे अपनी विचारधारा से अलग रखकर उनकी जयंती में शामिल तक नहीं होते, जबकि हिन्दूवादी विचारधारा के संवर्द्धन के कारण प्रेमचंद, तुलसीदास को अपना आदर्श मानते हैं और धर्म गुरू जैसा आदर देते हैं।

गौतम बुद्ध डॉ. अम्बेडकर के धार्मिक और महात्मा फूले सामाजिक आदर्श और गुरू थे। जब डॉ. अम्बेडकर की जयंती मनाई जाती है तो बुद्ध और फूले की तस्वीरें भी डॉ. अम्बेडकर के चित्र के साथ रखी जाती हैं और पुष्पांजलि द्वारा समादृत होती हैं। प्रेमचंद जयंती के अवसर पर प्रेमचंद के चित्र के साथ उनके आदर्श और उपास्य तुलसीदास का चित्र भी माल्यार्पण द्वारा आदर पाये।

सरदार भगतसिंह को 23 मार्च, 1931 के दिन लाहौर की जेल में फांसी हुई थी। उस दिन वे साढ़े 23 वर्ष के युवा थे। फांसी पर चढ़ने से पहले उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व और खुद के अईश्वरी होने पर एक बहुत ही उम्दा लेख लिखा था- ‘‘मैं नास्तिक क्यों हूँ।’’ वे अपने इस लेख में लिखते हैं-’’ मैं नहीं जानता कि ईश्वर में विश्वास और रोज-रोज की प्रार्थना, जिसे मैं मनुष्य के लिये सबसे स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ, मेरे लिये सहायक सिद्ध होगी या मेरे केस को और चौपट कर देगी। मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा है, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया, अतः मैं एक पुरूष की भांति फांसी के फंदे की अंतिम घड़ी तक सर ऊंचा किये खड़ा रहना चाहता हूँ।’’

वे इसी लेख में बड़ी बेबाकी से लिखते हैं - ‘‘मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा। जब मैंने उसे अपने नास्तिक होने की बात बतलाई तो उसने कहा, ‘‘अपने अंतिम दिनों में विश्वास करने लगोगे।’’ मैंने कहा, ‘‘नहीं प्यारे दोस्त ऐसा नहीं है। मैं इसे एक अपमानजनक तथा भ्रष्ट होने की बात समझता हूँ। स्वार्थी कारणों से मैं प्रार्थना नहीं करूंगा।’’

अगर भगत सिंह शहीद नहीं हुए होते तो न केवल भारत के ही बल्कि, विश्व के भी एक बहुत बड़े धर्मनिरपेक्ष विचारक और साहित्यिक होते।

मुंशी प्रेमचंद ने सन् 1920 में अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया था। उस समय वे 40 वर्ष के थे। उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी से अपना इस्तीफा क्यों दिया, इसके दो हेतु माने जाते हैं। बहुप्रचारित यह है कि असहयोग आंदोलन के दौरान जब गांधी जी ने गौरखपुर का दौरा किया तो उनकी सभा में प्रेमचंद भी शरीक हुए। उन्होंने गांधी जी की प्रेरणा पा कर स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के लिये अपनी नौकरी छोड़ दी। अंदरूनी कारण यह दृष्टिगोचर होता है कि उन दिनों घातक मानी जानेवाली पेचिश जैसी बीमारी ने प्रेमचंद को बुरी तरह जकड़ा हुआ था। आव और खून आने लगे थे। नौकरी पर जाना तो दूर, दुर्बलता ने इतना घेर लिया था कि उनका दो कदम चल पाना भी दूभर हो रहा था। अंग्रेज राज में शिष्टाचार और अनुशासन का डंका बजता था। जब कतई पार नहीं पड़ी तो उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उस समय उनके पास तीन हजार रूपये नकद थे, जो आज के हिसाब से 7-8 लाख रूपये बैठते हैं। इस बड़ी राशि के बूते उन्होंने हंस और जागरण जैसे प्रेस-प्रकाशन खड़े किये।

वे अपने आत्म कथ्य ‘‘जीवन सार’’ में लिखते हैं - ‘‘वहाँ (देहात) जाने के लिये एक सप्ताह बाद मेरी पेचिश कम होने लगी। यहां तक कि एक महीने के अंदर मल के साथ आव का आना बंद हो गया। फिर मैं काशी चला गया और अपने देहात में बैठ कर कुछ प्रचार और कुछ साहित्य सेवा में जीवन को सार्थक करने लगा। गुलामी से मुक्त होते ही मैं नौ साल के जीर्ण रोग से भी मुक्त हो गया।’’

वे इस लेख में आगे लिखते हैं - ‘‘इस अनुभव ने मुझे कट्टर भाग्यवादी बना दिया है। अब मेरा दृढ़ विश्वास है कि भगवान की जो इच्छा होती है, वहीं होता है और मनुष्य का उद्योग भी उसकी इच्छा के बिना सफल नहीं होता।’’

भगवान के इस भय ने प्रेमचंद के मानस में इस कदर घर कर लिया कि उनकी 1920 के बाद की रचनाओं में भाग्य-भगवान, पाप-पुण्य, आत्मा-परमात्मा, देवी-देवताओं, भूत-प्रेत और मंदिर-मूर्ति के गुणगान का अतिरेक होने लगा। यह गुणगान पात्रों द्वारा कथोपकथन के माध्यम से भी कराया गया और स्वयं प्रेमचंद ने कथ्य के विकास के बरअब्स भी ऐसा किया। उनके अंतिम दिनों में लिखे गये ‘‘गोदान’’ (1935-36) में तो शास्ता-स्तुति चरम पर पहुंच जाती है। गोदान में लगभग 200 बार ईशरूप महिमामण्डित है। गोदान कराकर तो वे पूरी तरह ब्राह्मणवाद की गोद में जा बैठते हैं। सही मायने में मुंशी प्रेमचन्द प्रगतिशील अथवा जनवादी न होकर हिन्दुवादी सोच के विपर्यय थे।

अब यहां पाठक की एक और वैचारिक विरोधाभास से मुठभेड़ होती है। यह मुठभेड़ पहली मुठभेड़ से ज्यादा घनघनाती है। अपनी किस प्रतिबद्धता के चलते प्रेमचंद जयंती बड़े उत्साह से मनाते हैं, जबकि भगत सिंह जयंती या शहीदी दिवस मनाने के अवसर पर प्रायः उदासीन रहते हैं, क्यों ? क्या महज इसलिये क्योंकि मुंशी प्रेमचन्द ने 9 अप्रैल 1936 को लखनऊ में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना समारोह का उद्घाटन किया था?

इसे अतिशयोक्ति कहना नाइंसाफी होगी कि शिल्प और कथ्य के निर्वाह की दृष्टि से जिस प्रकार प्रेमचंद की 224 (प्रेमचंद के पुत्र श्री अमृतराय का ‘कलम के सिपाही’ में काल खण्ड) कहानियों पर चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘‘उसने कहा था’’ कहानी भारी है, उसी प्रकार प्रेमचंद के तीन जिल्दों में प्रकाशित ‘‘प्रेमचंद के विचार’’ में संकलित तमाम लेखों पर शहीद भगत सिंह का यह वैचारिक लेख- ‘‘मैं नास्तिक क्यों हूँ।’’ भारी है।

प्रेमचन्द की प्रदर्शनवादिता, हिन्दूवादिता और भाग्यवादिता के ऊपर दिये गये उदाहरण उनके साहित्य में दलितोल्लेख के संदर्भ में तीखेपन और घृणास्पद रूप में सामने आते हैं। अंततः प्रवृति ही तो मनुष्य के व्यवहार की निर्माता होती है।

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रत्नकुमार सांभरिया

भाड़ावास हाउस

सी-137, महेश नगर,

जयपुर-302015

प्रो. सी. पी. जोशी professor c p joshi

 

षष्टिपूर्ति - 29.7.10 पर

सतत संघर्षशील व्‍यक्‍तित्‍व -डा़.प्रो.सी.पी.जोशी

यशवन्‍त कोठारी

सी.पी.जोशी एक कर्मठ राजनेता, अदभुत प्रतिभा के धनी, संघर्षशील व्‍यक्‍ति है। उनमें संगठन, पार्टी और सरकार की गहरी समझ है। उनमें गजब की संगठन क्षमता और राजनैतिक सूझबूझ है। राजनीति के सिद्धान्‍तों को चुनाव क्ष्‍ोत्रों में अपनाना और सफल होना उनकी विशेषता है। अकेले दम पर उन्‍होंने पूर्ववर्ती सरकार को उखाड़ फेंका उनसे मेरा परिचय काफी पुराना है। नेतृत्‍व करने के गुण सी.पी. में प्रारम्‍भ से ही थे। उन्‍होंने नाथद्वारा के हायर सैकण्‍डरी स्‍कूल में छात्रसंघ अध्‍यक्ष का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। ग्‍यारहवीं के बाद सी.पी.जोशी उदयपुर जाकर पढ़ाई करने लग गये। मैंने नाथद्वारा कालेज में दाखिला ले लिया। मगर हमारा सम्‍पर्क बराबर बना रहा। मोहनलाल सुखाड़िया से मिलने हम लोग एक-दो बार साथ-साथ गये थे। सी.पी. ने भौतिकशास्‍त्र में एम.एस.सी. किया नौकरी मिली मगर नहीं की। मैंने राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय जयपुर से रसायन विज्ञान में एम.एस.सी. कर नौकरी शुरू कर दी। सी.पी. ने एम.बी. कालेज के छात्रसंघ व उदयपुर विश्‍वविद्यालय के चुनाव लड़े। जीते।

नौकरी मिली मगर सी.पी. के मन में तो देश की सेवा की इच्‍छा थी। सी.पी. ने मनोविज्ञान में एम.ए.पी.एचडी भी की। कानून की पढ़ाई पूरी की। विश्‍वविद्यालय में प्राध्‍यापक हो गये। एम.एल.ए. का टिकट नाथद्वारा से मिला चुनाव लड़ा। जीता। एम.एल.ए. के रूप में भी सी.पी. का काम प्रभावशाली रहा। नाथद्वारा में कामरेड की होटल पर या तृप्‍ति केफे में हम लोग अक्‍सर समय मिलने पर बैठते। नाथद्वारा राजस्‍थान के विकास की चर्चा करते। चाय पीते। हंसी मजाक करते । मैं, विष्णु, जमनादास, जगजीवन तलेसरा, मुरली भाटिया साथ-साथ विचरण करते। सी.पी. की राजनीतिक प्रखरता के हम लोग कायल थे। चारू मजुमदार, चेग्‍वारा के विचारों का विश्लेषण होता वे महात्‍मा गांधी, नेहरू के विचारों से प्रभावित थे।

उन्‍हीं दिनों सी.पी.जोशी का एक्‍सीडेन्‍ट हो गया था। उसका घर ही हम सब के लिए मिलन स्‍थल बन गया। बात चीत के साथ-साथ समय भी तेजी से चलता रहा। बनास नदी में काफी पानी बह गया था। सी.पी. ने मोहनलाल सुखाडिया से राजनीति की गहरी सीख ली। बहुत कुछ सीखा। बाद के वर्पो में मास्‍टर किशनलाल जी शर्मा -गौरूलाल जी तथा हरिदेव जोशी से भी बहुत कुछ जाना समझा। बीच में एक दौर राजनैतिक वनवास का भी आया। सी.पी. एक चुनाव हार गये और एक बार टिकट नहीं मिला। लेकिन सी.पी. ने हिम्‍मत नहीं हारी। सतत संघर्प करते रहे वे विश्‍वविद्यालय में प्राध्‍यापक, बाद में प्रोफेसर बने वे राजनीति की भी सीढ़ियां चढ़ते रहे। वे गहलोत सरकार में कई विभागों के मंत्री रहे। फिर कांग्रेस के प्रदेश अध्‍यक्ष रहे, एक वोट से एम.एल.ए. का चुनाव हार गये। फिर सांसद का चुनाव लड़ा, जीता और केन्‍द्र में केबिनेट मंत्री के पद को सुशोभित किया। उनके नेतृत्‍व में ग्रामीण विकास के क्ष्‍ोत्र में देश नयी मंजिलें तय करेगा।

सी.पी. के दामन पर कोई दाग नहीं है वे चरित्रवान है। इर्मानदारी, स्‍पप्‍टवादिता, और जो कहो सेा करो, सी.पी. के ध्‍येय वाक्‍य है। वे शुरू से ही राजनीति में अर्थ शुचिता के पक्षधर है। अपने लगभग तीस वर्पो के राजनैतिक केरियर में उन पर आजतक किसी ने उंगली नहीं उठाई , उनके विरोधी भी उनकी इज्‍जत करते है। भाषा, धर्म, जाति की राजनीति से वे कोसों दूर हैं। लम्‍बे समय बाद मेवाड़ क्ष्‍ोत्र से किसी को केबिनेट मंत्री पद मिला है। राजस्‍थान से फिलहाल वे एक मात्र केबिनेट मंत्री है। मेवाड़ का परचम उन्‍होंने ही फिर लहराया है। आपाधापी के इस युग में वे एक धीर गम्‍भीर राजनेता की छवि रखते है जो सुकून देती है।

