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सतीश वर्मा की कविताएँ

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सतीश वर्मा ने अपने कई काव्य संग्रह प्रकाशित किये हैं बड़ी उग्र और नितान्त मौलिक शैली में। आपको आघात लगता है, रोष उत्पन्न होता है और हिंसा के साथ शब्द शब्द सामना होता है। कहीं अंगुली नहीं रख सकते लेकिन दिमाग घूम जाता है। सतीश वर्मा में बड़ी संवेदनशीलता मिलेगी जिससे जीवन की कुंठाओं, पीड़ाओं, दुविधाओं को बड़े सकारात्मक रूप से इन्होंने उभारा है, रास्ता ढूँढते हैं, अन्धेरे को चीरते हैं और हाथ पकड़ कर रोशनी की ओर मुड़ जाते हैं। लड़ाई है, ज़ख्म है, पीड़ा है परन्तु हारने की प्रकृति नहीं। जीवन के कटु सत्यों को झेला है परन्तु कभी भी छोटे रास्तों से समझौता नही किया। अपनी ईमानदारी की गठरी को सिर पर रख कर मंझधार पार की है। गिरे हैं, टूटे हैं, रक्तरंजित हुए हैं और फिर उठकर चल दिये हैं। आज की हिंसा, विध्वंस, विनाश को बखूबी समझा है, कविताचित्रों में इस त्रासदी को उकेरा है इसकी निष्फलता और निस्सारता को प्रदर्शित किया है। कहीं कहीं प्रकृति के बहुत सूक्ष्म सौन्दर्य को दिखाया है। इनके प्रतीक और बिम्ब अलौकिक हैं, बिल्कुल अभिन्न और अभूतपूर्व। यह अभिनव बिम्बों के समृद्ध शब्द शिल्पी हैं। कविताएं स्वत: स्फुरि…

असग़र वजाहत का संस्मरण - 'फ़ैज' पर कुछ अलग ढंग से

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असगर वजाहत का एक संस्मरण ई-बुक पर पढ़िए उनकी अपनी ही हस्तलिपि में - 'फ़ैज' पर अलग ढंग से -




संजय दानी की ग़ज़ल - बस प्यार है

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प्यार बस प्यार है प्यार बस प्यार है दोस्तों,
ज़ीस्त का सार है दोस्तों।चांदनी बेवफ़ा है अगर,
चांद की हार है दोस्तों ।मुल्क में मूर्खों का राज गर,
ग्यान बेकार है दोस्तों।इश्क़ के हाट में सुख नहीं,
गम का बाज़ार है दोस्तों।मेरे मन की ये गलती नहीं,
दिल गुनहगार है दोस्तों।दोस्त हूं लहरों का, साहिलों,
को नमस्कार है दोस्तों ।फ़िर शहादत पतन्गों की क्यूं,
शमअ गद्दार है दोस्तों।हुस्न की चाकरी क्यूं करूं,
इश्क़ खुद्दार है दोस्तों।गर कहे लैला जां दे दो तो,
मज़नूं तैयार है दोस्तों।प्यार मजबूरी है दिल की,
हम, सब समझदार हैं दोस्तों।
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उमेश कुमार चौरसिया की लघुकथाएँ

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लघु कथा 1 :-(संदर्भ गुर्जर आन्‍दोलन)संवेदनाआज आन्‍दोलन को आठ दिन हो गए हैं। प्रदेश-भर में जगह-जगह धरने, प्रदर्शन हो रहे हैं, रास्‍ते जाम हो रहे हैं, रेल की पटरियां उखाड़ी जा रही हैं। राजनीतिज्ञों को अपनी कुर्सी और वोट की चिन्‍ता है तो आन्‍दोलनकारियों को अपनी मांगे मनवाने के स्‍वार्थ की फिक्र। रोज हाथठेले से माल ठोकर मजदूरी कमाने वाला भोला आठ दिन से बेकाम बैठा है, उसके बच्‍चों को दो वक्‍त की रोटी भी नसीब नहीं हो रही। मजदूरों की कच्‍ची बस्‍ती में मातम-सा छाया है। बन्‍द रास्‍तों के कारण बच्चे कैरियर के लिए आवश्‍यक परीक्षा नहीं दे पाने के कारण व्‍यथित हैं। समाचार मिला है कि गांव से ट्रेक्‍टर में बैठकर शहर के स्‍कूल जा रहे बच्‍चों को बन्‍द का रौब दिखाकर मारा-पीटा गया और ट्रेक्‍टर में आग लगा दी गई। मंडी में सब्‍जियों के दाम आसमान छूने लगे हैं। हजारों यात्री ट्रेनें रद्‌द होने से स्‍टेशनों पर फंसे हुए हैं। चारों ओर आमजन हैरान-परेशान है। आन्‍दोलनकारी रेल की पटरियों और राजमार्ग पर डेरा डाले, अलाव के ताप में छक कर खा-पी रहे हैं और ढोल-नगाड़ों की ताल पर खुशी से नाच-गा रहे हैं। आंदोलन सचमुच सफल…

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल-गीत

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      जैसे को तैसा

उस दिन सुबह दादाजी
भोर भ्रमण को निकल पड़े ,
बहुत तेज चलते जाते थे
जैसे जाते उड़े उड़े |

बीच सड़क एक कुत्ता आया
उन्हें देखकर गुर्राया ,
पहले भौंका जोर जोर से
फिर फिर गुर्रा डरवाया |

दादाजी ने बड़े प्रेम से
उस कुत्ते को पुचकारा ,
फिर भी वह जब न माना तो
घुमा छड़ी सिर पर मारा |

डंडा सिर पर पड़ जाने से
तुरंत भौंकना बंद हुआ ,
डर के मारे दादाजी के
पल भर में वह हवा हुआ।

यदि प्रेम से समझाने पर ‌
बात नहीं कोई माने तो ,
कर सकते तुम भी उपाय ‌
खुद अपनी जान बचाने को |

