रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

November 2010
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

अब तो जागो!
कौन देख रहा है
हमारे बहते आंसू
लहूलुहान मन
और तन
जिस पर
करते आये हैं
प्रहार
जाने कितने लोग
सदियाँ गुजर गयीं
पीड़ाएँ भोगती रहीं
हमारी पीढियां
हमने
फल दिए
फूल दिए
और दीं
तमाम औषधियां
फिर भी
हम रहे
उपेक्षित
पीढित
अपने ही घर में
अपनों के ही बीच
अब तो जागो-
हे कर्णधारो!
क्योंकि
हम बचेंगे
तो बचेगा
धरा पर
जल और जीवन.

---


परिचय
अवनीश सिंह चौहान

जन्म: 4 जून, 1979, चन्दपुरा (निहाल सिंह), इटावा (उत्तर प्रदेश) में
पिता का नाम: श्री प्रहलाद सिंह चौहान

माताका नाम: श्रीमती उमा चौहान
शिक्षा: अंग्रेज़ी में एम०ए०, एम०फिल० एवं पीएच०डी० (शोधरत्) और बी०एड०

प्रकाशन: अमर उजाला, देशधर्म, डी एल ए, उत्तर केसरी, प्रेस-मेन, नये-पुराने, गोलकोण्डा दर्पण, संकल्प रथ, अभिनव प्रसंगवश, साहित्यायन, युग हलचल, यदि, साहित्य दर्पण, परमार्थ, आनंदरेखा, आनंदयुग, कविता कोश डॉट कॉम, सृजनगाथा  डॉट कॉम, अनुभूति डाट काम, हिन्द-युग्म डॉट कॉम, रचनाकार, साहित्य शिल्पी , पी4पोएट्री डॉट कॉम, पोयमहण्टर डॉट कॉम, पोएटफ्रीक डॉट कॉम, पोयम्सएबाउट डॉट कॉम, आदि हिन्दी व अंग्रेजी के पत्र-पत्रिकाओं में आलेख, समीक्षाएँ, साक्षात्कार, कहानियाँ, कविताओं एवं नवगीतों का निरंतर प्रकाशन। साप्ताहिक पत्र ‘प्रेस मेन’, भोपाल, म०प्र० के ‘युवा गीतकार अंक’ (30 मई, 2009) तथा ‘मुरादाबाद के प्रतिनिधि रचनाकार’ (2010) में गीत संकलित। मेरी शाइन (आयरलेंड) द्वारा सम्पादित अंग्रेजी कविता संग्रह ' ए स्ट्रिंग ऑफ वर्ड्स' में रचनाएँ संकलित

प्रकाशित कृतियाँ: स्वामी विवेकानन्द: सिलेक्ट स्पीचेज, किंग लियर: ए क्रिटिकल स्टडी, स्पीचेज आफ स्वामी विवेकानन्द एण्ड सुभाषचन्द्र बोस: ए कॅम्परेटिव स्टडी, ए क्विन्टेसेन्स आफ इंग्लिश प्रोज (को-आथर), साइलेंस द कोर्ट इज इन सेशन: ए क्रिटिकल स्टडी (को-आथर), फंक्शनल स्किल्स इन लैंग्वेज एण्ड लिट्रेचर, ए पैसेज टु इण्डिया: ए क्रिटिकल स्टडी (को-आथर)
अप्रकाशित कृतियाँ: एक नवगीत संग्रह, एक कहानी संग्रह तथा एक गीत, कविता और कहानी से संदर्भित समीक्षकीय आलेखों का संग्रह आदि
अनुवाद: अंग्रेजी के महान नाटककार विलियम शेक्सपियर द्वारा विरचित दुखान्त नाटक ‘किंग लियर’ का हिन्दी अनुवाद भवदीय प्रकाशन, अयोध्या से प्रकाशित ।
संपादन:
प्रख्यात गीतकार, आलोचक, संपादक श्री दिनेश सिंहजी (रायबरेली, उ०प्र०) की चर्चित एवं स्थापित कविता-पत्रिका ‘नये-पुराने’ (अनियतकालिक) के कार्यकारी संपादक पद पर अवैतनिक कार्यरत।
प्रबुद्ध गीतकार डॉ०बुद्धिनाथ मिश्र (देहरादून) की रचनाधर्मिता पर आधारित उक्त पत्रिका का आगामी अंक शीघ्र ही प्रकाश्य। वेब पत्रिका ‘गीत-पहल’ के समन्वयक एवं सम्पादक ।
सह-संपादन: कवि ब्रजभूषण सिंह गौतम ‘अनुराग’ अभिनंदन ग्रंथ (2009) के सह-संपादक ।
संपादन मण्डल: प्रवासी साहित्यकार सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ (नॉर्वे) अभिनंदन ग्रंथ (2009) के सम्पादक मण्डल के सदस्य ।
ब्लॉग: पूर्वाभास (http://poorvabhas.blogspot.com)
सम्मान :
अखिल भारतीय साहित्य कला मंच, मुरादाबाद (उ०प्र०) से ब्रजेश शुक्ल स्मृति साहित्य साधक सम्मान, वर्ष 2009
हिंदी साहित्य मर्मज्ञ सम्मान, अक्षरा, मुरादाबाद, उ.प्र., 2010
प्रथम पुरुष सम्मान, उत्तरायण, लखनऊ, उ.प्र., 2010
संप्रति:

प्राध्यापक (अंग्रेज़ी), तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद, उ.प्र

स्थायी पता: ग्राम व पो.- चन्दपुरा (निहाल सिंह), जनपद-इटावा (उ.प्र.)-२०६१२७, भारत ।
मोबा० व ई-मेल: 09456011560, abnishsinghchauhan@gmail.com

--
Abnish Singh Chauhan
Lecturer
Department of English
Teerthanker Mahaveer University
Moradabad (U.P.)-244001

*****************************************************
Web Info: www.printsasia.com/BookDetails.aspx?Id=882727714
www.marelibri.com/topic/39-main/books/AUTHOR_AZ/2200
bhavdiya.com/book_detail.php?cat_id=english&&id=161
www.dkagencies.com/doc/from/1023/.../MicroSubjectDetails.html
www.poemhunter.com/abnish-singh-chauhan/
www.poemsabout.com/poet/abnish-singh-chauhan/
http://www.completeclassics.com/p/m/poem.asp?poem=22816623&poet=1036823&num=4&total=6
http://www.completeclassics.com/p/m/poem.asp?poem=22847650&poet=1036823&num=1&total=6
profiles.tigweb.org/abnishsingh
afewlittlebooks.com/biographical poetfreak.com/poet/AbnishSinghChauhan
www.articlesbase.com/.../formative-influence-of-swami-vivekananda-on-subhash-chandra-bose-a-biographical-study-2157719...
http://www.actionfigureshq.info/tag/chandra/
http://www.articlesbase.com/literature-articles/social-exclusion-and-exploitation-in-mulk-raj-anand039s-untouchable-a-subaltern-study-2227611.html
http://www.professionalencouragers.info/father-of-the-career-guidance-movement/
http://www.bluemoonpiano.com/monster-cit/
http://kavita.hindyugm.com/2010/05/jalati-samidhayen.html
http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B6_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8
http://geetpahal.webs.com/home.htm
http://wikieducator.org/User:Abnish
http://geetpahal.webs.com/
http://poorvabhas.blogspot.com/

--
Abnish Singh Chauhan
Lecturer
Department of English
Teerthanker Mahaveer University
Moradabad (U.P.)-244001

*****************************************************
Web Info: www.printsasia.com/BookDetails.aspx?Id=882727714
www.marelibri.com/topic/39-main/books/AUTHOR_AZ/2200
bhavdiya.com/book_detail.php?cat_id=english&&id=161
www.dkagencies.com/doc/from/1023/.../MicroSubjectDetails.html
www.poemhunter.com/abnish-singh-chauhan/
www.poemsabout.com/poet/abnish-singh-chauhan/
http://www.completeclassics.com/p/m/poem.asp?poem=22816623&poet=1036823&num=4&total=6
http://www.completeclassics.com/p/m/poem.asp?poem=22847650&poet=1036823&num=1&total=6
profiles.tigweb.org/abnishsingh
afewlittlebooks.com/biographical poetfreak.com/poet/AbnishSinghChauhan
www.articlesbase.com/.../formative-influence-of-swami-vivekananda-on-subhash-chandra-bose-a-biographical-study-2157719...
http://www.actionfigureshq.info/tag/chandra/
http://www.articlesbase.com/literature-articles/social-exclusion-and-exploitation-in-mulk-raj-anand039s-untouchable-a-subaltern-study-2227611.html
http://www.professionalencouragers.info/father-of-the-career-guidance-movement/
http://www.bluemoonpiano.com/monster-cit/
http://kavita.hindyugm.com/2010/05/jalati-samidhayen.html
http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B6_%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%B9_%E0%A4%9A%E0%A5%8C%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8
http://geetpahal.webs.com/home.htm
http://wikieducator.org/User:Abnish
http://geetpahal.webs.com/
http://poorvabhas.blogspot.com/

art4

एकः-

विश्‍वास रूपी दीपक जो जलाते रहें,

मंजिल की समीपता आप पाते रहें।

 

गीत विश्‍वासों के निःस्‍वर होते नहीं,

सुबह के प्रिय दृश्‍य आप गाते रहें।

 

हृदय की कुण्‍ठा का पास आना क्‍या,

सत्‍य पर निष्‍ठा जब तक बनाये रहें।

 

तृष्‍णा के बढ़ने से होता भी क्‍या है,

सिन्‍धु सच का जब तक लहराता रहे।

 

छोड़ सभी मनोविकारों को अपने,

राग विश्‍वासों के यूं ही गाते रहे॥

 

दोः-

------

गैर जो कभी थे वे अपने लगे हैं,

बिछुड़े हुए साथी भी मिलने लगे हैं।

 

जैसा कि कुछ किसी से मैंने न चाहा,

वह दोष अपने बताने लगे हैं।

 

उनके तरफ की जो अड़चने हैं,

मित्रों में भेदभाव मिटने लगे हैं।

 

गैर जो कभी थे यहां तक आ गए,

खुशियों के सपने संजने लगे हैं।

 

दुश्‍मनी भुलाने का मौका जो देखा,

कई लोग मौके पर बढ़ने लगे हैं।

 

बढ़ते कदमों को इनके जो देखा,

स्‍वजन भी मन में हंसने लगे हैं।

 

आने के वायदे किये जिसने भारती',

दोस्‍ती के रिश्ते भी फलने लगे हैं॥

--

शशांक मिश्र ‘‘भारती''

दुबौला-रामेश्‍वर

पिथौरागढ़

बाल विवाह -एक बेईमानी

clip_image001

गुड़ियों के संग खेलती,

चिड़िया सी चहक रही,

माँ -बापू की लाड़ली,

फूलों सी महक रही!

छोटे-छोटे हाथों से,

मिट्टी का घर बना रही,

साजो-समान रख,

रंगों से सज़ा रही!

आज खूब सजी-धजी,

फिर भी रो रही,

सखियाँ बता गयी,

की उसकी शादी ही रही!

माँ का आँचल पकड़,

उससे प्रश्न कर रही,

क्या खता हो गयी,

जो आज विदा हो रही!

बापू के पांव पकड़,

प्रार्थना वो कर रही,

ना भेजो घर दूजे,

फूट-फूट रो रही!

मासूम सी कली,

आज कैसी ढल गयी,

खेलने के दिन थे,

खुद खेल बन गयी!

अग्नि के चहुं दिशा,

सात बार घूमती,

कुंड में स्वाह हो रहे,

बचपन को ढूंढती!

विवाह की रीति से,

अबोध अंजानी है,

रोक दो ये शादी,

ये शादी बेईमानी है!

---

एच . आई .वी- पॉज़िटिव

clip_image002

अशांत मन,खुद से घृणा

ग्लानि,भय,अफ़सोस और

ऐसे कई सारे भाव से लिप्त

एक युवक,प्रयोगशाला के द्वार

पर बैठा,एक नतीजे का इंतज़ार

कर रहा था!

कुछ समय पूर्व मतिभ्रष्ट

पदभ्रष्ट होकर ,यौवन की

आँधी में बहकर, परिणाम

से बेख़बर एक दुष्कर्म

कर बैठा था!

आज पहली बार प्रभु से

विनती कर रहा था,की

इस परिणाम में असफल

हो जाए,पर नतीजा आया

और खुद को वो एच .आई .वी

पॉज़िटिव पाया!

एक पल मे मानो ,जिंदगी

हाथ से फिसलती प्रतीत

हो रही थी!अंधकार ही अंधकार

किससे बताए,कहाँ जाए ,

कहे तो कैसे कहे,

यही सवाल उसे सता रहे थे और

उसकी भूल का अहसास दिला रहे थे!

सौभाग्य से एक व्यक्ति

फरिश्ता बन कर आया!

और उसने ऐ. आर .टी*

सेंटर का पता बताया!

जहाँ गोपनीय ढंग से उसकी

पुनः जाँच हुई!इस बीमारी

की विस्तृत जानकारी मिली

और मुफ़्त इलाज की शुरूआत हुई!

ऐसे ही कई युवक रोज अज्ञानता के

कारण इस बीमारी का शिकार

हो रहे है! अपने अनमोल जीवन

को यू मुफ़्त में ही खो रहे है!

सुरक्षित यौन संबंध ही इस बीमारी

से बचा सकती है!यौन शिक्षा ही

अज्ञानता को दूर भगा सकती है!

एच आई वी एक संक्रामक रोग है!

असुरक्षित यौन संबंध ,गैर क़ानूनी

रक्त दान ,संक्रमित सुई से संपर्क

पीड़ित माँ से अजन्मे बच्चे को, यही

इसके फैलने के स्रोत है!

इस बीमाऱी के खिलाफ मिल कर लड़ना है !

इसे जड़ से समाप्त कर आगे बढ़ना है !

मानव जीवन प्रभु की अनमोल रचना है!

हमें इस बीमारी से हर हाल में बचना है!

--

*Anti retroviral treatment center

---

सर्दी-हाइकु

लो सर्दी आई

निकाल लो रज़ाई

ठिठुर रहे!

 

सर्दी की धूप

बरामदे में बैठे

चाय पिएँगे !

 

गर्म कपड़े

बाहर निकाल लो

धूप दिखाओ !

 

ओस की बूँद

कोहरे की चादर

दिखता नहीं !

 

काँपते हाथ

ठिठुरता बदन

उफ़ ये सर्दी !

 

घना कोहरा

छुप गया सूरज

धूप गायब !

 

लकड़ी जली

सब हाथ तापते

बातें करते !

 

मुख से धुआँ

सबके निकलता

बच्चों की मस्ती !

 

अंधेरा जल्दी

सब घर भागते

सड़कें सूनी !

 

बढ़ती सर्दी

ग़रीब की आफ़त

जान भी जाती !

 

-

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

art7

परवरिश

सबेरे की हल्की बारिश में

नहाई हुई सुबह के माथे पर

अब चमकने लगी है

सोनेरी सूरज की बिदिंया

अलसाये से शरीर को लिये

मैं बैठी हूँ बगीचे में

और देख रही हूँ

एक चिड़िया और उसके छोटे से बच्चे को

 

चिड़िया फुदक-फुदक कर

बड़ी सतर्कता से चारों तरफ देखकर

चोंच नीचे झुकाकर

दाना उठाती है और

पीछे-पीछे आ रहे

बच्चे के मुँह में डाल देती है

एक मूक पक्षी में भी

समझ है अपने बच्चे की

परवरिश करने की

और मेरी आँखों के सामने

छा जाता है कपड़ों में लिपटा हुआ

एक नवजात शिशु

जिसे एक अभागन माँ

छोड़ गई है गाँव के बाहर झाड़ियों में

 

एक पाती मुक्तक के नाम

मुक्तक, मेरे बच्चे,

आज तुम फिर चले गये

मेरे मन को रीता-रीता करके।

स्कूल के गेट पर

विदा लेते हुए, हाथ हिलाते हुए

तुम्हें कुछ कहना चाहती थी

पर कह नहीं पाई।

 

मेरे बच्चे,

होस्टेल में

तुम्हारा सामान जमाते समय,

तुम्हारा बिस्तर लगाते समय,

मैं कुछ छोड़कर आई हूँ तुम्हारे लिये,

तुम्हारे पसंद के नाश्ते के डब्बे के साथ

वहीं पास में

रखकर आई हूँ

एक छलकता हुआ घड़ा

जो भरा हुआ है

मेरे प्रेम और स्नेह के जल से।

 

बेटा, जब कभी किसी परेशानी से

तुम निराश हो जाओ

और आँखें नम हो जायें

तो थोड़ा सा पानी लेकर

अपना चेहरा धोना

तुम्हारी आँखों पर छाया धुँधलापन

हट जायेगा

और तुम्हारी आँखों में बसे मेरे सपनों

तक पहुँचने की डगर

तुम्हे स्पष्ट दिखाई देने लगेगी।

 

दिन भर की कठिन मेहनत के बाद

अगर तुम्हारा गला सूखने लगे

तो घड़े का एक घूँट पानी पीना

मुझे विश्वास है मेरे बच्चे

कि चिलचिलाती धूप में भी

तुम्हें बारिश का अहसास होगा।

 

अरे हाँ,मेरे बच्चे,

जरा उपर तो नजर करना

वहीं कहीं तुम्हारे बिस्तर के उपर

मच्छरदानी के साथ

मैं लटका के आई हूँ

मेरी साड़ी का आँचल

रात को जब थककर सो जाओ

तो उसे ओढ़ लेना

सबेरे माँ तुम्हारे माथे को चूमकर

तुम्हें जगा रही है, यह अहसास होगा।

 

मैं तो यहाँ हर पल काटती हूँ

तुम्हारी यादों के सहारे

क्योंकि मेरे पास तो नहीं है

किसी के स्नेह का छलकता घड़ा,

किसी के आँचल का पल्लू

मैं तो बस कैलेंडर के पन्ने पलटते हुए

करती रहती हूँ तुम्हारी

अगली छुट्टियों का इंतज़ार।

----

 

डॉ. मालिनी गौतम

मंगलज्योत सोसाइटी

संतरामपुर-३८९२६०,गुजरात

एक फ़ौजी की कहानी

clip_image001

आया बुलावा धरती माँ का ,

जब दुश्मन ने ललकारा,

चल दिया वीर सब को छोड़ ,

जब माँ ने उसे पुकारा!