मनोविज्ञान में बर्न-आउट सिद्धान्‍त पर उन्‍होंने पी.एचड़ी.की है। उनके शोधपत्र भी प्रकाशित है। ग्रामीण विकास मंत्री के रूप में सी.पी. जोशी ने नरेगा का नाम महात्‍मा गांधी के नाम पर रख कर एक अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण योजना को अच्‍छा नाम दिया गया है। पंचायती राज मंत्री के रूप में उन्‍होंने पंचायती राज चुनावों में महिलाओं को पचास फीसदी आरक्षण का कानून बनवा कर एक क्रान्‍तिकारी कदम उठाया है। पिछले दिनों राजस्‍थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्‍यक्ष पद का चुनाव जीत कर उन्‍होंने राजस्‍थान में मृतप्रायः क्रिकेट को नव जीवन प्रदान किया है।

सी.पी. जोशी हौसलों के सहारे उड़ते है और अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं। उनका व्‍यक्‍तित्‍व अब एक राष्ट्रीय राज नेता के रूप में विकसित हो गया है। मिलन सरिता और सहज उपलब्‍धता के कारण सी.पी. जोशी सब के चहेते हैं और उनके दरवाजे सब के लिए हर समय खुले हुए हैं। त्‍वरित निर्णय लेने में उन्‍हें महारत हासिल है तथा निर्णयों को वे टालते नहीं है।

कांग्रेस संगठन की बागडौर भी उन्‍होंने प्रभावशाली तरीके से सम्‍भाल रखी है वे केवल दिल की आवाज सुनते हैं। उन्‍होंने हमेशा मोटा खाया। मोटा पहना। उनका दर्शन है कि भारत से भूख, गरीबी मिटे और सभी को समान अवसर मिले। सभी को स्‍वास्‍थ्‍य शिक्षा, शुद्ध पेयजल और रोजगार मिले। ग्रामीण रोजगार योजना से यह लाभ ग्रामीण भारत तक पहुंचाने का महता काम वे कर रहे हैं। षष्टिपूर्ति के इस पावन पर्व पर मैं उनका अभिनन्‍दन करता हूं तथा उनके दीर्घ एवं स्‍वस्‍थ जीवन की कामना करता हूं। वे सौ वर्ष जिये। सौ वर्ष देखें और सौ वर्ष सुनें, तथा ये सौ वर्ष देश की गरीब जनता की सेवा में लगायें।

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यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596

      भिखारी  
[निराला जी की आत्मा से क्षमा याचना सहित ]

-- वह आता!

मोबाइल पर बतिआते ,

निश्चिन्त-भाव से आता.

आकर कॉल-बेल बजाता.

भीख कहे या हफ्ता--

हर हफ्ते आकर ले जाता .

हरदम भरा रहता उसका पेट

अठन्नी उठा कर देता फेंक

पांच रूपया से कम मिलने पर

बहुत देर गरियाता

कभी-कभी उपदेश भी देता ,कहता-

"कब तक स्कूटर घसिटोगे साब!

क्यों चार चक्का नहीं ले आता"

वह आता !

मैं उसे देख घबराता

. .                                                                           

v k verma
vijayvermavijay560@gmail.com

हिन्‍दी के दोहे

(हिन्‍दी महिमा)

हिन्‍दी मे गुण बहुत है, सम्‍यक देती अर्थ।

भाव प्रवण अति शुद्ध यह, संस्‍कृति सहित समर्थ॥1॥


वैयाकरणिक रूप में, जानी गयी है सिद्ध।

जिसका व्‍यापक कोश है, है सर्वज्ञ प्रसिद्ध॥2॥


निज भाषा के ज्ञान से, भाव भरे मन मोद।

एका लाये राष्‍ट्र में, दे बहु मन आमोद॥3॥


बिन हिन्‍दी के ज्ञान से, लगें लोग अल्‍पज्ञ।

भाव व्‍यक्‍त नहि कर सकें, लगे नहीं मर्मज्ञ॥4॥


शाखा हिन्‍दी की महत्‌, व्‍यापक रूचिर महान।

हिन्‍दी भाषा जन दिखें, सबका सबल सुजान॥5॥


हिन्‍दी संस्‍कृति रक्षिणी, जिसमे बहु विज्ञान।

जन-जन गण मन की बनी, सदियों से है प्राण॥6॥


हिन्‍दी के प्रति राखिये, सदा ही मन में मोह।

त्‍यागे परभाषा सभी, मन से करें विछोह॥7॥


निज भाषा निज धर्म पर, अर्पित मन का सार।

हर जन भाषा का करे, सम्‍यक सबल प्रसार॥8॥


देश प्रेम अनुरक्‍ति का, हिन्‍दी सबल आधार।

हिन्‍दी तन मन में बसे, आओ करें प्रचार॥9॥


हिन्‍दी हिन्‍दी सब जपैं, हिन्‍दी मय आकाश।

हिन्‍दी ही नाशक तिमिर, करती दिव्‍य प्रकाश॥10॥


हिन्‍दी ने हमको दिया, स्‍वतंत्रता का दान।

हिन्‍दी साधक बन गये, अद्‌भुत दिव्‍य प्रकाश॥11॥


नहीं मिटा सकता कोई, हिन्‍दी का साम्राज्‍य।

सुखी समृद्धिरत रहें, हिन्‍दी भाषी राज्‍य॥12॥


हिन्‍दी में ही सब करें, नित प्रति अपने कर्म।

हिन्‍दी हिन्‍दुस्‍थान हित, जानेंगे यह मर्म॥13॥


ज्ञान भले लें और भी, पर हिन्‍दी हो मूल।

हिन्‍दी से ही मिटेगी, दुविधाओं का शूल॥14॥


हिन्‍दी में ही लिखी है, सुखद शुभद बहु नीति।

सत्‍य सिद्ध संकल्‍प की, होती है परतीति॥15॥



वृद्ध

बड़े हमारे पूज्‍य हैं, वही हमारी शान।

घर में इज्‍जत हो सदा, सदा करें सम्‍मान॥1॥


वृद्ध संग अनुभव मिले, अद्‌भुत ज्ञान अपार।

वृद्ध वृहद गुण पुंज हैं, करिये सब सत्‍कार॥2॥


जिस घर वृद्ध दुःखी रहे, अधम जानिये आप।

दान धर्म सब क्षीण हो, कलियुग का यह माप॥3॥


हो बुजुर्ग हित कामना, मन में सेवा कर्म।

मन की इच्‍छा पूर्णकर, पूर्ण करें सब धर्म॥4॥


अगर कष्‍ट हो वृद्ध को, मन में हो सन्‍ताप।

सुफल पुण्‍य होते नहीं, लगता मन को पाप॥5॥


इज्‍जत, सेवा भाव से, मिलता है आशीष।

कुल कुटुम्‍ब मे हर्ष हो, खुश रहते है ईश॥6॥


पूजित रक्षित सब करें, वृद्ध देव का रुप।

कर्म अलौकिक जानिये, सम्‍यक सबल अनूप॥7॥


गुण, अनुभव अर्जित करे, ज्ञान निधि को जान।

अगर किये सम्‍मान तो, मिलेगा बहु सम्‍मान॥8॥


वृद्ध सदा देते रहे, कुल को धन मन ज्ञान।

केवल वह है ढूंढ़ते, हमसे बस सम्‍मान॥9॥


उनके मत को मत करें, कभी आप प्रतिकार।

अहंभाव निज मारकर, कर सेवा सत्‍कार॥10॥



सच्‍चाई

मैंने स्‍वप्‍न अनूठा देखा, जग को जग से रूठा देखा।

चढ़े देवताओं पर जल औ, पुष्‍प दुग्‍ध की बात कहे क्‍या

मंदिर से जो मिलते अमृत, सब प्रसाद को जूठा देखा।

मैंने स्‍वप्‍न अनूठा देखा, जग को जग से रूठा देखा॥1॥


लोगों का मन खाली इतना, छेद भरे है दिल के अन्‍दर

पर ऊपर का हृदय आवरण, सज्‍जित बूटा बूटा देखा।

मैंने स्‍वप्‍न अनूठा देखा, जग को जग से रूठा देखा॥


मान न पाता सत्‍य को मानव, जो असत्‍य है सत्‍य लगा

हठ के वश मे नाच वृषभ अस, बंधा हुआ एक खूंटा देखा।

मैंने स्‍वप्‍न अनूठा देखा, जग को जग से रूठा देखा॥


जितना लूटा किया इकट्‌ठा, पर पीड़ा की बात न सोची

लेकिन ‘नन्‍द' छिना जब जिसका, उसी को हमने लूटा देखा।

मैंने स्‍वप्‍न अनूठा देखा, जग को जग से रूठा देखा॥



वाह विधाता

मानव का वश तब तक चलता, जब तक उसका जीवन है।

दम्‍भ भरा है तब तक उसमें, जब तक उसके संग धन है।


ईश वन्‍दना, अर्थ कल्‍पना, पूरक बन जाते उसके।

माया का जंजाल सताता, स्‍वार्थ हृदय आते जिसके।


पर जीवन हित सोच न पाया, यह जीवन का खेल रहा।

दुःखी जनो से दूर हुआ, न किसी से कोई मेल रहा।


विस्‍मृत था कि हमे अवस्‍थाऐं भी कभी न जकड़ेगी।

दारूण दुःख भी कभी न होगा, विपदा कभी न पकडेगी।


चला समय का झोंका ऐसा, तन का बल भी क्षीण हुआ।

लगा कि ऐसा सूना होगा ,सजा सजाया नीड़ हुआ।


ईश्‍वर का आराधन केवल, एक मार्ग आया मन में।

धन का अहंभाव भी टूटा, सत्‍पथ अपनाया तन में।


शेष जीवनी शक्‍ति को कैसे, सेाचा अपनाना होगा।

कितनी मृदुल भाव सेवा के, मन में अब लाना होगा।


वाह विधाता तेरी दुनिया, की है कैसी रीति निराली।

झुके सदा तेरे आगे है, कैसे - कैसे बलशाली॥



पूर्णिमा

हीरक नीलाम्‍बर आवेष्‍टित,

विहॅस रही राका बाला।

शुभ सुहाग सिन्‍दूरी टीका,

सोहत है मंगल वाला॥1॥


अलंकृता कल कला प्रेय संग,

पहुँची मानो मधुशाला।

छिन्‍न भिन्‍न छकि छकि क्रीड़ा में,

विखरत मोती की माला॥2॥



परदेशी

मोहक अनुरागी अनपरिचित,

दूर देश के वासी।

मायिक आकर्षित तन्‍त्री की,

बांधे ग्रीवा फॉसी॥1॥


अतिथि अनिश्‍चित वास तुम्‍हारा,

अन्‍तिम अमित उदासी।

परदेशी जाना है निश्‍चित,

प्रीति न कर उपहासी॥2॥



प्राण एवं जीव

हे व्‍यथित प्राण हे विकल प्राण, मत कर चिन्‍ता मत हो मलान।

इसको ही जीवन कहते हैं, मानव ही सब दुःख सहते हैं,

जो सबको एक समझते हैं, सब कहते हैं उसको महान॥

हे व्‍यथित प्राण हे विकल प्राण, मत कर चिन्‍ता मत हो मलान॥1॥


दुःख भी सुख की पतली रेखा, है जन्‍म मरण जीवन लेखा,

सत असत जग में जो देखा, मिल गया उसी को पूर्ण ज्ञान,

हे व्‍यथित प्राण हे विकल प्राण, मत कर चिन्‍ता मत हो मलान॥2॥


यह जग ही है दो का समास, यदि है विकास तो है विनाश,

मत हो आसी मत हो निराश, यदि है सन्‍ध्‍या तो है विहान,

हे व्‍यथित प्राण हे विकल प्राण, मत कर चिन्‍ता मत हो मलान॥3॥



बसन्‍त “एक दूत”