एक गाल पर थप्पड़ खाकर
दूजा गाल बताना मत ,
गाँधी का सिद्धांत कभी भी
अपने पर आजमाना मत |

समय आजकल वह आया है
जैसे को तैसा करना ,
जब तक हैं हम सही राह पर ‌
फिर बेमतलब क्यों डरना |
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विजय वर्मा के हाइकु

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विषमता की खाई
बढ़ गयी है
विषमता की खाई
राम दुहाई
.
दहेज़ बिना
उठी ना डोली,तब
ज़हर खाई
.
भोजन नहीं
घर जिसके,लाये
कैसे दवाई.? तंग हाल में
रह रही अकेली
रामु  की ताईजल ना जाए
ससुराल में दीदी
चिंतित भाई.झेल ना सकी
जाड़े की रात ,मरी
बुढ़िया माई.
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS
BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

वेद प्रताप वैदिक का आलेख - संदर्भ बिनायक सेन अदालती फ़ैसला : कामरेडों का फ़िजूल रोदन

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अदालत को बिनायक सेन के बारे में जितनी बातें मालूम पड़ी हैं, वे सब ऊंट के मुंह में जीरे के समान हो सकती हैं। असली बातों तक वे बेचारे पुलिसवाले क्या पहुंचेंगे, जो इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट को आईएसआई समझ लेते हैं। वे गुस्से से लबालब हों तो हैरत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि माओवादी हिंसा में वे ही मारे जाते हैं। हमारे गालबजाऊ बुद्धिजीवी तो उन्हें मच्छर बराबर भी नहीं समझते।डॉ बिनायक सेन को लेकर देश का अंग्रेजी मीडिया और हमारे कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी जिस तरह आपा खो रहे हैं, उसे देखकर देश के लोग दंग हैं। इतना हंगामा तो प्रज्ञा ठाकुर वगैरह को लेकर हमारे तथाकथित राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी तत्वों ने भी नहीं मचाया। वामपंथियों ने आरएसएस को भी मात कर दिया। आरएसएस ने जरा भी देर नहीं लगाई और ‘भगवा आतंकवाद’ की भर्त्सना कर दी। अपने आपको हिंसक गतिविधियों का घोर विरोधी घोषित कर दिया। ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द ही मीडिया से गायब हो गया। लेकिन बिनायक सेन का झंडा उठाने वाले एक भी संगठन या व्यक्ति ने अभी तक माओवादी हिंसा के खिलाफ अपना मुंह तक नहीं खोला। क्या यह माना जाए कि माओवादियों द्वारा मारे जा रहे सैकड़ों निहत्थे और …

कुछ उम्दा कविताएँ

—निरंजन कुमार ‘निराकार’, रतलामजरूरत के जबड़े में आदमी के सामने— जरूरत का विशाल पहाड़ खड़ा है। आदमी परेशान है जरूरत की एक पूर्ति के बाद दूसरी सिर उठाती है। टक्कर लेने इसे नित्य तनाव भरी दौड़ में व्यस्त। संताप पाले/गाफिल रहता है आदमी/ जरूरत /सुरसा का मुँह खोले। आदमी को भस्मसात करने में व्यग्र/तत्पर बेहतर यही है/अच्छी समझ के आदमी के लिए कठोर निर्णय ले/निर्ममता से कुचले/ धकेले/धकेलता जाये— ‘जरूरत’ संयम/धैर्य सादगी के शस्त्र से विवेक शून्य न हो— भौतिकता की चकाचौंध में जरूरत के/ जबड़े में फंसा आदमी पछाड़ खा, कहीं का न रहता है। वजूद अपना खो देता है/ आदमी। **************************** मान भी लो— बाबुभाई हरिभाई कापड़िया, रतलामबंद हो अब ये तकरार सच्चाइयों को करें, स्वीकार साठ साल बीत गए कल अब छोड़ो... बचपन वाली वैसी चाल अब बात कुछ यों बनी है— सिर्फ बात तीनों जजों की होगी फैसला तीनों ने, तीनों का दिया तारीख ३० में, तीन को गिनो आगे कदम का अन्तराल भी माह तीन है अतः मामला अब एक—दो—तीन करो जरा सोचो— फैसला है विधि और विधान का तीसरा है विद्वान का तो—अब मान भी लो या कहीं, ऐ…

असग़र वजाहत का नया कहानी संग्रह - यही तो डेमोक्रेसिया है, भइया

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लोकप्रिय कथाकार असग़र वजाहत का नया कहानी संग्रह है - यही तो डेमोक्रेसिया है भइया. इस कथा संग्रह की एक ख़ास कहानी दिल की दुनिया आप पढ़ें ई-स्निप पर असग़र वजाहत की अपनी स्वयं की पांडुलिपि में -यहाँ पर.असग़र वजाहत ने इस कहानी संग्रह के लिए एक लंबी भूमिका भी लिखी है. इसे भी आप उनकी स्वयं की पांडुलिपि में ई-स्निप पर यहाँ पढ़ सकते हैं.असग़र वजाहत के दो अन्य ताज़ा आलेख - मुसलमानों की पीड़ा यहाँ पर पढ़ें तथा शहरयार पर लिखा उनका संस्मरणात्मक आलेख यहाँ पर पढ़ें.आप चाहें तो इन पीडीएफ़ ई-किताबों को उन्हीं कड़ियों में दिए  डाउनलोड  लिंक से डाउनलोड कर अपने कंप्यूटर / मोबाइल / आई-पैड पर भी पढ़ सकते हैं. टीप : यदि कोई पाठक इनमें से किसी पांडुलिपि को यूनिकोड हिंदी अथवा हिंदी के किसी भी फ़ॉन्ट में टाइप कर सकते हों तो इस उत्तम कार्य हेतु उनका स्वागत है.

