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एम. जे. अकबर का आलेख - लालच अब सत्ताधारियों का नया धर्म है…

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लालच अब एक नया धर्म बन चुका है। उसके अलावा अब और कुछ पवित्र नहीं रह गया है : न अफसरशाही के सर्वोच्च दफ्तर, न मुख्यमंत्री, न सेना प्रमुख और न ही शीर्ष नौकरशाह, जिनसे होकर फाइलें गुजरती हैं। अगर युद्ध में जान गंवाने वाले सैनिकों की विधवाओं के लिए हाउसिंग सोसायटी में स्वीकृत फ्लैटों को चुराना हो, तो इनमें से हर कोई कारगिल के शहीदों के खून के साथ दगाबाजी करने को तैयार हो जाएगा।
शर्म नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। लालच हमेशा पाखंड के पर्दे के पीछे पनपता है। लोकतंत्र में पाखंड एक बड़ा प्रलोभन है, क्योंकि समझौतों की शुरुआत हमेशा यथार्थवाद या सेवा के नाम पर होती है। चुनाव में होने वाले वास्तविक खर्च और आधिकारिक रूप से स्वीकृत धनराशि के बीच का फासला ही भ्रष्टाचार का सबसे अहम औजार है, क्योंकि तब अवैध ‘खैरात’ लेने को भी न्यायोचित करार दिया जा सकता है।
घूस के लिए खैरात एक शिष्ट मुहावरा है। पाखंड की दरुगध अब सत्ता और संस्थानों के सभी स्तरों पर व्याप्त है। कारगिल के शहीदों की अमानत पर डाका डालने वाले अफसरों की फेहरिस्त हमें शर्मिदा कर देने के लिए काफी है। इनके लिए तो यह एक लॉटरी थी। ‘आदर्श’ बिल्डिंग स…

उदयकरण ‘सुमन’ की ग़ज़ल

वो कितने बेचारे होंगे जीती बाजी हारे होंगे खुद के सगा सहोदर ने भी ताने पत्थर के मारे होंगे माँ जाए भी ऐसे निर्मम कमर तोड़ हत्यारे होंगे नींद न होगी आँखों में जब सपनों के बटवारे होंगे भान नहीं था, डूबेंगे जब बिल्कुल पास किनारे होंगे सच को फिर सच कौन कहेगा कलमगार जब हारे होंगे रात जगेगी दिन सोचेगा सुख के जब ‘सन्थाने’ होंगे जो शिखरों में टूटे होंगे पत्थर वो कुछ मारे होंगे --- सुमन सेवा सदन, पो. रामसिंह नगर, जिला श्रीगंगानगर -- (दिव्यालोक – अंक 14, वर्ष 2010 से साभार)

विजयलक्ष्मी ‘विभा’ की ग़ज़ल

कोई मौसम का हाल क्या जाने कब बदल लेगी रूख हवा जाने मेरी कश्ती है आज दरिया में क्या हो लहरों का फैसला जाने मुझको खुद भी नहीं खबर अपनी कैसे कोई मेरा पता जाने बोलता है जो झूठ सच की तरह़ सारी दुनिया उसे भला जाने है अगर बेकसूर तो उसको क्यों डराता है आईना जाने साथ अश्कों ने मेरा छोड़ा है हो गई कौन-सी खता जाने बाजी हर बार जीत लेता है जाने वो कौन सी कला जाने मैंने तो सिर्फ हाल पूछा था फिर वो क्यों रो पडा खुदा जाने जख्म भर जाएंगे कभी न कभी वक्त हर दर्द की दवा जाने ग़म में कितना सुकून होता है राज की बात ये ‘विभा’ जाने -- 149, जी/2, चकिया, इलाहाबाद (उप्र) (साभार – दिव्यालोक, अंक 14 वर्ष 2010)

संजय दानी की ग़ज़ल

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खटखटाया ना करो दिल के दरों को,
मैं खुला रखता हूं मन की खिड़कियों को।
फिर दरख़्ते प्यार में घुन लग रहा,अब
काट डालो बेरुख़ी के डालियों को।
गर बदलनी दुश्मनी को दोस्ती में,
तो मिटा डालो दिलों के सरहदों को।
बढ गई है ग़म की परछाई ज़मीं में,
धूप का दीमक लगा ,सुख की जड़ों को।
मैं मकाने-इश्क़ के बाहर खड़ा हूं,
तोड़ आ दुनिया के रस्मों की छतों को।
गो ज़ख़ीरा ज़ख़्मों का लेकर चला हूं,
देख हिम्मत, देख मत घायल परों को।
फ़स्ले-ग़ुरबत कुछ अमीरों ने बढाई,
लूट लेते हैं मदद के पानियों को।
ख़ुशियों के दरिया में ग़म की लहरें भी हैं,
सब्र की  शिक्छा दो नादां कश्तियों को।
घर के भीतर राम की हम बातें करते,
घर के बाहर पूजते हैं रावणों को।
छत चराग़े-सब्र से रौशन है दानी,
जंग का न्योता है बेबस आंधियों को। ----

पूजा तोमर की रचना – मेरा परिचय

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*****मेरा परिचय***** मत पूछो मैं क्या हूं? मेरा परिचय देती है मेरी कलम जहां सबका कारवां होता है खतम वहीं से बढ़ते हैं मेरे कदम हर उस इन्सां की कद्र करती हूं गैरों के लिये होती है जिनकी आंखें नम मैं अभी अंजान हूं रास्तों से तो क्या जान जाऊंगी अभी ही तो लिया है जनम हर शख्स काबिलीयत रखता है कोई ज्यादा तो कोई थोड़ा कम किसी का साथ नसीब देता है तो किसी की निभा जाती है कलम जब भी करती हूं कुछ नया दिल कहता है "पूजा" तुझमें है दम ----

