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August 2010
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ग़ज़ल

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उनकी भोली मुस्कानों से जलते हैं कुछ लोग,

जाने कैसी-कैसी बातें करते हैं कुछ लोग।

 

धूप चांदनी सीप सितारे सौगातें हर सिम्त,

फिर भी अपना दामन खाली रखते हैं कुछ लोग।

 

उनके आंगन फूल बहुत हैं मेरे आंगन धूल,

तक़दीरों का रोना रोते रहते हैं कुछ लोग।

 

इस बस्ती से शायद कोई विदा हुई है हीर,

उलझे-उलझे खोए-खोए दिखते हैं कुछ लोग।

 

खु़शियां लुटा रहे जीवन भर लेकिन अपने पास,

कुछ आंसू कुछ रंज बचा कर रखते हैं कुछ लोग।

 

जुल्म ज़माने भर का जिसने सहन किया चुपचाप,

उसको ही मुजरिम ठहराने लगते हैं कुछ लोग।

 

इतना ही कहना था मेरा बनो आदमी नेक,

हैरां हूं यह सुनते ही क्यूं हंसते हैं कुछ लोग।

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- महेन्द्र वर्मा

व्याख्याता, डाइट, बेमेतरा

जिला दुर्ग ,छ.ग.,491335

e mail-            vermamahendra55@yahoo.in

बाल कथा-

मित्र की मदद : दीनदयाल शर्मा

Rajasthani Hindi child writer Deendayal Sharma. 1 JPG

एक थी गिलहरी और एक था तोता। गिलहरी का नाम था गिल्लू और तोते का नाम था टिल्लू।

गिल्लू और टिल्लू पक्के दोस्त थे। गिल्लू पीपल के पेड़ पर रहती थी और टिल्लू नीम के पेड़ पर। पीपल और नीम के दोनों पेड़ भी पास-पास ही थे। इस कारण गिल्लू और टिल्लू दोस्त के साथ-साथ पड़ोसी भी थे। दुख-सुख में दोनों एक दूसरे की मदद करते।

एक दिन की बात है। गिल्लू पेड़ के कोटर में सो रही थी। उसे हल्की-हल्की ठण्ड महसूस होने लगी। धीरे-धीरे उसे ज्यादा ठण्ड लगने लगी। गिल्लू को घबराहट सी होने लगी। उसने देखा कि उसका शरीर कुछ गर्म सा हो रहा है। उसे अपनी मां की याद आने लगी। मां कहती थी-कि यदि सर्दी लगकर बुखार चढ़े तो यह मलेरिया बुखार का लक्षण है। ऐसा होने पर पास ही लगे सिनकोना के पेड़ की दो-दो पत्तियां सुबह-शाम खानी चाहिए। बुखार तभी ठीक होगा। गिल्लू को अपने शरीर में कुछ कमजोरी सी महसूस होने लगी।

उसने लेटे-लेटे ही अपने दोस्त टिल्लू को आवाज दी-टिल्लू। टिल्लू। ओ टिल्लू। कई बार आवाजें दी लेकिन टिल्लू की तरफ से कोई उत्तर नहीं आने पर वह उठी और सिनकोना के पेड़ से चार पत्तियां तोड़कर लाई। उसने दो पत्तियां चबा ली। अब उसे सर्दी लगना कुछ कम हो गया था। वह पेड़ के कोटर में आकर सो गई। सुबह अपनी आदत के अनुसार गिल्लू जल्दी ही उठी और कुल्ला - मंजन करके सिनकोना की दो पत्तियां फिर चबा ली। कुछ देर बाद उसने महसूस किया कि उसका बुखार उतर गया है। वह अब स्वस्थ थी। वह अपनी कोटर से बाहर आई और अपने दोस्त टिल्लू तोते को आवाज दी। टिल्लू की तरफ से कोई उत्तर नहीं आया।

वह पीपल के पेड़ से नीचे उतरी और नीम के पेड़ के पास पहुंची। उसने टिल्लू को फिर आवाज दी। वह सोचने लगी कि टिल्लू को भी बुखार हो गया होगा। वह नीम के पेड़ पर चढ़ी तो देखा कि टिल्लू घोंसले में नहीं था। उसे चिंता होने लगी कि टिल्लू कहां चला गया। गिल्लू नीम के पेड़ से नीचे उतरी तो देखा कि कुछ लोगों के पैरों के निशान थे। उसने सोचा कि टिल्लू को कोई आदमी पकड़ कर ले गया है। वह पैरों के निशान देखती-देखती आगे बढऩे लगी। तभी उसे टिल्लू की आवाज सुनाई दी। गिल्लू के कदम रुक गए। वह इधर-उधर देखने लगी। उसे टिल्लू की आवाज फिर सुनाई दी। वह उस आवाज की तरफ बढ़ऩे लगी।

उसने देखा कि एक बहुत बड़े मकान के सामने लगे नीम के पेड़ पर एक पिंजरा लटक रहा है। टिल्लू तोता उसी में कैद था। गिल्लू दबे पांव पेड़ पर चढ़ गई। पिंजरे के पास जाकर वह टिल्लू तोते से धीरे से बोली-घबराओ नहीं टिल्लू, तुम्हारी मदद के लिए मैं आ गई हूं। इतना कहते-कहते गिल्लू ने पिंजरे के दरवाजे की कुंडी खोल दी। खुशी से टिल्लू की आंखों में आंसू आ गए। गिल्लू बोली टिल्लू देर मत करो, उड़ जाओ और फिर टिल्लू फुर्र से उड़ गया। टिल्लू की आजादी देखकर गिल्लू गिलहरी की आंखें भी नम हो आईं। वह अपनी नम आंखों से उसे बहुत देर तक देखती रही।

-दीनदयाल शर्मा, मानद साहित्य संपादक, टाबर टोल़ी, हनुमानगढ़ जं. -335512, राजस्थान,

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अभी सभ्य होना शुरू ही किया है....

पसरे हुए जंगल के किनारे वाला

वह पहला गाँव

मेरा ही तो है...

एक दिन वह जंगल ...

ओझल हो चुका होगा

आँखों से...

एक दिन हमारा गाँव दूर होता

पहुँच जायेगा शायद

बीहड़ चाँद पर....

अभी सभ्य होना शुरू ही किया है....

मैंने देखा है -

तुम्हारा गाँव

उसी वैमनस्य से लड़ता -झगड़ता ,

फसलें घृणा की काटता ..

.नस्लें उपेक्षा की बांटता

अलगाव के बीज रोपता

किसी दुर्दम्य वासना से

चाँद पर सृजन में लगा है

और करवट लेने लगे हैं -

धर्म सत्ताएं ....!

मानव का वही महाकार!

चाँद कुछ सहमा -सा है ...

बस्तियों का प्रसार ..

मेरे बंजर होने में

क्या जीवन यूँ छिपा था ?

आह ! अब धरती कितनी दूर हो चली है ...

और कोई प्रत्याशा?

तृषित रेगिस्तान में खोयी ..

.समय की झुर्रियाँ...

एक और ग्रह की मौत हो गयी

पर कन्धा देने को कौन था ?

तुम तो परदेश बसे थे !

है न !

---.

(लेखिका द्वय की टिप्पणी -

ये रचना हम दोनों का संयुक्त प्रयास है. इसे एक संवाद या परिचर्चा कहना गलत न होगा.

- जया-अपर्णा )

 

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कथाकार तेजेन्‍द्र शर्मा ने कुछ दिन पहले एक ई-मेल भेज कर सब दोस्‍तों को बताया था कि कहानीकार राजीव तनेजा ने उन्‍हें बताया है कि किसी ने उनकी (राजीव तनेजा की) चार कहानियां चुरा ली हैं। तेजेन्‍द्र जी ने इस मुद्दे को सार्व‍जनिक करते हुए मित्रों से इस मामले से जुड़े नैतिकता , अनैतिकता , चोरी और सीनाजोरी , मूल लेखक के प्रति आभार मानने जैसे सवालों के जवाब चाहे हैं और एक तरह से इस मामले पर रोचक बहस छेड़ी है।

कुल मिला कर किस्‍सा मज़ेदार है और इस पर बहस की जा सकती है।

शायद तेईस चौबीस बरस पहले की बात रही होगी। तब कमलेश्‍वर जी गंगा नाम की एक पत्रिका के संपादक हुआ करते थे। उसी गंगा में एक दिन गरमागरम मुद्दा उछला। प्रसिद्ध कहानीकार , नाटककार और उपन्यासकार स्‍वदेश दीपक जी ने एक बांग्‍ला लेखक (इस समय लेखक का नाम याद नहीं आ रहा है।) पर आरोप लगाया था कि उस लेखक ने दीपक जी की कहानी बाल भगवान (बाद में इस कहानी पर नाटक भी आया था।) को चुराया है और उस पर बांग्‍ला में देवशिशु नाम से कहानी लिखी है।

कमलेश्‍वर जी ने इसे एक सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनाया और अपनी पत्रिका के जरिये एक तरह की मुहिम शुरू कर दी कि इस तरह की साहित्यिक चोरी के खिलाफ क्‍या किया जाना चाहिये। कमलेश्‍वर जी ने यहां तक किया था कि पाठकों को दीपक जी के पक्ष में मुफ्त पत्र तक भेजने की सुविधा दे डाली थी और इन पत्रों का भुगतान गंगा पत्रिका द्वारा किया जाता।

बाद में पता चला था कि देवशिशु के लेखक की बहुत पहले इसी नाम से इसी कहानी पर आधारित बांग्‍ला फिल्‍म भी आ चुकी थी। वे फिल्‍में अलग नाम से बनाते थे और लेखन अलग नाम से करते थे। अब चोरी का मामला उलटा पड़ चुका था और नये मोड़ के हिसाब से बाल भगवान की कहानी देवशिशु से चुरायी गयी थी।

मुझे ठीक से याद नहीं कि बाद में पूरे मामले का क्‍या हुआ लेकिन राजीव तनेजा के मामले से उस मामले की याद हो आना स्‍वाभाविक ही था।

फिलहाल इसी मामले पर बात करें। न तो राजीव जी ने और न ही तेजेन्‍द्र ने ही बताया है‍ कि कहानी (एक नहीं चार कहानियां) किस स्‍तर पर चुरायी गयीं। हम यहां चार स्थितियों की कल्‍पना कर सकते हैं।

स्थिति एक : राजीव जी किसी दारू पार्टी में अपने कहानीकार दोस्‍तों को अपनी नयी कहानियों के प्‍लॉट सुना रहे थे और ये प्‍लॉट ही पहली बार दूसरे लेखक या लेखकों की कहानियों के रूप में सामने आये। नशा उतरने पर या अपने प्‍लाटों पर दूसरे के बसे घरों को देख कर (खोसला का घोंसला) उन्‍होंने पाया कि वे लुट चुके हैं।

स्थिति दो : राजीव जी अपनी कहानियां लिख चुके थे और किन्‍हीं मित्रों को पढ़ने या सुधारने के लिए दीं और ये कहानियां वापसी में राजीव के घर का पता भूल कर अलग अलग पत्रिकाओं के दफ्तर में जा पहुंची और बेवफा सनम की तरह दूसरे लेखकों का वरण करके उनके नाम से छप गयीं।

स्थिति तीन : ये भी हो सकता है कि राजीव जी ने अपनी कहानियां टाइप करने के लिए किसी टाइपिस्‍ट को दी हों और पैसों के अभाव में अपनी कहानियां वहां से उठवा न पाये हों। अब टाइपिस्‍ट ने अपना मेहनताना वसूल करने के लिए सिर्फ टाइपिंग की कीमत पर से कहानियां किसी दूसरे लेखक को टिका दी हों (दर्जी आम तौर पर यही करते हैं।) ये भी हो सकता है कि टाइपिस्‍ट खुद उभरता लेखक रहा हो और कहानियां अपने नाम से छपवा डाली हों।

स्थिति चार : राजीव जी की छपी हुई कहानियां ही किसी पहलवान छाप लेखक ने अपने नाम से दूसरी पत्रिकाओं में छपवा ली हों। क्‍या कर लेगा राजीव।

हो सकता है मेरे पाठकों को इसके अलावा कोई और स्थिति भी सूझ रही हो। मुझे जरूर बतायें।

ऐसा मेरे साथ भी हो चुका है। एक ही कहानी की दो बार चोरी। अलग अलग भाषाओं में।

बताता हूं आपको।

1989 में हँस में मेरी कहानी ये जादू नहीं टूटना चा‍हिये छपी थी। कहानी काफी चर्चित रही और कई भाषाओं में अनूदित हुई। शायद 1998 की बात होगी। मेरे एक गुजराती मित्र , जो मेरी ये कहानी गुजराती में पहले ही पढ़ चुके थे , ने फोन करके बताया कि ये कहानी भारतीय विद्या भवन की गुजराती पत्रिका नवनीत में छपी है और मूल लेखक की जगह किसी मुसलमान लेखक का नाम है। हिंदी से अनुवाद में बेशक किसी गुजराती अनुवादक का नाम है। मेरे मित्र ने जब उस कहानी की फोटोकापी मुझे दी तो मैं हैरान रह गया। कहानी के अंजर पंजर ढीले कर दिये गये थे। कहानी की अंतिम पंक्ति जो पूरी कहानी की दिशा तय करती थी और मेरे लिए और पाठक के लिए भी बहुत मायने रखती थी , बदली जा चुकी थी। मैंने बहुत निराश हो कर नवनीत के संपादक को पत्र लिखा और अपने पत्र के साथ अपनी मूल कहानी , गुजराती में पहले से अनूदित पाठ और अब नवनीत में छपी कहानी की कापी भेजी और जानना चाहा कि किसी भी रचना का अनुवाद छापने के लिए उनके क्‍या नियम हैं।

ये सरासर चोरी का मामला था।

जब कई दिन तक कोई जवाब नहीं आया तो मैंने फोन पर ही बात की। उनके उत्‍तर गोल मोल थे और कहीं से भी मुझे संतुष्‍ट न कर सके। हार कर मैंने अनुवादक का पता और फोन नम्‍बर मांगा। अनुवादक ने जो कुछ बताया , उस पर सिर ही धुना जा सकता था। मैंने भी वही किया। अनुवादक ने बताया कि वह राह चलते फुटपाथ से रद्दी में हिंदी पत्रिकाएं खरीदता है और कोई कहानी अच्‍छी लगने पर उसका अनुवाद कर लेता है। ये कहानी उसने सरिता नाम की मैगजीन के‍ किसी पुराने अंक से ली थी। जब मैंने पूछा कि हिंदी में कहानी क्‍या इसी रूप में और इसी अंत के साथ छपी थी और क्‍या वे मुझे सरिता का वह अंक दे सकते हैं। अनुवादक के जवाब किसी भी लेखक को आत्‍म हत्‍या करने के लिए प्रेरित कर सकते थे। मैंने वह नहीं की। उसने बताया कि वह अनुवादक के रूप में अपनी जिम्‍मेवारी समझता है और जो खुद उसे अच्‍छा नहीं लगता या समझ में नहीं आता , उसे बदल डालता है और अपने हिसाब से तय करता है कि कहानी का अंत क्या होना चाहिये। मेरी कहानी के साथ भी उसने यही किया।

जहां तक सरिता का वह अंक मुझे देने की बात थी , अनुवादक महोदय ने बताया कि वे अपना काम हो जाने के बाद पत्रिकाओं को वापिस रद्दी में बेच देते हैं।

अब मेरे पास अपनी ही कहानी , जो किसी और के नाम से सरिता में छप चुकी थी , पढने का एक ही जरिया था कि पिछले 10 बरस के सरिता के सभी पुराने अंक खंगालूं और चोर लेखक को और सरिता के संपादक मंडल को प्रणाम करूं। ये सब करना संभव नहीं होता। मैंने भी नहीं किया। सरिता , चोर लेखक और चोर अनुवादक को बधाई दी जिन्‍होंने बेशक मेरी कहानी को खराब करके ही सही , और पाठक दिये।

हमारे आफिस में कर्मचारियों के लिए हर बरस पत्रिकाएं छापी जाती हैं। इस बार एक वरिष्‍ठ कर्मचारी ने बच्‍चन जी की एक चर्चित कविता अपने नाम से छपने के लिए दी। मैंने उस नवोदित कवि से पूछा कि ये कविता बच्‍चन जी के नाम से छपेगी , कर्मचारी के नाम से छपेगी या दोनों के नाम से। जवाब में हुआ ये कि कर्मचारी ने चपरासी को भेज कर कविता वापिस मंगवा ली।

राजीव जी , मन छोटा न करें। हम मायानगरी मुंबई में रहते हैं और रोज़ाना पचासों गीतों , आइडियाज़ , धुनों , सिचुएशनों , पूरी की पूरी फिल्‍म की चोरी की घटनाएं सुनते पढ़ते हैं। चोरी तो होती ही है और जब चोरी एक बार से ज्‍यादा बार होती है , ये तय करना मुश्‍किल हो जाता है कि पहले चोरी किसने की। पहले अ ने अंग्रेजी धुन चुरायी और फिर ब ने अ द्वारा चुरायी धुन को अपनी बना कर अपना कहा या उसने भी मूल अंग्रेजी से चुरायी फिर अपना कहा , कहना मुश्किल होता है।

राजीव जी , किसी ने आपका आइडिया चुराया तो क्‍या चुराया। विश्‍व भर के लेखक सदियों से चले आ रहे उन्‍हीं ग्‍यारह आइडियाज़ में से अपने काम का आइडिया ले कर पूरा जीवन लेखन करते हैं। अब आप ही बतायें कि मेरे घर में मौजूद बूढ़े पिता पर लिखी गयी मेरी कहानी गोविंद मित्र द्वारा अपने पिता पर लिखी गयी कहानी से बहुत जुदा कैसे हो सकती है जबकि सच तो ये है दो अलग अलग घरों में दो अलग अलग बूढ़े एक ही वक्‍त को कमोबेश एक ही तरीके से जी रहे हैं। सिर्फ कहानी का ट्रीटमेंट ही एक कहानी को दूसरी कहानी से अलग करता है।

छपी हुई कहानी चुरायी , पढ़ने के लिए या टाइपिंग के लिए दी कहानी अपने नाम से छपवा ली तो आपके पास तो प्रूफ होगा कहानी को अपना कहने के लिए। चढ़ बैठिये , चोर के सीने पर और कीजिये एक्‍सपोज उसे।

बात खत्‍म करने से पहले अपनी ही एक और कहानी का उदाहरण देता हूं। मैंने अपनी पत्‍थर दिल कहानी 1992 में लिखी थी और मेरा आरोप है कि बी आर चोपड़ा जी ने इस कहानी के लिखे जाने से 25 बरस पहले ही इस पर अपनी मशहूर फिल्‍म गुमराह बना ली थी। बेशक उसमें फिल्‍मी लटके झटके डालने के लिए बहुत सारे चेंजेज किये थे। ये बात अलग है कि गुमराह मैंने पहली बार पिछले हफ्ते ही देखी और बी आर चोपड़ा ने मेरी कहानी शायद ही पढ़ी हो। बेशक उनकी फिल्‍म और मेरी कहानी की बेसिक थीम एक ही है।

सूरज प्रकाश

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कविता.