 

सारे रिश्ते छोटे पड़ जाते ,

जब माँ होती परेशान,

बढ़ गया अकेला शूरवीर,

अपना सीना तान!

 

पत्नी ने लगाया तिलक ,

और कहा जम के करो सामना ,

बच्ची लिपट रोने लगी ,

बोली पापा जल्दी घर आना !

 

नम आँखों से ली विदाई ,

पर दिल मे था आक्रोश ,

अपने वतन की करने को रक्षा ,

रगों में था जोश !

 

चल दिया सरहद की ओर

पूरा करने अपना फर्ज़

अब जान की परवाह नहीं

चुकाना है माँ का कर्ज़

 

अस्त्र -शस्त्र से हो के लैस ,

बढ़ चला दुश्मन की ओर ,

मार-मार के चित किया ,

दिखा दिया बाजुओं का ज़ोर !

 

विजय मिली फहराया तिरंगा ,

बढ़ाया धरती माँ का मान ,

अचानक एक गोली लगी सीने में ,

और निकली वीर की जान !

 

मरने से पहले साथियों से ,

घर भिजवाया समाचार ,

ये जन्म रहा धरती माँ के नाम ,

अगला तुम पे रहा उधार !

 

शहीद हो गया एक और वीर ,

खुशी-खुशी दे दी अपनी जान ,

शहीद के मरने पर गर्व करो ,

आँसू बहा के ना करो अपमान !

 

हे वीर आज नम आँखों से ,

मैं करूं तुझे सलाम ,

तू ही देश का सच्चा प्रेमी ,

जो भारत माँ के लिए

दे दी अपनी जान-----जय हिंद !

---

गाँव वापस जाना है

clip_image001[4]

शहर की इस दौड़ा भागी से,

अब तंग आ चुका हूँ!

इन उँची-उँची मीनारों,

के बीच में खो गया हूँ!

 

मैं क्या हूँ,मैं क्यों हूँ,

मेरा वजूद क्या है?

अब यही मेरे मुझसे प्रश्न है,

इन सभी प्रश्नों का उत्तर मुझे

पाना है,मुझे अब,

गाँव वापस जाना है!

 

सुबह तनाव में उठता हूँ,

और तनाव में ही जीता हूँ,

दिन भर भागते-भागते,

रात हो जाती है,तो सो ,

जाता हूँ ,इस चिंता के साथ,

की कल फिर भागना है,

मुझे अब सुकून से

पेड़ के नीचे खटिया पे सोना है ,

मुझे गाँव वापस जाना है!

 

नहीं है कोई ऐसा जिसे,

अपना कह सकूं,सब अपनी

दुनिया में जीते हैं.

पड़ोसी -पड़ोसी कों नहीं जनता,

कोई किसी को अपना नहीं मानता,

मुझे अपने लोगों के बीच जाना है

पेड़ की छांव में बैठ बातें करनी है,

मुझे गाँव वापस जाना है!

 

हर तरफ मकान ही मकान

पार्क के नाम पर कुछ घास

कुछ मूर्तियां और झूले,

भीड़ इतनी की जी घबराता है,

भाग जाने को दिल करता है.,

मुझे खेतों में खड़े होकर गन्ना

चूसना है,मुझे खेतों से चिड़िया भगानी है,

मुझे गाँव वापस जाना है!

 

क्या खा रहा हूँ ,नहीं पता

बस जीना है ,इसलिए खाना है,

सो खा रहा हू,ना कोई स्वाद ,ना ही

कुछ खाने की इच्छा,बस कुछ भी

खाए जा रहा हू,

मुझे अपनी माँ के हाथों की

चूल्‍हे पे बनी रोटी खानी है,

मुझे गाँव वापस जाना है!

 

ताजी हवा में साँस लेना

क्या होता है ? ,ये भूल चुका हू!

जब भी साँस लेता हूँ,

जिंदगी के कुछ पल कम,

हो जाने का डर रहता है!

हर तरफ धूल-ही धूल,

चेहरा भी काला पढ़ जाता है

मुझे खेतों में खड़े होकर

खुली हवा में साँस लेना है

मुझे गाँव वापस जाना है!

 

पानी नाप के पीता हूँ,

थोड़े में ही नहा लेता हूँ,

कुछ बाद के लिए बचाना होता है,

यहाँ तक कभी कभी पानी

भी खरीद के पीता हू!

मुझे नदी में नहाना है,

मुझे कुएँ का ताज़ा पानी पीना है,

मुझे तो बस अब

गाँव वापस जाना है!

---

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

सज़ा दो
मेरे क़ातिल का मुझे कोई पता दो,
या उसे मेरी तरफ़ से दुआ दो।

मैं चराग़ों की हिफ़ाज़त कर रहा हूं,
बात ये सरकश हवाओं को बता दो।

बेवफ़ा कह के घटाओ मत मेरा कद,
है वफ़ा की चाह तो ख़ुद भी वफ़ा दो।

छोड़ कर जाने के पहले ऐ सितमगर,
इक अदा सच्ची मुहब्बत की दिखा दो।

जीते जी गर दूरी ज़ायज थी जहां में,
कांधा तो मेरे जनाज़े को लगा दो।

ये किनारे बेरहम हैं बदगुमां हैं,
कश्तियों, मंझधार को अपनी बना लो।

चांदनी से चांद की इज़्ज़त है जग मे,
रौशनी दो या अंधेरों की सज़ा दो।

ज़िन्दगी कुर्बान है कदमों मे तेरे,
ऐ ख़ुदा मरने का मुझको हौसला दो।

प्यार में दरवेशी का आलम है दानी,
मिल सको ना तो तसव्वुर की रज़ा दो।

चंद मुस्कुराते- शेर !

बेदर्द जमाने में कोई अपने मिल जाते हैं ,

ढूँदने से राख में अँगारे निकल आते हैं !

 

प्यार में पल-दो पल में इकरार नही होता ,

जो पल में हो जाता है वो प्यार नही होता !

 

बस यही सोच कर हम हर गम पिए जाते हैं ,

की आप की महफ़िल में मेरे शेर पढ़े जाते हैं !

 

जाम का नशा तो पल दो पल में उतर जाएगा ,

जिसे हुस्न का नशा होगा वो आशिक कहाँ जाएगा !

 

सूखे हुए फूलों से घर नहीं सजता, रेत के टीलों से महल नहीं बनता ,

जिन रिश्तों में वफ़ाई नहीं होती, उन रिश्तों से प्यार का आशियाँ नहीं बनता !

 

महफ़िल ख़त्म हो जाती है, मेहमान घर चले जाते हैं ,

उस शाम को याद करने को, बस छलके जाम रह जाते हैं !

 

दोस्त तो कई मिलते है, कुछ जिंदगी का हिस्सा बन जाते हैं

फूल भी कई खिलते है, कुछ खुशनसीब ही किताबो में जगह पाते हैं !

---

nari

नारी तुम श्रृंगार करो, तन का नहीं मन का

सादगी स्वच्छता सत्य शील, लक्ष्य बनाओ जीवन का

 

हाथों में कंगन नहीं, दान को सुशोभित करो

आँखों में काजल नहीं, करुणा ममता का भाव भरो

 

वाणी में मृदुता का रस हो, मन में सेवा की भावना

मुख पर कोमल प्रेम का सौम्य, सदाचार की जीवंत प्रतिमा

 

दया त्याग का अलौकिक तेज, और फूलों सी कोमलता

शीतल गंगा सी अश्रुधारा, जैसे मोती की उज्ज्वलता

 

वीरता और कोमलता का, यह अटूट संगम

आदर्श नारी का यह श्रृंगार, अलौकिक और अनुपम

---

एकता नाहर

Email id : EktaNahar5@gmail. com

hobies : writing, sketching

Deendayal Sharma, Author new (Custom)

समर्पण

माँ

बहिन

बीवी

बेटी

और न जाने

कितने रूपों में

तू

समर्पित है

तेरा जीवन

सबके लिए अर्पित है

ममता उड़ेलती

प्यार बांटती

तू

अंतत:

बंट जाती है  

पञ्च तत्वों में

और

हो जाती है लीन

ब्रह्म में

बुनती ताना - बाना

नारी !

तुझे हर रूप में

पड़ा है

कड़वा घूँट पीना

फिर भी

छोड़ा नहीं है

तूने

बार- बार जीना..

-----

- दीनदयाल शर्मा

अध्यक्ष, राजस्थान साहित्य परिषद् , 

हनुमानगढ़  - 335512  

 

हास्य हास्य व्यंग्य hasya hasya-vyangya vyangya

एक बार यमदूत

एक कवि के चक्कर में पड़ गया

गया था उसकी जान लेने

पर अपनी देने पर उतर गया.

 

कवि के पास जाकर बोला--

अपनी आखरी कविता पढ़ जाओ,

दस तक गिनता हूँ,तबतक

इस भैंसे पर चढ़ जाओ.

 

कवि  मन ही मन मुस्कुराया

बहुत दिनों बाद कोई मुल्ला पाया.,

कवि बोला ,आओ आओ
कुछ कविता सुन लो ,

पेट-रस,क्रिकेट -रस ,खेल-रस ,रेल-रस

महंगाई-रस ,बेहयाई-रस

चाहे जो चुन लो.

 

चार कविता सुनने पर चाय-नास्ता मुफ्त है.

परिस्थिति-किचेन से बेलन,चिमटा आ सकते है,

पर इसी में तो कविता सुनने का लुत्फ़ है.

शर्त-घरवाली का चंडी-रूप देखकर घबडाना नहीं

कुछ थाली-ग्लास झेलकर भी हड़बड़ाना नहीं.

 

सावित्री की तरह पीछा करेगी

सिर्फ एक इच्छा  करेगी---

पर उसकी बातों में मत आना.

कहेगी- भूलकर भी इस कवि के बच्चे को

वापस मत लाना.  

 

इतना कहकर कवि भैंसे पर चढ़ा

भैंसा आगे बढ़ा

कवि ने मुँह खोला

उधर चित्रगुप्त का सिंहासन  डोला.

अभागा! किस पापी को ला रहा है

खुद तो फंसा ही है

मुझे भी फंसा रहा है.

 

कवि ने राग अलापा

शुरू किया अपना स्यापा.

यम ने रोका, कवि को टोका

रे कवि! तू चुप ही चल.

 

कवि गुस्साया, खूब भिन्नाया-

रे यम! तू सुनता चल,

अगर कुछ गड़बड़ की तो

राजनीति-रस पढ़ दूंगा ,या फिर

चीनी, पेट्रोल, लहसुन, प्याज पर ही

कुछ नया गढ़ दूंगा.

 

आखिर यम जान पर खेल गया

मन मार कर कवि को झेल गया.

चित्रगुप्त के पास जाकर बोला -

सर! अब आप अपना जॉब कीजिये.

जल्दी से इसका हिसाब कीजिये.

 

चित्रगुप्त ने खाता खोला और  

कवि से बोला---

सुनो ! तुमने साहित्य की बहुत हानि की है

जबतक तक चला है खूब मनमानी की है

लोगों को पकड़कर जबरदस्ती बैठाया है

लोग रोते  रहे पर तुमने कविता सुनाया है.

 

चप्पल,टमाटर और अंडे

तुम्हारे  कारण बर्बाद हुए हैं,

तुम्हारे सूरत से फायदा उठा कर

लुच्चे-लफंगे आबाद हुए हैं.

 

इस सब का तुम्हें पाप लगेगा

इसके अलावा  आधा दर्जन बच्चे और

इकलौती बीवी का श्राप लगेगा.

 

इस सब का दंड पाना होगा

जितने दिनों तक कविता किये हो

उतने दिनों के लिए नर्क जाना होगा.

यह सुनकर धर्मराज दूत को बुलाने लगे,

उधर मौका पाकर कवि जी  कविता सुनाने लगे.

 

कविता सुनकर गधे रेंकने लगे

श्रोताओं को जो मिला फेंकने लगे.

तभी एक दूत आया  ,पूछा

साहब! दूसरा लाऊं?

चित्रगुप्त ने कहा--अभी बहुत थका हूँ

अभी मत लाना.

 

चाहे और कुछ लाना ,पर

कवि मत लाना.

.

v k verma,sr.chemist,D.V.C.,btps
vijayvermavijay560@gmail.com

 

बिहार में आए ऐतिहासिक जनादेश ने साबित कर दिया है कि अर्से तक हिंसा, अराजकता और परिवारवाद की अजगरी गुंजलक में जकड़ा बिहार अब करबट ले रहा है। सकारात्‍मक सोच और रचनात्मक वातावरण का निर्माण करते हुए आम लोगों में विकास की भूख जगी है। नतीजतन नीतीश भाजपा गठबंधन के साथ दोबारा सत्ता में लौटे। कांग्रेस, बसपा, लोजपा और वामपंथी दलों की बात तो छोड़िए बिहार की राजनीतिक बड़ी ताकत रहे लालूप्रसाद यादव अपनी पत्‍नी और बिहार की पूर्व मुख्‍यमंत्री राबडी देवी समेत पूरे कुनबे को डूबो बैठे। बिहार के परिणाम देश के राष्‍ट्रीय क्षितिज और क्षेत्रीय दलों के लिए एक ऐसा संदेश है कि मतदाता अब जातिवाद, वंशवाद को नकारने के साथ अहंकारवादियों से भी मुंह मोड़ रहा है। बिहार की जीत इस बात का भी तकाजा है कि किसी क्षेत्र में यदि विषमता दूर होगी तो हिंसा पर भी अंकुश लगेगा। देश में बढ़ती विषमता के साथ-साथ हिंसा बढ़ रही है, इस संदर्भ में बिहार में नीतीश कुमार का कुशल राजनीतिक नेतृत्‍व एक सबक है। बिहार की यह विजयश्री राजनीतिक स्‍थिरता के लिए भी मेंडेट है, जिससे विकास की गति आगामी पांच साल अवरुद्ध न हो। कांग्रेस को अपेक्षित सफलता नहीं मिली इससे जाहिर होता है कि राहुल गांधी का जादू बिहार में नहीं चला। मतदाता वंशवाद के सम्‍मोहन से तो मुक्‍त हो ही रहा है, परिवारवाद की जो बनावटी नेतृत्‍व की पहल सामने आ रही है उसके प्रति भी आक्रोशित है। नीतीश कुमार की जीत वह आंधी और बाढ़ है जिसने बिहार की ऊबड़-खाबड़ राजनीतिक जमीन को समतल कर दिया है।

