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धूमकेतु की हास्य कविता – मेकअप उतर जाने के बाद

दिख रही है मंच पर, जो सुन्दरी ऐ दोस्तों कल दिखेगी भूतनी, मैकप उतर जाने के बाद। कर रही है नाज अपने खेत और खलिहान पर घास फूंस रह जायेगी, साजन के घर जाने के बाद। सप्त सुर की ढोलकी सी, बज रही है रात दिन ढपला वो रह जायेगी, चमड़ी उधड़ जाने के बाद। रंग रोगन से सजाई, सेकण्ड हैण्ड दूकान को कौन पूछेगा उसे कबाड़ी के दर जाने के बाद। कांच की दूकान में जब पड़ती है पत्थर की चोट कौन पूछेगा प्रिय, दर्पण दरक जाने के बाद। साधु सन्यासी महात्मा मुल्ला हो या पादरी खाक में मिल जाएंगे, पतझर में झर जाने के बाद। धीरे-धीरे भोगिये, जीवन के आनंद को क्या रखा है देखना, बसंत गुजर जाने के बाद। चढ़ गई है मंच पर, फिर देखिए सुर की नदी कीचड़ ही कीचड़ बचेगी, नदिया उतर जाने के बाद। रात दिन नोटों की बारिश, खा रही दीमक जिन्हें मिट्टी में मिल जायेगी, ठुइयाँ के उर जाने के बाद। शोहरतें मिलती है केवल, एक सीमा तक हुजूर जमीन पर आ जाएगी, पर के कतर जाने के बाद। --- धूमकेतु के हास्य व्यंग्य काव्य संग्रह – देख रहे हो भोलेनाथ से साभार.

योगेन्‍द्र कुमार वर्मा के कुछ मुक्तक

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मुक्‍तकत्‍यागकर स्‍वार्थ का छल भरा आवरण तू दिखा तो सही प्‍यार का आचरण शूल भी फिर नहीं दे सकेंगे चुभन जब छुअन का बदल जाएगा व्‍याकरण ------.------ सत्‍य को त्‍यागकर व्‍यक्‍ति जीवित नहीं सत्‍य की राह में ग्‍लानि किंचित नहीं झूठ बेशक परेशान करता रहे पर कभी सत्‍य होता पराजित नहीं ------.------ भोर बचपन लगी तो सुहानी लगी दोपहर में जवानी दिवानी लगी जब ढली साँझ मुख पर पड़ीं झुर्रियाँ रात को मृत्‍यु ही राजरानी लगी ------.------ द्वंद हर साँस का साँस के संग है हो रही हर समय स्‍वयँ से जंग है भूख - बेरोज़गारी चुभे दंश - सी ज़िन्‍दगी का ये कैसा नया रंग है ------.------ ; 2 द्धमंद शीतल सुगंधित पवन का कथन है निराला यहाँ रोशनी का चलन जुगनुओं के नयन की थकन को नमन हैं अधूरे सपन पर न कोई शिकन ------.------ प्‍यार इतना न मुझसे जताया करो बादलों को पता मत बताया करो ये पवन भी चुगलखोर-सी हो गई खुशबुओं को न यूँ ही उड़ाया करो ------.------ दर्द की दास्‍ताँ क्‍या कहूँ क्‍या लिखूँ बुझ रही हर शमा क्‍या कहूँ क्‍या लिखूँ कर रहीं खुदकुशी नित नई कोंपलें रो रहा आसमाँ क्‍या कहूँ क्‍या ल…

यशवंत कोठारी का आलेख : बच्‍चों को अपराध की दुनिया में कौन धकेलता है ?

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यदि आंकडे प्रमाण है कि तो पिछले दो-तीन दशकों में बाल अपराधियों और युवा वर्ग में हिंसा और पराध करने की प्रवृति में बहुत वृद्धि हुई हैं। 16 वर्ष से कम आयु के लगभग 1500 बच्‍चें जेल में बंद हैं। बड़े शहरों में युवाओं द्वारा किए जाने वाले अपराधों में निरंतर वृद्धि हो रही हैं। इन अपराधियों में आपराधिक प्रवृत्ति का विकास हाने का एक प्रमुख कारण हमारी दूषित शिक्षा पद्धति हैं। दस जमा दो हो या इससे पूर्व की पद्धति, सभी में अपराधों की रोकथाम या शिक्षार्थी को अपराधों की ओर जाने से रोकने का कोई प्रावधान नहीं हैं। बढ़ती बेरोजगारी, अनिश्‍चित भविष्‍य और शिक्षा की अर्थहीनता स्‍पष्‍ट हो जाने पर बालक, किशोर, युवा अपराधों की दुनिया में किस्‍मत आजमाते हैं। शुरू की सफलताएँ उन्‍हें और आगे जाने की ओर प्रवृत्त्‍ा करती हैं। समाजशास्‍त्रियों का मत है कि कानून का उल्‍लंघन करने वाले बच्‍चों के अन्‍दर अपराध के बीच प्रारंभिक वर्षों में स्‍कूलों में या कॉलेजों में पड़ जाते हैं और समय पाकर विकसित होते रहते हैं। लगभग हर अपराधी किसी न किसी मारक परिस्‍थिति का शिकार होता है। चोरी-चकारी, उठाईगिरी या ऐसे मामूली अपराधों का म…

संजय दानी की ग़ज़ल

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आईनों  से नहीं है  दुशमनी  मेरी , अक्श से अपनी डरती ज़िन्दगी मेरी। हुस्न ही है मुसीबत का सबब मेरा, क्यूं इबादत करे फ़िर बे-खुदी मेरी । साहिलों की अदा मंझधार के दम से। लहरों को पेश हरदम   बन्दगी  मेरी । घर वतन छोड़ आया हुस्न के पीछे, आज खुद पे हंसे   सरकशी मेरी । सूर्य   से क्यूं   नज़र लड़ाई    थी , खफ़ा नज़रों से अब रौशनी मेरी । सब्ज गुलशन समझ बैठा मै सहरा को अब    कहां   से बुझेगी  तशनगी    मेरी। शमा के प्यार मे मै जल चुका इतना मर के अब रो रही है खुदकुशी मेरी । मै बड़ी से बड़ी खुशियों को पकड़ लाया दूर    जाती गई     छोटी खुशी     मेरी। तू नहीं    तो      नशा काफ़ूर है दानी , इक नज़र ही तुम्हारी मयकशी मेरी । ----.