मंदिर

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मैं अपने रास्‍ते से

जा रहा था

रास्‍ते में देखा

एक मंदिर था

किसी देवी का

लाल रंग से पुती हुई

चुनरी में लिपटी हुई

मैंने सिर झुका लिया

आते-जाते, जहां भी

मंदिर देखता हूं

सिर झुका लेता हूं

 

लेकिन क्‍या हुआ कि

कुछ लिखा था, जो

मैंने पढ़ लिया

अब जब पढ़ लिया

तो पूरा पढ़ लिया

लिखा था

श्री चौरामाई मंदिर

सुन्‍दरपुर, वाराणसी

अध्‍यक्ष - त्रिभुवन सिंह

कोशाध्‍यक्ष - संजय सिंह

उपाध्‍यक्ष - प्रभाकर दुबे

उपप्रबन्‍धक - अषोक कुमार पटेल

आय-व्‍यय निरीक्षक - मुन्‍ना लाल सिंह

रजिस्‍टर्ड - 841

प्रबन्‍ध समिति

आपका हार्दिक

स्‍वागत करता है.

प्रबन्‍धक - लालचन्‍द प्रसाद

 

मैंने सोचा

चलो....क्‍या करना है....?

हमें तो बस सिर झुकाना है

मगर सिर झुकाने के बाद

जब सिर उठाया, तो भी

कुछ था, लिखा हुआ

कुछ था, पढ़ने के लिए

स्‍वर्गीय बच्‍चा लाल श्रीवास्‍तव

द्वारा भेंट (ग्रिल)

मतलब, मंदिर का दरवाजा

इन्‍होंने लगवाया था

मुझे तो यही समझ में आया

फिर भी, मैंने अपना ध्‍यान हटाया

सिर्फ चौरामाई को देखा

वहां भी

चौखट पर लिखा था

जय माता दी

जय चौरामाई

और वहीं बगल में

संगमरमर के पत्‍थर पर

खुदाई करके

लिखी गई थी

दानदाताओं की सूची

रामप्रसाद - 101 रुपया

जयदेव सिंह - 290 रुपया

कन्‍हैया लाल - 100 रुपया

.................. - ...................

................... - ..................

.................... - .................

- क़ैस ज़ौनपुरी.

(टीप - कविता में दिए गए स्थान व व्यक्तियों के नाम पूर्णतः काल्पनिक हैं, और किसी जीवित-मृत व्यक्ति से संबंधित नहीं हैं)

मानव सेवा से ही राष्‍ट्रोन्‍नति सम्‍भव

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डॉ0 शशांक मिश्र ‘भारती'

मनुष्‍य मात्र की सेवा करना तथा पुरूषार्थ के द्वारा हमेशा सत्‍कर्म कर मन, वचन और कर्म से प्राणि मात्र का हित करना मनुष्‍य का कर्तव्‍य है।

यह हमारे देश और संस्‍कृति की प्राचीन परम्‍परा एवं विशेषता रही है। मनुष्‍य में दूसरों के प्रति सेवा भाव होना ही परोपकार कहलाता है, जिसके द्वारा व्‍यक्‍ति दूसरों का उपकार करता है। जब तक मनुष्‍य में दूसरों के लिए दयाभाव नहीं होगा तब तक उसमें सेवा भाव होना सम्‍भव नहीं है। इसलिए मनुष्‍य में मनुष्‍य के प्रति सेवा, सहानुभूति, दया तथा परोपकार की भावना विकसित हो और उसका मन-मस्‍तिष्‍क सांसारिक विकारों से दूर हो। तभी मानव सेवा की भावना पनप सकती है। बिना सेवा भावना को अपने अर्न्‍तरंग में संजोये राष्‍ट्रोन्‍नति में भागीदार बनना मनुष्‍य के बस से बाहर की बात है। इसी लिये मनुष्‍य का कर्तव्य है, कि वह मनुष्‍य के प्रति सेवा भावों का अपने अन्‍दर समावेश करे। जिसके द्वारा राष्‍ट्र की प्रगति में अपनी सामर्थ्‍य शक्‍ति के अनुसार सहयोग देकर उसके विकास के पथ को प्रशस्‍त करे।

मानव सेवा राष्‍ट्रोन्‍नति का केन्‍द्र बिन्‍दु है, जिसके चारों ओर देश और समाज की प्रगति का चक्र रूपी पहिया चलता-फिरता रहता है; लेकिन मानव सेवा में क्षणिक सी कमी या शिथिलता आने पर प्रगति का चक्र डगमगाने लगता है और शनैः-शनैः राष्‍ट्र की प्रगति रूक जाती है। जो मानव सेवा के खोखलेपन को उजागर करती है। वैसे मानव सेवायें सदैव एक सी नहीं रहती। क्‍योंकि समय तथा वातावरण परिवर्तन शील है, जिसके द्वारा मनुष्‍य के रंग ,लिंग,स्‍वभाव,वेशभूषा,बोलचाल,रूचि,लगन तथा संस्‍कृति पर प्रभाव पड़ते है। जिसके कारण मनुष्‍य की प्रवृत्ति में भी थोड़े बहुत परिवर्तन होते रहते हैं। जिनसे प्रभावित होकर मनुष्‍य फिर नयी उमंग और उत्‍साह के साथ राष्‍ट्र की

सेवा प्रारम्‍भ कर देता है। मानव द्वारा की गयी सत्‍य एवं पूर्ण ढं़ग की सेवा से ही राष्‍ट्रोन्‍नति में गति आती है। राष्‍ट्र में खुशहाली का वातावरण झलकने लगता है, जो मानव सेवा से ही राष्‍ट्रोंन्‍नति सम्‍भव होने का संकेत देता है।

मनुष्‍य असत्‍य, लोभ, घृणा,ईर्ष्‍या तथा आलस्‍य जैसे दुर्गुणों का त्‍याग करके ही सेवा भाव के पथ पर चल सकता है। सेवाभाव ही राष्‍ट्र की उन्‍नति में सहायक होने वाला एक मात्र ऐसा शब्‍द है, जिसके द्वारा देश और समाज का चहुंमुखी विकास सम्‍भव है।

मानव सेवा के द्वारा व्‍यक्‍ति जटिल से जटिल परिस्‍थितियों में भी संघर्ष कर तथा उन पर विजय प्राप्‍त कर राष्‍ट्र की उन्‍नति में अपना अमूल्‍य सहयोग देता है। मानव अपनी निःस्‍वार्थ भाव की सेवाओं के द्वारा तरह-तरह के कल्‍याण मयी कार्य करके समाज व देश में उन्‍नति के अवसरों के सम्‍बन्‍ध में नयी क्रान्‍ति ला देता है। जिसके द्वारा अशिक्षिति व्‍यक्‍ति भी उनसे प्रेरणा लेकर उनके मार्ग का अनुसरण करते हुए देश व समाज के विकास में सहयोग देते हैं। अपने अन्‍दर सद्‌गुणों का विकास कर उसमें जीवन रस रूपी नवीन हरियाली को जन्‍म देते हैं।

लेकिन मानव सेवा मदर टेरेसा,लेदीविद लैम्‍प तथा भट्‌ट नागेश जैसी निःस्‍वार्थ भाव के वशीभूत होकर हो अथवा ऐसा न लगे कि वह अपने लाभ को ही सर्वोपरि मानकर चल रहा है या इस प्रकार कहें-कि वह किसी राष्‍ट्र या देश अथवा व्‍यक्‍ति पर कोई उपकार कर रहा है;बल्‍कि ऐसा लगे,कि इस व्‍यक्‍ति, समाज व देश की मुझ पर ऐसी कृपा है, जो कि यह मेरी सेवायें स्‍वीकार कर रहा है। साथ ही साथ यह भी स्‍मरण रखना चाहिए, कि मानव सेवा संकुचित अर्थों की सीमित परिधि में न हो। उसमें अमीर-गरीब,झोंपड़ी,महल, राजा-प्रजा का भेद-भाव न हो। वह सबल वर्ग के साथ-साथ निर्बल ,यहां तक कि पशु-पक्षियों तक सेवा करने वाली हो। तभी राष्‍ट्र व समाज की प्रगति हो सकती है। परन्‍तु यह भी नहीं होना चाहिए कि ऊपर से त्‍याग पूर्ण सच्‍ची सेवा का आवरण चढ़ा हो ; जबकि अन्‍दर से लोभ की तस्‍वीर छिपी हो अथवा अपने स्‍वार्थ की भावना प्रबल हो। इसलिए आवश्‍यकता इस बात की है, कि सेवा का उद्‌देश्‍य एक निश्‍चित किन्‍तु पूर्व निर्धारित लक्ष्‍य एवं उद्‌देश्‍य की ओर हो। तभी मानव सेवा के द्वारा राष्‍ट्र का विकास सम्‍भव हो सकेगा ।

अगर दिखावटी सेवायें प्राप्‍त होती रहे, तो ऐसा लगेगा कि मनुष्‍य की सेवायें तो अधिकाधिक प्राप्‍त होती हैं;किन्‍तु राष्‍ट्र की प्रगति मे कोई विश्‍ोष परिवर्तन नहीं हो रहा है और न ही भौतिक एवं सांस्‍कृतिक पक्ष सुदृढ़ हो रहा है। उस समय व्‍यक्‍ति राष्‍ट्र की उन्‍नति के स्‍थान पर अपनी तथा अपने परिवार की उन्‍नति को प्रधानता देगा। तो राष्‍ट्रोन्‍नति कैसे हो सकती है। क्‍योंकि वह अपने स्‍वार्थ के लिए देश की सेवा करेगा। जिसमें उसके कुटुम्‍ब की भलाई का प्रतिबिम्‍ब उभरा हेागा। मात्र अपने परिवार तक की सीमित भलाई चाहने वाला देश की उन्‍नति और विकास में भाग कैसे ले सकता है; क्‍योंकि उसकी सेवायें प्रत्‍यक्ष रूप से तो राष्‍ट्र की प्रगति को दर्शायेंगे। जबकि परोक्षतः उसमे परिवार की प्रगति होगी।

राष्‍ट्रोन्‍नति के लिए आवश्‍यक है कि मनुष्‍य अपनी स्‍वार्थ परता को त्‍याग कर समस्‍त देश के लिए ‘ हमभाव' की भावना अपने अन्‍दर विकसित करे। तभी वह देश का कल्‍याण कर उसकी उन्‍नति एवं विकास के अवसरों में तन-मन और धन के द्वारा अपनी सेवायें दे सकेगा। मानव सेवा जब तक निःस्‍वार्थ भाव से त्‍याग एवं लगनपूर्ण ढंग से नहीं होगी। उस समय तक मनुष्‍य के द्वारा राष्‍ट्रोन्‍नति के लिए किये गये प्रयास सार्थक नहीं होगे। उनकी सेवाओं से तो सिर्फ सच्‍ची देश सेवा का भ्रम उत्‍पन्‍न हो जायेगा। जो समाज व देश केा असमंजस की स्‍थिति में डाल देगा। जिससे देश में विकास के अनेक अवसर उपलब्‍ध होने के बाद भी मानव सेवायें पूर्ण रूप से प्राप्‍त नहीं हो सकेगीं

मनुष्‍य की सच्‍ची स्‍वार्थ रहित एवं निष्‍ठापूर्ण सेवाओं से कई बार हमारे देश व विदेशों में बड़े-बड़े चमत्‍कार हुए हैं जिनके द्वारा देशों के विकास के भौतिक तथा सांस्‍कृतिक पक्षों को बल मिला है। जिससे मानव सभ्‍यता और अधिक विकास के स्‍तर को प्राप्‍त हुई है। साथ ही नवीन वैज्ञानिक ,सामाजिक, आर्थिक एवं नैतिक प्रणालियों का जन्‍म हुआ है। हमारे देश मे राष्‍ट्र पिता महात्‍मा गांधी मानव सेवा को ही प्राथमिकता देते थे उन्‍होंने

मानव सेवा को ही देश की उन्‍नति का प्रदीप बताया जिन्‍हें अपनी र्निःस्‍वार्थ सेवा के बदले पुरस्‍कार स्‍वरूप गोलियां मिलीं। किन्‍तु उन्‍होंने सेवा का मार्ग नहीं छोंड़ा। बल्‍कि प्राण देना ही श्रेयस्‍कर समझा । इसी प्रकार महर्षि दयानन्‍द को कांच पीस कर खिला दिया तथा सुकरात को अपनी अमूल्‍य सेवाओं के बदले विष पीना पड़ा। आज भी ऐसे श्रृद्धालुओं का नाम उनके महान कार्यों के कारण बड़े सम्‍मान से लिया जाता है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि मानव सेवा से ही राष्‍ट्रोन्‍नति सम्‍भव है। लेकिन जब मानव सेवा सच्‍ची स्‍वार्थ रहित,निष्‍ठा, विश्‍वास एवं लगनपूर्ण ढंग से हो।

एक बरसाती शाम

तरु-पत्रों से गिरते

बूँद, बूँद, बूँद

कल के सूखे गड्ढे

आज  के   समुद्र.

ऊंचे-ऊंचे टीले पर

हरी-हरी दूब

शनैः शनैः सूरज

रहा है डूब.

जैसे सौन्दर्य की चादर

तान दी हो किसी ने

या कि अल्हड़ के होठों को

छुआ हो प्रेमी ने.

--
v k verma
vijayvermavijay560@gmail.com

कहानी                                                                                      ...अंधकार से आती आवाज!

-डॉ. अरुणा कपूर.

आवाज तो कभी हम किसी को देते है...बुलाते है, कहते है, सुनते है!... और कोई हमें भी आवाज दे कर बुलाता है... बतियाता है, अच्छी या बुरी खबर सुनाता है, अपने कहे के अनुसार चलने को मजबूर भी कर देता है!... लेकिन इस आवाज देने वाले का अपना रंग--रुप होता है...नाम होता है!...एक रिश्ता होता है!... कोई अजनबी भी होता है तो वह रिश्ते से हम जैसा ही एक होता है...इस धरती पर अवतरित एक जीव होता है!... !...अगर वह मनुष्य भी  है तो क्या हुआ?... एक जीव तो होता ही है जो जीवंत होने के सभी लक्षणों से युक्त होता है!

...और फिर तो क्या निर्जीव चिज-वस्तुओं की आवाज नहीं होती?... क्यों नहीं होती?...अवश्य होती है!... चीजें गिरने की आवाज होती है....चीजों के ट्कराने की आवाज होती है!... हवा के झोंके से सरसराहट करने वाले पत्तों की आवाज होती है...बिजली कड्कने की आवाज होती है... बरसने वाली वर्षा की आवाज होती है!...नदियां, समंदर, झरने....सभी आवाजें ही तो देते है..गिनवाने जाएं तो बहुत लंबी सूची बनेगी!

…...लेकिन...लेकिन हम जान ही जाते है कि आवाज किस चीज की है और कहां से आ रही है!... आवाज उत्पन्न करने वाली चीज-वस्तुएं नजर भी आ जाती है!

..आवाज को ले कर ही, ललिता के साथ जो कुछ घटा वह मै इस कहानी में बयां करने जा रही हूं!..सबसे पहले तो मै लोलिता का परिचय दूंगी!... इसकी 32 साल की उम्र है!...शादीशुदा है!..सरकारी स्कूल में अध्यापिका है!...पति इंजीनियर है और मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत है!...लोलिता की दो बेटियां है..बडी 6 साल की और छोटी 4 साल की है...अब लोलिता फिर पेट से है, तीन महीने की गर्भवती है!...लोलिता का परिवार, सुखी परिवार है!

... एक दिन सुबह जब लोलिता स्कूल जाने की तैयारी में थी; तब लोलिता के छोटे भाई जय का फोन आया...खबर दुःख भरी थी..लोलिता के पिताजी को हार्ट-अटैक आया था और उन्हें अस्पताल ले जाया गया था! ..सुनकर जाहिर है कि लोलिता का दिल बैठ गया... माता-पिता की जगह दुनिया में कौन ले सकता है?..लोलिता ऐसे में कैसे रुक सकती थी?......उसी शहर में उसका मायका था!...उसने स्कूल में संदेशा भिजवाया कि उसकी तीन दिन की छुट्टी ग्रांट की जाए...वह नहीं आ सकेगी!...लोलिता की दोनों बेटियां स्कूल जा चुकी थी... तय हुआ कि लोलिता अकेली ही ऑटॉ ले कर अपने पिता के घर पहुंच जाएगी और उसके पति मनोज, अपनी कार लेकर, दोनों बेटियों को स्कूल से साथ ले कर बादमें लोलिता के मायके पहुंच जाएंगे!..वह भी उस दिन एक दिन की छुट्टी ले रहे थे!...

…  ...लोलिता के पास अस्पताल का पता था... उसकी मां और छोटा भाई दिनेश अस्पताल में ही उसके पिताजी के पास थे..सो लोलिता अस्पताल पहुंच गई!...वहां पता चला कि पिताजी को समय रहते ही अस्पताल लाया गया था...इस वजह से सही समय पर डॉक्टरी सहायता मिल गई और अब वे खतरे से बाहर है!.. अस्पताल में उन्हें दो दिन ऑब्झर्वेशन के लिए रखने की आवश्यकता डॉक्टर को महसूस हुई थी!... फिलहाल उन्हें आई.सी.यू. में रखा गया था!... बाहर से ही पारदर्शी शीशे की खिड़की से लोलिता ने पिताजी को नजर भर कर देख लिया... उस समय वह आंखें बंद किए बेड पर लेटे हुए थे!