अब तक किसी भी राज्‍य में सत्तासीन रही गठबंधन सरकार रचनात्‍मक परिवेश निर्माण के बूते न तो अपनी सार्थकता सिद्ध कर पाईं और न ही परिपक्‍वता। बिहार में बीते पांच साल नीतीश कुमार और सुशील कुमार मोदी की सहमति से वजूद में रही जेडीयू और बीजेपी गठंधन सरकार ने जरूर इस परिपक्‍वता को जमीनी धरातल देने में कामयाबी हासिल की है। विचारधारा और व्‍यक्‍तिगत व्‍यवहार के स्‍तर पर क्षेत्रीय दलों में विकल्‍प शून्‍यता दिखाई देती रही है, जिसे नीतीश ने संवैधानिक व राजनीतिक प्रतिबद्धता और आंतरिक उदारता व सुशासन से भरा है। इस चुनाव में मतदाताओं ने यह भी उद्‌घोषणा की है कि मतदाता की समझ अब व्‍यक्‍तिवादी महत्‍वाकांक्षा और जातिवादी राजनीति से ऊपर पहुंच गई है। अतिवाद और अभिमान से उसने मुंह फेर कर इस तरह की राजनीति को सलाम कर गर्त का रास्‍ता दिखा दिया है। राजनेता के चाल, चरित्र और चेहरे से अब मतदाता को सौजन्‍य विनम्रता की अपेक्षा है। इस नजरिए से यदि हम पिछले कुछ सालों में देश के अन्‍य राज्‍यों में हुए विधानसभा चुनावों की पड़ताल करें तो मध्‍यप्रदेश में मतदाता ने शिवराज सिंह चौहान के विकास की तुलना में उमाभारती की धर्म और उन्‍माद की राजनीति के हौसलों को पश्‍त किया। वहीं राजस्‍थान में बंसुधराराजे सिंधिया के सामंती दंभ को अशोक गहलोत के बरक्‍स पटखनी दी। क्‍योंकि इस अंहकारी महारानी ने सिंचाई के लिए पानी मांग रहे किसानों और आरक्षण की मांग कर रहे गुर्जरों की छातियों पर गोली चलाने में कोई रहम नहीं दिखाया। नतीजतन राजसी नेतृत्‍व और फिंरगी चाल वाली इस महिला को राजस्‍थान की महिला मतदाताओं ने भी स्‍वीकार नहीं किया था। छत्तीसगढ़ में पूर्व नौकरशाह और मुख्‍यमंत्री रहे अजीत जोगी को भी सहज सरल रमण सिंह की तुलना में मतदाता ने नमंजूर किया। लालूप्रसाद और रामविलास पासवान को बिहार में आईना दिखाते हुए मतदाता ने तय कर दिया है कि लोकतंत्र अब अतिवादियों, नौकरशाहों और सामंती प्रवृत्ति के तानाशाहों की पनाहगाह नहीं रहा, बिहार का निर्णय इस सोच की तसदीक है। आने वाले दिनों में उत्तरप्रदेश में भी इसी परिणाम का विस्‍तार दिखाई देगा। वैसे भी उत्तरप्रदेश के 16 जिले ऐसे हैं जो बिहार की सीमा से तो सटे हैं, ही यहां के लोगों और बिहार के लोगों के बीच रोटी-बेटी के संबंध भी हैं, जो असरकारी साबित होंगे।

नीतीश बिहार में नेरन्‍द्र मोदी की विकासवादी और परिवारवाद से मुक्‍त छवि के आभामण्‍डल के साथ उभरे हैं। जिस तरह से बीते 10-12 सालों में नेरन्‍द्र मोदी का परिवार व कुटुम्‍ब के प्रति कोई आग्रह नहीं दिखा, वही स्‍थिति बिहार में नीतीश की है। नीतीश का गांव में आज भी कच्‍चा घर है। लेकिन इसका आशय यह नहीं है कि विकास धारा नीतीश के गांव तक नहीं पहुंची। नीतीश ने गांव में सड़क पाठशाला, अस्‍पताल, पशुचिकित्‍सालय और आंगनवाड़ी केंद्रों को तो सुदृढ़ किया ही सुरक्षा के भी पर्याप्‍त इंतजाम किए। नीतीश जहां सहज, सरल और आम आदमी के प्रति आसान पहुंच के लिए सजग रहे, वहीं लालू-पासवान पंचतारा संस्‍कृति के अनुयायी तो रहे ही जातीय-ग्रस्‍तता से भी ऊपर नहीं उठ पाए। लिहाजा लोगों ने जीवन शैलियों में फर्क किया, राजनीतिक उत्तर दायित्‍वों का अहसास किया और विकास के लिए नीतीश को वोट दिया।

जिस सोशल इंजीनियरिंग की शुरूआत लालू ने यादव-मुसलमान, पिछड़ो और दलितों के गठजोड़ से बिहार में 15 साल सरकार चलाई। वहीं उत्तरप्रदेश में मायावती ने ब्राह्मण, हरिजन और मुसलमानों के जातीय समीकरण के बूते सत्ता हथियाई। इधर बिहार में नीतीश का ऐसा नया जातीय उभार कर का गणित देखने में आया कि उसके मताधिकार के प्रयोग ने सारे समीकरणों के गूढ़ार्थ ने जातीय गठजोड़ को नए अर्थ दिए। नीतीश ने दलितों में महादलित, मुसलमानों में पसमाना मुसलमान, पिछड़ों में अतिपिछड़े और मध्‍य वर्ग को अपने राजनीतिक कौशल से अपने हित में धु्रवीकृत किया। नीतीश ने यादवी दबंगी से मुक्‍ति के इस रसायन से कुछ ऐसा महारसायन गढ़ा कि महिला मतदाताओं में भी विकास की भूख जगा दी। नतीजतन नीतीश के गठबंधन को महिलाओं के वोट पुरूषों की तुलना में चार फीसदी ज्‍यादा मिले। यह स्‍थिति मजबूत कानून व्‍यवस्‍था के चलते संभव हुई। नीतीश ने महिलाओं को पंचायती राज व्‍यवस्‍था में 50 फीसदी और शिक्षकों की भर्ती में भी 50 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण देकर उनकी नेतृत्‍व क्षमता को महत्‍व दिया। छात्राओं को मुफ्‍त साइकिलें देकर भी उनकी शाला तक पहुंच को सरल बनाया। बहरहाल हर वर्ग के मतदाताओं में विकास, रोटी और रोजगार की भूख जगाने में नीतीश की सोशल इंजीनियरिंग एक कारगर हिस्‍सा बन के उभरी।

जिस निचले तबके में अंदरूनी चल रही लोक लहर ने नीतीश को दोबारा बिहार की सत्ता पर आसीन किया है, उस लोक लहर को जगाने और उसे आबाज देने का काम लालू ने ही किया था। लेकिन इसी बुलंद हुई जबान से लोगों ने लालू से जब विकास मांगा तो वे बाधा बनकर पेश आए। दबे-कुचलों के विकास की आवाज को लालू ने तवज्‍जो नहीं दी। लालू बिहार में समस्‍याओं के हल ढूंढ़ने के प्रति संघर्ष करने की बजाय, लोकसभा में सांसदों के वेतन बढ़ाने, भ्रष्‍टाचार को संरक्षण देने और जातीयता को बढ़ावा देने के लिए जरूर वे अपनी विलक्षण शैली में आवाज बुलंद करते देखे गए। इन सब संकीर्ण कारणों के चलते ही लालू को बिहार में सर्वसमाजों से राजनीतिक ताकत देने के लिए जो जमात मिली थी, उसे भी लालू ने केवल जातीय वजूद के परिप्रेक्ष्‍य में देखना शुरू कर दिया था। जिसका नतीजा यह रहा कि लालू जहां लोकसभा में महज चार सांसदों की उपस्‍थिति के साथ हैं वहीं, बिहार में बमुश्‍किल दो दर्जन विधायकों की जमात में सिमटकर रह गए। कांग्रेस ने भी इस चुनाव में लालू से पल्‍ला झाड़कर उन्‍हें ठेंगा दिखा दिया है।

नीतीश नैतिकता के तकाजे के साथ भी पेश आए। उन्‍होंने समय पूर्व राज्‍यपाल को इस्‍तीफा तो दिया ही, बिहार विधानसभा में केबिनेट की बैठक आहूत कर वर्तमान विधानसभा भी 27 नवबंर से पहले भंग कर दी। जिससे जिसकी भी नई सरकार बने उसे अड़चन का सामना न करना पड़े। यह नैतिकता वर्तमान राजनीति के चरित्र में दुष्‍कर होती जा रही है। राजनीतिक दलों और नेताओं को इस पहल से सबक सीखने की जरूरत है।

बहरहाल देश हित और स्‍वच्‍छ राजनीति के पैरोकार के रूप में नीतीश का जीतना इसलिए भी जरूरी था कि शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य और सुरक्षा को दुरूस्‍त करने और नागरिकों को सड़क, पानी व बिजली मुहैया कराने के भी कोई मायने होते हैं ? यदि नीतीश को विजयश्री नहीं मिलती तो देश राजनीति में अपराधीकरण निजात पाने और कानून व्‍यवस्‍था के सुदृढ़ीकरण की दिशा में आगे बढ़ने को प्रोत्‍साहित नहीं होता। तय है आगे भी देश में बिहार का अनुसरण होगा।

---

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

pramod.bhargava15@gmail.com

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है ।

देश की चर्चित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक त्रैमासिक पत्रिका  ‘सरस्वती सुमन’  का आगामी अंक  ‘मुक्‍तक विशेषांक’  होगा जिसके अतिथि संपादक  होंगे सुपरिचित युवा कवि  जितेन्द्र ‘जौहर’ । उक्‍त विशेषांक हेतु आपके  विविधवर्णी (सामाजिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक, धार्मिक, शैक्षिक, देशभक्ति, पर्व-त्योहार, पर्यावरण, श्रृंगार, हास्य-व्यंग्य, आदि अन्यानेक विषयों/ भावों) पर केन्द्रित मुक्‍तक एवं तद्‌विषयक सारगर्भित एवं तथ्यपूर्ण आलेख सादर आमंत्रित हैं।

लेखकों-कवियों के साथ ही, सुधी-शोधी पाठकगण भी ज्ञात / अज्ञात / सुज्ञात लेखकों के चर्चित अथवा भूले-बिसरे मुक्‍तक भेजकर ‘सरस्वती सुमन’ के इस  दस्तावेजी ‘विशेषांक’  में सहभागी बन सकते हैं। प्रेषक का नाम ‘प्रस्तोता’ के रूप में प्रकाशित किया जाएगा। प्रेषक अपना पूरा नाम व पता (फोन नं. सहित) अवश्य लिखें।

प्रेषित सामग्री के साथ फोटो एवं परिचय भी संलग्न करें। समस्त सामग्री डाक द्वारा निम्न पते पर अति शीघ्र भेजें-

जितेन्द्र ‘जौहर’

(अतिथि संपादक  ‘सरस्वती सुमन’)

IR-13/6, रेणुसागर,

सोनभद्र (उ.प्र.) 231218.

मोबा. #          :   +91 9450320472

ईमेल का पता  :  jjauharpoet@gmail.com

यहाँ भी मौजूद :  jitendrajauhar.blogspot.com

art2

ऐसा ही कुछ-कुछ होता है

कुछ समय गुजरता है खुश-खुश

कुछ समय मुझे भरमाता है,

छोटे से बालक मुझ शुभ को

तकदीर पे गुस्सा आता है।

 

मैं नहीं खेलता जी भर के

हर रोज पढ़ाई करता हूँ,

फिर भी मम्मी की आँखों में

जाने क्यों गुस्सा रहता है।

 

एक बार गया था पापा संग

बाजार सब्जियाँ लाने को,

पापा ने जूते दिला दिए

फुटबॉल खेलकर आने को।

 

मैं निकल गया घर से अपने

बाहर से मित्र बुलाते थे,

मन को मेरे ललचाने को

फुटबॉल का खेल दिखाते थे।

 

मैं रोक सका न इस मन को

फुटबॉल की ऐसी माया है,

चुपके से निकला मैं घर से

जूतों ने ताव दिलाया है।

 

मैं खेल रहा था बस इसको

फुटबॉल तो मेरे पास रहे,

जब पास न आयी वो मेरे

तो मित्र से फरियाद करी।

 

एक मित्र ने जोर से किक मारी

फुटबॉल जो मुझको पास करी,

वो हाथ की हड्डी तोड़ गयी

उसने भी मेरे संग घात करी।

 

पापा चीखे, मम्मी रोई तो

मुझको यह एहसास हुआ,

मेरी ही थोड़ी गलती से

मेरा यह ऐसा हाल हुआ।

 

अब कभी न खेलूँगा बाहर

घर पर ही शोर मचाऊँगा,

चाहे कुछ भी हो जाए मगर

बाहर न पैर बढ़ाऊँगा।

 

एक बात सोचता हूँ ईश्वर

ऐसा क्यों तू बस करता है,

शुभ काम न करता है गंदे

क्यों उसको दण्डित करता है ?

----

pots

अर्ध सत्‍य''

प्रजापति'

दीवाली की धुरी आप हो आप ही सिरजनहार

पारस जैसा पावन करते महिमा अपरम्‍पार।

 

पड़ी अपावन अनगढ़ मिट्‌टी देते तुम आकार

जैसे करते रोज धरा पर अहिल्‍या उद्‌धार।

 

मिट्‌टी को पावन करने में सुबह से हो गई शाम

साथ ही रही घरैतिन लेकिन काम न हुआ तमाम।

 

बहुत रही सकुचाय घरैतिन पैबन्‍द लगा है धोती में

अबकी किरपा करहु लक्ष्‍मी मिले बिलाउज धोती में।

 

सांझ भये घिर आये बदरा अब मुश्‍किल में जान,

मेघदेव की करते विनती फिर से हुआ विहान।

 

धीर, वीर, संयमी तुम्‍हीं तुम कितनी चाक चलाते हो

उस मेहनत के बदले में तुम तो कुछ ना पाते हो।

 

तुम सा शिल्‍पी निश दिन खोजूं लेकिन कहीं न पाऊं

संस्‍कृति और धैर्य के साधक तुमको शीश नवॉऊं।

 

दीवाली की धुरी आप हो आप ही सिरज़नहार

एक तुम्‍ही हो आज भी पावन तुम पर सब न्‍यौछार।

 

बनावटी नकली दीयों से है कलुषित है संसार,

असली एक तुम्‍ही निर्माता तुम हो रचनाकार।

 

दीवाली पर लेकिन फिर परिवार की पीड़ा सहते हो

औरों को दे देते अमृत नीलकंठ बन जाते हो।

 

करवा, दीपक, सुत्‍ती, गगरी लक्ष्‍मी और गणेश,

रचना करते इन सबकी हो पाकर कठिन कलेश।

 

आदि अनन्‍त काल के जब खंडहर खुदवाये जाते हैं

रचना आप की नीचे पाकर सबके सिर चकराते है।

 

दीवाली की धुरी आप हो आप ही सिरज़नहार

पारस जैसा पावन करते महिमा अपरम्‍पार।

---

रामदीन

जे-431, इन्‍द्रलोक कालोनी

कृष्‍णा नगर, कानपुर रेाड, लखनऊ।

art4

ग़ज़ल [काश्मीरी-भाइयों के नाम]

बीते हुए दिन हम पर आज भी भारी है

गल्तियाँ कुछ तुम्हारी कुछ हमारी है.

 

संवाद के सारे रास्ते खोल के रखना

यही राह जायज़ है चाहे जो दुश्वारी है.

 

उस कश्ती का डूबना तय है दोस्तों

जिसका नाविक अनाड़ी, दुगुनी सवारी है.

 

कल जिस बस्ती में जलसे ही जलसे थे

किसकी नज़र लगी, आहो-बुका जारी है.

 

ग़ुरबतकदे में किस कंधे पे सर रख के रोये

यहाँ  खुद के कंधे पर सर रखना भारी है

 

इस माहौल में भला अपनी बात क्या रखें.

यहाँ हर एक एक चेहरे पर हैबत तारी है

 

दिलों की सरहदें आखिर मिटे भी तो कैसे

बेमन की कोशिश, ये कोशिशे सरकारी है..

.

कहते क्यूँ  नहीं  ?
दोस्त हो तो दोस्त जैसे लगते क्यूँ नहीं ?

दिल में कुछ फांस है, कहते क्यूँ नहीं?

 

तेरे हाथों में जो फूल है, कागज़ के है,

पूछते हो मुझसे ये महकते क्यूँ नहीं?

 

वही मै हूँ,वही गली है , वही फिज़ा भी है,

तेरे सूर्ख होंठ पहले -से दहकते क्यों नहीं?

 

प्यार एक चुभन है, दर्द है,अहसास है,

बयां क्या करना, इसे सहते क्यों,नहीं?

 

अभी ग़म -समंदर बहुत दूर तक बाकी है,

किनारा क्या ढूँढना, अभी बहते क्यूँ नहीं?