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल कविता – मत करना मनमानी

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हाथी दादा थे जंगल में सबसे वृद्ध सयाने डरे नहीं वे कभी किसी से किये काम मनमाने। आया मन‌ तो सूंड़ बढ़ाकर ऊँचा पेड़ गिराया जिस पर चढ़ा हुआ था बंदर नीचे गिरकर आया। कभी सूंड़ में पानी भरकर दर्जी पर फुर्राते मुझको देदो शर्ट पजामे हुक्म रोज फरमाते। तब पशुओं ने शेर चचा से करदी लिखित शिकायत‌ शेर चचा ने आनन फानन बुलवाई पंचायत। पंचायत ने किया फैसला करता जो मनमानी बंद करेंगे पाँच साल तक उसका हुक्का पानी। माफी मांगी तब हाथी ने लिखकर किया निवेदन‌ आगे अब न होगी ऐसी गलती करता हूँ ऐसा प्रण। तुमसे भी कहते हैं बच्चों मत करना मनमानी बंद तुम्हारा किया जायेगा वरना हुक्का पानी। ----

मनोज भावुक की भोजपुरी ग़ज़लें

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1-
दीपावली हs जिन्दगी, हर साँस हs दिया
अर्पित हरेक सांस बा तहरे बदे पिया
सूरज त साथ छोड़ देवे सांझ होत ही
हमदर्द बन के मन के मुताबिक जरे दिया
आघात ना लगित त लिखाइत ना ई ग़ज़ल
ऐ दोस्त! जख्म देल तू,  अब लेलs शुक्रिया
भीतर जवन भरल बा, ऊ तs दुख हs, पीर हs
अब के तरे कहीं भला हम गजल इश्किया
तोहरा हिया में दर्द के सागर बसल बा का
कुछुओ कहेलs तू तs ऊ लागेला मर्सिया
कुछ बात एह गजल में समाइल ना, काहे कि
ओकरा मिलल ना भाव के अनुरूप काफिया
ठंड़ा पड़ल एह खून के खउले के देर बा
‘भावुक’ हो एक दिन में सुधर जाई भेड़िया 
2-
वक्त रउओ के गिरवले आ उठवले होई
छोट से बड़ आ बड़ से छोट बनवले होई
अइसे मत देखीं हिकारत से एह चिथड़ा के
काल्ह तक ई केहू के लाज बचवले होई
धूर के भी कबो मरले जो होखब ठोकर तs
माथ पर चढ़ के ऊ रउआ के बतवले होई
जे भी देखियो के निगलले होई जीयत माछी
अपना अरमान के ऊ केतना मुअवले होई
काश ! अपराध के पहिले तनी सुनले रहितीं
आत्मा चीख के आवाज़ लगवले होई
जिंदगी कर्म के खेला ह कि ग्रह-गोचर के
वक्त रउओ से त ई प्रश्न उठवले होई
जब मेहरबान खुदा ,गदहा पहलवान भइळ
अनुभवी लोग ई लोकोक्ति बनवले होई
अइसहीं ना नू गजल-गीत लिखेलें भावुक
वक्त इनक…

कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा की कविता - वृक्षारोपण

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पेड़-पौधे तो, हमने भी लगाये हैं। फर्क केवल इतना कि, हमने फोटो नहीं खिचवाये हैं। क्‍या सबूत कि हमने, धरा को हरा बनाया है? ये और बात है कि, हमारे लगाये पेड़, फल रहे हैं, फूल रहे हैं। गांव के बच्‍चे आज भी, उन पर झूल रहे हैं। कौन करेगा विश्वास हम पर ? हमने पेपर में जो, नहीं छपवाये हैं। नाम तो उनका चला, जो पेड़ लगाते फोटो खिंचवाये हैं। उनसे ही हरियाली है, क्‍योंकि उन्‍होंने पेपर में भी छपवाये हैं। ये और बात है कि, उनके लगाये पेड़ कूड़ेदान में पड़े हैं। हरियाली के नाम पर मैदानों में, बड़े बड़े कारखाने और- भव्‍य इमारत खड़े हैं। हमने फोटो नहीं खिंचवाया, कोई बात नहीं। हमने पेपर में नहीं छपवाया, कोई बात नहीं। खुशी तो इस बात की है कि, हमारे लगाये पेड़, लहलहाते हुए आज भी खड़े हैं। ----- कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा (शिक्षक) मुकाम- बेलाकछार पोष्‍ट- बालको नगर जिला- कोरबा (छ.ग.) मो.- 9926150892 इमेल- kckrishnchandra270@gmail.com

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा के दो व्यंग्य

बस बाजीगरों की कमी रह गईवैसे तो चाचा दिल्‍लगी दास ने आज भी अपने चेहरे पर खासी नकली मुस्‍कान पोत रखी थी मगर मैं अच्‍छी तरह से वाकिफ था कि हकीकत बयान करे तब पता चले कि आखिर माजरा क्‍या है? चाचा बिन किसी पूछ-कछ के खूद ही बताने लगे। बात कुछ यूं थी।चाचा बोले भतीजे अब जाकर इतमीनान की सांस ले पाया हूं। पिछली शिकस्‍त से एक सबक सीखा था, उस वर अमल भी किया। नतीजतन अब पक्का यकीन हो गया है इस बार बाजी मार लूंगा। और ये कोई मुंगेरी लाल के हसीन सपने नहीं है बल्‍कि एक ठोस आधार पर सुनहरे भविष्‍य की तामीर की उम्‍मीद हैं अब तुम ही देख लो न, मेरे साथ पाक साफ दामन वाले लोग भी हे, और टेप की रोल में लिपटे लम्‍पट भी। रथों पर सवार होने वाले महारथी भी हैं तो साइकिल पर संघर्ष करते सवार भी। चाचा ने फख्र से छाती फुलाकर आगे कहा-कुछ फिल्‍मी सितारे तो मेरे यहां पहले भी चमक रहे थे, कुछ को और पटा लिया। जो जो भी मिस वर्ड', ‘मिस इंडिया' मिली, पहुंचा पकड़ कर साथ ले आया। कोई क्रिकेटर दिखा पकड़ कर खींच लिया। वैसे हॉकी, फुटबाल, बेड मिन्‍टन, पोलो, टेनिस, बास्‍केट बाल, बॉलीबाल, हेमर थ्रो, डिश थ्रो, जेवलिंग, जिमनास्‍टि…

