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July, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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दामोदर लाल ‘जांगिड़‘ की ग़ज़ल

ग़ज़लरोज चीखते अखबार तो, सरकार क्‍या करे।पसरे हैं भ्रष्‍टाचार तो, सरकार क्‍या करे॥
डिप्‍लोमा, डिग्रियां लिये, तादाद में इतने,बैठे हैं जो बेकार तो, सरकार क्‍या करे।
सियासत के हर शोबे में मुजरिमान की ऐसे,हैं हो गयी भरमार तो, सरकार क्‍या करे।
जम्‍हूरियत के नाम से अब मुल्‍क में मेरे, वो करते कारोबार तो ,सरकार क्‍या करे।
गर खास मोहरों को बचाने में मुल्‍क का ,होता है बंटाढ़ार तो, सरकार क्‍या करे।
भोपाल गैस काण्‍ड से होते हैं फैसले ,गर आदिल हैं लाचार तो, सरकार क्‍या करे।
दामोदर लाल ‘जांगिड‘

सुख नन्दन का आलेख संस्‍कृति के चार अध्‍यायः कवि और चिंतक का द्वंद्व

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सुखनंदन एडवोकेटसिविल कोर्ट, आजमगढ़, उ.प्र., 276001 दिनकर हिन्‍दी के उन कुछ एक साहित्‍यकारों में से हैं, जिनकी प्रतिभा का लोहा चिन्‍तन के क्ष्‍ोत्र में भी माना जाता है। उनकी इस असाधारण ख्‍याति का कारण है उनकी रचना ‘संस्‍कृति के चार अध्‍याय'। संस्‍कृति से संबंधित अध्‍ययनों में इस पुस्‍तक को एक अनिवार्य पठनीय संदर्भ ग्रंथ के तौर पर मील के पत्‍थर की हैसियत प्राप्‍त है। दिनकर के रचना संसार के संस्‍कृति के चार अध्‍याय की स्‍थिति अन्‍य काव्‍य रचनाओं से कुछ अलग सी है। न केवल इसमें अभिव्‍यक्‍ति के रूप (गद्य) की भिन्‍नता है, बल्‍कि इसमें उनका स्‍वर भी और उनके निष्‍कर्ष भी भिन्‍न हैं। यह भिन्‍नता बहुत मानीखेज है और दिनकर की वास्‍तविक छवि का निर्माण करते हुए इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। दिनकर पर विचार करते समय इस भिन्‍नता का इसलिए बढ़ जाता है क्‍योंकि यह दिनकर प्रेमियों और पाठकों को दो भिन्‍न दिशाओं में प्रेरित करती है।भारत के स्‍वाधीनता आंदोलन को हिंदी कविता में सर्वश्रेष्‍ठ अभिव्‍यक्‍ति देने वाले रामधारी सिंह दिनकर, विशाल जन समुदाय की आकांक्षा को अपनी ओजस्‍वी वाणी से मुखरित करने वाले …

सुभाष राय की कवितायें

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1. तलाश
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मौसम साफ होने पर
कोई भी बाढ़ के खिलाफ
पोस्टर लगा सकता है
बिजली को गालियाँ
बक सकता है
तूफान के खिलाफ
दीवारों पर नारे
लिख सकता है जब हवा शीतल हो
धूप मीठी हो
कोई भी क्रांति की
कहानियाँ सुना सकता है
लेनिन और माओ की
तस्वीरें टाँग सकता है
घर की दीवारों पर लेकिन जब मौसम
बिगड़ता है
गिने-चुने लोग ही
घर से बाहर निकलते हैं
बिजलियों की
गरज से बेखबर
बाढ़ के खिलाफ
बांध की तरह
बिछ जाने के लिए ऐसे कितने लोग हैं
धरती उन्हें
चूमना चाहती है प्यार से 2. आदमी होना
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उस पर इलजाम थे
कि वह झूठ नहीं बोलता
कि वह अक्सर
खामोश रहता है उसे देखने को
लालायित थी भीड़
बहुत दिनों से कोई
दिखा नहीं था इस तरह
सच पर अडिग वह बिल्कुल दूसरे
आदमियों जैसा ही था
हाथ, कान, आँख
सब औरों की ही तरह भीड़ में घबराहट थी
कुछ उसे पागल
ठहरा रहे थे..
आत्महत्या पर उतारू है
बेवकूफ, मारा जायेगा कुछ को याद आ रहीं थीं
ऐसे मरजीवों की कहानियाँ..
एक और आदमी
पगलाया हुआ��…