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की दो हास्य-व्यंग्य कविताएँ

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भाग्य विधायक ‌ नेता गुंडा दादा तस्कर और पर पीड़ा दायक ‌ इन ‌ पांचों तत्वों से मिल ‌ कर ‌ बनता भाग्य विधायक ‌ इसी कड़ी में कुछ ‌ विशिष्ट ‌ और ‌ अधिक ‌ योग्य ‌ जो होते जीत ‌ जीत ‌ कर ‌ के चुनाव ‌ वे ही संसद ‌ में होते इनका जीवन ‌ अहा स्वर्ग ‌ है बड़े मजे से जीते जितना खा सकते हैं खाते जो पी सकते पीते ऐसे नर ‌ पुंग ‌ व ‌ श्रेष्ठों को करना रोज ‌ प्रणाम ‌ अपना सारा जीवन ‌ ही कर ‌ देना इनके नाम ‌ इनके पद ‌ चिन्हों पर ‌ चलकर ‌ तुम ‌ पद ‌ पा सकते हो सारा स्वर्ग ‌ उठाकर ‌ अपने घर ‌ ला सकते हो -----बेटी का दर्जा मिले सास ससुर रहते जहां कहलाती ससुराल ‌ साले , सरहज , सालियों का है मायाजाल | है कोई षडयंत्र ये या समाज की चाल ‌ " स " से ही क्यों शुरू हैं संबंध ए ससुराल | ' स ' से चालू सास हैं ' स ' ससुरे की ढाल साले , सरहज सालियां सब ' स ' की टकसाल | क्यों इतना मजबूत है वर्चस्व ए ससुराल सड़ू भाई भी शुरु ' स ' से यही सवा | गुरू पढ़ाते क्यों नहीं ' स ' माने ससुराल ‌ ' स ' के माने सरोता बंद करें तत्काल ‌ | बार बार आता यही मेरे मन म…

नागेश पांडेय 'संजय' का गीत - कौन आया

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कौन आया ? द्वार पर आहट हुई है, देख तो लो, कौन आया ? तड़पते मन की कसक की गंध शायद पा गया वह, उसे आना ही नहीं था मगर शायद आ गया वह। मुझे घबराहट हुई है, देख तो लो, कौन आया ? ज्योति यह कैसी ? बुझाने पर अधिक ही जगमगाई। यह फसल कैसी ? कि जितनी कटी, उतनी लहलहाई। प्रीति अक्षयवट हुई है, देख तो लो, कौन आया ? थम गईं शीतल हवाएँ, दग्ध उर बेहाल हैं जी। प्यास अब भी तीव्रतम है, पर नदी पर जाल है जी। आस सूना तट हुई है, देख तो लो, कौन आया ? क्यों जगत की वेदनाएँ पल रहीं मन के निलय में ? मधुर सपनों की चिताएँ जल रहीं जर्जर हृदय में। जिंदगी मरघट हुई है, देख तो लो, कौन आया ? जिंदगी की देहरी पर, मौत को रोके खड़ा हूँ। नयन तुझको देख भर लें, बस इसी जिद पर अड़ा हूँ। एक ही अब रट हुई है, देख तो लो, कौन आया ? dr.nagesh.pandey.sanjay@gmail.com> --
डॉ. नागेश पांडेय "संजय"
शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश (भारत) - 242001.

डी.एल. खन्‍ना ‘प्‍यासा' की कविताएँ

तलाकप्रश्न चिन्ह जब सम्‍बंधों पर लग जाते हैं, सात जन्‍म के जीवन साथी पल में दूर चले जाते हैं। शंका के अंकुश से उपजे, बीज कहां फल पाते हैं। सदियों के संस्‍कार हमारे, पल में रूप बदल जाते हैं। सात जन्‍म के जीवन साथी... मन पर हावी इच्‍छाएं, जब हो जाती हैं। सही गलत की सब सीमाएं, जाने कहां खो जाती हैं। सात जन्‍म के जीवन साथी... विश्‍वासों की आधारशिला, जब हिल जाती है। एक नीड़ के दो पंछी, अलग दिशा को उड़ जाते हैं। सात जन्‍म के जीवन साथी... आशादीपदुःख अक्‍सर सिरहाने आकर, चुपके से कह जाता है। जिस पत्‍थर ने ठोकर मारी, गले उसे लगाकर देख। दुःख के बादल जब घिर आये, साथ अपनों ने छोड़ दिया। जीवन की आपाधापी में, गैरों को तू अपनाकर देख। उम्‍मीदों के अंधियारे में, आशादीप जलाकर देख। मंजिल कितनी दूर हो तेरी, पंखों को फैलाकर देख। सागर तट से टकराकर, लहरें, हरदम ये समझाती हैं। पीछे हटने वाले मुसाफिर, आगे कदम बढ़कर देख। बचपनऐ लौट के आ बचपन मेरे, जब तारों को गिनते गिनते, बेसुध होकर सो जाते थे। छोटी छोटी बातों पर हम, कभी हसंते थे कभी रोते थे। ऐ लौट के आ बचपन मेरे... जब दर्द दवा का पता ना था, मां की झोली बस दुनिय…

देवी नागरानी की दो ग़ज़लें

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ग़ज़लः 100पहचानता है यारों, हमको जहान साराहिंदोस्ताँ के हम है,  हिंदोस्ताँ हमारायह जंग है हमारी, लड़ना इसे हमें हैयादें शहादतों की देगी हमें सहाराइस मुल्क के जवाँ सब, अपने ही भाई बेटेकरते हैं जान कुर्बाँ, जब देश ने पुकाराजो भेंट चढ़ गए हैं, चौखट पे ज़ुल्मतों कीबलिदान से ही उनके, ऊंचा है सर हमारालड़ते हुए मरे जो, उनको सलाम देवीनिकला जुलूस उनका, वो याद है नज़ारामिट्टी के इस वतन की, देकर लहू की ख़ुशबूममता का क़र्ज़ देवी, वीरों ने है उतारा**ग़ज़लः 68दिल की दिल से हुई बग़ावत हैप्यार भी क्या हसीं रक़ाबत हैजो सुकूँ-चैन था, वही छीनादुश्मनों की यही रवायत हैहौसले हार कर भी कब टूटेजीत की आस अब सलामत हैदूर क्यों मुझसे है मेरा सायामुझको उसकी बड़ी ज़रूरत है.इस तरह दिल को चूर-चूर कियाक्या बतायें कि कैसी हालत है.कैसे साँझा कहूँ इसे लोगोदर्द मेरा, मेरी अमानत हैइतनी क़ाबिल न थी कभी 'देवी'दोस्तों की बड़ी इनायत है.-----