दीनदयाल शर्मा की हास्य कविताएँ - चिकोटियाँ

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चिकोटियां / दीनदयाल शर्मा खत्म होने लगा सैंस जिसकी लाठी उसकी भैंस। गिर गए दाम आँधी के आम। खत्म होने से ना डर चींटी के आ गए पर। रहा बात पे अड़ा चिकना घड़ा। धन बना न दूना लगा गया चूना। बातों का कहर उगले जहर। शक है लाला दाल में काला। मत बन होशियार पंख मत मार। बिक गए बाट उलट दी टाट। नहीं है अनाड़ी पेट में दाढ़ी। पुलिस ने डंडे मारे दिन में दिख गए तारे। पेट दिखा बाई मैं मौहल्ले की दाई। होगा वही जो होना घोड़े बेचकर सोना। मिल गई गोटी हाथ में चोटी। जीत गया जवान जान में आ गई जान। बेमतलब ना बोल जुबान को तौल। जीत ली लंका बज गया डंका। मत कर रीस दाँत पीस। ऐसे मत कुलबुला पानी का बुलबुला। मिट गए ठाट अब पेट काट। दोस्ती तगड़ी बदल ली पगड़ी। मंत्री बना लल्ला पकड़ लिया पल्ला। मान ली हार डाले हथियार। नहीं करना काम सुबह-शाम, सुबह-शाम। मीचे अक्खियां मारे मक्खियां। अब मत हो लाल बासी कढ़ी में उबाल। चल गई चाल गल गई दाल।। --- अध्यक्ष,  राजस्थान साहित्य परिषद्, हनुमानगढ़ संगम-335512

राजीव श्रीवास्तव की हास्य कविता – सब कुर्सी का खेल

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सबकुर्सीकाखेलबड़ी कुर्सी पे बैठ के मानस मचा रहा धमाल नहीं जनता के ये सब तो बस कुर्सी का कमाल लोग आगे पीछे घूमे जी-जी का राग अलापे सर -जी के पसंद हैं क्या ये पहले से भांपे कोई लेकर बैग घूमता कोई छतरी ताने सोसायटी में रोब जमता कि साहब हम को जाने लगा -लगा माखन सेर भर पीछे -पीछे भागे जो सर जी का काम पड़े तो रात-रात भर जागे घर का सारा काम करे ये सब्जी भी लाए जो सर जी की मैडम कह दे वो काम है भाए बचो को स्कूल छोड़ मैडम को कराए "शॉपिंग" अपने घर वालों को भूल कर सर से करे है "सेटिंग" सिर जी की तारीफ उन्हीं के मूह पे है करते सिर जी भी गर्व से हर बात पे हामी भरते सोच -सोच कर खूब इतराते देख के लंबी फौज सोचा जब से मिले है कुर्सी हो गए है मौज अपने घर पे दावत देकर साम करेंगे रोशन हर तरह से खुस करेंगे पाने को परमोसन एक ज़रा से बात पर किसी के समझ ना आई तेरे कोई वक्त नहीं ये कुर्सी का खेल है भाई जिस दिन कुर्सी पे बैठेगा दूजा कोई ऑफीसर नहीं कोई तेरी बात करेगा नहीं कहेगा सर-सर तेरे सामने ही तेरे चमचे होंगे बेगाने हर किसी को बोलेंगे के हम इन्हें ना जाने सोच रहा "राजीव दुनिया का है …

राजीव श्रीवास्तव की हास्य कविता - काले घने घुँघराले बाल

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काले घने घुँघराले ये शब्द, दो शब्दकोश से निकाल क्योंकि इनका बालों की लिए होता है इस्तेमाल ! कभी ये तीनों शब्द मुझे भी बहुत प्रिय थे , लगता था की जैसे ये मेरे लिए ही बने थे ! सर पे लहलाहाती खेती पे मुझ को था अभिमान , मेरी गर्लफ्रेंड को भी मेरे बालों पे था गुमान ! याद है कैसे प्यार से मेरे बालों पे हाथ फेरती थी , जलने वालों की नज़र मुझे ही टेरती थी ! हर पार्टी मैं बालों की तारीफ करते थे यार , मैं भी क्रीम और जेल लगा के देता नित-नये आकर ! कोई मुझे ऋतिक तो कोई संजय द्त्त पुकारता , मैं भी बड़े चाव से अपने बालों को निहारता ! याद है वो मनहूस घड़ी,बुरा हुआ था मेरा हाल , जब कंघी करी और देखा झड़ रहे थे मेरे बाल ! एक-एक कर लगे थे गिरने ,मेरा सर रहे थे छोड़ , लग रहा था जैसे जल्दी निकलने की लगी थी उनमें होड़ ! मेरे तो होश उड़ गये तब लोगों से ली राय , सोच रहा था किस कम्बख़त की मुझ को लग गयी हाय ! दही, माखन ,शहद, नींबू सब कुछ बालों मैं लगाया , पर कुदरत को कुछ और मंजूर था कुछ काम ना आया ! जड़ी-बूटी,दवाई और लगाए कई सारे तेल , पर मेरे सर पे लगते ही सभी हो गये फेल ! मेरा तो चेहरा बदल गया और आया नया रूप …