सुनील संवेदी की कविता : बड़ी हो गई बिटिया

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उन्हें-पड़ोस की वह छोटी सी बिटिया बहुत अच्छी लगती थी।
वह उसे-बिटिया ही कहते थेसुंदर, लाडली, मासूम बिटिया।
और बिटिया-‘बिटियों’ के साथ ’बिटिया’ नहीं,’बड़े’ के साथ ’बड़ा’ बन जाना चाहती थी।
बड़े सपने, बड़ी बातें, बड़ा सोचना,बड़ा सुनना, बड़ा सुनाना, बड़ा देखनाबड़ा दिखना, बड़ी कहानी, बड़े गीतबड़ा राजा, बड़ी रानीहां... एक छोटी सी राजकुमारी बस्स...’बड़े’ का तो मुंह ही’बड़ा’ कर देती थी।
बड़े खड़े होते तो-कमर के आस-पास के कद कोपंजों पर उचकाती,देखो न, मैं बड़ी हो गई हूं।
और बड़े-उसे, अपने शांत आलिंगन में समेटकरबस्स, चूमते ही चले जाते।
या कि, तुम गोद में बैठी रहो,न, मैं तो न बैठतीअब बड़ी हो गई हूं, देखो।
अपनी झालरदार फ्रॉक पकड़तीऔर, झूमने लगती,बड़े, एकटक निहारते रहते।बिटिया कभी-कभीछोटी सी बात भी कह देती,आप, मेरे पापा से अच्छे हैं,आप, मेरे पापा होतेमेरे पास रहतेमुझे प्यार करते।
कि, बड़े सकपका जातेबड़ी-बड़ी बातें सिखाने लगते।मम्मी कहती-बिटिया, अधिक न जाया करो वहां।कि, ऊं हू मम्मी आप और पापा का घर आफिसऔर मेरा!मम्मी सकपका जाती।
एक रात-एक अंधेरे कोने में दुबकीसिसक रही थी,उसकी झालरदार फ्राक,और चड्डी, मुंह में ठुंसीमना रही थी मातमलाज न ब…

शोभा गुप्ता के हास्य व्यंग्य दोहे

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जिम्मेदार कौन ?नेता ने जनता से बोला ये रोना-धोना छोड़बात पुरानी बोझ बन गई उसको ढोना छोड़बाढ़ प्रभावित क्षेत्र हैं कारण कहा हाथ को जोड़ तू मंहगाई का कोई ठीकरा मेरे सिर मत फोड़ ॥ १॥
अनाज सड़े गोदाम से बाहर किसको सुध है भाई नाम,पता गोदाम का लेकर ट्रक में शराब है आई अब सरकारी गोदामों में अवैध माल संभलेगा राशन की दूकान पर लिखा "चीनी नहीं है आई"॥ २॥
धरती छोटी बड़ी आबादी,प्रजनन की आजादी कंक्रीट के जंगल देखो और खेतों की बर्बादीदूध,अनाज,फल जहर मिले हैं मरने की आजादी दोष नहीं यह सरकारी है व्यवसायिक आजादी ॥ ३॥
फैशन के इस दौर में नकली अब सामान मिलेगा अजी पैसे भी तब देने होंगे जब सामान मिलेगा बाजारवाद की महिमा को तब तुम भी समझोगे तेरे ही घर की बाजारों में अमेरिका,जापान मिलेगा ॥ ४॥
आतंकवाद है एक खिलौना मिलकर सब खेलेंगे दद्दा ने ही हुक्म दिया है इसे अब की हम झेलेंगेविकासवाद की इस थ्योरी को भारत जब पढ़ लेगा जब दद्दा का आदेश मिलेगा तब और लोग खेलेंगे॥ ५॥
शोभा गुप्ता जनकपुरी,नई दिल्ली ३० जुलाई २०१०