हे पतझड़ तुम जाते जाते, विपदा घन को लेते जाना।

श्‍याम सरोरूह शिव शंकर को, पूछे तब तुम याद दिलाना।

कहना कि कलियुग के युग में, आज बसेरा असुर बनाते,

अशुभ अधर्म कुमारग पथ को, सदा सर्वथा है अपनाते,

कही राजनेता बनकर के, कोई धाक जमाता है,

स्‍वार्थ और पद लोलुपता में, नाता तोड़ बहाता है,

हे पतझड़ बसन्‍त आने से पहले, तुम सन्‍देश दे जाना।

हे पतझड़ तुम जाते जाते, विपदा घन को लेते जाना॥1॥


मेरे जो सहयोगी बन्‍धु, उनका नाम बसन्‍त पड़ा,

वह ऋतुराज मधुप को लेकर, आज न जाने कहां अड़ा,

साथ स्‍नेहरस का रस लेकर, के वह भूला है आना।

हे पतझड़ तुम जाते जाते, विपदा घन को लेते जाना॥2॥


अंग स्‍फुरण मन लालायित, देख सुमन को होता है,

हम स्‍वागत करते हैं उसका, मन लालायित होता है,

जब अनंग से अंग मिले तो, बात यही तुम भी दुहराना।

हे पतझड़ तुम जाते जाते, विपदा घन को लेते जाना॥3॥


मेरी इन बातों को जाकर, ना तुम उन्‍हें सुनाओगे,

तो समझो इस शून्‍य जगत में, निन्‍दक माने जाओगे,

”नंद“ के नन्‍दित मन में ”नंदा“ को जाकर मेरी याद दिलाना।

हे पतझड़ तुम जाते जाते, विपदा घन को लेते जाना॥4॥



अनमना

है प्रेम रोता कक्ष में,

प्रीतम बिना प्रियतम बने।

अन्‍तर्निहित शशि उरसि तल है

नखत गणमाला बने॥1॥


है आज अम्‍बर ध्रूम्रघन,

युग मकर में सावन बसा।

अकथनीया है कथा,

विपरीत संकुल शब्‍द सा॥2॥


सतत होगी क्‍या यहॉ,

यह कष्‍टदा श्‍यामा अमा।

मुकुलित न होगी पुनि पियूषी,

सरस प्रिय अनूपमा॥3॥



भ्रमर

भ्रामी भ्रमर बताओ तो, तू क्‍यों उपवन में रमते हो।

कुंता कीर्णित सुमन न तेरे, जिनमें विधि नित रमते हो॥1॥


इन सौरभ से सुन्‍दरता से यह, कैसी तेरी ममता है।

शंकर जी के विष कराल से, इन दोनों की समता है॥2॥


अतः अनिल झकझोर झोर के, इनका मस्‍तक मोड़ रहा।

बार बार हठि झटक झटक के, पंखुड़ियों को तोड़ रहा॥3॥


मनमोहक मुद्रा ही उर्वसि, मंथन सबका करता है।

प्रबल काष्‍ठभेदी हो तुम भी, गुन गाता दम भरता है॥4॥

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डॉ0 महेन्‍द्र प्रताप पाण्‍डेय ‘‘नन्‍द''

रा0 इ0 का 0 द्वाराहाट अल्‍मोड़ा उत्‍तराखण्‍ड

दूरभाषिका- 09410161626/05966.244243

e-mail - mp_pandey123@yahoo.co.in

जीवन परिचय

clip_image0031. नामः- डॉ0 महेन्‍द्र प्रताप पाण्‍डेय ‘‘नन्‍द''

2. जन्‍म तिथिः- 05-मई-1965

3. जन्‍म स्‍थानः- ग्राम- गोबराई पोस्‍ट- बड़हरा

जिला- देवरिया (उ0 प्र0)

4. पारिवारिक परिचयः-

पिता- डा0 विश्‍वनाथ प्रसाद पाण्‍डेय (होम्‍योपैथिक चिकित्‍सक)

माता- श्रीमती विद्यावती पाण्‍डेय (गृहिणी)

5. शिक्षाः- एम0ए0 (हिन्‍दी), एम0एड0

6. लेखन की विधाएँः- कविता, नाटक, कहानी, वार्ता, उपन्‍यास

7. प्रकाशित कृतियों का विवरण तथा प्रकाशन वर्षः-

§ ‘‘अमृता'' काव्‍य संग्रह प्रकाशन वर्ष 2007

विमोचन - पद्‌मश्री डा0 श्‍याम सिंह ‘शशि' (पूर्व निदेशक, प्रकाशन विभाग भारत सरकार), पद्‌म श्री ललित पाण्‍डेय (उत्तराखण्‍ड सेवानिधि), डा0 हरि सिंह पाल (आकाशवाणी दिल्‍ली), डा0 चक्रधर नलिन (रायबरेली), डा0 ऊषा यादव (आगरा), डा0 हीरालाल बाछोतिया (NCERT दिल्‍ली), डा0 एन0एन0 खान (प्राचार्य के0 ई0 सी0 द्वाराहाट), क्षेत्रीय विधायक श्री पुष्‍पेश त्रिपाठी के कर कमलो द्वारा बाल प्रहरी साहित्‍य संगोष्‍ठी एवं सम्‍मान समारोह 2007 में।

§ ‘‘बुड़मशाण चालीसा'' प्रकाशन वर्ष 2007

विमोचन - प्रधानाचार्य रा0 इ0 का0 द्वाराहाट तथा मंदिर निर्माण समिति के पदाधिकारी गण द्वाराहाट द्वारा रा0 इ0 का0 द्वाराहाट अल्‍मोड़ा में।

§ स्‍वाधीनता संग्राम में कुमायूँ मण्‍डल की नारियों का योगदान (काव्‍य में) (अप्रकाशित)

§ कहानी संग्रह (अनाम) 7 कहानियाँ आकाशवाणी गोरखपुर से प्रसारित

§ उपन्‍यास - 1. उपेक्षिता 2. अपहृता प्रणय (प्रकाशनाधीन)

§ नाटक - 1. प्‍यार और फाँसी 2. दानवीर मयंक 3. एक टुकड़ी रोटी

4. माई के प्‍यार 5. धर्म का पलड़ा (सभी मंचित)

§ बाल कविता संग्रह - (प्रस्‍तावित नाम उद्‌भव) अप्रकाशित

§ डाक्‍यूमेन्‍ट्री फिल्‍म का निर्माण- मौसम वेधशाला और द्वाराहाट का मौसम

1- 5 जून 2010 को गोविन्‍द बल्‍लभ पन्‍त पर्यावरण एवं विकास संस्‍थान कोसी कटारमल अल्‍मोड़ा के निदेशक डॉ एल. एम. एस. पालनी, डॉ. आर. एस. रावल वैज्ञानिक, मेजर बी. सी. सती और खण्‍ड शिक्षा अधिकारी द्वाराहाट श्री एस. एल. आर्या के द्वारा।

2- ‘‘कजरा'' इण्‍टरनेशनल फिल्‍म्‌स समिति गोण्‍डा के प्रोड्‌यूसर श्री राजेश निगम और उमराव जान फिल्‍म के निर्देशक मुजफ्‍फर अली के हाथों साहित्‍य एवं सांस्‍कृतिक अकादमी वहराइच में।

3- यूट्‌यूबडॉट कॉम पर यूप्रोब नाम से फिल्‍म उपलब्‍ध।

8. प्राप्‍त सम्‍मान/पुरस्‍कार आदि का विवरणः-

· काव्‍य श्री 2007 ः- बालप्रहरी द्वारा- डा0 राजेन्‍द्र डोभाल (निदेशक विज्ञान एवं प्राद्यौगिकी परिषद्‌ देहरादून), डा0 बानो सरताज (महाराष्‍ट्र) तथा सम्‍पादक उदय किरौला।

· काव्‍य गौरव 2007 ः- डा0 फारूख कप्‍तानगंजवी प्रमुख निदेशक अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्‍मानोपाधि संस्‍थान, कप्‍तानगंज कुशीनगर द्वारा वर्ष 2007 में।

· युवा प्रतिभा सम्‍मान 2007 ः- 15वाँ अखिल भारतीय हिन्‍दी साहित्‍य समारोह गाजियाबाद द्वारा वर्ष 2007 में श्री मुकेश्‍वर चुन्‍नी (भारत में माँरीशस के उच्‍चायुक्‍त), श्री त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी (पूर्व राज्‍यपाल केरल व कर्नाटक) तथा डा0 रत्‍नाकर पाण्‍डेय (राज्‍यसभा सांसद एवं मुख्‍य संरक्षक)।

· साहित्‍य श्री 2008 ः- पुष्‍पगंधा प्रकाशन कवर्धा छत्‍तीसगढ़ द्वारा वर्ष 2008 में श्री सन्‍तोष गुप्‍ता (अध्‍यक्ष नगर पालिका निगम कवर्धा), डा0 सुनील गुप्‍ता ‘तनहा' (साहित्‍यकार/प्रकाशक राजमहल चौक कवर्धा), श्री सुहास गोविन्‍द पोल (हाईकोर्ट अधिवक्‍ता/साहित्‍यकार बेमेतरा, दुर्ग छत्‍तीसगढ़)।

· भारत गौरव 2008 ः- ऋचा प्रकाशन कटनी मध्‍य प्रदेश द्वारा वर्ष 2008 में श्री आशा रायजादा (अध्‍यक्ष) तथा श्री ओम रायजादा (निदेशक)।

· काव्‍य कल्‍पज्ञ 2008 ः- अखिल भारतीय साहित्‍य संगम आयड़ उदयपुर द्वारा वर्ष 2008 में श्री ओम पारदर्शी संस्‍थापक/संरक्षक।

· मधुपर्क सम्‍मान पत्र 2008 ः- अखिल भारतीय समाचार पत्र लेखक परिषद्‌ देवनगर कानपुर द्वारा वर्ष 2008 में श्री विजय प्रकाश त्रिपाठी (राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष) तथा डा0 सम्‍पूर्णानन्‍द पाण्‍डेय (महामन्‍त्री)।

· भाषाई समाचार पत्र सम्‍मान 2008 ः- श्री भगत सिंह कोश्‍यारी (पूर्व मुख्‍यमंत्री उत्‍तराख्‍ण्‍ड), श्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक' (स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री उत्‍तराखण्‍ड) के मुख्‍य आतिथ्‍य में श्री प्रकाश पन्‍त (मंत्री उत्‍तराखण्‍ड), श्री ओंकार भावे (समारोह अध्‍यक्ष) तथा श्री राजेन्‍द्र तिवारी (संयोजक इनसाइट एक्‍सप्रेस) देहरादून एवं सुरभि लोक संस्‍था द्वारा।

· युवा प्रतिभा सम्‍मान 2008 ः- हम सब साथ साथ द्वारा आयोजित अखिल भारतीय बाल, युवा एवं प्रतिभा प्रदर्शन व सम्‍मान समारोह 2008 में मुख्‍य अतिथि डा0 श्‍याम सिंह ‘शशि', डा0 सरोजनी प्रीतम (टी0वी0 सीरियल निर्मात्री), श्री उमाशंकर मिश्र (सम्‍पादक), श्री विनोद बब्‍बर (सम्‍पादक राष्‍ट्र किंकर), श्री प्रवीण आर्य (प्रोड्‌यूसर साधना टी0 वी0 चैनल), श्री किशोर श्रीवास्‍तव के हाथों प्राप्‍त।

· सृजन श्री 2008 ः- बाल प्रहरी द्वारा आयोजित राष्‍ट्रीय बालसाहित्‍य संगोष्‍ठी एवं सम्‍मान समारोह 2008 में डा0 राष्‍ट्रबन्‍धु (संपादक, बाल साहित्‍य समीक्षा), डा0 लक्ष्‍मण सिंह बिष्‍ट ‘बटरोही' (निदेशक, महादेवी वर्मा सृजनपीठ, नैनीताल), डा0 कुवंर बेचैैन, डा0 प्रतीक मिश्र, श्री उदय किरौला (सम्‍पादक)।

· बालवाटिका अभिनन्‍दन पत्र 2008 ः- बालवाटिका द्वारा आयोजित अखिल भारतीय बालसाहित्‍य संगोष्‍ठी एवं सम्‍मान समारोह 2008 भीलवाड़ा राजस्‍थान में प्रो0 के एम0 नुवाल (मुख्‍य संरक्षक) तथा डा0 भैरूँलाल गर्ग (समारोह संयोजक तथा सम्‍पादक)।

· भारतीय गौरव रत्‍न 2008 ः- शबनम साहित्‍य परिषद सोजत सिटी राजस्‍थान के अध्‍यक्ष एवं प्रबंध निदेशक डा0 अब्‍दुल समद राही द्वारा राष्‍ट्रीय प्रतिभा सम्‍मान 2008 में प्रदत्‍त।

· प्रशस्‍ति पत्र 2008 ः- 16वाँ अखिल भारतीय हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन हिन्‍दी भवन गाजियाबाद उ0प्र0 द्वारा।

· महानुभाव ग्रंथोत्‍तेजक पुरस्‍कार 2008 ः- अमृता काव्‍य संग्रह पर महानुभाव विश्‍वभारती अमरावती महाराष्‍ट्र द्वारा।