राजीव श्रीवास्तव की हास्य व्यंग्य कविता – मन की गंगा

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मन की गंगा गंगा मैली हो गयी घटा देश का मान गंगा को साफ करने का चला रहे अभियान एक और गंगा है जो सब के मन में बहती मुझे भी साफ करो ये दबी जुबां में कहती क्रोध जा मिला है इस में, नफ़रत ने जगह बनाई एक दूसरे का वध कर रहे,लड़ रहे है भाई-भाई छल-कपट से हो रही आरती,क्रोध से लगता भोग लहू से कर रहे अर्चना,नहा रहे सब लोग कभी जहाँ बस्ती थी सच्चाई, और सुन्दर थी काया आज अधर्म और अंधकार जा मिला, जब से कलयुग आया करना ही है साफ, तो कर साफ मन की गंगा नहीं तो वो दिन दूर नहीं ,जब होगा हर तरफ दंगा जो मन की गंगा साफ रहे तो गंगा भी तर जाए जो स्वच्छ मन ही लगाए डुबकी ,तो गंगा भी स्वच्छ हो जाए मन की गंगा को साफ करने का बता रहा उपाय काम-क्रोध, ईर्ष्या, देख कभी पास ना आय -- डॉक्टर राजीव श्रीवास्तव © copyright reserved with author

राजीव श्रीवास्तव की हास्य - व्यंग्य कविता - उदघाटन से पहले टूटा पुल

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उदघाटनसेपहलेटूटापुललाखों का निकला टेंडर और जेबें हो गयी फुल उद्घाटन से पहले देखो टूट गया था पुल जनता के मेहनत की कमाई इस पुल मैं हुई बर्बाद पर किसी के घर बन गये कोई हुआ आबाद पुल से नदी पार करने का सपना मन मैं थे संजोए सोच रहे थे उनके ख़ुशियों को किन के लग गई हाए नहीं पता इन्हें कि क्या टूटे पुल की कहानी घटिया सा सामान लगाया खूब करी मनमानी पुल से ज़्यादा इनको चिंता कमीशन की सताई सोच रहे थे ज़्यादा से ज़्यादा इससे करो कमाई बना के तैयार कर दी इन्होंने जिंदा लास पैसे देकर आकाओ से पुल कराया पास सजी खूब महफ़िल थी उस दिन हाउस हुआ था फुल नेता जी फीता काटे उससे पहले टूटा पुल सभी के सपने ऐसे टूटे जैसे टूटे कॉच नेता जी कह के चल दिए की कराव जाँच जनता को दे जाँच का लोलीपाप मामला किया था गुल देशद्रोही फिर मिल बैठे बनाने को नया पुल सोच रहा राजीव की उपर वाले ने किया अहसान जो पुल टूटता बाद मैं तो जाती कितनी जान --- डॉक्टर राजीव श्रीवास्तव मेडिकल कॉलेज हल्दवानी © copyright reserved by author

संजय जनागल की लघुकथाएँ

लघुकथाएंटुकड़ेसंजय जनागल‘‘साब, ये क्‍या सुनने में आ रहा है कि जाति आधारित जनगणना होने वाली है?'' चंपक मालिक के पाँव दबाते हुए बोला। ‘‘हाँ, तुमने सही सुना है।'' मालिक ने कहा। ‘‘लेकिन आप तो हमेशा जातिवाद मिटाने के पक्षधर रहे हैं? फिर ये?'' चंपक फिर बोला। चंपक की ओर मुँह करके मालिक ने कहा, ‘‘पार्टी को बचाने के लिए उनकी बात माननी पड़ी। पार्टी के दो टुकड़े होने की नौबत आ गई थी?'' ‘‘पार्टी के दो टुकड़े ?? मैं समझा नहीं।'' चंपक आँखें नीची करके बोला। ‘‘चंपकिया तू तो बहुत भोला है। अगर जाति आधारित जनगणना की मांग को ठुकरा देते तो अपनी पार्टी के कुछ कार्यकर्ता और शीर्ष अधिकारी मिलकर नई स्‍वतंत्र पार्टी बना लेते?'' ‘‘पार्टी को दो टुकड़ों में बंटने से तो आपने बचा लिया लेकिन क्‍या इस जाति आधारित जनगणना से देश कई टुकड़ों में नहीं बंट जायेगा।'' इस बार चंपक की आवाज़ में एक अजीब सा द्वेष था। परन्‍तु तब तक मालिक गहरी निद्रा में सो चुके थे। -- ऐसे ही....खरगोश को अपने जाल में फंसाने के लिए गीदड़ ने उसे कहा, ‘यदि तुम मेरे मित्र बन जाओ तो तुम्‍हारा कोई…