रत्नकुमार सांभरिया का आलेख : दलित, प्रेमचंद, तुलसीदास और शहीद भगत सिंह

मुंशी प्रेमचंद (1880-1936) को वर्णवादी आलोचक साहित्य जगत का बरगद मानते आ रहे हैं। बरगद तक पहुँचाने में उनकी कितनी ही खामियाँ ढंक-दबा दी गईं। यह ठीक वैसे ही रहा जैसे मूर्ति की महिमा ही गाई जा सकती है, प्रतिकार अक्षम्य है।इस तथ्य से कितने रूबरू हैं कि प्रेमचंद ग्राम्य जीवन और लोक परंपराओं से नितांत अनभिज्ञ थे। वे घोर ईश्वरवादी, भाग्यवादी और वर्णवादी थे तथा छुआछूत और जातपांत में उनका अटूट विश्वास था। यहाँ यह तथ्य भी पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है कि प्रेमचंद- साहित्य में श्लीलता का प्रायः अभाव है और उनकी भाषा में लियाकत नहीं होने के कारण पाठक मन को कचोटती है। विशेषतः दलितों के बारे में वे जिस भाषा-शैली का प्रयोग करते हैं, वह हृदय ही चीर डालती है।बावजूद इसके मार्क्सवादी सोच का यह मानना है कि प्रेमचंद ने उस समय दलितों के बारे में लिखा, जब लोग उनकी छाया से भी दूर भागते थे। क्या यह तर्क इस दायरे में नहीं आता कि कोई किसी अछूत को थप्पड़ मार दे और यह तर्क दे कर उसकी प्रशंसा की जाये देखो, ‘उसने ‘अछूत’ को छुआ तो सही, दूसरे लोग तो उसकी छाया से भी दूर भागते हैं।’कहना होगा कि प्रेमचंद-साहित…

यशवन्‍त कोठारी का आलेख : सतत संघर्षशील व्‍यक्‍तित्‍व -डा़.प्रो.सी.पी.जोशी

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षष्टिपूर्ति - 29.7.10 परसतत संघर्षशील व्‍यक्‍तित्‍व -डा़.प्रो.सी.पी.जोशीयशवन्‍त कोठारीसी.पी.जोशी एक कर्मठ राजनेता, अदभुत प्रतिभा के धनी, संघर्षशील व्‍यक्‍ति है। उनमें संगठन, पार्टी और सरकार की गहरी समझ है। उनमें गजब की संगठन क्षमता और राजनैतिक सूझबूझ है। राजनीति के सिद्धान्‍तों को चुनाव क्ष्‍ोत्रों में अपनाना और सफल होना उनकी विशेषता है। अकेले दम पर उन्‍होंने पूर्ववर्ती सरकार को उखाड़ फेंका उनसे मेरा परिचय काफी पुराना है। नेतृत्‍व करने के गुण सी.पी. में प्रारम्‍भ से ही थे। उन्‍होंने नाथद्वारा के हायर सैकण्‍डरी स्‍कूल में छात्रसंघ अध्‍यक्ष का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। ग्‍यारहवीं के बाद सी.पी.जोशी उदयपुर जाकर पढ़ाई करने लग गये। मैंने नाथद्वारा कालेज में दाखिला ले लिया। मगर हमारा सम्‍पर्क बराबर बना रहा। मोहनलाल सुखाड़िया से मिलने हम लोग एक-दो बार साथ-साथ गये थे। सी.पी. ने भौतिकशास्‍त्र में एम.एस.सी. किया नौकरी मिली मगर नहीं की। मैंने राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय जयपुर से रसायन विज्ञान में एम.एस.सी. कर नौकरी शुरू कर दी। सी.पी. ने एम.बी. कालेज के छात्रसंघ व उदयपुर विश्‍वविद्यालय के चुनाव लड़…

विजय वर्मा की हास्य कविता - भिखारी

भिखारी  
[निराला जी की आत्मा से क्षमा याचना सहित ]
-- वह आता! मोबाइल पर बतिआते ,निश्चिन्त-भाव से आता.आकर कॉल-बेल बजाता.भीख कहे या हफ्ता--हर हफ्ते आकर ले जाता .हरदम भरा रहता उसका पेट अठन्नी उठा कर देता फेंकपांच रूपया से कम मिलने पर बहुत देर गरियाताकभी-कभी उपदेश भी देता ,कहता-"कब तक स्कूटर घसिटोगे साब!क्यों चार चक्का नहीं ले आता"वह आता !मैं उसे देख घबराता . .                                                                            v k verma
vijayvermavijay560@gmail.com