· उत्‍तराखण्‍ड रत्‍न सम्‍मान 2008 ः- जैमिनी अकादमी पानीपत द्वारा राष्‍ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जन्‍म शताब्‍दी स्‍मृति अ0 भा0 सम्‍मान एवं विमोचन समारोह 2008 द्वारा।

· हास्‍य श्री सम्‍मान 2009 ः- राष्‍ट्र किंकर समाचार पत्र दिल्‍ली द्वारा आयोजित अखिल भारतीय हास्‍य कवि प्रतियोगिता 2008 में पद्‌म विभूषण सोनल मान सिंह तथा संपादक श्री विनोद बब्‍बर द्वारा प्राप्‍त।

· विश्‍व साहित्‍यकार संदर्शिका नामांकन 2009 ः- डा0 ओम प्रकाश बरसैया (झांसी) द्वारा प्रकाशित विश्‍व हिन्‍दी साहित्‍यकार संदर्शिका के सप्‍तम खण्‍ड में नामांकन।

· बाल प्रहरी साहित्‍य सृजन सम्‍मान 2009 ः- पद्‌म श्री यशोधर मठपाल (उत्‍तराखण्‍ड) , डॉ0 चिनोद चन्‍द्र पाण्‍डेय ‘विनोद' (लखनऊ) डॉ0 राष्‍ट्रबन्‍धु (कानपुर), डॉ0 हरि सुमन बिष्‍ट (दिल्‍ली), बाल प्रहरी सम्‍पादक उदय किरौला के हाथों भीमताल (नैनीताल) में।

· हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मान 2009 ः- डॉ0 रवि कान्‍त खरे (बाबा जी), डॉ0 विनोद चन्‍द्र पाण्‍डेय ‘विनोद' रामचन्‍द्र शुक्‍ल एवं डॉ चक्रधर नलिन के हाथों स्‍वामी रामतीर्थ प्रतिष्‍ठान अलीगंज लखनऊ में अखिल भारतीय वैचारिक क्रान्‍ति मंच निराला नगर लखनऊ द्वारा।

· आदर्श शिक्षक सम्‍मान (मौसम) 2008 ः- पं0 गोविन्‍द वल्‍लभ पन्‍त पर्यावरण एवं विकास संस्‍थान द्वारा आयोजित रा0 इ0 का0 हवालबाग में डा0 उपेन्‍द्र धर (निदेशक), श्री अम्‍बाराम आर्य (जिला शिक्षा अधिकारी अल्‍मोड़ा) तथा खण्‍ड शिक्षा अधिकारी हबालबाग के द्वारा (यू0 प्रोब) आदर्श शिक्षक सम्‍मान का प्रथम पुरस्‍कार वर्ष 2008।

· उत्‍कृष्‍ट शिक्षक सम्‍मान (मौसम बेधशाला) 2009 ः- डॉ0 एल0 एम0 एस0 पालनी निदेशक, एवं यू0 प्रोब अन्‍वेषक आर0 एस0 रावल (गोविन्‍द बल्‍लभ पन्‍त पर्यावरण एवं विकास संस्‍थान कोसी कटारमल अल्‍मोड़ा) द्वारा आयोजित राजकीय इण्‍टर कॉलेज धौलछीना में।

· साहित्‍य वाचस्‍पति 2009 ः- साहित्‍यिक सांस्‍कृतिक कला संगत अकादती परियावां प्रतापगढ़ उ0प्र0 के अध्‍यक्ष शिव नारायण मिश्र एवं सचिव वृन्‍दावन त्रिपाठी रत्‍नेश द्वारा पूर्व जज रामचन्‍द्र शुक्‍ल और सुरेश चन्‍द्र श्रीवास्‍तव के हाथों प्राप्‍त।

· सुश्री0 सरस्‍वती सिंह स्‍मृति सम्‍मान 2009 ः- साहित्‍यिक सांस्‍कृतिक कला संगत अकादमी परियावां प्रतापगढ़ उ0प्र0 के अध्‍यक्ष शिव नारायण मिश्र एवं सचिव वृन्‍दावन त्रिपाठी रत्‍नेश द्वारा पूर्व जज रामचन्‍द्र शुक्‍ल और सुरेश चन्‍द्र श्रीवास्‍तव के हाथों प्राप्‍त।

· काव्‍य कलश सम्‍मान ः- हिन्‍दी भाषा सम्‍मेलन पटियाला (पंजाब) द्वारा हर्ष कुमार हर्ष, के हाथो भाषा भवन में 24 मई 2009 को प्राप्‍त।

· संस्‍कृत सम्‍मान पत्र 2009 ः- संस्‍कृत विद्यापीठ परिषर में गीता जंयति पर श्री श्री 108 रामगिरी जी महाराज एवं उपजिलाधिकारी रानीखेत द्वारा।

· कुमाऊॅनी लोक साहित्‍य सम्‍मान पत्र 2009 ः- पप्‍साग्राम्‍स संस्‍थापक विशनदत्त जोशी ‘‘श्‍ौलज'' एवं श्री श्री 108 रामगिरी जी महाराज एवं उपजिलाधिकारी रानीखेत द्वारा।

· 0 मैगजीन अनुभूति में रचना प्रकाशित 2009 ः- 6 मई 2009 और 2 नवम्‍बर 2009, मार्च 2010

· उत्‍तरा पोर्टल डॉट इन ः- उत्‍तराखण्‍ड की साहित्‍य एवं संस्‍कृति संरक्षण में अमृता और बुड़ मशाण चालीसा

· समय दर्पण डाट कॉम पर रचना ः- साहित्‍य उपल्‍बध

· स्‍वर्गविभा डाट कॉम पर रचना ः- साहित्‍य उपल्‍बध

· भोजपुरिया डाट कॉम पर रचना ः- साहित्‍य उपल्‍बध

· विद्यावाचस्‍पति (पी. एच.डी.) 2009 ः- विक्रमशिला हिन्‍दी विद्यापीठ भागलपुर (बिहार) के कुलाधिपति डॉ लारी आजाद कुलपति डॉ तेजनारायण कुशवाहा एवं कुलसचिव डॉ देवेन्‍द्र नाथ साह के द्वारा।

· आलेख वाचन 2009 ः- विक्रमशिला हिन्‍दी विद्यापीठ भागलपुर (बिहार) में चतुर्दश महाधिवेशन सह सम्‍मान समारोह में जनपदीय भाषा हिन्‍दी पर आलेख।

· साधना टी.वी. पर काव्‍य पाठ 2010 ः- सतमोला कवियों की चौपाल के लिए 9-01-2010 को काव्‍य पाठ।

· हिन्‍दी गरिमा सम्‍म्‍मान 2010 ः- हिन्‍दी भाषा सम्‍मेलन पटियाला (पंजाब) द्वारा आयोजित कार्यक्रम के मुख्‍य अतिथि पंजाबी विश्‍वविद्यालय के कुलपति डॉ. जसपाल सिंह, सचिव पंजाब सरकार श्रीमती ऊषा आर. शर्मा, कमिश्‍नर श्री गुरेन्‍दर सिंह गरेवाल तथा डा. राजा आनन्‍द सिंह सुमन के हाथो।

· पं0 बृज बहादुर पाण्‍डेय स्‍मृति सम्‍मान 2010 ः- शिक्षा साहित्‍य कला विकास समिति बहराइच (उ0प्र0) में फिल्‍म निर्देशक मुजफ्‍फर अली, आकाशवाणी लखनऊ के कार्यक्रम अधिकारी अनामिका सिंह, आयुवर्ेदिक चिकित्‍सा स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री उ0 प्र0 सरकार तथा प्रसिद्ध साहित्‍यकार डॉ. अशोक पाण्‍डेय ‘गुलशन' से प्रदत्‍त।

9. दायित्‍व -

Ø संपादन - भारत ज्ञान विज्ञान समिति द्वाराहाट द्वारा हस्‍तलिखित पत्रिका ‘‘नयी उड़ान'' का प्रधान सम्‍पादन।

विमोचन - श्री काशी सिंह ऐरी विधायक कनालीछीना तथा श्री पुष्‍पेश त्रिपाठी के हाथों।

Ø संरक्षक - भारत ज्ञान विज्ञान समिति इकाई द्वाराहाट अल्‍मोड़ा वर्ष 2004-2008 तक।

Ø अध्‍यक्ष - भारत ज्ञान विज्ञान समिति द्वाराहाट इकाई का वर्ष 2008 से।

Ø ब्‍लाक समन्‍वयक - राष्‍ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस - वर्ष 2005 से 2008 तक।

Ø जिला संयुक्‍त सचिव - राष्‍ट्रीय बाल विज्ञान आयोजन समिति वर्ष 2006-07

Ø प्रशस्‍ति पत्र - भारतीय संस्‍कृति ज्ञान परीक्षा शांतिकुंज हरिद्वार - वर्ष 2002 से 2004 तक।

Ø मार्गदर्शक शिक्षक सम्‍मान - राष्‍ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस उत्तरांचल के वर्श 2007 में

‘‘जैव विविधता प्रकृति बचायें भविश्‍य संवारे'' विशय पर रा0 इ0 का0 रानीखेत से प्राप्‍त।

Ø नोडल टीचर - (एड्‌स) किशोरावस्‍था यौन शिक्षा कार्यक्रम 2008 रा0 इ0 का0 द्वाराहाट में नोडल टीचर।

Ø टी0 एल0 एम0 प्रतिस्‍पर्धा - सर्वशिक्षा अभियान द्वारा आयोजित जिला शिक्षा मेला 2007-08 में तृतीय स्‍थान।

Ø मौसम वेधशाला प्रभारी (यू0 प्रोब0) - रा0 इ0 का0 द्वाराहाट में विज्ञान एवं प्रौद्यौगिकी विभाग भारत सरकार द्वारा स्‍थापित। 15 नवम्‍बर 2009 से ई.टी.वी. उत्‍तर प्रदेश/उत्‍तराखण्‍ड पर मौसम तापमान की जानकारी।

10. अन्‍य प्रस्‍तुति -

o आकाशवाणी गोरखपुर से वर्ष 1983 से 1996 तक युवा जगत व देस हमार कार्यक्रम में हिन्‍दी तथा भोजपुरी कविता/कहानियों का प्रसारण।

o आकाशवाणी अल्‍मोड़ा से वर्ष 1996 से अद्यतन हिन्‍दी कार्यक्रम में काव्‍य पाठ का प्रसारण।

o आकाशवाणी अल्‍मोड़ा से ‘‘राजभाषा हिन्‍दी हमारी स्‍वाभिमान की भाषा'' विषय पर हिन्‍दी दिवस पर विष्‍ोश आलेख प्रस्‍तुति।

o जैन टी.वी. से काव्‍य पाठ वर्ष 2007

o राष्‍ट्रस्‍तरीय काव्‍य पाठः- गान्‍धी शान्‍ति प्रतिष्‍ठान (दिल्‍ली) वर्ष 2008, हिन्‍दी भवन लोहियानगर गाजियाबाद (उ0 प्र0) वर्ष 2007, कुमायूँ इंजीनियरिंग कालेज द्वाराहाट अल्‍मोड़ा (उत्तराखण्‍ड) वर्ष 2007, अनासक्‍ति आश्रम कौसानी बागेश्‍वर (उत्तराखण्‍ड) वर्ष 2008, गजाधर मान सिंह धर्मशाला भीलवाड़ा (राजस्‍थान) वर्ष 2008 तथा आकाशवाणी अल्‍मोड़ा द्वारा आयोजित विष्‍ोश कवि सम्‍मेलन में मूर्धन्‍य एवं प्रतिष्‍ठित साहित्‍यकारों संग काव्‍य पाठ।

o संचालन - राष्‍ट्रस्‍तरीय बाल साहित्‍य संगोष्‍ठी एवं सम्‍मान समारोह 2007 में ‘‘बाल साहित्‍य एवं बाल अधिकार'' विषय तथा अखिल भारतीय कवि सम्‍मेलन 2007 का संचालन।

o आलेख प्रकाशन - देव पुत्र, लोट-पोट, धोधर बाबा सरजू सागर मेल, साहित्‍यांचल, कंचनलता, बाल वाटिका, बाल प्रहरी, ज्ञान विज्ञान बुलैटिन, हम सब साथ साथ, यू0 एस0 एम0, शब्‍द सरोकार, प्रेरणा अंशु, पंखुड़ी, वात्‍सल्‍य जगत, हिन्‍दी ज्‍योति विम्‍ब, काव्‍याजलि, राष्‍ट्र किकंर, सच का साया, सरस्‍वती सुमन, साहित्‍य त्रिवेणी, इनसाइट एक्‍सप्रेस, जयतु हिन्‍दू विश्‍व, हिमा पर्यावरण, यू0 प्रोब0 न्‍यूजलेटर, दैनिक जागरण, अमर उजाला, उत्‍तर उजाला आदि में अनेक आलेख प्रकाशित।

o राष्‍ट्रीय काव्‍य संग्रह में कविता प्रकाशनः- दूर गगन तक (सं. सुनील गुप्‍ता ‘तनहा'), देवसुधा (सं. शशांक मिश्र ‘भारती') आदि

11. सम्‍प्रति ः- सहायक अध्‍यापक रा0 इ0 का0 द्वारा हाट अल्‍मोड़ा उत्तराखण्‍ड

12. सम्‍पर्क ः- रा0 इ0 का0 द्वारा हाट अल्‍मोड़ा पिन-263653

फोन नम्‍बर -- 05966-244243 / 09410161626

E-mail - mp_pandey123@yahoo.co.in

शरद जायसवाल sharad jaiswal

आशा की किरण फूटी है

पढ़ी लिखी है वो

हम उससे कमतर

जमीं पे हम

वो आसमां को छूती है !