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य : जाते वर्ष की यादें

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जाता हुआ बरस बहुत सी यादें छोड़ कर जा रहा है। सरकार ने नित नये घोटाले दिये, और सब कुछ बस ऐसे ही चलता रहा। सरकार है यह अहसास भी खतम हो गया। आन्‍दोलनों, घोटालों हड़तालों से बचे तो टेप-काण्‍डों में उलझ गये। पी․ए․सी․ से बचे तो जे․पी․सी में फंसो। दोनों से बचो तो विकीलीक्‍स में उलझो। बेचारी सरकार भी क्‍या करें। युवा लोग नौकरियों को तरसते रहे। राजपथ की रोशनी में अन्‍धेरों की पगडंडियां ढूंढते ढूंढते आम आदमी खो गया। बचपन खो गया। कामनवेल्‍थ में कुछ पदक आये, मगर भ्रष्टाचार के पदकों के सामने सोने, चांदी के तमगे बौने सिद्ध हो गये। नीरा राडि़या, प्रभु चावला, वीर सांघवी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में नयी संभावनाओं की खोज की। टाटा तक के दामन में दाग लग गये। दामन किसी का भी उजला नहीं या बचा। फोन टेपिंग से देश में खूब हल्‍ला मचा। मगर क्‍या किसी सामान्‍य व्‍यक्‍ति को लाभ मिला। साल गुजर रहा है और महंगाई बढ़ रही है। मानसून खूब आया जम कर बरसा मगर सड़कों पर गड्‌ढे ऐसे ही बने रहे सरकार ने मानसून, मावट की चर्चा की, मगर अफसरों के कानों पर जूं नहीं रेंगी वे वैसे ही सफेद हाथी बने रहे। कानून का मखौल पूरे वर्ष उड़ा…

प्रमोद भार्गव का आलेख - भूमि की बिगड़ती सेहत

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हमारे देश में रोटी और रोजगार का सबसे बड़ा संसाधन बनी भूमि की गुणवत्ता अथवा उसकी बिगड़ती सेहत को जांचने का अब तक कोई राष्‍ट्रव्‍यापी पैमाना नहीं है। जबकि देश की कुल आबादी में से सत्तर फीसदी आबादी कृषि और प्राकृतिक संपदा से रोजी-रोटी जुटाती है। भूमि की उर्वरता और क्षरण को लेकर टुकड़ों में तो आकलन आते रहते हैं लेकिन इस स्‍थिति की वास्‍तविक हालत का खुलासा करने वाला कोई एक मानचित्र देश की जनता के सामने पेश नहीं किया गया। हालांकि अशासकीय स्‍तर पर इस मांग की आपूर्ति अहमदाबाद की संस्‍था ‘स्‍पेस एप्‍लिकेशन सेंटर' ने सत्रह अन्‍य इसी काम से जुड़ी एजेंसियों के साथ मिलकर की है। जमीन की सेहत से जुड़ा यह शोध बताता है कि आधुनिक व औद्योगिक विकास, जल व वायु प्रदूषण और कृषि भूमि में खाद व कीटनाशकों के बढ़ते चलन ने किस तरह से उपयोगी भूमि को रेगिस्‍तान में तब्‍दील करने का सिलसिला जारी रखा हुआ है। यदि जमीन की गुणवत्ता और क्षरण रोकने के उपाय राष्‍ट्रीय स्‍तर पर जल्‍दी एक अभियान के रुप में शुरु नहीं किये गये तो देश की एक बड़ी आबादी आजीविका का संकट के दायरे में तो आएगी ही देश की जैव-विविधता भी खतरे में पड…

संजय दानी की ग़ज़ल - तेरे तसव्वुर ने किया पागल मुझे

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तेरे तस्व्वुर ने किया पागल मुझे,
कोई दवा भी है नहीं हासिल मुझे।किरदार मेरा हो चुका दरवेश सा,
अपनी  ग़मों की पहना दे पायल मुझे।ज़ख्मों की बारिश से बचूं कैसे सनम,
प्यारा है तेरी गलियों का दलदल मुझे।कश्ती मेरी, लहरों की दीवानी हुई,
मदमस्त साहिल ने किया घायल मुझे ।तेरी अदाओं ने मुझे मारा है पर,
दुनिया समझती, अपना ही क़ातिल मुझे।या मेरी तू चारागरी कर ठीक से,
साबूत लौटा दे, या मेरा दिल मुझे । झुकना सिखाया वीर पोरष ने मुझे,
दंभी सिकन्दर,ना समझ असफ़ल मुझे।मन्ज़ूर है तेरी ग़ुलामी बा-अदब,
है जान से प्यारा तेरा जंगल मुझे ।तू खुदगरज़ सैयाद दानी, इश्क़ में  
तू मत समझना बेवफ़ा बुलबुल मुझे।

विजय वर्मा की कविता - जाड़े की धूप है, जरा सेंकने दीजिए...