महेन्‍द्र प्रताप पाण्‍डेय ‘‘नन्‍द'' की कविताएँ व दोहे

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हिन्‍दी के दोहे(हिन्‍दी महिमा)हिन्‍दी मे गुण बहुत है, सम्‍यक देती अर्थ।भाव प्रवण अति शुद्ध यह, संस्‍कृति सहित समर्थ॥1॥
वैयाकरणिक रूप में, जानी गयी है सिद्ध।जिसका व्‍यापक कोश है, है सर्वज्ञ प्रसिद्ध॥2॥
निज भाषा के ज्ञान से, भाव भरे मन मोद।एका लाये राष्‍ट्र में, दे बहु मन आमोद॥3॥
बिन हिन्‍दी के ज्ञान से, लगें लोग अल्‍पज्ञ।भाव व्‍यक्‍त नहि कर सकें, लगे नहीं मर्मज्ञ॥4॥
शाखा हिन्‍दी की महत्‌, व्‍यापक रूचिर महान।हिन्‍दी भाषा जन दिखें, सबका सबल सुजान॥5॥
हिन्‍दी संस्‍कृति रक्षिणी, जिसमे बहु विज्ञान।जन-जन गण मन की बनी, सदियों से है प्राण॥6॥
हिन्‍दी के प्रति राखिये, सदा ही मन में मोह।त्‍यागे परभाषा सभी, मन से करें विछोह॥7॥
निज भाषा निज धर्म पर, अर्पित मन का सार।हर जन भाषा का करे, सम्‍यक सबल प्रसार॥8॥
देश प्रेम अनुरक्‍ति का, हिन्‍दी सबल आधार।हिन्‍दी तन मन में बसे, आओ करें प्रचार॥9॥
हिन्‍दी हिन्‍दी सब जपैं, हिन्‍दी मय आकाश।हिन्‍दी ही नाशक तिमिर, करती दिव्‍य प्रकाश॥10॥
हिन्‍दी ने हमको दिया, स्‍वतंत्रता का दान।हिन्‍दी साधक बन गये, अद्‌भुत दिव्‍य प्रकाश॥11॥
नहीं मिटा सकता कोई, हिन्‍दी का साम्राज्‍य।सुखी समृद्ध…

शरद जायसवाल की हास्य व्यंग्य कविताएँ व ग़ज़लें

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आशा की किरण फूटी है पढ़ी लिखी है वो हम उससे कमतर जमीं पे हम वो आसमां को छूती है !
प्रेम के धागे को तुम कच्‍चा मत समझो वो रेशम की थान इधर गठान सूती है !
हूं तो शहरी शक्‍ल से दिखूं वनवासी उधर भोग है छप्‍पन इधर जड़ी बूटी है !
जब हुई शाम वो अंधेरे में सिमट गई्र जानो मैं हूं बत्‍ती उसे गुल मानो लाइन में खड़े होते हैं हम सटकर लोग समझते हैं जगह छूटी है !
उसकी चाल चकरघिन्‍नी सी खनकती रहती है वो सिन्‍नी सीहम तो उसके बदन पे लटकेफालतु कपड़ेवो दीवार पे लगीशानदार खूंटी है !
सुबह-शाम था हमाराछत पे जानावहीं शु्‌रु हुआ अफसोसनाक़ अफ़सानाहमने तो औरों पे डोरे डाले थेउसने लंगड़ फंसापतंग लूटी है !
अब तो चैन लेटा हूंउसकी बाहों मेंसपने रंगीन हैं अबनिगाहों मेंकल ही गांव से आई हैउसकी बहनाएक आशा की किरण फूटी है !---अब कैसे करें दिल लगा कर गधी से , कुछ इस तरहां हमने कहा !चार पायों पे खड़े तुम , दीदार अब कैसे करें !!
इस कदर आंधी चली कि , टीन टप्‍पर उड़ गया !सब निहारें गौर से , हम प्‍यार अब कैसे करें !!
तुम जमीं को देखते , यूं चर गए सारा जहां !सर के तो गायब हुए , एतवार अब कैसे करें !!
हममें नहीं तुममें बहुत है

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़ल

ग़ज़लसब का मन ललचाये कुर्सी।क्‍या क्‍या नाच नचाये कुर्सी ॥यूं ही सहज नहीं मिल जाती ,सैण्‍डल तक उठवाये कुर्सी ,नींद उसे फिर कब आती है,अगर जरा हिल जाये कुर्सी ।कौन छोड़ ना फिर चाहेगा ,एक बार मिल जाये कुर्सी ।जीते जी ही वो मर जाता ,जिसकी भी छिन जाये कुर्सी ।करे फाइलें कानाफूसी,क्‍या क्‍या चट कर जाये कुर्सी।लगी हैं चलने यहां कुर्सियां ,क्‍या क्‍या दौर दिखाये कुर्सी ।---दामोदर लाल जांगिड़पोस्‍ट लादड़ियाजिला नागौर राज