प्रेम के धागे को

तुम कच्‍चा मत समझो

वो रेशम की थान

इधर गठान सूती है !


हूं तो शहरी

शक्‍ल से दिखूं वनवासी

उधर भोग है छप्‍पन

इधर जड़ी बूटी है !


जब हुई शाम

वो अंधेरे में सिमट गई्र जानो

मैं हूं बत्‍ती उसे गुल मानो

लाइन में खड़े होते हैं

हम सटकर

लोग समझते हैं

जगह छूटी है !


उसकी चाल चकरघिन्‍नी सी

खनकती रहती है वो सिन्‍नी सी

हम तो उसके बदन पे लटके

फालतु कपड़े

वो दीवार पे लगी

शानदार खूंटी है !


सुबह-शाम था हमारा

छत पे जाना

वहीं शु्‌रु हुआ अफसोसनाक़ अफ़साना

हमने तो औरों पे डोरे डाले थे

उसने लंगड़ फंसा

पतंग लूटी है !


अब तो चैन लेटा हूं

उसकी बाहों में

सपने रंगीन हैं अब

निगाहों में

कल ही गांव से आई है

उसकी बहना

एक आशा की किरण फूटी है !

---

अब कैसे करें

दिल लगा कर गधी से , कुछ इस तरहां हमने कहा !

चार पायों पे खड़े तुम , दीदार अब कैसे करें !!


इस कदर आंधी चली कि , टीन टप्‍पर उड़ गया !

सब निहारें गौर से , हम प्‍यार अब कैसे करें !!


तुम जमीं को देखते , यूं चर गए सारा जहां !

सर के तो गायब हुए , एतवार अब कैसे करें !!


हममें नहीं तुममें बहुत है , भाई चारे का जुनून !

मेनका दीदी तुम्‍हारी , तुमपे वार अब कैसे करें !!


खूब सेवा हो रही , दिन रात अब आठों पहर !

मिचलियों का दैार , सरहद पार अब कैसे करें !!


मैं तो हूं सादा सुखनवर , वो तो हाईटेक है !

एक पे फुलस्‍टाप , दो से चार अब कैसे करें !!


एक तो है पास , दूजे के लिए बेचैन मन !

साला थानेदार , दूजी नार अब कैसे करें !!

...

एक कप चाय


व्‍यवहारिकता और प्रेम की पर्याय

एक कप चाय !


जब लगाती है गुहार !

तभी खुलते हैं

हमारी बुद्धि के द्वार !

पत्‍नी की सौत !

जाड़े की मौत !

गरीबों का सहारा !

अमीरों ने इसे

बेड टी पुकारा !

चाय की चुश्‍की !

जवानी की मुश्‍की !

दफ्‍तर की शान !

बाबुओं की जान !

एक कप चाय !


आपकी इज्‍जत बचाय !

अगर नहीं है

घर में चाय

उल्‍टे पांव आपको

बाजार की सैर कराय !

आराम से बैठ

इसे लोग

तसल्‍ली से पीते !

कुछ पल ही सही

ख्‍़यालों में जीते !

अंग्रेजों ने इसे

हमें पीना सिखाया !

ज़हर धीमा-धीमा

नसों में समाया !

खुद तो चले गए

औलाद छोड़ी !

गुलामी की जंजीरें

हमारे जीवन से जोड़ीं !

एक समय यारों

एैसा भी आएगा !

अपराध जगत में

सुपारी का काम

एक कप चाय में हो जाएगा !

बोलते-बोलते थका है गला !

भगवान करे आप सभी का भला !

इर्श्‍वर आपको हर मुसीबत से बचाए !

तो फिर हो जाए एक कप चाय !

 

....

चार लोगों की बदौलत


दो इधर थे दो उधर थे

बीच में थे ख़ैरख्‍़वाह !

हम सनम दुनिया में आए
चार लोगों की बदौलत !!


पत्‍थरों के दौर में

मेरा निशाना लग गया !

तुम टूट के बाहों में आए

चार लोगों की बदौलत !!


हमारे तुम्‍हारे प्‍यार के

चर्चे ज़ुबां पे आ गए !

हमने तुमने घर बसाए

चार लोगों की बदौलत !!


यूं बदन को ढांपते

बस्‍तियां गुजरा किए !

सुर्खियां हम ही बने

अब चार लोगों की बदौलत !!


चार दिन का शौक था

इत्र जैसे के उड़ गया !

पंख हमने फड़फड़ाए

चार लोगों की बदौलत !!


सीख ली हमने कलाएं

सीख ली अय्‍यारियां !

फ़न तुम्‍हीं पे आजमाए

चार लोगों की बदौलत !!


सर तलक कर्जे में डूबे

बाल भी अब हैं कहां !

हम नहीं पहुंचे यहां तक

चार लोगों की बदौलत !!


हम चले थे जिस जगह से

उस तरफ जाना है अब !

हम वहां तक पहुंच पाएं

चार लोगों की बदौलत !!

.....

जरा सा

ज़रा सा

छू दो तो

झनझना जाते !

दिल में

कसे तार

बारीक़

हुआ करते हैं !!

....

जूते उतार लेता है


बात बिगड़ जाय तो !

साथ बिछड़ जाय तो !

पाथ बिखर जाय तो !

जात बिसर जाय तो !

कुदरत का साथ देता है !

जूते उतार लेता है !



बंदगी की शान में !

गंदगी की खान में !

दरिंदगी की थकान में !

छरछंदगी की मुस्‍कान में !

उल्‍टी वो नाव खेता है !

जूते उतार लेता है !



ग़रीब ग़र है तख्‍़त पर !

करीब ग़र है वक़्‍त पर !

नसीब ग़र है रक़्‍त पर !

सलीब ग़र है भक्‍त पर !

पैसे उधार देता है !

जूते उतार लेता है !


मसखरी मुस्‍कान को !

तस्‍करी सामान को !

तश्‍तरी के पान को !

नश्‍तरी अपमान को !

फौरी मुकाम देता है !

जूते उतार लेता है !


वस्‍त्र की अंगड़ाई हो !

शस्‍त्र की लड़ाई हो !

जब दस्‍त तब सगाई हो !

जबरजस्‍त जब लुगाई हो !

पुरखों को तार देता है !

जूते उतार लेता है !


खलती कहां है


चार दिन चालीस योजन चार युग से सुन रहे

फूल के होती है कुप्‍पा बेशरम फलती कहां है !


नज़्‍म जैसी शोख है वो गीत सी रमणीक है

चुप रहे हम मनमसोसे तू बता गलती कहां है !


हुश्‍न वजनी इश्‍क जर्जर हादसा होना ही था

व्‍हील चेयर पे लदी कमबख्‍़त अब चलती कहां है !


खांचों पे खांचे खींच के हम कोशिशे मर्दा किए

सख्‍़त इतनी है ये ज़ालिम सांचे में ये ढलती कहां है !


हमको इशारे पे लिए वो इस कदर बेखौफ है

खूब भटका लौट आया हाथ ये मलती कहां है !


महफिलों के दौर हों बज़्‍मे अदब की शान गर

रौशनी फानूस की है मोम अब जलती कहां है !


मैं भिखारी सा हूं मरियम वो सेहतमंद है

सामने मुझको खिलाती बेरहम टलती कहां है !


सात जन्‍मों का है बंधन ये ना जाने कौन सा

नक्‍सली इसकी अदाएं नस्‍ल ये पलती कहां है !


इनसे है मेरी बरक्‍कत इनके बल जिंदा हूं मै

लाख कांटे हैं बदन पे गुलज़दा खलती कहां है !

...

साले का क्‍या करें

होती है शाम जब भी दिल बैठने लगता

कुंदा नहीं है दर में

उम्र आसपास है

बीवी नहीं है घर में

साले का क्‍या करें !


रौशनी से उनकी

रौशन मेरी दुनिया

चांद कुनमुनाए

उजाले का क्‍या करें !


अधरों से जाम पीकर

मदहोश हो गए

ट्रे में सजे सजाए

प्‍याले का क्‍या करें !


चटपटी ज़ुबान

आंख नमकीन है

रसोई में रखे

मसाले का क्‍या करें !


बातों से उनकी

पेट भर गया मेरा हाथ में पकड़े

ताले का क्‍या करें !

निवाले का क्‍या करें !


शक्‍ल एक सी दोनों की

रंगों से सजाई है

तस्‍वीर यार की

भुकड़ा हुआ है अब

काले का क्‍या करें !


झुमकों ने छीन ली

मेरी जेब की बहार

कानों में लटके

उसके बाले का क्‍या करें !


गंगा उतार लेते

संगम हो गया होता

जटाएं नहीं हैं पास

शिवाले का क्‍या करें !

.....

 शादी के लड्‌डू

शादी के मंडप में

वर-वधु

नजर आते हैं खिले-खिले !

होंठ होते हैं उनके सिले !

सुहाग की सेज़ पर

मन डोलता है !

केवल दिल बोलता है !

जैसे-जैसे

दिलों के अरमान जागते हैं !

शर्म और हया

दूर भागते हैं !


दुल्‍हन अपनी मां से

पेट से होकर दिल में समाने की

पाक-विद्या सीख कर आई थी !

जिसे उसने सफलता पूर्वक

अपने पति पर आजमाई थी !

कुछ ही दिनों में

पत्‍नी का प्‍यार

पति के पेट में समाया !

सीना हुआ अंदर

पेट ने अपने आकार को बढ़ाया !


बढ़ा हुआ पेट



पति के लिए

सुहाग की निशानी है !

पति-पत्‍नी के एक तरफा

मधुर संबंध की कहानी है !

अगर आप चाहते हैं

शांति से जीना !

तो अंदर ही रखिए अपना सीना !

वरना बेचारी वह आपके जुल्‍मों को

सह नहीं पाएगी !

आपके जीवन काल में ही

सती हो जाएगी !

खुद तो बनेगी प्रेत !

आपको अंदर कराएगी

परिवार समेत !


तो साहबान

शादी के लड्‌डू होते हैं कमाल के !

आराम से खाइए इसे सम्‍हाल के !

इसको खाने वाला खाकर पछताया!

ना खाने वाला इसे देख-देख ललचाया!

दाम्‍पत्‍य जीवन में पति-पत्‍नी के होते हैं

बराबरी के शेयर! प्‍लीज हैंडिल विथ केयर!