..लोलिता को थोड़ी तसल्ली मिल गई!...इतने में उसके पति मनोज भी अपनी दोनों बेटियों के साथ ले अस्पताल पहुंच गए!.. उन्होंने भी डॉक्टर से मिल कर अपने ससुरजी के बारे में सारी जानकारी ले ली और राहत महसूस की..अब खतरा टल चूका था!..बस दो दिन की बात थी; पिताजी को अस्पताल से घर ले जाने की इजाजत मिल जानी थी!

आज दूसरा दिन था!... पिताजी स्वस्थ लग रहे थे!..वे घर जाने की जिद कर र्हे थे, लेकिन उनका इलाज करने वाले डॉ. तिवारी उन्हें एक दिन और अस्पताल में रखना चाहते थे!.. एक ही दिन की तो बात थी!... सभी ने उन्हें समझाया कि ' बस!.. कल सुबह 10 बजे जैसे कि डॉ. तिवारी अस्पताल पहुंचेंगे... आपका एक बार परीक्षण करेंगे और आपको घर जाने की इजाजत मिल जाएगी!'

...उस रात लोलिता को रात देर तक नींद नहीं आई!...कल सुबह पिताजी घर आने वाले थे...उसके बाद शनिवार और रविवार...दो दिन के लिए वैसे भी स्कूल की छुट्टी ही थी!... पति मनोज और दोनों बेटियां ..पूरा परिवार यही पर था!... पिताजी का स्वास्थ्य ठीक-ठाक था...चिंता करने जैसा कुछ भी नहीं था!.... लेकिन लोलिता की आंखों से मानों नींद कोसों दूर थी!...लोलिता ने अपने मोबाइल फोन में झांका... रात के करीब 2 बजने वाले थे!... उसी समय उसने अपने कान के पास हवा का हलका-सा झोंका महसूस किया...लेकिन उसने खास ध्यान नहीं दिया!.. वह अपनी ही सोच में डूबी हुई थी!

... अब कान के पास हवा में कुछ ठंड भी महसूस हुई.. लोलिता चौक गई!.. उसके पास ड्बल बेड पर इस समय उसकी बडी बिटिया 'विदुषी' सोई हुई थी!...साथ वाले कमरे में मनोज और छोटी बिटिया ' वैशाली' थे!.. गरमियों के दिन थे; सिलिंग फैन जरुर चल रहा था... लेकिन कान के पास ठंडी हवा क्यों कर महसूस हुई!... लोलिता समझ नहीं पाई और उसने पासा पलटा!

...कि उसके कान के बिलकुल पास कोई फुस्फुसाया...' लोलिता!..तेरे पिताजी बस!.. कल शाम तक के मेहमान है!...अगर वे कल घर नहीं आएंगे तो ही अच्छा है...कुछ साल की जिंदगी और जी सकतें है!'

" क्या?......." लोलिता लगभग चिल्लाई!..और अब एकदम से उठकर बैठ गई!...वह घबराई हुई थी!...अब उसने बेड के पास का स्वीच ओन किया...बल्ब जल उठा!...कमरे में रोशनी थी! लोलिता ने आस-पास नजर दौडाई...वहां तो कोई भी नहीं था!...तो फिर कौन बोल रहा था?...लोलिता मारे घबराहट के पसीने से तर-बतर थी!...उसके बाद उसने लाईट जलती ही छोड दी...सुबह सुबह कोई पांच बजे के करीब उसकी आंख लगी!

...आज सुबह से घर में सभी खुश थे...लेकिन लोलिता कुछ तनाव और कुछ डर की मिलीजुली शकल में नजर आ रही थी!... लोलिता का यह रुप उसके पति मनोज से छिपा न रह सका!... मनोज ने पूछ ही लिया...

"... लो लो, आज तो पिताजी घर आ रहे है... फिर भी लगता है कि तुम्हें परेशानी है?... क्या बात है?"

" बस!...ऐसे ही...कुछ ठीक नहीं लग रहा!...चिंता पिताजी की ही हो रही है!"..लोलिता ने परेशानी बता दी!

" लगता है कुछ छुपा रही हो...क्या तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है?...या रात को विदुषी ने परेशान किया?" मनोज को लोलिता के पहले वाले जवाब से संतुष्टि हुई नहीं थी!

... अब लोलिता को भी लगा कि रात को उसके साथ जो कुछ घटित हुआ...उसे छिपाना ठीक नहीं!... उसने मनोज को सबकुछ बता दिया!... सुनकर मनोज को ज्यादा हैरानी नहीं हुई! उसने लोलिता को एक अच्छे पति की तरह समझाया कि यह उसका वहम है... 'कई बार मनुष्य अपने ही विचारों में इतना उलझ जाता है कि उसे आंखों के सामने विचित्र चीज-वस्तुएं भी दिखाई देती है और आवाजें भी सुनाई देती है!...' मनोज के समझाने पर लोलिता को कुछ तसल्ली मिली!...उसे भी लगा कि यह उसका वहम ही है कि उसके कान में कोई कुछ कह गया था!

... अब पिताजी को घर लाने के लिए लोलिता, भाई जय और मनोज अस्पताल गए!... लोलिता की भाभी सुजाता और मां घर पर ही थे!...पिताजी अव स्वस्थ थे!.. घर जाने के लिए तैयार बैठे थे!...अब 11 बजने वाले थे!... समय के पाबंद, ठीक 10 बजे अस्पताल पहुंचने वाले डॉ. तिवारी अब तक पहुंचे नहीं थे!...अस्पताल में बैठे लोलिता वगैरा सभी डॉ. तिवारी का इंतजार कर रहे थे!...उनके आते ही एक बार के परीक्षण के बाद पिताजी घर जा सकते थे!

... लेकिन डॉ.तिवारी नहीं आए... खबर आई कि नजदीक के पूल पर उनकी कार का एक्सिडैंट हुआ है... ड्राईवर दम तोड़ चुका है और डॉ.तिवारी को पुलिस द्वारा वही नजदीक के अस्पताल में ले जाया गया है!... सुन कर सभी सकते में आ गए... सबसे ज्यादा तो लोलिता सक्ते में आ गई.. अस्पताल मे उस समय ड्यूटी पर मौजूद अन्य डॉक्टर, राठी ने लोलिता के पिताजी का परीक्षण किया और उन्हे घर ले जाने की इजाजत दी! ...लेकिन लोलिता एकदम से कह उठी.." नहीं डॉक्टर...पिताजी को कुछ दिन यही रहने दीजिए!...उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है!...डॉक्टर मुझे लगता है कि उनका घर जाना ठीक नहीं रहेगा... आई रिक्वेस्ट यू डॉक्टर!"

...सुन कर सभी अचंभे में पड़ गए कि लोलिता ऐसा क्यों कह रही है!...लोलिता के पिताजी भी हैरानी से उसकी तरफ देखने लगे!...मनोज को जरुर लगा कि लोलिता ने जो सुबह कानों में किसी की आवाज सुनने की बात कही थी... उस बात को ले कर वह अब तक परेशान है और इसी वजह से कह रही है कि 'पिताजी को आज घर नहीं ले जाना चाहिए!' ...पति मनोज लोलिता को एक तरफ ले गए और थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए बोले...

" लोलिता!... तुम अब भी आवाज वाली बात पर विश्वास कर रही हो? कौन-सी सदी में जी रही हो?...माना कि औरतें अंध-विश्वासी होती है...लेकिन तुम तो हद पार कर रही हो!"

" ..प्लीज मानिए मेरी बात!...आज के दिन अगर पिताजी यही रहते है तो किसी का क्या जाएगा?... मेरा वहम ही सही... पिताजी को आज का दिन यही रहने के लिए समझाइए!"...लोलिता अब आंखों में आंसू लिए कह रही थी!...अब उसका भाई जय भी आ कर खडा हो गया था और सुन रहा था...वह बोला...

" ...ठीक है दीदी...अगर आपके मन में कोई वहम है तो मै पिताजी को समझाने की कोशिश करता हूं..लेकिन वह शायद ही मानेंगे!.. कल से घर जाने की रट लगाए हुए है!"

...और वैसा ही हुआ..पिताजी नहीं माने!...डॉ. राठी को भी लगा कि वे स्वस्थ है और चाहे तो घर जा सकतें है!... और पिताजी घर आ गए!

... घर में लोलिता की मां और भाभी दोनों ही बहुत खुश थी...उन्होंने मंदिर जा कर प्रसाद भी चढाया!...अब चिंता करने जैसा कुछ भी नहीं था!...कुछ नजदीकी रिश्तेदार घर पर पिताजी का हाल-चाल पूछ्ने भी आ गए थे!...हां!..किसी ने अब तक डॉ. तिवारी के एक्सीडैंट की खबर पिताजी को दी नहीं थी!..पिताजी ने दो-एक बार कहा भी कि .... 'मेरा इलाज करने वाले डॉ.तिवारी अस्पताल से निकलते समय मिल जाते तो अच्छा रहता!...बहुत अच्छे हार्ट-स्पेशियालिस्ट है!...स्वभाव से कितने खुश-मिजाज है!.....उनसे मिलने को बहुत दिल कर रहा है...मेरी फोन पर ही उनसे बात करवा दो!' ... लेकिन जय ने ' बाद में बात करवाता हूं!' कह कर बात टाल दी थी!

.... उस रात पिताजी रात को अच्छी नींद सोए!...सुबह उठ कर मॉर्निंग-वाक पर भी गए!...वापस आकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ कर चाय पी रहे थे... हाथ में अखबार था!...अखबार का दुसरा पन्ना देख रहे थे कि बोल उठे..." अरे भगवान!...यह क्या हो गया...डॉ. तिवारी चल बसे?" साथ वाली कुर्सी पर बेटा जय बैठा हुआ था!... सामने वाली कुर्सी पर दामाद मनोज बैठे हुए थे!... घर की महिलाएं रसोई में थी!

...जय और मनोज ने फूर्ति दिखाई और पिताजी को संभाला...लेकिन उनकी गर्दन कुर्सी के पीछे लुढ़क चुकी थी!... उन्होंने अखबार में छ्पी डॉक्टर तिवारी के एक्सीडैंट की खबर पढ ली थी...एक्सीडैंट के बाद डॉक्टर तिवारी को नजदीक के अस्पताल में ले जाया गया था..लेकिन सिर पर गहरी चोट लगी हुई थी और ज्यादा खून बह गया था; इस वजह से उन्हें बचाया नहीं जा सका!...पिताजी के दिल को इस खबर ने हिला कर रख दिया!

...तुरन्त अस्पताल में फोन किया गया...डॉ. राठी तुरन्त पहुंच गए...उनका परीक्षण हुआ...लेकिन लोलिता के पिताजी दुनिया छोड़ कर जा चुके थे!... अब घर में मातम छाया हुआ था!...लोलिता रोते रोते बार बार कह रही थी कि..." आप लोगों ने मेरी बात मानी होती..पिताजी को और एक दिन अस्पताल में रहने देते.. तो...पिताजी आज जीवित होते...हमारे बिच होते!"...मनोज लोलिता को समझाने में लगे हुए थे कि...मनुष्य का जन्म और म्रृत्यु का चक्र ईश्वर ही की मरजी से चलता है...इसमें कोई फरक नहीं कर सकता!...लेकिन लोलिता अपनी बात पर अड़ी हुई थी कि उसको संकेत पहले ही मिल चुका था!..उसके कान में किसी ने बताया था कि पिताजी को बचाया जा सकता है!

...कुछ दिन ऐसे ही गुजर गए!...और परीक्षण में पता चला कि लोलिता के गर्भ में जुड़वां बच्चे है!... यह खबर अचरज करने वाली तो थी नहीं - जुड़वां बच्चे तो पैदा होते ही रहते है!

....लेकिन एक दिन लोलिता को ऐसे ही रात को फिर आवाज सुनाई दी...जैसे कि किसी ने कान में कहा.." लोलिता, तेरे गर्भ में दो लड्के है...एक तो तेरे पिता स्वयं पुनर्जन्म ले कर अवतरित हो रहे है!"

..." मै कैसे विश्वास कर लूं कि वे मेरे पिता ही है?" लोलिता आधी-कच्ची नींद में थी - वह भी बोल पडी!

..." तेरे पिता की बाह पर लाल रंग के लाखे का निशान था...बेटे की बाह पर भी होगा!" ..स्वर धीमा हो गया और उसके बाद कुछ नहीं.

..." लोली!..लोली!.. क्या सपना आया था?...नींद में क्या बोल रही थी?" ..साथ ही बेड पर लेटे हुए पति मनोज ने पूछा.

..." पता नहीं क्या बोली मै!..मुझे कुछ याद नहीं है!" लोलिता ने बात छिपाई!

.... समय के चलते लोलिता ने दो जुडवा लड्कों को जन्म दिया!...सही में एक बच्चे की बाह पर लाल रंग के लाखे का निशान था; ठीक उसी जगह जहां लोलिता के पिताजी की बाह पर था!...लोलिता अब आवाज में बसी हुई सच्चाई जान चुकी थी!

... लेकिन दो महीने बाद उसके दोनों बेटे जॉन्डिस की चपेट में आ गए!... उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया!...उन दोनों की हालत देखते हुए डॉक्टर्स ने जवाब दे दिया!

...." हम अपनी पूरी कोशिश करेंगे... बाकी उपरवाले की मर्जी!" ...डॉक्टर ने कहा!

... और उसी रात फिर अस्पताल के अहाते में बेंच पर बैठी लोलिता को आवाज सुनाई दी.....

..." तेरे पिता को बचा ले.... उन्हें उनके असली नाम से पुकार कर रुक जाने के लिए कहेगी तो वे रुक जाएंगे...अभी इसी समय चली जा!"

...लोलिता भागती हुई I.C.U. की तरफ गई... मनोज साथ ही थे..वे भी उसके पीछे भागे... लेकिन लोलिता को I.C.U.में जाने से रोका गया! ....मनोज कुछ बोलते उससे पहले ही लोलिता बाहर खडी जोर से चिल्लाने जैसी आवाज में बोली....

..." पुरुषोत्तम!... रुक जाओ!....मेरी खातिर रुक जाओ पुरुषोत्तम!...तुम्हारी मै बेटी भी हूं; मां भी हूँ!!... मुझे छोड कर मत जाओ!" ...बोलते बोलते लोलिता रो पडी.

...उसी समय आइ.सी.यू का दरवाजा थोड़ा सा खुल गया और नर्स ने बताया कि एक बच्चा अभी सांसें ले रहा है और एक भगवान को प्यारा हो गया है!

..."जो है वे मेरे पिता पुरुषोत्तम है नर्स!...वे अब कहीं नहीं जाएंगे!" लोलिता ने नर्स से कह दिया...अब दरवाजा फिर बंद हो गया!...

.... सही में एक बच्चे की जान बच गई थी!...बच्चा अब ठीक हो कर घर आ गया था!... लोलिता ने अब अपने पति मनोज को सब कुछ बताया. मनोज को भी अब विश्वास हो गया है कि कुदरत के पिटारे में कई शक्तियां भरी हुई है!

...एक दिन मनोज ने लोलिता से यूं ही पूछा...

लोली..हमारा दूसरा बच्चा क्यों हमें छोड़ कर गया?

बस!..वो चला गया...अपने घर ही तो गया है! लोलिता का ठंडा जवाब!

कौन था वह?...उसका कौन सा घर था?...मनोज के मन में जिज्ञासा पैदा हुई!

वे डॉ.तिवारी थे मनोज!...अपने घर वापस चले गए है!...तुम पता कर लो, वे वहीं मिलेंगे!... कहते हुए लोलिता ने अपने सोए हुए बच्चे के गाल पर होठ रख लिए!...मनोज ने दूसरे दिन ही डॉ.तिवारी के घर का रुख किया..उसे पता चला की जिस रात उसके दूसरे बच्चे की मृत्यु हुई थी... उसी रात, उसी समय डॉ.तिवारी की बहू ने बेटे को जन्म दिया था!

...वाकई कुदरत एक ऐसा अंधकार है, जिसमें बहुत कुछ छिपा हुआ है!....उस अंधकार को भेदने की शक्ति हमारे पास नहीं है!

...............समाप्त....................

(1)

नानक की नेकियों को भुनाते रहे हैं हम ।

गौतम का पुण्‍य बेचकर खाते रहे हैं हम ॥

 

जारी है अब तलक भी अँधेरों की अर्चना ।

सदियों से ज्‍योति पर्व मनाते रहे है हम ॥

 

दहशत के दरमियान गुजारी है जिन्‍दगी ।

डरते रहे है और डराते रहे है हम ॥

 

‘बोफोर्स' का सौदा हो या कोठों की दलाली।

सच मानिये हराम की खाते रहे हैं हम ॥

 

अब तुम इसे जुनून कहो या कि बेबसीं ।

ज्‍वालामुखी पे जश्न मनाते रहे हैं हम ॥

 

रिश्वत को इक रिवाज-सा हमने बना दिया।

खाते रहे हैं और खिलाते रहे हैं हम ॥

 

‘राजेश' किस जुबां से कहूँ ये सफेद झूठ।

कि इंसानियत के दीप जलाते रहे हैं हम ॥

----.