सुनील संवेदी की कविता : लेडीज फर्स्ट

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लेडीज फर्स्टआधुनिक साहित्य नेजब- औरत के सदियों पुरानेदबे-कुचलेपन, आकांक्षाओं, संभावनाओंआस्थाओं, संवेदनाओं की असमय-अस्वाभाविक मृत्युएवं इससे उपजीअस्सीम पीड़ा युक्त हताशा-कुंठा कोशब्दों के भरपूर आंदोलन कीशक्ल देने का जिम्मा उठा ही लिया हैतो- औरत का रोनासुनाई भी दे दिखाई भीलेकिन-आदमी का हंसना मात्र।आदमी की-असहनीय व्यथा- व्याकुलता कोभीड़ से खचाखच भरे चौराहों परकुचल कर नष्ट हो जाने के लिए, फेंककर,औरत की डकार कोआकाश दे दो।औरत में-जबरन प्यास जगाओपरंतु-आदमी के फफदियाये होठों सेपपड़ियाये गले तक कोपानी की एक बूंद मयस्सर न हो।औरत के-जीर्ण-शीर्ण पल्लू के भीतरआदमी के माथे कीदुर्भाग्य की पराकाष्ठा नापती लकीरेंखो जाएं।चूल्हा-चक्की, झाडू़-पोंछाबच्चों की चिल्ल-पों केसुर में सुर मिलाकरजैसे-तैसे निबटती औरत के कद मेंइतना अप्रत्याशित उछाल आए कि,छीना-झपटी से लेकरमार-काट की हद तकएक-दूसरे कोनोचती-खसोटती भीड़ कीसुर्ख आंखों से घिसट-घिसट करजैसे-तैसे बचकरघर लौटता कटा-फटा आदमीबौना लगने लगे।ऐ आधुनिक औरत-छीन ले आगे बढ़करआदमी के कपड़ों-लत्तों, हाव-भावचाल-ढाल,पीना-पिलानाउठना-बैठना आदि-आदि कोपरंतु-आज से सदियों पूर्व तक केदर…

दामोदर लाल जांगिड की कविता : फुटपाथ

फुटपाथफुटपाथ भी पैदा होते हैं, फुटपाथ जवानी पाते हैं।फुटपाथ से डोली उठती तो, माँ बाप के आँसू आते हैं।फुटपाथ भी रोते मय्‍यत पे, ये मंगल गीत भी गाते हैं।इ न कीच भरे फुटपाथों पर, भगवान भी पूजे जाते हैं॥हालात से कर के समझौता, फुटपाथ पे ही मर जाते हैं।फुटपाथ वसीसत में अपनी, फुटपाथ ही देकर जाते हैं॥अभिजात्‍य शब्‍द की व्‍याख्‍या में, फुटपाथ धरातल होता है।थक हार परिश्रम भी आखिर, फुटपाथ पे आकर सोता है॥फुटपाथ के नेता का बँगला , फुटपाथ के उपर होता है।फुटपाथ का अपना साल गिरह गणतंत्र दिवश पर होता है।फुटपाथ बनाता सरकारें, सरकार इन्‍हें बनवाती है।आजन्‍म यहां पर रहने का, अघिकार इसे दिलवाती है।हर बार दिवाली आती तो, दिल काम दीये का करते हैं।फिर स्‍वप्‍न पतंगे आकर के , फुटपाथ पे आकर मरते हैं।और आतिशबाजी बन कर के, कुण्‍ठित अरमान बिखरते हैं।नवजात अभावों के चूजे, फुटपाथ के नाम से डरते हैं।अपराध जो भूखा पेट करे, कभी माफ किया नहीं जाता है।बलवान की उँची गर्दन तक, कानून पहुँच नहीं पाता है।फुटपाथ के उभरे हिस्‍सों को, हर आँख निहारा करती है।फुटपाथ के होठों की लाली, कुछ और इशारा करती है।फुटपाथ के दामन की सिलवट, को…