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - लक्ष्‍मी बनाम गृहलक्ष्‍मी

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दीपावली के दिनों में गृहलक्ष्‍मियों का महत्‍व बहुत ही अधिक बढ़ जाता है, क्‍योंकि वे अपने आपको लक्ष्‍मीजी की डुप्‍लीकेट मानती हैं। लक्ष्‍मी और गृहलक्ष्‍मी दोनों खुश हो तो दिवाली है, नहीं तो दिवाला है, और जीवन अमावस की रात है। सोचा इस दीपावली पर गृहलक्ष्‍मी पर एक सर्वेक्षण कर लिया जाये क्‍योंकि अक्‍सर मेरी गृहलक्ष्‍मी अब मायके जाने की धमकी देने के बजाय हड़ताल पर जाने की धमकी देती है। क्‍या इस देश की गृहलक्ष्‍मियों को हड़ताल पर जाने का कोई मौलिक अधिकार है ? और यदि है तो यह अधिकार किसने, कब और क्‍यों दिया ? लक्ष्‍मीजी तो पुरूष पुरातन की वधु है, उनका चंचला होना स्‍वाभाविक भी है और आवश्यक भी है। मगर सामान्‍य गृहलक्ष्‍मी हड़ताल की बात करें तो मन में संषय पैदा हो जाता है आखिर वे चाहती क्‍या हैं। अपनी गृहलक्ष्‍मी से पूछा तो वे भभक पड़ीं। क्‍या आराम का अधिकार केवल पुरूषों की ही जागीर है। हम लोग आराम नहीं कर सकतीं। मैंने विनम्रता पूर्वक निवेदन किया। आराम करना आपका जन्‍म सिद्ध अधिकार है, मगर दीपावली के शुभ मौके पर यह अशुभ विचार। वे फिर क्रोध से बोल पड़ीं। तुम तो लक्ष्‍मी के वाहन के लायक भी नहीं ह…

अरूप मंडल के जूट की कलाकृतियाँ

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अरूप मंडल व उनके मित्र असित वैद्य जूट से जीवंत कलाकृतियाँ गढ़ने में उस्ताद हैं. कुछ बानगी देखें -अरूप मंडल – दक्षिण 24 परगना, पश्चिम बंगालArup mondal & Ashit Baidya – jute art

मंजरी शुक्ल की कविता – गए थे परदेस में रोटी कमाने…

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गए थे परदेस में रोजी रोटी कमाने
चेहरे वहां  हजारों थे पर सभी अनजाने
दिन बीतते रहे महीने बनकर
अपने शहर से ही हुए बेगाने
गोल रोटी ने कुछ ऐसा चक्कर चलाया
कभी रहे घर तो कभी पहुंचे  थाने
बुरा  करने से पहले हाथ थे काँपते
पेट  की अगन को भला दिल क्या जाने
मासूम आँखें तकती रही रास्ता खिड़की  से
क्यों  बिछुड़ा बाप वो नादाँ क्या जाने
दूसरों के दुःख में  दुखी होते कुछ लोग
हर किसी को गम सुनाने  वाला क्या  जाने डॉ. मंजरी शुक्ल   
श्री समीर शुक्ल       
सेल्स  ऑफिसर (एल.पी.जी.)
इंडियन ऑइल कॉरपोरेशन
गोरखपुर  ट्रेडिंग कंपनी
गोलघर
गोरखपुर (उ.प्र.)
पिन - २७३००१

एकता नाहर की रचना - कुछ दर्द खामोश भी रहते हैं, हर एक दर्द दवा नहीं मांगता…

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सागर को प्यास लगती है, तो दरिया से नहीं मांगता। वृक्ष अगर गिरता है तो, लता से सहारा नहीं मांगता। हम गिरेंगे तो कौन सम्हालेगा हमें, सूरज खुद ही तपता है, रोशनी नहीं मांगता। कुछ दर्द खामोश भी रहते हैं, हर एक दर्द दवा नहीं मांगता। हम मांग भी लेते चांद से तुझको, अगर चाँद तुझको हमसे नहीं मांगता। EktaNahar5@gmail.com

कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा की हास्य – व्यंग्य कविता – महंगाई कथा

महंगाई कथाकैसे चले गुजारा बाबा, इस महंगाई में। चौकी के संग चूल्‍हा रोये, इस महंगाई में। बैंगन फिसल रहा हाथों से, कुंदरु करे गुमान। चुटचुटिया कहने लगी, मै महलों की मेहमान। भाजी भौहें तान रही है, इस महंगाई में। मुनिया दूध को रोती है, मुन्‍ना मांगे रोटी। पीठ तक जा पहुंचा पेट, ढीली हुई लंगोटी। चुहिया भी उपवास रहे अब, इस महंगाई में। शासन पर राशन है भारी, ये कैसी है लाचारी। काले धंधे, गोरख धंधे, और जमाखोरी जारी। चीनी भी कड़वी लगती है, इस महंगाई में। मन का दीपक जलता है, बिन बाती बिन तेल। कहीं दिवाली, कहीं दिवाला, पैसे का सब खेल। तन के भीतर आतिशबाजी, इस महंगाई में। ---- कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा

प्रभुद‌याल‌ श्रीवास्त‌व‌ की बाल कविता - पिकनिक

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पिक‌निक‌ लालू, कालू मोहन,सोहन,
चलो वलें अब पिकनिक में| लीला,शीला,कविता,रोशन,
चलो चलें अब पिकनिक में| ले जायेंगे आलू बेसन,
चलो चलें अब पिकनिक में| वहीं तलेंगे भजिये छुन छुन,
चलो चलें अब पिकनिक में| चलकर् सीखेंगे योगासन,
चलो चलें अब पिकनिक‌ में| योगासन पर होगा भाषण,
चलो चलें अब पिकनिक में| प्रिंसिपल होंगे मंचासन,
चलो चलें अब पिकनिक में| रखना है पूरा अनुशासन,
चलो चलें अब पिकनिक में| गायेंगे सब बच्चे गायन,
चलो चलें अब पिकनिक में|
लाओ अपने अपने वाहन,
चलो चलें अब पिकनिक में| मनमोहन मनभावन है दिन,
चलो चलें अब पिकनिक में|     प्रभुद‌याल‌ श्रीवास्त‌व‌

दामोदर लाल जांगिड़ की ग़ज़लें

ग़ज़ल 48 आदमी या रुप खोटा, आदमी का आदमी। कब उतारेगा मुखौटा, आदमी का आदमी॥ आदमी जो कि गया था आदमी को ढूंढ़ने , और कर के कत्‍ल लौटा, आदमी का आदमी। आदमी की रुह आखिर तिलमिला कर रह गयी, रख रहा गिरवी लंगोटा, आदमी का आदमी। इतनी भारी भीड़ में भी हैं अकेला आदमी। कर रहा महसूस टोटा, आदमी का आदमी। आदमी का कद अगर दें आदमी को नापने, नाप दे छोटे से छोटा, आदमी का आदमी । ग़ज़ल 7 अपना तो देखा भाला था। सच कब चुप रहने वाला था॥ और अर्थ थे खामोशी के, क्‍यों माना मुँह पे ताला था। कौन गवाही देगा उसकी, झूठ ने झूठा भ्रम पाला था। उबटन के उपरांत भी उसका, चहरा ज्‍यों का त्‍यों काला था। ऐसे कब तक टल सकता था, ले दे के अब तक टाला था। इस साँचे को किसने ‘जांगिड' कौन से साँचे में ढ़ाला था। ग़ज़ल 55 गिनता हैं हर सांस बही में लेता रोज उतार। बड़ा काईयां हैं ये उपर वाला लेखाकार ॥ कुछ दिन आयी खुशियां लौटी दे यादों के घाव, दुखियारे दुःख पास बैठ के करते अब उपचार। सांसे जितनी ले कर आये कम पड़ती देखी, अधिक सूद का लालच दे कर ले ली और उधार। ये रस्‍ता तो बस्‍ती से सीधा मरघट को जाता है, न जाने कि…

राजेश विद्रोही की ग़ज़लें

ग़ज़लकुछ के ख़ातिर मददगार है जिन्‍दगी। पर अमूमन तो दुश्‍वार है जिन्‍दगी॥ मौत को यूं ही मुज़रिम समझते रहे।जबकि असली ख़तावार है ज़िन्‍दगी॥ चार दिन की नियामत बड़ी चीज है। यूं समझ लो तो फिर पार है ज़िन्‍दगी॥ भक्त भी है स्‍वयं और भगवान भी। एक अद्‌भुत सा अवतार है ज़िन्‍दगी॥ वो पहेली जिसे कोई समझा नहीं।धार भी है तो पतवार है ज़िन्‍दगी॥ आख़िरी सांस तक जो ना समझा गया। वो कसैला सा किरदार है ज़िन्‍दगी॥ कब कहां टूट जाये नहीं कुछ पता। इक अधूरा सा इकरार है ज़िन्‍दगी॥ ताकते है भटकते जहाजी जिसे। वो मुनव्‍वर सी मीनार है ज़िन्‍दगी॥ ग़ज़लक्‍या बतायें तुम्‍हें हम किधर जाएँगे।दिल कहेगा जिधर बस उधर जाएँगे॥ एक आवारा शाइर की हस्‍ती भी क्‍या। कौन है जिससे अब रुठकर जाएँगे॥  एक मुद्दत से जिसको संभाला किये। वो अमानत तुम्‍हें सौंपकर जाएँगे॥ ज़िद के पक्के मग़र कच्‍चे मनुहार के। तुम कहोगे तो कैसे मुकर जाएँगे॥ धूप तो रोक पाये ये मुमकिन नहीं।छांव जो मिल गई तो ठहर जाएँगे॥ कांच के मर्तबानों की क़िस्‍मत भी क्‍या।टूट जाएँगे और फिर बिख़र जाएँगे॥ ग़ज़लक़ायदे ज्‍यों ज्‍यों कड़े होते गये।नित नये फ़ितने खड़े होते …