देखने दीजिये.
इंसानियत के ख्वाब हैं, देखने दीजियेजाड़े की धूप है ,जरा सेंकने  दीजिये. हम तो आज सच बात ही कहेंगे, लोग पत्थर फेंकते है, फेंकने दीजिये. उनकी आत्मा तो बहुत पहले बिकी थी. अब झूठे सपने बेचते है, बेचने दीजिये. आज दिखा हूँ मै आपको जलता हुआ वर्षों से जल रहा हूँ, जलने दीजिये. ये रास्ता किसी मंदिर-मस्जिद को नहीं जाता हम इसी पर चलेंगे, हमें चलने दीजिये. ----

राजीव श्रीवास्तवा की कविताएँ और गीत

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बरखातेरेकितनेरूपनभ के आँचल से पानी की फुहार जब, धरा को अपने आगोश में, लेती है,तो बरखा कहलाती है, बरखा कई रूपों में आती है! "प्रेम"रूप में बरखा पिया मिलन की चाह, जागती है, मन में प्रेम धुन, बज उठती है, और जी करता है, घर की मुंडेर पे, पी संग बैठ कर, आस्मां से गिरते मोतियों को , घंटे निहारते रहे, ये है"आनंदमयी बरखा" "नटखट" रूप मैं बरखा बच्चों को पुकारती है, और बच्चे ,नंगे पांव बाहर आ जाते हैं, और बरखा की बूँदों के साथ खेलते हैं, उनके चेहरे पे जो भाव आते हैं, वो बरखा ही ला सकती है, ये है "एक प्यारी दोस्त बरखा"! "उम्मीद" के रूप में बरखा किसानों की आशाओं को, पूरा करती है,उनकी मेहनत को अंजाम देती है,उनका महीनों का इंतज़ार ख़तम होता है,और हर तरफ बारिश के गीत फ़िज़ा में घुल जाते हैं, ये है"अन्नपूर्णा जैसी बरखा"! 'आनंद के रूप में बरखा, तपती गर्मी से निजात दिलाती है, परिवेश में हर तरफ शीतलता, और मन में सुकून का अहसास, आँखें आसमान को देख सुकून के लिए शुक्रिया करती है, और फिर "चाय और पकौड़े"�…

राजीव श्रीवास्तवा की कविता - नारी! तुम ये सब कैसे सह लेती हो!

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अपने ही घर में अपमानित हो कर, तुम कैसे रह लेती हो, दिन में कई बार तिरस्कृत होती हो,ये सब कैसे सब हेती हो! अपने नर्म हाथों से रोटी बनाती हो,फिर पत्थर भी तोड़ लेती हो, ठेकेदार की गालियाँ खाती हो,ये सब कैसे सह लेती हो! कई तरह के रिश्तों को कितनी कुशलता से निभा लेती हो , हर रिश्ते में ठुकराई जाती हो ये सब कैसे सह लेती हो ! अपने बच्चों की खातिर अपनी हर खुशी त्याग देती हो, वही बच्चे फिर आँख दिखाते है,ये सब कैसे सह लेती हो! पति को परमेश्वर कहती हो,पूरा जीवन अर्पण कर देती हो, तुझे दासी समझ लज्जित करता है, ये सब कैसे सह लेती हो! सृष्टि को नया जीवन देने को प्रसव पीड़ा तुम सह लेती हो, उसी समाज में अबला कहलाती हो,ये सब कैसे सह लेती हो! पुरुषों को जन्म देती हो,छाती से लगा बड़ा करती हो उन्हीं के द्वारा सताई जाती हो ये सब कैसे सह लेती हो! अपने कुटुम्ब की खातिर ,दिन भर चक्की में पिसती हो फिर भूखे पेट सोना पड़ता है ये सब कैसे सह लेती हो! डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

प्रमोद भार्गव का आलेख : विकीलीक्‍सः विचार बनती तकनीक

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विकीलीक्‍स द्वारा अमेरिका जैसे शक्‍तिशाली देश से जुड़ी एक साथ ढाई लाख गोपनीय सूचनाओं को उजागर करने की घटना को एक ऐसे विचार के रूप में देखने की शुरूआत बुद्धिजीवियों द्वारा की जा रही है, जो कभी मरने वाला नहीं है। इस विचार को इसलिए भी बल और समर्थन मिल रहा है क्‍योंकि विकीलीक्‍स के संस्‍थापक-संपादक जूलियन अंसाजे को संदिग्‍ध और पुराने मामलों में तब गिरफ्‍तार किया गया जब वे सूचनाओं से जुड़ी फाइल पर क्‍लिक कर चुके थे। इस गिरफ्‍तारी से यह संदेश जनमानस में फैल रहा है कि वैश्‍विक चौधरी बना जो अमेरिका भूमण्‍डलीय विस्‍तार के दृष्‍टिगत जिस उदारवाद के विस्‍तार और मानवाधिकारों के हनन की पैरवी करता था वह खुद बौखलाकर दमन पर उतर आया है। अब तो अंसाजे के बैंक खातों को भी सील कर दिया गया है। जिस ब्रितानी साम्राज्‍य को कभी न डूबने वाले सूरज की संज्ञा मिली हुई थी, उसको परतंत्र भारत के एक सिपाही मंगल पाण्‍डे ने चुनौती तकनीक से ही आविष्‍कृत बंदूक का घोड़ा दबाकर दी थी। और फिर इस गोली से उपजे शहीदी विचार ने ब्रितानी हुकूमत को आने वाले सौ सालों में पूरे एशिया में नेस्‍तनाबूद कर दिया था। कथित आर्थिक उदारवाद के दौ…