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ग़ज़ल

सब का मन ललचाये कुर्सी।

क्‍या क्‍या नाच नचाये कुर्सी ॥

 

यूं ही सहज नहीं मिल जाती ,

सैण्‍डल तक उठवाये कुर्सी ,

 

नींद उसे फिर कब आती है,

अगर जरा हिल जाये कुर्सी ।

 

कौन छोड़ ना फिर चाहेगा ,

एक बार मिल जाये कुर्सी ।

 

जीते जी ही वो मर जाता ,

जिसकी भी छिन जाये कुर्सी ।

 

करे फाइलें कानाफूसी,

क्‍या क्‍या चट कर जाये कुर्सी।

 

लगी हैं चलने यहां कुर्सियां ,

क्‍या क्‍या दौर दिखाये कुर्सी ।

---

 

दामोदर लाल जांगिड़

पोस्‍ट लादड़िया

जिला नागौर राज

Image004 (Mobile)

लेडीज फर्स्ट

आधुनिक साहित्य ने

जब- औरत के सदियों पुराने

दबे-कुचलेपन, आकांक्षाओं, संभावनाओं

आस्थाओं, संवेदनाओं की

असमय-अस्वाभाविक मृत्यु

एवं इससे उपजी

अस्सीम पीड़ा युक्त हताशा-कुंठा को

शब्दों के भरपूर आंदोलन की

शक्ल देने का जिम्मा उठा ही लिया है

तो- औरत का रोना

सुनाई भी दे दिखाई भी

लेकिन-

आदमी का हंसना मात्र।

आदमी की-

असहनीय व्यथा- व्याकुलता को

भीड़ से खचाखच भरे चौराहों पर

कुचल कर नष्ट हो जाने के लिए, फेंककर,

औरत की डकार को

आकाश दे दो।

 

औरत में-

जबरन प्यास जगाओ

परंतु-

आदमी के फफदियाये होठों से

पपड़ियाये गले तक को

पानी की एक बूंद मयस्सर न हो।

औरत के-

जीर्ण-शीर्ण पल्लू के भीतर

आदमी के माथे की

दुर्भाग्य की पराकाष्ठा नापती लकीरें

खो जाएं।

 

चूल्हा-चक्की, झाडू़-पोंछा

बच्चों की चिल्ल-पों के

सुर में सुर मिलाकर

जैसे-तैसे निबटती औरत के कद में

इतना अप्रत्याशित उछाल आए कि,

छीना-झपटी से लेकर

मार-काट की हद तक

एक-दूसरे को

नोचती-खसोटती भीड़ की

सुर्ख आंखों से घिसट-घिसट कर

जैसे-तैसे बचकर

घर लौटता कटा-फटा आदमी

बौना लगने लगे।

 

ऐ आधुनिक औरत-

छीन ले आगे बढ़कर

आदमी के कपड़ों-लत्तों, हाव-भाव

चाल-ढाल,पीना-पिलाना

उठना-बैठना आदि-आदि को

परंतु-

आज से सदियों पूर्व तक के

दर्द की दुहाई देकर

अंततः, उसे परे धकेल दे

कि, तेरा और कुछ आवश्यक नहीं।

जैसे भी हो-

आदमी को निकृष्ट, निर्लज्ज, दुरूपयोगी,

डरावना, असहज, अमित्र, असहयोगी ही तो

साबित करना है।

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सुनील संवेदी

उप संपादक

हिंदी दैनिक‘जनमोर्चा, बरेली

email-

bhaisamvedi@gmail.com

फुटपाथ

फुटपाथ भी पैदा होते हैं, फुटपाथ जवानी पाते हैं।

फुटपाथ से डोली उठती तो, माँ बाप के आँसू आते हैं।

 

फुटपाथ भी रोते मय्‍यत पे, ये मंगल गीत भी गाते हैं।

इ न कीच भरे फुटपाथों पर, भगवान भी पूजे जाते हैं॥

 

हालात से कर के समझौता, फुटपाथ पे ही मर जाते हैं।

फुटपाथ वसीसत में अपनी, फुटपाथ ही देकर जाते हैं॥

 

अभिजात्‍य शब्‍द की व्‍याख्‍या में, फुटपाथ धरातल होता है।

थक हार परिश्रम भी आखिर, फुटपाथ पे आकर सोता है॥

 

फुटपाथ के नेता का बँगला , फुटपाथ के उपर होता है।

फुटपाथ का अपना साल गिरह गणतंत्र दिवश पर होता है।

 

फुटपाथ बनाता सरकारें, सरकार इन्‍हें बनवाती है।

आजन्‍म यहां पर रहने का, अघिकार इसे दिलवाती है।

 

हर बार दिवाली आती तो, दिल काम दीये का करते हैं।

फिर स्‍वप्‍न पतंगे आकर के , फुटपाथ पे आकर मरते हैं।

 

और आतिशबाजी बन कर के, कुण्‍ठित अरमान बिखरते हैं।

नवजात अभावों के चूजे, फुटपाथ के नाम से डरते हैं।

 

अपराध जो भूखा पेट करे, कभी माफ किया नहीं जाता है।

बलवान की उँची गर्दन तक, कानून पहुँच नहीं पाता है।

 

फुटपाथ के उभरे हिस्‍सों को, हर आँख निहारा करती है।

फुटपाथ के होठों की लाली, कुछ और इशारा करती है।

 

फुटपाथ के दामन की सिलवट, कोई नाम पुकारा करती है।

फुटपाथ की कातर नजरों से, हर आँख किनारा करती है।

 

जब कर्ण जन्‍म लेता कोई, फुटपाथ पे आकर पलता है,

यह हवश में अंघा स्‍वार्थ यहां, यूं मजबूरी को छलता है।

 

सैलाब वो छिछली नदियों का, फुटपाथ किनारा बनते हैं।

कमजोर अपाहिज कवियों का, फुटपाथ सहारा बनते हैं।

 

इन पाँच सितारों की रौनक, फुटपाथ निखारा करते हैं।

बँगलों को कालिख पुतने से, फुटपाथ उबारा करते हैं।

 

कोठी की विघवा आखिर में, फुटपाथ की दुल्‍हन बनती है।

पश्‍चात्‍य सभ्‍यता की जूठन, फुटपाथ की उलझन बनती है।

 

फुटपाथ की सूखी छाती पर, नवजात मचलते देखे हैं।

फुटपाथ पे आकर रिश्‍तों के, आघार बदलते देखे हैं।

 

व्‍यभिचार सदाचारों जैसे, आकार में ढ़लते देखे हैं।

फुटपाथ के रिसते धावों से, अवसाद निकलते देखे हैं।

 

यूं पाप पुण्‍य की परिभाषा, खुद एक प्रश्‍न बन जाती है।

जब जिस्‍म फरोशी कर ममता, बच्‍चे को दूघ पिलाती है।

 

फुटपाथ के जज्‍बातों में क्‍यों, ये सरकारीपन मिलता है।

बुनियाद में इसकी किस्‍मत में, क्‍यों अत्‍याचारीपन मिलता है।

 

उपकार के रुप में हक पाकर, क्‍यों आभारीपन मिलता है।

फुटपाथ के मरने जीने में, इक दस्‍तूर सा लगता है।

 

लक्ष्‍यहीन चलते रहने को, वो मजबूर सा लगता है।

दो हाथ याचना को पसरे, क्‍यों आभारीपन लगता है।

 

पुचकारने उठते ममता के, दो हाथ हिचकते देखे हैं।

कभी बाप का नाम बयां करते, दो होंठ हिचकते देखे हैं।

 

नैतिकता के उपदेशों के, वो शब्‍द सिसकते देखे हैं ।

सब घर्म शिकस्‍ता पां होकर, धबरा के सिमटते देखे हैं।

 

गांघी के तीन बंदरों की, माकूल जगह फुटपाथ ही है।

खामौश देख सुन रहने की, अनुकूल जगह फुटपाथ ही है।

 

रोटी के आविष्‍कारक को, फुटपाथ कोसता रहता है।

इतिहास के पन्‍नों में अपना, वो नाम खोजता रहता है।

 

राशन की लाइन में पीछे, कभी बाल नोचता रहता है।

फुटपाथ की कौख में पलने का, वो दण्‍ड भोगता रहता है।

 

पश्‍चिम की पुत्री निर्घनता, सैलानी बन कर आयी थी

यहां अभयदान हासिल करके, फुटपाथ की नींव लगायी थी।

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दामोदर लाल जांगिड

पोस्‍ट लादड़िया

जिला नागौर राज.

बना है आन भारत की हुआ है शान भारत की।

यकीनन आज भ्रष्‍टाचार है पहचान भारत की॥

 

चरम सीमा पे ताण्‍डव भूख बेकारी ग़रीबी का,

कि क्रंदन में हुई तब्‍दील वो मुस्‍कान भारत की।

 

निर्धन देश के धन से यहां उड़ते हैं गुलच्‍छर्रे,

बड़ी बदकार गाली बन गया ईमान भारत की।

 

यहां माँ भारती का खैरख्‍वाह कोई नहीं शायद,

तुम्‍हारे हाथ में हैं आबरु भगवान भारत की ।

 

भिखारी की तरह रिश्वत पसारे हाथ बैठी हैं,

दलाली हैं हकीकत में निगाहबान भारत की।

 

मिसाले फाहिशा ‘अफसर‘ यहां दिन रात बिकते हैं,

हैं बिक्री के लिए तत्‍पर सियासतदान भारत की।

 

इसी तकिये से मेरे मुल्‍क की सरकार चलती है,

यही हस्‍ती का वायस है शिकाहो शान भारत की।

 

वतन पे मर मिटे उस कोख से पैदा हुये ऐसे,

हरीफों की तरह काटें जड़े सन्‍तान भारत की।

 

ये कुत्‍ता पालतू जो काटने दौड़ा है मालिक को,

मिटाने का सियासत कर रही ऐलान भारत की

 

निठारी में मिले कंकाल इक दिन खुद बतादेंगे,

हालत हो गयी है आज क्‍या साहबान भारत की।

hasparihas

हम स्वतंत्र हैं

डा० कान्ति प्रकाश त्यागी

बलिदानों से मिली आज़ादी, हम स्वतंत्र हैं
परन्तु हम ज़रूरत से ज्यादा ही स्वतंत्र हैं
हम स्वतंत्र हैं, चाहे डिटर्जेन्ट से दूध बनायें
हम स्वतंत्र हैं, पनीर में यूरिया आदि मिलाये
स्वतंत्र हैं,फ़ल सब्ज़ियों में इंज़ेक्शन लगाये
जनता के स्वास्थ्य पर,ज़हरीली छुरियां चलायें
स्वतंत्र हैं, पुरानी दवाइयों को बाज़ार में लाये
प्रसिद्ध कम्पनियों के नाम पर ,अरबों कमायें

हम स्वतंत्र हैं, कर ले अरबों का घोटाला
जो हमें टोके, कर दें उसी का मुँह काला
स्वतंत्र हैं, किसी की कहीं भी पगड़ी उछालें
जो दे भाषण, पहले उसी को घर से उठालें
हम स्वतंत्र हैं, किसी से मांगे लाखों का धन
न देने पर सरे आम कर दें, उसका कतल

जब चाहे किसी के घर में घुसें, बहू बेटियां उठाले
यदि करे रिपोर्ट पुलिस, पुलिस से उसे फंसवा दे
यह निश्चित है, हमारा कुछ नहीं होने वाला
यदि नेता अफ़सरों को देते दिलाते रहें निवाला

---

Dr.K.P.Tyagi
Prof.& HOD. Mech.Engg.Dept.
Krishna institute of Engineering and Technology
13 KM. Stone, Ghaziabad-Meerut Road, 201206, Ghaziabad, UP

कहानी

नक्‍टू

प्रमोद भार्गव   

pramod bhargav

नकटू अब दस साल का हो गया था। अपने नाम के ही अनुरूप वह बेशरम था, बल्‍कि यों कहा जाए कि उसका नाम उसके जन्‍म के कारण ही नकटू पड़ गया था तो ज्‍यादा व्‍यावहारिक होगा। वह अपनी विधवा मां का नाजायज पुत्र था। मां ने गांव के लोगबागों के गिले शिकवे और विष बुझे वाणों की भार से घायल होते रहने से हमेशा के लिए निजात पाने के लिए खारे कुंए में कूद कर आत्‍महत्‍या कर ली थी। घर में नकटू की नानी के अलावा और कोई था नहीं। नानी ने ही जैसे-तैसे उसे पाला पोसा, बड़ा किया। नकटू का पिता कौन है ठीक-ठीक किसी को ज्ञात नहीं है। बताते हैं एक बार उसकी मां का देवर यानि कि उसका काका अपनी विधवा भाभी भुर्रो की सुधबुध लेने के बहाने गांव आया था और अर्से तक रूका था। उसके जाने के बाद से ही भुर्रो के शरीर में परिवर्तन शुरू हो गए थे और पूरे गांव में यह काना-फूंसी होने लगी थी कि भुर्रो के पैर भारी हो गए हैं।


अवैध संतान होने के कारण ही उसे उच्‍च जाति का होने के बावजूद जाति-बिरादरी सगे-संबंधी, नाते-रिश्‍तेदारों और गांव में वह आदर नहीं मिला जिसका वह हकदार था। जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया, नानी की पकड़ से बाहर होता चला गया था। ब्राह्मणों की बस्‍ती उपरेंटी के बच्‍चे उसके साथ इसलिए नहीं खेलते क्‍योंकि उनकी मांओं ने बच्‍चों को जता दिया था कि यह नकटू नासमिटा पाप की औलाद है। कुछ बच्‍चे उसे पाप की, औलाद कहकर चिढ़ाते भी। हांलाकि नकटू यह नहीं समझता था कि 'पाप की औलाद‘ के मायने क्‍या होते है ? लेकिन अपने प्रति हम उम्र बच्‍चों की हीनता देख उसका बाल सुलभ मन यह जरूर ताड़ गया था कि पाप की औलाद कोई बुरी बात होती है, जिसके चलते गांव के लागे उससे नफरत करते हैं और हिकारत भरी नजरों से देखते हैं। जबसे उसमें इस समझ का अंकुरन हो आया था कि पाप की औलाद होना एक तरह की गाली है, तब से उसने आक्रामक रूख अपना लिया था। अब, जब भी कोई बच्‍चा उसे पाप की औलाद कहकर चिढ़ाता, वह उसे पीटने लग जाता। उसमें बला की फुर्ती थी। शरीर में उम्र से ज्‍यादा ताकत थी। उसके स्‍वभाव में भरपूर निडरता थी। उसके द्वारा आक्रामक रूख अपनाने के बाद से बच्‍चे उससे भय खाने लगे थे। अब उनकी हिम्‍मत उसके मुंह पर पाप की औलाद कहने की न होती।