विजय वर्मा की दो कविताएँ – सलीब व धोखा

[१] सलीबना रिश्तों की अहमियत है ना भावनाओं पे  गौर है, एक अज़ब की बेकसी है एक गज़ब का दौर है। क्या कहूँ, किससे कहूँ सभी ने तो है यहाँ अपने ज़ख्मों के सौदा किये. एक तुम्हीं नहीं हो 'विजय' दर्द के सलीब पे टंगे हुए, इस ज़माने ने हजारों मसीहा हैं पैदा किये .    [२] धोखा
क्यूँ  हर शख्श में अपनत्व ढूंढता हूँ मैं? क्यूँ हर बेगाने मुझे अपने से लगते है , जबकि यह बस्ती है बेगानों की बेगानी यह दुनियाँ है . यह सौहार्द एक छलावा है यह हंसी एक धोखा है.
--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,btps
vijayvermavijay560@gmail.com

राजीव श्रीवास्तव की हास्य व्यंग्य कविता – लो आया करवाचौथ

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एक सुबह जब आँख खुली तो मेरे उड़ गये होश , मेरे बीवी खड़ी सामने आँखों में भर के जोश ! बोली मिस्टर कैसे हो और कैसी कटी है आपकी रात , ना जाने क्यों कर रही थे मिश्री से मीठी बात ! मैंने पूछा ओ डियर आज मैं तुमको क्यो भाया , पलकें झुकए बड़ी शर्म से बोली करवाचौथ है आया ! ये सुन कर मेरे शरीर मैं दौड़ उठा करेंट , समझ गया था मेरे नाम का निकल चुका वारेंट! इस दिन का इंतजार हर शौहर को है रहता , बड़ी अदब से बात मनती मैं जैसा-जैसा कहता ! पूरा साल बीत गया था सुन -सुन के ताने , आज कहे हर बात पे हाँ , ये मेरी ही माने ! मुझे कभी परमेश्वर कहती कभी कहे देव , खुद तो व्रत रखती पर मुझको देती सेब ! शाम होते होते फिर वो घड़ी है आती , गिफ्ट गिफ्ट का राग आलापे बाज़ार ले जाती ! अहसानों के बोझ तले दब मुझ को आए रोना , नहीं चाहते हुए भी लेना पड़े है महँगा सोना ! देर रत जब चाँद ना निकले ये चाँद -चाँद चिल्लाए , कभी भेजे नुक्कड़ पे मुझको कभी छत पे दौड़ाए  ! मैं भी जब दौड़- दौड़ के हो जाता परेशान , हाथ जोड़ कर चाँद से बोलूं अब बात इसकी मान ! आज तुम्हारा दिन है इसलिए खा रहे भाव , कल से कौन पूछेगा तुम को जब आओ जब जाव ! इत…

राघवेन्द्र सिंह का आलेख - चीन के द्वारा भारत की घेराबंदी

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वर्ष 2007 में चीन द्वारा वास्‍तविक नियंत्रण रेखा पर अतिक्रमण या उससे मिलती जुलती लगभग 140 घटनायें हुई, वर्ष 2008 में 250 से भी अधिक तथा वर्ष 2009 के प्रारम्‍भ में लगभग 100 के निकट इसी प्रकार की घटनायें हुई इसके बाद भारत सरकार ने हिमालयी रिपोर्टिंग, भारतीय प्रेस पर प्रतिबन्‍ध लगा दिया। आज देश के समाचार पत्रों एवं इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया को सूचनायें मिलना बन्‍द हैं। क्‍या उक्‍त प्रतिबन्‍ध से घुसपैठ समाप्‍त हो गयी या कोई कमी आयी। इस प्रतिबन्‍ध से चीन के ही हित सुरक्षित हुये तथा उनके मनमाफिक हुआ। जरा हम चीन के भारत के प्रति माँगों की सूची पर गौर करें - वह चाहता है अरुणाचल प्रदेश उसे सौंप दिया जाये तथा दलाईलामा को चीन वापस भेज दिया जाये। वह लद्‌दाख में जबरन कब्‍जा किये गये भू-भाग को अपने पास रखना चाहता है तथा वह चाहता है। भारत अमेरिका से कोई सम्‍बन्‍ध न रखे इसके साथ-साथ चीन 1990 के पूरे दशक अपनी सरकारी पत्रिका ‘‘पेइचिंग रिव्‍यू'' में जम्‍मू कश्‍मीर को हमेशा भारत के नक्‍शे के बाहर दर्शाता रहा तथा पाक अधिकृत कश्‍मीर में सड़क तथा रेलवे लाइन बिछाता रहा। बात यही समाप्‍त नहीं होती कुछ दिनों…

संजय दानी की ग़ज़लें

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(1)सर झुकाता ही नहीं हंगामे- इश्क़,
इसलिये सबसे उपर है नामे-इश्क़।
है नहीं सारा ज़माना रिंद पर,
कौन है जो ना पिया हो जामे-इश्क़।
इश्क़ में कुर्बानी पहली शर्त है,
इक ज़माने से यही अन्जामे-इश्क़।
दुश्मनों से भी गले दिल से मिलो,
सारी दुनिया को यही पैग़ामे-इश्क़।
फिर खड़ी है चौक पे वो बेवफ़ा,
फिर करेगी शहर में नीलामे-इश्क़।
जिसको पहले प्यार का गुल समझा था,
निकली अहले-शहर की गुलफ़ामे-इश्क़।
हुस्न के मंदिर में घुसने ना मिला,
ये अता है ये नहीं नाकामे-इश्क़।
बस तड़प बेचैनी रुसवाई यही,
मजनूं को है लैला का इनआमे-इश्क़।
तर-ब-तर हो जाता हूं बारिश में मैं,
दानी का बेसाया क्यूं है बामे-इश्क़। हंगाम - समय। रिंद - शराबी। अहले-शहर - शहर वालों। अता - देन। बामेइश्क़ - इश्क़ का छत। ----- (2) इस भीड़ भरी ट्रेन में कोई नहीं मेरा,
तन्हाई के बिस्तर में तसव्वुर का बसेरा।
रफ़्तार बहुत तेज़ है बैठा भी न जाता,
मजबूरी के चादर में ग़मे-जिस्म लपेटा।
मुझको नहीं मालूम कहां है मेरी मन्ज़िल,
कब ये ख़ौफ़ज़दा रस्ता सख़ावत से हटेगा। मैं एक नई नौकरी करने चला परदेश,
माज़ी के ग़मों का जहां होगा न बखेड़ा।  मग़रूर था उस फ़ेक्टरी का दिल जहां था मैं,
सम्मान नये स्थान में महफ़ूज़ रहेगा।
ह…