यशवन्त कोठारी का व्यंग्य - मैंने भी वर्जिश की

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मैंने भी वर्जिश कीयशवन्‍त कोठारी आखिर मुझे गुस्‍सा आ ही गया, सहनशक्‍ति की भी हद होती है, रोज-रोज सवेरे उठते ही पत्‍नी टोकती है, तुम्‍हारा शरीर। इससे तो सींकिया पहलवान ही अच्‍छा होता है, दर्पण देखता तो उममें भी वही शरीर आखिर मैंने तय किया कि शरीर सुधार का राष्‍ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया जाय और इसी बीच मैं गुस्‍से में भरकर वर्जिश संबंधी साहित्‍य का पारायण करने लग गया। योग, प्राकृतिक चिकित्‍सा, शरीर को स्‍वस्‍थ रखने के सौ उपाय, बुलवर्कर, स्‍प्रिंगों तथा कमर को कमरा बनने से रोकने के सौ उपायों आदि पुस्‍तकों से निपटकर मैंने तय किया, स्‍वस्‍थ शरीर के लिए आवश्‍यक है- नियमित वर्जिश। और वर्जिश की शुरूआत में ही मेरी समझ में यह आ गया कि क्‍यों लोगबाग आराम कुर्सी पर पड़े-पड़े पुस्‍तक चाटना बेहतर समझते हैं लेकिन वर्जिश नहीं करते। क्‍यों लोग बाग वेट लिफ्‍टिंग के बजाय कैलोरियों की गणना करने में कोताही करते हैं। दरअसल, पड़े-पड़े सोते रहने से तथा अनियोजित विहार से शरीर बिल्‍कुल बेकार हो गया था। जाहिर है कि मुझे अपना शरीर पसन्‍द नहीं था, अन्‍य कई पाठक भी मेरी इस बात से सहमत होंगे कि उन्‍हें भी अपना शरीर …

गंगाप्रसाद शर्मा 'गुणशेखर' की कविताएँ, दोहे, पहेलियाँ

दोहे
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पहरे जबसे दे रहे, लोहे के इंसान।
राहजनी करने लगे,सड़कों के ईमान ।।
रहना मुश्किल है बहुत, छोड़ें कैसे गाँव।
छालों से लबरेज़ हैं नन्हें-नन्हें पाँव।।
पछुआ ऐसा कर गई ,धूल-धूसरित सोच।
कुर्ते की आभा गई,आँचल का संकोच।।
सेमल चुम्बन ले गया,खड़ा रहा कचनार ।
जींस पहन के गा रही,पुरवा मस्त मल्हार।।
बिन बरसे बदली गई,पड़ी न रंच फुहार।
घास ताकती रह गई ,मिलीं न बूँदें चार।।
महुआ टपके रात भर,खाते रहे सियार।
मस्ती में झूमा किए, सारे चौकीदार।।
बीच गाँव इज़्ज़त लुटी, भए विधाता बाम।
जमहाई लेते रहे ,सब हाकिम हुक्काम।।
सब पैसे की भूख में, लिखते रहे लिलार।
क्या देवी क्या देवता, बिकते बीच बज़ार।।
कौड़ी -कौड़ी पर जहाँ, बिकने को तैयार।।
कौन बड़ा -छोटा वहाँ, खोटा सब व्यापार।
ना नारद जी आए ही,   ना भेजे संदेश।
जब से भारत भूमि का,बदल गया गणवेश।।
-- कविताबड़े होना जल्दी-जल्दी बेटा!
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अभी -अभी
देकर गई है दाई
यह खुशखबरी कि-
बेटा!
तुम आ गए हो
अपनी माँ के
आँसुओँ से भिगो-भिगो कर
छापे गए खुशबूदार फूलों वाले
गीले- गीले आँच…

राकेश शर्मा की कविता - ओ गौरैया

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ओ गौरैया.....ओ गौरैया
नहीं सुनी चहचहाहट तुम्हारी
इक अरसे से
ताक रहे ये नैन झरोखे
कुछ सूने और कुछ तरसे से।
फुदक फुदक के तुम्हारा
हौले से खिड़की पर आना,
जीवन का स्वर हर क्षण में
घोल निडर नभ में उड़ जाना।
धागे तिनके और फुनगियां
सपनों सी चुन चुन कर लाती,
उछलकूद कर इस धरती पर
अपना भी थी हक जतलाती। खो गई तुम कहीं गौरेया भौतिकता के अंध-जाल में मानव के विकट स्वार्थ और अतिवाद के मुख कराल में।
सिमट गई चिर्र-मिर्र तुम्हारी
मोबाइल के रिंग-टोन पर,
हँसता है अस्तित्व तुम्हारा
सभ्यता के निर्जीव मौन पर। मोर-गिलहरी जो आंगन को
हरषाते थे सांझ-सकारे,
कंक्रीट के जंगल में हो गए
विलीन सभी अवशेष तुम्हारे।
तुलसी के चौरे से आंगन
हरा-भरा जो रहता था,
कुदरत के आंचल में मानव
हँसता भी था और रोता था।
भूल गये हम इस घरती पर
औरों का भी हक था बनता,
मानव बन पशु निर्दयी
मूक जीवों को क्यों हनता।(The cheerful, gregarious house sparrows, once commonly seen flitting around the neighborhood, are in real trouble and are vanishing from the center of many cities and rural areas. Their recent decline has put them on the International Union for the Conservatio…

रामशंकर चंचल की लघुकथा - अलाव

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लघुकथा अलाव—डॉ. रामशंकर चंचल, झाबुआ बरसाती सर्द रात, साँय—साँय करते वीरान जंगल, ऊँची पहाड़ियों पर बसी झोपड़ियों में निवास करते भोले—भाले आदिवासी। २५—३० झोपड़ियों का यह गाँव रोशन नगर कहलाता है। यद्यपि रोशनी के नाम पर इन सहृदय आदिवासियों ने सिर्फ चाँद—सूरज की रोशनी देखी है। पता नहीं क्या सोचकर वर्षौं से अँधेरे के श्राप में जी रहे इस गाँव का नाम रोशन नगर रख दिया? बरसाती सर्द रातों में कुछ खेतों में ही दिखाई देती है रोशनी। वह रोशनी, जिसे जलाकर करते हैं सारी रात खेतों की रखवाली। वह अलाव (आग) उन्हें रोशनी भी देती है और ठंड से लड़ने का साहस भी। आज कड़कड़ाती ठंड से बचने के लिए मंगलिया ने अलाव जलाया और बैठ गया पास में अपना जिस्म गरमाने। दिनभर की मेहनत के बाद रात भर फिर जागना बहुत मुश्किल होता है। फिर भी मंगलिया बीड़ी जलाकर कुछ धुआँ उड़ाता, जैसे—तैसे नींद से लड़ रहा था। आखिर जब कुछ ज्यादा ही थकान महसूस की तो समीप रखी खटिया पर कुछ देर सुस्ताने के लिए लेट गया। पता नहीं कब नींद लग गई। इधर तूफानी हवा चली और अलाव की आग मंगलिया की झोपड़ी में लग गई। बस फिर क्या था। देखते ही देखते झोपड़ी भभक उठी, जिसे देख मंगलिया…