चूंकि उच्‍च वर्ग नकटू उपेक्षित था इसलिए वह सहराने के बच्‍चों में ज्‍यादा हिलमिल गया था। सुबह वह सायकल का पुराना टायर दौडा़ता हुआ तलैया पर पहुंच जाता। वहीं सहरियों के बच्‍चे आ जाते। उन्‍हीं के साथ वह गुल्‍ली-डंडा, सितोलिया, होलक-डंडा खेलता रहता। कभीकभार वे पिड़कुलए मारने, पठार से नीचे जंगल में भी उतर जाते। पिड़कुलए मारने के लिए उन्‍होंने गिलोलें बना ली थीं। नकटू की कुछ किरार के लड़कों और चमारों के लड़कों से भी दोस्‍ताना हो गया था। चूंकि इस दल का संगठक नकटू था और नकटू का कहा ही सब मानते थे इसलिए वह एक तरह से दल का अघोषित नेतृत्‍वकर्ता बन बैठा था।


उसमें बहस-मुवाहिसा करने का माद्‌दा था। प्रबल हठी था। अपने दोस्‍तों के प्रति उसका समर्पित भाव था। कोई साथी अगर गलत काम कर दे, झूठी बात कह दे तो भी वह खुलकर उसी का साथ देता। सद्‌गुणों और दुर्गुणों का उसके चरित्र में अनुपातिक सम्मिश्रण था। वह पढ़ने में भी होशियार था। स्‍कूल रोजाना जाता और सब विद्यार्थियों में पढ़ने में अव्वल रहता। पढ़ाई में अव्वल होने के कारण गांव के जो समझ रखने वाले लोग थे वे नकटू के प्रति दया और स्‍नेह का भाव रखते थे।


गर्मियों की छुटि्‌टयां हो गईं थीं। गांव की एक मात्र हवेली जो पूरे साल वीरान पड़ी रहती थी, उसकी साफ-सफाई शुरू हो गई थी। चौकीदार पहरा देने लगा था और उसने गांव के बच्‍चों को हवेली की लंबी-लंबी दहलानों में खेलते रहने पर रोक लगा दी थी। गोधूलि वेला के समय दहलानों में आइस-पाइस खेलना बच्‍चों की दिनचर्या थी। नकटू भी खेलता था पर अब वह भी वंचित हो गया था।


हवेली की रंग-बिरंगी सभी बत्‍तियां जलने लगी थीं। तीन दिन में ही हवेली राजमहल के माफिक जगमगा उठी थी। सिंधिया स्‍टेट के जमाने में अटलपुर के जमींदार की यह हवेली राजमहल सा ही वैभव भोगती थी। पर वे जमाने लद गए, अब न राजे-रजवाड़े रहे न जमीदार और जागीरें। अटलपुर के जमीदार ने जागीरें खत्‍म होने के तत्‍काल बाद ही मुंबई और इंदौर में व्‍यापार खोल लिए और अपने दोनेां लड़कों को वहीं जमा दिया। व्‍यापार अच्‍छा चल निकला जमीदारी में लखपती थे तो व्‍यापार में करोड़पति हो गए। सामंतशाही के दौर में जो रुतबा था वह लोकतंत्र में भी बरकरार रहा। जमींदारी नहीं रहने के बावजूद उनके पास बावन कमरों की हवेली थी और एक हजार बीघा का लंबा-चौड़ा कृषि फार्म था। अटलपुर वे साल में एक मर्तबा ही आते, गर्मियों में। यह पूंजीपति परिवार अपने देवताओं से बड़ा खौफ खाता था। इसलिए वे प्रत्‍येक वर्ष बेनागा देवताओं पर सत्‍य नारायण भगवान की कथा कराने के बहाने यहां आते और पंद्रह बीस दिन रूककर लौट जाते।


तीन गाड़ियों में लदकर वे अटलपुर आए। परिवार के सदस्‍य वातानुकूलित गाड़ी में थे बांकी दो गाड़ियों में सामान था। उनके आते ही गांव के लोगों की हवेली के सामने भीड़ जुट गई। बड़े बुर्जुग उन्‍हें झुककर प्रणाम करने लगे। कई ने जमींदार साहब के पैर छूते हुए अपने छोटे-छोटे बच्‍चों से भी जमींदार साहब के पैर छुलाए। नकटू भी गांव वालों के साथ था लेकिन उसने न जमींदार साहब के पैर छुए और न ही नमस्‍कार! वह उनके साथ आए उस गोरे-चिट्‌टे भरे हुए बदन वाले लड़के को देखता रहा जो उसकी ही उम्र का था। वह जमींदार साहब के छोटे लड़के का लड़का था। उसका नाम डिंपल था। कईयों ने जमींदार साहब को अन्‍नदाता और माई-बाप कहते हुए उनके चरणों में सिर रखकर आशीर्वाद लिया तो कई बेवजह जमींदारों के जमाने में सुखचैन बरपा रहने का गुणगान करते हुए उनकी तारीफों के पुल बांधने लगे। नकटू चुपचाप सब देखता-सुनता रहा। उसे जमींदार साहब को अन्‍नदाता व माईबाप कहना अटपटा लग रहा था। वह यह अच्‍छी तरह जानता था कि किसानों के अन्‍नदाता तो खेत हैं, खलिहान हैं, गाय-बैल हैं, नदी-नाले हैं। जमीदार अन्‍नदाता कैसे हो गए ?
डिंपल के गांव में आने के साथ ही अजब परिवर्तन होना शुरू हो गए थे, जो नकटू के लिए नागबार थे।

डिंपल जब भी हवेली से उतरता तो अजीबो-गरीब खेल-खिलौनों के साथ प्रगट होता। उसकी पेंट और शर्ट की जेबें तरह-तरह के बिस्‍किट्‌स और चॉकलेट पैकेटों से भरी होती। हवेली के द्वार पर उसके लिए सवारी सजी रहती। कभी वह बैटरी वाली कार, कभी तीन पहिए, दो पहिए और चार पहिए की सायकल पर सवार होकर हवेली के सामने वाले गलियारे में अपनी सवारी दौड़ाता। दौ नोकर आजू-बाजू उसके साथ होते। अटलपुर के आभिजात्‍य मौहल्‍ले के उच्‍च जातियों के बच्‍चे विस्‍मयपूर्वक डिंपल की सवारियों, कपड़ों और बिस्‍किट्‌स चॉकलेट्‌स की चर्चा करते हुए डिंपल की खुशामद-मलामद करते हुए उसे घेर लेते। इस वक्‍त उनके मुखों में लार होती और वे थूंक का घूंट गटक रहे होते। जब कुछ बच्‍चों की डिंपल से निकटता बढ़ गई तो वे उसकी सवारी में धक्‍का लगाने का अधिकार प्राप्‍त कर गए। क्रमानुसार एक-एक लड़का उसकी सायकल में धक्‍का लगाता हुआ बंसी सेठ की हवेली तक ले जाता और फिर वहां से लौटकर हवेली के दरवाजे तक छोड़ देता। धक्‍का लगाने का चांस जिस लड़के को मिल जाता वह अपने को धन्‍य समझता। अन्‍य लड़के उसे भाग्‍यशाली कहते।

डिंपल को जिस लड़के का धक्‍का लगाना सुखदायक लगता उसे वह इनाम स्‍वरूप एक-दो बिस्‍किट्‌स या एक-दो चॉकलेट दे देता। पुरस्‍कृत लड़का इनाम पाकर पुलक उठता उसका चेहरे प्रगल्‍भता से भर जाता। बहुत देर तक वह उस चीज को निहारता रहता। अपने मित्रों को दिखाता। फिर दौड़ी लगाता हुआ घर पहुंचकर मां-बहनों को दिखाता। चॉकलेट कहीं छिन न जाए इसलिए वह धीर गंभीर इत्‍मीनान के साथ उसकी पन्‍नी उतारता और पन्‍नी को संभालकर पाठ्‌य पुस्‍तक के पन्‍नों में छिपा देता। डिंपल का बिस्‍किट्‌स का डिब्‍बा जब खाली हो जाता तो वह आनंद के लिए उसे बच्‍चों के बीच उछाल देता। बच्‍चे उस डिब्‍बे को लूटने के लिए कटी पतंग की तरह झपट पड़ते। जो लड़का डिब्‍बा पा जाता वह उसे छाती से चिपकाये घर की ओर दौड़ी लगा देता। और डिंपल अपने वाहन पर उछल-उछल कर इस खेल का आनंद ले रहा होता।


यह सारा मन बहलाने का खेल नकटू दूर खड़ा तमाशे की तरह देखता और मन ही मन ईर्ष्‍यावश चिढ़ता रहता। उसके भी मुंह में कैडवरी चॉकलेट्‌ और पारले बिस्‍किट्‌ देखकर लार आ जाती। जीभ चखने के लिए मचलने लगती। ऐसा ही हाल उसका तब होता जब वह सरपंच के यहां टीवी में विज्ञापन देख रहा होता। टीवी की यह विज्ञापनी दुनिया उसे स्‍वप्‍न की तरह छलावा लगती। वह सोच ही नहीं पाता था गांव की चाहर दीवारी के बाहर वास्‍तव में ही ऐसी ही थिरकती हुई मनमौजी बच्‍चों की दुनिया है। कभी-कभी वह सोचता टीवी के पर्दे पर पत्‍थर मारे और उछलते-कूदते लड़के के हाथ से बिस्‍किट पैकेट छुड़ाकर ले भागे। लेकिन वह जानता था इस बक्‍शानुमा डिब्‍बे में लड़का-बड़का कोई नहीं होता यह तो सब पर्दे पर विज्ञान का करतब भर है। किंतु जबसे डिंपल गांव आया था तब से उसे यह विश्‍वास हो गया था कि गांव के बाहर शहरों में एक दुनिया बच्‍चों की जरूर ऐसी है जो टीवी के बच्‍चों की तरह मनमौजी है। अल्‍हड़ है। यदि नहीं होती तो यह डिंपल कहां से खा पाता कैडवरी.....पारले.......? कहां घूम पाता सायकल और बैटरी वाली गाड़ी पर.....? नकटू की तरह ही उसके सहराने और चमराने वाले मित्रों को डिंपल की शान पर विस्‍मय होता।


ऐसे ही एक दिन चम्‍पेबारी की दल्‍लान में बैठा नकटू डिंपल की सायकल का इधर से उधर, उधर से इधर आना जाना देख रहा था कि एकाएक नकटू के सामने बीच गलियारे में डिंपल ने सायकल रोक दी और धक्‍का लगाने वाले व बेवजह पीछे दौड़ते रहने वाले बच्‍चे बाडीगार्डों की तरह डिंपल के दांए-बांए खड़े हो गए। डिंपल सगर्व ललकार भरे लहजे में बोला, '' अबे.....नकटू इधर आ.....‘‘
नकटू को अव्वल तो डिंपल के बोलने का लहजा एकदम असहनीय लगा लेकिन वह डिंपल का मंतव्‍य समझने के लिए चुपचाप आगे बढ़कर डिंपल की सायकल के पास खड़ा हो गया और बोला‘‘ का......?‘‘
डिंपल का विनम्र अनुनय होता तो नकटू कुछ सोचता भी ? किंतु वह तो हुक्‍म था और नकटू यह बखूबी समझता था कि हुक्‍म का पालन एक तो नौकर करते हैं दूसरे चमचे। जबकि नकटू डिंपल का न नौकर है और न ही चमचा! फिर वह इस रईसजादे की सायकल में धक्‍का क्‍यों लगाए ?
''जल्‍दी कर वे.......‘‘ इस बार डिंपल थोड़ा गर्जा था।