(2)

ग़ज़ल बुढ़ापा करेगा असर धीरे-धीरे।

झुकेगी तुम्‍हारी कमर धीरे-धीरे ॥

 

उमर भर सुने थे रवानी के किस्‍से।

हुई जिन्‍दगानी बसर धीरे-धीरे ॥

 

मिलेगा तुम्‍हें भी किसी रोज चश्मा ।

कि कमजोर होगी नज़र धीरे-धीरे ॥

 

अभी इब्‍तिदा में तो समझे हो जन्‍नत ।

बढे़गा मग़र दर्दे-सर धीरे-धीरे ॥

 

अभी तक तो राशन में मिलती नहीं है।

सिमेंटेड होगी क़बर धीरे-धीरे ॥

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राजेश ‘विद्रोही'

लाडनू नागौर राज

341306

राग, रोग और रोगी - अन्‍तः सम्‍बन्‍धों की विवेचना

डॉ․ ज्‍योति सिनहा

प्रवक्‍ता (संगीत)

भारतीय महिला पी․जी․ कालेज

जौनपुर

एवं

रिसर्च एसोसियेट

भारतीय उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थान

राष्‍ट्रपति निवास, शिमला-171005

भारतीय संस्‍कृति अपनी जीवन्‍त परम्‍पराओं, शास्‍वत मूल्‍यों तथा अपरिवर्तनीय विशिष्‍टता के कारण सर्वत्र सराहनीय है, वन्‍दनीय है, अनुकरणीय है। इसी भारतीय सभ्‍यता व संस्‍कृति की संवाहक है -- समस्‍त कलायें। भारतीय संस्‍कृति में कला को ‘मनसत्‍व' कहा गया है और वह ‘आत्‍मवत्‌-सर्वभूतेषु' के चिन्‍तन से उत्‍प्रेरित है। भारतीय चिन्‍तन के अनुसार चौंसठ कलायें मानी गयी हैं। जिनमें ललित कलायें अन्‍य कलाओं से कुछ विशिष्‍टता रखती है। जीवन में सौंदर्य-बोध विकसित करने के लिये तथा जीवन को सम्‍पूर्णता, समग्रता के साथ जीने के लिये कलायें मन को सदैव प्रेरित करती रही हैं। जिनमें सर्वाधिक उत्‍कृष्‍ट, प्रभावी एवं मुखर कला है-- संगीत। मानवीय भावनाओं एवं संवेदनाओं को स्‍वरों द्वारा अभिव्‍यक्त करने की अविरल धारा ही संगीत है। यह ईश्‍वर द्वारा प्रदत्त्‍ा सृष्‍टि की मधुरतम्‌ अभिव्‍यक्‍ति है। संगीत वह परम्‌ दिव्‍य नाद है जिसमें सृष्‍टि के समस्‍त स्‍वर समाहित हैं' समस्‍त ब्रह्मांड संगीत मय है। यह स्‍वरों का अनुपम एवं मनोहारी सामंजस्‍य है जो मानव के हृदय तंत्र को स्‍पन्‍दित करती हैं यह नाद ब्रह्म में एकाकार हो जाने की दिव्‍य एवं पवित्र साधना है। भारतीय मान्‍यता के अनुसार संगीत साक्षात्‌ ईश्‍वर का स्‍वरुप है और इसीलिये इससे प्राप्‍त आनन्‍द को ‘ब्रह्‌मानन्‍द-सहोदर' कहा गया है। माधुर्य की वर्षा से सभी को रससिक्त करने वाली महादेव निर्मित कला है, अनुभूतियों का चरमोत्‍कर्ष है, जो सत्‌ चित्‌ आनन्‍द तथा लौकिक विभेद से परे मोक्ष प्राप्‍ति का सरल व सुलभ साधन हैं सत्‍यं शिवं सुन्‍दरं के भावों से भरी भारतीय संगीत की पृष्‍ठभूमि आध्‍यात्‍मिक विकास, धार्मिक ऐश्‍वर्य एवं जीवन के स्‍वाभाविक विकास पर आधारित है।

ललित कलाओं में संगीत कला का स्‍थान सर्वोच्‍च है, क्‍योंकि इसके उपकरण ही अत्यंत अमूर्त और चल है। जहां काव्‍य के उपकरण भाषा और भाव, चित्रकला के उपकरण रेखा और रंग, वहां संगीत के मुख्‍य उपकरण मात्र स्‍वर और लय है। इस विशिष्‍ट विशिष्‍ट्‌ता के कारण ही ललित कलाओं में संगीत अपना एक अहम्‌, अनूठा एवं सम्‍मानजनक स्‍थान बनाये हुये है।

भारतीय संगीत की विशिष्‍टता का वर्णन वेद, स्‍मृति, पुराण, उपनिषद तथा अन्‍य शिक्षा ग्रन्‍थों में भी मिलता है। ऋग्‍वेद में कहा गया है कि -- ‘‘तुम यदि संगीत के साथ ईश्‍वर को पुकारोगे तो वह तुम्‍हारी हृदय गुहा में प्रगट होकर अपना प्‍यार प्रदान करेगा।''1

भगवान श्रीकृष्‍ण ने भी कहा है-- नाहं वसामि बैकुण्‍ठे योगिनां हृदये न वा।

मदभक्ताः यत्र गायन्‍ति तत्र तिष्‍ठामि नारदः॥2

सृष्‍टि का बीजमंत्र ‘ओम्‌' अथवा ‘ऊंकार' अथवा ‘प्रणव नाद' ब्रह्‌म का सर्वोच्‍च उद्‌गान माना गया है। समस्‍त स्‍वर इस ओम्‌ से ही निष्‍पन्‍न होते हैं और इसी में विलीन हो जाते हैं आचार्य मतंग ने नाद की व्‍याख्‍या अपने ग्रंथ ‘वृहद्‌देशी' के ‘देशी-उत्‍पत्ति-प्रकरण' में करते हुये बताया है कि नाद के बिना कोई संगीत या संगीत सृजन नहीं।

यथा--

न नादेन बिना गीतं, न नादेन बिना ास्‍वराः।

न नादेन बिना नृतं, तस्‍मान्‍नादात्‍मकं जगत्‌॥3

संगीत कला विभिन्‍न नादों का संयोग मात्र है। ‘नादाधीनम्‌ जगत्‌ सर्वम्‌' से ही इसकी व्‍याख्‍या पूर्ण हो जाती है।

भारतीय संगीत में संभवतः अनेकानेक तालों की कल्‍पना, लय के विभिन्‍न प्रकार, स्‍वर- संवाद, श्रुति-स्‍वर-मूर्च्‍छना, असंख्‍या राग-रागीनियां मेल-थाट, राग पद्धति, ताल पद्धति, संगीत की विविध प्रणालियां, गीत शैलियां, गायन शैलियां विभिन्‍न वाद्यों की वादन-विधि, विशिष्‍ट संगति, कल्‍पना की स्‍वतंत्रता, स्‍वर व लय की स्‍वतंत्र सत्ता, अनन्‍तता, रस निष्‍पत्ति इत्‍यादि ऐसे गुण हैं जो अन्‍य देशों के संगीत में नहीं मिलते। ऐसी निःसीम सम्‍भावनाओं से भरी जिसमें अनन्‍त भाव सृष्‍टि निर्माण करने की अदम्य क्षमता है, जिसकी व्‍यापकता व गहराई का अनुमान लगाना कल्‍पना से परे है। इन्‍हीं विशिष्‍टताओं से भारतीय संगीत विश्‍व संगीत के क्षितिज पर दैदीत्‍यमान है।

भारतीय संगीत की प्रमुख विशिष्‍ट्‌ता ‘रागदारी संगीत' है। स्‍वर तथा ताल किसी न किसी रूप में लगभग सभी संगीत प्रणालियों में विद्यमान है परन्‍तु राग की अवधारणा भारतीय संगीत की अपनी विशिष्‍ट विशिष्‍ट्‌ता हैं राग का मूल अर्थ ‘रंगना' है। रंगने अथवा रंग देने की यह मूल भावना राग में महत्त्‍वपूर्ण है। जन चित्त्‍ा का रंजन या लोकरंजन के उपयोग से ही राग का अस्‍तित्‍व कायम हैं। राग भारतीय संगीत की आधारशिला है। स्‍वरों की एक विशेष अवस्‍था ‘रांग' कहलाती है। एक निश्‍चित स्‍वरावली को लेकर स्‍वरों का ऐसा क्रमिक विकास किया जाता है, जिसमें सभी स्‍वर स्‍थायी ‘सा' से अपना रिश्‍ता जोड़ लेते हैं। प्रत्‍येक राग का अपना एक स्‍वरूप एवं स्‍वतंत्र व्‍यक्‍तित्‍व होता है जो उसमें लगने वाले स्‍वर, उनके परस्‍पर सम्‍बन्‍ध, स्‍वर स्‍थान, विश्रांति स्‍थान, अल्‍पत्‍व-बहुत्‍व, कण-भीड़ आदि पर निर्भर करता है। प्रत्‍येक राग में वही सात शुद्ध व पांच विकृत स्‍वर प्रयोग होते हैं परन्‍तु अपनी व्‍यक्‍तिगत विशेषताओं के कारण प्रत्‍येक राग की प्रकृति सर्वथा एक दूसरे से भिन्‍न हो जाती हैं प्रत्‍येक राग कोई न कोई प्रतिक्रिया अथवा सन्‍देश (Msasage) अवश्‍य देती है। राग के विभिन्‍न तत्त्‍वों वादी-संवादी, पकड़, अंग वर्ण तथा विभिन्‍न घटकों आलाप, तान, लय तथा बंदिशों के साथ जब कलाकार अपनी भावनाओं को साकार करने की कोशिश करता है तो वह स्‍वयं तथा श्रोता दोनों ही रसमगन हो जाते हैं। यही भारतीय राग की विशेषता है जो अपने में अनूठी है, बेजोड़ है। यह सिर्फ स्‍वरों का समूह नहीं, बल्‍कि रस-भाव-सौन्‍दर्य का वाहक है। यह स्‍वरों का गायन-वादन मात्र नहीं ‘रागमय' बोध अभिप्रेत हैं राग में रंजकता का लक्षण श्रोता के मन में असीम आनन्‍द की सृष्‍टि करता है और कुछ समय के लिये ही क्‍यों न हो, श्रोता-प्रयोक्ता संसार की तमाम पीड़ाओं चिंताओं से मुक्ति पाकर नाद ब्रह्‌म में मगन हो जाता हैं श्री शरत्‌चन्‍द्र परांजपे लिखते है-

‘‘नाद ब्रह्‌म का यही साक्षात्‍कार राग संगीत' की वास्‍तविक अनुभूति हैं। यही है-

रंग देने की क्रिया॥4

राग की यही रंग देने की विशिष्‍टता ने वैज्ञानिकों, संगीत चिकित्‍सकों को अपनी शक्‍ति की ओर आकृष्‍ट किया। संगीत में जो आनन्‍द प्रदान करने की चमत्‍कारिक शक्‍ति है वह मानव को सांसारिक बंधनों से मुक्‍त करके आत्‍मिक सुख प्रदान करती है। इसी आत्‍मिक सुख में ‘रोग-निवारण' की शक्‍ति निहित है। संगीत की प्रभावी शक्‍ति को देखने-परखने के बाद भारतीय मनीषियों एवं आचार्यों ने संगीत के चिकित्‍सकीय प्रभाव पर सर्वाधिक जोर दिया है। भारतीय संगीत का इतिहास ऐसे कथाओं से भरा है जो इस बात की द्योतक है कि संगीत में रोग निवारक क्षमता है। अतीत से ही संगीत का उपयोग मानव की भौतिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक दुर्बलताओं से मुक्‍त होने के लिये किया जाता रहा है। यद्यपि संगीत एक कला है, परन्‍तु ऋषियों-महर्षियों की यह धारणा है कि संगीत द्वारा मानव के मस्‍तिष्‍क को शान्‍ति मिलती है और वह शान्‍तिपूर्ण जीवन यात्रा समाप्‍त कर मोक्ष को प्राप्‍त होता है। सामवेद की रचना स्‍वर तथा गेय शक्‍ति का सर्वोत्तम उदाहरण है। वैदिक युग से ही संगीत का प्रयोग चिकित्‍सा के रूप में किया जाने लगा था। श्री उमेश जोशी ने अपनी पुस्‍तक ‘भारतीय संगीत के इतिहास में लिखा है कि-- ‘‘जब कोई बीमार पड़ता था तो ये लोग उसे दवा नहीं देते थे बल्‍कि संगीत द्वारा ही उसका उपचार करते थे और इस सांगीतिक उपचार से अनेक व्‍यक्‍ति स्‍वस्‍थ व सुन्‍दर बन जाते थे। उन्‍हें संगीत के वैज्ञानिक रूप का पता था तभी तो उन्‍होंने संगीत का प्रयोग चिकित्‍सा रूप में किया।''5

ऋग्‍वेद व अथर्वेद में नीहित मंत्रों का प्रयोग मनुष्‍य की शारीरिक व्‍याधियों के उपचार के लिये किया जाता था। गायत्री महामंत्र के 24 मुख्‍य चमत्‍कारिक प्रभावों के अर्न्‍तगत 15वें प्रभाव में यह वर्णित है कि गायत्री मंत्र के सस्‍वर जाप से रोगों, व्‍याधियों से मुक्‍ति-निवृति मिलती है।6 सामवेद के बीज मंत्र ओम्‌' में ही रोग निवारक की शक्‍ति निहित है। नाद योग व नाद साधना में ऊँ' की महत्ता निर्विवाद हैं तथापि सामवेद में रोगों के निवारण के लिये राग गायन का विधान मिलता हैं। दीर्धायु की प्राप्‍ति एवं व्‍याधियों से मुक्‍ति के लिये साम गायन का विधान मिलता है। ऐसा उल्‍लेख है कि ‘‘रोग शान्‍ति की कामना करने वाले महारोगी की रोग के शान्‍ति के लिये विश्‍वापृतनाः' इस साम का गायन करें।''7

मैंद ऋषि के शब्‍द कौतुहल नामक ग्रंथ में रोगी का शब्‍द से रोग निदान, बीना, तंत्री, पणव, भेरी, मृदंग, वंशी आदि वाद्य भेषज से ही बनाने और उनको सुनाकर रोगापहरण का विवरण है तथा हर रोग के लिये पृथक-पृथक बाजों के प्रभावों का वर्णन है तथा साथ ही अमुक प्रकार के श्रवन-मनन कीर्तन से रोग निवारण का विवरण है।8

आर्युवेद में भी अश्‍विनी कुमारों ने हर रोग के लिये चार भैषज बताये हैं -- पवनौकस, जलौकष, वनौकष और शाब्‍दिक। क्रौंचमुनी के ग्रंथ ‘कुर्णक-प्रभा' में भी शब्‍द और शरीर के सम्‍बन्‍ध का विवरण हैं।9

इसके अतिरिक्‍त संगीत के विभिन्‍न चिकित्‍सकीय आयामों एवं औषधीय प्रभावों का विस्‍तृत वर्णन संगीत मकरंद, संगीत सारामृत, चरक संहिता सुश्रुत- संहिता, अग्‍नि पुराण इत्‍यादि ग्रंथों में भी मिलता है। संगीत-मकरंद ग्रंथ में नारद द्वारा रागों की जातियों (ऑडव-षॉडव-सम्‍पूर्ण) के आधार पर रोगी के मन व शरीर पर प्रभाव पड़ने का उल्‍लेख किया गया हैं। नारद ने ‘संगीताध्‍याय' के प्रकरण में विभिन्‍न दशाओं में रागों के गायन-वादन का निर्धारण किया है।

यथा-

आयुधर्मयशोवृद्धिः धनधान्‍यफलम्‌ लभेत्‌।

रागामिवृद्धि सन्‍तानंपूर्णभगाः प्रगीयते॥10-

अर्थात्‌ आयु, धर्म, यश, बृद्धि, संतान की अभिवृद्धि, धन-धान्‍य, फल-लाभ इत्‍यादि के लिये पूर्ण रागों का गायन करना चाहिये।

मध्‍यकाल में भी संगीत कि वैज्ञानिक व चमत्‍कारिक प्रभाव के वर्णन मिलते हैं। तानसेन बैजुबावरा, सरीखे संगीतज्ञों के चमत्‍कारिक प्रभावों से सभी परिचित हैं। मुस्‍लिम ग्रंथ शरमा-इ-इशरत' के अनुसार-- ‘‘यदि रागों को उचित रीति से गाया जाता है तो वे रोग निदान एवं औषधि का काम करते हैं तथा रोगों पर तत्‍कालिक प्रभाव डालते हैं।''10

20वीं सदी में पं0 ओम्‌कार नाथ ठाकुर ने संगीत के चिकित्‍सकीय प्रभाव पर गहरा चिन्‍तन किया तथा उसका सफल प्रयोग भी किया। उन्‍होंने अपने चमत्‍कारिक गायन में राग पूरिया की अवतारणा कर इटली के शासक मुसोलिनी को अनिद्रा रोग से मुक्‍ति दिलाई। भारत में ही नहीं रोम, युनान, मिश्र आदि देशों के इतिहास में भी संगीत चिकित्‍सा का वर्णन मिलता है। इस प्रकार संगीत-चिकित्‍सा प्रणाली का इतिहास विविध रूपों में प्राप्‍त होता है। जिसके अर्न्‍तगत विपाद प्रमाद, अनिद्रा जैसे अनेक दैहिक, दैविक, भौतिक त्रियतायों के उपचार हेतु संगीत चिकित्‍सा का सहारा लिया गया।

आज पुनः वैज्ञानिकों, संगीत चिकित्‍सकों ने इस तथ्‍य पर अनुसंधान करना शुरू किया है कि संगीत अर्थात्‌ भारतीय राग संगीत में चिकित्‍सोपयोगी तत्‍व निहित है जो रोगोपचार में सहायक हैं। राग-चिकित्‍सा के अर्न्‍तगत रोग (रोगी) की उत्‍पत्ति व अर्थ के विषय में जानना न्‍यायसंगत है।

आयुर्वेद जो आयु का वेद कहलाता है, के अनुसार देह धारण की तीन धातुयें बताई गयी है-- वात्‌, पित्‌ और कफ़। हमारे शरीर को निरोग रखने में इनकी अहम भूमिका है। इनमें से किसी एक धातु में भी विकार आने से तत्‌सम्‍बन्‍धी रोग शरीर में होने लगते हैं जब इन तीनों में सन्‍तुलन बना रहता है तो हम स्‍वस्‍थ रहते हैं और असन्‍तुलन होने पर अनेक रोगों का जन्‍म होता है अर्थात्‌ इनके कुपित होने के फल को रोग कहते हैं। आचार्य भरत ने रोग अथवा व्‍याधि के बारे में नाट्‌यशास्‍त्र में लिखा है--

व्‍यार्धिनाम्‌ वात्‌पित्त्‍ाकफसनिपात प्रभवः।''

अर्थात्‌ वात्‌ पित्त्‍ा्‌ कफ़ में से किसी एक की विकृति के कारण व्‍याधि उत्‍पन्‍न होती है।