रामप्रताप गुप्ता का आलेख - देश में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या और उनकी बढ़ती उपेक्षा

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देश में बुजुर्गौं की बढ़ती संख्या और उनकी बढ़ती उपेक्षा —डॉ. रामप्रताप गुप्ता, उज्जैन समय के साथ—साथ चिकित्सा सुविधाओं और पोषण स्तर में बेहतरी के चलते देश की औसत आयु में वृद्धि होती जा रही है और इसी के साथ देश की आबादी में बुजुर्गौं (६० वर्ष या अधिक आयु वाले लोग) का प्रतिशत और उनकी संख्या भी बढ़ती जा रही है। सन् १९६१ में देश में बुजुर्गों की कुल संख्या २.४ करोड़ थी जो कि सन् १९८१ में ४.५ करोड़ और सन् २००१ में ७.७ करोड़ हो गई थी। इस समय उनकी संख्या १० करोड़ के लगभग होने का अनुमान है। अगर कुल आबादी में बुजुर्गौं के प्रतिशत पर नजर डालें तो यह १९६१ में ५.६३ प्रतिशत था जो कि सन् २००१ में बढ़कर ७.५ प्रतिशत हो गया। अर्थ यह हुआ कि देश की युवा और उत्पादक आबादी पर बुजुर्गौं की देखभाल का भार बढ़ता ही जा रहा है। उम्र के साथ शारीरिक और मानसिक असमर्थताएँ बढ़ती जाने से बुजुर्गौं की विशेष देखभाल की माँग रहती है। स्वास्थ्य संबंधी आँकड़े बताते हैं कि भारतीय बुजुर्गौं के २५—२७ प्रतिशत को दिखाई कम पड़ने लगता है, १२—१४ प्रतिशत को सुनाई कम देने लगता है। अनेक बुजुर्ग के लिए तो बढ़ती उम्र के साथ चलना—फिरना भी असंभव हो जा…

जयकुमार जलज की लघुकहानी : हासिल

लघुकहानी हासिल — डॉ. जयकुमार जलज, रतलाम उस तरफ नाला और उजाड़ मैदान होने से गली बंद हो गई थी। लोगों ने काँटेदार तार लगाकर उसे और भी बंद कर लिया था। दोनों तरफ बने मकानों के लिए अब वह एक आँगन जैसी थी। खेलकूद, सगाई, मुंडन जैसे कार्य उसी में हो लेते थे। आबादी अधिक नहीं थी। पर उच्च, मध्यम और साधारण आय वर्ग के कई परिवार रहते थे। एक तरफ एक बड़ा सरकारी दफ्तर, दूसरी तरफ एक कारखाना होने से भी गली अपने में ही सौहार्द्रपूर्वक सिमटी हुई थी। रहवासियों के दैनिक सरोकारों को बाहर निकलने के कम ही अवसर थे। बच्चे मिलकर खेलते। मिलकर स्कूल जाते। त्यौहारों पर अपनत्व और बढ़ जाता। दिवाली के दूसरे दिन सुबह से ही एक — दूसरे के यहाँ पकवान पहुँचाए जाते। किराए के छोटे से मकान में उस परिवार को आए अधिक दिन नहीं हुए थे। गली में यह उसकी पहली दिवाली थी। पकवानों के आदान—प्रदान में शामिल होना ही था। पहला मौका और उम्र में अपेक्षाकृत छोटे होने से उसके तीनों बच्चों में बेहद उत्साह था। माँ को जरूर डर था, कहीं बच्चों की नीयत बिगड़ गई । कहीं प्लेट लाते— ले जाते वे उस पर हाथ साफ कर बैठे। नया मुहल्ला, क्या मुँह दिखाएगी ? सो रात को खा…

विजय वर्मा की हास्य व्यंग्य कविता : हम गधे हैं

हम गधे हैं. हमारे देश आकर सबके उल्लू सधे हैं, हाँ ,जी ,हाँ !हम गधे हैं. 'अंकल सैम'भी आयें अपना व्यापार बढ़ाएं जबतक W T C नहीं गिरा था आतंकवाद पर कुछ कह नहीं पायें यहाँ आकर सबने सिर्फ मीठे-मीठे भाषण पढ़े हैं. हाँ ,जी,हाँ! हम गधे हैं. तुम भी आओ,! जिआबाओ अपनी डिप्लोमेसी दिखलाओ. बिना कुछ ठोस वादा किये १०० अरब तक व्यापार बढाओ . हम पर तो 'अतिथि देवो भव;'के कब से नशे चढ़े हैं. हाँ ,जी ,हाँ!हम गधे हैं. एक staple वीसा का तो मसला अब तक हल हुआ नहीं उनके होठों पर इस देश की खातिर रहती है कभी दुआ नहीं. शह देना हो या शस्त्र-नाभकिये दुश्मन को तो भरपूर दिए इनकी शह पर ही तो दुश्मनों के हौसले बढे हैं. हाँ,जी,हाँ! हम गधे हैं. छीनी जिसने हजारों मील जमीन भूल गए ,यह वही है चीन इसने ही मानचित्र पे गलत कश्मीर के नक़्शे गढ़े हैं हाँ,जी,हाँ! हम गधे हैं '६५' के आक्रमण की जिम्मेवारी हमारे सर पर मढ़े हैं. हाँ,जी हाँ!हम गधे हैं. हे! निति-निर्धारक नेतागण गाँठ बाँध लो अपने मन जिसने इस पर विश्वास किया-- उसके आगे बस गड्ढे हैं. हाँ,जी,हाँ! हम गधे हैं. .--
v k verma,sr.chemi…