नकटू को काटो तो खून नहीं। नाक पर गुस्‍सा चढ़ाए रखने वाले नकटू को इतना सहन कैसे होता ? और उसने पूरी ताकत से सायकल में एक लात दे मारी। दाएं-बाएं खड़े लड़के दूर छिटक गए और डिंपल औंधे मुंह गिरा धूल खा रहा था। सायकल उलटकर डिंपल के पैरों पर थी। डिंपल अंग्रेजी में गालियां बकता हुआ रोने लगा था। नकटू अगला मोर्चा संभालता इससे पहले हवेली के द्वार पर खड़े दरबान दौड़े-दौड़े आए और नकटू के दोनों हाथ पकड़कर हवेली की ओर घसीटते हुए ले गए। नकटू हाथ-पैर पटकता हुआ छुड़ाने का असफल प्रयास करता रहा। एक दरबान ने डिंपल को उठाया। उसके कपड़ों से धूल झड़ाई और उसे गोदी में लादकर हवेली की ओर ले गया। धक्‍का लगाने वाले लड़के पीछे-पीछे सायकल धकियाते हुए चल दिए।


डिंपल के रोने की आवाज सुनकर उसकी मम्‍मी, उसके बाबा और हवेली के सभी नौकर-नौकरानियां दौड़े-दौड़े, क्‍या हुआ ? क्‍या हुआ कहते हुए नीचे आए और डिंपल को घेरकर उसकी सुध लेने लगे। नौकरों और चाटूकारों ने सारा माजरा कह सुनाया। लड़कों ने सोचा नकटू बेटा आज बड़ी मुश्‍किल से अंटी में आया है इसलिए इसे आड़े हाथों लेकर क्‍यों न पुरानी कसर निकाल ली जाए। फिर क्‍या था, प्रतिद्वंद्वियों ने कुढ़नवश सारा दोष नकटू के सिर मढ़ दिया।
डिंपल की मम्‍मी ने आव देखा न ताव और चार-छैः चांटे नकटू के गालों पर जड़ दिए। क्रोधांध मम्‍मी और भी मारती किंतु प्रतिकार स्‍वरूप नकटू ने गालियां बकते हुए उनकी ओर लातें फेंकना शुरू कर दी थीं। और वे प्रत्‍युत्‍पन्‍न मति से काम लेते हुए नकटू कुछ ऐसी-वैसी हरकत न कर दे जिससे उनकी जग हसाई हो, इस अनुभूति के साथ चार कदम पीछे हट गई थीं।
जब मम्‍मी हट गईं तो डिंपल के बाबा नकटू के सामने आकर बोले, '' तूने क्‍यों मारा बच्‍चे को‘‘ ?
'' मैंने डिंपल को नहीं मारा। खाली सायकल में लात दी थी, वह गिर पड़ा तो मैं क्‍या करूं ?‘‘
नकटू के दोनों हाथ नौकर पकड़े हुए थे। वह अपने वजूद के पूरे रौब के साथ छाती ताने खड़ा था। उसकी आंखों में न आंसू थे और न ही पछतावा था, न भय था और न ही बेइज्‍जती हो जाने की शर्म थी।
''तूने सायकल में लात क्‍यों मारी ?‘‘
'' उसने मुझसे नौकरों की तरह क्‍यों कहा कि मेरी सायकल में धक्‍का लगा ? मैं क्‍या उसके बाप का नौकर हूं या उसका दिया खाता हूं ? मैं क्‍यों लगाऊं धक्‍का ? ‘‘
अटलपुरजागीर के भूतपूर्व जमींदार उस लड़के के दो टूक जबाव को सुनकर सन्‍न रह गए। अस्‍सी वर्ष की उम्र में उनकी इतनी बेइज्‍जती अंग्रेज अधिकारियों के अलावा किसी ने नहीं की थी। वे सोचने लगे काश आज जमींदारी का जमाना होता तो वे इस लड़के को हाथी के पैर के नीचे कुचलवाकर, लाश तलैया पर चील-कौवों को खाने डाल देते। किंतु वे विवश थे अब न अटलपुर जागीर थी और न वे जमींदार। इस बीच काफी भीड़ इकठ्‌ठी हो गई थी। बच्‍चों से लेकर किशोर, जवान प्रौढ़ और बुजुर्ग। गांव के एक प्रौढ़ शिक्षक आगे आकर बोले, ''बेटा जरा धक्‍का लगा देता तो तेरा क्‍या जाता.....बदले में बिस्‍किट, गोली खाने को मिलती.....‘‘
-'' मैं क्‍या बिस्‍कुट चॉकलेट का भूखा हूं जो धक्‍का लगाऊं....? खाने को इतनी ही जीभ लपलपा रही है तो तुम्‍हीं धक्‍का लगाओ माटसाब.....।‘‘


मास्‍टर साहब की एक झटके में ही बोलती बंद हो गई। फिर लोगों में यह खुसर-फुसर होने लगी कि वह थोड़े ही किसी की मान रहा है, वह तो नम्‍बर एक का बेशरम है तभी तो उसका नाम नकटू पड़ा। कहें भी तो किससे कहें डुकरिया भी बेचारी परेशान रहती है।
इस बीच डुकरिया (नानी) को भी खबर लग गई। वह बेचारी हाथ में खजूर की टान लिए भागी-भागी आई। उसने आते ही नकटू को नौकरों के हाथ से छुड़ाया और उसकी गालियां देते हुए सुतउअल पिटाई लगाना शुरू कर दी, ''धुआंलगे, नासमिटे, नकटा! तू का मेरे करमन में लिखो तो.....? जाने मुरहू कौन पापी को बीज जनके अपन तो चलती भई और मेरे प्राण खावे जाए छोड़ गई।‘‘


नानी जब पीटकर लस्‍त हो गई तो जमींदार साहब के पास जाकर हाथ जोड़कर बोली, ''महाराज जो तो ऐसोई पापी है, जाए माफ कर देईओ....., मैं तुमरे पांव पड़तों।‘‘ और नानी ने जमींदार के पैरों में सिर रख दिया था।
उस दिन जैसे-तैसे नानी द्वारा मिन्‍नत चिरौरी करने से मामला सुलट गया था। किंतु नकटू के अंदर आहत सर्प की तरह प्रतिहिंसा रह-रहकर प्रज्‍वलित होती रही थी। उसने अंतर्मन में संकल्‍प ले लिया था कि वह अपनी बेइज्‍जती का बदला जरूर लेगा। दूसरे दिन से ही वह मौके की तलाश मं रहने लगा कि डिंपल को कब मजा चखाया जाए ? हालांकि नकटू के पीटे जाने के बाद से डिंपल का रूतबा थोड़ा बढ़ गया था फिर भी डिंपल नकटू की सकल देखते ही सहम जाता और नकटू से दूर रहने का प्रयास करता। हालांकि उस घटना के बाद से डिंपल ने कंधे पर नकली बंदूक लटकाना शुरू कर दी थी और वह अपने दोस्‍तों में यह कहकर रौब पेलता कि अबकी मर्तबा बोलेगा तो साले में गोली मार दूंगा।
नकटू की सार्वजनिक तौहीन हो जाने की वजह से उसके सहराने और चमराने के मित्र भी उससे कन्‍नी काटने लगे थे। उन्‍हें यह भय सताने लगा था कि यदि वे नकटू का साथ देंगे तो नौकर उन्‍हें पकड़कर भी डिंपल की मम्‍मी के हाथों पिटवा सकते हैं। किंतु उन्‍हेांने अपनी असलियत नकटू पर जाहिर नहीं की थी। दिखाने को तो वे नकटू के भी दोस्‍त बने रहे

और नकटू के साथ डिंपल को पीटने की मोर्चाबंदी साधने में भागीदारी भी करते रहे। दरअसल वे कुटिल बुद्धि से काम लेते हुए नकटू के भी साथ थे और डिंपल के भी।
वह दिन भी आया जब देवताओं पर कथा हुई। आज के दिन हवेली के सभी नौकर, पंडितों और गांव के सवर्ण जाति के लोगों को खान-पान की व्‍यवस्‍था में लगे थे। बारह बजे के करीब कथा समाप्‍त हुई। कथा में डिंपल देवताओं के सामने जिजमान बनकर बैठा। उसी के हाथ से पंडित को दक्षिणा दिलाई गई और नारियल फुड़वाया गया। प्रसाद बंटने के बाद भोज संपन्‍न हुआ। डिंपल और उसके साथियों ने तुरत-फुरत भोजन किया और चुपचाप सायकल घुमाने के लिए चल दिए। आज डिंपल के हाथ में एक बड़ा बिस्‍किट्‌स का पैकेट था जो उसने अभी खोला नहीं था।


देवताओं का स्‍थान गांव से बाहर हवेली के पिछवाड़े की ओर था। वहां से थोड़ी दूर चलकर तलैया थी और तलैया के पीछे पठारी जंगल था। डिंपल ने आज अपने मित्रों से तलैया तक घूम आने की इच्‍छा प्रकट की। उसके दोस्‍त सायकल धकियाते हुए तलैया की आर चल दिए।
नकटू अपने सहराने के मित्रों के साथ बरगद के नीचे होलक-डंडा खेल रहा था। सायकल की चींची चर्र....चर्र की आवाज सुनकर एकाएक वे चौंके और कान खड़े करके गैल की तरफ देखने लगे। डिंपल की सायकल पर नजर पड़ते ही नकटू धीरे से बोला, ''छिप जाओ डिंपल का बच्‍चा इधर ही आ रहा है। नौकर भी कोई नहीं है। अब देखता हूं बकरे की अम्‍मा कब तक खैर मनाएगी।‘‘


और सभी लड़के बरगद के पीछे छिप गए। नकटू के हाथ में होलक खेलने का बांस का डेढ़ हाथ लम्‍बा तेल पिलाया डंडा था। जैसे ही सायकल बरगद क्रास करके तलैया की ओर बढ़ी कि नकटू सायकल की ओर झपट पड़ा। नकटू को देखते ही डिंपल के दोस्‍त सायकल छोड़ गांव की ओर भाग खड़े हुए। अविलंब नकटू ने डिंपल की गिरेबान पकड़कर उसे सायकल से खींच लिया। डिंपल के हाथ से बिस्‍कुट का डिब्‍बा छीनकर नकटू ने एक मित्र को दे दिया। और फिर वह डिंपल पर पिल पड़ा। डिंपल के पौदों, टखनों में दस बीस डंडे मारे जब वह रोता बिलखता मम्‍मी....मम्‍मी.... चिल्‍लाता धरती पर लोटपोट होने लगा तो उसमें लातें, घूंसे मारने लगा। नकटू के दोस्‍तेां ने जब देखा कि अब बाजी पूरी तरह नकटू के हाथ में है तो वे भी बहती गंगा में हाथ धोने के बहाने डिंपल में लाते मारने लगा। डिंपल के मुंह और नाक से जब उन्‍होंने खून बहता देखा तो वे सहम गए और वे सब डिंपल को वहीं छोड़कर पठारी जंगल की ओर भाग निकले। नकटू ने जब पीछे पलटकर देखा तो देखा गांव की तरफ से डिंपल के नौकर बेसाख्‍ता भागे चले आ रहे हैं।
नौकर डिंपल को लादकर भागे-भागे हवेली जाए। डिंपल की मम्‍मी और उसके बाबा ने नौकरेां को जलीकटी सुनाते हुए गालियां दीं, चांटे भी मारे। फिर फौरन डिंपल को कार में लिटाकर उपचार के लिए इंदौर रवाना हो लिए।


इधर नकटू और उसके मित्र पठारी जंगल पार कर सिआंखेड़ी गांव के गेंत भी पार कर गए थै यहां से भरखा का जंगल शुरू होता था। यहां रूककर वे सुस्‍ताए फिर बिस्‍किटों को चार बराबर हिस्‍सों में बांटा। बिस्‍किटों का स्‍वाद लेते ही उनकी दौड़ने की थकान जाती रही। सिआंखेड़ी के टपरों पर रहने वाले सहरिए अटलपुर के सहरियों के नातेदार थे। अतः नकटू अपने मित्रों के साथ सहरियों के टपरों में रूक गया।


जब चार दिन गुजर गए तब उन्‍होंने गांव की सुध ली। अटलपुर के पठारी जंगल में पहुंचने पर उन्‍हें अटलपुर के ग्‍यारें (ग्‍वाले) मिल गए। ग्‍यारें सब सहराने के सहरिए थे। यह सुनकर उन्‍हें तसल्‍ली हुई कि डिंपल उसकी मम्‍मी, उसकी बाबा उसके नौकर सब माल-असवाब गाड़ियों में लादकर उसी दिन अटलपुर से कूच कर गए थे। नकटू अब पूरी जिंदादिली के साथ निर्भय होकर गांव में घूमता। ब्राह्मण और बनियों के जो लड़के उससे कतराते थे वे अब डिंपल के हुए हश्र से सहमकर उसकी चिरौरी में अपनी भलमनसाहत समझने लगे। नकटू जैसे-जैसे उम्र के सौपान चढ़ रहा था, वैसे-वैसे जिंदादिली के साथ उसमें अद्‌भुत नेतृत्‍व क्षमता का उभार होता जा रहा था।

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प्रमोद भार्गव
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