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा की ग़ज़ल

बना है आन भारत की हुआ है शान भारत की। यकीनन आज भ्रष्‍टाचार है पहचान भारत की॥ चरम सीमा पे ताण्‍डव भूख बेकारी ग़रीबी का, कि क्रंदन में हुई तब्‍दील वो मुस्‍कान भारत की। निर्धन देश के धन से यहां उड़ते हैं गुलच्‍छर्रे, बड़ी बदकार गाली बन गया ईमान भारत की। यहां माँ भारती का खैरख्‍वाह कोई नहीं शायद, तुम्‍हारे हाथ में हैं आबरु भगवान भारत की । भिखारी की तरह रिश्वत पसारे हाथ बैठी हैं, दलाली हैं हकीकत में निगाहबान भारत की। मिसाले फाहिशा ‘अफसर‘ यहां दिन रात बिकते हैं, हैं बिक्री के लिए तत्‍पर सियासतदान भारत की। इसी तकिये से मेरे मुल्‍क की सरकार चलती है, यही हस्‍ती का वायस है शिकाहो शान भारत की। वतन पे मर मिटे उस कोख से पैदा हुये ऐसे, हरीफों की तरह काटें जड़े सन्‍तान भारत की। ये कुत्‍ता पालतू जो काटने दौड़ा है मालिक को, मिटाने का सियासत कर रही ऐलान भारत की निठारी में मिले कंकाल इक दिन खुद बतादेंगे, हालत हो गयी है आज क्‍या साहबान भारत की।

कान्ति प्रकाश त्यागी की हास्य व्यंग्य कविता : हम स्वतंत्र हैं

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हम स्वतंत्र हैंडा० कान्ति प्रकाश त्यागी बलिदानों से मिली आज़ादी, हम स्वतंत्र हैं
परन्तु हम ज़रूरत से ज्यादा ही स्वतंत्र हैं
हम स्वतंत्र हैं, चाहे डिटर्जेन्ट से दूध बनायें
हम स्वतंत्र हैं, पनीर में यूरिया आदि मिलाये
स्वतंत्र हैं,फ़ल सब्ज़ियों में इंज़ेक्शन लगाये
जनता के स्वास्थ्य पर,ज़हरीली छुरियां चलायें
स्वतंत्र हैं, पुरानी दवाइयों को बाज़ार में लाये
प्रसिद्ध कम्पनियों के नाम पर ,अरबों कमायें हम स्वतंत्र हैं, कर ले अरबों का घोटाला
जो हमें टोके, कर दें उसी का मुँह काला
स्वतंत्र हैं, किसी की कहीं भी पगड़ी उछालें
जो दे भाषण, पहले उसी को घर से उठालें
हम स्वतंत्र हैं, किसी से मांगे लाखों का धन
न देने पर सरे आम कर दें, उसका कतल जब चाहे किसी के घर में घुसें, बहू बेटियां उठाले
यदि करे रिपोर्ट पुलिस, पुलिस से उसे फंसवा दे
यह निश्चित है, हमारा कुछ नहीं होने वाला
यदि नेता अफ़सरों को देते दिलाते रहें निवाला ---Dr.K.P.Tyagi
Prof.& HOD. Mech.Engg.Dept.
Krishna institute of Engineering and Technology
13 KM. Stone, Ghaziabad-Meerut…

प्रमोद भार्गव की कहानी : नक्टू

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कहानी नक्‍टू प्रमोद भार्गव    नकटू अब दस साल का हो गया था। अपने नाम के ही अनुरूप वह बेशरम था, बल्‍कि यों कहा जाए कि उसका नाम उसके जन्‍म के कारण ही नकटू पड़ गया था तो ज्‍यादा व्‍यावहारिक होगा। वह अपनी विधवा मां का नाजायज पुत्र था। मां ने गांव के लोगबागों के गिले शिकवे और विष बुझे वाणों की भार से घायल होते रहने से हमेशा के लिए निजात पाने के लिए खारे कुंए में कूद कर आत्‍महत्‍या कर ली थी। घर में नकटू की नानी के अलावा और कोई था नहीं। नानी ने ही जैसे-तैसे उसे पाला पोसा, बड़ा किया। नकटू का पिता कौन है ठीक-ठीक किसी को ज्ञात नहीं है। बताते हैं एक बार उसकी मां का देवर यानि कि उसका काका अपनी विधवा भाभी भुर्रो की सुधबुध लेने के बहाने गांव आया था और अर्से तक रूका था। उसके जाने के बाद से ही भुर्रो के शरीर में परिवर्तन शुरू हो गए थे और पूरे गांव में यह काना-फूंसी होने लगी थी कि भुर्रो के पैर भारी हो गए हैं।
अवैध संतान होने के कारण ही उसे उच्‍च जाति का होने के बावजूद जाति-बिरादरी सगे-संबंधी, नाते-रिश्‍तेदारों और गांव में वह आदर नहीं मिला जिसका वह हकदार था। जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया, नानी की पकड़ से …

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तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

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रवि रतलामी

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