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य – साहब का कुत्ता

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व्‍यंग्‍य साहब का कुत्‍ता -यशवन्‍त कोठारीमेरे एक साहब हैं। आपके भी होंगे! नहीं हैं तो बना लीजिए। साहब के बिना आपका जीवन सूना है। हमारे साहब के पास एक कुत्‍ता है। आपके साहब के पास भी होगा। नहीं है तो आप भेंट में दीजिए, और फिर देखिये खानदान का कमाल! आप जिस तेजी के साथ दफ्‌तर में प्रगति की सीढ़ियां चढ़ने लगेंगे, क्‍या खाकर बेचारा कुत्‍ता चढ़ेगा! खैर तो साहब, हमारे साहब के कुत्‍ते की बात चल रही थी। मेरे साहब का यह कुत्‍ता अलसेसियन है या बुलडॉग या देसी, इस झगड़े में न पड़कर मैं आपको इस कुत्‍ते का नाम बताता हूं। साहब इसे प्‍यार से ‘मिकी' कहकर पुकारते हैं, मेमसाहब उसे ‘टिंकू' कहती हैं और साहब के साहबजादे इसे ‘रिंकू' समझते हैं। अलबत्‍ता ऐसा वफादार कुत्‍ता मैंने अपनी जिन्‍दगी में नहीं देखा! यह साहब, मेमसाहब और साहबजादे, सभी की सेवा में तत्‍पर रहता है। साहब के कुत्‍ते में कुछ बहुत ही महत्‍वपूर्ण गुण हैं, जो आम कुत्‍ते या आम आदमी में नहीं पाये जाते। इनमें से एक गुण है, आदमी की पहचान। साहब की कोठी के दरवाजे पर जो भी व्‍यक्‍ति आता है, उसका स्‍वागत यही करता है, और इसी पहली मुलाकात में प…

आपने अब तक पढ़ी तो होंगी बहुतेरी ग़ज़लें, किन्‍तु सबसे अलहदा है मोहतरिम राजेश विद्रोही की ग़ज़लें॥

--राजेश विद्रोही की ग़ज़लेंबेशक हम भी चाहेंगे कि वाज़िब मांगें पूरी हो।लेकिन ये क्‍या बात हुई कि चाहे जो मज़बूरी हो'असली है रुहानी रिश्‍ते अष्‍टावक्र बताते है। चमड़ी में क्‍या तो रक्‍खा है काली हो या भूरी हो॥ मिलना तो मन का होता है, तन तो सिर्फ बहाना है। ऐसा मिलना भी क्‍या मिलना, जो मिलना दस्‍तूरी हो॥ बहनों की रक्षा करना तो भाई पर है फर्ज सदा। वो फिर सीता-सावित्री हो, नज़मा हो या नूरी हो॥ ये मेरी अनमोल विरासत इसे ना कायरता समझो। तब तक नहीं आक्रमण करते जब तक नहीं जरुरी हो॥ और नहीं अभिलाषा कोई मालिक बस इतना कर दे।हर सुबहा चम्‍पा सी उजली हर सन्‍ध्‍या सिन्‍दूरी हो॥--- जीवन की अलबेली यादें। हैं विश्‍वस्‍त सहेली यादें॥ खट्टी-मीठी और चरपरी। कड़वी और कसैली यादें॥ नहीं पुरानी पड़ती हर्गिज़। लगती नित्‍य नवेली यादें॥ लाख सहेजो, लाख समेटो।रहती बिखरी फैली यादें॥ सुधियों की सुनी गलियों में।धूल भरी मटमैली यादें॥ जाने क्‍या कुछ सँग ले आती।आती नहीं अकेली यादें॥ --- आपने अब तक पढ़ी तो होंगी बहुतेरी ग़ज़ल।किन्‍तु सबसे अलहदा है मोहतरिम मेरी ग़ज़ल॥ मातहत बनकर गुजर करने से मर जाना भला।हो नहीं …

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

ग़ज़ल 43ये कंगन बज परस्‍पर कर रहे हैं बात यूं आली। अधूरी रह गयी लगती कोई चाह ज्‍यूं आली॥ चिहुक हैं हर्ष की या दर्द की सिसकी हैं क्‍या जानू , अभी निर्णय न कर पायी इसे क्‍या नाम दूं आली। छुपा बैठा हो भीतर तो भला हो क्‍या खबर हमको , वगरना दूर तक दिखता न कोई चारसू आली। लिपट कर ये तरुवर वल्‍लरी कहते चुहल करके, अगर परवान चढ़ ना हो तो किसी को थाम लूं आली। अरी ये ढ़ोर वय का क्‍या क्‍या करने को उतारु हैं, खड़ी हैं लाज बैरन बन के चरवाहा क्‍यों आली। ग़ज़ल 45 छोड़ कर जाना नहीं तू गाँव की दहलीज को शहर में तहजीब के पहरे कड़़े हो जायेंगे॥ इन खरोंचों को हिफाजत से रखोगे तो यही, जख्‍म आखिर एक दिन काफी बड़े हो जायेंगे। कब्र गहरी खोद कर के इस तरह पत्‍थर चुने, जैसे हो शुब्‍हा कि ये उठ कर खड़े हो जायेंगे। मर गये बेमौत इतने आज तो आँसू बहा कल सुबह अखबार के ये आँकड़े हो जायेंगे। चाँद ने मायूस हो कर चाँदनी से यूं कहा, अपना क्‍या होगा अगर तारे बड़े हो जायेंगे। इस कदर जज्‍बात को छेड़ा करो न रात दिन, हैं बड़े मासूम ये फिर चिड़च़िड़े हो जायेंगे। ग़ज़ल 60 खरे मोती बनी जब जब बही बूंदी पसीने की। ह़कों से रह गयी वंचित…

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता

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भूख से जब अंतड़ियां पेट में दर्द देती हैजब रिरियाती नई पीढ़ीमौत की चादर ओढ़ लेती हैतब तनी हुई मुट्‌ठीहाथ में बन्‍दूक थाम लेती हैतब बुन्‍देलखण्‍ड के बीहड़ मेंबगावत की जंग शुरू होती हैतब सिसकती ममता हैकंलकित मानवता होती हैस्‍तब्‍ध कर देने वाली शांतिचीत्‍कार की ध्‍वनि सन्‍नाटा तोड़ती है।सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री राजसदन-120/132, बेलदारी लेन,लालबाग, लखनऊ