गोविंद सिंह असिवाल की पुस्तक समीक्षा – पी. दयाल श्रीवास्तव के बाल गीत संग्रह

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समीक्षा
व्यंगकार पी दयाल श्रीवास्तव के
एक जोड़ी बाल गीत संग्रह
समीक्षक .. गोविंद सिंह असिवाल
                                         2बी..विजय नगर लालघटी भोपाल
हर जिंदगी की बेहद हसीन आयु होती है बचपन। फिर तो चला गया तू लेकर मेरे जीवन की सबसे मस्त खुशी। [सुभद्रा कुमारी चौहान]बचपन की मुस्कानों से सैकड़ों किताबें भरी पड़ी हैं। उसका सौंदर्य उसकी बोली उसका अल्लहड़पन युगों युगों से साहित्यकारों की कल्पनाओं में नये नये आकार लेते रहे हैं। हिंदी के वरिष्ठ व्यंग्यकार पी दयाल श्रीवास्तव[छिंदवाड़ा]के हाल में ही एक जोड़ी बाल गीत संग्रह प्रकाशित होकर आये हैं। नाम हैं "बचपन छलके छल छल छल” और " बचपन गीत सुनाता चल। " दोनों संग्रहों में 26 - 26 गीत हैं। प्रकाशक'बाल कल्याण एवं बाला साहित्य शॊध केन्द्र भोपाल हैं, मूल्य 50 - 50रुपये है। हमारे देश में हमारे बचपन के तीन परिदृश्य स्पष्ट नजर आते हैं [1]उत्तम[गोल्डन स्पूनर [2]मध्यस्थ[3]विकृत। सामाजिक वर्गीय संरचना की प्रतिछाया[रिफ्लेकशन]बचपन पर भी है। प्रथम वर्ग सर्व सुविधा संपन्न वर्ग है। दूसरे परिश्रमी..प्रगतिशील हैं। तीसरे कुपोषण,गरीबी अभावों के शि…

अनामिका घटक की कविता

इस पार प्रिये तुम हो

मुझे नहीं जाना
उस पार
क्योंकि इस पार …
मैं  हूँ तुम्हारी संगिनी
उस पार निस्संग जीवन है
स्वागत के लिए
इस पार मैं सहधर्मिणी
मातृत्व सुख से परिपूर्ण
देवता स्वरुप माता – पिता
पूजने के लिए
उस पार मैं स्वाधीन हूँ
परंतु स्वाधीनता का
रसास्वादन है एकाकी
गरल सामान
इस पार रिश्तों की पराधीनता
मुझे है सहर्ष स्वीकार
इस पार प्रिये तुम हो………… अनामिका घटक नॉएडा

प्रभुदयाल श्रीवास्तव‌ का बाल गीत - मुनियाँ की बारात

मुनियाँ की बारात
हाथी, घोड़े, उल्लू तक थे मुनियाँ की बारात में
भालू ,बंदर , शेर उचकते मुनियाँ की बारात में। शोर शराबा, ढोल ढमाका, आतिशबाजी फूट रही
नाच,नाच कोई न थकते मुनियाँ की बारात में।
कुत्ता,बिल्ली,चूहे,हाथी सभी झूमते मस्ती में
मेंढक भी भरपूर उचकते मुनियाँ की बारात में।डी जे चीख रहा जोरों से सभी बाराती झूम रहे
बड़ा काफला रुकते रुकते मुनियाँ की बारात में। हुल्लड़बाजी, धूम धड़ाका, सड़कों पर उत्पात किया
बचे बाराती पिटते पिटते मुनियाँ की बारात में। मुनिया नामक चींटी थी जो चली ब्याहने चींटे को
सभी बराती नाचे मटके मुनियाँ की बारात में। छोटे बड़े सभी शामिल थे उस छुटकी की शादी में
सबने किये काम मिल जुलकर मुनियाँ की बारात में।
पता नहीं इंसान आज के भेद भाव क्यों करते हैं
क्यों न वे शामिल हो जाते मुनियाँ की बारात में।---
प्रभुदयाल श्रीवास्तव‌

प्रमोद भार्गव का आलेख - कचरा मैदानों से फूटती शैतानी (लैंडफिल)गैसें ?