--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,btps
vijayvermavijay560@gmail.com

कभी न खाना तंबाकू

किसी किराने की दुकान से

तंबाकू के पाउच ले आते,

गली गली में बच्चे दिखते

खुल्ल्म खुल्ला गुटखा खाते।

 

बाली उमर और ये गुट्खा

कैसे कैसे रोग बुलाते,

तड़प तड़प कर निश्छल नन्हें

हाय मौत को गले लगाते।

 

ढेरों जहर, भरे गुटखों में

टी बी का आगाज कराते,

और अस्थमा के कंधे चढ़‌

मरघट तक का सफर कराते।

 

मर्ज केंसर हो जाने पर

लाखों रुपये रोज बहाते,

कितनी भी हो रही चिकित्सा

फिर भी प्राण नहीं बच पाते।

 

सरकारी हो हल्ले में भी

तम्बाकू को जहर बताते,

पता नहीं क्यों अब भी बच्चे

गुटखा खाते नहीं अघाते।

 

वैसे बिल्कुल सीधी सच्ची

बात तुम्हें अच्छी बतलाते,

जो होते हैं अच्छे बच्चे

तम्बाकू वे कभी न खाते।

।वंश का हल खींचते हैं।


शौक के बादल घने हैं
दिल के ज़र्रे अनमने हैं।


दीन का तालाब उथला
ज़ुल्म के दरिया चढ़े हैं।


अब मुहब्बत की गली में
घर,हवस के बन रहे हैं।


मुल्क ख़तरों से घिरा है
क़ौमी छाते तन चुके हैं।


बेवफ़ाई खेल उनका
हम वफ़ा के झुनझुने हैं।


ख़ौफ़ बारिश का किसे है
शहर वाले बेवड़े हैं।


चार बातें क्या की उनसे
लोग क्या क्या सोचते हैं।


हम ग़रीबों की नदी हैं
वो अमीरों के घड़े हैं।


लहरों पे सुख की ज़ीनत
ग़म किनारों पे खड़े हैं।


रोल जग में" दानी" का क्या
वंश का रथ खींचते हैं।

---

(2)

जागे से दिल के अरमान हैं
इश्क़ का सर पे सामान है।


कुछ दिखाई नहीं देता अब
सोच की गलियां सुनसान हैं।


दुश्मनी हो गई नींद से
आंखों के पट परेशान हैं।


मेरी तनहाई की तू ख़ुदा
महफ़िले ग़म की तू जान है।


काम में मन नहीं लगता कुछ
बेबसी ही निगहबान है।


मुझको दरवेशी का धन दिया
तू फ़कीरों की भगवान है।


दर हवस के खुले रह गये
बंद तहज़ीब की खान है।


सब्र मेरा चराग़ों सा है
वो हवस की ही तूफ़ान है।


ज़र ज़मीं जाह क्या चीज़ है
प्यार में जान कुरबान है।


दिल की छत पे वो फ़िर बैठी है
मन का मंदिर बियाबान है।


दानी को बेवफ़ाई अजीज़
इल्म ये सबसे आसान है।

----

art3

*प्रमाणपत्र*

एक बुढ्ढा बैंक में क्लर्क से जोर-जोर कह रहा था कि मैं जिन्दा तुम्हारे सामने खड़ा हूँ। इससे बड़ा मेरे जीवित होने का दूसरा और क्या प्रमाण हो सकता है ? और तुम कहते हो कि मैंने अपने जीवित होने का प्रमाणपत्र अभी तक जमा नहीं किया है। क्लर्क का कहना था कि मुझे सिर्फ प्रमाणपत्र चाहिये। तुम जिन्दा हो या मुर्दा मैं कुछ नहीं जानता। पेंशन चाहिये तो प्रमाणपत्र लेकर आओ। बुढ्ढा बुदबुदाते हुए निकला कि बुढ़ापा भी क्या चीज है कि कोई जीवित भी नहीं समझता। जो हाल घर में वही बाहर भी, यह सोचकर रुआंसा हो गया।

संयोग से मैं भी बैंक गया था। मैंने कहा बाबाजी आप दो प्रमाणपत्र बनवा लीजिये। एक बैंक और दूसरा घर के लिए। शायद आपको पता नहीं, अभी हाल में एक आदमी मरा हुआ सड़क के किनारे पड़ा था। पोलिस आई और उसे जिन्दा बताकर चली गयी। कारण, उसके जेब में जीवित होने का प्रमाणपत्र था। एक आदमी बोला कि यह जिन्दा नहीं मुर्दा है। शायद इसे मरे हुए कई दिन हो गये । लाश से बदबू आ रही है। तो पोलिस उसे साथ ले गयी। वह झूठा बयान देने तथा कानून के आँख में धूल झोंकने के आरोप में जेल में बंद है।

बाबाजी प्रमाणपत्र बनवाने चले गए। बहरहाल उनके दिमाग में यह बात अच्छी तरह से घर कर चुकी है कि यहाँ मुर्दे को जीवित होने का प्रमाणपत्र तो आसानी से मिल सकता है, लेकिन जीवित व्यक्ति को जीवित होने का उतनी आसानी से नहीं।

----

एस के पाण्डेय, समशापुर (उ.प्र.)।

URL: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

*********

image

              दोहे -

1 हिन्दी माँ का रूप है, समता की पहचान।
   हिन्दी ने पैदा किए, तुलसी औ’ रसखान।।

2 हिन्दी हो हर बोल में, हिन्दी पे हो नाज।
   हिन्दी में होने लगे, शासन के सब काज।।

3 दिल से चाहो तुम अगर, भारत का उत्थान।
   परभाषा को त्याग के, बांटो हिन्दी ज्ञान।।

4 हिन्दी भाषा है रही, जन-जन की आवाज।
   फिर क्यों आंसू रो रही, राष्ट्रभाषा आज।।

5 हिन्दी जैसी है नहीं, भाषा रे आसान।
   पराभाषा से चिपकता, फिर क्यूं रे नादान।।

6 बिन भाषा के देश का,  होय नहीं उत्थान।
   बात पते की ये रही,  समझो तनिक सुजान।।

7 मिलके सारे आज सभी, मन से लो ये ठान।
   हिन्दी भाषा का कभी, घट ना पाए मान।।

8 जिनकी भाषा है नहीं, उनका रूके विकास।
   पराभाषा से होत है, यथाशीघ्र विनाश ।।


9 मन रहता व्याकुल सदा, पाने माँ का प्यार।
   लिखी मात की पातियां, बांचू बार हजार।।

10 अंतर्मन गोकुल हुआ,  जाना जिसने प्यार।
    मोहन हृदय में बसे,  रहते नहीं विकार।।

11 बना दिखावा प्यार अब,  लेती हवस उफान।
    राधा के तन पे लगा,  है मोहन का ध्यान।।

12 बस पैसों के दोस्त है,  बस पैसों से प्यार।
   बैठ सुदामा सोचता,  मिले कहां अब यार।।

13 दुखी-गरीबों पे सदा, जो बांटे हैं प्यार।
    सपने उसके सब सदा,  होते हैx साकार।।

14 आपस में जब प्यार हो,  फले खूब व्यवहार।
    रिश्तों की दीवार में,  पड़ती नहीं दरार।।

15 नवभोर में फले-फूले,  मन में निश्छल प्यार।
    आंगन आंगन फूल हो,  महके बसंत बहार।।

16 रो हृदय में प्यार जो, बांटे हरदम प्यार।
   उसके घर आंगन सदा,  आए दिन त्योहार।।


17 जहां महकता प्यार हो, धन न बने दीवार।
    वहा कभी होती नहीं,  आपस में तकरार।।

18 प्रेम वासनामय हुआ,  टूट गए अनुबंध।
    बिारे-बिखरे से लगे, अब मीरा के छंद।।

19 राखी प्रतीक प्रेम की,  राखी है विश्वास।
   जीवनभर है महकती, बनके फूल सुवास।।

20 राखी के धागे बसी, मीठी-मीठी प्रीत।
    दुलार प्यारी बहन का, जैसे महका गीत।।

                     - डा0 सत्यवान वर्मा सौरभ
                        कविता निकेतन,  बड़वा भिवानी हरियाणा-127045

---

(ऊपर का चित्र – डॉ. आलोक भावसार की कलाकृति)

rajanikanth रजनीकांत

रोबोट जब रिलीज हुई थी तो रजनीकांत चुटकुलों की चहुँओर फिर से भरमार हो गई थी. कुछ चुनिंदा रजनीकांत चुटकुलों का आनंद फिर से लें.

रजनीकांत प्याज को भी आठ-आठ आँसू रूला सकता है.


रजनीकांत तो रीसाइकल बिन को भी मिटा सकता है.


भूत वास्तव में रजनीकांत की वजह से हैं. हजारों लोगों को मौत की घाट उतारेंगे तो वे और क्या कर सकते हैं भूत बनने के सिवा.


रजनीकांत कार्डलेस फोन के जरिए किसी का भी गला घोंट सकता है.


रजनीकांत वायलिन बजा सकता है... एक पियानो के साथ.


जब रजनीकांत एक कमरे में प्रवेश करता है तो उजाला हो जाता है क्योंकि डर के मारे अंधेरा भाग जाता है.


जब रजनीकांत किसी दर्पण में अपने आप को देखता है तो दर्पण टूट जाता है क्योंकि दर्पण इतना बेवकूफ नहीं है कि वो रजनीकांत और रजनीकांत के बीच में आए.


रोनाल्डिन्हो फुटबॉल को एक किक से 50 गज दूर फेंक सकता है. रजनीकांत रोनाल्डिन्हो को उससे भी आगे फेंक सकता है.


रजनीकांत को यह नहीं पता कि आप कहाँ रहते हैं, लेकिन वह जानता है कि आप कहाँ मरने वाले हैं.


दरअसल, गोलियाँ रजनीकांत को चकमा देती हैं, और इस तरह अपना जीवन बचाती हैं.
विकलांगों के लिए पार्किंग स्थल यह नहीं दर्शाता है कि यह स्थान विकलांग लोगों के लिए है. दरअसल यह वास्तव में एक चेतावनी है, कि यह जगह रजनीकांत की मालिकाना जमीन है और अगर आपने वहाँ पार्क किया तो आप विकलांग हो जाएंगे.


'रजनीकांत के कैलेंडर में 31 मार्च से सीधे 2 अप्रैल होता है, क्योंकि कोई भी रजनीकांत को मूर्ख नहीं बना सकता.


यदि आप गूगल पर सर्च करते समय रजनीकांत की गलत वर्तनी डालते हैं तो वो यह नहीं पूछता कि "क्या आप मतलब रजनीकांत से है?" वो तो बस यह जवाब देता है, "जितनी जल्दी हो सके जी जान से भागो, जब तक कि तुम्हारे पास मौका है."


एक बार एक कोबरा सांप ने रजनीकांत के पैर में काट खाया. पांच दिनों के भयंकर कष्टदायी दर्द के मारे कोबरा सांप की मृत्यु हो गई.


जब रजनीकांत आपकी ओर उंगली उठाता है, तो वह कह रहा होता है कि आपका कितने सेकंड का जीवन बाकी है.


रजनीकांत एक पक्षी के जरिए दो पत्थर को छर्री-दर्री कर सकता है.


सेलिब्रिटी व्हील ऑफ फॉर्च्यून पर एक बार रजनीकांत गया था और स्पिन करने के लिए पहला चांस उसका था. इस शो के अगले 29 मिनट तक हर सेलिब्रिटी इंतजार करती रही की पहिया रुके. पहिया को न रूकना था सो न रूका और शो खत्म हो गया.


हाथ धोने के एंटीबायोटिक लिक्विड सोप दावा करते हैं कि वे 99.9 प्रतिशत कीटाणुओं को मार सकते हैं. रजनीकांत दावा करे न करे, वो 100 प्रतिशत मार सकता है.


दरअसल, ग्लोबल वार्मिंग जैसी कोई चीज ही नहीं है. रजनीकांत को ठंड लग रही थी तो उसने सूरज को पास खींच लिया.


रजनीकांत एक आवर्धक काँच के जरिए चींटियों को भून कर रख सकता है. रात में.
रजनीकांत को 60 मिनट देखने में सिर्फ 20 मिनट लगते हैं.


रजनीकांत ने एक बार सिर्फ अपनी उंगली से एक जर्मन लड़ाकू विमान को गोली मार कर गिरा दी, यह चिल्लाकर, "बैंग!"


एक औसत रहने वाले कमरे में 1242 वस्तुएँ होती हैं जिनमें से किसी का भी प्रयोग रजनीकांत आप को मारने के लिए कर सकता है, जिसमें कमरा भी शामिल है.


रजनीकांत को 16 सेकंड की उम्र में ड्राइविंग लाइसेंस मिल गया था.


पेट्रोल की बढ़ती कीमतों के कारण, रजनीकांत को अपनी पीने की आदतों के बारे में चिंता होने लगी है.


रजनीकांत को गिनती मत सिखाओ. रजनीकांत मारता पच्चीस है और गिनता कुछ भी नहीं.


जब कोई कहता है कि दुनिया में कोई भी परफेक्ट, परिपूर्ण नहीं है, तो रजनीकांत इसे अपने व्यक्तिगत अपमान के रूप में लेता है.


मंदी जैसा जुमला कुछ नहीं होता है, वो तो रजनीकांत जब तब पैसे बचाने शुरू कर देता है.

सुनो...! सुनाएं एक कहानी.....। परखनली के आदमी की कहानी.....। यह कहानी और कहानियों की तरह परीलोक की कथा नहीं है, न ही भूतकाल की कहानी है, न ही वर्तमान की। यह कहानी है भविष्‍य काल की...इक्‍कीसवीं सदी के दूसरे दशक की। आप प्रबुद्ध श्रोताओं में जिज्ञासा जागी होगी कि मैं भला इक्‍कीसवीं सदी के दूसरे दशक में पहुंचे बगैर इस सदी के दूसरे दशक के अंतिम चरण की कहानी कैसे सुना सकता हूं। वह भी परखनली के आदमी की, जो अभी शैश्‍व अवस्‍था में है..अभी उसे अभी आदमी बनने के लिए पच्‍चीस से तीस वर्षों का लंबा सफर तय करना होगा ? आपकी जिज्ञासा उचित है, लीजिए मैं आपको बताये देता हूं कि मैंने परखनली के आदमी के मस्‍तिष्‍क के स्‍नायु तंत्रों के बीच एक लघु कंप्‍यूटर छिपा रखा है। जिसमें परखनली के आदमी के डाटाज फिट हैं....। बस बटन दबाया और कंप्यूटर के माध्‍यम से मेरा मस्‍तिष्‍क इक्‍कीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंतिम चरण में छलांग लगा देता है। तो अब गौर फरमाइए मैं बटन दबाता हूं....

यह सन्‌ 2020 है...।

अब इस युग को कलियुग कहने की बजाए कंप्‍यूटर युग कहना ही उचित है। बीसवीं सदी के उत्‍तरार्द्ध में मनुष्‍य के हाथों में कल-पुर्जों पर जो नियंत्रण था उस पर अब कंप्‍यूटर ने विजय पा ली थी और अब रोबोट का प्रचलन भी आमफहम हो गया है।

परखनली का आदमी इस वक्‍त इंदिरा गांधी मार्ग पर बने विजयंत अपार्टमेंट्‌स के चालीसवें माले पर एचआईजी फ्‍लैट में सो रहा है। इधर आसमान में सूरज निकलता है उधर कंप्‍यूटर स्‍क्रीन के संकेत पर स्‍वतः ही फ्‍लैट का प्रमुख द्वार खुलता है और एक औरत के प्रविष्‍ट होने के साथ ही स्‍वयंमेव बंद हो जाता है। वह औरत खाना बनाने वाली होती है। थोड़ी देर में वह चाय बनाकर टेबिल पर रख जाती है। कंप्‍यूटर बोलता है, ‘‘उठिए चाय पीजिए..।‘‘ किसी गृहिणी की तरह विनम्र और आत्‍मीय स्‍वर शयनकक्ष में तैर जाता है। वह आदमी उठकर बैठता है और चाय की चुस्‍कियां लेने लगता है। इधर कंप्‍यूटर स्‍क्रीन पर इंटरनेट के जरिए परखनली के आदमी की पसंद के समाचारों का प्रसारण प्रारंभ हो जाता है। इस आदमी की पसंद के समाचार होते हैं- राजनीति, खेल, अपराध एवं शेयर बाजार के समाचार।

इसके बाद वह उठकर दिनचर्याओं से निवृत होने के लिए स्‍नानघर में प्रवेश कर जाता है। इलेक्‍ट्रिक शेवर से दाढ़ी बनाता है और कमोड पर शौच के लिए बैठ जाता है। इस बीच वह किसी विदेशी सिगरेट को सुलगाकर लंबे-लंबे कश खींचकर धुआं उड़ाता रहता है। स्‍नान करने के लिए वह निर्वस्‍त्र होकर बाथ टब में लेट जाता है। स्‍वचालित यह बाथ-टब मनुष्‍य के शरीर के तापमान की क्षमताओं के अनुसार ठंडा और गरम होता रहता है। शैंपू और इत्र (परफ्‍यूम) एक निश्‍चित मात्रा में पानी में मिला होता है। टब से निकलकर वह गर्म वायु हीटर (हॉट एयर हीटर) चलाता है। गर्म हवा उसके शरीर को स्‍पर्श करती है और कुछ ही क्षणों में उसका बदन सूखकर खुशबू की तरह तरोताजा हो उठता है। वह बालों में कंघी करता है और गाउन ओढ़कर बाहर निकल आता है।

इस बीच नौकरानी डाइनिंग टेबिल पर नाश्‍ता लगा देती है। दो अण्‍डे का आमलेट, काजू, किसमिस युक्‍त दूध और सेब-मौसमी नाश्‍ते में खाने की उसकी आदत है। कंप्यूटर के निवेदन पर वह कुर्सी पर बैठता है और नाश्‍ता करते हुए निगाहें कंप्यूटर स्‍क्रीन पर केन्‍द्रित कर देता है। कंप्यूटर सुबह से अब तक आये दूरभाष एवं मोबाइल संदेशों का प्रसारण प्रारंभ कर देता है।

नाश्‍ता करने के बाद वह आदमी सूट पहनता है। टाई की नॉट आदमकद दर्पण के सामने जाकर ठीक करता है और जूते पहनकर ब्रीफकेस हाथ में लेकर जाने को तत्‍पर हो जाता। इसी समय नौकरानी उसके सामने जाकर गिड़गिड़ाती है ''बाबूजी....‘‘

''क्‍या है ?‘‘ झिड़कते हुए।

''बाबूजी आज मेरे बेटे की फीस जमा होनी है....। कुछ रूपये एडवांस दे दें तो बड़ी मेहरबानी होगी.....।‘‘

''तुझसे कितनी बार कहा कि तेरा महीना दस तारीख को पूरा होता है.....। पर तू है कि दस दिन पहले से पैसे मांगने लगती है....।‘‘ और वह चल पड़ता है।

''बाबूजी कॉनवेंट स्‍कूल है....आज फीस जमा नहीं हुई तो नाम कट जायेगा।‘‘

''क्‍यों पढ़ाती है कॉनवेंट स्‍कूल में बच्‍चों को ? वह तो पैसे वालों के लिए है। तुम्‍हारे लिए थोड़े ही है। वहां से नाम कटाकर निगम के या सरकारी स्‍कूल में लिखा दे। तुम लोगों के लिए तो यही स्‍कूल है....। इन स्‍कूलों में वजीफा भी मिलेगा और मध्‍यान्‍ह भोजन भी। वैसे भी इतने कॉम्‍पटीशन के युग में पढ़कर वह बनेगा भी क्‍या ?‘‘

‘‘.........''