श्याम गुप्त की ग़ज़ल

आशनाई
यूं तो खारों से ही अपनी आशनाई है |
आंधियां भी तो मगर हमको रास आईं हैं |
मुश्किलों का है सफ़र जीना यहाँ पर ऐ दिल,
हर एक मुश्किल नई राह लेके आई है  ||
तू न घबराना गर राह में पत्थर भी मिलें ,
पत्थरों में भी उसी रब की लौ समाई है |
डूब कर जान लो इसमें है अभी दरिया गहरा ,
कौन जाने न रहे कल को ये गहराई है |
आशिकी उससे करो श्याम' हो दुश्मन कोई,
दोस्त , दुश्मन को बनाए वो आशनाई है ||
डा श्याम गुप्त

शशांक मिश्र ‘‘भारती'' की कविताएं

एक-मेघ राज आये हैं ----------- गगन की गोद से पहाड़ों की ओट से मेघराज आये हैं, गरमी दूर करने धरा में नमी भरने बादल जी भाये हैं, किसान राह देखें मोर भी बाट जोहें बच्‍चों ने गीता गाये हैं, मेंढक जी बोले मछली जी तोले जुगनू जगमगाये हैं, झींगुर की झिक-झिक कोई बोला टिक-टिक मनभावन आये हैं, बुँद जो गिरती हैं टप टप करती है चुनरी धरा की ले हरिचंदन करने को मेघराज आये हैं॥ (प्रकाशनः-देवसुधाः-2009 पृष्‍ठ-54 से साभार) दो-अधखिली कली --------- शशांक मिश्र ‘‘भारती'' तू- सो रही है अपने को चिरनिद्रा में विलीन किये न किसी के आने की चाह और- न ही जाने की आस सिर्फ- अपने में ही लीन विचरण कर रही है स्‍वप्‍न लोक में। कली- तू अभी खिली नहीं है लेकिन- तेरी चिर निद्रा का अवसान होते ही तेरी पंखुड़ियां खिल जाएंगी, और- बन जाएगी तू- स्‍वप्‍न लोक से बाहर आकर अपनी गहन निद्रा का त्‍याग कर कली से पुष्‍प! तेरे खिल जाने से समीप आकर गुन-गुनाएंगे भौंरे तेरा मकरन्‍द लेकर अपनी क्षुधा मिटायेंगे, और- अपनी व्‍यथाओं की गाथा तुझको- मधुर स्‍वरों में सुनाएंगे। तेरी सुगन्‍ध जब फैलेगी अथक वायु के द्वारा तब- हर्षित हो उठेंगे सभ…

यशवन्त कोठारी का आलेख - प्रकाश

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अमावस्‍या की काली अंधेरी रात को प्रकाशित करता है - प्रकाश। अंधकार से प्रकाश की ओर यह यात्रा हमें बताती है कि प्रकाश कितना महत्‍वपूर्ण है, जीवन तथा प्रकाश पर्व दोनों के लिए। प्रकाश की एक वैज्ञानिक विवेचना प्रस्‍तुत है। वास्‍तव में प्रकाश वह साधन या माध्‍यम है जिसकी सहायता से हम वस्‍तुओं को देख सकते हैं, मगर आश्‍चर्य की बात है कि प्रकाश स्‍वयं अदृश्‍य है। न्‍यूटन ने सर्वप्रथम प्रकाश के गुणों का विधिवत अध्‍ययन किया। उनके अनुसार प्रकाश का कणों के रूप में संचरण होता है, प्रकाश परिवर्तित होता है, वर्तित होता है तथा सूर्य के सफेद प्रकाश में सात रंगों का मिश्रण है। वास्‍तव में प्रकाश एक प्रकार की ऊर्जा है तथा ऊर्जा के अन्‍य रूपों यथा ध्‍वनि, विद्युत, ऊष्‍मा आदि की तरह एक से गुणों से युक्‍त है। प्रकाश को ऊर्जा के अन्‍य रूपों में बदला जा सकता है। न्‍यूटन ने यह भी बताया कि प्रकाश के कण गेंद की तरह टकराते हैं और रंग पैदा करते है। बाद में जाकर ह्यूजेंस नामक वैज्ञानिक ने प्रकाश की तरंग के सिद्धान्‍त का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार प्रकाश कणों से नहीं तरंगों से बनता है। थामस यंग ने आगे जाकर बताया कि …

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा का व्यंग्य – भ्रष्टाचार का खात्मा

लगता है जैसे चाचा दिल्‍लगी दास अब इस भ्रष्‍टाचार से काफी आजिज आ चुके थे, नाम सुना नहीं कि भड़क उठते थे। मगर आज जब से भ्रष्‍टाचार मुक्त समाज का नाम सुना है पुलक उठे हैं। सो चाचा बोले कि भतीजे इस भ्रष्‍टाचार के हटते ही मुल्‍क के मौजूदा तमाम मसअलात का खुद-ब-खुद तसफिया निकल जाएगा जैसे कि बेरोजगारी तो इस भ्रष्‍टाचार के खात्‍में के साथ ही इस मसअले का खात्‍मा समझो। क्‍योंकि फिर सरकारी नौकरियों में रिश्‍वत तो रहेगी नहीं,ऐसे में कौन जाना चाहेगा इनमें,और फिर कोई भी रोजगार कार्यालय में अपना नाम दर्ज नहीं करवाएगा सबको पता होगा कि जब रिश्‍वत ही नहीं रही और उपर से काम भी करना पड़ेगा तो फिर प्राइवेट सेक्‍टर क्‍या बुरा है। आगे चलकर सरकार को नियम भी बनाना पड़ सकता है कि प्रत्‍येक व्‍यक्ति को कम से कम इतने वर्ष तो अनिवार्य रूप से अपनी सेवाएं किसी सरकारी महकमें में देनी पड़ेगी। एक मसअला है महंगाई सो इसकी भी भ्रष्‍टाचार के साथ ही खात्‍मा हो जाएगा। जानते हो मुल्‍क में मूल्‍य वृद्धि का कारण क्‍या है ? वो है सरकारी खरीद,जिसमें तीन रुपए के क्रीत सामान का तेरह रुपए का बिल बनवाया जाता है और बिल बनाते-बनाते दुक…