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कचरा मैदानों से फूटती शैतानी (लैंडफिल)गैसें ? केंचुओं से संभव है जहरीली गैसों पर नियंत्रण!प्रमोद भार्गवसॉफ्‍टवेयर इंजीनियर अभिषेक भार्गव आज उत्‍साहजनक जल्‍दी में थे। कल ही उनकी कंपनी ने एक परियोजना के लिए नया सॉफ्‍टवेयर बनाने का अनुबंध किया था और आज उन्‍हें उस पर काम शुरु कर देना था। फुर्ती से वे माइंड स्‍पेस कांप्‍लेक्‍स स्‍थित अपने दफ्‍तर में पहंचे। ईश्‍वर का स्‍मरण कर कंप्‍यूटर, एसी और सीलिंग फेन सब एक साथ ऑन किए। लेकिन यह क्‍या ? काम शुरु किए अभी एक घंटा भी नहीं बीता कि कंप्‍यूटर स्‍क्रीन धुंधलाने लगी। की-बोर्ड से दी जाने वाली कमांड कंप्‍यूटर ने नामंजूर कर दीं। वे कुछ सोच पाते इसी बीच एसी बैठने लगा और पंखा घरघराकर गतिहीन हो गया। धमनियों में एकाएक बढ़ते रक्‍त प्रवाह से अभिषेक ने माउस जोर से पटका और माथा पकड़ कर रह गए। इस स्‍थिति से सामना वे पहली बार नहीं कर रहे थे, बल्‍कि कई दिनों से इस विचित्र स्‍थिति से अकेले वही नहीं दफ्‍तर के अनेक इंजीनियर दो-चार हो रहे थे। विज्ञान और प्रौद्योगिक तकनीक विशेषज्ञों में से तमाम ने इस हरकत को शैतानी (भूत-पे्रत) हरकत समझा, तो प्रबंधन ने आलीशान बहुम…

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का व्यंग्य : लुंगी महिमा बनाम लुंगी पर एक शोध प्रबंध

प्रस्तुत अंश देश के होनहार एवं प्रगतिशील विचारधारा वाले समाज शास्त्र के एक पी एच डी के एक छात्र द्वारा प्रेषित शोध प्रबंध से लिया गया है। वह छात्र मेरे पास आया था एवं लुंगी पर लिखा यह अद्वितीय एवं अमूल्य शोध प्रबंध मुझसे जंचवाया था। मैंने अपनी तीसरी एवं सबसे तरोताजा प्रेमिका के सहयोग से राष्ट्रहित में लिखा गया एवं समकालीन पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता यह शोध  प्रबंध ओ. के. कर दिया है पाठक गण भी इस उच्च कोटि के शोध प्रबंध को मुक्त कंठ् से स्वीकार करेंगे ऐसी आशा है।

लुंगी राष्ट्रीय एकता की पहचान है, क्योंकि वह जन्म से महान है। लुंगी शिव है,  सुंदर है,  सत्य है अन्य कोई भी वस्त्र गुलाम है सेवक है,  अंग्रेजों का भक्त है। लुंगी सौम्य है,  सरल है, भारत की तरह अखंड है,  कुरते की प्राणेश्वरी है,  शक्ति में प्रचंड है।

उत्तर से दक्षिण तक लुंगी का राज्य है पूर्व से पश्चिम तक लुंगी का साम्राज्य है। लोग लुंगी पहनते हैं, ओढ़ते हैं, बिछाते हैं, रस्सी न हो तो लुंगी को बाल्टी में लगाते हैं। कामवाली बाई लुंगी का पोंछा बना लेती है, झाड़ू न हो तो लुंगी से झाड़ू लगा देती है। लुंगी अपनी और बच्चों की नाक पोंछने के…

प्रभुद‌याल‌ श्रीवास्त‌व‌ की रचना – तिरंगा लिख

तिरंगा लिख
न अच्छा न गंदा लिख
कोई कहानी जिंदा लिख|
किस दल को कब कहां दिया
काले धन का चंदा लिख|
काले चेहरे नहीं छुपा
सबका गोरख धंधा लिख|
पकड़े गये गुनाहों को
लिख फाँसी का फंदा लिख|
अंतस में घुमड़ें बादल
तो कोई बात चुनंदा लिख|
राज मुकुट पर बहुत लिखा
अब तो कीट पतंगा लिख|
चेहरे ढके मूखोटों से
उनको खुलकर नंगा लिख|
अवसरवादी कलमों ने
जो झूठा लिखा पुलंदा लिख|
खड़ी द्रोपदी विलख रही
दुर्यॊधन की जंघा लिख|
लगी हुई है आग वहां
मत कागज पर दंगा लिख|
लाख रहें कौमी झंडे
तू बस एक तिरंगा लिख| ---प्रभुद‌याल‌ श्रीवास्त‌व‌

मंजरी शुक्ल की बाल कहानी – फूलों का नगर

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गुरु वशिष्ठ के यहाँ बहुत से राजकुमार शिक्षा प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से आते थे और गुरुकुल मे रहा करते थे। गुरूजी सभी शिष्यों को समान रूप से प्रेम करते थे,और उनमें किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं करते थे। यूं तो सभी उनकी बहुत सेवा करते थे पर अमृत और शांतनु दिन रात की परवाह किये बगैर आश्रम का कार्य किया करते। जब उनकी शिक्षा पूरी हो गई और आश्रम छोड़ने का समय आया तो गुरूजी ने उन दोनों को बुलाकर कहा-"मैं तुम दोनों से बहुत प्रसन्न हूं,इसलिए तुम्हें दो बातें बता रहा हूँ-"अगर तुम इन पर अमल करोगे,तो तुम्हारे राज्य में सदा सम्पन्नता और खुशहाली रहेगी "दोनों राजकुमार एक साथ बोले-"हम आपकी आज्ञा अवश्य मानेंगे। गुरूजी मुस्कुराकर बोले-"तुम दोनों जहा तक हो युद्ध टालने की कोशिश करना और अहिंसा का मार्ग अपनाना और सदा प्रकृति की रक्षा करना। " दोनों राजकुमारों ने सहर्ष हामी भर दी और अपने अपने राज्य की ओर चल पड़े। शांतनु ने कुछ दिन तक तो गुरूजी की आज्ञा का पालन किया परन्तु राजा बनते ही उसने शिकार पर जाना शुरू कर दिया। हरे भरे वृक्षों को कटवाकर उसने कई नगर बसवाए। धीरे धीरे उसके रा…

दामोदर लाल ‘जांगिड़’ की ग़ज़लें

ग़ज़ल 55 गिनता हैं हर सांस बही में लेता रोज उतार। बड़ा काईयां हैं ये उपर वाला लेखाकार ॥ कुछ दिन आयी खुशियां लौटी दे यादों के घाव, दुखियारे दुःख पास बैठ के करते अब उपचार। सांसे जितनी ले कर आये कम पड़ती देखी, अधिक सूद का लालच दे कर ले ली और उधार। ये रस्‍ता तो बस्‍ती से सीधा मरधट को जाता है, न जाने किस रस्‍ते पर हैं स्‍वर्ग नर्क के द्वार। चंदे के मंदिर में बैठा निर्भर नित्‍य पुजारी पर, भक्‍त खड़े हैं कितने उसके आगे हाथ पसार। जिसकी भी चाहे जैसी वो किस्‍मत लिख देता है, किसने दिये विधाता को ये ‘दामोदर‘ अधिकार। ---- ग़ज़ल 7 अपना तो देखा भाला था। सच कब चुप रहने वाला था॥ और अर्थ थे खामोशी के, क्‍यों माना मुँह पे ताला था। कौन गवाही देगा उसकी, झूठ ने झूठा भ्रम पाला था। उबटन के उपरांत भी उसका, चहरा ज्‍यों का त्‍यों काला था। ऐसे कब तक टल सकता था, ले दे के अब तक टाला था। इस साँचे को किसने ‘जांगिड' कौन से साँचे में ढ़ाला था। ------ ग़ज़ल 48 आदमी या रुप खोटा, आदमी का आदमी। कब उतारेगा मुखौटा, आदमी का आदमी॥ आदमी जो कि गया था आदमी को ढूंढने , और कर के कत्‍ल लौटा, आदमी…

दीप्ति परमार की उपन्यास समीक्षा : छिन्नमस्ता - नारी मुक्ति की संघर्ष गाथा

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( प्रभा खेतान के उपन्यास पर केन्द्रित )
विशिष्ट प्रतिभा की धनी प्रभा खेतान (1 नवम्बर 1942 से 19 सितम्बर 2008 )
ने दर्शन शास्त्र् से एम. ए. कर ज्याँ पोल सार्त्र् के अस्तित्ववाद पर पीएच. डी. की।
'अपरिचित उजाले','कृष्णधर्मा मैं' सहित छह कविता संग्रह,'आओ पेपे घर चलें'
और 'छिन्नमस्ता' सहित सात उपन्यास, दो उपन्यासिकाएँ, 'शब्दों का मसीहा सार्त्र्'
और 'बाजार के बीच : बाजार के खिलाफ' सहित पाँच चिंतनपरक पुस्तकें, तीन
संपादक पुस्तकें, एक आत्मकथा तथा अनेक दक्षिण अफ्रीकी कविताओं के हिन्दी
अनुवाद के लिए ख्याति प्राप्त और राहुल सांकृत्यायन तथा बिहारी पुरस्कार जैसे
विशिष्ट पुरस्कारों से सम्मानित प्रभा खेतान का हिन्दी समकालीन लेखन में
चिरस्मरणीय योगदान हैं। 'छिन्नमस्ता' प्रभा खेतान का मारवाड़ी समाज की नारी जीवन से सम्बन्धित वो
संघर्ष और मुक्ति की गाथा है जो अब तक साहित्य में अप्रस्तुत थी। उपन्यास की
नायिका प्रिया लड़की होने के कारण बचपन से ही अवहेलना एवं घरेलू बलात्कार का
भोग बनी हुई है। विवाह के बाद उसे मारवाड़ी समाज में होनेवाले बहुविवाह की
कुप्रथा…

राजीव श्रीवास्तवा की कविताएँ

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एकदिन-- कुछहसरतेंतुझसे बेपनाह मोहब्बत करता हूँ, सारी जिंदगी समझाता रहा, खून के एक-एक कतरे से, खत लिख,मर कर एलान- ए- मोहब्बत कर जाऊँगा” एक दिन”! तेरी एक"हाँ" के इंतेज़ार में, सारी जिंदगी तड़पता रहा, गर क़ुबूल ना की मेरी मोहब्बत, तो तेरी अर्थी का फूल बन, बदनाम कर जाउँगा “एक दिन”! मयखाने में तो रोज पीता हूँ, ज़ाम का नशा बहुत हुआ, अब तेरी आँखों से पी कर, मदहोश हो जाना चाहता हूँ , बस” एक दिन”! प्रभु तेरी बेरहम दुनिया में, मैं रोज कत्ल होता हूँ, पर तू पत्थर बन देखता ही रहा, तेरे दर पे सर पीट हमेशा के लिए, रुखसत हो जाउँगा” एक दिन”! किसी ग़रीब पे सितम ना कर, उसकी हाय में वो ताक़त है, की पत्थर को भी रेत बना, धारा पे ला सकता है” एक दिन”! दूसरों की लिए बहुत जिया, मुझसे मैं ही छिन गया, अब तो बस यही ख्वाहिश है, की खुद के लिए जी अपने को पहचान पाऊँ बस” एक दिन”! गर हौसले बुलंद हो, और दिल में जज़्बा हो, तो पत्थर से भी पानी, निकाल प्यास बुझा , सकता है” एक दिन”! खुद के लिए तो रोज जीते है, आपनी हसरतें पूरी किए गये , किसी गमज़दा की आँखों से गम , चुरा ले,तो तु…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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