अवाक नौकरानी जाते हुए बाबूजी को देखती रही। दरवाजा खुला। वह बाहर हुआ और दरवाजा बंद हो गया। वह सोचती रही, जरा भी सहानुभूति नहीं है। कैसा निर्मोही है यह आदमी.....मानवता पर कलंक! जिसने अपने मां बाप को नहीं बख्‍शा वह भला साधारण नौकरानी के हालातों पर क्‍या तरस खायेगा ?

वह आदमी लिफ्‍ट से उतरकर नीचे आता है। गैरेज में पहुंचकर कार का दरवाजा खोलकर बोर्ड में चॉबी लगा देता है। की बोर्ड पर रंग बिरंगी बिजलियां और संकेत चमकने लगते हैं। वह कुछ बटन दबाता है और सीट से टिक कर बैठ जाता है। कार में लगा दूरदर्शन चालू हो जाता है। स्‍क्रीन पर क्रिकेट खेलते हुए खिलाड़ी नजर आते हैं। भारत और आस्‍ट्रेलिया के बीच दिल्‍ली के जवाहर लाल नेहरू स्‍टेडियम में खेले जा रहे वन-डे मैच का प्रसारण हो रहा है।

सूरज की रोशनी से चलने वाली, कंप्यूटर - नियंत्रित यह कार अपने आप बैक होकर मार्ग पर आती है और गंतव्‍य की ओर चल देती है। अब आपको न चौराहों पर लाल या हरी बत्‍ती देखने की जरूरत और न आगे - पीछे आजू-बाजू से आने वाले वाहनों से चौकन्‍ना रहने की आवश्‍यकता।

बहुमंजिली इमारतों के बीच से गुजरती हुई परखनली के आदमी की यह कार एक तीस मंजिले विशाल भवन के तलघर में बने पार्किंग में जाकर खड़ी होती है। वह चाबी निकाल दरवाजे का ताला लगाता है और भवन में प्रवेश कर जाता है। कंप्‍युटरीकृत मैटल डिटेक्‍टरों के बीच से उसे गुजरना पड़ता है। वह लिफ्‍ट से उतरता है और कक्ष क्रमांक 522 के सामने पहुंचकर सरसरी निगाह से अपने नाम की तख्‍ती पढ़ता है। शशांक....कोष्‍टक में लिखा था-भारतीय प्रशासनिक सेवा। दरअसल इस भवन में गंतव्‍य स्‍थान को कक्ष क्रमांक पढ़कर ही पहचाना जा सकता है, क्‍योंकि इस पूरे भवन की बनावट एक जैसी है। इस भवन की दीवारें एवं छतें मानक प्‍लास्‍टिक की बनी हुई हैं। इस प्‍लास्‍टिक को निर्माण करते समय ऐसे रासायनिक घोलों (क्रियाओं) से गुजारा जाता है कि परमाणु बम जैसे भयंकर विस्‍फोटकों व जैविक हमलों का भी इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

''शुभ प्रभात..।‘‘

स्‍वचालित यांत्रिक मानव (रोबोट) विनम्र स्‍वर प्रगट कर 'जय हिंद‘ की मुद्रा में शशांक का अभिवादन करता है।

''शुभ प्रभात....।‘‘ शशांक यंत्र चालित-सी मुस्‍काराहट प्रगट करता हुआ मजाक के लहजे में कहता है ''और कैसे हो गंगाराम....?‘‘ देश में कम्‍प्‍यूटर और रोबोट का युग भले ही अवतरित हो गया हो लेकिन आज भी काम के आधार पर नामों का चलन है। जो आर्थिक और वर्गीय विषमता को सहज ही उजागर कर देते हैं।

''अच्‍छा....बहुत सुन्‍दर, अति सुन्‍दर.....।‘‘

इतने में रोबोट के संकेत पर यंत्रचालित दरवाजा खुल जाता है और शशांक अंदर प्रविष्‍ट हो जाता है। कंप्यूटर क्रांति के बाद देश में कंप्यूटर क्रांति की ही तरह जोर-शोर से रोबो (यांत्रिक मानव) क्रांति आई थी और कार्यालयों में चपरासियों की जगह यांत्रिक मानव तैनात हो गए थे। अब फाइलें एक कमरें में से दूसरे कमरे में लाने ले जाने का काम, अधिकारियों, बाबुओं को चाय-पानी पिलाने का काम यांत्रिक मानव बखूबी करने लगे हैं। रेलवे स्‍टेशनों एवं बस अड्‌डों पर कुली का काम भी यांत्रिक मानवों ने हथिया लिया है। ये यांत्रिक मानव कुलीगिरी का काम पूरी ईमानदारी एवं जवाबदारी के साथ निभाते। निर्धारित भाड़ा अदा करने के बाद एवं लक्ष्‍य निर्धारित निर्देशन देने के बाद यात्रियों का माल असबाब निश्‍चित गाड़ी में आरक्षित शीट या बर्थ तक पहुंचा दिया जाता।

होटलों में बावर्ची का काम तथा चौराहों पर यातायात पुलिस का काम भी यांत्रिक मानवों के हाथों में आ गया है। इन यांत्रिक मानवों के मस्‍तिष्‍कों में सशक्‍त कंप्यूटर बिठा दिए गए हैं। खनखनाती हुई धातुई हिंदी का उच्‍चारण इनके मुख से एक दम स्‍पष्‍ट और शुद्ध निकलता है। जब कोई मसखरा व्‍यक्‍ति इन्‍हें बार-बार बेवजह छेड़ता तो इनका व्‍यवहार कठोर हो जाता और ये आंखें चढ़ाकर बोलते-''मेरा समय बरबाद नहीं कीजिए श्रीमान!''...स्‍त्री होती तो, ‘‘श्रीमती आगे बढ़िये और जाइये....।‘‘

यह थी परखनली के आदमी श्री शशांक की दिनचर्या के कुछ घंटों की कहानी। अब मैं दिनचर्या को यहीं स्‍थगित कर शशांक के जीवन के भूतकाल की कहानी सुनाता हूं-

श्रीमान एवं श्रीमती कुमार की जब शादी हुए पांच वर्ष गुजर जाने के बाद भी कोई संतान पैदा नहीं हुई तो उनकी संतान चाह की भावना उग्र हो गई। कुमार दंपत्‍ति ने शहर के सभी प्रमुख स्‍त्री विशेषज्ञों से चैकप कराया। महीनों दवाईयों का सेवन किया। परहेज का दृढ़ता से पालन किया। पर नाकाम रहे। साधु-संतों की शरण में भी गए। उनके द्वारा बताये गए टोनों टोटकों का भी निर्वाह किया। तांत्रिकों से बनवाकर गण्‍डे ताबीज भी पहने। व्रत भी किए। मन्‍नतें भी मांगी। पर सब चेष्‍टाएं अप्रभावी रहीं। कोई सार्थक बात बनी नहीं। अंत में सभी उम्‍मीदों को तिलांजलि देकर उन्‍होंने अपने किसी निकटतम रिश्‍तेदार की औलाद को गोद लेने की बात सोची। किसी बच्‍चे को गोद लेते, इससे पहले भारत में सफलता पूर्वक परखनली शिशु का जन्‍म हो गया था। इस नये आविष्‍कार की खूबियों से वाकिफ होने के उपरांत निसंतान दंपत्‍ति नई आशाओं से भर गए थे। कुमार दंपत्‍ति ने भी चैकप से ज्ञात कर लिया था कि श्रीमान कुमार में शुक्राणु तो ठीक थे किंतु श्रीमती कुमार का गर्भाशय गर्भ धारण करने के लायक नहीं था। उनका गर्भाशय बेहद कमजोर था। परखनली में फ्‍यूजन करने के उपरांत भ्रूण को गर्भाशय में रोपने के बाद गर्भपात होने का भय था। इस खतरे से चिकित्‍सकों ने कुमार दंपत्‍ति को अवगत कर दिया। वे फिर निराश हो गए थे। कुछ समय बाद ही आशा की नई किरण पुनः चमकी। अब गरीब महिलाओं की कोख गर्भ - धारण के लिए किराये से मिलना शुरू हो गईं थीं। इच्‍छुक दंपत्‍ति एक निश्‍चित राशि किराये के रूप में भुगतान करने के बाद मजबूर दीन-हीन महिलाओं के गर्भाशय किराये से ले सकते थे। अनेक नर्सिंग होमों ने यह धंधा प्रारंभ कर दिया था। सड़क पर गिट्‌टी-मुरम ढोने वाली तमाम महिलाओं ने गर्भधारण करने का धंधा अपना लिया था। स्‍वस्‍थ महिलाओं को इस काम में पैसे खूब मिलते और निसंतान दंपत्‍ति उनका खाने-पीने का खयाल भी खूब रखते। पर संतान जन्‍मने के बाद इन्‍हें घोर तिरस्‍कार भोगना पड़ता। संतान के पैदा होते ही इन्‍हें संतान से अलग कर दिया जाता। अब संतान का लालन-पालन आयाएं करतीं। जन्‍मदात्री....किराये की मां के आंचल के दूध की एक भी बूंद बच्‍चे के मुख में न जाने दी जाती। बालक के मुंह में बोतल ठूंस दी जाती। कुमार दंपत्‍ति ने भी यही उक्‍ति अपनाई। श्रीमती कुमार बिना किसी प्रसव पीड़ा के, बिना आंचल में दूध का अनुभव किए एक सुंदर स्‍वस्‍थ नन्‍हें मुन्‍ने बच्‍चे की मां बन गईं। इस दुधमुंहे की ज्‍योतिष विशेषज्ञ कंप्यूटर से जन्‍मपत्री बनवाई गई। उसी के आधार पर नामकरण हुआ...शशांक....। बड़े से बंगले में दो-दो आयाओं और ढेरों देशी-विदेशी विद्युती खिलौनों के बीच नन्‍हा शशांक बड़ा होने लगा।

श्री कुमार एक सॉफ्‍टवेयर कंपनी कें प्रबंधक थे। निजी संस्‍थान होने की वजह से उनकी व्‍यस्‍तता कुछ अधिक रहती। हवाई दौरों और पंचतारा होटलों में प्रायोजित कॉकटेल पार्टियों में ही उनका अधिकांश समय गुजरता। श्रीमती कुमार का याराना दोस्‍ताना कुछ ज्‍यादा ही था। अपने महिला संगठनों की वे सक्रिय सदस्‍या होने के साथ-साथ कुछेक की अध्‍यक्ष एवं सचिव भी थीं। इन्‍हीं संगठनों की गतिविधियों के क्रियान्‍वयन में लगी रहना ही उनकी प्रमुख दिनचर्या थी। जितनी गहरी रूचि उनकी इन संस्‍थाओं को सक्रिय बनाये रखने में थी उतनी दिलचस्‍पी उन्‍होंने कभी बालक शशांक के लालन-पालन में नहीं दिखाई। मातृत्‍व का वह अलौकिक भाव बेचैनी बनकर उनके जेहन में उभरता ही नहीं, जो एक आम मां के अंतःकरण में स्‍वाभाविक प्रवृति बनकर उभरता है। संभवतः यही वजह थी कि बच्‍चे के प्रति उनका आकर्षण औपचारिक ही रहता। वात्‍सल्‍य स्‍नेह के ऐसे ही औपचारिक क्षणों में एक दिन शशांक ने उनके ऊपर टट्‌टी पेशाब कर दी। घृणा और बदबू से उनका जी मिचलाने लगा। तत्‍क्षण उन्‍होंने बच्‍चे को आया को थमाया और मुख हथेली से दाबे हुए वे बाथरूम में घुस गईं। वहां उन्‍हें उल्‍टी हुईं। तब कहीं, उन्‍होंने राहत की सांस ली। इस हादसे के बाद उनका लाड़-दुलार, माई स्‍वीट बाय...माई स्‍मार्ट बाय...मेरे प्‍यारे बेटे....वाक्‍यों को बोलने तक और गालों पर एक दो चुंबन एवं चुटकियां ले लेने तक ही सीमित रह गया।

शंशाक ने जब चौथे वर्ष में प्रवेश किया तब उसे एक लाख रूपये अनुदान में देकर पब्‍लिक स्‍कूल में भर्ती कराया गया। शशांक ने जब पांचवीं कक्षा उत्‍तीर्ण कर ली तब उसे देहरादून के पब्‍लिक स्‍कूल के होस्‍टल में डाल दिया गया। जैसे-जैसे शशांक कक्षाएं उत्‍तीर्ण करता जा रहा था वैसे-वैसे उसकी मानसिकता पर अंग्रेजियत और पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति पूरे जोर से प्रभाव जमाती जा रही थी। उसे अंग्रेजी साहित्‍य ही पढ़ने के लिए आसानी से सुलभ होता। अंग्रेजी के नये पुराने छोटे-बड़े साहित्‍यकारों की तमाम पुस्‍तकों से विद्यालय का पुस्‍तकालय भरा पड़ा था। इंटरनेट पर भी इसी भाषा का साहित्‍य बड़ी मात्रा में उपलब्‍ध था। जबकि भारतीय साहित्‍य की यहां रामायण, महाभारत, और रामचरितमानस जैसी मानक पुस्‍तकें भी उपलब्‍ध नहीं थीं। आधुनिक भारतीय साहित्‍यकारों की पुस्‍तकें इनकी कुंद मानसिकता वाली दृष्‍टि से अश्‍लील थीं। इसलिए पुस्‍तकालय में उनका खरीदा जाना सर्वथा वर्जित था। हिंदी साहित्‍य के नाम पर जहां दिखावे भर के लिए कुछ आलोचना साहित्‍य, कुछ महा पुरूषों की जीवनियां और कुछेक राष्‍ट्रीय कविताओं की पुस्‍तकें ही थीं। हालांकि लड़के-लड़कियों के इस संयुक्‍त विद्यालय में दरख्‍तों की ओट में, सीढ़ियों पर उतरने चढ़ने में, खेल के मैदान में, पुस्‍ताकलय में और केंटीन में अश्‍लील हरकतों का आदान प्रदान इतना खुलकर होता कि कभी-कभी बेहूदी हरकत लगने लगता। यहां यौनिक जागरूकता और यौन रोगों से बचाव के बहाने यौन सुरक्षा के उपाय बड़ी ही आसानी से सुलभ थे। इसीलिए यहां के छात्र-छात्राएं इंटर करते-करते देह में यौनिक आनंद के आदी थे। ऐसी ही हरकतों का आनंद लेते हुए शशांक बारहवीं कक्षा उत्‍तीर्ण कर गये।

इसके बाद शशांक ने दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में विज्ञान स्‍नातक में प्रवेश लिया। परिवार से अलग रहते-रहते शशांक का स्‍वभाव एकाकी हो गया था। वह घर आता तो सीधा अध्‍ययन कक्ष में बंद हो जाता। नौकर चाकर वहीं उसे खाना आदि दे जाते। माता-पिता से शशांक का वार्तालाप शुभ-प्रभात और शुभ-रात्रि तक सीमित था।

एक दिन दोपहर के समय शशांक अपने बंगले की बालकनी में बैठा हुआ कुछ सोच रहा था कि उसे बगल वाले बंगले की बालकनी से दो महिलाओं में किये जा रहे वार्तालाप की भनक लगी। वह चौकन्‍ना हुआ और चिक की ओट लेकर बगल की दीवार की ओर खिसक आया। दरअसल कानों में भनक लगते हुए शशांक को यह आभास हो गया था कि ये महिलायें उसी के बारे में कानाफूसी कर रही हैं।