विजय वर्मा के हाइकु – जीवन मृत्यु

हाइकु 
जीवन-मृत्यु 
--  प्रत्येक क्षण  जीवन का,है बोध  का अवसर. अनावृत हो रहस्य नया,पढो  मंत्र सस्वर . रहो ना सिर्फ  जी लेने में जीवन छोड़ो असर. कब चेतोगे? आयी अब तो बस  अंत-पहर आपाधापी में  बीता जीवन ,अब  जरा ठहर. मृत्यु को जानो नहीं तो भटकोगे  जीवन-भर.  --- नोट;हाइकु ५-७-५ अक्षरों की त्रिपदी है
v k verma
vijayvermavijay560@gmail.com

रवि भारद्वाज की लघुकथा - पनघट

मेरी पृष्‍ठभूमि गांव की है, जहां मैंने अपने बचपन के 16 साल व्‍यतीत किये थे, मुझे अक्‍सर घर में पानी भरने का काम सौंपा जाता था, गाय, बैल,भैंस के लिये तो पानी बराबर चाहता था, मुझे उस समय बहुत गुस्‍सा आया करता था। मैं अपनी दो छोटी छोटी बाल्‍टियां लेकर कुएं पर जाता था। मुझे उस समय कुएं से पानी निकालने की मनाही थी। अक्‍सर तो कुए के जगत पर औरतें ही रहती थी शायद वह ही ऐसा स्‍थान था जहॉ वो अपने दिल की बात अपने साथियों से कर सकती थी किसकी सास ने क्‍या कहा......... किसका देवर कैसा है.......... किसकी बहु ने अपनी सास को खरी खोटी सुना दी,......... किसकी बहु कितना दहेज लाई है,आदि आदि.............जिस चीज को घर पर नहीं कह पाती थी और जिसका उन्‍हें अजीर्ण हो जाया करता था वह अजीर्ण पनघट चूर्ण खाकर ठीक हो जाता था। अक्‍सर जब महिलायें पनघट पर रहती थी तो मेरी बाल्‍टियां जल्‍द भर जाती थी.............. पुरूषों के मामले में मुझे काफी देर तक इन्‍तजार करना पड़ता था........... अक्‍सर लोग मुझसे अपनी बीड़ी सिगरेट, पान तम्‍बाकू मंगाया करते थे तब कहीं जाकर वो मेरी बाल्‍टियों में पानी दिया करते थे। मेरे खेलने का सारा …

योगेन्‍द्र वर्मा ‘व्‍योम' की ग़ज़लें

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ग़ज़ल आज फिर अख़बार की ये सुर्खियाँ हैं । गाँव सहमे-से डरी-सी बस्‍तियाँ हैं ॥ कह रहा है ज्‍वार भाटा सिंधु से यह । अब सफ़र में और कितनी क़िश्‍तियाँ हैं ॥ रात भर रोयी सुबककर चाँदनी यूँ । अश्‍क़ हाथों में सहेजे पत्तियाँ हैं ॥ मृत्‍यु भी तो जन्‍म का इक रूप ही है । सोच अपनी और अपनी दृष्‍टियाँ हैं ॥ चिट्ठियाँ तो हो गईं हैं गुमशुदा अब । याद करने को बचीं बस हिचकियाँ हैं ॥ आज कुहरे का लगा दफ़्‍तर सुबह से । धूप की खारिज हुईं सब अर्जि़याँ हैं ॥ फूल बम बिस्‍फोट में जबसे जले कुछ । ‘व्‍योम' दहशत में तभी से तितलियाँ हैं ॥ ग़ज़ल अब किसी घर में न कोई तीरग़ी क़ायम रहे । हो यही कोशिश सभी की रोशनी क़ायम रहे ॥ हर तरफ छाया हुआ है खौफ का कुहरा घना । है ज़रूरी अम्‍न की अब धूप भी क़ायम रहे ॥ ज़िन्‍दगी में साथ हैं परछाइयों सी उलझनें । पर हमेशा हौंसलों में ज़िन्‍दगी क़ायम रहे ॥ हो बुज़ुर्गों की दुआओं का असर कुछ इस तरह । हम तरक़्‍की भी करें तहजीब भी क़ायम रहे ॥ गीत लिख या फिर ग़ज़ल लेकिन हमेशा ध्‍यान रख । ‘व्‍योम' तेरी शायरी में ताज़गी क़ायम रहे ॥ ग़ज़ल बताता है हुनर हर शख्‍़स को वह दस्‍तकारी का । ज़रूर…

गोपी गोस्वामी की कविता – मैं यहीँ रहता हूँ

मैं यहीं रहता हूँइसी पेड़ के नीचेअकेला, उजाड़या शायद कबाड़कभी बैठा, कभी लेटा,कभी अधलेटाकभी ओढ़ता हूँ चीथड़ेऔर कभी नग्नरहता हूँकुत्तों ने भोंकनाछोड़ दिया हैपर इंसानों को मेरीपरछाई छू जाने भर सेउबकाई आती हैकौन हूँ, क्या हूँ, कहाँ से आयानहीं जानताबस बुदबुदाता हूँ कुछमैले से बेमेल शब्दमैं यहीं रहता हूँइसी पेड़ के नीचेदिन-भर, इधर-उधरकूड़े के ढेर मेंघूमता हूँजो कुछ भीअपना सा लगता हैभर लेता हूँएक बोरी मेंजो कुछ भी फेंका जाता हैमेरी ओरखा लेता हूँखाली दुत्कार और फटकारसे पेट नहीं भरतातो कभी कभीखा जाता हूँ अखबार भीमैं यहीं रहता हूँइसी पेड़ के नीचेएक ऐसी दुनिया मेंजो अलग हैजैसे घसीट कर रख दी गई हो एक कोने मेंजहाँ केवल मैं हूँखुद से बतियाता हुआजब कभी इस दुनिया सेनिकला तो पत्थर मारकर फेंक दिया गयावापसइसी पेड़ के नीचेजहाँ अब भी पड़ा हूँमैं यहीं रहता हूँइसी पेड़ के नीचेआज भी लौटा हूँसिर पर पत्थर खा करशायद सफ़ेद होगातुम्हारी दुनिया मेंपर मेरी दुनिया में ये लाल हैजो मेरे सिर से रिसता हुआमेरे चेहरे पर फ़ैल रहा हैरात गुजर रही हैबारिश हो रही हैपर मेरा शरीर जल रहा हैक्या कल मेरी दुनिया में सुबह होगी?

प्रमोद भार्गव का आलेख – भूख और सड़ते अनाज का अर्थशास्‍त्र

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हमारे देश में सड़ता अनाज इंसान की प्राकृतिक भूख की जरूरत से नहीं लाभ-हानि के विश्‍वव्‍यापी अर्थशास्‍त्र से जुड़ा है। इसलिए चुनिंदा संपादकों के साथ बातचीत में अर्थशास्‍त्री प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को यह कहने में कोई आत्‍मग्रंथि परेशान नहीं करती कि यदि अनाज को यों ही भूखों को बांट दिया गया तो किसानों को पैदावार के लिए प्रोत्‍साहित नहीं किया जा सकता। क्‍या विडंबना है कि आर्थिक मंदी के दौर में जब औद्योगिक घरानों को बडे़ पैकेज दिए तब क्‍यों यह बात नहीं सोची गई कि प्रोत्‍साहन पैकेजों से उद्योगपति ज्‍यादा औद्योगिक उत्‍पाद बाध्‍य नहीं होंगे ? यही नही कंपनियों की दी जाने वाली अनेक प्रकार की छूटें (सब्‍सिडी) जन कल्‍याण योजनाओं के खर्च से चार गुना ज्‍यादा हैं। छूट के बावजूद देश के प्रमुख सौ उद्योगपतियों पर 1.41 लाख करोड़ रूपये कर के रूप में बकाया हैं। मौजूदा बजट में ही गरीबों की खाद्य सुरक्षा की दुहाई देने वाली सरकार ने कुटिल चतुराई से 450 करोड़ रूपये की छूट की कटौती की है। लेकिन ये सब तथ्‍य इसलिए नजरअंदाज कर दिए जाते हैं क्‍योंकि भूख और सड़ते अनाज का भी अपना एक अर्थशास्‍त्र है, जिसकी बहाली…

प्रमोद भार्गव का आलेख - ये भी हैं खोजी वैज्ञानिक

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भारत में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, लेकिन शालेय शिक्षा व कुशल-अकुशल की परिभाषाओं से ज्ञान को रेखांकित किए जाने की विवशता के चलते केवल कागजी काम से जुड़े डिग्रीधारी को ज्ञानी और परंपरागत ज्ञान आधारित कार्य प्रणाली में कौशल-दक्षता रखने वाले शिल्‍पकार और किसान को अज्ञानी व अकुशल ही माना जाता है। यही कारण है कि हम देशज तकनीक व स्‍थानीय संसाधनों से तैयार उन आविष्‍कारों और आविष्‍कारकों को सर्वथा नकार देते हैं जो ऊर्जा, सिंचाई, मनोरंजन और खेती की वैकल्‍पिक प्रणालियों से जुड़े होते हैं। जबकि जलवायु संकट से निपटने और धरती को प्रदूषण से छुटकारा दिलाने के उपाय इन्‍हीं देशज तकनीकों में अंतर्निहित हैं। औद्योगिक क्रांति ने प्राकृतिक संपदा का अटाटूट दोहन कर वायुमण्‍डल में कार्बन उत्‍सर्जन की मात्रा बढ़ाकर दुनिया के पर्यावरण को जिस भयावह संकट में डाला है उससे मुक्‍ति के स्‍थायी समाधान अंततः देशज तकनीकों से वजूद में आ रहे उपकरणों व प्रणालियों में ही तलाशने होंगे। भारतीय वैज्ञानिक संस्‍थाएं और उत्‍साही वैज्ञानिकों को नौकरशाही के चंगुल से मुक्‍ति भी इन्‍हीं देशज मान्‍यताओं को प्रचलन का बढ़ावा देने से ही …

हिंदी के प्रसिद्ध कवियों के प्रेमगीत

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हिंदी में प्रेमगीत ज्यादा नहीं हैं, और जो माल उपलब्ध हैं, उसमें भी दिलचस्प और हृदयग्राही गीत तो बहुत ही कम हैं. प्रस्तुत है हिंदी के कुछ प्रसिद्ध कवियों के प्रेमगीत – दामिनी बन प्यार की मुझको निहारा है जानता हूँ, यह बुलाने का इशारा है. - देवराज दिनेश चाँद हँसता वहाँ, ज्वार उठता यहाँ शून्य कितना वहाँ, तुम नहीं हो जहाँ तुम जहाँ हो वहीं हँस रही नीलिमा तुम जहाँ हो वहीं है शरद् पूर्णिमा - पोद्दार रामावतार ‘अरूण’ मेरी भूली पहिचान न मुझसे मांगो तुम हँस कर मेरा प्यार न मुझसे मांगो - भगवतीचरण वर्मा अपनी दुनिया में मैं मस्त हूँ, जवान हूँ फागुन की गेहूँ हूँ, सावन का धान हूँ बिरहा की जोगिनी बनाओ ना पिया बार बार बाँसुरी बजाओ ना पिया - रामदरश मिश्र तुम जानती सब बात हो, दिन हो कि आधी रात हो मैं जागता रहता कि कब, मंजीर की आहट मिले मेरे कमल-मन में उदय, किस काल पुण्य प्रभात हो किस लग्न में हो जाए कब, जाने कृपा भगवान की - दिनकर लौटे क्या मोहन मधुवनियाँ, बाजे राधा की पायलिया मह मह महक रहीं मंजरियाँ, कुहु कुहु कुहुक रही कोयलिया; दूर कहीं बाजे खंजरिया, छूम छनन गूंजे पैंजनियाँ कहीं अहीरों की छोकरियाँ, नाचें…

