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October 2010
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लालच अब एक नया धर्म बन चुका है। उसके अलावा अब और कुछ पवित्र नहीं रह गया है : न अफसरशाही के सर्वोच्च दफ्तर, न मुख्यमंत्री, न सेना प्रमुख और न ही शीर्ष नौकरशाह, जिनसे होकर फाइलें गुजरती हैं। अगर युद्ध में जान गंवाने वाले सैनिकों की विधवाओं के लिए हाउसिंग सोसायटी में स्वीकृत फ्लैटों को चुराना हो, तो इनमें से हर कोई कारगिल के शहीदों के खून के साथ दगाबाजी करने को तैयार हो जाएगा।


शर्म नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। लालच हमेशा पाखंड के पर्दे के पीछे पनपता है। लोकतंत्र में पाखंड एक बड़ा प्रलोभन है, क्योंकि समझौतों की शुरुआत हमेशा यथार्थवाद या सेवा के नाम पर होती है। चुनाव में होने वाले वास्तविक खर्च और आधिकारिक रूप से स्वीकृत धनराशि के बीच का फासला ही भ्रष्टाचार का सबसे अहम औजार है, क्योंकि तब अवैध ‘खैरात’ लेने को भी न्यायोचित करार दिया जा सकता है।


घूस के लिए खैरात एक शिष्ट मुहावरा है। पाखंड की दरुगध अब सत्ता और संस्थानों के सभी स्तरों पर व्याप्त है। कारगिल के शहीदों की अमानत पर डाका डालने वाले अफसरों की फेहरिस्त हमें शर्मिदा कर देने के लिए काफी है। इनके लिए तो यह एक लॉटरी थी। ‘आदर्श’ बिल्डिंग सोसायटी में शहीदों की विधवाओं के लिए स्वीकृत फ्लैटों को आपस में बांट लेने वालों को भ्रष्टाचार का दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए, उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया जाना चाहिए।


हमारे तंत्र को लगता है कि वह किसी भी तरह के जनाक्रोश को मजे से हजम कर सकता है। कॉमनवेल्थ खेलों में जनता के पैसों के साथ जो घिनौना बलात्कार हुआ, उसके लिए सुरेश कलमाडी को आधिकारिक रूप से कुर्बानी के लिए नामांकित किया गया था। शायद ‘आदर्श’ के कारण महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को भी इस्तीफा देना पड़े, बशर्ते वे दिल्ली में बैठे अपने आकाओं को यह धमकी देते हुए ब्लैकमेल न करने लगें कि वे उस रकम का खुलासा कर देंगे, जो उन तक पहुंचाई जाती रही है। दिल्ली में बैठे चतुरसुजानों ने हमें मूर्ख बनाया है।


अशोक चव्हाण उस दिन भ्रष्ट नहीं हुए थे, जिस दिन मीडिया ने यह खुलासा किया कि उन्होंने न केवल कारगिल के नायकों के साथ धोखाधड़ी करने के लिए संदर्भ शर्तो को बदल दिया था और फिर बड़े आराम से अपने कुनबे के लिए उनके हिस्से के चार फ्लैट चुरा लिए थे। वे उसी दिन से भ्रष्ट थे, जब उन्हें महाराष्ट्र सरकार में मंत्री बनाया गया। उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में इसलिए नहीं पदोन्नत किया गया, क्योंकि वे योग्य थे, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्हें पता था कि कांग्रेस में आगे बढ़ने का फॉमरूला है वफादारी और भ्रष्टाचार का घालमेल। खुलासा होने पर अगर दिल्ली ने चेहरे पर नकाब ओढ़ लिया है तो इसकी वजह यह है कि मामले को टालने का यही एक तरीका उसे पता है।


देश के मतदाता ‘आदर्श’ में नहीं रहते। मुंबई के 62 फीसदी लोग झुग्गी बस्तियों में बसते हैं। घोटालों के भारत और झुग्गियों के भारत के बीच के फासले को अखबार रोज मापते हैं, लेकिन हम अपनी सहूलियत के चलते उस पर गौर नहीं करते। मीडिया भी इस फासले को पाटने में हिचकिचाता नजर आता है। दिल्ली के अखबारों में अशोक चव्हाण की अगुवाई में हुई इस लूट-खसोट की खबरें जहां पहले पन्ने पर थीं, वहीं एक बेनाम मां की कहानी को तीसरे पन्ने पर छोटी-सी जगह दी गई, जो अपने दो बच्चों पुकार और दक्षिणा को एक मजार के बाहर छोड़ गई थी।


दोनों बच्चे रातभर रोते रहे, लेकिन जल्द ही वे भूख, बेघरबारी और कठोर यथार्थ के साथ जीना सीख लेंगे, क्योंकि यही आधे भारत का मुकद्दर है। दूसरी ओर कुछ लोग राष्ट्रीय संपत्ति को लूटते रहेंगे। जो इनके बीच में हैं, वे अपने सपनों और असुरक्षाओं की गिरफ्त में बने रहेंगे। लेकिन क्या पुकार और दक्षिणा अपनी नियति को स्वीकारते हुए चव्हाण और उनके गिरोह को उसी तरह नजरंदाज कर देंगे, जैसे उनकी बेनाम-लाचार मां ने किया था? मैं उम्मीद करता हूं ऐसा नहीं होगा।

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(भास्कर.कॉम से साभार)

 

वो कितने बेचारे होंगे

जीती बाजी हारे होंगे

 

खुद के सगा सहोदर ने भी

ताने पत्थर के मारे होंगे

 

माँ जाए भी ऐसे निर्मम

कमर तोड़ हत्यारे होंगे

 

नींद न होगी आँखों में जब

सपनों के बटवारे होंगे

 

भान नहीं था, डूबेंगे जब

बिल्कुल पास किनारे होंगे

 

सच को फिर सच कौन कहेगा

कलमगार जब हारे होंगे

 

रात जगेगी दिन सोचेगा

सुख के जब ‘सन्थाने’ होंगे

 

जो शिखरों में टूटे होंगे

पत्थर वो कुछ मारे होंगे

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सुमन सेवा सदन, पो. रामसिंह नगर, जिला श्रीगंगानगर

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(दिव्यालोक – अंक 14, वर्ष 2010 से साभार)

 

कोई मौसम का हाल क्या जाने

कब बदल लेगी रूख हवा जाने

 

मेरी कश्ती है आज दरिया में

क्या हो लहरों का फैसला जाने

 

मुझको खुद भी नहीं खबर अपनी

कैसे कोई मेरा पता जाने

 

बोलता है जो झूठ सच की तरह़

सारी दुनिया उसे भला जाने

 

है अगर बेकसूर तो उसको

क्यों डराता है आईना जाने

 

साथ अश्कों ने मेरा छोड़ा है

हो गई कौन-सी खता जाने

 

बाजी हर बार जीत लेता है

जाने वो कौन सी कला जाने

 

मैंने तो सिर्फ हाल पूछा था

फिर वो क्यों रो पडा खुदा जाने

 

जख्म भर जाएंगे कभी न कभी

वक्त हर दर्द की दवा जाने

 

ग़म में कितना सुकून होता है

राज की बात ये ‘विभा’ जाने

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149, जी/2, चकिया, इलाहाबाद (उप्र)

(साभार – दिव्यालोक, अंक 14 वर्ष 2010)

sanjay dani new

खटखटाया ना करो दिल के दरों को,
मैं खुला रखता हूं मन की खिड़कियों को।

 
फिर दरख़्ते प्यार में घुन लग रहा,अब
काट डालो बेरुख़ी के डालियों को।

 
गर बदलनी दुश्मनी को दोस्ती में,
तो मिटा डालो दिलों के सरहदों को।

 
बढ गई है ग़म की परछाई ज़मीं में,
धूप का दीमक लगा ,सुख की जड़ों को।

 
मैं मकाने-इश्क़ के बाहर खड़ा हूं,
तोड़ आ दुनिया के रस्मों की छतों को।

 
गो ज़ख़ीरा ज़ख़्मों का लेकर चला हूं,
देख हिम्मत, देख मत घायल परों को।

 
फ़स्ले-ग़ुरबत कुछ अमीरों ने बढाई,
लूट लेते हैं मदद के पानियों को।

 
ख़ुशियों के दरिया में ग़म की लहरें भी हैं,
सब्र की  शिक्छा दो नादां कश्तियों को।

 
घर के भीतर राम की हम बातें करते,
घर के बाहर पूजते हैं रावणों को।

 
छत चराग़े-सब्र से रौशन है दानी,
जंग का न्योता है बेबस आंधियों को।

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*****मेरा परिचय*****

POOJA

मत पूछो मैं क्या हूं?

मेरा परिचय देती है मेरी कलम

 

जहां सबका कारवां होता है खतम

वहीं से बढ़ते हैं मेरे कदम

 

हर उस इन्सां की कद्र करती हूं

गैरों के लिये होती है जिनकी आंखें नम

 

मैं अभी अंजान हूं रास्तों से तो क्या

जान जाऊंगी अभी ही तो लिया है जनम

 

हर शख्स काबिलीयत रखता है

कोई ज्यादा तो कोई थोड़ा कम

 

किसी का साथ नसीब देता है

तो किसी की निभा जाती है कलम

 

जब भी करती हूं कुछ नया

दिल कहता है "पूजा" तुझमें है दम

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prabhudayal (Custom)

हाथी दादा थे जंगल में सबसे वृद्ध सयाने

डरे नहीं वे कभी किसी से किये काम मनमाने।

 

आया मन‌ तो सूंड़ बढ़ाकर ऊँचा पेड़ गिराया

जिस पर चढ़ा हुआ था बंदर नीचे गिरकर आया।

 

कभी सूंड़ में पानी भरकर दर्जी पर फुर्राते

मुझको देदो शर्ट पजामे हुक्म रोज फरमाते।

 

तब पशुओं ने शेर चचा से करदी लिखित शिकायत‌

शेर चचा ने आनन फानन बुलवाई पंचायत।

 

पंचायत ने किया फैसला करता जो मनमानी

बंद करेंगे पाँच साल तक उसका हुक्का पानी।

 

माफी मांगी तब हाथी ने लिखकर किया निवेदन‌

आगे अब न होगी ऐसी गलती करता हूँ ऐसा प्रण।

 

तुमसे भी कहते हैं बच्चों मत करना मनमानी

बंद तुम्हारा किया जायेगा वरना हुक्का पानी।

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manoj bhavuk                              

1-
दीपावली हs जिन्दगी, हर साँस हs दिया
अर्पित हरेक सांस बा तहरे बदे पिया

 
सूरज त साथ छोड़ देवे सांझ होत ही
हमदर्द बन के मन के मुताबिक जरे दिया

 
आघात ना लगित त लिखाइत ना ई ग़ज़ल
ऐ दोस्त! जख्म देल तू,  अब लेलs शुक्रिया

 
भीतर जवन भरल बा, ऊ तs दुख हs, पीर हs
अब के तरे कहीं भला हम गजल इश्किया

 
तोहरा हिया में दर्द के सागर बसल बा का
कुछुओ कहेलs तू तs ऊ लागेला मर्सिया

 
कुछ बात एह गजल में समाइल ना, काहे कि
ओकरा मिलल ना भाव के अनुरूप काफिया

 
ठंड़ा पड़ल एह खून के खउले के देर बा
‘भावुक’ हो एक दिन में सुधर जाई भेड़िया 

 
2-
वक्त रउओ के गिरवले आ उठवले होई
छोट से बड़ आ बड़ से छोट बनवले होई

 
अइसे मत देखीं हिकारत से एह चिथड़ा के
काल्ह तक ई केहू के लाज बचवले होई

 
धूर के भी कबो मरले जो होखब ठोकर तs
माथ पर चढ़ के ऊ रउआ के बतवले होई

 
जे भी देखियो के निगलले होई जीयत माछी
अपना अरमान के ऊ केतना मुअवले होई

 
काश ! अपराध के पहिले तनी सुनले रहितीं
आत्मा चीख के आवाज़ लगवले होई

 
जिंदगी कर्म के खेला ह कि ग्रह-गोचर के
वक्त रउओ से त ई प्रश्न उठवले होई

 
जब मेहरबान खुदा ,गदहा पहलवान भइळ
अनुभवी लोग ई लोकोक्ति बनवले होई

 
अइसहीं ना नू गजल-गीत लिखेलें भावुक
वक्त इनको के बहुत नाच नचवले होई

 
                           3-
उचरे लागल हमरो छान्हीं काग ए बाबा
लागत बा कि हमरो जागी भाग ए बाबा

 
अउरो निखरी, चमकी तप के ,सोना हs जिनगी
लागत बा त  लागे   दींहीं   आग ए बाबा

 
मारे के त मरनी अंगना- दुअरा, चौखट पर
कइसे मारीं मनवा में के नाग ए बाबा

बइठे त बइठे आपस में ताल-मेल कइसे
सभे अलापे आपन-आपन राग ए बाबा

 
दूध ज़हर लागेला, दारू अमृत लागेला
लइकइयें में मुंह से निकले झाग ए बाबा

 
साबुन से त धुलिये जाई  देहिया  के, बाकिर
कइसे धोईं दिलवा पर के दाग ए बाबा

 
‘बेबीकेयर ‘ में बच्चा पोसाला जइसे कि
अंडा पारे कोयल सेवे काग ए बाबा

 
नींद लगे आ भूख लगे आ मन में रहे सकून
भलहीं रहीं पलानी, खाईं साग ए बाबा

 
भावुक कइसे जीयत बाडन, अचरज में बा सब
गोड़वो तर बा, मथवो पर बा आग ए बाबा

 
4-
भटकावे जाने कहां -कहां हिरनीला मन बउराइके
पतई मतिन अनजान राही बढ़त रहे उधियाइके

 
दउडे़ला लोग त आहे पर हहुआइके, खखुआइके
तनी जांच के जे बढ़े ना ऊ फंसे जाल में जहुआइके

 
हमरा बुझाला कि जिंदगी चलते रहे के रिवाज हs
अब जे तरे रउआ चलीं खिसिआइके, मुसुकाइके

 
ना बहिर भइल कबो गूंग ना, ई त आंख हs, हवे आइना
हर हाल के कर दे बयां मुसुकाइके, अगिआइके

 
कबो लोभ में, कबो क्रोध में, कबो मोह में, कबो माया में
अइसे फँसल कि छुटल ना फिर जिनगी रहल छपिटाइके

 
मन प्यार के रसरी रहे, फँसरी बनल अब जान के
एमें गाँठे-गाँठ बा पड़ गइल अझुराइके, सझुराइके

 
अब जिंदगी से हीं जिंदगी के बा खौफ एतना कि जिंदगी
सल्फास खाइके मर गइल छपिटाइके, अकुताइके

 
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2 जनवरी 1976 को सीवान (बिहार) में जन्मे और रेणुकूट (उत्तर प्रदेश ) में पले- बढ़े मनोज भावुक भोजपुरी के सुप्रसिद्ध युवा साहित्यकार हैं। पिछले 15 सालों से देश और देश के बाहर (अफ्रीका और यूके में) भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भावुक भोजपुरी सिनेमा, नाटक आदि के इतिहास पर किये गये अपने समग्र शोध के लिए भी पहचाने जाते हैं। अभिनय, एंकरिंग एवं पटकथा लेखन आदि विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले मनोज दुनिया भर के भोजपुरी भाषा को समर्पित संस्थाओं के संस्थापक, सलाहकार और सदस्य हैं। तस्वीर जिंदगी के( ग़ज़ल-संग्रह) एवं चलनी में पानी ( गीत- संग्रह) मनोज की चर्चित पुस्तके हैं। ‘तस्वीर जिन्दगी के’ तो इतना लोकप्रिय हुआ कि इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित किया जा चुका है और इस पुस्तक को वर्ष 2006 के भारतीय भाषा परिषद सम्मान से नवाज़ा जा चुका है। एक भोजपुरी पुस्तक को पहली बार यह सम्मान दिया गया है।


अभी हाल ही में भाऊराव देवरस सेवा न्‍यास,लखनऊ द्वारा मनोज भोजपुरी भाषा में उल्‍लेखनीय योगदान के लिए पंडित प्रताप नारायण मिश्र स्‍मृति-युवा साहित्‍यकार सम्‍मान २०१० से नवाजे गए हैं.

 
सम्प्रति -Creative Head,Hamar Tv,NOIDA

ई मेल-manojsinghbhawuk@yahoo.co.uk
बेबसाइट- WWW.MANOJBHAWUK.COM

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पेड़-पौधे तो,

हमने भी लगाये हैं।

फर्क केवल इतना कि,

हमने फोटो नहीं खिचवाये हैं।

 

क्‍या सबूत कि हमने,

धरा को हरा बनाया है?

ये और बात है कि,

हमारे लगाये पेड़,

फल रहे हैं, फूल रहे हैं।

 

गांव के बच्‍चे आज भी,

उन पर झूल रहे हैं।

कौन करेगा विश्वास हम पर ?

हमने पेपर में जो, नहीं छपवाये हैं।

 

नाम तो उनका चला,

जो पेड़ लगाते फोटो खिंचवाये हैं।

उनसे ही हरियाली है,

क्‍योंकि उन्‍होंने पेपर में भी छपवाये हैं।

 

ये और बात है कि,

उनके लगाये पेड़ कूड़ेदान में पड़े हैं।

हरियाली के नाम पर मैदानों में,

बड़े बड़े कारखाने और-

भव्‍य इमारत खड़े हैं।

 

हमने फोटो नहीं खिंचवाया,

कोई बात नहीं।

हमने पेपर में नहीं छपवाया,

कोई बात नहीं।

 

खुशी तो इस बात की है कि,

हमारे लगाये पेड़,

लहलहाते हुए आज भी खड़े हैं।

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कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा (शिक्षक)

मुकाम- बेलाकछार

पोष्‍ट- बालको नगर

जिला- कोरबा (छ.ग.)

मो.- 9926150892

इमेल- kckrishnchandra270@gmail.com

बस बाजीगरों की कमी रह गई

वैसे तो चाचा दिल्‍लगी दास ने आज भी अपने चेहरे पर खासी नकली मुस्‍कान पोत रखी थी मगर मैं अच्‍छी तरह से वाकिफ था कि हकीकत बयान करे तब पता चले कि आखिर माजरा क्‍या है? चाचा बिन किसी पूछ-कछ के खूद ही बताने लगे। बात कुछ यूं थी।

चाचा बोले भतीजे अब जाकर इतमीनान की सांस ले पाया हूं। पिछली शिकस्‍त से एक सबक सीखा था, उस वर अमल भी किया। नतीजतन अब पक्का यकीन हो गया है इस बार बाजी मार लूंगा। और ये कोई मुंगेरी लाल के हसीन सपने नहीं है बल्‍कि एक ठोस आधार पर सुनहरे भविष्‍य की तामीर की उम्‍मीद हैं अब तुम ही देख लो न, मेरे साथ पाक साफ दामन वाले लोग भी हे, और टेप की रोल में लिपटे लम्‍पट भी। रथों पर सवार होने वाले महारथी भी हैं तो साइकिल पर संघर्ष करते सवार भी।

चाचा ने फख्र से छाती फुलाकर आगे कहा-कुछ फिल्‍मी सितारे तो मेरे यहां पहले भी चमक रहे थे, कुछ को और पटा लिया। जो जो भी मिस वर्ड', ‘मिस इंडिया' मिली, पहुंचा पकड़ कर साथ ले आया। कोई क्रिकेटर दिखा पकड़ कर खींच लिया। वैसे हॉकी, फुटबाल, बेड मिन्‍टन, पोलो, टेनिस, बास्‍केट बाल, बॉलीबाल, हेमर थ्रो, डिश थ्रो, जेवलिंग, जिमनास्‍टिक, वेट लिफ्‍टर, तैराकी, रेस, स्‍केटिंग, बोक्‍सिंग, जूड़ो, कराते, कूंगफू, कैरम, शतरंज, आदि खेलों के खिलाड़ियों ने भी ऑफर भेजा था, मगर मैंने उन्‍हें घास तो क्‍या घास का तिनका भी नहीं डाला। वो ठीक भी रहा उन्‍हें कौन जानता हैं ? उन्‍हें मिलाता तो अपना प्रचार छोड़ कर उनकी पहचान करानी पड़ती। धावकों पर विश्‍वास करना खाण्‍डे की धार जैसा है। क्‍या पता कब उठ का दौड़ पड़े ? तैराकों का भी क्‍या भरोसा, डुबकी लगाई और अपने खेमे से बाहर निकल प्रतिपक्षी के डेरे में। ऐसे में केवल क्रिकेटर ही भरोसे मंद रहते है। वे जीत जाएं तो इज्‍जत पाते हैं, हार भी जाएं तो उनको कौन कहने वाला है।

अब देखना इनके मजे। बिना बुलाए ही दौड़े चले आ रहे है। भीड़ इतनी कि तिल धरने को भी जगह नहीं । इससे एक बड़ा फायदा तो ये होगा कि आम सभा व रैलियों में भीड़ जमा करने के लिए पार्टी को फ्री के वाहन भेजने का खर्चा नहीं उठाना पड़ेगा। बस अखबार में एक छोटा सा इश्‍तेहार शाया करवाना ही काफी रहेगा। जनता इनके ठुमकों पर ही लट्टू हो जाएगी। ऐसे में पार्टी को अपना एजेंडा भी बताने की जरुरत नहीं। डॉयलोग इनको जो लिख कर देंगे, उनको रट कर बोलने का इन्‍हें पहले से ही अच्‍छा अभ्‍यास है। जमा भीड़ सम्‍मोहित सी एकटक उन्‍हें देखती रह जाएगी और भूल जाएगी कि वो भूख, भ्रष्‍टाचार, भय, बेरोजगारी, अशिक्षा,आतंकवाद जैसी भी कोई समस्‍या से वो त्रस्‍त है।

चाचा ने जब थोड़ा सा ब्रेक दिया तो मुझे भी मौका मिल गया। मैंने कहा चाचा वैसे तो सब इंतजामात दुरुस्‍त है। बस थोड़ी सी कसर रह गई है चंद बाजीगरों की। अगर कुछ बाजीगर भी जुटा लेते तो बेहतर रहता। भारत अभी भी गांवों में रहता है और इसकी एप्रोच किए बगैर तुम्‍हारी पार्टी सिर्फ और सिर्फ शहरी लोगों तक ही प्रभावित कर पाएगी,सो कुछ बाजीगरों को और जमा कर लिया होता तो पूरे पांच साल आराम से गुजर जाते।

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा

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ये भी मातम के मसीहा निकले

मेरे चाचा दिल्‍लगी दास की विचार तंत्री के तार इतने कसे हुए हैं कि उन पर एहसास की हर छोटी से छोटी चोट के पड़ते ही उनमें झनझनाहट पैदा हो जाती है और चाचा शुरु हो जाते है सोचना। सोचते-सोचते वो उस मुकाम पर पहुंच जाते हैं कि जहां से धरातल पर उतरने के लिए उन्‍हें मेरी समझ की सीढ़ी का इस्‍तेमाल करना पड़ता है। आज की ही बात लो, बोले कि भतीजे मुझे उनकी यह बात चुभ रही है कि उनको हमारी फरियाद सुनने के लिए उनका दरबार लगाना कचोट रहा है। शुक्र करो अभी तो सिर्फ फरियाद ही सुनी है हमारी, और उनकी यह हालत हो रही है, जब हमारे दुःख-दर्द दूर कर दिये जाएंगे तब तो शायद वो अपने कपड़े फाड़ते नजर आएंगे।

तुम्‍हें याद तो होगा कि जनाबे आला ने क्‍या कहा था ? कहा था, ”अस्मत के खिलाफ है यह गरीबों की फरियाद के लिए लगाया गया दरबार।“ ”इस जन सुनवाई में राजनीति है।समझे उन्‍होंने क्‍या कहा, ‘सुनवाई में राजनीति' और राजनीति में गरीब की सुनवाई का क्‍या काम। राजनीति तो उन्‍होंने भी की है मगर यूं दरबार लगा-लगाकर जन सुनवाई करके नहीं। अगर किसी को एतराज न हो तो प्रमाण देकर साबित कर सकते हैं। हां किसी चुनाव सभा में अपवाद स्‍वरुप औपचारिकता के नाते किसी को दुःख-दर्द पूछ लिया हो वो राजनीति में नहीं आता। हां गरीबों के दरबार में पांच-पांच बरस के अन्‍तराल से वोट मांगने जरुर जाते रहे है।

वो एक बात और कह रहे है कि हमारे सूबे की सिर्फ दो ही महीनों में बद से बदतर हालत हो गई हैं। कुछ ही दिनों पहले की तो बात है, पूरे सूबे में हर तरफ खुशहाली ही खुशहाली थी, ऊंची-ऊंची अट्‌टालिकाएं थीं, सुन्‍दर-सुन्‍दर फ्‍लाई-ओवर, चौड़ी साफ-सुथरी सड़कें, सड़कों पर दौड़ती लेटेस्‍ट मॉडल की इम्‍पोर्टेड कारें, रोजगार ज्‍यादा काम करने वाले हाथ कम मगर इनके विपक्ष में बैठते ही सब-कुछ उल्‍टा हो गया। एक तंदुरुस्‍त सूबा देखते ही देखते बीमारु हो गया। रिआया की भीड़ अपनी पीड़ा लिए दरबार में पंहुची, यह हुक्‍मराना जमात की नाकामयाबी नहीं तो क्‍या है, अब इतना तो तुम भी समझते होंगे कि इसके कब्‍ल रिआया पीड़ित नहीं थी या उसकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं था अथवा उसे अपनी फरियाद लेकर दरबार में पंहुचने नहीं दिया जाता था।

सच पूछो भतीजे में उस दरबार में जाकर आया हूं। वाकई मानना पड़ेगा कि अबकी बार यहां कोई राज करने नहीं आया, प्रजा की सेवा करने आया है। अरे भाई किसी का दुःख-दर्द सुनना भी क्‍या कम बात है। अगर ऐसे ही दरबार गांव-गांव में लगाए जाएं तो मजा आ जाए। एक तो सरकार को पता लग जाएगा कि कौन-कौन दुःखी हैं, कितने-कितने दुःखी हैं, कब से और किसके कारण दुःखी हैं। मगर इसमें फरियाद करने वाला और फरियाद सुनने वाला आमने-सामने हो तो ही बात बनेगी। अगर कोई जरिया बना दिया गया तो दुःखी लोगों के दुःख में और वृद्धि हो जाएगी। और अगर दीन-दुःखियों का सही-सही अन्‍दाजा लगाना है तो छद्‌म वेश में घूमना पड़ेगा, जैसा पूर्व में कभी होता था।

पुरुषोत्तम विश्‍वकर्मा

yashwant kothari

दीपावली के दिनों में गृहलक्ष्‍मियों का महत्‍व बहुत ही अधिक बढ़ जाता है, क्‍योंकि वे अपने आपको लक्ष्‍मीजी की डुप्‍लीकेट मानती हैं। लक्ष्‍मी और गृहलक्ष्‍मी दोनों खुश हो तो दिवाली है, नहीं तो दिवाला है, और जीवन अमावस की रात है।

सोचा इस दीपावली पर गृहलक्ष्‍मी पर एक सर्वेक्षण कर लिया जाये क्‍योंकि अक्‍सर मेरी गृहलक्ष्‍मी अब मायके जाने की धमकी देने के बजाय हड़ताल पर जाने की धमकी देती है। क्‍या इस देश की गृहलक्ष्‍मियों को हड़ताल पर जाने का कोई मौलिक अधिकार है ? और यदि है तो यह अधिकार किसने, कब और क्‍यों दिया ?

लक्ष्‍मीजी तो पुरूष पुरातन की वधु है, उनका चंचला होना स्‍वाभाविक भी है और आवश्यक भी है। मगर सामान्‍य गृहलक्ष्‍मी हड़ताल की बात करें तो मन में संषय पैदा हो जाता है आखिर वे चाहती क्‍या हैं। अपनी गृहलक्ष्‍मी से पूछा तो वे भभक पड़ीं।

क्‍या आराम का अधिकार केवल पुरूषों की ही जागीर है। हम लोग आराम नहीं कर सकतीं। मैंने विनम्रता पूर्वक निवेदन किया।

आराम करना आपका जन्‍म सिद्ध अधिकार है, मगर दीपावली के शुभ मौके पर यह अशुभ विचार। वे फिर क्रोध से बोल पड़ीं।

तुम तो लक्ष्‍मी के वाहन के लायक भी नहीं हो। मगर फिर भी सुनों।

सारे साल हम काम करते हैं। अब अगर दीपावली पर दो दिन आराम करना चाह रहे हैं तो तुम्‍हारा क्‍या बिगड़ जायेगा। फिर हम कोई बोनस, डी.ए. तो मांग नहीं रहे हैं, केवल आराम की बात कर रहे हैं।

मगर देवीजी आराम तो हराम है।

तो बस इसे हराम की कमाई ही समझो और तुम जानते हो हलाल से हराम की कमाई का महत्‍व बहुत ज्‍यादा है।

वो तो ठीक है मगर काली लक्ष्‍मी रूठ गई तो सब गुड़ गोबर हो जायेगा।

अब काली रूठे या सफेद। हम तो भई चले हड़ताल करने।

यह कहकर देवीजी तो आराम करने चली गयीं। मैंने फिर एक अन्‍य गृहलक्ष्‍मी से आराम और हड़ताल पर विचार जाने।

वे पढ़ी लिखी थीं। सब्‍जी खरीद रही थीं। टमाटर पर कददू रख रही थीं और खील बताशों पर दीपक रख कर सुखी हो रहीं थी।

मेरा प्रश्न सुनकर पहले मुस्‍कराई, फिर अधराई और अन्‍त में कोयल की तरह कूक पड़ी।

भाई साहब। ईश्वर आपके मुंह में घी-शक्कर डाले नेकी और पूछ पूछ कर, अरे भाई यहां तो दफ्‍तर से छुट्‌टी तो घर में पिसों। घर से छूटो तो दफ्‍तर में फाईलों में सर खपाओ। दोनों से छूटों तो पति और बच्‍चों के मामले देखो। अगर कहीं दुनिया में नरक है तो वो औरतों के भाग्‍य में ही है, भाई साहब।

मैंने दिलासा देने की गरज से कहा-अगर आप कुछ दिनों के लिए हड़ताल पर चली जाएं तो।

भई वाह मजा आ गया क्‍या ओरिजिनिल आइडिया है। मगर एक बात बताओ भाई साहब।

ये भाई सहाब। भाई साहब। शब्‍द सुनते-सुनते मेरे कान पक गये थे सो मैं भाग खड़ा हुआ।

इस बार सोचा एक गृहलक्ष्‍मा से बात करें। सुनते ही वो तमक कर बोल पड़े। अमां यार तुम भी निरे मूर्ख हो। गृहलक्ष्‍मियां अगर काम नहीं करेगी तो हम सब खायेंगे क्‍या ? तुम पूरे देश के घरों की व्‍यवस्‍था बिगाड़ने का षडयंत्र कर रहे हो देखो मुझे लगता है तुम्‍हारे पीछे किसी विदेशी एजेन्‍सी का हाथ लगता है। देखो प्‍यारे चुपचाप घर जाओ, एक दीपक जलाओ और गृहलक्ष्‍मी के हाथ की बनी चाय पीकर सो जाओ।

लेकिन मुझे तो गृहलक्ष्‍मियों के जीवन के सर्वेक्षण का बुखार चढ़ा हुआ था। सो मैं उस गृहलक्ष्‍मा की नेक राय क्‍यों मानता। मैंने सर्वेक्षण करने वालों की तरह दो सेंटीमीटर मुस्‍कान चेहरे पर चिपकाई और सर्वेक्षण के अगले दौरे हेतु कुछ ऐसे लोगों को पकड़ा जो रोज गृहलक्ष्‍मियों को भुगतते हैं और आठ-आठ आंसू रोते हैं।

सबसे पहले मैंने शहर के मिनी बसों के कण्‍डक्‍टरों से पूछा-गृहलक्ष्‍मी के बारे में तुम्‍हारे क्‍या विचार हैं ?

जो गृहलक्ष्‍मी बिना हील-हुज्‍जत के पूरे पैसे दे देती है, वही गृहलक्ष्‍मी अच्‍छी है जो झिकझिक करती है, मैं उसे रास्‍ते में ही उतार देता हूं और तुम पैसे निकालो।

मैंने कण्‍डक्‍टर को पैसे दिये और उतर गया।

बस कण्‍डक्‍टर से अपमानित होकर जब मैं नीचे उतरा तो एक आलीशान भवन के सामने एक आदमी खड़ा था मैं समझ गया यह बिल्‍डिंग बैंक की होगी और यह आदमी हर्षद मेहता की श्रेणी का। मैंने विनम्रतापूर्वक पूछा।

गृहलक्ष्‍मी के बारे में आप क्‍या सोचते हैं ? वो धीरे से बोला।

अपनी गृहलक्ष्‍मी के अलावा सब गृहलक्ष्‍मियां अच्‍छी लगती हैं।

ये कहकर वो हो हो कर हंसने लगा मैं भी उसके साथ हंसने लगा फिर हम दोनों हंसने लगे। अब मैंने पूछा-

बैंक में जो गृहलक्ष्‍मियां आती है, उनके बारे में आप क्‍या सोचते है यदि वे हड़ताल कर दे तो ?

देखो दोस्‍त लॉकर खोल कर खुला छोड़ जाये वही गृहलक्ष्‍मी अच्‍छी होती है। और फिर यदि बैंको में हड़ताल हो तो देश के कामकाज का क्‍या होगा। वैसे गृहलक्ष्‍मी हड़ताल करे यह तो बात ठीक नहीं।

यह ज्ञान लेकर मैं घर आ गया।

इधर घर की गृहलक्ष्‍मी किराने वाले को महंगाई पर भाषण सुनाकर आई थी और देश, सरकार, दूकानदार आदि को कोस रही थी। सोचा दूकानदारों से भी गृहलक्ष्‍मियों के बारे में पूछना चाहिए। सभी दूकानदारों ने एक स्‍वर में कहा जो गृहलक्ष्‍मी बिना भाव ताव किये सामान खरीदकर ले जाती है, वही गृहलक्ष्‍मी श्रेष्‍ठ होती है। ऐसा व्‍यापार लक्ष्‍मी का कहना है।

लेकिन गृहलक्ष्‍मी सर्वेक्षण प्रकरण में जब तक हारी बीमारी नहीं हो तो सर्वेक्षण का मजा ही क्‍या सो एक वैद्यराज से पूछा।

रोगी गृहलक्ष्‍मियों से आप कैसे निपटते हैं ?

बस जरा-सी सहानुभूति, कुछ आत्‍मीयता और फिर वे खुलकर सास, ननद, जेठानी, देवरानी के किस्‍से सुनाने लग जाती हैं।

अच्‍छा फिर उनके रोग का क्‍या होता है ?

रोग केवल मन की भड़ास निकालने का होता है। भड़ास निकली और सब कुछ ठीक हो जाता है। फीस मिलती है सो अलग।

यदि गृहलक्ष्‍मी हड़ताल कर दे तो ?

वैद्यजी यह सुनकर बेहोश हो गये। वैद्यजी को छोड़कर एक रिक्शे वाले से पूछा।

प्‍यारे भाई गृहलक्ष्‍मी के बारे में क्‍या सोचते हो वो छूटते ही बोला।

चौपड़ से चौपड़ तक 2 रूपये लगेंगे काहे की लक्ष्‍मी और काहे की गृहलक्ष्‍मी चलना है तो चलो नहीं तो अपना रास्‍ता नापो। रिक्शावाले से बचते बचाते गृहलक्ष्‍मियों की चिंता करते सोचा किसी विधुर से भी राय कर लूं। एक विधुर मिला बोला।,

ईश्‍वर बचाये गृहलक्ष्‍मी से। बड़ी मुश्किल से जान छूटी है। मेरी गृहलक्ष्‍मी तो स्‍थायी हड़ताल पर है। तुम अपनी खैर मनाओ और चाहो तो मेरी बिरादरी में शामिल हो जाओ। मगर मेरे ऐसे भाग्‍य कहां।

लगे हाथ एक कुंवारे से भी पूछा बैठा। भाई गृहलक्ष्‍मी के बारे में आप क्‍या सोचते हो।

लड़का नयी उमर का था मसें भीग रहीं थीं, मूंछे निकल रही थीं बोल पड़ा।

गृहलक्ष्‍मी में क्‍या रखा है अंकल ! कोई लक्ष्‍मी पुत्री हो तो बताओ मैं समझ गया यहां से बचो।

लेकिन अभी मेरा काम बाकी था सोचा भारतीय संस्‍कृति में गृहलक्ष्‍मी को ढूंढूं मगर वहां तो सब गृहलक्ष्‍मियां लक्ष्‍मीजी की आरती में व्‍यस्‍त थीं। हड़ताल पर जाने की धमकी देने वाली गृहलक्ष्‍मी भी लक्ष्‍मीजी की पूजा अर्चना कर रही थी।

सब सोच मैंने भी गृहलक्ष्‍मी की शरणम्‌ गच्‍छामि होना ही उचित समझा। सो हे पाठक ! इस लक्ष्‍मी पूजन पर अपनी गृहलक्ष्‍मी को भी सम्‍मान दें और सुखी रहें।

शास्‍त्रों में लक्ष्‍मी का बड़ा महत्‍व है, और जीवन में गृहलक्ष्‍मी का। इन दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय। वैसे लक्ष्‍मी को श्री, पदमा, कमला, नारायणी, तेजोमयी, देवी आदि अनेकों नामों से जाना गया है। और कालान्‍तर में ये सभी नाम गृहलक्ष्‍मियों को सुशोभित करने लगे।

शास्‍त्रों के अनुसार लक्ष्‍मीजी क्षीरसागर नरेश विष्‍णुजी की पत्‍नी है और एक वरिष्‍ठ कवि के अनुसार पुरूष पुरातन की वधु क्‍यों न चंचला होय। मगर यह उक्‍ति गृहलक्ष्‍मियों पर ठीक नहीं उतरती क्‍योंकि भारतीय परिवेष में गृहलक्ष्‍मी डोली में बैठ कर आती है और अर्थी पर जाती है।

वैसे लक्ष्‍मी के कई प्रकार बताये गये हैं। धनलक्ष्‍मी, शस्‍यलक्ष्‍मी, कागजलक्ष्‍मी, कालीलक्ष्‍मी, सफेदलक्ष्‍मी, राजलक्ष्‍मी, राष्‍ट्रलक्ष्‍मी, लाटरीलक्ष्‍मी, सतालक्ष्‍मी, यशलक्ष्‍मी, सट्‌टालक्ष्‍मी, शेयरलक्ष्‍मी, प्रवासी अन्‍नपूर्णालक्ष्‍मी और न जाने कितने प्रकार की लक्ष्‍मी।

वैसे क्‍या कभी आपने लक्ष्‍मीजी के चित्र को ध्‍यान से देखा है। बचपन में जब छोटा था तो मैं लक्ष्‍मी पूजा का बड़ी बेताबी से इंतजार करता था क्‍योंकि पूजन के बाद ही मिठाई मिलती थी तथा पटाखे छोड़ने की इजाजत थी। लक्ष्‍मीजी को मैंने सदैव कमल पर बिराजे हुए ही देखा है, मगर किसी भी गृहलक्ष्‍मी को कमल पर बैठते नहीं देखा, शायद इसका कारण कमल का नरमा नाजुक होना है मगर किसी भी गृहलक्ष्‍मी को आप उल्‍लू नहीं पायेंगे हां वे पति रूपि गृहलक्ष्‍मा को अवश्य उल्‍लू बनाती रहती

हैं।

कल्‍पना कीजिए लक्ष्‍मी और गृहलक्ष्‍मी दोनों साथ-साथ अवतरित हो जायें तो क्‍या हो ? मेरे ख्‍याल से यदि किसी के जीवन में ऐसा हो जाये तो शायद उसका पूरा जीवन अमावस्‍या की रात बन जाये। आज की लक्ष्‍मी गृहलक्ष्‍मी विष्‍णु अनुगामिनी नहीं है वो तो स्‍वयं आगे बढ़कर विष्‍णु की समस्‍याओं को हल करने में सहयोग देने वाली लक्ष्‍मी बन जाना चाहती है।

आज की लक्ष्‍मी तो बस मत पूछिये। मेघवर्णा सुमध्‍यमें, कामिनी, कामोदरी, सुकेशी, सुकान्‍ता, सरस और फैशन की मारी है। वो तो कभी पद्‌मिनी, कभी हस्‍तिनी, कभी संखिनी है तो कभी गजगामिनी गजलक्ष्‍मी। मत पूछिये कभी दुर्गा है तो कभी कोमल शीतल। गृहलक्ष्‍मी का कमल कोमल नहीं है और गृहलक्ष्‍मी स्‍वयं भी घर के अर्थशास्त्र पर अपना ही हक समझती है। वैसे भी पतियों को उल्‍लू समझने, उल्‍लू बनाने में गृहलक्ष्‍मियों का जवाब नहीं।

सामान्‍य गृहलक्ष्‍मी पति को पीर, बावर्ची, भिश्ती और खर समझती है। वे पति को गृहलक्ष्‍मा नहीं समझकर एक घरेलू नौकर भी समझे तो क्‍या आश्चर्य। वैसे भी शादी के बाद पति केवल गृहलक्ष्‍मी के द्वारा की गयी खरीददारी के डिब्‍बे उठाने का ही काम करता है।

कभी -कभी कोई गृहलक्ष्‍मी अपने पतिदेव को विष्‍णु समझकर उनके पांव क्षीर सागर में शयन करने के वक्‍त दबा देती होगी। गृहलक्ष्‍मी की सर्वप्रिय वस्‍तु होती है पति की कमाई या मासिक वेतन। समझदार गृहलक्ष्‍मी वेतन डी.ए. बोनस, सब का ध्‍यान रखती है पति के पूरे वेतन को पहले सप्‍ताह में ही खर्च करने की हिम्‍मत रखती है और बेचारा पति फिर किसी काली लक्ष्‍मी की तलाश में दौड़ने लगता है वैसे सोतिया डाह की दृष्‍टि से देखें तो एक ही घर में दो महिलाएं एक लक्ष्‍मी और दूसरी गृहलक्ष्‍मी। मगर साहब, कोई एक तो गृहलक्ष्‍मी ढूंढ लाइये जो सहोदरियों में भी दुर्लभ है।

परिचर्चाकारों को लक्ष्‍मी और गृहलक्ष्‍मी दोनों खड़े काके लागूं पाय नुमा परिचर्चाओं का आयोजन करना चाहिए। दूरदर्शन आकाशवाणी को लक्ष्‍मी और गृहलक्ष्‍मी पर कार्यक्रम करने चाहिए। अखबारों को इन सौतनों पर लेख और परिशिष्ट निकालने चाहिए। आखिर ये दोनों तो वास्‍तव में आधुनिक युग रूपी गाड़ी के दो पहिये हैं।

एक लक्ष्‍मी को लाती है दूसरी खुले दिल से इसे खर्च कर अपना जीवन सफल, सुखी और आनन्‍दमयी करती है। लक्ष्‍मी की पूजा तो एक दिन की उसके नाज, नखरे उसकी पूजा एक दिन की मगर गृहलक्ष्‍मी की सेवा तो बस चलती ही रहती है जो लक्ष्‍मी से बचे वे गृहलक्ष्‍मी में उलझे, जो गृहलक्ष्‍मी से बचे वे लक्ष्‍मी में उलझे क्‍योंकि लक्ष्‍मी के बिना सब सूना-सूना है बिना गृहलक्ष्‍मी के घर भूतों का डेरा है।

रहिमन लक्ष्‍मी राखिये।

बिन लक्ष्‍मी सब सून।

गृहलक्ष्‍मी गये न उबरे

मोती मानस चून ॥

तो इस दीपावली पर लक्ष्‍मी और गृहलक्ष्‍मी दोनों की अर्चना कर अपना इहलोक और परलोक दानों सुधारिये। इति शुभम्‌।

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यशवन्त कोठारी

86, लक्ष्‍मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर 302002, फोन 2670596

अरूप मंडल व उनके मित्र असित वैद्य जूट से जीवंत कलाकृतियाँ गढ़ने में उस्ताद हैं. कुछ बानगी देखें -

arup mandal

अरूप मंडल – दक्षिण 24 परगना, पश्चिम बंगाल

jute art

jute art 2

jute art 3

jute art 4

Arup mondal & Ashit Baidya – jute art

manjari shukla (Custom)

गए थे परदेस में रोजी रोटी कमाने
चेहरे वहां  हजारों थे पर सभी अनजाने

 
दिन बीतते रहे महीने बनकर
अपने शहर से ही हुए बेगाने

 
गोल रोटी ने कुछ ऐसा चक्कर चलाया
कभी रहे घर तो कभी पहुंचे  थाने

 
बुरा  करने से पहले हाथ थे काँपते
पेट  की अगन को भला दिल क्या जाने

 
मासूम आँखें तकती रही रास्ता खिड़की  से
क्यों  बिछुड़ा बाप वो नादाँ क्या जाने

 
दूसरों के दुःख में  दुखी होते कुछ लोग
हर किसी को गम सुनाने  वाला क्या  जाने

 

डॉ. मंजरी शुक्ल   
श्री समीर शुक्ल       
सेल्स  ऑफिसर (एल.पी.जी.)
इंडियन ऑइल कॉरपोरेशन
गोरखपुर  ट्रेडिंग कंपनी
गोलघर
गोरखपुर (उ.प्र.)
पिन - २७३००१

ekta nahar

सागर को प्यास लगती है,

तो दरिया से नहीं मांगता।

 

वृक्ष अगर गिरता है तो,

लता से सहारा नहीं मांगता।

 

हम गिरेंगे तो कौन सम्हालेगा हमें,

सूरज खुद ही तपता है, रोशनी नहीं मांगता।

 

कुछ दर्द खामोश भी रहते हैं,

हर एक दर्द दवा नहीं मांगता।

 

हम मांग भी लेते चांद से तुझको,

अगर चाँद तुझको हमसे नहीं मांगता।

 

EktaNahar5@gmail.com

महंगाई कथा

कैसे चले गुजारा बाबा, इस महंगाई में।

चौकी के संग चूल्‍हा रोये, इस महंगाई में।

 

बैंगन फिसल रहा हाथों से,

कुंदरु करे गुमान।

चुटचुटिया कहने लगी,

मै महलों की मेहमान।

भाजी भौहें तान रही है, इस महंगाई में।

 

मुनिया दूध को रोती है,

मुन्‍ना मांगे रोटी।

पीठ तक जा पहुंचा पेट,

ढीली हुई लंगोटी।

चुहिया भी उपवास रहे अब, इस महंगाई में।

 

शासन पर राशन है भारी,

ये कैसी है लाचारी।

काले धंधे, गोरख धंधे,

और जमाखोरी जारी।

चीनी भी कड़वी लगती है, इस महंगाई में।

 

मन का दीपक जलता है,

बिन बाती बिन तेल।

कहीं दिवाली, कहीं दिवाला,

पैसे का सब खेल।

तन के भीतर आतिशबाजी, इस महंगाई में।

 

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कृष्‍ण कुमार चन्‍द्रा

prabhudayal (Custom)

पिक‌निक‌

लालू, कालू मोहन,सोहन,
चलो वलें अब पिकनिक में|

लीला,शीला,कविता,रोशन,
चलो चलें अब पिकनिक में|

ले जायेंगे आलू बेसन,
चलो चलें अब पिकनिक में|

वहीं तलेंगे भजिये छुन छुन,
चलो चलें अब पिकनिक में|

चलकर् सीखेंगे योगासन,
चलो चलें अब पिकनिक‌ में|

योगासन पर होगा भाषण,
चलो चलें अब पिकनिक में|

प्रिंसिपल होंगे मंचासन,
चलो चलें अब पिकनिक में|

रखना है पूरा अनुशासन,
चलो चलें अब पिकनिक में|

गायेंगे सब बच्चे गायन,
चलो चलें अब पिकनिक में|
लाओ अपने अपने वाहन,
चलो चलें अब पिकनिक में|

मनमोहन मनभावन है दिन,
चलो चलें अब पिकनिक में|    

प्रभुद‌याल‌ श्रीवास्त‌व‌

ग़ज़ल 48

आदमी या रुप खोटा, आदमी का आदमी।

कब उतारेगा मुखौटा, आदमी का आदमी॥

 

आदमी जो कि गया था आदमी को ढूंढ़ने ,

और कर के कत्‍ल लौटा, आदमी का आदमी।

 

आदमी की रुह आखिर तिलमिला कर रह गयी,

रख रहा गिरवी लंगोटा, आदमी का आदमी।

 

इतनी भारी भीड़ में भी हैं अकेला आदमी।

कर रहा महसूस टोटा, आदमी का आदमी।

 

आदमी का कद अगर दें आदमी को नापने,

नाप दे छोटे से छोटा, आदमी का आदमी ।

 

ग़ज़ल 7

अपना तो देखा भाला था।

सच कब चुप रहने वाला था॥

 

और अर्थ थे खामोशी के,

क्‍यों माना मुँह पे ताला था।

 

कौन गवाही देगा उसकी,

झूठ ने झूठा भ्रम पाला था।

 

उबटन के उपरांत भी उसका,

चहरा ज्‍यों का त्‍यों काला था।

 

ऐसे कब तक टल सकता था,

ले दे के अब तक टाला था।

 

इस साँचे को किसने ‘जांगिड'

कौन से साँचे में ढ़ाला था।

 

ग़ज़ल 55

गिनता हैं हर सांस बही में लेता रोज उतार।

बड़ा काईयां हैं ये उपर वाला लेखाकार ॥

 

कुछ दिन आयी खुशियां लौटी दे यादों के घाव,

दुखियारे दुःख पास बैठ के करते अब उपचार।

 

सांसे जितनी ले कर आये कम पड़ती देखी,

अधिक सूद का लालच दे कर ले ली और उधार।

 

ये रस्‍ता तो बस्‍ती से सीधा मरघट को जाता है,

न जाने किस रस्‍ते पर हैं स्‍वर्ग नर्क के द्वार।

 

चंदे के मंदिर में बैठा निर्भर नित्‍य पुजारी पर,

भक्‍त खड़े हैं कितने उसके आगे हाथ पसार।

 

जिसकी भी चाहे जैसी वो किस्‍मत लिख देता है,

किसने दिये विधाता को ये ‘दामोदर‘ अधिकार।

 

ग़ज़ल 18

इक सचेतक सजग गुप्‍तचर लेखनी।

और बजी सर्वदा बन गज़र लेखनी॥

 

जब ये विरही के मन की तहों में गयी,

तब गयी दौड़ पी के नगर लेखनी।

 

जब भी बस्‍ती में निर्बल कराहें सुना,

तो सुना रोयी हैं रात भर लेखनी।

 

हासिये तू भी सुर्खी तक आ सका

जब चली तुझपे कस के कमर लेखनी।

 

जो इतिहास लिख्‍खी थी तलवार ने

मिट गयी होती होती न गर लेखनी।

 

जुर्म सहकर बगावत क्‍यों खामोश है,

इससे वाकिफ हैं ये जादूगर लेखनी।

 

जो भी ढ़र्रे से हट के चली है कभी

विश्‍वकर्मा हुई वो अमर लेखनी।

--

दामोदर लाल जांगिड़

ग़ज़ल

कुछ के ख़ातिर मददगार है जिन्‍दगी।

पर अमूमन तो दुश्‍वार है जिन्‍दगी॥

 

मौत को यूं ही मुज़रिम समझते रहे।

जबकि असली ख़तावार है ज़िन्‍दगी॥

 

चार दिन की नियामत बड़ी चीज है।

यूं समझ लो तो फिर पार है ज़िन्‍दगी॥

 

भक्त भी है स्‍वयं और भगवान भी।

एक अद्‌भुत सा अवतार है ज़िन्‍दगी॥

 

वो पहेली जिसे कोई समझा नहीं।

धार भी है तो पतवार है ज़िन्‍दगी॥

 

आख़िरी सांस तक जो ना समझा गया।

वो कसैला सा किरदार है ज़िन्‍दगी॥

 

कब कहां टूट जाये नहीं कुछ पता।

इक अधूरा सा इकरार है ज़िन्‍दगी॥

 

ताकते है भटकते जहाजी जिसे।

वो मुनव्‍वर सी मीनार है ज़िन्‍दगी॥

 

ग़ज़ल

क्‍या बतायें तुम्‍हें हम किधर जाएँगे।

दिल कहेगा जिधर बस उधर जाएँगे॥

 

एक आवारा शाइर की हस्‍ती भी क्‍या।

कौन है जिससे अब रुठकर जाएँगे॥ 

 

एक मुद्दत से जिसको संभाला किये।

वो अमानत तुम्‍हें सौंपकर जाएँगे॥

 

ज़िद के पक्के मग़र कच्‍चे मनुहार के।

तुम कहोगे तो कैसे मुकर जाएँगे॥

 

धूप तो रोक पाये ये मुमकिन नहीं।

छांव जो मिल गई तो ठहर जाएँगे॥

 

कांच के मर्तबानों की क़िस्‍मत भी क्‍या।

टूट जाएँगे और फिर बिख़र जाएँगे॥

 

ग़ज़ल

क़ायदे ज्‍यों ज्‍यों कड़े होते गये।

नित नये फ़ितने खड़े होते गये।

 

दिन ब दिन कुनबा बिखरता ही गया।

अनगिनत इसमें धड़े होते गये॥

 

ज़ब से आजादी मिली अहले वतन।

आदतन चिकने घड़े होते गये॥

 

धज्‍जियाँ उड़ने लगी कानून की।

क़ायदों के चीथड़े होते गये॥

 

हम जहाँ पर थे वहीं पर रह गये।

सिर्फ बच्‍चे ही बड़े होते गये॥

 

ग़ज़ल

कैसी जादूगरी हो गई।

ख़िदमतें अज़गरी हो गई॥

 

फिर सदाकत को फाँसी लगी।

झूठ फिर से बरी हो गई॥

 

मुफ़लिसी को मिटा देंगे हम।

आम ये मसख़री हो गई॥

 

था दुपट्टा तवायफ़ का जो।

पॉलीटिक चुनरी हो गई॥

 

साफग़ोई सभी के लिए।

आँख की किरकिरी हो गई॥

 

जब भी सूखा पड़ा मुल्‍क में।

उनकी तबीयत हरी हो गई॥

 

हादसों की हवालात में।

ज़िन्‍दगी अधमरी हो गई॥

 

ग़ज़ल

जब जब मौसम में तब़्‍दीली होती है।

सुबह सुरीली शाम नशीली होती है॥

 

जिन राहों से मंजिल का याराना है।

वो राहें अक्‍सर रेतीली होती हैं॥

 

तब तब मेरी दांयी आँख फड़कती है।

माँ की आँखें जब-जब गीली होती है॥

 

तंज निगारों की बस्‍ती में बड़े मियां।

जाने क्‍यों हर बात नुकीली होती है॥

 

मुखिया के बेटे के मर्जीदानों में ।

अक्‍सर कोई छैल छबीली होती है॥

 

फल फूलों से जो रहती है लदी फदी।

केवल वो ही शाख लचीली होती है॥

 

विष के दांत उखाड़ो लेकिन याद रहे।

सांपों की सांसे ज़हरीली होती है॥

 

चाहे जितना रोको आ ही जाती है।

कुछ यादें भी अजब हठीली होती है॥

 

ग़ज़ल

झुके सर खुद ब खुद वो सज़्‍दागाहें और होती हैं।

जो सीधे दिल से निकले वो दुआएँ और होती हैं॥

 

जहाँ में यूँ तो कहने को हजारों रहगुजारें हैं।

सरे मंजिल जो जाती हैं वो राहें और होती हैं॥

 

ज़िगर को पार कर जाता है हर तीरे-नज़र लेकिन।

उतर जाये जो ज़ेहन में निगाहें और होती हैं॥

 

कदम तेरा ना हिल जाये किसी की बद्दुओं से।

हिला दे अर्श का दामन वो आहें और होती हैं॥

 

लबो-रुख़सार के तेवर तो बदले हैं हवाओं ने।

बदल दे वक्त का रुख वो हवायें और होती हैं॥

 

अभी तक तुमने कुचली हैं फ़कत कमजोर आवाजें।

क़यामत तक जो गूंजे वो सदायें और होती हैं॥

 

कभी इस ऱाख के मलबे से तुम खिलवाड़ मत करना।

छिपा रखती हैं शोले वो रिदायें और होती हैं॥

 

गुजारी है उमर हमने हसीं जुल्‍फों के साये में।

भुला दे रंजो-ग़म सारे वो बाँहें और होती हैं॥

 

ग़ज़ल

जहां पेड़ पर चार दाने लगेंगे।

परिन्‍दे वहीं चहचहाने लगेंगे॥

 

जिन्‍हें याद करते गई उम्र सारी।

उन्‍हें भूलने में ज़माने लगेंगे॥

 

मेरी बेबसी पूछकर क्‍या करोगे।

तुम्‍हें तो वो सारे बहाने लगेंगे॥

 

भले आज तुमको ना रास आये लेकिन।

ये मंजर किसी दिन सुहाने लगेंगे॥

 

ग़ज़ल

हम सलामत रहें ग़म सलामत रहें।

बेख़ुदी का ये आलम सलामत रहे॥

 

हम उलझते रहें इसका कुछ गम नहीं।

तेरी जुल्‍फों के ये ख़म सलामत रहे॥

 

बर तरफ सारी दुनियां के रंजो-अलम।

बस दुआ है कि दमखम सलामत रहे॥

 

साजो-आवाज़ को सिन दराज़ी मिले।

ये सिसकता सा सरगम सलामत रहे॥

 

होश आने की हसरत मुबारक तुम्‍हें।

मैकशी का ये मौसम सलामत रहे॥

 

ग़ज़ल

कैसी अज़ब मशीन कैमरे।

सिर्फ तमाशबीन कैमरे॥

 

बटन होल में छिप जाते हैं।

इतने हुए महीन कैमरे॥

 

वक्त, वार, तारीख़-महीने।

रखते याद ज़हीन कैमरे॥

 

शुरु शुरु में श्‍वेत श्‍याम थे।

मग़र आज रंगीन कैमरे॥

 

जो देखेंगे वही कहेंगे।

हैं पूर्वग्रह हीन कैमरे॥

 

इधर उधर ना कभी ताकते।

अपनी धुन में लीन कैमरे॥

 

सब कुछ देख लिया फिर भी चुप।

हैं कितने शालीन कैमरे॥

 

उनकी नज़र बचाकर रक्‍खो।

ज़ालिम लेते छीन कैमरे॥

 

ग़ज़ल

सब कुछ रखती याद डायरी।

सुधियों का संवाद डायरी॥

 

लिखो मिटाओ फिर से लिक्‍खो।

खुद अपनी नक़्‍क़ाद डायरी॥

 

नहीं किसी की दाब धौंस में।

है असली आज़ाद डायरी॥

 

कभी किसी को माफ ना करती।

जबरदस्‍त ज़ल्‍लाद डायरी॥

 

गलत हाथ में पड़ जाये तो।

कर देती बरबाद डायरी॥

 

जब चाहो तब इसे टटोलो।

पूरी करे मुराद डायरी॥

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     [१]

सलीब

ना रिश्तों की अहमियत है

ना भावनाओं पे  गौर है,

एक अज़ब की बेकसी है

एक गज़ब का दौर है।

क्या कहूँ, किससे कहूँ

सभी ने तो है यहाँ

अपने ज़ख्मों के सौदा किये.

एक तुम्हीं नहीं हो 'विजय'

दर्द के सलीब पे टंगे हुए,

इस ज़माने ने हजारों

मसीहा हैं पैदा किये .

   [२]

धोखा
क्यूँ  हर शख्श में

अपनत्व ढूंढता हूँ मैं?

क्यूँ हर बेगाने मुझे

अपने से लगते है ,

जबकि यह बस्ती है बेगानों की

बेगानी यह दुनियाँ है .

यह सौहार्द एक छलावा है

यह हंसी एक धोखा है.
--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,btps
vijayvermavijay560@gmail.com

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एक सुबह जब आँख खुली तो मेरे उड़ गये होश ,

मेरे बीवी खड़ी सामने आँखों में भर के जोश !

 

बोली मिस्टर कैसे हो और कैसी कटी है आपकी रात ,

ना जाने क्यों कर रही थे मिश्री से मीठी बात !

 

मैंने पूछा ओ डियर आज मैं तुमको क्यो भाया ,

पलकें झुकए बड़ी शर्म से बोली करवाचौथ है आया !

 

ये सुन कर मेरे शरीर मैं दौड़ उठा करेंट ,

समझ गया था मेरे नाम का निकल चुका वारेंट!

 

इस दिन का इंतजार हर शौहर को है रहता ,

बड़ी अदब से बात मनती मैं जैसा-जैसा कहता !

 

पूरा साल बीत गया था सुन -सुन के ताने ,

आज कहे हर बात पे हाँ , ये मेरी ही माने !

 

मुझे कभी परमेश्वर कहती कभी कहे देव ,

खुद तो व्रत रखती पर मुझको देती सेब !

 

शाम होते होते फिर वो घड़ी है आती ,

गिफ्ट गिफ्ट का राग आलापे बाज़ार ले जाती !

 

अहसानों के बोझ तले दब मुझ को आए रोना ,

नहीं चाहते हुए भी लेना पड़े है महँगा सोना !

 

देर रत जब चाँद ना निकले ये चाँद -चाँद चिल्लाए ,

कभी भेजे नुक्कड़ पे मुझको कभी छत पे दौड़ाए  !

 

मैं भी जब दौड़- दौड़ के हो जाता परेशान ,

हाथ जोड़ कर चाँद से बोलूं अब बात इसकी मान !

 

आज तुम्हारा दिन है इसलिए खा रहे भाव ,

कल से कौन पूछेगा तुम को जब आओ जब जाव !

 

इतनी से बात क्यों मैडम के समझ ना आती ,

जो साल भर प्यार जताती तो बात बन जाती !

rajeev shrivastava

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तव

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वर्ष 2007 में चीन द्वारा वास्‍तविक नियंत्रण रेखा पर अतिक्रमण या उससे मिलती जुलती लगभग 140 घटनायें हुई, वर्ष 2008 में 250 से भी अधिक तथा वर्ष 2009 के प्रारम्‍भ में लगभग 100 के निकट इसी प्रकार की घटनायें हुई इसके बाद भारत सरकार ने हिमालयी रिपोर्टिंग, भारतीय प्रेस पर प्रतिबन्‍ध लगा दिया। आज देश के समाचार पत्रों एवं इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया को सूचनायें मिलना बन्‍द हैं। क्‍या उक्‍त प्रतिबन्‍ध से घुसपैठ समाप्‍त हो गयी या कोई कमी आयी। इस प्रतिबन्‍ध से चीन के ही हित सुरक्षित हुये तथा उनके मनमाफिक हुआ। जरा हम चीन के भारत के प्रति माँगों की सूची पर गौर करें - वह चाहता है अरुणाचल प्रदेश उसे सौंप दिया जाये तथा दलाईलामा को चीन वापस भेज दिया जाये। वह लद्‌दाख में जबरन कब्‍जा किये गये भू-भाग को अपने पास रखना चाहता है तथा वह चाहता है। भारत अमेरिका से कोई सम्‍बन्‍ध न रखे इसके साथ-साथ चीन 1990 के पूरे दशक अपनी सरकारी पत्रिका ‘‘पेइचिंग रिव्‍यू'' में जम्‍मू कश्‍मीर को हमेशा भारत के नक्‍शे के बाहर दर्शाता रहा तथा पाक अधिकृत कश्‍मीर में सड़क तथा रेलवे लाइन बिछाता रहा। बात यही समाप्‍त नहीं होती कुछ दिनों पहले एक बेवसाइट में चीन के एक थिंक टैंक ने उन्‍हें सलाह दी थी कि भारत को तीस टुकड़ों में बाँट देना चाहिये। उसके अनुसार भारत कभी एक राष्‍ट्र रहा ही नहीं। इसके अतिरिक्‍त चीन भारत पर लगातार अनावश्‍यक दबाव बनाये रखना चाहता है। वह सुरक्षा परिषद में भारत की स्‍थाई सदस्‍यता पाने की मुहिम का विरोध करता है तो विश्‍व बैंक और अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मुद्रा कोष में अरुणाचल प्रदेश की विकास परियोजनाओं के लिये कर्ज लिये जाने में मुश्‍किलें खड़ी करता है। इसके साथ-साथ तिब्‍बत में सैन्‍य अड्‌डा बनाने सहित अनेक गतिविधियाँ उसके दूषित मंसूबे स्‍पष्‍ट दर्शाती हैं।

आज से लगभग 100 वर्षों पूर्व किसी को भी भास तक नहीं रहा होगा, वैश्‍विक मंच पर भारत तथा चीन इतनी बड़ी शक्‍ति बन कर उभरेंगे। उस समय ब्रिटिश साम्राज्‍य ढलान पर था तथा जापान, जर्मनी तथा अमेरिका अपनी ताकत बढ़ाने के लिए जोर आजमाइश कर रहे थे। नये-नये ऐतिहासिक परिवर्तन जोरों पर थे। आज उन सबको पीछे छोड़ चीन अत्‍यधिक धनवान तथा ताकतवर राष्‍ट्र बनकर उभरा है। कुछ विद्वानों का मत है चीन अनुमानित समय से पहले अमेरिका को पीछे छोड़ देगा। भारत भी अपनी पूरी ऊर्जा के साथ लोकतंत्र को सीढ़ी बना अपनी चहुमुखी प्रगति की ओर अग्रसर है। चीन अपने उत्‍पादन तथा भारत सेवा के क्षेत्र में विश्‍व पटल पर अपनी उपस्‍थिति अग्रणी भूमिका के रूप में बनाये हुए है। यह बात सत्‍य है कि चीन भारत के मुकाबले अपनी सैन्‍य क्षमता में लगभग दोगुना धन खर्च कर रहा है। अतः उसकी ताकत भी भारत के मुकाबले दोगुनी अधिक है। उसकी परमाणु क्षमता भी भारत से कहीं अधिक है। इन सबके साथ यह भी सत्‍य है कि चीन की सीमा अगल-अलग 14 देशों से घिरी है अतः वह अपनी पूरी ताकत का उपयोग भारत के खिलाफ आजमाने में कई बार सोचेगा। परन्‍तु चीन की उक्‍त बढ़ती हुई सैन्‍य एवं मारक शक्‍ति भारत के लिए चिन्‍तनीय अवश्‍य है।

एक तरफ चीन अपनी जी0डी0पी0 से कई गुना रफ्‍तार से रक्षा बजट में खर्च कर रहा है वहीं वह अपने रेशम मार्ग जहाँ से सदियों पहले रेशम जाया करता था, पुनः चालू करना चाहता है। वह अफगानिस्‍तान, ईरान, ईराक और सउदी अरब तक अपनी क्षमता बढ़ाना चाहता है। निश्‍चित ही वह वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अपने हित में करना चाहता है। जिसके उक्‍त कार्य में निश्‍चित ही पाकिस्‍तान की भूमिका महत्‍वपूर्ण रहने वाली है। देखना यह है कि उसकी यह सोच कहाँ तक कारगर रहती है।

चीन महाशक्‍ति बनने की जुगत में है, जिससे भारत को चिन्‍तित होना लाजमी है, उसकी ताकत निश्‍चित ही भारत को हानि पहुँचाएगी। लगातार चीनी सेना नई शक्‍तियों से लैस हो रही है। पाकिस्‍तान तथा बांग्‍लादेश में समुद्र के अन्‍दर अपने अड्‌डे बनाकर वह अपनी भारत के प्रति दूषित मानसिकता दर्शा रहा हैं। वर्ष 2008 में चीन पाकिस्‍तान में दो परमाणु रिएक्‍टरों की स्‍थापना को सहमत हो गया था। जिसका क्रियान्‍वयन होने को है।

हमारे नीति निर्धारकों को उक्‍त विषय की पूरी जानकारी भी है। परन्‍तु फिर भी वे एकतरफा प्‍यार की पैंगे बढ़ाते हुए सोच रहे हैं। कि एक दिन चीन उनपर मोहित हो जाएगा, तथा अपनी भारत विरोधी गतिविधियाँ समाप्‍त कर देगा। हमारे देश के प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह का वैश्‍विक मंच पर कहना अन्‍तर्राष्‍ट्रीय व्‍यापार की दुनिया में चीन हमारा सबसे महत्‍वपूर्ण सहोदर है तथा भारतीय विदेशमंत्री का कहना तिब्‍बत चीन का अंग है। उचित प्रतीत नहीं होता। उक्‍त दोनों बयान भारत को विभिन्‍न आयामों पर हानि पहुँचाने वाले प्रतीत होते हैं। चाणक्‍य तथा विदुर के देश के राजनेता शायद यह भूल गये कि राष्‍ट्र की कोई भी नीति भावनाओं से नहीं चलती। अलग-अलग विषयों पर भिन्‍न-भिन्‍न योजनाएँ लागू होती हैं। परन्‍तु भावनाओं का स्‍थान किसी भी योजना का भाग नहीं है। आज भारत को चीन से चौकन्‍ना रहने की आवश्‍यकता है। उसे भी कूटनीति द्वारा अपनी आगामी योजना बनानी चाहिए। उसे चाहिए चीन की अराजकता से आजिज देश उसके विषय में क्‍या सोच रहे हैं। उसके नीतिगत विकल्‍प क्‍या हैं ? भारत को अमेरिका के साथ-साथ दक्षिण पूर्व एशिया के महत्‍वपूर्ण देशों के साथ खुली बात-चीत करनी चाहिए। चीन का स्‍पष्‍ट मानना है कि भारत में कई प्रकार के आंतरिक विवाद चल रहे हैंं चाहे वह अंतर्कलह हो, आतंकवाद हो या साम्‍प्रदायिक खींच-तान। भारत क्षेत्रीय विषयों पर भी बुरी तरह बटा हुआ है। चीन उक्‍त नस्‍लीय विभाजन का लाभ देश को बाटने के लिए कर सकता है। वहाँ के दूषित योजनाकारों के अनुसार प्रांतीय स्‍तर पर अलग-अलग तरीके से क्षेत्रीय वैमनस्‍यता एवं विवादों को भड़का भारत का विभाजन आसानी से किया जा सकता है।

निश्‍चित रूप से आगे आने वाले वर्ष भारत के लिए काफी मुश्‍किलों भरे हो सकते हैंं। वर्ष 2011 के बाद पश्‍चिमी सेना काबुल से निकल जाएगी। इसके बाद बीजिंग-इस्‍लामाबाद-काबुल का गठबंधन भारत के लिए मुश्‍किलें खड़ी करेगा। चीन नेपाल के माओवादियों को लगातार खुली मदद कर रहा है। वहाँ की सरकार बनवाने के प्रयासों में उसकी दखलंदाजी जग जाहिर है। पाकिस्‍तान भारत में नकली नोट, मादक पदार्थ, हथियार आदि भेज भारत को अंदर से नुक्‍सान पहुँचाने की पूरी कोशिश कर रहा है। उसकी आतंकी गतिविधियाँ लगातार जारी हैं। भारत चीन के साथ व्‍यापार कर चीन को ही अधिक लाभ पहुँचा रहा है। वहाँ के सामानों ने भारतीय निर्माण उद्योग को बुरी तरह कुचल डाला है। यदि आगे आनेवाले समय में भारत सरकार चीनी उत्‍पादनों पर पर्याप्‍त सेल्‍स ड्‌यूटी या इसी प्रकार की अन्‍य व्‍यवस्‍था नहीं करती है तो भारत का निर्माण उद्योग पूरी तरह टूट कर समाप्‍त हो जाएगा। इसे भी चीन का भारत को हानि पहुँचाने का भाग माना जा सकता है।

भारत को चाहिए 4,054 किलोमीटर सरहदीय सीमा की ऐसी चाक-चौबन्‍द व्‍यवस्‍था करें कि परिंदा भी पर न मार सके। इसके साथ-साथ देश के राज्‍यीय राजनैतिक शक्‍तियों को अपने-अपने प्रान्‍तों को व्‍यवस्‍थित करने की अति आवश्‍यकता है। जिससे वह किसी भी सूरत में भारत की आंतरिक कमजोरी का लाभ न ले सके। देश की सरकार को जल, थल तथा वायु सैन्‍य व्‍यवस्‍थाओं को और अधिक ताकतवर बनाना चाहिए। जिससे चीन भारत पर सीधे आक्रमण करने के बारे में सौ बार विचार करे। 1954 के हिन्‍दी-चीनी भाई-भाई तथा वर्तमान चिन्‍डिया के लुभावने नारों के मध्‍य चीन ने 1962 के साथ-साथ कई दंश भारत को दिये हैं। भारत को आज सुई की नोक भर उस पर विश्‍वास नहीं करना चाहिए। चीन जैसे छली राष्‍ट्र के साथ विश्‍वास करना निश्‍चित ही आत्‍मघाती होगा। हमें अपनी पूरी ऊर्जा राष्‍ट्र को मजबूत एवं सैन्‍य शक्‍ति बढ़ाने में लगाना चाहिए।

॥ समाप्‍त ।A

लेखक - ( राघवेन्‍द्र सिंह ),

117/के/145, अम्‍बेदकर नगर,

गीतानगर, कानपुर - 208 025 (उ0 प्र0) भारत

ई मेल ः raghvendrasingh36@yahoo.com

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sanjay dani

(1)

सर झुकाता ही नहीं हंगामे- इश्क़,
इसलिये सबसे उपर है नामे-इश्क़।

 
है नहीं सारा ज़माना रिंद पर,
कौन है जो ना पिया हो जामे-इश्क़।

 
इश्क़ में कुर्बानी पहली शर्त है,
इक ज़माने से यही अन्जामे-इश्क़।

 
दुश्मनों से भी गले दिल से मिलो,
सारी दुनिया को यही पैग़ामे-इश्क़।

 
फिर खड़ी है चौक पे वो बेवफ़ा,
फिर करेगी शहर में नीलामे-इश्क़।

 
जिसको पहले प्यार का गुल समझा था,
निकली अहले-शहर की गुलफ़ामे-इश्क़।

 
हुस्न के मंदिर में घुसने ना मिला,
ये अता है ये नहीं नाकामे-इश्क़।

 
बस तड़प बेचैनी रुसवाई यही,
मजनूं को है लैला का इनआमे-इश्क़।

 
तर-ब-तर हो जाता हूं बारिश में मैं,
दानी का बेसाया क्यूं है बामे-इश्क़।

हंगाम - समय। रिंद - शराबी। अहले-शहर - शहर वालों। अता - देन। बामेइश्क़ - इश्क़ का छत।

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(2)

इस भीड़ भरी ट्रेन में कोई नहीं मेरा,
तन्हाई के बिस्तर में तसव्वुर का बसेरा।

 
रफ़्तार बहुत तेज़ है बैठा भी न जाता,
मजबूरी के चादर में ग़मे-जिस्म लपेटा।

 
मुझको नहीं मालूम कहां है मेरी मन्ज़िल,
कब ये ख़ौफ़ज़दा रस्ता सख़ावत से हटेगा।

 

मैं एक नई नौकरी करने चला परदेश,
माज़ी के ग़मों का जहां होगा न बखेड़ा। 

 

मग़रूर था उस फ़ेक्टरी का दिल जहां था मैं,
सम्मान नये स्थान में महफ़ूज़ रहेगा।

 
हम नौकरों को झेलना ही पड़ता है ये सब,
मालिक के बराबर कहां ठहराव मिलेगा।

 
अपनों से विदा ले के चला हूं मैं सफ़र में,
अब हश्र तलक अपनों को ये दिल न दिखेगा।

 
सच्चाई दिखानी है वहां अपने ज़मीं की,
अब झूठ का दरिया वहां पानी भरेगा।

 
किस्मत का बदलना मेरे बस में नहीं दानी,
भगवान ही दानी की ख़ता माफ़ करेगा।

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( सख़ावत- दानशीलता, माज़ी - बीता समय)

समीक्षा
व्यंगकार पी दयाल श्रीवास्तव के
एक जोड़ी बाल गीत संग्रह

balgeet  (Custom)

समीक्षक .. गोविंद सिंह असिवाल
                                         2बी..विजय नगर लालघटी भोपाल
हर जिंदगी की बेहद हसीन आयु होती है बचपन। फिर तो चला गया तू लेकर मेरे जीवन की सबसे मस्त खुशी। [सुभद्रा कुमारी चौहान]बचपन की मुस्कानों से सैकड़ों किताबें भरी पड़ी हैं। उसका सौंदर्य उसकी बोली उसका अल्लहड़पन युगों युगों से साहित्यकारों की कल्पनाओं में नये नये आकार लेते रहे हैं।

हिंदी के वरिष्ठ व्यंग्यकार पी दयाल श्रीवास्तव[छिंदवाड़ा]के हाल में ही एक जोड़ी बाल गीत संग्रह प्रकाशित होकर आये हैं। नाम हैं "बचपन छलके छल छल छल” और " बचपन गीत सुनाता चल। " दोनों संग्रहों में 26 - 26 गीत हैं। प्रकाशक'बाल कल्याण एवं बाला साहित्य शॊध केन्द्र भोपाल हैं, मूल्य 50 - 50रुपये है।

हमारे देश में हमारे बचपन के तीन परिदृश्य स्पष्ट नजर आते हैं [1]उत्तम[गोल्डन स्पूनर [2]मध्यस्थ[3]विकृत। सामाजिक वर्गीय संरचना की प्रतिछाया[रिफ्लेकशन]बचपन पर भी है। प्रथम वर्ग सर्व सुविधा संपन्न वर्ग है। दूसरे परिश्रमी..प्रगतिशील हैं। तीसरे कुपोषण,गरीबी अभावों के शिकार हैं।

एक बार एक समाचार पढ़ा था जब एक वर्ग विशेष की महिलाओं का प्रसवकाल निकट आता है,तो कोई न कोई अपराध करतीं हैं ताकि प्रसव जेल में हो। सरकार के बालश्रम विरोधी कानून और सर्व शिक्षा अभियान उनके लिये बेमानी हैं। यहाँ तक कामन वेल्थ खेलों के खेल गाँव के निर्माण में भी बालश्रम के दाग मौजूद हैं। खुशी की बात यह है कि मेरे मित्र पी दयाल श्रीवास्तव के ये बालगीत किसी भी खांचे में नहीं रखे हैं। सिर्फ बाल गीत हैं,सर्वप्रिय विश्वव्यापी बालगीत। कोई भी पढ़कर गुनगुना सकता है।

बचपन की केलियों का लुत्फ उठा सकता है। वह शीत युद्ध का दौर था। एक अमेरिकी विद्वान सोवियत यूनियन से लौटा। किसी पत्रकार ने उससे पूछा"क्या सोवियत यूनियन में वर्ग हीन समाज स्थापित हो गया है?"उसका उत्तर था.."कौन कहता है रूस में विशिष्ट वर्ग नहीं है। वहां बच्चे हैं, सोवियत यूनियन में बच्चे विशिष्ट वर्ग हैं। यह मैंने भी अपनी इन दो छोटी छोटी काली काली आँखों से1987 में बुल्गारिया में देखा है। उसका लालन पालन शिक्षा स्वास्थ्य की पूरी जुम्मेवारी देश की थी इसलिये कुपोषण निरक्षरता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। वहाँ हर बच्चा राजकुमार था, हर कन्या राजकुमारी थी। हो सकता है ये अंकुर दयालजी के मानस में रहे हों। वे इन पुस्तकों में इस प्रकार प्रस्फुटित हुये हैं।

"बच्चे हैं जीवन का सार/होते ईश्वर का अवतार.....। बच्चों को भगवान न समझे/वह सच्चा इंसान नहीं...बच्चे लगते वेद पुराण...। " बचपन छलके छल छल छल बच्चों की कल्पना का एक प्राकृतिक झरना लगता है। वही छल छल छल छलकता है बहता है। इस गीत संग्रह के हर गीत में सीख है। जो आम आदमी के जीवन ,समाज और भविष्य के लिये लाभकारी है। प्रबल बोध है। इन गीतों में कहीं कोई वर्ग विद्वेश नहीँ है। हर कविता में मनोवैग्यानिक पुट है,संदेश है,स्वचरित्र निर्माण की पद्धति है,परंपरा है।

यह सीख प्रात: की बेला से शुरू होती है.."बिस्तर को फटकारो रोज./चादर को झटकारो रोज" आम घरों में पीने के पानी का घड़ा जरूरी है। मटके के बचाव की सीख है..रहे छिपकुली दीवारों पर उनसे इसे बचाके रखना,गिर न जाये वह पानी में,ढक्कन जरा दबा के रखना"ऐसी सीखों से ओतप्रोत हैं"हम सबको है बहुत जरूरी धरती का पर्यावरण बचाना"अभी से बचपन को ताक़ीद दी है.."कल तक था बिल्कुल कंगाल/आज हो गया मालामाल.....ये है पक्का रिश्वतखोर ..। "आज का सबसे बड़ा खतरा आतंक है। कहते हैं.. जब चाहा आतंक मचाया/इनको कोई पकड़ न पाया। बम गिराया दस को मारा/हुये बाद में नौ दो ग्यारह। बाल साहित्यकारों एवं घरों के स्यानों की प्रचंड शिकायत है कि बच्चे टी. वी. से चिपके रहते हैं। कम्प्युटर पर खाना सोना पढ़ना सब भूल जाते हैं।

यह बचपन पर भारी वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक हमला है। उससे उनकी पढ़ाई ,सोच चिन्तन,और निर्णयकारी क्षमता का क्षरण हो रहा है। इस सबके बावजूद आज का बचपन कुशाग्र है,शार्प है,और विशाल जानकारियों का कोष हैं। इतना समझदार बचपन पहिले कभी नहीं था। श्रीवास्तव साहब ने बचपन का ध्यान कुछ ज्वलंत मुद्दों की ओर आकर्षित किया है,जैसे"हिदी भारत के कण कण में/हिंदी ही संपूर्ण वतन है। सब भाषायें बहनें बहनें हिंदी सबकी बड़ी बहिन है। "भाषा, धर्म,क्षेत्र को लेकर ही तो वितंडावाद खड़ा किया जाता है।

दयालजी ने विवादित मुद्दों को बड़ी शालीनता से अपने बालगीतों में प्रस्तुत किया है..हिंदु/मुस्लिम/ सिख/ईसाई रहते हैं सब मिलजुलकर। एक बेहतरीन उदाहरण फूल का है.."बड़े बड़े मंदिर समाधि/और देवों के सिर चढ़ते/धर्म भले लड़ते आपस में/फूल कभी न लड़ते/"कवि ने पुराना उदाहरण देकर चेतावनी दी है.. टुकड़ों टुकड़ों बटे देश पर/परदेशी क्यों छाये/इसी फूट के कारण वर्षों/ कब्जा रहे जमाये। "कवि ने भारत माता की सोंधी सोंधी गंध वाली मिट्टी की"मिट्टी" कविता में प्रशंसा की है। अंत में बचपन के हाथ में सितार देकर कहा है...बचपन गीत सुनाता चल/हँसता चल मुस्काता चल। ...मिले तिरंगे से संबल/एक झंडा फहराता चल। "भाषा भी बालोपयोगी सरस सुगम है।

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prabhudayal (Custom)

परिचय‌
पी. दयाल श्रीवास्तव  [प्रभुदयाल श्रीवास्तव]
जन्म      4 अगस्त 1944 धरमपुरा दमोह {म.प्र.]
शिक्षा वैद्युत यांत्रिकी में पत्रोपाधि
व्यवसाय विद्युत मंडल की सेवा से सेवा निवृत कार्यपालन यंत्री
लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख,        बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन
प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत, अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस, पंजाब केसरी, एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ। पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित।
कृतियां       1 दूसरी लाइन [व्यंग्य संग्रह]शैवाल प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित
            2 बचपन गीत सुनाता चल[बाल गीत संग्रह]बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र
भोपाल से प्रकाशित
            3 बचपन छलके छल छल छल[बाल गीत संग्रह]बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र
भोपाल से प्रकाशित
प्रकाशनाधीन  1 बिल क्लिंटन का नाम करण संस्कार[व्यंग्य संग्रह}शैवाल प्रकाशन
            2 शाला है अनमोल खजाना[बाल गीत संग्रह]बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केन्द्र भोपाल
            3 बच्चे सरकार चलायेंगे[बाल गीत संग्रह]बाल कल्याण.....................
प्रसारण आकाशवाणी छिंदवाड़ा से बालगीतों,बुंदेली लघु कथाओं एवं जीवन वृत पर परिचर्चा का प्रसारण
सम्मान राष्ट्रीय राज भाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा "भारती रत्न "एवं "भारती भूषण सम्मान"
श्रीमती सरस्वती सिंह स्मृति सम्मान वैदिक क्रांति देहरादून एवं हम सब साथ साथ पत्रिका दिल्ली
द्वारा "लाइफ एचीवमेंट एवार्ड"
भारतीय राष्ट्र भाषा सम्मेलन झाँसी द्वारा" हिंदी सेवी सम्मान"
शिव संकल्प साहित्य परिषद नर्मदापुरम होशंगाबाद द्वारा"व्यंग्य वैभव सम्मान"
युग साहित्य मानस गुन्तकुल आंध्रप्रदेश द्वारा काव्य सम्मान
संबद्धता संस्थाओं के नाम अध्यक्ष बुंदेलखंड साहित्य परिषद भोपाल, छिंदवाड़ा जिला इकाई के अध्यक्ष
विशेष बुंदेली लोक गीत,गज़लें बुंदेली साहित्य पर लेख। वर्ष 2009 में साहित्य अकादमी दिल्ली में आयोजित बुंदेलखंड साहित्य परिषद भोपाल के कार्यक्रम में रवींद्र भवन दिल्ली में बुंदेली की दक्षिणी सीमाऐं विषय पर आलेख का पाठन।
संप्रति सेवा निवृत कार्यपालन यंत्री म. प्र.विद्युत मंडल छिंदवाड़ा से
संपर्क        12, शिवम सुंदरम नगर छिंदवाड़ा[ म.प्र.]480001
         Email ID- pdayal_shrivastava@yahoo.com

इस पार प्रिये तुम हो

मुझे नहीं जाना
उस पार
क्योंकि इस पार …
मैं  हूँ तुम्हारी संगिनी
उस पार निस्संग जीवन है
स्वागत के लिए
इस पार मैं सहधर्मिणी
मातृत्व सुख से परिपूर्ण
देवता स्वरुप माता – पिता
पूजने के लिए
उस पार मैं स्वाधीन हूँ
परंतु स्वाधीनता का
रसास्वादन है एकाकी
गरल सामान
इस पार रिश्तों की पराधीनता
मुझे है सहर्ष स्वीकार
इस पार प्रिये तुम हो…………

अनामिका घटक

नॉएडा

मुनियाँ की बारात 
हाथी, घोड़े, उल्लू तक थे मुनियाँ की बारात में
भालू ,बंदर , शेर उचकते मुनियाँ की बारात में।

शोर शराबा, ढोल ढमाका, आतिशबाजी फूट रही
नाच,नाच कोई न थकते मुनियाँ की बारात में।

 
कुत्ता,बिल्ली,चूहे,हाथी सभी झूमते मस्ती में
मेंढक भी भरपूर उचकते मुनियाँ की बारात में।

डी जे चीख रहा जोरों से सभी बाराती झूम रहे
बड़ा काफला रुकते रुकते मुनियाँ की बारात में।

हुल्लड़बाजी, धूम धड़ाका, सड़कों पर उत्पात किया
बचे बाराती पिटते पिटते मुनियाँ की बारात में।

मुनिया नामक चींटी थी जो चली ब्याहने चींटे को
सभी बराती नाचे मटके मुनियाँ की बारात में।

छोटे बड़े सभी शामिल थे उस छुटकी की शादी में
सबने किये काम मिल जुलकर मुनियाँ की बारात में।

 
पता नहीं इंसान आज के भेद भाव क्यों करते हैं
क्यों न वे शामिल हो जाते मुनियाँ की बारात में।

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प्रभुदयाल श्रीवास्तव‌

कचरा मैदानों से फूटती शैतानी (लैंडफिल)गैसें ?

केंचुओं से संभव है जहरीली गैसों पर नियंत्रण!

pramod bhargav

प्रमोद भार्गव

सॉफ्‍टवेयर इंजीनियर अभिषेक भार्गव आज उत्‍साहजनक जल्‍दी में थे। कल ही उनकी कंपनी ने एक परियोजना के लिए नया सॉफ्‍टवेयर बनाने का अनुबंध किया था और आज उन्‍हें उस पर काम शुरु कर देना था। फुर्ती से वे माइंड स्‍पेस कांप्‍लेक्‍स स्‍थित अपने दफ्‍तर में पहंचे। ईश्‍वर का स्‍मरण कर कंप्‍यूटर, एसी और सीलिंग फेन सब एक साथ ऑन किए। लेकिन यह क्‍या ? काम शुरु किए अभी एक घंटा भी नहीं बीता कि कंप्‍यूटर स्‍क्रीन धुंधलाने लगी। की-बोर्ड से दी जाने वाली कमांड कंप्‍यूटर ने नामंजूर कर दीं। वे कुछ सोच पाते इसी बीच एसी बैठने लगा और पंखा घरघराकर गतिहीन हो गया। धमनियों में एकाएक बढ़ते रक्‍त प्रवाह से अभिषेक ने माउस जोर से पटका और माथा पकड़ कर रह गए। इस स्‍थिति से सामना वे पहली बार नहीं कर रहे थे, बल्‍कि कई दिनों से इस विचित्र स्‍थिति से अकेले वही नहीं दफ्‍तर के अनेक इंजीनियर दो-चार हो रहे थे। विज्ञान और प्रौद्योगिक तकनीक विशेषज्ञों में से तमाम ने इस हरकत को शैतानी (भूत-पे्रत) हरकत समझा, तो प्रबंधन ने आलीशान बहुमंजिला इमारत में वास्‍तु दोष ! पंडितो, वास्‍तुकारों और तांत्रिकों से अलौकिक शक्‍तियों के निवारण के उपाय भी कराए गए लेकिन नतीजा ठन-ठन गोपाल !

जी हां मुबंई, दिल्‍ली, बैंगलोर, अहमदाबाद, गुड़गांव और नोएडा में तत्‍काल शैतान की उपज लगने वाली इन हरकतों से कुछ ऐसा ही हो रहा है। लेकिन ऐसा केवल उन स्‍थानों पर ही हो रहा है, जहां कचरा मैदानों (डंपिंग ग्राउंडों) पर बने आलीशान व बहुमंजिला इमारतों में आईटी, वीपीओ, कॉल सेंटर और सायबर कैफे हैं। सीमेंट, कंक्रीट और लोहे से निर्मित इन इमारती भूखण्‍डों में कंप्‍यूटर, लेपटॉप, एसी, टीवी, प्रिंटर, फ्रिज, माइक्रोवेव व अन्‍य इलेक्‍ट्रोनिक उपकरण चलते-चलते एकाएक जबाव देने लग जाते हैं। ऐसा उन भू-खण्‍डों पर ज्‍यादा देखने में आ रहा है, जहां एक दशक-डेढ़ के भीतर इमारती जंगल उगा है। यहां चांदी, पीतल और तांबे के बर्तन व इलेक्‍ट्रोनिक उपकरणों में इस्‍तेमाल होने वाले कल-पुर्जे काले पड़ जाते हैं। नतीजतन इन पुजोंर् की संवेदन-क्षमता (सेंसेविटीज) कुंद हो जाती है, लिहाजा संगणक अभियंता द्वारा दी जाने वाली क्‍लिक का कोई असर नहीं होता।

आखिर में इस अनंग अशरीरी प्रेत की पड़ताल की ‘‘नेशनल सॉलिड वेस्‍ट एसोसिएसन ऑफ इंडिया'' के रसायन वैज्ञानिक विशेषज्ञों ने। इस भयावहता का पर्दाफाश होने पर पता चला कि इलेक्‍ट्रोनिक उपकरणों में पैदा होने वाली हरकतें डंपिंग ग्राउण्‍ड में दफन कचरे से लगातार रिस रहीं लैंडफिल गैसों की देन हैं।

दरअसल लैंडफिल गैसें उन स्‍थलों से उत्‍सर्जित होती हैं, जहां गड्‌ढों-युक्‍त उबड़-खाबड़ जमीन का समतलीकरण शहरी कचरे से किया गया हो। इस कचरे में औद्योगिक और घरों में उपयोग में लाये जाने वाले इलेक्‍ट्रोनिक उपकरणों का कचरा भी शामिल हो तो इसमें प्रदूषण की भयानकता और बढ़ जाती है। नियम-कानूनों को ताक पर रखकर लापरवाही से तैयार किए भू-खण्‍डों पर खड़ी इमारतों में चल रहे सूचना तकनीक के कारोबार में प्रयोग में लाये जाने वाले ई कचरे का अपशिष्‍ट चांदी, तांबा प्‍लेडियम, टिन, सीसा, सोना और पीतल के कल-पुर्जे लैंडफिल गैसों के रूप में रिसकर हवा में तैरने से ये गैसें इन कल-पुजोंर् के संपर्क में आकर इनकी सेहत बिगाड़ देती हैं। इनका हमला निर्जीव यांत्रिक उपकरणों पर ही नहीं मानव स्‍वास्‍थ्‍य पर भी बुरा असर डालता हैं। इनके दुष्‍प्रभाव से कैंसर, ऐलर्जी, गर्भपात और तंत्रिका तंत्र के गड़बड़ा जाने की समस्‍या पैदा हो सकती है।

हमारे देश की महानगर पालिकाएं और भवन-निर्माता कंपनियां गड्‌ढों युक्‍त भूमि के समतलीकरण का बड़ा आसान उपाय खोज लेते हैं कि गड्‌ढों को रोजाना घरों से निकलने वाले घरेलु कचरे और इलेक्‍ट्रोनिक कचरे से मुफत में पाट दिया जाए। वह भी बिना किसी रासयनिक उपाय (ट्रीटमेंट) के। विभिन्‍न तत्‍वों और रसायनों से मिश्रित दफन कचरा परस्‍पर संपर्क में आकर जब पांच-छह साल बाद रासयनिक प्रक्रिया शुरु करता है तो इसमें से जहरीली लैंडफिल गैसें वजूद में आने लगती हैं, जो हाइड्रोजन ऑक्‍साइड, नाइट्रोजन ऑक्‍साइड, मीथेन कार्बन मोनो ऑक्‍साइड और सल्‍फर डाय ऑक्‍साइड होती हैं। कचरे के सड़ने सेे बनने वाली इन गंधाती गैसों को वैज्ञानिकों ने लैंडफिल गैसों के दर्जे में रखकर एक अलग ही श्रेणी बना दी है। दफन कचरे में भीतर ही भीतर कुदरती प्रक्रिया के चलते ‘लीचेड' नामक जहरीला तरल पदार्थ जमीन की दरारों से रिसता है। लीचेड इतना खतरनाक होता है कि यह जमीन के जीव-जगत के लिए उपयोगी सहज गुणों का विनाश भी करता है। भू-गर्भ में निरंतर बहते रहने वाले जल-स्‍त्रोतों में भी लीचेड विलय होकर शुद्ध पानी को जहरीला बना देता है। गंधक के अनेक जीवाणुनाशक यौगिक भूमि में फैलकर इसकी उर्वरा क्षमता को नष्‍ट कर देते हैं। इन यौगिकों को वैज्ञानिक ‘मेरकैप्‍टैंस' कहते हैं।

आधुनिक जीवन शैली, कचरा उत्‍पादक शैली भी है। इसीलिए भारत ही नहीं दुनिया के ज्‍यादातर विकसित और विकासशील देश कचरे को ठिकाने लगाने की समस्‍या से जूझ रहे हैं। लेकिन ज्‍यादातर विकसित देशों ने समझदारी बरतते हुए औद्योगिक-प्रौद्योगिक कचरे को अपने देशों में ही नष्‍ट कर देने की कार्रवाई पर रोक लगा दी है। दरअसल पहले इन देशों में भी इस कचरे को धरती में गड्‌ढे खोदकर दफना देने की छूट थी। लेकिन जिन-जिन क्षेत्रों में यह कचरा दफनाया गया, उन-उन क्षेत्रों में लैंडफिल गैसों के उत्‍सर्जन से पर्यावरण बुरी तरह प्रभावित होकर खतरनाक बीमारियों का जनक बन गया। जब ये रोग लाइलाज बीमारियों के रुप में पहचाने जाने लगे तो इन देशों का शासन-प्रशासन जाग्रत हुआ और उसने कानून बनाकर औद्योगिक-प्रौद्योगिक कूड़े-कचरे को स्‍वदेश में दफन करने पर सख्‍ती से प्रतिबंध लगा दिया। तब इन देशों ने इस कचरे को ठिकाने लगाने के लिए लाचार देशों की तलाश की और आपको हैरानी होगी कि सबसे लाचार देश निकला भारत, जहां दुनिया के 105 से भी ज्‍यादा देश अपना औद्योगिक कचरा समुद्रतटीय इलाकों में जहाजों से भेजकर नष्‍ट करते हैं। इन देशों में अमेरिका, चीन, ब्राजील, आस्‍ट्रेलिया, जर्मनी और ब्रिटेन प्रमुख हैं।

नेशनल एनवायरमेंट इंजिनियरिंग रिसर्च इंस्‍टीट्‌यूट के एक रिसर्च पर्चे के अनुसार वर्ष 1997 से 2005 के बीच भारत में प्‍लास्‍टिक कचरे के आयात में 62 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। यह आयात देश में पुनर्शोधन व्‍यापार को बढ़ावा देने के बहाने किया जाता है। इस क्रम में सोचनीय पहलू यह है कि इस आयातित कचरे में खतरनाक माने जाने वाले आर्गनों मरक्‍यूरी यौगिक निर्धारित मात्रा से 1500 गुणा अधिक पाए गए हैं, जो कैंसर जैसी लाइलाज और भयानक बीमारी को जन्‍म देते हैं। विकसित देशों द्वारा कचरे की निर्बाध चली आ रही निर्यात की मंशा के पीछे भारत को बीमार देश बनाए रखने की दुर्भावना भी लगती है। इससे ये देश भारत में घातक बीमारियों के उपचार हेतु औषधियां, वैक्‍सीन-टीके और एन्‍टी बॉयोटिक दवायें निर्यात कर मुनाफा कमाते रहें।

सर्वोच्‍च न्‍यायालय की मूल्‍यांकन समिति के अनुसार देश में हर साल 44 लाख टन कचरा पैदा होता है। ऑर्गनाइजेशन फॉर कारपोरेशन एण्‍ड डवलपमेंट ने इस मात्रा को 50 लाख टन बताया है। इसमें से केवल 38.3 प्रतिशत कचरे का ही पुनर्शोधन किया जा सकता है, जबकि 4.3 प्रतिशत कचरे को जलाकर नष्‍ट किया जा सकता है। लेकिन इस कचरे को औद्योगिक इकाइयों द्वारा ईमानदारी से पुनर्शोधन न किया जाकर ज्‍यादातर जल स्‍त्रोतों में धकेल दिया जाता है। मेनयूफेक्‍चरर्स ऐसोशियशन ऑफ इनफॉरमेशन टेक्‍नोलॉजी के एक अध्‍ययन में बताया गया है कि इलेक्‍ट्रोनिक उपकरणों के बढ़ते इस्‍तेमाल को देखते हुए अनुमान है कि 2011 में भारत में निकलने वाले ई कचरे की मात्रा 470 हजार टन से भी अधिक हो सकती है। ई कचरा बच्‍चों के खिलौनों, पुराने टीवी, कम्‍प्‍यूटर, माइक्रोवेव, और मोबाइल के रूप में भी निकलता है। कचरा भण्‍डारों को नष्‍ट करने के ऐसे ही फौरी उपायों के चलते एक सर्वे में ‘पर्यावरण नियोजन एवं समन्‍वय संगठन' ने पाया है कि हमारे देश के पेय जल में 750 से 1000 मिली ग्राम तक प्रति लीटर नाइटे्रट पानी में मिला हुआ है और अधिकांश आबादी को बिना किसी केमीकल ट्रीटमेंट के पानी प्रदाय किया जा रहा है, जो लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य पर बुरा असर डालता है। एप्‍को के अनुसार नाइट्रेट बढ़ने का प्रमुख कारण औद्यौगिक कचरा, मानव व पशु मल है। ई कचरे का निपटारा भी खतरों से जुड़ा है। क्‍योंकि इनसे खतरनाक व जानलेवा तत्‍व निकलते है। ट्रांजिस्‍टर की पिन में लगा कॉपर अलग करते समय डाई ऑक्‍सिन गैस निकलती है। कंप्‍यूटर के कल पुर्जों से यलो मेटल अगल करते समय साइनाइट गैस निकलती है। ये गैसें मानव स्‍वास्‍थ्‍य के लिए खतरनाक है।

ऐसे ही कारणों से लैंडफिल गैसों का उत्‍सर्जन बढ़ रहा है। नतीजतन बच्‍चों में ब्‍लू बेबी सिंड्रोम जैसी बीमारी फैल रही है। इन गैसों के आंख, गले और नाक में स्‍थित श्‍लेष्‍मा परत ;म्‍यूकोजल लाइनिंग के संपर्क में आने से दमा, सांस, त्‍वचा और एलर्जी की बीमारियां बढ़ रही हैं। कचरा मैदानों के ऊपर बने भवनों में रहने वाले लोगों में मूत्राशय का कैंसर घर कर लेने की आशंका ज्‍यादा बढ़ जाती है, वह भी खास तौर से महिलाओं में। लैंडफिल गैसें इन खतरों को चार गुना ज्‍यादा बढ़ा देती हैं। यह प्रदूषण गर्भ में पल रहे शिशु को भी प्रभावित करता है।

नियमानुसार कचरा मैदानों में भवन निर्माण का सिलसिला 15 साल बाद होना चाहिए। इस लंबी काल अवधि में कचरे के सड़ने की प्रक्रिया पूर्ण होकर लैंडफिल गैसों का उत्‍सर्जन भी समाप्‍त हो जाता है और जल में घुलनशील तरल पदार्थ लीचेड का बनना भी बंद हो जाता है। लेकिन प्रकृति की इस नैसर्गिक प्रक्रिया के पूर्ण होने से पहले ही हम जमीन के समतल होने के तत्‍काल बाद ही आलीशान इमारतों को वजूद में लाने का सिलसिला शुरु कर देते हैं। फिर नतीजा भुगतना होता है उस क्षेत्र में रहने वाली आबादी और इलेक्‍ट्रोनिक उपकरणों को ?

इस औद्योगिक-प्रौद्योगिक कचरे को नष्‍ट करने के अब प्राकृतिक उपाय भी सामने आ रहे हैं। हालांकि हमारे देश में तो घरेलू कचरे व मानव और पशु मल-मूत्र से ग्रामीण अंचलों में घर के बाहर ही ‘घूरे' में कूढ़े को प्रसंस्‍कृत कर खाद बनाने की प्राचीन परंपरा रही है। उपयोगिता और ज्ञान की यह ऐसी परंपरा है जिसके अंतर्गत कचरा महामारी का रुप धारण कर जानलेवा बीमारियों का पर्याय न बनते हुए खेत की जरुरत के लिए ऐसी खाद में रुपांतरित होता है, जो फसल की उत्‍पादकता बढ़ाने के साथ उसकी पौष्‍टिकता भी बढ़ाता है।

अब एक ऐसा ही अनूठा प्रयोग औद्योगिक-प्रौद्योगिक जहरीले कचरे को नष्‍ट करने में सामने आया है। अभी तक हम केंचुओं का इस्‍तेमाल खेतों की उत्‍पादकता बढ़ाने के लिए वर्मी कंपोस्‍ट खाद के निर्माण में कर रहें हैं। हालांकि खेतों की प्राकृतिक रुप से उर्वरा क्षमता बढ़ाने के लिए केंचुओं की उपयोगिता सर्वविदित है, पर अब औद्योगिक जहरीले कचरे को केंचुओं से निर्मित ‘वर्मीकल्‍चर‘ पद्धति चलन में लाए जाने का सफल प्रयोग अस्‍तित्‍व में आया है। अहमदाबाद के निकट मुथिया गांव में एक पायलट परियोजना शुरु की गई है। इसके तहत पिछले एक साल के भीतर जमा 60 हजार टन वजनी कचरे में 50 हजार केंचुऐं छोड़े गए थे। चमत्‍कारिक ढंग से केंचुओं ने इस कचरे का सफाया कर दिया। फलस्‍वरुप यह स्‍थल पूरी तरह प्राकृतिक ढंग से जहर के प्रदूषण से मुक्‍त हो गया। लैंडफिल गैसों से सुरक्षा के लिए कचरे को नष्‍ट करने के कुछ ऐसे ही प्राकृतिक उपाय अमल में लाने होंगे, जिससे कचरा मैदानों में बसी आबादी व इलेक्‍ट्रोनिक उपकरण सुरक्षित रहें।

मो. 09425488224

फोन 07492-232007, 233882

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है ।

प्रस्तुत अंश देश के होनहार एवं प्रगतिशील विचारधारा वाले समाज शास्त्र के एक पी एच डी के एक छात्र द्वारा प्रेषित शोध प्रबंध से लिया गया है। वह छात्र मेरे पास आया था एवं लुंगी पर लिखा यह अद्वितीय एवं अमूल्य शोध प्रबंध मुझसे जंचवाया था। मैंने अपनी तीसरी एवं सबसे तरोताजा प्रेमिका के सहयोग से राष्ट्रहित में लिखा गया एवं समकालीन पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता यह शोध  प्रबंध ओ. के. कर दिया है पाठक गण भी इस उच्च कोटि के शोध प्रबंध को मुक्त कंठ् से स्वीकार करेंगे ऐसी आशा है।

लुंगी राष्ट्रीय एकता की पहचान है, क्योंकि वह जन्म से महान है। लुंगी शिव है,  सुंदर है,  सत्य है अन्य कोई भी वस्त्र गुलाम है सेवक है,  अंग्रेजों का भक्त है। लुंगी सौम्य है,  सरल है, भारत की तरह अखंड है,  कुरते की प्राणेश्वरी है,  शक्ति में प्रचंड है।

उत्तर से दक्षिण तक लुंगी का राज्य है पूर्व से पश्चिम तक लुंगी का साम्राज्य है। लोग लुंगी पहनते हैं, ओढ़ते हैं, बिछाते हैं, रस्सी न हो तो लुंगी को बाल्टी में लगाते हैं। कामवाली बाई लुंगी का पोंछा बना लेती है, झाड़ू न हो तो लुंगी से झाड़ू लगा देती है। लुंगी अपनी और बच्चों की नाक पोंछने के काम आती है, लुंगी विवाह मंडप में गठजोड़ का भी काम कर जाती है। लुंगी में परिवार के लिये सब्जी बांधकर लाई जा सकती है, लुंगी पर बैठकर दाल रोटी खाई जा सकती है।

फैली हुई लुंगी धूप में छाया का काम करती है, लुंगी को कुंडी बनाकर पनिहारन सिर पर घड़ा रखती है। लुंगी माननीय लालूजी की पहचान है, लुंगी सम्माननीय करुणानिधि का संविधान है। लुंगीवला बच्चों को खिलोने लाता है, लुंगीराम सुंदिरियों को चूड़ी पहनाता है। लुंगी बेड रूम की शान होती है, लुंगी अच्छे पति की पहचान होती है।शहर के दादा लुंगी धारण कर सड़्कों पर बेधड़क घूमते हैं, लुंगीधारी बेरोजगार बस स्टेंड पर कन्याओं को घूरते हैं।
             
लुंगी पहनने वाला मरकर सीधे स्वर्ग जाता है, लुंगी विहीन नरक में ही जगह पाता है। लुंगी पहनकर लोग संसद में पहुंच जाते हैं, लुंगी के कारण ही वे टिकिट पाने में सफलता पाते हैं। साड़ी को फाड़कर लुंगी बनाई जा सकती है, तीन लुंगियों को मिलाकर एक साड़ी सिलवाई जा सकती है। लुंगी पहनने व उतारने में सरल होती है, लुंगी की गयी साधना सफल् होती है।लुंगी संभालने में हाथ पैर सदा व्यस्त रहते हैं,  इसलिये लुंगीधारी सदा स्वस्थ रहते हैं।

लुंगी सस्ती होती है, सुंदर होती है, टिकाऊ होती है, किसी नेता के ईमान की तरह बिकाऊ होती है। लुंगी सर्वधर्म संभाव की हामी है, हिन्दू मुस्लिम सिख, हर व्यक्ति लुंगी का अनुगामी है। लुंगी फैलाकर चंदा उगा सकते हैं, लुंगी से गले में फंदा लगा सकते हैं। लुंगी इंसान को एक अनुपम उपहार है, बूढ़े और जवान सभी को लुंगी से प्यार है। लुंगी पहनकर लोग राष्ट्रपति प्रधान  तक बन जाते हैंलुंगी विहीन संतरी पद पर ही सड़ जाते हैं। बड़े बड़े लोग लुंगी को सलाम करते हैं, चोर उठाईगीर आतंकवादी तक प्रणाम करते हैं। लुंगी ब्रह्मा का दुर्लभ वरदान  है, भरत वंशियों को लुंगी पर बड़ा अभिमान है। लुंगी पहनकर वीरप्पन ने देश में नाम कमाया, लुंगी लपेटकर लालूजी ने बिहार चलाया।

लुंगी का राष्ट्रीकरण जरूरी है, समझ में नहीं आता सरकार को क्या मजबूरी है। लुंगीवाद को हम सरकारी मान्यता दिलायेंगे, यदि अनदेखी हुई तो हम हड़ताल पर बैठकर भूखे मर जायेंगे। अब हम घर घर जायेंगे लुंगीवाद चलायेंगे, बच्चे वृद्ध जवानोँ को हम लुगी पहनायेंगे और हर लुंगी धारी को राष्ट्रप्रेम सिखलायेंगे।

लुंगी जिन्दाबाद लुंगीवाद जिंदाबाद।

आपका ही पी.एच डी का तमगा प्राप्त करने का अभिलाषी एक योग्य उम्मीदवार लुंगीराम लुंगीवाला।

तिरंगा लिख
न अच्छा न गंदा लिख
कोई कहानी जिंदा लिख|

 
किस दल को कब कहां दिया
काले धन का चंदा लिख|

 
काले चेहरे नहीं छुपा
सबका गोरख धंधा लिख|


पकड़े गये गुनाहों को
लिख फाँसी का फंदा लिख|

 
अंतस में घुमड़ें बादल
तो कोई बात चुनंदा लिख|

 
राज मुकुट पर बहुत लिखा
अब तो कीट पतंगा लिख|

 
चेहरे ढके मूखोटों से
उनको खुलकर नंगा लिख|

 
अवसरवादी कलमों ने
जो झूठा लिखा पुलंदा लिख|

 
खड़ी द्रोपदी विलख रही
दुर्यॊधन की जंघा लिख|

 
लगी हुई है आग वहां
मत कागज पर दंगा लिख|

 
लाख रहें कौमी झंडे
तू बस एक तिरंगा लिख|

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प्रभुद‌याल‌ श्रीवास्त‌व‌

manjari shukla (Custom)

गुरु वशिष्ठ के यहाँ बहुत से राजकुमार शिक्षा प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से आते थे और गुरुकुल मे रहा करते थे। गुरूजी सभी शिष्यों को समान रूप से प्रेम करते थे,और उनमें किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं करते थे। यूं तो सभी उनकी बहुत सेवा करते थे पर अमृत और शांतनु दिन रात की परवाह किये बगैर आश्रम का कार्य किया करते। जब उनकी शिक्षा पूरी हो गई और आश्रम छोड़ने का समय आया तो गुरूजी ने उन दोनों को बुलाकर कहा-"मैं तुम दोनों से बहुत प्रसन्न हूं,इसलिए तुम्हें दो बातें बता रहा हूँ-"अगर तुम इन पर अमल करोगे,तो तुम्हारे राज्य में सदा सम्पन्नता और खुशहाली रहेगी "दोनों राजकुमार एक साथ बोले-"हम आपकी आज्ञा अवश्य मानेंगे। गुरूजी मुस्कुराकर बोले-"तुम दोनों जहा तक हो युद्ध टालने की कोशिश करना और अहिंसा का मार्ग अपनाना और सदा प्रकृति की रक्षा करना। " दोनों राजकुमारों ने सहर्ष हामी भर दी और अपने अपने राज्य की ओर चल पड़े। शांतनु ने कुछ दिन तक तो गुरूजी की आज्ञा का पालन किया परन्तु राजा बनते ही उसने शिकार पर जाना शुरू कर दिया। हरे भरे वृक्षों को कटवाकर उसने कई नगर बसवाए। धीरे धीरे उसके राज्य में गिने चुने पेड़ ही बाकी रह गए। जिसकी वजह से पर्यावरण असंतुलित हो गया,और बारिश ना के बराबर होने लगी और आए दिन सूखा पड़ने लगा। वहीं दूसरी और अमृत को अपना वचन याद था। उसने राजा बनते ही शिकार पर पूर्णत: प्रतिबन्ध लगा दिया और जगह जगह पेड़ लगवाने शुरू कर दिए। वह जब भी कोई खाली जमीं पड़ी देखता तो वहां पर फूलों के बीज बिखरवा देता और कुछ ही दिनों बाद वहां रंग बिरंगे सुंदर फूल उग जाते। प्रजा भी अपने राजा को पूरा सहयोग करती और बच्चे से लेकर बूढ़े - कोई भी फूलों को नहीं तोड़ता था।

फूलों पर रंग बिरंगी तितलिया मंडराया करती और लोग ठगे से इस मनोरम दृश्य को देखने लगते। अमृत एक दिन दरबार मै बैठा हुआ अपनी प्रजा के बारे में बात कर रहा थे तभी एक दूत दौड़ता हुआ आया और बोला –“-"महाराज,राजा शांतनु ने हमारे राज्य पर आक्रमण करने की योजना बनाई है और वह अपनी विशाल सेना सहित युद्ध करने के लिए दो दिन में आ जायेगा। " यह सुनकर अमृत परेशान होता हुआ बोला-"युद्ध होने से तो हजारों सैनिक मारे जायंगे और मासूम प्रजा भी बर्बाद हो जाएगी। " इस पर महामंत्री विनम्र शब्दों मे बोला-"परन्तु महाराज,अगर हम युद्ध नहीं करेंगे तो वह हम सबको बंदी बना लेगा। " यह सुनकर अमृत के मुख पर चिंता की लकीरें उभर आई और वह बिना कुछ कहे अपने कक्ष में चला गया। बिना कुछ खाए पिए वह सारी रात और सारा दिन सोचता रहा की युद्ध को कैसे टाला जाएं। सुबह की पहली किरण के साथ ही वह उठकर बगीचे में चले गए। रंग बिरंगे फूलों से लदे हुए वृक्षों को देखकर अचानक उनके मन में एक विचार आया और उन्होंने तुरंत महामंत्री को बुलाकर अपनी योजना समझा दी। महामंत्री का चेहरा भी अमृत के साथ ख़ुशी से खिल उठा। इसके बाद राजा आराम से सोने चला गया। शाम के समय राजा शांतनु ने राज्य की सीमा में अपने हजारों सैनिकों के साथ प्रवेश किया और नगर की खूबसूरती देखकर वह अचंभित रह गया। चारों तरफ हरे भरे पेड़ हवा के साथ साथ झूम रहे थे। मोगरा,बेला और चमेली की कलिया चटख रही थी और चारों और भीनी भीनी सुगंध आ रही थी। मालती के गुच्छे लता के सहारे दीवारों पर चढ़े हुए बहुत ही सुन्दर लग रहे थे। उसे कुछ पलों के लिए ऐसा लगा मानो वह किसी फूलों के जादुई संसार में आ गया हो। तभी उसके सेनापति ने कहा -"महाराज,अब हमें आक्रमण करना चाहिए। " "हाँ - हाँ क्यों नहीं कहता हुआ शांतनु आगे की और बढ़ा। जैसे ही सैनिकों ने तलवारें म्यान से निकली और प्रजा को मारने के लिए आगे बढ़े , लाखों मधु मक्खियों ने उन पर धावा बोल दिया। अब उनकी तलवारें भी किसी काम की नहीं रही। मधु मक्खियों ने पूरी सेना को काट काट कर लहू लुहान कर दिया। वे जान बचने के लिए वापस भागे। इसी बीच शांतनु को भी मधु मक्खियों ने चेहरे पर काट लिया और उसका मुंह सूजकर गुब्बारे की तरह हो गया। अचानक उसका संतुलन बिगड़ गया और वह घोड़े से नीचे गिर पड़ा। उसका सर किसी नुकीली वस्तु से टकराया और वह बेहोश हो गया। जब उसको होश आया तो वह अमृत के राजमहल में था और अमृत उसके माथे पर प्यार से हाथ फेर रहा था। उसकी आँखों की कोरो से आंसू बह निकले। वह रुंधे गले से बोला-"मैं तुम्हें जान से मारने आया था और तुम्हीं ने मेरी जान बचाई है। " अमृत उसके आँसूं पोछते हुए बोला -"मैंने हमेशा गुरूजी की सीख पर अमल किया है। अहिंसा ही मेरा धर्म है। " यह सुनकर शांतनु शर्मिंदा होते हुए बोला -"पर जब तुम्हें पता था की मै तुम पर आक्रमण करने वाला हूं तो तुम अपनी सेना लेकर मुझसे युद्ध करने क्यों नहीं आये ? " इस पर अमृत मुस्कुराता हुआ बोला-" मेरी मधु मक्खियों की सेना गई तो थी तुमसे लड़ने और देखो उन्होंने मेरे वर्षों पुराने मित्र को एक बार फिर मुझसे मिला दिया। " अमृत ने शांतनु के चेहरे पर अचरज के भाव देखकर कहा-"तुमने देखा की मेरे राज्य में हर कदम पर वृक्ष फूलों से लदे हुए है और उनमें सैकड़ों मधु मक्खियों ने अपने छत्ते बनाये हुए है। जब तुम्हारी सेना आई तो मेरे सैनिकों ने गुलेलों से छत्तों पर पत्थर मारे और छिप गए। और गुस्से में वे सारी मधु मक्खियाँ तुम लोगों पर टूट पड़ी।" शांतनु अमृत की दूरदर्शिता और सूझबूझ देखकर हैरान रह गया और बोला -"मुझे माफ कर दो और अब मैं चलता हूँ। " यह सुनकर अमृत बड़े प्यार से बोला-"मैं तुम्हें खाली हाथ नहीं जाने दूंगा क्योंकि मैं तुम्हारे राज्य की सारी स्थिति जानता हूँ , तुम जितना चाहे उतना धन ले जा सकते हो और कई बोरों में फूलों के बीज भी हैं उन्हें तुम मिटटी में दबवा देना ताकि जब मैं तुम्हारे यहाँ आऊं तो तुम्हारे राज्य को खूब हरा भरा पाऊ। " शांतनु अमृत का प्यार देखकर ख़ुशी के मारे रो पड़ा और बोला-"मैं भी अपने राज्य को तुम्हारे जैसा ही "फूलों का नगर" बनाऊंगा। " और दोनों मित्र खिलखिलाकर जोर से हंस पड़े।

 

डॉ. मंजरी शुक्ल

श्री समीर शुक्ल

सहायक प्रबंधक

इंडियन आयल कारपोरेशन

गोरखपुर ट्रेडिंग कंपनी

गोलघर

गोरखपुर

२७३००१

ग़ज़ल 55

गिनता हैं हर सांस बही में लेता रोज उतार।

बड़ा काईयां हैं ये उपर वाला लेखाकार ॥

 

कुछ दिन आयी खुशियां लौटी दे यादों के घाव,

दुखियारे दुःख पास बैठ के करते अब उपचार।

 

सांसे जितनी ले कर आये कम पड़ती देखी,

अधिक सूद का लालच दे कर ले ली और उधार।

 

ये रस्‍ता तो बस्‍ती से सीधा मरधट को जाता है,

न जाने किस रस्‍ते पर हैं स्‍वर्ग नर्क के द्वार।

 

चंदे के मंदिर में बैठा निर्भर नित्‍य पुजारी पर,

भक्‍त खड़े हैं कितने उसके आगे हाथ पसार।

 

जिसकी भी चाहे जैसी वो किस्‍मत लिख देता है,

किसने दिये विधाता को ये ‘दामोदर‘ अधिकार।

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ग़ज़ल 7

अपना तो देखा भाला था।

सच कब चुप रहने वाला था॥

  

और अर्थ थे खामोशी के,

क्‍यों माना मुँह पे ताला था।

 

कौन गवाही देगा उसकी,

झूठ ने झूठा भ्रम पाला था।

 

उबटन के उपरांत भी उसका,

चहरा ज्‍यों का त्‍यों काला था।

 

ऐसे कब तक टल सकता था,

ले दे के अब तक टाला था।

 

इस साँचे को किसने ‘जांगिड'

कौन से साँचे में ढ़ाला था।

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ग़ज़ल 48

आदमी या रुप खोटा, आदमी का आदमी।

कब उतारेगा मुखौटा, आदमी का आदमी॥

 

आदमी जो कि गया था आदमी को ढूंढने ,

और कर के कत्‍ल लौटा, आदमी का आदमी।

 

आदमी की रुह आखिर तिलमिला कर रह गयी,

रख रहा गिरवी लंगोटा, आदमी का आदमी।

 

इतनी भारी भीड़ में भी हैं अकेला आदमी।

कर रहा महसूस टोटा, आदमी का आदमी।

 

आदमी का कद अगर दें आदमी को नापने,

नाप दे छोटे से छोटा, आदमी का आदमी ।

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ग़ज़ल 18

इक सचेतक सजग गुप्‍तचर लेखनी।

और बजी सर्वदा बन गज़र लेखनी॥

 

जब ये विरही के मन की तहों में गयी,

तब गयी दौड़ पी के नगर तेखनी।

 

जब भी बस्‍ती में निर्बल कराहें सुना,

तो सुना रोयी हैं रात भर लेखनी।

 

हासिये तू भी सुर्खी तब आ सका

जब चली तुझपे कस के कमर लेखनी।

 

जो इतिहास लिख्‍खी थी तलवार ने

मिट गयी होती होती न गर लेखनी।

 

जुर्म सहकर बगावत क्‍यों खामोश है,

इससे वाकिफ हैं ये जादूगर लेखनी।

 

जो भी ढ़र्रे से हट के चली हैं कभी

विश्‍वकर्मा हुई वो अमर लेखनी।

 

 

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दामोदर लाल जांगिड़

पो0लादड़िया

नागौर-राज0

deepti b parmar

( प्रभा खेतान के उपन्यास पर केन्द्रित )
विशिष्ट प्रतिभा की धनी प्रभा खेतान (1 नवम्बर 1942 से 19 सितम्बर 2008 )
ने दर्शन शास्त्र् से एम. ए. कर ज्याँ पोल सार्त्र् के अस्तित्ववाद पर पीएच. डी. की।
'अपरिचित उजाले','कृष्णधर्मा मैं' सहित छह कविता संग्रह,'आओ पेपे घर चलें'
और 'छिन्नमस्ता' सहित सात उपन्यास, दो उपन्यासिकाएँ, 'शब्दों का मसीहा सार्त्र्'
और 'बाजार के बीच : बाजार के खिलाफ' सहित पाँच चिंतनपरक पुस्तकें, तीन
संपादक पुस्तकें, एक आत्मकथा तथा अनेक दक्षिण अफ्रीकी कविताओं के हिन्दी
अनुवाद के लिए ख्याति प्राप्त और राहुल सांकृत्यायन तथा बिहारी पुरस्कार जैसे
विशिष्ट पुरस्कारों से सम्मानित प्रभा खेतान का हिन्दी समकालीन लेखन में
चिरस्मरणीय योगदान हैं।

'छिन्नमस्ता' प्रभा खेतान का मारवाड़ी समाज की नारी जीवन से सम्बन्धित वो
संघर्ष और मुक्ति की गाथा है जो अब तक साहित्य में अप्रस्तुत थी। उपन्यास की
नायिका प्रिया लड़की होने के कारण बचपन से ही अवहेलना एवं घरेलू बलात्कार का
भोग बनी हुई है। विवाह के बाद उसे मारवाड़ी समाज में होनेवाले बहुविवाह की
कुप्रथा के कारण दुसरी औरत का स्थान प्राप्त होता है। पति का कठोर शाशन,
संपत्ति समझकर अनवरत होनेवाले बलात्कारों का सिलसिला आदि स्थितियां उसे
अनेक यातनाओं से भर देती है। अनेक यातनाओं को छिन्नमस्ता देवी की तरह
अपने उपर झेलकर प्रिया उन्हीं यातनाओं के सामने अपना संहारक, विद्रोही एवं
आत्मनिर्भर रूप दिखाकर दयनीय स्थिति से मुक्ति पाती है। पौराणिक गाथाओं के
अनुसार छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं में पांचवी देवी है। यह अपना ही कटा हुआ
सिर अपने बायें हाथ में लिये हुए है। मुंह खुला और जीभ निकली हुई है। अपने
ही गले से निकली रक्तधार को वह चाटती है। इनके हाथ में खड़ग, गले में मुण्डों
की माला रहती है। छिन्नमस्ता निर्वस्त्र् रहती है। इसका यह रूप भयंकर अवश्य है
किन्तु शक्ति का प्रतिरूप है। छिन्नमस्ता वह शक्ति है जो संसार बनाती भी है और
उसका नाश भी करती है। जो महामाया षोडशी, भुवनेश्वरी बनकर संसार का पालन
करती हुई अन्तकाल में छिन्नमस्ता बनकर सर्वनाश कर डालती है। महाप्रलय की
प्रक्रिया में छिन्नमस्ता की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

प्रिया को छिन्नमस्ता का प्रतीक बनाकर प्रभाजी ने उपन्यास में नारी जीवन की यातना,
संघर्ष, विद्रोह एवं मुक्ति को अधिक सशक्तता से प्रस्तुत किया है।
'छिन्नमस्ता' कलकत्ता में रहनेवाले उच्चवर्गीय मारवाड़ी परिवार की कथा है, जहाँ घर
में काम करने के लिए ढेरों नौकर है, परिवार की आन, बान और शान देखते ही
बनती है। किन्तु 'छिन्नमस्ता' की किसी भी औरत के जीवन को जरा सा खुरेचो, तो
उसमें दर्द, पीड़ा और आँसुओं का दरिया मिलेगा। यद्यपि उसकी अलमारी में हजारों
साड़ी, ब्लाउज, ढेर सारा मेकअप का सामान और हीरों के कीमती आभूषण मिलेंगे
किन्तु शारीरिक एवं मानसिक अत्याचारों से भीतर से टूट चुकी है। इस परिवार में
लड़की के जन्म को अशुभ, बोझ और हुंडी माना जाता है। प्रिया इस परिवार की
स्त्री कस्तुरी की अनचाही चौथी बेटी है। अतः माँ ने न उसे कभी गोद लिया, न पास
सुलाया, न बीमार होने पर कभी डॉक्टर को बुलाया। वह सदैव एक शाश्वत दूरी
बनाएं रखती है। चौथी लड़की का होना प्रिया की माँ कस्तुरी के लिए भाररूप है।
अतः प्रिया दाई माँ की बेटी के रूप में पहचानी जाती है कस्तुरी की बेटी के रूप में
नहीं। प्रिया को पढ़ा लिखाकर स्वयं की पहचान बनाने के लिए नहीं किन्तु सिर्फ
विवाह के लिए बड़ा किया जाता है। सिर्फ विवाह ही उनका भविष्य है। साथ ही उसे
'काली लड़की' से पहचाना जाता है। पढ़ने लिखने की उसकी इच्छा का कोई मूल्य
नहीं, विवाह के बाजार में उसकी बौद्धिक क्षमता नहीं उसकी चमड़ी का रंग
महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। इसी वैचारिक परिवेश में प्रिया की परवरिश होती है।

प्रिया को जन्म से ही विद्रोहिणी बनाने के मूल में पारिवारिक वैचारिकता के साथ साथ
अनेक यातनाओं की भी लंबी सूची है। उसका शैशव अनवरत बलात्कारों की कड़ी
है। सौतेले भाई द्वारा बार बार किये गये बलात्कारों ने दस वर्षीय प्रिया के अन्दर
भय एवं घृणा भर दी है। जैसे जैसे प्रिया बड़ी होती गयी उसका मन विद्रोह के उफान
से भरता जाता है।

प्रिया को छिन्नमस्ता बनाने में मारवाड़ी परिवार में चल रही बहुविवाह की कुरीति एवं
उसको मिलने वाला दूसरी औरत का दर्जा भी महत्त्वपूर्ण है। बहुविवाह प्रथा के
चलते प्रिया करोड़पति घराने के नरेन्द्र की दूसरी औरत बन जाती है। दूसरी औरत
का दर्जा देनेवाला नरेन्द्र एक हैल्दी एनिमल से ज्यादा कुछ नहीं है। उसका मशीनी
यौनावेग प्रिया की संवेदनाओं को मार डालता है अतः प्रिया पति द्वारा बनाये गये
हरबार के सम्बन्ध को बलात्कार की तरह झेलती है। अनवरत बलात्कारों का
सिलसिला और पति का कठोर शासन प्रिया को विद्रोहिणी बनाने में अपना प्रगाढ़
योगदान देता है। प्रभा खेतान ने उच्चवर्गीय, सामन्ती परिवारों में पुरुष की
अधिकार भावना, पुरुषीय वासना, पुरुषसत्ता की निरंकुशता, संपत्ति पर एकाधिकार
की भावना, स्त्री के प्रति तिरस्कृत एवं तुच्छ दृष्टिकोण आदि का वर्णन करते हुए
उनकी बखिया उधेड़ कर रख दी है- जहाँ स्त्री के पास पैसे हैं, जेवरात है, महेंगी
पार्टियां हैं, जिसमें पैसे खर्च किये जा सकते हैं। यदि व्यवसाय के लिए उन जेवरों
को बेचना चाहे तो संयुक्त परिवार की संपत्ति होने के कारण कोई संभावना नहीं।
व्यक्ति के निज कोने पर कोई अधिकार नहीं, उसकी अभिरुचियों का कोई सम्मान
नहीं, वह कपड़ों पर खर्च कर सकती है, किताबों पर नहीं। चूंकि कमाती नहीं
इसलिए गरीब नौकर की मौके पर मदद का हक उसे नहीं। अपने सिद्धांतों के
क्रियान्वयन, मानवीयता की भावना के तहत यदि कुछ करना चाहें तो स्त्री को कमाना
होगा अथवा गुलाम की तरह पति की दया पर जीवित रहना होगा। 1

पति के धनाढ्य परिवार में पति के नाम से जानना प्रिया को स्वीकार्य नहीं, किन्तु
'व्यक्ति के तौर पर बड़ा होना और हर एक का अपनी प्रतिभा का भरपूर दोहन
करने का तर्क परंपरागत परिवारों में समझा या समझाया नहीं जा सकता। बौद्धिक
क्षमता का उपयोग होना चाहिए अथवा 'काम' स्त्री के लिए जीवन शक्ति हो सकता
है।' 2 'यह न प्रिया के पिता का परिवार समझता है न पति का।' 3 नरेन्द्र तो यह
भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं कि स्त्री होने के कारण प्रिया का अपना भी
कोई वजूद हो सकता है, उसकी अपनी भी कुछ इच्छाएँ और वैचारिकता भी हो
सकती है, वह भी अपनी प्रतिभा से कुछ कर सकती है। वह मारवाड़ी बिजनेसमेन
है जो अमरीका जाकर शोपिंग करता है किन्तु पत्नी के ओफिस आने पर कहता है
'श्रृंगार पटार करो और रंडियों सी जा कर ओफिस में बैठो।' 4

नरेन्द्र प्रिया को व्यवसायिक क्षेत्र में प्रवेश देने के लिए बिलकुल तैयार नहीं है, किन्तु
अनायास जब प्रिया को नरेन्द्र के व्यवसाय में 'डमी पार्टनर' बनने का मौका मिल
जाता है, तब वह अनेक विराधी परिस्थितियों में भी अपना व्यवसाय, नाम और पैसा
बनाने के लिए पूरे सामर्थ्य से लग जाती है। नीना के यह कहने पर कि 'माँ हम
लोगों को रुपयों की तो जरूरत नहीं' प्रिया का उत्तर है 'मुझे तो है बेटा' 5 प्रिया
अपनी प्रतिभा से अपनी अलग पहचान बनाती है। प्रिया की यह विशेषता स्त्री को
सिर्फ घर गृहस्थी के लायक समझने वाले नरेन्द्र के लिए चुनौती बन जाती है और
प्रिया का संघर्ष बढ़ जाता है। नरेन्द्र की बच्चों को छीन लेना, घर से निकालना,
रिजर्व बैंक में पत्र लिखकर बिजनेस बंद करवाने की धमकियाँ प्रिया को अधिक
विद्रोही बना देती है। अपने पिता की मृत्यु के बाद घर में भी लड़कियाँ लानेवाला
नरेन्द्र प्रिया की बिजनेस ट्रिप को 'अकेले मोज करने की आदत' कहता है और
कहता है 'मैं सीरियस हूँ' फिर कहता हूँ यदि आज तुम लन्दन गई तो मेरे घर में
तुम्हारी जगह नहीं है। यह भी साली कोई जिन्दगी है जब देखो तब बिजनेस।
कल कस्टमर आ रहे है। तो आज सैम्पल बंधवाने में ही फैक्टरी में रात के दस
बज गये। फिर रात को साली फोन की घंटी बजती रहती है। घर न हुआ
पागलखाना हो गया।' 6 घर नरेन्द्र का है उसमें प्रिया रहे या नहीं यह निर्णय नरेन्द्र
का अधिकार क्षेत्र है। फिर सुन लो, यहाँ मत आना। आओगी तो मैं धक्के देकर
बहार निकलवा दूँगा। 7

स्त्री की परंपरागत भूमिका से भिन्न रुप परिवार एवं समाज को स्वीकार्य नहीं है।
पुरुषों के अधीनस्थ की भूमिका वाले कार्य स्त्री सदियों से कर रही है, किन्तु स्त्री जब
पुरुष के बराबर रहकर कुछ करना चाहे तो प्रश्न खड़े हो जाते है। पुरुष की इसी
मानसिकता पर अलका सरावगी की टिप्पणी है- 'ऐ औरत तूने जब भी किसी भी
कोने में पुरुष से अलग अपना कुछ बनाया है तो तुझे इसकी कीमत देनी पड़ी है 8
प्रिया ने भी जब अपने लिए पैसे कमाने चाहे अपने स्वतंत्र अस्तित्व के विषय में
सोचा, ऐसे में उसके हिस्से में सजा का आना निश्चित ही था। नरेन्द्र प्रिया को
परिवार और बिजनेस दोनों में से एक विकल्प चुनने के लिए कहता है, प्रिया
बिजनेस को चुनती है, क्योंकि वह जान चुकी है कि परिवार, प्यार, समर्पण,
वफादारी आदि शब्दों का उपयोग स्त्री को भ्रमर में फँसाने के लिए ही है। नारी के
सम्बन्ध में प्रयुक्त मानवाचक संबोधन नारी आहुति परंपरा को कायम रखने के लिए
ही होते हैं।

पुरुष सर्वोच्च वादी परिवार में प्रिया छिन्नमस्ता बनकर मुश्किल राहों में भी अपना
मार्ग बना लेती है। देश विदेश में अपना बिजनेस फैलाकर सफलता प्राप्त कर के
राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित होती है। 'इन्डिया टुडे' में उसका फोटो छपता है-
'ए ग्रेट बिजनेस इन्टरप्राइझर मिसेस प्रिया।' प्रिया अपने व्यक्तित्व को एक विशेष
उँचाई पर पहुँचाकर पति परिवार एवं समाज को मुंह तोड़ जवाब देती है वहीं अपने
साहस से नारी समाज को भी एक नयी पहचान देती हुई संघर्ष द्वारा मुक्ति का मार्ग
खोजने की प्रेरणा देती है। मैंने दुःख झेला है। पीड़ा और त्रासदी में झुलसी हूँ,
जिस दिन मैंने त्रासदी को ही अपने होने की शर्त समझ लिया उसी दिन, उस
स्वीकृति के बाद, मैंने खुद को एक बड़ी गैर जरूरी लड़ाई से बचा लिया। कुछ के
प्रति मेरा समर्पण था। सारे जुल्मों के सामने सलीब पर लटकते मैंने पाया कि अब
पूरी तरह जिन्दगी की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हूँ। 9

'छिन्नमस्ता' काश ! इस उपन्यास को मैं फिर से लिख पाऊँ' लेख में प्रभा खेतान
लिखती है साधारण मानवीय रूप में मेरी नायिका प्रिया अपनी व्यथा को कहती है
और हमें कहते कहते अपने एक त्रासद अतीत से उबारती है। समाज के अनुसार
उसे मर जाना चाहिए था, टूट जाना चाहिए था। उसका सर तो पहले ही कट चुका
था, लेकिन फिर भी वह छिन्नमस्ता देवी अपने रक्त से परिवेश से और अन्ततः
अपने पति से लड़ती हुई अपनी जिन्दगी बनाती है क्योंकि मेरे जीवन की सबसे बड़ी
प्रेरणा रही है कि स्त्री अपनी मानवीय गरिमा के लिए संघर्ष करे, उसे जगत में अपने
होने के माध्यम से हासिल करके रहे।

'छिन्नमस्ता' उपन्यास में प्रभा खेतान ने नारी मुक्ति की संघर्ष गाथा को उसकी
मानवीय गरिमा के साथ प्रस्तुत किया है। छिन्नमस्ता बनकर अपने लिए रास्ता
तलाश ने का नारी का प्रयत्न समाज का तिलमिलाने वाला कटु यथार्थ है।

संदर्भ :
1 'छिन्नमस्ता' प्रभा खेतान पृष्ठ, 194 , 197
2 वही पृष्ठ, 157
3 वही पृष्ठ, 215
4 वही पृष्ठ, 154
5 वही पृष्ठ, 15
6 वही पृष्ठ, 14
7 वही पृष्ठ, 14
8 'शेष कादम्बरी' अलका सरावगी पृष्ठ, 78
9 'छिन्नमस्ता' प्रभा खेतान पृष्ठ, 10

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समीक्षक :
डॅा. दीप्ति बी. परमार प्रवक्ता - हिन्दी विभाग
श्रीमती आर. आर. पटेल महिला महाविद्यालय, राजकोट

एक दिन-- कुछ हसरतें

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तुझसे बेपनाह मोहब्बत करता हूँ,

सारी जिंदगी समझाता रहा,

खून के एक-एक कतरे से,

खत लिख,मर कर एलान- ए- मोहब्बत

कर जाऊँगा” एक दिन”!

 

तेरी एक"हाँ" के इंतेज़ार में,

सारी जिंदगी तड़पता रहा,

गर क़ुबूल ना की मेरी मोहब्बत,

तो तेरी अर्थी का फूल बन,

बदनाम कर जाउँगा “एक दिन”!

 

मयखाने में तो रोज पीता हूँ,

ज़ाम का नशा बहुत हुआ,

अब तेरी आँखों से पी कर,

मदहोश हो जाना चाहता हूँ ,

बस” एक दिन”!

 

प्रभु तेरी बेरहम दुनिया में,

मैं रोज कत्ल होता हूँ,

पर तू पत्थर बन देखता ही रहा,

तेरे दर पे सर पीट हमेशा के लिए,

रुखसत हो जाउँगा” एक दिन”!

 

किसी ग़रीब पे सितम ना कर,

उसकी हाय में वो ताक़त है,

की पत्थर को भी रेत बना,

धारा पे ला सकता है” एक दिन”!

 

दूसरों की लिए बहुत जिया,

मुझसे मैं ही छिन गया,

अब तो बस यही ख्वाहिश है,

की खुद के लिए जी अपने को

पहचान पाऊँ बस” एक दिन”!

 

गर हौसले बुलंद हो,

और दिल में जज़्बा हो,

तो पत्थर से भी पानी,

निकाल प्यास बुझा ,

सकता है” एक दिन”!

 

खुद के लिए तो रोज जीते है,

आपनी हसरतें पूरी किए गये ,

किसी गमज़दा की आँखों से गम ,

चुरा ले,तो तुझे खुदा यही मिल

जाएगा” एक दिन’ !

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आँखों ही आँखों में

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जब जहन में शब्द ना हो,

और जुबां थम जाए,

तो कुछ बातें हो जाती हैं,

बस आँखों ही आँखों में!

 

प्रेम के दो शब्द ,

कहने में उम्र गुजर जाती है,

इकरारे मोहब्बत हो जाता है,

बस आँखों ही आँखों में!

 

समय की नज़ाकत को समझ,

कुछ इशारे हो जाते है,

शब्द पढ लिए जाते हैं,

बस आँखों ही आँखों में!

 

बेवफ़ाई वो कर गये,

प्यार को ठुकरा दिया,

इनकार हमने पड़ लिया,

बस आँखों ही आँखों में!

 

तन्हाई में हम क़ैद थे,

सहारा ढूंढते रहे,

दर्द-ए-दिल वो समझ गये,

बस आँखों ही आँखों में!

 

उनकी एक झलक को तरसते रहे,

पुर जिंदगी हम,

एक दीदार हुआ,

और कत्ल हो गये,

बस आँखों ही आँखों में!

 

डॉली उठी मेरे यार की,

किसी और की वो हो गयी,

अलविदा हमें कह गयी,

बस आँखों ही आँखों में!

 

सुहाग की सेज पे,

सनम का दीदार है,

अब उम्र कट जाए,

बस आँखों ही आँखों में!

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rajeev shrivastava

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

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