''यह कुमार साहब का लड़का कैसा है...? न कभी पड़ोसियों के यहां आता-जाता है और न ही गली मोहल्‍ले के लड़कों से मिलता-जुलता है..। सुना है मां बाप से भी बहुत कम बोलता चालता है....। मुझे तो लगता है इकलौता होने के कारण घमंडी हो गया है.....।‘‘ एक महिला बोली थी।

''अरे नहीं यह बात नहीं है...इस ससुरे का ना तो बाप का पता......न मां का......। श्रीमान्‌ एवं श्रीमती तो नामर्द बांझ हैं। शादी के बाद इन्‍हें बच्‍चा-अच्‍चा तो हुआ नहीं। तब इन्‍होंने टैस्‍ट्‌यूब में फ्‍यूजन कराया और गर्भ ठहराया किसी किराये की औरत की कोख में....। ऐसी अप्राकृतिक संतान का क्‍या भरोसा....किसके सीमन से जनी हैं फिर भला जिस औरत ने प्रसव पीड़ा ही नहीं सही, वह क्‍या जाने ममता की पीर....? तभी तो श्रीमती कुमार इसे ठीक से प्‍यार नहीं करतीं। बचपन तो इसका सारा आयाओं की गोद में ही गुजरा है।‘‘ दूसरी महिला बोली थी।

एक नये रहस्‍य के खुले जाने से शशांक दंग रह गए। और उनके अंदर यह भ्रम पलना प्रारंभ हो गया कि संभवतः उनके माता-पिता उन्‍हें इसीलिए ठीक-ठीक प्‍यार नहीं करते। अब तक उनकी यह धारणा थी कि माता-पिता अपने कार्यों में अत्‍यधिक व्‍यस्‍त रहने के कारण उन्‍हें समय नहीं दे पाते। पर रहस्‍य का पर्दा हट जाने से जब उनका यह भ्रम टूट गया था।

विज्ञान स्‍नातक प्रथम श्रेणी से उत्‍तीर्ण करने के बाद शशांक ने आईएएस की प्रतिस्‍पर्धा परीक्षा में भाग लेने का निश्‍चय किया। निश्‍चित रूप से सफलता पाने के लिए उन्‍होंने कोचिंग कक्षायें भी प्रारंभ कर दीं। दिन और रात की कड़ी मेहनत के बाद वह प्रतिस्‍पर्धा परीक्षा उत्‍तीर्ण कर गए। इस तरह शशांक भारतीय प्रशासनिक सेवा में आ गये।

प्रशासनिक सेवा में आने के साथ ही शशांक के व्‍यवहार में आश्‍चर्यजनक ढंग से परिवर्तन आना प्रारंभ हो गया। वह रात को विलंब से आने लगा। शराब के नशे में धुत्‍त उसकी चाल डगमगाती सी होती। ओंठों पर सिगार दबा होता। एक दिन कार्यालय से लौटते वक्‍त शशांक की कार रास्‍ते में खराब हो गई। उन्‍होंने मोबाइल से गैरेज में कार खराब हो जाने की सूचना दी। ताले का गुप्‍त नंबर बताया और टैक्‍सी पकड़कर अधिकारी प्रकोष्‍ट (आफीसर क्‍लब) में पहुंच गया। छककर शराब पी। फिर अपने एक अधिकारी मित्र की बीबी की बांहों में डालकर गुफ्‍तगू करता रहा। जब वक्‍त मध्‍य रात्रि के करीब पहुंच गया और सुरासुंदरी के दौर की गर्माहट कुछ ठंडी हुई तब वह मित्र की बीबी की कार में बैठकर गुफ्‍तगू करता हुआ घर आया। आज श्रीमती कुमार भी किसी पार्टी में उपस्‍थिति दर्ज कराने के कारण देर से लौटी थीं। दरवाजे पर कार रूकने की आहट सुनकर वे खिड़की से बाहर झांकने लगी। उन्‍होंने देखा-शशांक के कार से उतरने के साथ ही एक महिला का खूबसूरत चेहरा खिड़की से बाहर निकला, ''हाऊ स्‍वीट‘‘ के उच्‍चारण के साथ ही उसने अपना हाथ लंबा कर दिया.....। शशांक ने तत्‍क्षण पलटकर महिला की अंगुलियों को हथेली में कसकर चुंबन लेते हुए कहा ''आई लव यू माई डार्लिंग....। ओ......के........बाय......बाय......सी.....यू.....।‘‘ और हाथ हवा में लहराते हुए गाड़ी गति में आ गई।

शशांक जब अपने शयन कक्ष में पहुंचकर टाई की नॉट ढीली कर रहा था कि उसकी मां ने एकाएक शयन कक्ष में आकर कहा- ''यह औरत कौन थी शशांक......?‘‘

ऐश ट्रे में रखे अधजले सिगार से धुआं उठ रहा था।

इस तरह यकायक पहले कभी श्रीमती कुमार शशांक के शयन कक्ष में नहीं पहुंची थीं। शशांक ने गौर से मां को देखा और उनके हाव-भाव से अहसास किया कि मां भी किसी क्‍लब अथवा पार्टी से शराब पीकर लौटी हैं। शशांक ने बहुत धीरे से कहा, ''मेरे एक अधिकारी मित्र की बीबी थी।‘‘ किसी प्रकार का संकोच अथवा शर्म शशांक के चेहरे पर नहीं थी।

''इस तरह नशे में इतनी रात को दो टके की औरतों के साथ तुम्‍हारा घर आना कतई ठीक नहीं है। जवानी का इतना ही जोश चढ़ गया है तो शादी क्‍यों नहीं कर लेते ?‘‘

''ओह.....माई...डियर मम्‍मी....शादी की ऐसी भी क्‍या जल्‍दी है? क्‍या जरूरत है.......? वह ऐसी कौन सी वस्‍तु है जो आज बिना शादी किये न मिलती हो....? खरीददार के पास खरे दाम हों, बेचने वाले तो लाईन लगाकर खड़े हैं। औरत लो.......। बच्‍चा लो.....। किराए की कोख लो.....। मम्‍मी....यह भौतिक युग है।....वैज्ञानिक युग है, यहां सब कुछ सुलभ है.....।‘‘ शशांक के व्‍यवहार में यांत्रिक सहजता और उच्‍छश्रृंखलता एक साथ थी।

''शशांक तुम्‍हें मां से बात करने की जरा भी तमीज नहीं है। जानते हो मां और बेटे के बीच एक मर्यादा की सीमा रेखा होती है.....।‘‘

''नहीं......मम्‍मी......नहीं, यह पाठ तो घर और स्‍कूल में मुझे किसी ने पढ़ाया ही नहीं.....। मैं तो मम्‍मी के मायने मां और मदर ही जानता हूं। इस शब्‍द की परिभाषा से एकदम अनभिज्ञ हूं।‘‘

शशांक का इतना उद्‌दंडतापूर्ण खुला व्‍यवहार देखकर वे आशंकित हो गईं और दो कदम पीछे खिसककर यह कहते हुए ''अभी तुम होश में नहीं हो शशांक.....सो जाओ।‘‘ वापिस हो गई। उन्‍हें लगा, ऐसी दोगली संस्‍कृति की औलाद उनकी कोख से जन्‍म ले ही नहीं सकती? यह सोचते हुए उनके मस्‍तिष्‍क में दस्‍तकों का प्रहार शुरू हो गया, तब उन्‍हें ख्‍याल आया, ‘वह उनकी कोख से जन्‍मा ही कहां है....?'

श्री कुमार दौरे पर मुंबई गए हुए थे। ऐसे में उन्‍हें नितांत अकेलापन बेहद खटक रहा था। भयभीत होकर वे शयन कक्ष के दरवाजे खिड़कियां बंद कर बिस्‍तर में दुबक गईं।

अगले दिन श्रीमती कुमार एवं शशांक में कहा सुनी हो गई। मां की मर्यादित हिदायतें शशांक के लिए बरदाश्‍त से बाहर की बातें थीं। लिहाजा शशांक एक अटैची में जरूरी कपड़े-लत्‍ते एवं कागजात डालकर साथ में ले जाते हुए घर छोड़ गए। घर छोड़ने के बाद उसने विजयंत अपार्टमेंट्‌स में फ्‍लैट आवंटित कराया और उसी में वक्‍त गुजारने लगा।

यह था श्री शशांक का जीवन इतिहास। चलिये अब पुनः वर्तमान में आते हैं और आपको शशांक के कार्यालय ले चलते हैं......।

सिगरेट, चाय, कॉफी लगातार पीने के क्रम के बीच वह सारा दिन फाइलें निपटाता रहता है। दोपहर के खाने के समय आशुलिपिक (स्‍टैनो) के साथ खाना खाने बैठता है। सुंदर, स्‍वस्‍थ हंसमुख चुलबुली आशुलिपिका और वह चुटकुलों और शगूफों के बीच किसी न किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी को केंद्र मं रखकर चटखारे ले लेकर उसका मजाक उड़ाते रहते हैं। आलिंगन और चुंबन उनके बीच सहज प्रक्रिया बनकर क्रियारत रहते हैं।

शाम को वह कार्यालय से निकलकर सीधा पंचतारा होटल में पहुंचता है। वहां कुछ समय शापिंग सेंटर में घूमता रहता है। फिर कुछ समय के लिए कैबरे केबिन में जाकर बैठ जाता है। हर रात उन्‍हीं लड़कियों द्वारा ड्रांस की पुनरावृति देखने बैठ जाता है। वेटर के आने पर सिगरेट के कशों के बीच शराब पीने लगता है। पी चुकने के बाद खाना खाता है। फिर भुगतान अदाकर नीचे आकर कार में सवार हो इंडिया गेट पहुंच जाता है। इंडिया गेट का शीतलता से भरा सुहाना मौसम उसे बड़ा लुभावना लगता है। वह आइसक्रीम वाले से एक कप फ्रूट आइसक्रीम लेता है और घास पर बैठ चाव से खाने लगता है। खा चुकने के थोड़ी ही देर बाद कलाई घड़ी का अलार्म बजता है। इसके साथ ही उसे अहसास हो जाता है कि अब रात के ग्‍यारह बज चुके हैं। अतः फ्‍लैट पर पहुंचने के लिए रवाना हो जाना चाहिए।

साढ़े ग्‍यारह बजे के लगभग वह अपने फ्‍लैट में प्रविष्‍ट होता है। शयन कक्ष में पहुंचकर कपड़े उतारता है। पलंग पर बनी गुप्‍त अलमारी खोलकर कामुक गुड़िया (सैक्‍सीडाल) निकालकर बिस्‍तर पर रखता है। ऐसे समय कंप्यूटर उनके लिए जरूरी दूरभाष संदेश प्रसारित करता है, ''आपकी माताजी की तबीयत बहुत खराब है, वे आपसे मिलना चाहती हैं। यह संदेश आपके पिताजी ने दिया है।‘‘

शशांक के चेहरे पर कुटिलता पूर्ण मुस्‍कान तैर जाती है। वह बिस्‍तर पर पैर फैलाकर बैठ जाता है और उस गुड़िया में यंत्र से हवा भरने लगता है। अब हिन्‍दुस्‍तान के बाजारों में कृत्रिम सैक्‍सी बॉय व सेक्‍सी गर्ल खुले आम मिलने लगे हैं। एकाकी जीवन व्‍यतीत करने वाले स्‍त्री - पुरूषों के लिए ये गुड्‌डा - गुड़िया फ्‍लैट में रखना दस्‍तकारी की वस्‍तुओं की तरह शोभा एवं शान की चीजें हो गईं हैं।

हवा भर जाने के बाद गुड़िया फुटबाल ब्‍लेडर की तरह फूल गई थी। खजुराहों की मूर्तियों की तरह तराशा गया उसका रूप निखर आया है। प्राकृतिक औरतों की देहदृष्‍टि की तरह वह भी बेहद सुगठित स्‍वस्‍थ एवं सुंदर लग रही है। गुड़िया के सिर के बालों के नीचे लगे बटन के दबाने पर जब उसके मुख से आग्रहपूर्ण, मादक, मीठा, स्‍वर फूटना प्रारंभ हो जाता है तो उसकी सजीवता के प्रति एकाएक शंका करना मुश्‍किल की बात है। शशांक ने उसके बालों पर हल्‍के से चुंबन लिए और उसकी कृत्रिम मखमली देह को अपने आगोश में ले लिया। शशांक की अंगुली गुड़िया के बालों के नीचे दबे बटन पर दबाव बना रही है। एकाएक कमरे में मादक एवं कामुक स्‍वर लहरियां खन-खना उठीं।

विज्ञान ने मानवता को चुनौती दे दी है और इंसान मानवता को पैरों तले रौंद कर ज्‍यादा से ज्‍यादा यंत्रों से संबंध स्‍थापित करता चला जा रहा है। जीवन में भावना और सहानुभूति औपचारिक भर रह गई है।

सुबह जब शशांक कंप्यूटर के विनम्र निवेदन पर उठा तो कंप्यूटर ने एक जरूरी संदेश प्रसारित किया, ''आपकी माता जी का स्‍वर्गवास हो गया है।‘‘

शशांक का चेहरा निर्लिप्‍त रहा । कोई खेद का भाव प्रगट ही नहीं हुआ। तुरंत उसने कंप्यूटर की-बोर्ड के निकट जाकर कुछ बटन दबाते हए अपने पिता को शोक संदेश प्रेषित कर दिया, ''मम्‍मी के देहांत का समाचार प्राप्‍त हुआ। मम्‍मी की आकस्‍मिक मृत्‍यु पर मुझे बेहद दुख हुआ। ईश्‍वर उनकी आत्‍मा को शांति प्रदान करे। मेरी ओर से विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित।‘‘ और शशांक निर्विकार भाव लिए स्‍नानघर में घुस गया।

यह थी मानवता और रिश्‍तों को विकृत रूप दे देने वाली परखनली के आदमी की कहानी।....लीजिए अब मैं पुनः अपने मस्‍तिष्‍क में विराजमान लघु कंप्यूटर के बटन को दबाता हूं और इक्‍कीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंतिम साल की कंप्‍यूटरी गुफा से निकलकर वर्तमान में आता हूं......।

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ, 49 श्रीराम कॉलोनी,

शिवपुरी (म.प्र.) पिन 473-551

satyawan 

1सबके पास उजाले हों -

मानवता का संदेश फैलाते, मस्जिद और शिवाले हों।

नीर प्रेम का भरा हो सब में, ऐसे सब के प्याले हों।।

 

होली जैसे रंग हो बिखरे, दीपों की बारातें सजी हों,

अंधियारे का नाम ना हो, सबके पास उजाले हों।।

 

हो श्रद्धा और विश्वास सभी में, नैतिक मूल्य पाले हों।

संस्कृति का करे सब पूजन, संस्कारों के रखवाले हों।।

 

चौराहों पे न लुटे अस्मत,दुःशासन ना फिर बढ़ पाए,

भूख,गरीबी,आतंक मिटे,ना देश में धंधे काले हों।।

 

सच्चाई को मिले आजादी और लगे झूठ पर ताले हों।

तन को कपड़ा,सिर को साया, सबके पास निवाले हों।।

 

दर्द किसी को छू न पाए, न किसी आंख से आंसू आए,

झोंपड़ियों के आंगन में भी खुशियों की फैली डाले हों।।

 

‘जिए और जीने दे’ सब ना चलते बरछी भाले हों।

हर दिल में हो भाईचारा नाग न पलते काले हों।।

 

नगमों -सा हो जाए जीवन, फूलों से भर जाए आंगन,

सुख ही सुख मिले सभी को, एक दूजे को संभाले हों।।

-----.