मुमताज़ एवं टी एच खान कविताई जुगलबंदी – प्यार का रंग

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(प्रस्तुत कविता मुमताज एवं टी. एच. खान (पति-पत्नी) द्वारा संयुक्त रूप से लिखी गई है. )आखिर में सिर्फ़ प्यार ऐसा रंग दिखाता है,परिवार को अपने, सुखी परिवार बनाता है।दूर हो जाती है हर मुसीबत हँसते - हँसते छँटता है अँधेरा, उजाला जगमगाता है।कभी तोड़ सकता नहीं कोई इस घरौंदे को,भाग्य अपना वो, इस तरह मिलके बनाता है।साथ हो ही जाता है जनम -जनम का इस तरह,वियोग एक पल का भी, इस मन को तड़पाता है।ज़िन्दगी में बिना प्यार के आती नहीं खुशबूलहलहाता हुआ मन का गुलशन मुरझाता है।मतभेद हों दूर सबके ये हमारी दुआ है,त्याग दें हम वो ख़्याल, जो दूरियाँ बढ़ाता है।-0-प्रस्तुति – रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

प्रमोद भार्गव का आलेख – ज्यादा मुश्‍किल में आ गया है विदेशी बैंकों में जमा कालेधन

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खासतौर से स्‍विट्‌जरलैंड के बैंकों में जमा भारत के कालेधन की वापसी अब और मुश्‍किल हो गई है। क्‍योंकि स्‍विस सरकार से दोहरे कराधान समाप्‍त करने के लिए संशोधित प्रोटोकॉल पर दस्तखत करते वक्‍त भारत सरकार वह वह सख्‍ती नहीं दिखा पाई जो कालाधन वापिसी के लिए जरूरी थी। अंतर्राष्ट्रीय स्‍तर पर होने वाले ऐसे किसी भी दोहरे समझौते में राष्‍ट्रीय हित सर्वोपरि होने चाहिए। ऐसे हालात में भारत सरकार शर्त रख सकती थी कि भारतीयों के जमा कालेधन की सूची भारत को सौंपी जाए। लेकिन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा लोकसभा में दिये बयान से साफ हो गया है कि स्‍विस बैंकों में इस समझौते से पूर्व जमा कराये धन पर इस संधि की कोई शर्त लागू नहीं होगी। जबकि स्‍विस बैंकों से अमेरिका और जर्मनी जैसे देशों ने वहां की सरकार को हड़का कर अपने देशों का बड़ी मात्रा में जमा कालाधन वसूल लिया है। इससे जाहिर होता है कि देश की केन्‍द्र सरकार स्‍विट्‌जरलैण्‍ड सरकार पर वाजिब दबाव बनाना नहीं चाहती क्‍योंकि उसके लिए धन वापिसी की कार्रवाई हवन करते हाथ जलाने वाली कहावत की तरह है। कुछ समय पहले संयोगवश विदेशी बैंकों में जमा काले धन की वापसी …

प्रमोद भार्गव का आलेख - हर तीसरा भारतीय भ्रष्‍ट

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ह शीर्षक नहीं कथन है जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुए केंद्रीय सतर्कता आयुक्‍त (सीवीसी) प्रत्‍यूष सिन्‍हा ने कहा है। उनका दावा है कि देश के तीस फीसदी भारतीय पूरी तरह भ्रष्‍ट हो चुके हैं। मसलन प्रत्‍येक तीन में से एक व्‍यक्‍ति पूरी तरह भ्रष्‍ट है। उन्‍होंने यह भी कहा कि बमुश्‍किल बीस प्रतिशत लोग पूरी तरह ईमानदार माने जा सकते हैं। उनका यह कहना अतिरंजित नहीं है। जिस देश में भ्रष्‍टाचार को सामाजिक स्‍वीकृति मिल चुकी हो वहां इसका फैलना स्‍वभाविक जरूरत बन जाती है। वैसे भी भ्रष्‍टाचार पर नजर रखने वाली सर्वोच्‍च संस्‍था ट्रांपैरेंसी इंटरनेशनल भारत को भ्रष्‍टतम देश की सूची में चौरासीवें स्‍थान पर रखा है। संस्‍था ने भारत को 10 में से 3.4 अंक दिये हैं। दुनिया के सबसे कम भ्रष्‍ट देश में न्‍यूजीलैंड का स्‍थान सबसे ऊपर है और इसे 10 में से 9.4 अंक दिये हैं। जबकि सबसे भ्रष्‍ट देश सोमालिया को 1.1 अंक दिये गए है। जो राष्‍ट्रीय संपत्ति गरीब की भूख, कुपोषण, अशिक्षा दूर करने और स्‍वावलंबन का पर्याय बनना चाहिए थी, वह भ्रष्‍ट तंत्र को विकसित कर राष्‍ट्रीय संपत्‍ति को निजी संपत्‍ति में बदलने का काम कर रही है। …

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