प्रभुदयाल श्रीवास्तव का बाल गीत

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भ्रष्ट तंत्र को मार भगाओ

सड़क सड़क पर
गिट्टी गिट्टी
गली गली में
मिट्टी मिट्टी
देखो मेरे गाँव में आकर
नहीं एक भी सड़क है पक्की|

नेता आते
वोट माँगते
सौ सौ वाले
नोट बाँटते
हाथ जोड़कर कहते सबसे
मेरी जीत करोजी पक्की|

दारु लाते
मुर्गा लाते
ग्राम प्रमुख को
खूब पटाते
घर घर जा सबको ललचाता
ग्राम प्रमुख है बड़ा मदक्की|

सड़क फंड का
पैसा आता
सरकारी कुनबा
खा जाता
भरे पेट भूखों के कारण
सड़क पड़ी वैसी ही कच्ची|ग्राम प्रमुख भी
बतलाता है
मंत्री तक
हिस्सा जाता है
लोकतंत्र के मंत्री देखो
हैं पाखंडी ढोंगी झक्की|

बच्चों तुम
तलवार उठाओ
भ्रष्ट तंत्र को
मार भगाओ
उन्हें हटा दो अब कुर्सी से
जो सरकारें चोर उचक्की|
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मुक्तक पंड्या की कविता - चलो सब मिलकर काम करें

चलो सब मिलकर काम करेंमुक्तक पंड्या कक्षा 8
चलो सब मिलकर काम करें। पेड़ लगाकर तापमान का काम तमाम करें!!
ओज़ोन परत हो रही क्षीण औ’बढ़ा रही है गर्मी पेड़ लगाकर तापमान में ले आयें हम नरमी
“ग्लोबल वॉर्मिंग” के दानव का काम तमाम करें चलो सब मिलकर काम करें!! “एसिड वर्षा” नें कर डाला वनस्पति का नाश नाइट्रिक एसिड से होता है जीवों का विनाश
“एसिड वर्षा” खत्म करें, आराम-हराम करें! चलो सब मिलकर काम करें!! आग जंगलों में सुलगी तो co2 निकलेगी ”ग्रीन हाउस” के प्रभाव से यह धरती मचलेगी
“ग्रीन हाउस” की वायु पर पूर्ण-विराम करें! चलो सब मिलकर काम करें!!
”ग्लोबल वॉर्मिंग” शुरू रहा तो हिम नदियाँ पिघलेगीं
सागर तट के जन जीवन को झटपट वे निगलेगीं
तापमान कम हो, प्रयास हम आठों याम करें! चलो सब मिलकर काम करें!!
हर बीमारी का इलाज है शुद्ध हवा औ’ पानी कर न सकेगी यों कोई भी बीमारी मनमानी
फैले नहीं प्रदूषण ऐसे काम प्रकाम करें चलो सब मिलकर काम करें!!
धरती माँ का आँचल कर दें हरा-भरा धानी-धानी पेड़ लगाकर ले आयें रेगिस्तानों में पानी
दोस्त बनें हम धरती माँ के उन्हें प्रणाम करें चलो सब मिलकर काम करें!! मुक्तक पंड्या
कक्षा 8 जवाहर नव…

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री की कविता - नटों के लिए नहीं आया फरमान

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नटों के लिए नहीं आया फरमान,अधूरे रह गये बस सभी अरमान,खेल प्रतिभा को नहीं मिली पहचान,जिन्‍दगी ठोकर खाने को हलकान,किलों की फतह के लिए सेंधमारी,चस्‍पा ताजिन्‍दगी की बनी लाचारी,पेचीदगी भरा कला बाजी का खेल,सामंती सोच से नहीं खा पाया मेल,जो नहीं थे खेल में कभी शामिल,उन्‍हें सुविधा के लिए माना काबिल॥ -- सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्रीराजसदन-120/132 बेलदारीलेन, लालबाग, लखनऊ

नागेश पांडेय ‘संजय’ का गीत - जाने कितनी छवियों से संपृक्त लगी हो तुम!

गीतजाने कितनी छवियों से जाने कितनी छवियों से
संपृक्त लगी हो तुम!
गरम थपेड़ों में तुम मुझको
शीतल हवा लगीं,
रोगग्रस्त जब हुआ, मुझे तुम
मीठी दवा लगीं,
अंधकार में एक दिये-सी
जलती मुझे दिखीं,
दुर्निवार में आशाओं-सी
पलती मुझे दिखीं।
निस्पृह-सी तुम दिखीं
कभी आसक्त लगी हो तुम।अगर भूलकर भी रोया तो
माँ-सा पुचकारा,
लिया सँभाल मुझे वामा-सा,
अगर कभी हारा,
कभी सुता-सी जिद कर तुमने
मन में मोद भरा,
और बहन-सा नेह लुटाया,
जब भी हृदय डरा।
संबंधों को जीने में
अभ्यस्त लगी हो तुम।कभी प्रभाती लगीं मुझे
तुम लोरी कभी लगीं,
कच्ची होकर भी दृढ़,
ऐसी डोरी मुझे लगीं।
प्रीति-खजाना जिससे खाली
होगा नहीं कभी,
ना जाने क्यों ऐसी
भरी तिजोरी मुझे लगीं।
मनचाही रेखाओं वाला
हस्त लगी हो तुम!रसभीनी मुरली, अमृत की
गागर कभी लगीं,
कभी लगीं आकाश सरीखी,
सागर कभी लगीं।
मगहर में वृंदावन का
अनुमान लगी हो तुम
थकती श्वासों में प्राणों का
दान लगी हो तुम।
देवी जैसी दिखीं, तो कभी
भक्त लगी हो तुम।---
e-mail - dr.nagesh.pandey.sanjay@gmail.com
--
डॉ. नागेश पांडेय "संजय"
शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश (भारत) - 242001.

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