2कैसे आज गुनगुनाऊं मैं

बिखेर चली तुम साज मेरा

अब कैसे गीत गाऊं मैं ।

तुमने ही जो ठुकरा दिया

अब किससे प्रीत लगाऊं ।।

 

सूना-सूना सब तुम बिन

रात अंधियारी फीके दिन ।

तुम पे जो मैंने गीत लिखे

किसको आज सुनाऊं मैं ।।

 

बिखरी-बिखरी सब आशाएं

घेरे मुझको घोर निराशाएं ।

नौका जो छूट गई है मुझसे

अब कैसे साहिल पाऊं ।।

 

रूठे स्वर,रूठी मन वीणा

मुश्किल हुआ तन्हा जीना।

कहो प्रिये ! अब तुम बिन

कैसे आज गुनगुनाऊं मैं ।।

 

सताती हर पल तेरी यादें

बीता मौसम, बीती बातें ।

टूटी कसमें,टूटे सब वादे

साथी किसपे मर जाऊं मैं ।।

-----

3 बचपन

कहता है मन।

काश ! लौटे फिर

बीता बचपन।।

 

छोटा सा गांव।

मासूम चेहरा

वो ख्वाब सलौने।।

 

खिलता मधुवन।

बाबू जी की डांट

अमा का चुंबन।।

 

चांदी का पलना।

रेशम की डोर

ममता का झरना।।

 

सपनों की रानी।

कागज की नाव

सावन का पानी।।

 

खुशी का तराना।

शरारत का दौर

हँसी का खजाना।।

 

झिलमिल तारे

माँ की गोद

वो अजीब नजारे।।

 

मौसम सुहाना।

काश! लौटे

वो दौर पुराना।।

-----

4आओ मेरे श्याम

महाभारत हो रहा देखो अविराम।

आओ मेरे कृष्णा,आओ मेरे श्याम ।।

 

शकुनि चालें चल रहा है

पांडुपुत्रों को छल रहा है

अधर्म की बढ़ती ज्वाला में

संसार अब जल रहा है

बुझा डालो जो आग लगी है

जलधारा बरसाओ मेरे श्याम ।।

 

शासक आज बने हैं शैतान

मूक,विवश है संविधान

झूठ तिलक लगवा रहा

बचा न सच का मान

गूंज उठे फिर आदर्शी स्वर

वो मोहक बांसुरी बजाओ मेरे श्याम।।

 

दुःशासन की क्रूर निगाहें

भरती हर पल कामुक आहें

कदम-कदम पर खड़े लुटेरे

शीलहरण की कहे कथाएं

खोए ना लाज कोई पांचाली

फिर आकर चीर बढ़ाओ मेरे श्याम।।

 

आग लगी नंदन वन में

रूदन हो रहा वृंदावन में

नित जन्मते रावण-कंस

बढ़ रहा पाप भुवन में

मिटे अनीति,अधर्म,अंधकार सारे

आकर आशादीप जलाओ मेरे श्याम।।

 

-----.

5हरियाणवी कविता

हाथ जोड़ कहूं अमा मेरी

मैं हूं बिन जन्मी नादान,इबै ना मारै मनै।

 

सै छह महीने का गर्भ तेरा

ना छीनै माँ तू नसीब मेरा

अमा मेरी मैं हूं तेरी संतान, इबै ना मारै मनै।

 

मैं भी तेरै आंगण खेलूगी

तेरे दुखड़े मिलके झेलूंगी

अमा मेरी बात मेरी मान, इबै ना मारै मनै।

 

मान मनै भी धन तू अपणा

पूरा करूं तेरा हर सपना

अमा के तनै नुकसान, इबै ना मारै मनै।

 

बदल्या टेम सै लीक तोड़ तूं

अपणी बिटिया तै प्रीत जोड़ तूं

अमा मेरी मैं हूं तेरी जान, इबै ना मारै मनै।

 

6बड़े बने ये साहित्यकार

बंटते बंदर बांट पुरस्कार।

दौड़ रहे है पीछे-पीछे ,बड़े बने ये साहित्यकार।।

 

पुरस्कारों की दौड़ में खोकर

भूल बैठे हैं सच्चा सृजन

लिख के वरिष्ठ रचनाकार

करते है वो झूठा अर्जन

मस्तक तिलक लग जाए,चाहे गले में हार ।

 

बड़े बने ये साहित्यकार।।

अब चला हाशिये पे गया

सच्चा कर्मठ रचनाकार

राजनीति के रंग जमाते

साहित्य के ये ठेकेदार

बेचे कौड़ी में कलम,हो कैसे साहित्यिक उद्धार।

 

बड़े बने ये साहित्यकार।।

देव-पूजन के संग जरूरी

मन की निश्छल आराधना

बिन दर्द का स्वाद चखे

नहीं होती पल्लवित साधना

बिना साधना नहीं साहित्य,झूठा है वो रचनाकार।

 

बड़े बने ये साहित्यकार।।

---

7कर मानव से प्यार

कर मानव विचार।

मानव रूप है ईश्वर का,कर मानव से प्यार।।

 

जग में कुछ नहीं तेरा

फिर क्यों रे तेरा मेरा

आखिर सांसें खोल छोड़ेगी

छूट जाएगा ये बसेरा

छोड़ यहां से जाएगा,संगी साथी यार।

कर मानव से प्यार।।

पढ़े तूने गीता और वेद

बढ़ते गए मन के भेद

सुबह शाम की रे पूजा

मनवा नहीं हुआ सफेद

ढ़ाई अक्षर प्रेम के,ला दे जीवन में झंकार।

 

कर मानव से प्यार।।

दुखियों को गले लगा ले

बेगानों को भी अपना ले

मोह माया के बंधन तोड़

सद्भावों के नगमें गा ले

समझ पराया दुख अपना,गिरा घृणा की दीवार।

कर मानव से प्यार।।

---

8मतलब के सब यार

फैला रिश्तों का बाजार।

मतलब के सब रिश्ते नाते,

मतलब के सब यार।।

 

मतलब का है लेना देना

मतलब के सब बोल

स्वार्थ के संग तुल गए

आज संबंध सब अनमोल

दिल के भाव सूख गए,

मुरझा गया है प्यार।

मतलब के सब यार।।

 

भूल बैठे त्याग- कर्त्तव्य

सबको अधिकार लुभाए

भौतिक सुख की लालसा

पल-पल डसती जाए

अपनेपन का रंग लुटा,

हैं फीके-फीके त्योहार।

मतलब के सब यार ।।

 

रूठा-रूठा मुखिया से

परिवारजनों का मन

पत्नी सुख साथिन हुई

पुत्र चाहता बस धन

फैल गया जीवन में,

अब धन का व्यापार।

मतलब के सब यार।।

---

9सरस्वती वंदना

माँ वीणा वादिनी मधुर स्वर दो

हर जिह्वा वैभवयुक्त कर दो।

 

मन सारे स्नेहमय हो जाए

ऐसे गुणों का अमृत भर दो।।

 

माँ वीणा की झंकार भर दो

जीवन में नवल संचार कर दो।

 

हर डाली खुशबूमय हो जाए

ऐसे सब गुलजार कर दो।।

 

अंतस तम को दूर कर दो

अंधकार को नूर कर दो।

 

मन से मन का हो मिलन

भेद सारे चूर कर दो।।

 

गान कर माँ रागिनी का

भान कर माँ वादिनी का।

 

पूरी हो सब कामनाएं

दो सुर माँ रागिनी का ।।

---

10अब कौन बताए

चेहरे हैं सब क्यों मुरझाए, अब कौन बताए।

क्यों फैले दहशतगर्दी के साये, अब कौन बताए।।

 

कभी होकर देश पे कुर्बान जो अमर हुए थे

सपूत वही आज क्यों घबराये, अब कौन बताए।

 

कौन है कातिल भारत माँ के सब अरमानों का

है हर चेहरा नकाब लगाए, अब कौन बताए।

 

लिांू क्या कहानी मैं वतन पे मिटने वालों की

वो तो मर के भी मुस्काए, अब कौन बताए।

 

ये शदों की आजाद शमां यूं ही जलती जाएगी

बुझे न दिल की आग बुझाए, अब कौन बताए।

 

इस माटी में जन्मा एक रोज इसी में मिल जाऊंगा

अरमां ये काम देश के आए, अब कौन बताए।

---

माँ

माँ ममता की खान है

माँ दूजा भगवान है।

 

माँ की महिमा अपरंपार

माँ श्रेष्ठ-महान है।।

 

माँ कविता,माँ है कहानी

माँ है दोहों की जुबानी।

 

माँ तो सिर्फ माँ ही है

न हिन्दुस्तानी,न पाकिस्तानी।।

 

माँ है फूलों की बहार

माँ है सुरीली सितार।

 

माँ ताल है माँ लय है

माँ है जीवन की झंकार।।

 

माँ वेद है माँ ही गीता

माँ बिन ये जग रीता।

 

माँ दुर्गा, माँ सरस्वती

माँ कौशल्या, माँ सीता।।

 

माँ है तुलसी की चौपाई

माँ है सावन की पुरवाई।

 

माँ कबीर की वाणी है

माँ है कालजयी रूबाई।।

 

माँ बगिया है माँ कानन

माँ बसंत सी मनभावन।

 

आखिर देवों ने भी माना

माँ शद बड़ा है पावन।।

 

माँ प्रेम की प्रतिमूर्ति

माँ श्रद्धा की आदिशक्ति।

 

माँ ही हज माँ ही मदीना

माँ से बड़ी न कोई भक्ति।।

 

माँ है सृष्टि का आगाज

माँ है वीणा की आवाज।

 

माँ है मन्दिर,माँ मस्जिद

माँ प्रार्थना,माँ है नमाज।।

 

माँ है गंगा सी अनूप

माँ धरती पे हरी धूब।

 

माँ दुख हरणी माँ कल्याणी

अजब निराले माँ के रूप।।

 

-डॉ0 सत्यवान वर्मा सौरभ

कविता निकेतन,बड़वा भिवानी

हरियाणा-127045

 

करूणा दया प्रेम का भारत ‌

 

भारत माँ का शीश हिमालय‌

चरण हैं हिंद महासागर,

मातुश्री के हृदय देश में

बहती गंगा हर हर हर|

 

अगल बगल माता के दोनों

लहराते हैं रत्नाकर,

पूरब में बंगाल की खाड़ी

पश्चिम रहे अरब सागर|

 

मध्यदेश में ऊँचे ऊँचे

विंध्य सतपुड़ा खड़े हुये,

सोन बेतवा चंबल के हैं

यहीं कहीं चरणों के घर|

 

छल छल छलके यहां नर्मदा

यमुना केन चहकतीं हैं,

दक्षिण में गोदावरी कृष्णा

पार उतारें भवसागर|

 

हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई

रहते हैं सब मिलजुल कर,

यहां चाहते देवता रहना

स्वर्ग लोक से आ आ कर|

 

कहीं भेद न भाव धर्म का

न ही जाति का बंधन,

करुणा दया प्रेम का भारत‌

पावन निर्मल मन निर्झर|

----

 

वीर बहादुर चुहिया रानी

 

बिल से निकली चुहिया रानी

लगी चाल चलने मस्तानी|

 

बोली मैं हूं घर की मुखिया

दुनियाँ है मेरी दीवानी|

 

पूर्ण तरह से ही मेरा है

इस घर का सब राशन पानी|

 

कभी भूल से न कर देना

मुझसे लड़ने की नादानी|

 

मेरे नाना पहिलवान हैं

बड़ी लड़ाकू मेरी नानी|

 

तभी अचानक किसी जगह से

आ धमकी बिल्ली महारानी|

 

डर के मारे बिल में घुस गई

वीर बहादुर चुहिया रानी|

--

 

कभी न खाना तंबाकू

 

किसी किराने की दुकान से

तंबाकू के पाउच ले आते,

गली गली में बच्चे दिखते

खुल्ल्म खुल्ला गुटखा खाते|

 

बाली उमर और ये गुट्खा

कैसे कैसे रोग बुलाते,

तड़फ तड़फ कर निश्छ्ल नन्हें

हाय मौत को गले लगाते|

 

ढेरों जहर, भरे गुटखों में

टी बी का आगाज कराते,

और अस्थमा के कंधे चढ़‌

मरघट तक का सफर कराते|

 

मर्ज केंसर हो जाने पर

लाखों रुपये रोज बहाते,

कितनी भी हो रही चिकित्सा

फिर भी प्राण नहीं बच पाते|

 

सरकारी हो हल्ले में भी

तम्बाकू को जहर बताते,

पता नहीं क्यों अब भी बच्चे

गुटखा खाते नहीं अघाते|

 

वैसे बिल्कुल सीधी सच्ची

बात तुम्हें अच्छी बतलाते,

जो होते हैं अच्छे बच्चे

तम्बाकू वे कभी न खाते|

-----

'एक और जिन्दगी' मोहन राकेश की श्रेष्ठ एवं चर्चित कहानी है । पति पत्नी के दाम्पत्य सम्बन्घों पर प्रकाश डालने वाली यह कहानी मोहन राकेश की अन्य कहानियों से सर्वथा भिन्न है, क्योंकि यह वह कहानी है जिसमें मोहन राकेश ने अपने जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं का हूबहू चित्र्ण किया है। 'एक और जिन्दगी' के नायक प्रकाश नायिका बीना तथा बच्चा पलाश तथा प्रकाश की दूसरी पत्नी निर्मला के माध्यम से मोहन राकेश ने अपने शीला (राकेश जी की पहली पत्नी) और नीत (मोहन राकेश और शीला का बेटा) तथा पुष्पा (मोहन राकेश की दूसरी पत्नी) की जिन्दगी की घटनाओं को केन्द्र में रखा है। मोहन राकेश का अधिकांश लेखन उनके व्यक्तिगत जीवन की परिस्थितियों पर किसी न किसी रूप में आधारित है। मोहन राकेश ने अपने जीवन में जो भोगा उसे ही शिल्प की उँचाई के साथ अपनी साहित्यिक रचनाओं में निरूपित किया है। उन्होंने जब भी और जो कुछ भी लिखा, अपने ही जीवन के इतिहास को फिर फिर दोहराया है। 1 अपने साहित्य में अपने ही जीवन को दोहराने की बात का समर्थन करते हुए मोहन राकेशने अपनी डायरी में लिखा है- जिस तरह 'सोलर' में शराब बरसों डंजनतम होती रहती है उसी तरह छोटी छोटी घटनाएँ बरसों दिमाग में डंजनतम होती रहती है। उन्हें फिर फिर लिपिबद्ध करने में पुरानी शराब का सा ही नशा हासिल होता है। 2

'एक और जिन्दगी' कहानी का नायक प्रकाश और नायिका बीना अपनी इच्छा से विवाह करते है। किन्तु कुछ ही दिनों बाद यह बंधन दोनों के लिए परेशानी का कारण बन जाता है। क्योंकि दोनों समान रूप से बौद्धिक होने के कारण अपनी अपनी अतृप्तियों के लिए असंतुष्ट रहते और अपने ही अहं की तुष्टि के लिए परेशान। दोनों यह भी समझ रहे थे कि शायद सम्बन्ध की शुरुआत ही गलत हुई है। दोनों के बीच एक दूसरे के प्रति 'अन्डरस्टेडिंग' का विकास ही नहीं हुआ था जो प्रणय सम्बन्धों को जोड़े रखता है। परिणामतः ब्याह के कुछ ही महीने बाद से ही पति पत्नी अलग रहने लगे थे। ब्याह के साथ जो सूत्र् जुड़ना चाहिए था, वह जुड़ नहीं सका था। दोनों अलग अलग जगह काम करते थे और अपना अपना स्वतंत्र् ताना-बाना बुनकर जी रहे थे। लोकाचार के नाते साल छः महीने कभी एक दो बार मिल लिया करते थे। 3

इन्हीं परिस्थिति को मोहन राकेश ने अपने जीवन में झेला था। मोहन राकेश ने स्वीकार किया है कि जीवन के उखड़ेपन को समेटने के प्रयास में और घर की तलाश में उन्होंने शीला से विवाह किया था किन्तु वह एक सिरे पर मोहभंग की शुरुआत थी। इस विवाह के साथ ही सहसा मैंने अपने को रुका हुआ पाया, रुका हुआ ही नहीं जड़ और स्तंभित। 4 विवाह के दिन से ही मोहन राकेश को शीला के अहंवादी स्वभाव का अनुभव होने लगा था। मोहन राकेश ने राजेन्द्र पाल से इस विषय में कहा था। विवाह की रस्मों में सादगी की बजाय भौंडा आडंबर देखकर उन्हें और भी दुख हुआ। विवाह के बाद पहली रात को ही असफलता के बीज बो दिये गये थे। उनकी पत्नी आकाश पर उड़ी जा रही थी कि आखिर तुम्हें मेरे हठ के सामने झुकना पड़ा न। बहुत ज़ीद कर रहे थे, विजय आखिर किसकी हुई ? मेरी न ? इसके बाद मानसिक यातनाओं और कुंठाओं का दौर शुरु हुआ। 5 इस विषय में मोहन राकेश अपनी डायरी में लिखते है मन बार-बार उन दिनों में लौट जाता है, जब यह विवाह नहीं हुआ था। यदि यौवन के प्रथम चरण में ही यह कालरात्रि आरंभ न हो जाती। बार-बार मन को मारा है। बार-बार अपने को और दूसरों को धोखा दिया है। बार-बार यह चाहा है कि इस दुःस्वप्न की परिणति मंगलमय हो। 6

विवाह के कुछ ही महीने में मोहन राकेश और शीला अलग-अलग जगह रहने लगे थे। मोहन राकेश नौकरी के लिए जलन्धर और शीला आगरा चली गयी और फिर से कालेज में काम करने लगी। दोनों अजनबी बनकर अपने अपने रास्तों पे चलते रहे। सन् 1952 से 1957 तक यानि पाँच साल तक दोनों ने अलग-अलग जगहों पर रहकर ही अपना वैवाहिक सम्बन्ध निभाया। कभी-कभी मिल भी जाते तो दुनिया को यह दिखाने का प्रयास करते कि दोनों आधुनिक ढंग से स्वस्थ वैवाहिक जीवन जी रहे हैं। मोहन राकेश और शीला के जीवन में जब नीत का प्रवेश हुआ तब वे अधिक चिंतित हो गये। यद्यपि व्यक्तिगत जीवन बहुत तनावों के बीच जिया जा रहा था, फिर भी अपने परिवेश से कटे होने की अनुभूति का स्थान सर्वथा दूसरी अनुभूति ने ले लिया था और वह भी जुड़े रहने की अनिवार्यता की अनुभूति। एक तरह की कड़वाहट इस अनुभूति में भी थी, पर वह कड़वाहट आरोपित नहीं थी। उसका उद्देश्य भी जुड़े होने की स्थिति से मुक्ति पाना नहीं उसकी तत्कालीन शर्तो को अस्वीकार करते हुए भी जुड़े रहने के सार्थक संदर्भों को खोजना था। 7 नीत की मौजूदगी से भी मोहन राकेश और शीला के बीच कोई समझौता नहीं हुआ।