धर्मग्रंथों के अनुसार मानव शरीर पंच-तत्‍वों से मिलकर बना है- पृथ्‍वी, जल, वायु, अग्‍नि और आकाश। संतुलन से हम आरोग्‍यावस्‍था में रहते हैं परन्‍तु इनमें असंतुलन अर्थात्‌ तन और मन में संचित विकार रोगों के कारण हैं।

योगदर्शन के अनुसार शरीर के विभिन्‍न स्‍थानों पर चेतना शक्‍ति के सात चक्र है। ये सातों चक्र नर्वस सिस्‍टम और मुख्‍य ग्रंथियों से सम्‍बन्‍धित है जो शरीर-मन-बुद्धि से जुड़ी होती हैं। ये चक्र हमारे नाड़ी संस्‍थान और स्‍नायु संस्‍थान का भी संचालन केन्‍द्र हैं। जब इनमें से किसी चक्र में विकृति आती है तो यह शरीर व मन रोगी हो जाता है।

इन समस्‍त अवयवों में संतुसलन बनाये रखने के लिये वैदिक काल से शब्‍द शक्‍ति, मंत्र शक्‍ति व गीत शक्‍ति का भी प्रयोग होता रहा है। अर्थवेद में ऋक्‌, यजुष और साम के ऐसे मंत्र थे जो जीवन से व्‍यवहार से और स्‍वास्‍थ्‍य से सम्‍बन्‍धित थे। मंत्र-मणि व औषधि तीनों द्वारा अथर्वेद में उपचार बताया गया हैं संगीतारिषि तुम्‍बरू को प्रथम संगीत चिकित्‍सक माना जाता हैं उन्‍होंने अपनी पुस्‍तक ‘संगीत-स्‍वरामृत' में उल्‍लेख किया है कि-ऊँची व असमान ध्‍वनि का वात्‌ पर, गम्‍भीर व स्‍थिर ध्‍वनि का पित्त्‍ा पर तथा कोमल व मृदु ध्‍वनियों का कफ.
के गुणों पर प्रभाव पड़ता है।

वर्तमान में वैज्ञानिकों एवं चिकित्‍सकों ने यह प्रमाणित किया है कि अस्‍सी फ़ीसदी बीमारियों का मूल मानसिक कारण हैं जो तनाव चिंता, अवसाद इत्‍यादि के कारण होता है। राग जो भारतीय संगीत की विशिष्‍टता है मानव-मन को समस्‍त चिंताओं-पीड़ाओं से दूर ले जाती है। इसके अर्न्‍तनिहित स्‍वर-लय, रस-भाव अपने विशिष्‍ट प्रभाव से व्‍यक्‍ति के मन-मस्‍तिष्‍क को प्रभावित करता हैं स्‍वर तथा लय की भिन्‍न-2 प्रक्रिया उसकी शारीरिक क्रियाओं, रक्‍त संचार, मांसपेशियों, कंठ-ध्‍वनियों आदि में स्‍फूर्ति, ऊर्जा उत्‍पन्‍न करते हैं तथा व्‍याधियों को दूर करते हैं मानसिक विक्षिप्‍तिका का मुख्‍य कारण मस्‍तिष्‍क के उतकों में होने वाला असंतुलन है। इनका संतुलन बनाये रखने में रागों की भूमिका महत्‍वपूर्ण है। संगीत आनन्‍दानुभूति का विषय तो है ही साथ राग की सुमधुर धवनियां मानसिक स्‍थितियों की सूचक भी होती हैं। संगीत में एक गति है और हमारी नाड़ी-स्‍नायु संस्‍थान की क्रियायें भी गत्‍यात्‍मक हैं। दोनों में गुण-धर्म की समानता-सादृश्‍यता होने के कारण ही मधुर राग-रागिनियां हमारी आत्‍मा को प्रभावित करती हैं। स्‍वस्‍थ्‍य रहने का प्रमुख कारण है मन की प्रसन्‍नता और संगीत का प्रथम प्रभाव जो होता है वह मन की प्रसन्‍नता ही है।

संगीत चिकित्‍सकों की मान्‍यता है कि संगीत का प्रभाव मस्‍तिष्‍क के सेरिब्रल कार्टेक्‍स और आटोनौमिक नर्वस सिस्‍टम पर सीधा पड़ता है जो शरीर की साम्‍यावस्‍था को नियमित एवं नियंत्रित रखता है। राग की स्‍वर लहरियों से हृदय की घड़कनों की गति में कमी आती है जो रिलेक्‍शेसन का प्रमुख कारण हैं। रागों को सुनने से कार्टिसोल हार्मोन का स्‍तर घट जाता है, इससे शरीर तनावमुक्‍त हो जाता है जिसके फलस्‍वरूप शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती हैं साथ ही मधुर रागिनी शरीर को प्राकृतिक दर्द निवारक तत्‍व इर्न्‍डोफिन्‍स बनाने के लिये प्रेरित करती हैं संगीत की ध्‍वनि तंरगे मानव-मस्‍तिष्‍क में स्‍थित हाईपोथैलेमस को आन्‍दोलित करती हैं। जिससे मस्‍तिष्‍क की ग्रंथियां सक्रिय हो जाती हैं और स्‍वास्‍थ्‍यवर्द्धक हार्मोन्‍स का स्राव सुचारु रूप से होता है जिससे रोगी स्‍वतः स्‍वस्‍थ्‍य होने लगता है। वैज्ञानिकों के मत से संगीत मेटाबॉलिज्म को तेज करता है तथा मांसपेशियों की उम्र् बढ़ाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार मानसिक तनाव, पागलपन, मिर्गी हिस्‍टीरिया, याददाश्‍त की कमी, अपंगता, गर्भावस्‍था, रक्‍तचाप, अनिद्रा, हृदय रोग, श्‍वास रोग तथा नशा से उत्‍पन्‍न रोगों मं संगीत की मधुर ध्‍वनि सुनने से तत्‌जनित रोगों से मुक्‍ति मिलती हैं।

सुख-दुःख आशा-निराशा, उल्‍लास-उमंग की अनुभूति संगीत द्वारा प्रभावी रूप से अभिव्‍यक्‍त की जाती हैं मनुष्‍य के अर्न्‍तनिहित भावों का सम्‍बन्‍ध मन से होता है तथा मानव मन और संगीत का अटूट सम्‍बन्‍ध रहा है। शारीरिक व मानसिक थकान होने पर मधुर संगीत सुनने से तनावमुक्‍त, सुकून एवं आनन्‍द की अनुभूति होती है। स्‍वरों के उच्‍चारण मात्र से विभिन्‍न शारीरिक अवयवों का व्‍यायाम हो जाता है। शोध से ज्ञात हुआ है कि संगीत की विभिन्‍न राग-रागीनियां इन्‍फ्रा और अल्‍ट्रासोनिक स्‍तर की ध्‍वनियां है जो अपने में समाहित तीव्रता और मधुरता के कारण अलग-अलग प्रकार के परिणाम प्रस्‍तुत करती है। अतः अलग-अलग रागों का अपना विशिष्‍ट प्रभाव है जो उनसे निकलने वाली ध्‍वनियों की तीव्रता इत्‍यादि के कारण प्रभावी होता है।12

संगीतज्ञों, चिकित्‍सकों, मनोवैज्ञानिकों ने राग में लगने वाले स्‍वरों तथा उनका शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव के आधार पर कुछ राग निश्‍चित किये हैं जो रोगों को दूर करने में सहायक हो रहे है। जैसे-मानसिक विक्षिप्‍तता के लिये राग बहार, बागेश्री, बिहाग, धानी, श्‍वास के रोगों एवं दमा-अस्‍थमा में राग दरबारी मालकौंस, भैरव, श्री, केदार, भैरवी, मधुमेह के लिये राग जौनपुरी, जयजयवन्‍ती, नेत्र सम्‍बन्‍धी रोगों में राग पटदीप, भीमपलासी, मुल्‍तानी व पटमंजरी, हृदय से सम्‍बन्‍धित रोगों में राग दरबारी, पित्त्‍ा, सिरदर्द व जोड़ों के दर्द में राग सारंग, सोहनी, तोड़ी, यमन कल्‍याण व नट भैरव, पेट के रोगों में रागेश्री एवं पंचम अनिद्रा राग में राग पूरिया निलाम्‍बरी, काफी, खमाज रक्‍तचाप से सम्‍बन्‍धित रोगों में हिंडोल, कौशिक कान्‍हरा, पूर्वी तथा क्षय रोग, मलेरिया व हिस्‍टीरिया के रोगों में राग खमाज, बिलावल, रामकली, मारवा इत्‍यादि राग निर्धारित किये गये हैं। मल्‍हार, सोरठ, जयजयवंती इत्‍यादि राग शरीर की उम्र् बढ़ाते बढ़ाते हैं तथा क्रोध को दूर कर मस्‍तिष्‍क को शांत करते हैं। स्‍मरण शक्‍ति बढ़ाने में राग शिवरंजनी, तनाव को कम करने में राग तोड़ी तथा भैरवी अच्‍छी निद्रा एवं रोगियों को शान्‍ति प्रदान करती है। जो राग पूर्वाग प्रधान है वे कफ रोगों से दोपहर के राग पित्त्‍ा सम्‍बन्‍धी रोगी से एवं रात्रि के राग वात्‌ सम्‍बन्‍धी रोगों से मुक्‍ति दिलाते हैं।

रागों के समय निर्धारण के पीछे प्राचीन संगीतज्ञों का वैज्ञानिक दृष्‍टिकोण अवश्‍य ही इसी चिकित्‍सकीय प्रभाव पर आधारित होगा।

संगीत के रागों का शरीर पर इस पूर्ण रूपी प्रभाव का वर्णन करते हुये जार्जस्‍टीवेन्‍स ने लिखा है-- ‘‘क्रोध उत्‍पन्‍न हो तो शारीरिक श्रम में लगे। विक्षिप्‍त मन स्‍वाध्‍याय से शान्‍त होता है और मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य के लिये व्‍यायाम की आवश्‍यकता अनिवार्य है। इन तीनों के लिये सार्थक उपाय संगीत है। इससे मानसिक तनाव दूर होता है, शान्‍ति मिलती है और स्‍वास्‍थ्‍य स्‍थिर रहता है।''13

भारतीय राग-संगीत की यह विशिष्‍टता है कि इसमें निहित स्‍वर लहरियां व्‍यक्‍ति में अर्न्‍तनिहित सूक्ष्‍मताओं व विशिष्‍टताओं को अपने ही रंग में रंगने व समाहित करने का कार्य करती है। यह मन की गहराईयों को छूकर परमाननन्‍द की प्राप्‍ति कराती हैं यह वास्‍तव में रोगी को निरोगी, संवेदनाशून्‍य के संवेदनशील बनाती है।

राग-संगीत की इन्‍हीं विशेषताओं को परख कर, आज वर्तमान में संगीत को रोगोपचार की प्रक्रिया में वैकल्‍पिक चिकित्‍सा पद्धति के सशक्‍त माध्‍यम के रूप में अपनाया जा रहा है जिसे संगीत चिकित्‍सा ‘अथवा' म्‍युजिक-थेरेपी' के नाम से जाना जा रहा है। संगीत की सुमधुर स्‍वर लहरियों से मानसिक शारीरिक व भावनात्‍मक विकार-विकृति का उपचार ही ‘म्‍युजिक-थेरेपी' हैं अर्थात्‌ कला और विज्ञान के समन्‍वय से जो संगीत द्वारा रोगों को दूर करने की वैज्ञानिक प्रणाली तैयार की गयी उसे संगीत-चिकित्‍सा नाम दिया गया। इस पद्धति में मानवीय भावनाओं एवं संवेदनाओं को ऊर्जावान कर मनुष्‍य को मानसिक व दैहिक रूप से समृद्ध और ओजवान किया जाता है जिससे रोगियों के पुर्नवास उपचार के लिये उत्‍प्रेरणा, भावनात्‍मक सहयोग तथा भावाभिव्‍यक्‍ति में भी सहायता मिलती है।

राग-रागीनियों से फलप्रद चिकित्‍सा सम्‍भव है किन्‍तु उसके लिये आवश्‍यक है संगीत चिकित्‍सक का कुशल होना, उपयुक्‍त वाद्य, राग, शैली, का चयन, रोगी की मानसिक अवस्‍था रूचि, परिवेश तथा संगीत के प्रति गा्रहयता का आंकलन तथा मूल्‍यांकन करने की क्षमता हो। क्‍योंकि प्रत्‍येक राग का स्‍वर प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति के मनः स्‍थिति एवं मानसिक स्‍थिति पर भिन्‍न प्रकार से अपना प्रभाव डालता है। राग रोग व रोगी के बीच सामंजस्‍य ही इस चिकित्‍सा पद्धति का प्रमुख आधार है। उचित रोग मे उचित राग का प्रयोग अवश्‍य ही लाभकारी सिद्ध होगा।

संगीत जैसी महान्‌ विरासत को सुरक्षित व संरक्षित रखने के लिये आवश्‍यक है कि इसका उपयोग नये युग की नयी मांगों के सन्‍दर्भ में करें, इसकी उपयोगिता व उपदेयता को समझें।14

संगीत को सामाजिक उपयोगिता के सन्‍दर्भ में देखने की आज भी आवश्‍यकता हैं विषय के प्रति हम श्रद्धा अवश्‍य रखें परन्‍तु ज्ञान के प्रति जागरूक रहना भी घ्‍येय होना चाहिये। संगीत के विज्ञान को नहीं बल्‍कि संगीत को ही वैज्ञानिक नजरिये से देखने की आवश्‍यकता है।

वर्तमान में जबकि मानव का अस्‍तित्‍व सर्वाधिक संकटग्रस्‍त है। इस युग को असाध्‍य रोगों के जनक की संज्ञा दी जा सकती हैं जीवन की इस बेतहाशा दौड़ में इंसान अनेक मानसिक-शारीरिक दुष्‍परिणामों से ग्रसित हो रहा है। ऐसी पीरस्‍थिति में सम्‍पूर्ण परिवेश को सुन्‍दर, शान्‍त व समृद्ध बनाने में संगीत संजीवनी का कार्य कर सकती है। परिणामस्‍वरूप संगीत द्वारा शिष्‍ट समाज, शुद्ध पर्यावरण, प्रदूषण मुक्‍त स्‍वस्‍थ मन और पुष्‍ट शरीर, तीव्र बुद्धि प्रखरता इत्‍यादि संगीत के माध्‍यम से सहज ही सुलभ हो जाते हैं।

तुलसी दास जी ने कहा है--

क्षिति जल पावक गगन समीरा।

पंच रहित यह अधम शरीरा॥

ये पांचों तत्‍व मानव शरीर के आधार है। जिनमें संतुलन बिठाकर स्‍वस्‍थ व दीर्धायु जीवन प्राप्‍त किया जा सकता है। शोध से यह स्‍पष्‍ट है कि इन पांचों में संगीत विद्यमान है अथवा इन पांचों तत्‍वों में संतुलन संगीत के द्वारा बनाये रखा जा सकता है तथा मानव स्‍वास्‍थ्‍य दीर्धायु जीवन पा सकता है।

कालाईल ने भी कहा कि -- ‘‘संगीत के पीछे-पीछे खुदा चलता है।'' अतः जहां ईश्‍वर का वास स्‍वयं है वहां भला कोई रोक-शोक कैसे टिक सकता है?

भारतीय संगीत की परम्‍परा विश्‍व की सबसे पुरातन संगीत परम्‍परा है। विश्‍व की सबसे पुरातन संगीत परम्‍परा है। भारतीय संगीत अपनी मधुरता, सरसता, शुद्धता एवं विविधता के बल पर श्रुतिमधुर एवं लोकप्रिय सिद्ध हुआ।

वास्‍तव में संगीत मन व वाणी से परे अनुभव व आनन्‍द का विषय हैं यह भाव-सौन्‍दर्य के रसानुभूति तथा सुखानुभूति से अभिप्रेत हैं यह हमारी भारतीय संस्‍कृति की अमूल्‍य धरोहर है, विरासत है जो भावी पीढ़ी को प्रेम व सद्‌भाव का संदेश देती है। जन-गण-मन को प्रस्‍फुटित करने वाले भारतीय संगीत में मुक्‍ति का अमर सन्‍देश हैं।

संगीत के विविध रूप है, आवश्‍यकता है कि उनके मूल्‍यों एवं उपचारात्‍मक उपयोगिता को पहचाना जाये ताकि उनके द्वारा प्रदत्त्‍ा लाभों का प्रयोग हो सके। संगीत-चिकित्‍सा निश्‍चित रूप से मानव जीवन को एक नई दिशा प्रदान करेगी। वर्तमान में, बदलते परिवेश में, संगीत में राग द्वारा रोगों का निदान एवं रोगियों को शान्‍ति तथा सुकून की महती आवश्यकता है। अपने चमत्‍कारिक प्रभाव से ये निश्‍चित रूप से आश्‍चर्यजनक परिणाम देगी, ऐसी आशा एव अपेक्षा हम अपने अनुसंधानकर्ताओं, वैज्ञानिकों, मनो-वैज्ञानिकों, संगीतज्ञों-संगीत चिकित्‍सकों से करते हैं।

सन्‍दर्भ ग्रन्‍थ

1․ ऋग्‍वेद 8/33/2

2․ नारदीय शिक्षा, नारद

3․ भारतीय संस्‍कृति, शास्‍वत जीवन दृष्‍टि एवं संगीत- डा․ रूचि गुप्‍ता पृ․ सं․ 31

4․ संगीत बोध- शरत चन्‍द्र परांजपे - पृ․ सं․ 58

5․ भारतीय संगीत का इतिहास- उमेश जोशी पृ․ सं․ 50-51

6․ सत्‍यं, शिवं, सुन्‍दरं- डॉ․ सुकन पासवान पृ․ सं․ 148-149

7․ साम गान, उद्‌भव व्‍यवहार एवं सिद्धान्‍त- डॉ․ पंकज माला पु․ सं․-235

8․ संगीत मासिक पत्रिका-1993-राग चिकित्‍सा-मधुगन्‍ध मधुव्रत पृ․ सं․ 24-26

9․ वही पृ․ सं․- 26

10․। संगीत मकरंद- नारद संगीताध्‍याय चतुर्थ पाठश्‍लोक सं․ 80 सतीश शर्मा- संगीत चिकित्‍सा पृ․ सं․ 160

11․ हिन्‍दी नाट्‌य शास्‍त्र- बाबूलाल शास्‍त्री- पृ․ सं․ 421

12․ शब्‍द ब्रह्‌म-नाद ब्रह्‌म-श्रीराम शर्मा, पृ․ सं․ 6․3

13․ संगीत- चिकित्‍सा, श्री सतीश शर्मा, पृ․ सं․ 380

14․ साहित्‍य, संगीत व दर्शन-ए․ए․ज्‍दानोव, पृ․ सं․ 22 अनु0 श्री कर्ण सिंह चौहान

संगीतांजलि (समस्‍त भाग) - (श्री) पं․ ओम्‌कार नाथ ठाकुर

संगीत विशारद - श्री बसंत

भारतीय संस्‍कृति, शास्‍वत दृष्‍टि एवं संगीत - डॉ․ रूचि गुप्‍ता

भारतीय संगीत का इतिहास (आध्‍यात्‍मिक एवं दार्शनिक) -- डा․ सुनीता शर्मा

ख्‍याल गायन शैली विकसित आयाम- सत्‍यवती शर्मा

सरस संगीत रचना रत्‍नाकर -भाग- 1,2,3- श्री राजकिशोर प्रसाद सिनहा

प्राचीन भारत स इतिहास -- विद्याधर महाजन

प्राचीन भारत में संगीत -- धर्मावती श्रीवास्‍तव

संगीत बोध -- श्री शरत चन्‍द्र परांजये

भारतीय कलायें -- श्री बासुदेव शरन अग्रवाल

स्‍रस संगीत -- श्री प्रदीप कुमार दीक्षित

पत्रिकाः-

'' आरोग्‍य संजीवनी

'' निरोग धाम

'' अखण्‍ड ज्‍योति

'' कल्‍याण

बीती बिभावारी
[जयशंकर प्रसाद जी की आत्मा से क्षमा -याचना सहित]

बीती बिभावारी,

जाग री !

कैसे तू इनके

चंगुल में आन पड़ी

शिघ्रातिशिघ्रम तू

यंहा से भाग री.

इनके मधुर वचन औ'

शुभ वस्त्रों पे मत जा ,

दिखाते है वक

पर है तो ये काग री .

इनकी शिकायत

तू करेगी जाकर थाने

कर दूं सचेत तुझे

तू जाने कि ना जाने

ये तो है सांपनाथ

वहां बैठे है नाग री.

बहुत सोचकर ही

पग उठाना इस ज़ग में

वरना जीवनभर धोती

रह जाओगी दाग री.

बीती बिभावारी

जाग री !,

-  

v k वर्मा

vijayvermavijay560@gmail.com

सातवीं पढ़ा व्‍यंग्‍यकार

चाचा दिल्‍लगीदास कक्षा नवम्‌ की पाठ्‌‌य पुस्‍तक ‘गद्य-पद्य संग्रह भाग एक' का कोई पाठ पढ़ कर एक लंबी सांस लेने के बाद बोले कि मरहूम गोपाल प्रसाद व्‍यास, अल्‍लाह तआला उनकी रुह-ए-पाक को जन्‍नत में मकाम दे, अगर आज जिन्‍दा होते, तो मैं उनसे पूछता जरुर कि क्‍यों हजूर, क्‍या ये गधा ही बचा था आपके कुछ लिखने के लिए? हजरत ने जिस अंदाज से गधे की तारीफें की हैं, उसे देख कर पूरे यकीन से कहा जा सकता हैं कि जनाब ने भले ही कोई गधा न पाला हो, मगर अव्‍वल किस्‍म के गधों से उनका पाला जरुर पड़ा है। चाचा ऊपर हाथ करके जरा संजीदगी के साथ बोले कि परवर दिगार इस जुबां से बेजा न कहलवाए, इस तंजनिगार ‘व्‍यासजी' ने गधे को काफी गौर कर करीब से देखा है, वरना एक उचाट-सी नजर डालते हुए पास से गुजर कर, या दुलत्ती के खौफ से कनखियों से देखते हुए गधे से बच निकलने की स्‍थिति में गधे को इतनी सूक्ष्‍मता से परखा नहीं जा सकता। गधे में पाई जाने वाली या यूं कहे कहना बेहतर रहेगा कि ढूंढी तमाम खुसिसियात के मद्देनजर ये दावा किया जा सकता हैं कि कातिब वाकई गधा विशेषज्ञ रहा होगा। और हो न हो, कोई गैर-मतबुआ ‘गधा ग्रंथ' भी रख छोड़ा होगा।

चाचा कुछ झुंझलाकर बोले कि भतीजे माना कि ‘व्‍यासजी' को गधा अति प्रिय था। वो ही उनका पे्ररणा स्‍त्रोत, सोच का आधार, कल्‍पना का आदि-अंत, कामयाबी का नुस्‍खा, उनकी अपनी र्एप्रोज' था। उन्‍हें खर महाशय में अनेक खूबियां नजर आती थी। इस गर्धर्भराज में उन्‍हें न जाने किस-किस की छवि नजर आती होगी, मगर इसका अर्थ ये तो नहीं कि चाहे जिसकी तुलना अपने गधे से कर डालें। यहां तक कि अपने राष्‍ट्रीय नेताओं की, जिनमें प्रजाजन आज तक एक महापुरुष तलाशता आया है। जगह-जगह जिनकी तस्‍वीरें और पोस्‍टर चस्‍पा कर हम उन्‍हें पूजते आए हैं। चाचा ने अपने हाथ में थामी पुस्‍तक मेरे हवाले करते हुए कहा कि इस किताब में छपा लेख ‘अगर गधे के सींग होते' पढ़ कर देखना। गौर से नहीं, जरा सरसरी नजर से ही देखोगे, तो पाओगे कि इस लेख के कतिपय अंश ही क्‍या पूरा का पूरा लेख ही विवादित है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इनकी जरा सी तारीफ क्‍या कर दी, जनाब बेलगाम हो गए। इसी लेख में एक जगह राजा की आड़ में किसी को सजा-धजा गुड्डा बताया गया है और ये किसी शीर्षस्‍थ नेता की और इशारा है, तो खाल वाली उपमा से भी कहीं ज्‍यादा गंभीर प्रकृति का है। एक जगह महिलाओं में पवित्रताओं की संख्‍या दिन-दिन घटने का ज्रिक है, जो एक सनातन विवाद है अपने आप में। चाचा ने जाते-जाते कहा कि बात मेरी समझ से परे है कि इस लेख को नवीं कक्षा की पुस्‍तक में किसने क्‍या सोचकर घुसेड़ा, कभी त्रय साहब से मुलाकात हो, तो जानूं। एक सातवीं पास लेखक को नवीं स्‍तर की कक्षा में शिक्षा स्‍नातकों से पढ़वाकर छात्रों को हम कैसा भाषा ज्ञान देना चाहते हैं। मेरी समझ में तो यह भी नहीं आ रहा कि क्‍या राजस्‍थान में कोई प्रिंटिंग प्रेस था ही नहीं, जो पुस्‍तकें सरल प्रिंटिंग प्रेस, मथुरा जाकर छपीं। कुछ भी हो, अगले वर्ष तो इस लेख को चार लाख बराणवे हजार विधार्थियों ने पढ़ लिया, अगले वर्ष से इसका कोई हल खोजना है। चाचा उठ कर किताब बगल में दबाते हुए बोले कि कपूत ये लेखक बड़े खर दिमाग होते है। एक वो डार्विन था, जो सबको बंदर की औलाद बता गया। इन व्‍यासजी ने जो कर दिखाया, सामने है।

ग़रीब देश के अमीर सांसद

चाचा दिल्‍लगी दास ने जब सांसदों के भत्ते पाँच गुना बढ़वा लेने की कवायद के समाचार पढे तो अचानक उनकी आंखों में पानी आ गया जब वर्तमान में सांसदों को मिलने वाले भत्तों पर गौर किया तो उनकी विपन्‍नता पर तरस आया और चाचा की आंखों से अविरत्‍न अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी। जब मन कुछ हल्‍का हुआ तो रुंधे गले से बोले कि आज बिचारे इन सांसदों को मिलता ही क्‍या है, सिर्फ माह में छियालिस हजार नकद और फ्री बिजली, पानी, टेलिफोन, आजीवन सपत्‍नीक रेल्‍वे पास, वायुयान की बत्तीस टिकटें जैसी चंद टुच्‍ची सुविधाओं के अलावा। माना कि पाँच व षोंर् में इन पर साढे आठ नो सौ करोड़ रुपये खर्च हो जाते हैं मगर वो कौन-से पूरे के पूरे इनकी जेब में जाते हैं।

चाचा आगे बोले कि आज राजनीति की दुर्दशा के लिए ये अत्‍यल्‍प ही जिम्‍मेदार हैं जब इतनी कम तनख्‍वाह में कुशल श्रमिक तक नहीं मिलते तो फिर इतने से भत्ते व नाकाफी सहूलियतों में स्‍वच्‍छ राजनीति की छवि वाले सांसद कहां से उपलब्‍ध होंगे जरा गौर करने की बात हैं। इन भत्तों से तो वर्तमान में हाथ लगे सांसदों को रजनीतिक क्षेत्र में बनाये रखना भी दुष्‍कर होगा। इस खरीद फरोख्‍त को रोकने के लिए ये भत्ते व अन्‍य सुविधाएं पर्याप्‍त साबित नहीं होगी। ये भत्ते ही तो कारण है देश की वर्तमान दुर्दशा के, जब तक सांसदों का ध्‍यान इन भत्तों से नहीं हटेगा तो ये देश के विषय पर कब सोचेंगें।

चाचा ने अपना तफसला मुसलसल जारी रखते हुए अपनी वाकिफीयत जाहिर की, कह रहे थे कि माना कि संसद में सत्तापक्ष के अलावा प्रतिपक्ष भी होता है और सत्तापक्ष के हर जायज नाजायज कदम का विरोध कर अपना अस्‍तित्‍व कायम रखने की चेष्‍टाएं करते रहते है मगर विरोध तब करते है जब कुर्सी की लड़ाई होती है जब पेट की लड़ाई का मामला होता है तो ये ही सांसद अपने-अपने सिद्धांत, आपसी रंजिशें व प्रतिद्वन्‍द्विता भुला कर एक होकर लड़ते है। सिर्फ ऐसे ही अवसरों पर इनको एक राय होते देखा जा सकता है।और जब इनके भत्ते बढ़ जाएंगे तो ये मेज थपथपा कर उस फैसले कर स्‍वागत करेंगें। एक दूसरे के गले मिलकर बधाईयां देंगे।

चाचा जरा झुंझला कर बोले कि कुछ समझ में नहीं आ रहा कि सरकार इनके भत्ते बढ़ाने में इतनी हील-हुज्‍जत क्‍यों कर रही है। पिछली सरकारों की भांति बढ़ा क्‍यों नही ंदेती। ये सांसद है कोई सरकारी कर्मचारी तो है नहीं सो पूर्व स्‍पीकर की रहनुमाई में कमेठी बनाने,‘कैग' को सौंपने किसी बाहरी एजेंसी को मामला सुपुर्द करने, आयोग गठन करने जैसी अड़चनें डाली जा रही हैं। इसका विरोध करने वाले साहबान को शायद सांसदों की माली हालत का पता नहीं, कुल जमा 300 सांसद ही तो करोड़पति हैं 30धन्‍ना सेठ बाकी बेचारे तो आज भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे है। इनको जितना मिलता है उससे कहीं अधिक तो किसी कमाऊ सरकारी महकमें का चपरासी भी झटक लेता है महिनें भर में। इनके भत्तों से कई गुणा ज्‍यादा देश के रईशजादे तफरीह में उड़ा देते हैं। उनकी तुलना में तो सांसद मोटी रस्‍सी से खूंटे पर बंधी काली गाय से प्रतीत होते है जिसको तौलकर सूखा चारा डाला जाता है।

आज चाचा इन सांसदों की बेचारगी पर तरस खाकर खासे मेहरबान नजर आ रहे थे बोले कि चाहे कोई कमेठी बने या किसी की भी रहनुमाई कोई आयोग गठित है इन सांसदों की मांग मानी ही जानी चाहिए। इनके साथ-साथ इनकी सांसद निधि को भी दो से बढ़ा कर पांच करोड़ कर देनी चाहिए। माना कि पूर्व ‘राजग' सरकार ने इस मांग को निर्दयता पूर्वक रौंद दिया था मगर इस ‘सम्‍प्रग' सरकार को ऐसी गलती कभी नहीं करनी चाहिए। भला दो करोड़ रु. सालाना कोई सांसद निधि हुई। ये सरासर एक सांसद की खुली तौहीन है इतनी सी निधि के कारण ही तो हमारे मुल्‍क को अभी भी गरीब मुल्‍कों में शुमार किया जाता है।

ग़ज़ल .1

जाने कैसी खबर छप गयी है अब के अखबारों में।

खौफज़दा है मची खलबली सारे इज्‍जतदारों में॥

 

मंदिर मंदिर ढूंढ रहा हूं धूप बत्‍तियां लेकर मैं,

दीनानाथ हुआ करता था इक तेरे अवतारों में।

 

कभी कटोरा होता था उस हाथ में खंजर देखा तो,

पाप पुण्‍य पर बहस छिड़गयी धर्म के ठेकेदारों में।

 

भरे पड़े भण्‍डार डॉलरों से फिर भूख से मरते क्‍यों,

रोटी खाकर चिंतन करते दरबारी दरबारों में।

 

नई गरीबी रेखा खिंची फुटपाथों की छाती पर,

मिटी गरीबी निर्धन सारे आ बैठे जरदारों में।

 

लाशों के अम्‍बार देखकर गिद्ध कराहकर बोले,

जीने का अधिकार भी शामिल हो मौलिक अधिकारों में।

 

आस पास जो बिखरा देखा वो कागज पे लिख डाला,

लोग तुझे क्‍यों शामिल करते ‘‘जांगिड़'' तंजनिगारों में।

 

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ग़ज़ल 2

हाथ में थाम कर मेरे घर का पता।

और फिरी पूछती सब शहर का पता॥

 

जब हुआ भूखा जागा उठ चला पड़ा़,

जानवर ढूंढ़ने जानवर का पता ।

 

फर्द सरगस्‍ता फहरिस्ते चौराहों से,

खोजता इब्‍दिताये सफर का पता।

 

सब बयाजों के पन्‍ने परीशां पड़े,

अब कहां ढूंढ़े लख्‍ते जिगर का पता।

 

बात सुन इक पते की हैं मेरा पता,

नाम और गाँव के डाक घर का पता।

 

कुछ तख्‍ल्‍लुस से चलता नहीं बारहा,

क्‍या कह देगा इक सुखनवर का पता।

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ग़ज़ल 3

बुरा नहीं है किसी का बन जाना खाना-दामाद।

सारा माल ससुर का मिल जाता शादी के बाद ।

 

हो इज्‍जत चाहे दरवाजे के कुत्‍ते से बदतर ,

समझदार ससुराल में होते खाना आबाद।

 

काम किया चक्‍की चूल्‍हे का बर्तन भांज दिये,

पांव दबा के सास श्‍वसुर के ले ले आशीर्वाद।

 

अपनी किस्‍मत कोस रहे क्‍यों जलते औरों पे,

कुछ नेक काम करके गये थे शायद मेरे अज्‍जाद।

 

मन मर्जी से कुछ करने का जब जब जी चाहे,

जो खाना दामाद हुऐ हैं खुद्‌दारी पे खेल,

 

ऐसे मौकों पर बाबुल का घर आता है याद।

इन बदकिस्‍मत लोगों की ‘‘जांगिड'' खूब बड़ी तादाद।

...

(खाना दामाद = घर जँमाई)

---

 

ग़ज़ल 4

हम ले सके थे आसमान ताकते रहे।

दिलों के दरमियां पड़ी दरारें नापते रहे॥

 

किताबे दिल में जो सफा मुड़ा हुआ मिला हमें,

वो पढ़ा हुआ कलाम जान फाड़ते रहे।

 

रुप ओ मकरंद का व्‍यापार तिसका कर्म था,

डस मधुप को वाटिका का मीत मानते रहे।

 

नितान्‍त सहज भाव से तूफान तो चला गया,

हिला गया जड़ें उन्‍हीं का दर्द आंकते रहे।

 

तमाम वाकयात का बयाने मुख्‍तसर हैं ये,

सिले हुऐ से होंठ बार बार कांपते रहे।

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समीक्षित कृति-‘अधूरा सच‘ – कहानी संग्रह

कथाकार – रमाकांत दीक्षित

आज के महानगरीय जीवन का सत्‍य

अवनीश सिंह चौहान

‘साहित्‍य सम्‍पूर्ण सामाजिक अस्‍तित्‍व की अभिव्‍यक्‍ति है। हमारा आज का जीवन न सम्‍पूर्ण है, न सामाजिक, न सच्‍चे अर्थों में जीवन है, तब इसकी अभिव्‍यक्‍ति सम्‍पूर्ण कैसे हो?‘ (जगदीश चन्‍द्र माथुरः ‘भोर का तारा‘) शायद इसीलिए रमाकांत क्षितिज अपनी पन्‍दह कहानियों के संग्रह का शीर्षक ‘अधूरा सच‘ रखते हैं और इस बात को बड़ी ही साफगोई से स्‍वीकारते लगते हैं कि सच चाहे गढ़ा हुआ हो या कि जिया हुआ, अभिव्‍यक्‍ति में हमेशा कुछ न कुछ छूट ही जाता है कभी संघर्ष सूत्रों को ठीक से याद न रख पाने के कारण, तो कभी वैचारिकी पर पड़ने वाले परिस्‍थिति जन्‍य पभावों के चलते फिर भी इस अधूरे सच के प्रकाशन से आज के महानगरीय जटिल जीवन संदर्भो को बारीकी से व्‍यक्‍त करने की सामर्थ्‍य रखने वाले इस नवोदित कथाकार की रचना प्रक्रिया बड़ी ही सहजता, तारतम्‍यता एवं पारदर्शिता से कहानी चोला पहनती है और अपने कथ्‍य की विशिष्‍टता एवं विश्‍वसनीयता के बल पर पाठकों को झकझोर कर रख देती है।

आज ‘रेसिंग‘ का दौर है, तेज दौड़ती जिंदगी पर सबकी नजर है। और इस दौड़ में आगे निकल जाने की होड़ में जाने कितने लोग पीछे छूट जाते हैं, उनकी ओर मुड़कर देखने की फुर्सत भी नहीं होती है हमारे पास। ऐसे पिछड़े लोगों की लाइफ ट्रेन पटरी पर है भी या नहीं, इस ओर भी हमारा ध्‍यान नहीं जा पाता। किंतु जब कोई कलमकार इन उपेक्षित एवं पीड़ित लोगों की कुछ दुखद स्‍थितियों से संवेदित होकर उन्‍हें शब्‍द देता है तो निश्‍चय ही उस शब्‍द-शिल्‍पी के साहस और सजगता की सराहना की जानी चाहिए। ऐसे ही सहजग एवं संवेदनशील कथाकार रमाकांत क्षितिज आम और बदनाम जीवन और उससे जुड़ी तमाम बातों को बड़ी बेबाकी से व्‍यंजित करते हैं अपने इस रचना संसार में। उनकी ये कहानियां आजादी के बाद के बदले भारतीय समाज की असंगतियों-असमानताओं को अपने छोटे से फलक पर इतनी कलात्‍मकता से उकेरती है कि इनके शब्‍द-चित्र, घटनाएं, पात्र जीवन्‍त हो उठते हैं और लगने लगता है कि भारतीय समाज के नवीन खांचे में बहुत कुछ परिवर्तन की आवश्‍यकता है और जब तक यह परिवर्तन, परिर्वधन नहीं होता तब तक मनुष्‍य की पीड़ा को कम से कम कर एक सुखद एवं संस्‍कारित समाज की रचना का सपना, सपना ही रहेगा।

सामाजिक कहर, वर्तमान एवं भविष्‍य के खतरों से घिरी बचपन में ही अनाथ होने वाली फटपाथी जीवन जीती भिखारिन बच्‍ची रमिया की बेहद दुखद कहानी से प्रांरंभ होता है यह कहानी संग्रह। कातर दो ऐसे युवा प्रेमियों की भावनाओं को प्रकट करती है जो अलग-अलग वर्ण के होने के कारण एक दूसरे से वैवाहिक संबंधों में बंधने का साहस नहीं जुटा पाते। भस्‍मासुर कहानी उन लोगों पर करारा व्‍यंग्‍य है जिन्‍हे बड़े विश्‍वास से अपने समाज का प्रतिनिधित्‍व करने का जिम्‍मा सौंपा गया था किंतु जिन्‍होंने स्‍वार्थों के वशीभूत होकर अपनों के साथ ही विश्‍वासघात करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। साइड इफेक्‍ट कहानी पाश्‍चात्‍य जीवन श्‍ौली की देखा-देखी भारतीय परिवेश में अप्राकृतिक लेसवियन संबंधों के कटु अनुभवों की ओर संकेत करती है तो परिवर्तन कहानी में राहुल और मान्‍यता प्रेम में एक साथ जीने-मरने की बातें तो करते हैं किंतु विवाह किसी और से रचाकर अलग-अलग घर बसा लेते हैं। इस प्रवृत्‍ति से आधुनिक पीढ़ी की जियो और मौज करो की मानसिकता परिलक्षित होती है। मीठा जहर कजहरी जैसी सैक्‍स कर्मियों एवं सुनील जैसे परदेश में अकेले रहने, खाने-कमाने वाले अति सामान्‍य लोगों की बेवसी एवं बदहाली में जानलेवा बीमारियों का शिकार हो जाना बढ़ते महानगरीय संत्रास को उद्‌घाटित करती है। जबकि निपंग महानगरीय गुण्‍डागर्दी को सारी रोगी को ठीक न कर पाने की स्‍थिति में डॉक्‍टर द्वारा इस शब्‍द से अपनी असमर्थता जताने का आसान तरीके को, कांच की चूड़ियां दाम्‍पत्‍य जीवन की कड़ुवाहट को, हाथी का दांत, दहेज की दानवी प्रवृत्‍ति को 9ः14 सी.एस.टी. लोकल ट्रेन में सफर करने वालों की दैनिक दास्‍तान को, खोइया वृद्धों की दारूण दशा को, अधूरा सच प्रशासन, खासकर पुलिस मकहमे की कलाई खोलने के प्रयास को तथा अंतिम कहानी छब्‍बीस जुलाई प्राकृतिक प्रकोप का शिकार हुए मुंबई-वासियों की पीड़ा को रूपायित करती है। हालांकि इस संग्रह की कुछ कहानियों की बुनावट एवं उनका कथानक कमजोर है फिर भी उनमें भरपूर ताजगी एवं सरसता विद्यमान है। कुल मिलाकर इस संग्रह की कहानियां जीवन को हर हाल में शिद्‌दत से जीने का संकेत तो करती ही हैं, विषम स्‍थितियों से जूझने और उनका निदान खोजने के लिए उकसाती-जगाती है उन लोगों को जिनके हृदय में पीड़़ितों के प्रति सहानुभूति एवं दया के स्‍वर स्‍पंदित होते हैं।

-अवनीश सिंह चौहान

चन्‍द्रपुरा निहाल सिंह

जिला-इटावा

(डाॅ. रमाकांत क्षितिज ‘अधूरा सच‘, शिवा प्रकाशन

निकट आइडियल स्‍कूल, लेक रोड भांडुप (पं0)

मुंबई-400078, पथ आवृत्‍ति-2008, मूल्‍य-रु.100/-,पृष्‍ठ-151,

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समीक्षक परिचय:
अवनीश सिंह चौहान
जन्म : 4 जून, 1979, चन्दपुरा (निहाल सिंह), इटावा (उत्तर प्रदेश) में
पिता का नाम : श्री प्रहलाद सिंह चौहान
माताका नाम : श्रीमती उमा चौहान
शिक्षा : अंग्रेज़ी में एम०ए०, एम०फिल० एवं पीएच०डी० (शोधरत्) और बी०एड०
प्रकाशन: अमर उजाला, देशधर्म, डी एल ए, उत्तर केसरी, प्रेस-मेन, नये-पुराने, गोलकोण्डा दर्पण, संकल्प रथ, अभिनव प्रसंगवश, साहित्यायन, युग हलचल, यदि, साहित्य दर्पण, परमार्थ, आनंदरेखा, आनंदयुग, कविता कोश डॉट कॉम, सृजनगाथा डॉट कॉम, साहित्य शिल्पी डॉट कॉम, हिन्द-युग्म डॉट कॉम, रचनाकार ब्लागस्पाट डॉट कॉम, पी4पोएट्री डॉट कॉम, पोयमहण्टर डॉट कॉम, पोएटफ्रीक डॉट कॉम, पोयम्सएबाउट डॉट कॉम, आदि हिन्दी व अंग्रेजी की देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं में आलेख, समीक्षाएँ, साक्षात्कार, कहानियाँ, कविताओं एवं नवगीतों का निरंतर प्रकाशन। साप्ताहिक पत्र ‘प्रेस मेन’, भोपाल, म०प्र० के ‘युवा गीतकार अंक’ (30 मई, 2009) तथा ‘मुरादाबाद के प्रतिनिधि रचनाकार’ (2010) में गीत संकलित. मेरी शाइन (आयरलेंड) द्वारा सम्पादित अंगरेजी कविता संग्रह 'ए स्ट्रिंग ऑफ़ वर्ड्स' में रचनाएँ संकलित.
प्रकाशित कृतियाँ: स्वामी विवेकानन्द: सिलेक्ट स्पीचेज, किंग लियर: ए क्रिटिकल स्टडी, स्पीचेज आफ स्वामी विवेकानन्द एण्ड सुभाषचन्द्र बोस: ए कॅम्परेटिव स्टडी, ए क्विन्टेसेन्स आफ इंग्लिश प्रोज (को-आथर), साइलेंस द कोर्ट इज इन सेशन: ए क्रिटिकल स्टडी (को-आथर), फंक्शनल स्किल्स इन लैंग्वेज एण्ड लिट्रेचर, ए पैसेज टु इण्डिया: ए क्रिटिकल स्टडी (को-आथर)
अप्रकाशित कृतियाँ : एक नवगीत संग्रह, एक कहानी संग्रह तथा एक गीत, कविता और कहानी से संदर्भित समीक्षकीय आलेखों का संग्रह आदि
अनुवाद: अंग्रेजी के महान नाटककार विलियम शेक्सपियर द्वारा विरचित दुखान्त नाटक ‘किंग लियर’ का हिन्दी अनुवाद भवदीय प्रकाशन, अयोध्या से प्रकाशित ।
संपादन :
प्रख्यात गीतकार, आलोचक, संपादक श्री दिनेश सिंहजी (रायबरेली, उ०प्र०) की चर्चित एवं स्थापित कविता-पत्रिका ‘नये-पुराने’ (अनियतकालिक) के कार्यकारी संपादक पद पर अवैतनिक कार्यरत।
प्रबुद्ध गीतकार डॉ०बुद्धिनाथ मिश्र (देहरादून) की रचनाधर्मिता पर आधारित उक्त पत्रिका का आगामी अंक शीघ्र ही प्रकाश्य। वेब पत्रिका ‘गीत-पहल’ के समन्वयक एवं सम्पादक ।
सह-संपादन: कवि ब्रजभूषण सिंह गौतम ‘अनुराग’ अभिनंदन ग्रंथ (2009) के सह-संपादक ।
संपादन मण्डल: प्रवासी साहित्यकार सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ (नॉर्वे) अभिनंदन ग्रंथ (2009) के सम्पादक मण्डल के सदस्य ।
सम्मान :
अखिल भारतीय साहित्य कला मंच, मुरादाबाद (उ०प्र०) से ब्रजेश शुक्ल स्मृति साहित्य साधक सम्मान, वर्ष 2009
संप्रति :
प्राध्यापक (अंग्रेज़ी)
स्थायी पता: ग्राम व पो.- चन्दपुरा (निहाल सिंह), जनपद-इटावा (उ.प्र.)-२०६१२७, भारत ।
मोबा० व ई-मेल: 09456011560, abnishsinghchauhan@gmail.com
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Abnish Singh Chauhan
Lecturer
Department of English
Teerthanker Mahaveer University
Moradabad (U.P.)-244001
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हमारे जीवन की हकीकत बयान करती गजलें

समीक्षक- अवनीश सिंह चौहान



जो हजारों साल से मैं कह रहा हूं
फिर वही इक बात कहना चाहता हूं।

सैयद रियाज रहीम के गजल संग्रह पूछना है तुमसे इतनाकी फेहरिस्‍त से पहले उनका उपर्युक्‍त शेर पाठकों से कलमकार की बात बड़ी साफगोई से कह देता है कि वर्षों से साहित्‍यकार समाज के जिस कीचड़-दलदल को साफ करने की बात और उसके तत्‍कालीन सवरूप को प्रतिबिंबित करने का प्रयास करते रहे हैं, वही काम आज भी हो रहा है, बस उसको करने का अंदाज बदल गया है और बदल गयी है कुछ चिन्‍ताएं भी। ऐसे में इस शायर की कहन में समयानुकूल ताजगी, अपना खिंचवा-जुड़ाव, रगड़-घिसड़ के चिन्‍हों का रूपायन स्‍वाभाविक ही है। जिससे इतना तो अंदाजा लगता ही है कि जो बात वह हमसे कहना चाहता है, या पूछना चाहता है, वह हमारी और हमारे परिवेश से जुड़ी बात है, जो हमें रिमाइण्‍डकराती है कि किसमें हमारा हित है और किस में नहीं। उसकी यह सजगता-संवेदनशीलता तब और भी मायने रखती है जबकि आज का आदमी मायावी बाजारवाद के वशीभूत होकर अपनी आदमियत को भूलता-दरकिनार करता चला जा रहा है। इसीलिए वह सीधे-सपाट कह देता है-


आदमी हो, रहो, आदमी की तरह
ये समझता नहीं जो वो शैतान है।




हमारे बाद भी जिंदा रहेंगे ख्‍वाब रियाज
हमारे ख्‍वाबों का रिश्‍ता तो आदमी से है।

चूंकि रहीम साहब और उनके अशआरों का रिश्‍ता आदमी से है इसीलिए उसके बेहतर वर्तमान एवं भविष्‍य को ध्‍यान में रखते हुए वह किसी भी बात को दो टूक कह देने का साहस रखते हैं। उनका कविमन इस बात को जानता है कि सही बात कहने, दूसरे के दर्द से संवेदित होने और पीड़ितों के लिए आवाज उठाने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए, न केवल हिम्‍मत बल्‍कि सर्वे भवन्‍तु सुखन' जैसी उच्‍च भावना त्‍याग, और दृढ़ संकल्‍प की भी आवश्‍यकता पड़ेगी और जिनमें उक्‍त तत्‍व, बातें मौजूद हैं, वे लोग बहुत कम ही है। किन्‍तु इतिहास गवाह है कि मुट्‌ठी भर लोगों ने ही सदैव क्रांति के बीज बोये हैं। इसीलिए उसका पैगाम है-

कब तक एक ही मंजर देखो, कब बदलेगा मंजर यार
सन्‍नाटों के इस सागर में कोई तो फेंके कंकर यार।

लेखक का यह संदेश हमारे सुप्‍त मन-मस्‍तिष्‍क को झकझोरने का प्रयास कर रहा है ताकि हमारा मरता हुआ ईमान लाज-शर्म, मान-मर्यादा को पुनः अनुप्रमाणित किया जा सके। उसको चिन्‍ता है-

धर्म को कोई खतरा नहीं है जनाब
अब तो खतरे में हम सबका इर्मान है
कोई अकीदा, कोई नजरिया, कोई उसूल
सब कुछ जैसे ख्‍वाब तमाशा लगता है।

रचनाकार का यह अनुभव बहुत साफ-सुथरा है, इसमें पूरी सच्‍चाई है क्‍योंकि आज की परिस्‍थितियों और मानवी-प्रवृत्तियाँ बहुत बदल गयी हैं। इसीलिए वह जीवन के लिए जरूरी एवं कल्‍याणकारी आयामों-सामाजिक-सांस्‍कृतिक एकता, रस्‍म-ओ-रिवाज, आपसी स्‍नेह-विश्‍वास, सहयोग, भाईचारा , सच्‍चाई, अमन-चैन, सांप्रदायिकता-निष्‍ोध और अंतराष्‍ट्रीय सद्‌भाव, पर बल देता है।
कुछ उदाहरण दृष्‍टव्‍य हैं-

मस्जिद-मंदिर के झगड़े तो होते मिटते रहते हैं
दफन है जिसमें दिल के रिश्‍ते उस मलबे की बात करें।

इतना ही नहीं, वह मानव जीवन के लिए अहितकर एवं घातक-संवेदनहीनता, अलगाव, अवसरवादिता, खोट-कपट, नफरत, खौफ, अन्‍याय, अत्‍याचार जैसी सामाजिक विसंगतियों-विद्रूपताओं के विरुद्ध भी अपना प्रतिवाद बेधड़क प्रस्‍तुत करता है-

सितमगरों के हक में हैं सारे मुन्‍सिफ भी
हमारे हक में कोई फैसला मिलेगा कहां।
मिरे अपने ही मुझको कत्‍ल करते हैं यहां पल-पल
जहां भी खून बहता है वो मेरा ही तो होता है।

इतना कुछ कहने के पीछे उसकी मंशा यही है कि यदि उसके इन अल्‍फाजों से समाज में जागृति आ गयी, तो संभव है कि इसके अरुणोदय में नयी कोपलें फूटें और जीवन को सुवासित करने लगें। यही तो उसका ख्‍वाब है क्‍योंकि वह मानता है-

सफर का सिलसिला यों ही नहीं जिन्‍दा है सदियों से
हमारे ख्‍वाब सहराओं में भी दरिया बनाते हैं।

और इसके लिए वह पूरी तरह से आशावादी भी दिखता है-

धीरज रखो आज नही तो कल अच्‍छा हो जायेगा
पगडंडी पर चलते रहना ही रस्‍ता हो जायेगा।

इस कलमकार के कलामों में कइ प्रकार की देशज अन्तर्ध्‍वनियां हैं, अकथित आशय हैं जो जीवन के तमाम खट्‌टे-मीठे अनुभवों के साक्ष्‍य हैं और महत्‍वपूर्ण बात तो यह है कि इनके अर्थ आसानी से निकल आते हैं और लगने लगता है कि मानो वे हमारे जीवन की हकीकत बयान कर रहे हों। हालांकि कुछ गिने-चुने पहलुओं पर कथ्‍य और शब्‍द-समूहों की पुनरावृत्‍ति देखने को मिलती है, फिर भी उसका बिम्‍ब विधान और भावबोध एक गंभीर चिंतक की सर्जना लगते हैं। कुल मिलाकर यह संग्रह पठनीय है।

संदर्भ- समीक्षित कृति-‘पूछना है तुमसे इतना‘, रचयता- सैयद रियाज रहीम, प्रकाशक- आजमी पब्‍लिकेशन कुर्ला, मुंबई, प्रथम आवृत्‍ति-2007।
----.


अवनीश सिंह चौहान
-चन्‍दपुरा निहाल सिंह
जिला-इटावा-206127 (उ.प्र.), भारत

--
Abnish Singh Chauhan
Lecturer
Department of English
Teerthanker Mahaveer University
Moradabad (U.P.)-244001
---
समीक्षक परिचय:
अवनीश सिंह चौहान
जन्म : 4 जून, 1979, चन्दपुरा (निहाल सिंह), इटावा (उत्तर प्रदेश) में
पिता का नाम : श्री प्रहलाद सिंह चौहान
माताका नाम : श्रीमती उमा चौहान
शिक्षा : अंग्रेज़ी में एम०ए०, एम०फिल० एवं पीएच०डी० (शोधरत्) और बी०एड०
प्रकाशन: अमर उजाला, देशधर्म, डी एल ए, उत्तर केसरी, प्रेस-मेन, नये-पुराने, गोलकोण्डा दर्पण, संकल्प रथ, अभिनव प्रसंगवश, साहित्यायन, युग हलचल, यदि, साहित्य दर्पण, परमार्थ, आनंदरेखा, आनंदयुग, कविता कोश डॉट कॉम, सृजनगाथा डॉट कॉम, साहित्य शिल्पी डॉट कॉम, हिन्द-युग्म डॉट कॉम, रचनाकार ब्लागस्पाट डॉट कॉम, पी4पोएट्री डॉट कॉम, पोयमहण्टर डॉट कॉम, पोएटफ्रीक डॉट कॉम, पोयम्सएबाउट डॉट कॉम, आदि हिन्दी व अंग्रेजी की देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं में आलेख, समीक्षाएँ, साक्षात्कार, कहानियाँ, कविताओं एवं नवगीतों का निरंतर प्रकाशन। साप्ताहिक पत्र ‘प्रेस मेन’, भोपाल, म०प्र० के ‘युवा गीतकार अंक’ (30 मई, 2009) तथा ‘मुरादाबाद के प्रतिनिधि रचनाकार’ (2010) में गीत संकलित. मेरी शाइन (आयरलेंड) द्वारा सम्पादित अंगरेजी कविता संग्रह 'ए स्ट्रिंग ऑफ़ वर्ड्स' में रचनाएँ संकलित.
प्रकाशित कृतियाँ: स्वामी विवेकानन्द: सिलेक्ट स्पीचेज, किंग लियर: ए क्रिटिकल स्टडी, स्पीचेज आफ स्वामी विवेकानन्द एण्ड सुभाषचन्द्र बोस: ए कॅम्परेटिव स्टडी, ए क्विन्टेसेन्स आफ इंग्लिश प्रोज (को-आथर), साइलेंस द कोर्ट इज इन सेशन: ए क्रिटिकल स्टडी (को-आथर), फंक्शनल स्किल्स इन लैंग्वेज एण्ड लिट्रेचर, ए पैसेज टु इण्डिया: ए क्रिटिकल स्टडी (को-आथर)
अप्रकाशित कृतियाँ : एक नवगीत संग्रह, एक कहानी संग्रह तथा एक गीत, कविता और कहानी से संदर्भित समीक्षकीय आलेखों का संग्रह आदि
अनुवाद: अंग्रेजी के महान नाटककार विलियम शेक्सपियर द्वारा विरचित दुखान्त नाटक ‘किंग लियर’ का हिन्दी अनुवाद भवदीय प्रकाशन, अयोध्या से प्रकाशित ।
संपादन :
प्रख्यात गीतकार, आलोचक, संपादक श्री दिनेश सिंहजी (रायबरेली, उ०प्र०) की चर्चित एवं स्थापित कविता-पत्रिका ‘नये-पुराने’ (अनियतकालिक) के कार्यकारी संपादक पद पर अवैतनिक कार्यरत।
प्रबुद्ध गीतकार डॉ०बुद्धिनाथ मिश्र (देहरादून) की रचनाधर्मिता पर आधारित उक्त पत्रिका का आगामी अंक शीघ्र ही प्रकाश्य। वेब पत्रिका ‘गीत-पहल’ के समन्वयक एवं सम्पादक ।
सह-संपादन: कवि ब्रजभूषण सिंह गौतम ‘अनुराग’ अभिनंदन ग्रंथ (2009) के सह-संपादक ।
संपादन मण्डल: प्रवासी साहित्यकार सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ (नॉर्वे) अभिनंदन ग्रंथ (2009) के सम्पादक मण्डल के सदस्य ।
सम्मान :
अखिल भारतीय साहित्य कला मंच, मुरादाबाद (उ०प्र०) से ब्रजेश शुक्ल स्मृति साहित्य साधक सम्मान, वर्ष 2009
संप्रति :
प्राध्यापक (अंग्रेज़ी)
स्थायी पता: ग्राम व पो.- चन्दपुरा (निहाल सिंह), जनपद-इटावा (उ.प्र.)-२०६१२७, भारत ।
मोबा० व ई-मेल: 09456011560, abnishsinghchauhan@gmail.com
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Abnish Singh Chauhan
Lecturer
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Teerthanker Mahaveer University
Moradabad (U.P.)-244001
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ल्कू , मुन्नी और जबरा -
हूँ .. कितनी पीढ़ियों तक ?
पूस की आदत है क्या ?
तुम्हारे खून में रात बनकर बैठी है ?
या ठहर गयी है सूखी हड्डियों में ?
तीन रूपये का कम्बल खरीदने की अभिलाषा ....
अब भी कहाँ मिला ?
अंटी में तीन सौ हैं तो ....!
कहते हैं अब मालगुजारी भी नहीं ...!
फिर क्यों ये पूस टलता नहीं ?
तुम्हारे ऊख कहाँ हैं ?
नीलगाय अब हैं क्या ?
तुम्हारी मड़ैया?
अब ज़रूरत नहीं क्या ?
पड़ोस के आम के बगीचे में पतझड़ ....
अलाव तो मिला था ...
तुम और जबरा सो पाए थे
बटोरी पत्तियाँ जला कर ...!
वह तो अच्छा था कि पतझड़ उन्हीं दिनों होता है ......!
उधर -
नेपथ्य से लड़ता रहा था पूस
तुम्हारी अकर्मण्यता से .
अब भी लड़ रहा है ...
सुना है हार कर बैठ गया है ...
ठिठुरते तारों की सौगात लिए !
परास्त जान पड़ता है !
उधर -
कितने निर्लिप्त हैं वे !
संतुष्ट !
सब छोड़ कर -
एक चौड़ी सड़क से गुज़रकर
यहाँ फुटपाथ पर
तपी पड़े हैं -
पूस किनारे बैठा देख रहा है ...
पास से कई गुज़र गए ...
क्या अब शिनाख्त भी मुझे करनी होगी ?

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- बाकी है अभिलाषा

सराय में मकसद का निकल रहा जनाजा

छल-प्रपंच,दण्‍ड-भेद का गूंजता है बाजा

नयन डूबे मन ढूंढे भारी है आज हताशा

आदमी बने रहने की बाकी है अभिलाषा ।

दुनिया हमसे हम दुनिया से नाहिं

फिर भी बनी है बेगानी ,

आदमी की भीड़ में छिना छपटी है

कोई मानता मतलबी कोई कपटी है

भले बार-बार मौत पायी हो आशा

जीवित है आज भी

आदमी बने रहने की बाकी है अभिलाषा ।

मुसाफिर मकसद मंजिल थी परम्‌शक्‍ति

मतलब की तूफान चली है जग में ऐसी

लोभ-मोह,कमजोर के दमन में बह रही शक्‍ति

मंजिल दूर कोसों जवां है तो बस अंधभक्‍ति

दुनिया एक सराय नाहिं है पक्‍का ठिकाना

दमन-मोह की आग,

नहीं दहन कर पायी अर्न्‍तमन की आशा

अमर कारण यही,पोषित कर रखा है

आदमी बने रहने की अभिलाषा ।

सच दुनिया एक सराय है

मानव कल्‍याण की जवां रहे आशा

जन्‍म है तो मौत है निश्‍चित

कोई नहीं अमर चाहे जितना जोडे धन-बल

सच्‍चा आदमी बोये समानता-मानवता-सद्‌भावना

जीवित रखेगा कर्म यही मुसाफिरखाने की आशा

अमर रहे आदमियत विहंसती रहे

आदमी बने रहने की अभिलाषा ।

----.

चैन की सांस

भय है भूख है नंगी

गरीबी का तमाशा खिस्‍सों में छेद कई-कई

चूल्‍हा गरमाता है आंसू पीकर

आटा गीला होता है पसीना सोखकर ।

कुठली में दाने थमते नहीं

खिस्‍से में सिक्‍के जमते नहीं

स्‍कूल से दूर बच्‍चे भूख-भूख खेलते

रोटी नहीं गम खाकर पलते

जवानी में बूढे होकर मरते

कर्ज की विरासत का बोझ आश्रित को देकर ।

कैसे कैसे गुनाह इस जहां के

हाशिये का आदमी अभाव में बसर कर रहा

धनिखाओं की कैद में धन तड़प रहा

गोदामों में अन्‍न सड़ रहा

गरीब अभागे बदल रहे करवटें भूख लेकर ।

कब बदलेगी तस्‍वीर कब छंटेगा अधियारा

कब उतरेगा जाति-भेद का श्राप

कब मिलेगा हाशिये के आदमी को न्‍याय

कब गूंजेगा धरती पर मानवतावाद

कब जागेगा देश सभ्‍य समाज के प्रति स्‍वाभिमान

ये है सवाल दे पायेगे जबाव धर्म-सत्‍ता के ठेकेदार

काश मिल जाता,

मैं और मेरे जैसे लोग जी लेते

चैन की सांस पीकर

----.

-इतिहास

तपती रेत का जीवन अघोषित सजा है

वही भोग रहे है अधिकतर लोग

जिन्‍हें हाशिये का आदमी कहता है

आज भी आधुनिक समाज ।

फिक्र कहां होती तो

तपती रेत के जीवन पर पूर्ण विराम होता

गरीबी-भेद के दलदल में फंसा आदमी

तरक्‍की की दौड़ में शामिल होता आज।

कथनी गूंजती है करनी मुंह नोचती है

तपती रेत के दलदल में कराहता

हाशिये का आदमी तकदीर को कोसता है

जान गया है

ना कर्म का और ना तकदीर का दोष है

तरक्‍की से दूर रखने की साजिश है

तभी तो हाशिये का आदमी

पसीने और अश्रु से सींच रहा है

तपती रेत का जीवन आज ।

तरक्‍की से बेदखल आदमी की उम्‍मीदें टूट चुकी है

वह जी रहा है तपती रेत पर

सम्‍भावनाओं का आक्‍सीजन पीकर

तरक्‍की चौखट पर दस्‍तक देगी

जाग जायेगा विष-बीज बोने वालों के दिलों में

बुद्ध का वैराग्‍य और हर चौखट पर

दे देगी दस्‍तक तरक्‍की

यदि ऐसा नहीं हुआ तो आखिर में

एक दिन टूट जायेगा सब्र रच देगा इतिहास

आज का हाशिये का तरक्‍की से बेदखल समाज ।

----.

-अमृत-बीज

कसम खा लिया है,अमृत बीज बोने का

जीवन के पतझड़ में बसन्‍त के एहसास का

चल पड़ा लेकर खुली आंखों के सपने ।

दर्द बहुत है यारों राह में,

हरदम आघात का डर बना रहता है

पुराने घाव में नया दर्द उभरता है

मुश्‍किलों के दौर में भी जीवित रहते है सपने ।

अंगुलिया उठती है विफलता पर,

रास्‍ता छोड देने की मशविरा मिलती है

मानता नहीं जिद पर चलता रहता हूं

विफलता के आगे सफलता देखता हूं

कहने वाले तो यहां तक कह जाते है

मर जायेगे सपने, मेरी जिद को उर्जा मिल जाती है

ललकारता अमृत बीज से बोये, नहीं मर सकते सपने ।

कहने वाले नहीं मानते कहते,मिट जायेगी हस्‍ती इस राह में

कहता खा लिया है कसम बोने के इरादे अपने

हस्‍ती भले ना पाये निखार ,ना मिटेगे सपने ।

सपनों को पसीना पिलाकर

आंसुओं की महावर से सजाकर

उजड़ी नसीब से उपजे चांद सितारों को मान देकर

चन्‍द अपनों की शुभकामनाओं की छांव में,

कलम थाम,विरासत का आचमन कर,

थाती भी तो यही है कलमकार के अपने ।

कैसे नहीं उगेगे अमृत बीज

राष्‍ट्र हित-मानवहित मे देखे गये खुली आंखों के सपने ।

---.

- एक मिनट का मौन

सकून ही नहीं यकीन भी तो है

तुम पर ! हो भी क्‍यों ना ? यही तो कमाई है विश्‍वास की।

पहले या बाद में मैं रख लूंगा या तुम

दो मिनट का नहीं एक मिनट काफी है ।

हादशों के शहर में आज ही तो बाकी है

कल क्‍या होगा प्यारे ? ना तो हम जानते ना तुम ।

आदमी के बदमिजाज से जान ही गये हो

भ्रष्‍टाचार, आतंकवाद, क्ष्‍ोत्रवाद, धर्मवाद जातिवाद

खाद्यान्नों की मिलावट, दूषित वातावरण

और दूसरी साजिशें कब मौत के कारण बन जाये

दोस्‍त ना तुम जानते हो ना हम

एक बात जान गये है ये साजिशो की ज्‍वालामुखी

कभी भी जानलेवा साबित हो सकती है ।

काश ये ज्‍वालामुखी शान्‍त हो जाती सदा के लिये

परन्‍तु विश्‍वास की परतें जम तो नहीं रही है ।

हां सकून और यकीन तो है दोस्त

तुम मेरी और मैं तुम्‍हारी

मौत पर दो की जगह एक मिनट का

मौन तो रख ही लेंगे कोई तूफान क्‍यों ना उठे

और फिर भले ही हम खो जाये ब्रहमाण्‍ड में

दुनिया की अमन शान्‍ति के लिये।

---.

- हंसना याद नहीं

हंसना याद नहीं मुझे कब हंसा था पहली बार

आंख खुली तो अट्‌टहास करते पाया

नफरत-तंगी और मानवीय-अभिशाप की ललकार ।

हंसना तब भी अपराध था आज भी है

शोषित आम आदमी के दर्द पर

ताककर खुद के आंगन की ओर

अभाव- भेद से जूझे कैसे कह दूं

मन से हंसा था कभी एक बार ।

पसरी हो भय-भूख जब आम आदमी के द्वार

नहीं बदले हैं कुछ हालात कहने भर को बस है

तरक्‍की दूर है आज भी आम आदमी से

वह भूख-भय भूमिहीनता के अभिशाप से व्‍यथित

माथे पर हाथ रखे जोह रहा बार-बार ।

सच कह रहा हूं

हंस पड़ेगा शोषित आम-आदमी जब एक बार

सच तब मैं सच्‍चे मन से हंसूंगा पहली बार...

---.

लेखक परिचय

नन्‍दलाल भारती

कवि,कहानीकार,उपन्‍यासकार

शिक्षा - एम.ए. (समाजशास्‍त्र) एल.एल.बी. (आनर्स )

पोस्‍ट ग्रेजुएट डिप्‍लोमा इन ह्‌यूमन रिर्सोस डेवलपमेण्ट (PGDHRD)

जन्‍म तिथि एवं जन्‍म स्‍थान- 01.01.1963 ग्राम-चौकी ।ख्‍ौरा।पो.नरसिंहपुर जिला-आजमगढ ।उत्‍तर प्रदेश।

प्‍्राकाशित पुस्‍तकें

ई पुस्‍तकें............

उपन्‍यास-अमानत, प्रतिनिधि पुस्‍तकें- काली मांटी ,निमाड की माटी मालवा की छावं,ये आग कब बुझेगी एवं अन्य

उपन्‍यास-दमन,चांदी की हंसुली एवं अभिशाप

कहानी संग्रह -मुट्‌ठी भर आग,हंसते जख्‍म एवं सपनों की बारात।

लघुकथा संग्रह-उखड़े पांव / कतरा-कतरा आंसू एवं एहसास ।

काव्‍यसंग्रह -कवितावलि ,काव्‍यबोध

आलेख संग्रह- विमर्श एवं अन्य

सम्‍मान स्‍वर्ग विभा तारा राष्‍ट्रीय सम्‍मान-2009,मुम्‍बई ।चयनित।

विश्‍व भारती प्रज्ञा सम्‍मान,भोपल,म.प्र.,

विश्‍व हिन्‍दी साहित्‍य अलंकरण,इलाहाबाद।उ.प्र.।

लेखक मित्र ।मानद उपाधि।देहरादून।उत्‍तराखण्ड।

भारती पुष्‍प। मानद उपाधि।इलाहाबाद,

भाषा रत्‍न, पानीपत ।

डां.अम्‍बेडकर फेलोशिप सम्‍मान,दिल्‍ली,

काव्‍य साधना,भुसावल, महाराष्‍ट्र,

ज्‍योतिबा फुले शिक्षाविद्‌,इंदौर ।म.प्र.।

डां.बाबा साहेब अम्‍बेडकर विश्‍ोष समाज सेवा,इंदौर

विद्‌यावाचस्‍पति,परियावां।उ.प्र.।

कलम कलाधर मानद उपाधि ,उदयपुर ।राज.।

साहित्‍यकला रत्‍न ।मानद उपाधि। कुशीनगर ।उ.प्र.।

साहित्‍य प्रतिभा,इंदौर।म.प्र.।

सूफी सन्‍त महाकवि जायसी,रायबरेली ।उ.प्र.।एवं अन्य

आकाशवाणी से काव्‍यपाठ का प्रसारण ।कहानी, लघु कहानी,कविता और आलेखों का देश के समाचार irzks@ifrzdvksaमें www.swargvibha.tk,www.swatantraawaz.com rachanakar.com / hindi.chakradeo.net www.srijangatha.com,esnips.con, sahityakunj.net,chitthajagat.in,hindi-blog-podcast.blogspot.com, technorati.jp/blogspot.com, sf.blogspot.com, archive.org ,ourcity.yahoo.in/varanasi/hindi, ourcity.yahoo.in/raipur/hindi, apnaguide.com/hindi/index,bbchindi.com, hotbot.com, ourcity.yahoo.co.in/dehradun/hindi, inourcity.yaho.com/Bhopal/hindi,laghukatha.com ई-पत्र पत्रिकाओं में रचनाये प्रकाशित एवं जनप्रवाह।साप्‍ताहिक।ग्‍वालियर द्वारा उपन्‍यास-चांदी की हंसुली का धारावाहिक प्रकाशन

सदस्य

इण्‍डियन सोसायटी आफ आथर्स ।इंसा। नई दिल्‍ली

साहित्‍यिक सांस्‍कृतिक कला संगम अकादमी,परियांवा।प्रतापगढ।उ.प्र.।

हिन्‍दी परिवार, इंदौर ।मध्‍य प्रदेश।

आशा मेमोरियल मित्रलोक पब्‍लिक पुस्‍तकालय,देहरादून ।उत्‍तराखण्ड।

साहित्‍य जनमंच,गाजियाबाद।उ.प्र.।

म.प्र..लेखक संघ,म.प्र.भोपाल एवं अन्य

सम्‍पर्क सूत्र आजाद दीप, 15-एम-वीणा नगर ,इंदौर ।म.प्र।-452010

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