यही स्थिति 'एक और जिन्दगी' के प्रकाश और बीना की है। दोनों सिर्फ अपने अपने व्यक्तित्व को लेकर सचेत है। बच्चे की पहली वर्षगांठ पर प्रकाश और बीना के संबंध और भी लड़खड़ाने लगते है। बीना पलाश की वर्षगांठ मनाने का प्रयोजन अपने पिता के घर करती है और प्रकाश अपने घर। प्रकाश बीना और पलाश को अपने घर बुलाना चाहता है। किन्तु बीना एक घंटे के लिए भी यहाँ आने को तैयार नहीं होती। अतः प्रकाश महेमानों को चाय पिलाकर विदा कर देता है और पलाश के लिए खरीदे उपहार को नौकरों के हाथ बीना को भेज देता है। दोनों में से कोई भी बच्चे के लिए समझौता करने को तैयार नहीं होता।

प्रकाश और बीना के बीच एक ऐसी स्थिति बन जाती है कि आगे कुछ संभावना नहीं रहती। एक अनिवार्य अलगाव और बाद में कोर्ट द्वारा स्वीकृत तलाक ही आखिरी विकल्प बन जाता है। प्रकाश पलाश पर अधिकार चाहता है। इस पर बीना कहती है अगर आपके पास पिता का दिल होता तो आप पार्टी में न आते ? यह तो आकस्मिक घटना है कि आप इसके पिता है। 8 बीना किसी भी हालत में पलाश का अधिकार प्रकाश को सौंपने के लिए तैयार नहीं है। प्रकाश भी सोचता है कि बच्चे के लिए फिजूल की भावुकता में कुछ नहीं रखा। सम्बन्ध विच्छेदन के बाद फिर से विवाह कर लिया जाए तो घर में और बच्चे आ जायेंगे।

शीला से तलाक के बाद नीत के सम्बन्ध में सोचकर मोहन राकेश बहुत दुःखी थे नीत की तस्वीर सामने है। मुझे इस बच्चे से कितना प्यार है फिर भी। 9 और बच्चा बड़ा होकर इस परिस्थिति को ठीक से समझ सके तो मुझे खुशी होगी। न समझ सके तो भी दुख नहीं होगा। बच्चे की ग़लतफहमी उसकी माँ को सांत्वना दे सके तो भी मैं उसे सांत्वना से वंचित नहीं करना चाहूँगा। 10 तलाक के बाद की मनःस्थिति को मोहन राकेश ने इन शब्दों में स्पष्ट किया है आज सम्बन्ध विच्छेदन के इतने दिन बाद मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि दाम्पत्य में जो सहचर्य चाहिए वह दोनों में कहीं नहीं था, कोई भी परम्परापेक्षिता नहीं थी। यह एक दुर्वाह स्वप्न छाया थी, जिसे हट जाना ही चाहिए 11

प्रथम विवाह की असफलता से उबरने के लिए मोहन राकेश ने पुष्पा से दूसरा विवाह किया। पुष्पा उनके एक मित्र की बहन थी। पहली पत्नी शीला और पुष्पा में बड़ा अंतर था। फिर भी यह विवाह मोहन राकेश के लिए गलत चुनाव का ही परिणाम था। इस विवाह से मोहन राकेश को बड़ा संघर्ष झेलना पड़ा क्योंकि उनकी यह पत्नी मानसिक रूप से विक्षिप्त थी। यह तथ्य उनके सामने शादी के बाद आया। यह उसकी नियति का अजीब खेल था। पत्नी की इस मानसिक स्थिति ने उन्हें दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर कर दिया था। घर छोड़ने के कुछ महीने बाद कमलेश्वर से सारी बातें स्पष्ट करते हुए मोहन राकेश ने कहा था कमलेश स्थिति यह थी कि मैं आत्महत्या कर लेता। चार महीने से माँग माँगकर कपड़े पहन रहा हूँ। सचमुच मैं जान दे देता। 12 मोहन राकेश ने वैवाहिक जीवन के वो दर्दनाक मोड़ों को पार किया था जिससे 'पत्नी' नाम से ही उनमें एक तरह की दहशत भर जाती।

'एक और जिन्दगी' का प्रकाश अपनी बिखरी जिन्दगी को समेटने के लिए अपने मित्र जुनेजा की बहन निर्मला से विवाह करके नये जीवन का प्रारंभ करता है। कुछ ही दिनों में प्रकाश के सामने निर्मला का मानसिक विक्षिप्त रूप आता है। निर्मला की यह स्थिति प्रकाश द्वारा आरंभ की गयी नयी जिन्दगी के प्रयत्न को काफी करुणाजनक प्रमाणित करता है। निर्मला के साथ रहते उसे लगता है कि वह जी न रहा हो सिर्फ अंदर ही अंदर घुट रहा हो। क्या यही वह जिन्दगी थी जिसे पाने के लिए उसने इतने साल अपने आप से संघर्ष किया था। 13 घुटन भरी जिन्दगी से पीछा छुड़ाने के लिए प्रकाश घर से भागकर पहाड़ी पर चला जाता है। यद्यपि वहाँ उसे घूमने आये बीना और पलाश अवश्य मिलते है किन्तु बीना और प्रकाश के बीच कोई आत्मीय संवाद नहीं होता और दोनों अपनी अपनी राह पर जाते दिखाई देते हैं। दो विवाहों की असफलता के बाद प्रकाश अन्दर ही अन्दर घुटकर रह जाता है। अंततः बीयर की बोतलों में वह अपने अकेलेपन को दूर करने का प्रयत्न करता है।

अतः स्पष्ट है कि 'एक और जिन्दगी' कहानी में मोहन राकेश ने सिर्फ पात्रें के नाम बदलकर अपने ही जीवन की घटनाओं को शब्दांकित किया है। यह मोहन राकेश के जीवन की वे घटनाएँ है जिसने राकेश होम ब्रेकर है और एक ही औरत के साथ नहीं रह सकता। जैसा सबसे बड़ा इल्जाम लगाया था। डॉ. इन्द्रनाथ मदान मोहन राकेश के जीवन की विड़म्बना को स्पष्ट करते हुए लिखते है राकेश को घर और बीबी बदलने की विवशता हर दो तीन साल बाद पड़ जाती थी। यह अमीरों की पुरानी गाड़ियाँ बदलने की ऐयाशी नहीं थी लाचारी थी। अपने ही जीवन की घटनाओं को स्वर देनेवाली यह कहानी मोहन राकेश के जीवन का सच्चा दस्तावेज बनी नज़र आती है।

संदर्भ- 1 मोहन राकेश रंग,शिल्प और प्रदर्शन- डॉ ़जयदेव तनेजा पृष्ठ, 22 2 मोहन राकेश की डायरी- पृष्ठ, 97 3 मोहन राकेश की संपूर्ण कहानियाँ- पृष्ठ, 278 4 मोहन राकेश की डायरी- पृष्ठ, 59 5 राजेन्द्रपाल के- 'अन्तर्विरोधी व्यक्तित्व' लेख से (नाटककार मोहन राकेश-सं ़सुंदरलाल कथूरिया) 6 मोहन राकेश की डायरी-पृष्ठ, 93 7 वही- पृष्ठ, 35 8 मोहन राकेश की संपूर्ण कहानियाँ- पृष्ठ, 279 9 मोहन राकेश की डायरी- पृष्ठ, 126 10 वही- पृष्ठ, 79 11 वही- पृष्ठ, 121 12 मेरा हमदम मेरा दोस्त- कमलेश्वर पृष्ठ, 11 13 मोहन राकेश की संपूर्ण कहानियाँ- पृष्ठ, 282

---

डॉ. दीप्ति बी. परमार, प्रवक्ता हिन्दी-विभाग आर. आर. पटेल महाविद्यालय, राजकोट

साठ वर्षों से अधिक के आजाद भारत की जो तस्‍वीर उभर कर सामने आती है उसे देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि आधुनिक भारत के निर्माण में सबसे ज्‍यादा योगदान पण्‍डित जवाहर लाल नेहरु, श्री मती इन्‍दिरा गांधी और स्‍वर्गीय राजीव गांधी का रहा है। नेहरु जी व श्रीमती इन्‍दिरा गांधी ने लम्‍बे समय तक देश के प्रधान मंत्री की बागडोर संभाली और वही किया जो इस देश के लिए उचित था। जरुरी था। नेहरु जी एक स्‍वप्‍न दृष्टा थे, उन्‍हें देश की हकीकत मालूम थी। आजादी की लड़ाई में सक्रिय भाग लेने के कारण उन्‍होंने पूरे देश का बार बार दौरा किया था। वे विदेशों में शिक्षित - दीक्षित थे, मगर वे जानते थे कि देश के गरीब किसान, मजदूर का हित किसमें है। उन्‍होंने समाजवाद का भारतीय माडल दिया जो उस वक्‍त की जरुरत थी। वे गंगाजमुनी तहजीब के हिमायती थे। अपने लेखन में भी उन्‍होंने इसी बात की ओर बार बार ध्‍यान आकृष्ट किया है।

नेहरु के समाजवादी माडल के कारण ही भारत एक गुट निरपेक्ष राष्ट्र के रुप में उभर कर सामने आया। नेहरु जी की पंचशील नीति आज भी भारत सरकार की विदेश नीति का आधार है नेहरु जी की पंच वर्षीय योजनाओं के प्रारुप के कारण ही आज पूरे देश में योजनाएँ बनती है और साकार रुप लेती है। 1947 से 1962 तक का समय भारतीय जनमानस के लिए नवजागरण का दौर था। देश में एक नई युवा पीढ़ी अंगडाई ले रही थी, देश धीरे धीरे मगर सही दिशा में आगे बढ़ रहा था। पण्‍डित नेहरु के कार्यकाल ‘1947-1962' में पंचवर्षीय योजनाओं के अलावा समाजवादी माडल पर काम हुआ। उस वक्‍त नेहरु के ही प्रयासों से इस माडल के कारण देश में प्रगति विकास और वैज्ञानिक सोच बना। उन्‍होंने देश में जल-विधुत का विकास किया। उन्‍होंने नाभिकीय उर्जा, परमाणु उर्जा के विकास की भी नीव रखी। पंचशील सिद्धान्‍त के सहारे भारतीय विदेश नीति को गुट निरपेक्ष रखा जो आज भी हमारी नीति है। नेहरु ने औद्योगिक विकास, कृषि विकास, वैज्ञानिक विकास की नीव रखी। जिस पर बाद के प्रधान मंत्रियों ने एक शानदार इमारत बनाई। लेकिन नेहरु को चीन से विश्वासघात मिला।

नेहरु जी के असामयिक अवसान के बाद अल्‍प समय के लिए लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधान मंत्री बने। उन्‍होंने जय जवान जय किसान के रुप में देश को एक नई राह पर ले जाने के सफल प्रयोग किये। लेकिन शास्त्री जी को ज्‍यादा समय नहीं मिला और इन्‍दिरा गांधी देश की प्रधान मंत्री बनी। वे एक लौह महिला के रुप में सामने आई। उन्‍होंने वही किया जो इस देश के लिए उनके हिसाब से आवश्यक था। श्रीमती गांधी अपने प्रगतिशील विचारों के साथ हमेशा भारतीय समाज को दिशा देती रही। उनके कार्यकाल में बैंक का राष्ट्रीयकरण एक क्रान्‍तिकारी कदम था, जिसने पूरे देश के आर्थिक जगत में एक क्रान्‍ति कर दी। राजाओं का प्रिवीपर्स बन्‍द करने के निर्णय के भी बडे दूरगामी प्रभाव पड़े। श्री मती इन्‍दिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्‍तान के सरदर्द को हमेशा हमेशा के लिए समाप्‍त कर बंगला देश का निर्माण कर दिया। वे सच में दुर्गा सिद्ध हुई।

इन्‍दिरा गांधी ने आपातकाल लगाया जो लम्‍बे समय तक बहस का मुद्‌दा बना रहा लेकिन दूसरी आजादी कुल ढ़ाई वर्ष चली। जनता पार्टी में फूट पड़ गई। फिर चुनाव हुए और इन्‍दिरा गांधी ने शानदार जीत दर्ज कर दिल्‍ली में सत्‍ता पर कब्‍जा कर लिया। सत्‍ता संगठन पर एक साथ कब्‍जा कर उन्‍होंने सिद्ध कर दिया कि वे ही देश को सही दिषा में ले जा सकती है। देश उनके नेतृत्‍व में लगभग 16 वर्ष आगे बढता रहा। देश के विकास में उनका योगदान अविस्‍मरणीय रहा। उन्‍होंने 18 माई 1974 के पोकरण में परमाणु विस्‍फोट किया। आपरेशन ब्‍लू स्‍टार के माध्‍यम से उन्‍होने देश की एकता और अखण्‍डता को बनाये रखा। उनके कार्य काल में ही देश की अर्थ व्‍यवस्‍था में सुधार हुए। हरित क्रान्‍ति-दुग्‍धक्रान्‍ति की नीव उन्‍होने ही रखी। उन्‍होने भारतीय जनमानस को गर्व से जीने का स्‍वाभिमानी तरीका सिखाया। आपातकाल के बाद वे चुनाव हारी मगर जनता पार्टी की असफलता के बाद वे वापस पूरी ताकत से देश को आगे बढ़ाने में लग गई। अपने ही अंगरक्षकों की गोली का शिकार होने के बाद राजीव गांधी देश के प्रधान मंत्री बने। कम्‍प्‍यूटर क्रान्‍ति, मोबाइल क्रान्‍ति, दूरसंचार क्रान्‍ति तथा पंचायती राज को एक नई दिशा राजीव गांधी ने दी।

राजीव गांधी के अल्‍प कार्य काल में देश में कम्‍प्‍यूटर सूचना प्रोधोगिकी और दूरसंचार के क्षेत्र में महत्‍वपूर्ण नीतियां बनाई गई। जिसके कारण करोड़ों युवाओं को रोजगार मिला। देश की विदेशी मुद्रा भण्‍डार में अत्‍यधिक वृद्धि हुई और कभी सोना गिरवी रखने वाली चन्‍द्रशेखर सरकार की तुलना में राजीव की दूरगामी नीतियों से देश खुशहाल हुआ। उन्‍होंने शिक्षा, पंचायती राज और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में क्रान्‍तिकारी सुधार किये। अपने मंत्री वी.पी. सिंह की महत्‍वाकांक्षा के कारण राजीव को दूसरे कार्यकाल का अवसर नहीं मिला। लिट्‌टे ने उनकी हत्‍या कर दी। राजीव गांधी का सपना था एक युवा और विकसित भारत जो आज हकीकत बन गई है। राजीव गांधी को समय कम मिला।

फिर सत्‍ता-परिवर्तन का एक ऐसा दौर चला जब देश पीछे रह गया और व्‍यक्‍तिगत महत्‍वाकांक्षाएं हावी हो गई। कांग्रेस से टूट कर गये, मोरार जी देसाई, चौधरी चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, एच.डी.देवगौडा, आइ.के.गुजराल और चन्‍द्रशेखर जैसे लोग प्रधान मंत्री बने। इनके पास देश के लिए कोई दूर दृप्‍टि नहीं थी, ये अल्‍प कालीन प्रधान मंत्री देश को कोई दिशा नहीं दे सके। इनके कार्यकाल व्‍यक्‍तिगत महत्‍वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गये। अटल बिहारी वाजपेई ने जरुर दूसरा परमाणु विस्‍फोट कर देश का नाम रोशन किया।

आगे चलकर पी.वी.नरसिंहाराव देश के प्रधान मंत्री बने और देश में खुली अर्थव्‍यवस्‍था की हवा चली। देश एक नई दिशा की और चल पड़ा। मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों के कारण देश के व्‍यापार, उद्योग व कृषिजगत में नये परिवर्तन हुए। डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्‍व वाली सरकार ने तेजी से सुधारो को लागू किया। इस सरकार ने पंचायती राज, ग्रामीण विकास के क्षैत्र में नये सुधार किये। शिक्षा का अधिकार दिया। महिलाओं के सशक्‍तिकरण के सफल प्रयास किये।

0 0 0

यशवन्‍त कोठारी, 86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 2, फोन - 2670596

ykkothari3@gmail.com

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *