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December 2010
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सतीश वर्मा ने अपने कई काव्य संग्रह प्रकाशित किये हैं बड़ी उग्र और नितान्त मौलिक शैली में। आपको आघात लगता है, रोष उत्पन्न होता है और हिंसा के साथ शब्द शब्द सामना होता है। कहीं अंगुली नहीं रख सकते लेकिन दिमाग घूम जाता है। सतीश वर्मा में बड़ी संवेदनशीलता मिलेगी जिससे जीवन की कुंठाओं, पीड़ाओं, दुविधाओं को बड़े सकारात्मक रूप से इन्होंने उभारा है, रास्ता ढूँढते हैं, अन्धेरे को चीरते हैं और हाथ पकड़ कर रोशनी की ओर मुड़ जाते हैं। लड़ाई है, ज़ख्म है, पीड़ा है परन्तु हारने की प्रकृति नहीं। जीवन के कटु सत्यों को झेला है परन्तु कभी भी छोटे रास्तों से समझौता नही किया। अपनी ईमानदारी की गठरी को सिर पर रख कर मंझधार पार की है। गिरे हैं, टूटे हैं, रक्तरंजित हुए हैं और फिर उठकर चल दिये हैं। आज की हिंसा, विध्वंस, विनाश को बखूबी समझा है, कविताचित्रों में इस त्रासदी को उकेरा है इसकी निष्फलता और निस्सारता को प्रदर्शित किया है। कहीं कहीं प्रकृति के बहुत सूक्ष्म सौन्दर्य को दिखाया है। इनके प्रतीक और बिम्ब अलौकिक हैं, बिल्कुल अभिन्न और अभूतपूर्व। यह अभिनव बिम्बों के समृद्ध शब्द शिल्पी हैं। कविताएं स्वत: स्फुरित, उद्भाषित दार्शनिक और विजनयुक्त एवं चिन्तनपरक हैं। सतीश वर्मा 35 वर्षों तक डीएवी कॉलेज, अजमेर में वनस्पति विज्ञान का अध्यापन करने के बाद अब अजमेर में ही एक चैरिटेबल संस्था सेवा मन्दिर फाउन्डेशन का संचालन कर रहे हैं।

प्रस्तुत है उनकी कुछ कविताएँ

आगमन

यह चाँद की चेतावनी

थी रात को

कि जुगनुओं का देह व्यापार बन्द कर दिया जाये

जब आकाश में हुए विस्फोट

को लाखों सितारे अचम्भित

हो कर देख रहे थे

मैं नींद के झोंकों में मस्त था और

नये प्रस्फुटित विचारों के होंठों से

विद्युत बीजों को चुन रहा था

शरीर की रेतघड़ी में

बालू खत्म हो गई थी

दूर था अस्थियों का किला

जो काली विषैली मकड़ियों के शरीर

पर चुना गया था और समुद्र धुन्ध को चाट रहा था

-

 

एकाकीपन

जो हो रहा था, वो इतना क्रूर था

कि तुम जीने के लिये मौत

का निर्वासन करते हुए दंभ को

गले लगा रहे हों

एक नकल किसी प्रतिभा का ऐसा

गुणगान कर रही थी जैसे शब्द

बाल्टीभर झूठों पर गिर रहे थे

पीठ से पीठ मिला कर सूखे बाँध

टूटते जा रहे थे आप्लावित हो रहे थे

मनीषियों की जैसे पाषाणी शव-पेटिकाएं?

और वृक्षों के तनों पर वार्षिक वलय

और गहरे, कंगाली की काई में डूबे

उसके चाँद की किताब काली हो गई थी

विदा, न डूबने वाले अन्धकार

मैं अपने दुःख के अथाह सागर

में दुबारा जन्म ले रहा हूँ

-

 

प्रतीक्षा

*ऑरकिअस के रास्ते मत जाओ

वो सोचता था, दोस्त सड़क पर अजनबियों की तरह

मिलते हैं, क्या निर्बाध अवर्तमान हवा

में एक बड़ा छेद ढूंढ सकेगा? सत्य का काल

बड़ी देर से उगता है; हवा में नहाये चन्द्रमा

को गवाह के रूप में बुलाता है

यह कम्पन बैंजनी डर को खौफ

की चलनी से आसवित कर लेगा

और नीले किनके गिरना शुरू होंगे

सहमति ने अब असत्यता का नया अर्थ

ढूँढ निकाला है, फिर झुकती है, सम्भवतः

एक वृहत सृष्टि के लिये

पागल करते मूक विरोधों के बीच में बच्चे की लाश

कचरे के ढेर पर मिली थी, शाकाहारी लोग कुछ नहीं कर रहे थे

तुम भी एक मृत शरीर की तरह कमज़ोर हो गये हो और

पट्टी बँधे चेहरे से आँखें नहीं खोलना चाहते

-

 

*एक प्राचीन युनानी कवि

-

उदासी के साथ

गुरदों की आग

टोकरी को जला रही थी

हरे अंगूठों की गोपनीयता

इसमें आत्मीय रूप से शामिल थी

आओ इस मोमबत्तियों के अभियान से

कलियों की खातिर भागीदारी करें

जो बूढ़े पक्षियों के लिये

खिल नहीं पाईं

उस शहीद का यह स्मृति-लेख मुझे

दुबारा पढ़ कर सुनाओ जिसने बहते

हुए दरिया के दर्द के कारण

किसी यश की कामना नहीं की

उस एकाकी बन्दे के उन्माद की हद

न रही जब गुलाब की क्यारी पर

एक बाँध ने सड़ी हुई लकड़ियाँ

उगल दीं

-

 


अनूठी गूँज

होठों पर एक

चुम्बन स्पष्ट शैली में

एक सुगन्धित व्यवहार के साथ वापिस लौटता है

मैंने सुना नहीं

उन असीमित नज़रों के साथ, बेड़ियों

में जकड़ा एक कैदी जो आत्मरक्षा पर उतर आया था

लाल रंग के सारे छायाभास

सागर के ऊपर चले रहे थे

एक काली खोपड़ी पानी पर फिसलती है

रात पोर पोर में भर जाती है

तूफान काले हिरणों को मार रहा था,

शिकारी भाग रहे थे

वो मायावी

बड़े कपट से काम ले रहा था, तुम्हें

गृह-युद्ध में मरने वालों की सही संख्या कभी पता नहीं चलेगी

उसने वाणी के उपहार को कभी स्वीकार नहीं किया

शब्द और सीटियाँ अतियथार्थ की प्रतिध्वनियाँ थीं

और मुझे एक नाक तलवार की तरह दिखाई देती थी

-

 

अवरोही

मैं अपने आप को तैयार कर रहा था अपमान

और सीने में दर्द के लिये, अनकटे बालों को काँटों की तरह परिरेखाओं पर

खड़ा करके, अज्ञात मोड़ों पर चाँद-नीली पहाड़ियों पर बादलों

का जीर्णोद्धार करते हुए, वृक्षों पर जलरंग बिखराते हुए, कोई

एक जना समाधि-स्थल के भीतर तूफान मचा रहा था, पीले कमरे में

एक फकीर के पदचिह्न थे, जो रहस्योद्घाटन के पश्चात आँखें

बन्द कर के शमशानों में चलता था, उसके चीथड़ों की अब

पूजा होती थी बाद के सालों में उसके टेक लगी देह के

अन्धेरों से रोशनी दमकने लगी थी गुलाब ही गुलाब चहुँ

ओर, वो जल्लाद से कह रहा था गीत के स्वर में कि खम्बे

कितने ऊँचे थे

-

 

जयन्ती

तुम्हारे शरीर के चारों ओर

एक नैशसंगीत फैलाते हुए

मैं दंग रह गया

एक नागराज खड़ा हो गया था

हम दोनों के बीच में, जैसे एक बाँध क्रोध और उन्माद

में फट गया हो,

मैं शब्दों के साथ श्रद्धाहीन तरीके से खेलने लग गया था

एक काँच के मर्तबान में बड़ी बड़ी मकड़ियाँ

गोल भूरी आँखों से टकटकी बाँधे घूर रही थीं,

आह अब जघन दृश्य कष्टकारी है, सेक्स और पैसा

संगीत उन्माद में फेंका जाता है, अछूती कला पर

हमला हुआ है, अणु-अस्त्रों की दौड़ में संरक्षक अपने

पैंतरे बदलते हैं, एक गुनहगार का बयान था कि, क्या यह सड़क

का तमाशा था, या एक धूर्त का असमंजस, भूरी चमड़ी की

शिराओं में पर्याप्त रक्त नहीं था जो मन्दिर के फर्श

को रंग सके, मौत इन्तज़ार करेगी, पहिले जनता के सामने

फाँसी शुरू हो, हवाओं में फुसफुसाहट है कि पवित्र

धूर्तता का आखिरी उत्तरजीवी मर गया था

-

 

कड़कती गरमी

बेघर छत के नीचे, रोशनी

को कैद करते हुए, काफी नहीं था

सन्ताप में हुए एक जन्म की चीत्कार?

तिक्त वक्ष से होते हुए स्त्राव में

आखिर तुम ने गेंदे के फूलों के साथ गठबन्धन तोड़ दिया

नीललोहित आँखें, प्रक्षेपणास्त्र मृत्यु

की ओर धकेलते हुए, चीखें मैंने एक

पेपरवेट शिराओं के ऊपर रख दिया था ताकि

स्तनाग्रों से निकलता हुआ काला खून रूक जाये

सुबह, अभी बहुत दूर थी, मातृदेवी पृथ्वी की बर्फ

को साँस में खींच रही थी

-

 

क्षय

शाँति की कीमत होती है यादृच्छिक

इच्छाशक्ति के समुद्र द्वारा घुटने घुटने गहरे

खारे कीचड़ों में धकेली हुई ध्वंस के बाद,

हस्ती में हस्ती ताकि असहमति ज़िन्दा रहे

मुझे बताओ मृत्यु के बीच में तुम रोशनी की

चाप में कैसे पहुँचे रक्तिम जल की ठन्डी खुशियाँ

में डुबकी लगाते हुए? प्रचलित निवर्तन अन्तहीन

गिनतियों को छितरा गया है अनन्त क्षणों में

स्थायित्व और कपट की बात करें, एक ही चेहरा

एक वक्त में दो कैनवसों में विद्यमान था,

समुद्री शैवाल में अवसाद विजयी हो रहा था

और वृक्षीय चाँद के लिये रात बूँद बूँद झर रही थी

जब पक्षियों के घरौदों में भविष्य आयेगा

तो में कोयल के अन्डे ढूंढूंगा, इससे पहिले

मैं तुम्हें दुबारा जान सकूँ एक छिपे हुए चुम्बन

के लिये कीटभक्षी वीनस फ्लाईट्रेप अपनी मधु ग्रन्थियाँ खोल देगी

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*संघात

उसने मुझे उत्तेजित कर दिया है

अब मैं एक कविता लिखूँगा

प्रलापी चाँद ने मुझे

त्वचा के नीचे से निकाल कर बीन लिया था

सुरक्षा-पिन टूट गई थी

अब भीड़ मुझे नंगा कर देगी

जब जब मेरा दर्द तुम्हें रुला जाता है

तब यह नांरगियाँ नहीं बिकेंगी

एक कौलीजियम तो ज़ख्मों को सी लेगा

किन्तु एक जाति के नाम पर देश बलि चढ़ जायेगा

 

सतीश वर्मा

* ‘साइमोन म्यूनिच’ का काव्य संग्रह ‘आरेन्ज क्रश’ पढ़कर

 

प्यार बस प्यार है

प्यार बस प्यार है दोस्तों,
ज़ीस्त का सार है दोस्तों।

चांदनी बेवफ़ा है अगर,
चांद की हार है दोस्तों ।

मुल्क में मूर्खों का राज गर,
ग्यान बेकार है दोस्तों।

इश्क़ के हाट में सुख नहीं,
गम का बाज़ार है दोस्तों।

मेरे मन की ये गलती नहीं,
दिल गुनहगार है दोस्तों।

दोस्त हूं लहरों का, साहिलों,
को नमस्कार है दोस्तों ।

फ़िर शहादत पतन्गों की क्यूं,
शमअ गद्दार है दोस्तों।

हुस्न की चाकरी क्यूं करूं,
इश्क़ खुद्दार है दोस्तों।

गर कहे लैला जां दे दो तो,
मज़नूं तैयार है दोस्तों।

प्यार मजबूरी है दिल की,
हम, सब समझदार हैं दोस्तों।

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लघु कथा 1 :-(संदर्भ गुर्जर आन्‍दोलन)

संवेदना

आज आन्‍दोलन को आठ दिन हो गए हैं। प्रदेश-भर में जगह-जगह धरने, प्रदर्शन हो रहे हैं, रास्‍ते जाम हो रहे हैं, रेल की पटरियां उखाड़ी जा रही हैं। राजनीतिज्ञों को अपनी कुर्सी और वोट की चिन्‍ता है तो आन्‍दोलनकारियों को अपनी मांगे मनवाने के स्‍वार्थ की फिक्र।

रोज हाथठेले से माल ठोकर मजदूरी कमाने वाला भोला आठ दिन से बेकाम बैठा है, उसके बच्‍चों को दो वक्‍त की रोटी भी नसीब नहीं हो रही। मजदूरों की कच्‍ची बस्‍ती में मातम-सा छाया है। बन्‍द रास्‍तों के कारण बच्चे कैरियर के लिए आवश्‍यक परीक्षा नहीं दे पाने के कारण व्‍यथित हैं। समाचार मिला है कि गांव से ट्रेक्‍टर में बैठकर शहर के स्‍कूल जा रहे बच्‍चों को बन्‍द का रौब दिखाकर मारा-पीटा गया और ट्रेक्‍टर में आग लगा दी गई। मंडी में सब्‍जियों के दाम आसमान छूने लगे हैं। हजारों यात्री ट्रेनें रद्‌द होने से स्‍टेशनों पर फंसे हुए हैं। चारों ओर आमजन हैरान-परेशान है।

आन्‍दोलनकारी रेल की पटरियों और राजमार्ग पर डेरा डाले, अलाव के ताप में छक कर खा-पी रहे हैं और ढोल-नगाड़ों की ताल पर खुशी से नाच-गा रहे हैं। आंदोलन सचमुच सफल है।

-उमेश कुमार चौरसिया

लघु कथा 2 :-

पुण्‍य

सेठजी अपनी कोठी में यज्ञ-पूजा करवा रहे हैं। इक्‍यावन संभ्रान्‍त पंडितों को बुलाया गया। सबने मिलकर सेठजी की सुख-शांति के लिए यज्ञ किया और फिर विविध स्‍वादिष्‍ट व्‍यंजनों का भरपेट सेवन किया। अंत में सेठजी ने उन्‍हें कीमती शॉल, धोती-कुर्ता, चांदी का सिक्‍का और सुन्‍दर लिफाफे में ग्‍यारह सौ एक रूपये भेंट दिए। पंडितों ने प्रसन्‍न होकर आशीर्वाद देते हुए सेठजी से कहा-‘सेठजी, आज आपने बड़े पुण्‍य का काम किया है।‘

कोठी से कुछ दूर ही एक अनाथालय है, जिसमें मूक-बघिर व विमंदित बच्‍चे रहते हैं। वहां एक भिखारी बच्‍चों को कपड़े और खाने-पीने की वस्‍तुएं दे रहा था। बच्‍चे उस भिखारी के साथ बहुत प्रसन्‍न थे। पता लगा कि वह भिखारी लगभग प्रत्‍येक माह वहां आता है। जगह-जगह घूमकर उसे भीख में जो कपड़े और रूपये-पैसे मिलते हैं, उसमें से वह अपने उपयोग के लिए जरूरी कपड़े रखता, अपनी बीमार पत्‍नी के इलाज के लिए गांव में पैसे भेजता और फिर शेष कपड़े यहां बच्‍चों में बांट देता। जो पैसे उसके पास बचे रहते उससे बच्‍चों के लिए खाने-पीने की वस्‍तुएं और किताबें ले आता। कहता-‘इन बच्‍चों को खुश देखकर मुझे बड़ी शांति और सुकून मिलता है। लगता है जैसे कई जन्‍मों का पुण्‍य मिल गया।‘

-उमेश कुमार चौरसिया

लघु कथा 3 :-

क्‍यों ?

पत्‍नी के साथ बैठकर अखबार पढ़ रहा था। मुखपृष्‍ठ पर छपी खबर ने चौंका दिया। आदिवासी गांव में एक स्‍त्री को चुड़ैल मानकर उसे पेड़ से बांधकर पीटा गया। खबर के साथ छपे चित्र में पेड़ से बंधी विवश स्‍त्री बिलख रही थी और तमाम ग्रामीण पुरूष उसे घेरे डण्‍डों से पीट रहे थे।

‘‘उफ! इक्‍कीसवीं सदी में ये सब ․․․․․․․․․․․․․․․․․ ! इसे अंधविश्‍वास कहूं या अत्‍याचार।․․․․․․․․․․․․․ आश्‍चर्य इस बात का है कि जहां मीडिया पहुंच गया, वहां कानून क्‍यूं नहीं पहुंच पाता।‘‘

पत्‍नी ने याद दिलाया-‘‘अभी पिछले महीने भी तो किसी गांव में एक विधवा स्‍त्री को डायन बताकर निर्वस्‍त्र कर घुमाया गया और फिर तपती सलाखों से दागा गया था․․․।‘‘

यह सब सुन रही मेरी 15 वर्षीया पुत्री ने बीच में ही प्रश्‍न किया-‘‘पापा, यह सब केवल स्त्रियों के साथ ही क्‍यूं होता है․․․․․․․․․․․․․․․ किसी पुरूष के साथ क्‍यूं नहीं ?‘‘

-उमेश कुमार चौरसिया

लघु कथा 4 :-

सस्‍ता

आज बाजार में बड़ा हल्‍ला हो रहा था। सुना है मंहगाई में कुछ कमी हुई है। बड़े मैदान पर चल रही सभा में नेताजी जोर-जोर से बता रहे थे-‘‘ये हमने कर दिखाया है․․․․․रसोई गैस में 20 और पेट्रोल-डीजल में 5-5 रूपये की कमी की है․․․․․․․․हवाई जहाज का किराया भी हमने 30 प्रतिशत कम कर दिया है․․․․․․․․․․․․जमीनों की कीमतें और सीमेंट-सरिये की कीमतें भी कम हो रही हैं․․․․․․․․हमने जनता की सुविधा का पूरा ध्‍यान रखा है․․․․․․․․․․․․इससे गरीब जनता को राहत मिलेगी․․․․․․․․․․․।‘‘

किसना दिन भर ठेले पर माल ढ़ोता यह सब सुनकर बहुत खुश था। वह सोच रहा था-‘‘आज मेरी मजूरी में से चार-पांच रूपये तो बच ही जाएंगे।‘‘

शाम को वह जल्‍दी-जल्‍दी राशन की दुकान पहुंचा। वहां भी कुछ लोग मंहगाई में राहत होने की ही चर्चा कर रहे थे। किसना खुश होता हुआ बोला-‘‘सेठजी, मुझे तो आटा-दाल ही चाहिए․․․․․․․․․इसमें कितने कम हुए․․․․․․․․․।‘‘ उसकी बात सुन सेठजी सहित वहां खड़े सभी लोग ठहाका लगाकर हंस पड़े।

-उमेश कुमार चौरसिया

50, महादेव कॉलोनी

नागफणी बोराज रोड, अजमेर 30500 (राज़)


      जैसे को तैसा
 
उस दिन सुबह दादाजी
भोर भ्रमण को निकल पड़े ,
बहुत तेज चलते जाते थे
जैसे जाते उड़े उड़े |
 
बीच सड़क एक कुत्ता आया
उन्हें देखकर गुर्राया ,
पहले भौंका जोर जोर से
फिर फिर गुर्रा डरवाया |
 
दादाजी ने बड़े प्रेम से
उस कुत्ते को पुचकारा ,
फिर भी वह जब न माना तो
घुमा छड़ी सिर पर मारा |
 
डंडा सिर पर पड़ जाने से
तुरंत भौंकना बंद हुआ ,
डर के मारे दादाजी के
पल भर में वह हवा हुआ।

यदि प्रेम से समझाने पर ‌
बात नहीं कोई माने तो ,
कर सकते तुम भी उपाय ‌
खुद अपनी जान बचाने को |
 
एक गाल पर थप्पड़ खाकर
दूजा गाल बताना मत ,
गाँधी का सिद्धांत कभी भी
अपने पर आजमाना मत |
 
समय आजकल वह आया है
जैसे को तैसा करना ,
जब तक हैं हम सही राह पर ‌
फिर बेमतलब क्यों डरना |
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vijay-verma (Custom)

विषमता की खाई
बढ़ गयी है
विषमता की खाई
राम दुहाई
.
दहेज़ बिना
उठी ना डोली,तब
ज़हर खाई
.
भोजन नहीं
घर जिसके,लाये
कैसे दवाई.?

तंग हाल में
रह रही अकेली
रामु  की ताई

जल ना जाए
ससुराल में दीदी
चिंतित भाई.

झेल ना सकी
जाड़े की रात ,मरी
बुढ़िया माई.

 
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS
BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

अदालत को बिनायक सेन के बारे में जितनी बातें मालूम पड़ी हैं, वे सब ऊंट के मुंह में जीरे के समान हो सकती हैं। असली बातों तक वे बेचारे पुलिसवाले क्या पहुंचेंगे, जो इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट को आईएसआई समझ लेते हैं। वे गुस्से से लबालब हों तो हैरत नहीं होनी चाहिए, क्योंकि माओवादी हिंसा में वे ही मारे जाते हैं। हमारे गालबजाऊ बुद्धिजीवी तो उन्हें मच्छर बराबर भी नहीं समझते।

ved-pratap vaidik (Custom)

डॉ बिनायक सेन को लेकर देश का अंग्रेजी मीडिया और हमारे कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी जिस तरह आपा खो रहे हैं, उसे देखकर देश के लोग दंग हैं। इतना हंगामा तो प्रज्ञा ठाकुर वगैरह को लेकर हमारे तथाकथित राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी तत्वों ने भी नहीं मचाया। वामपंथियों ने आरएसएस को भी मात कर दिया। आरएसएस ने जरा भी देर नहीं लगाई और ‘भगवा आतंकवाद’ की भर्त्सना कर दी। अपने आपको हिंसक गतिविधियों का घोर विरोधी घोषित कर दिया। ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द ही मीडिया से गायब हो गया। लेकिन बिनायक सेन का झंडा उठाने वाले एक भी संगठन या व्यक्ति ने अभी तक माओवादी हिंसा के खिलाफ अपना मुंह तक नहीं खोला। क्या यह माना जाए कि माओवादियों द्वारा मारे जा रहे सैकड़ों निहत्थे और बेकसूर लोगों से उनका कोई लेना-देना नहीं है? क्या वे भोले आदिवासी भारत के नागरिक नहीं हैं? उनकी हत्या क्या इसलिए उचित है कि उसे माओवादी कर रहे हैं? माओवादियों द्वारा की जा रही लूटपाट क्या इसीलिए उचित है कि आपकी नजर में वे किसी विचारधारा से प्रेरित होकर लड़ रहे हैं? मैं पूछता हूं कि क्या जिहादी आतंकवादी और साधु-संन्यासी आतंकवादी चोर-लुटेरे हैं? वे भी तो किसी न किसी ‘विचार’ से प्रेरित हैं। विचारधारा की ओट लेकर क्या किसी को भी देश के कानून-कायदों की धज्जियां उड़ाने का अधिकार दिया जा सकता है? क्या यही मानव अधिकार की रक्षा है?

यदि नहीं तो फिर प्रश्न उठता है कि छत्तीसगढ़ में जो लोग पकड़े गए हैं, उन्हें दंडित क्यों न किया जाए? जो भी दंड उन्हें दिया गया है, उसे वे खुशी-खुशी स्वीकार क्यों नहीं करते? यदि वे सचमुच माओवादी हैं या माओवाद के समर्थक हैं, तो उन्हें वैसी घोषणा खम ठोककर करनी चाहिए थी, देश के सामने और अदालत के सामने भी। जरा पढ़ें, 1921 में अहमदाबाद की अदालत में महात्मा गांधी ने अपनी सफाई में क्या कहा था। यदि वे लोग माओवादी नहीं हैं और उन्होंने छत्तीसगढ़ के खूनी माओवादियों की कोई मदद नहीं की है, तो वे वैसा साफ-साफ क्यों नहीं कहते? वे सरकारी हिंसा के साथ-साथ माओवादी हिंसा की निंदा क्यों नहीं करते? यदि वे ऐसा नहीं करते, तो जो अदालत कहती है, उस पर ही आम आदमी भरोसा करेगा। छत्तीसगढ़ की अदालत के फैसले पर जिस तरह का आक्रमण हमारे छद्म वामपंथी कॉमरेड लोग कर रहे हैं, वैसी न्यायालय की अवमानना भारत के इतिहास में पहले कभी नहीं हुई।

यदि बिनायक सेन और उनके साथी सचमुच बहादुर होते या सचमुच आदर्शवादी होते तो सच बोलने का नतीजा यही होता न कि उन्हें फांसी पर लटका दिया जाता। जिसने अपने सिर पर कफन बांध रखा है, वह एक क्या, हजार फांसियों से भी नहीं डरेगा। आदर्श के आगे प्राण क्या चीज है? अपने प्राणों की रक्षा के लिए बहादुर लोग क्या झूठ बोलते हैं? क्या कायरों की तरह अपनी पहचान छुपाते हैं? भारत जैसे लोकतांत्रिक और खुले देश में जो ऐसा करते हैं, वे अपने प्रशंसकों को मूर्ख और मसखरा बनने के लिए मजबूर करते हैं। माओवादियों की दलाली कर रहे लोगों को कहीं उनके प्रशंसक भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद और बिस्मिल के उच्चासन पर बिठाने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं?

डॉ बिनायक सेन और उनकी पत्नी यदि सचमुच आदिवासियों की सेवा के लिए अपनी मलाईदार नौकरियां छोड़कर छत्तीसगढ़ के जंगलों में भटक रहे हैं तो वे निश्चय ही वंदनीय हैं, लेकिन उनके बारे में आग उगल रहे अंग्रेजी अखबार यह क्यों नहीं बताते कि उन्होंने किन-किन क्षेत्रों के कितने आदिवासियों की किन-किन बीमारियों को ठीक किया? यदि सचमुच उन्होंने शुद्ध सेवा का कार्य किया होता तो अब तक काफी तथ्य सामने आ जाते। लोग मदर टेरेसा को भूल जाते हैं। पहला प्रश्न तो यही है कि कोलकाता या दिल्ली छोड़कर वे छत्तीसगढ़ ही क्यों गए? कोई दूसरा इलाका उन्होंने क्यों नहीं चुना? क्या यह किसी माओवादी पूर्व योजना का हिस्सा था या कोई स्वत:स्फूर्त माओवादी प्रेरणा थी? जेल में फंसे माओवादियों से मिलने वे क्यों जाते थे? क्या वे उनका इलाज करने जाते थे? क्या वे सरकारी डॉक्टर थे? जाहिर है कि ऐसा नहीं था।

इसीलिए चिट्ठियां आर-पार करने का आरोप निराधार नहीं मालूम पड़ता। मैंने खुद कई बार आंदोलन चलाए और जेल काटी है। जो लोग जेल में रहे हैं, उन्हें पता है कि गुप्त संदेश आदि कैसे भेजे और मंगाए जाते हैं। पीयूसीएल के अधिकारी के नाते बिनायक का कैदियों से मिलना डॉक्टरी कम, वकालत ज्यादा थी। यदि कॉमरेड पीयूष गुहा के थैले से वे तीन चिट्ठियां पकड़ी गईं, जो कॉमरेड नारायण सान्याल ने बिनायक सेन को जेल में दी थीं, तो गुहा की कही हुई इस बात को झुठलाने के लिए वकीलों को खड़ा करने की जरूरत क्या थी? भारत को शोषकों से मुक्त करवाने वाला क्रांतिकारी इतना छोटा-सा ‘गुनाह’ करने से भी क्यों डरता है? पकड़े गए कॉमरेडों को किराए पर मकान दिलवाने और बैंक खाता खुलवाने की बात खुद बिनायक ने स्वीकार की है। अदालत को बिनायक की सांठ-गांठ के बारे में अब तक जितनी बातें मालूम पड़ी हैं, वे सब ऊंट के मुंह में जीरे के समान हो सकती हैं। असली बातों तक वे बेचारे पुलिसवाले क्या पहुंच पाएंगे, जो इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट को आईएसआई (पाकिस्तानी जासूसी संगठन) समझ लेते हैं। पुलिसवालों का दिल गुस्से से लबालब हो तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि माओवादी हिंसा में वे ही थोक में मारे जाते हैं। वे नेता हैं, न धन्ना सेठ। उनके लिए कौन रोएगा? हमारे गालबजाऊ और आरामफरमाऊ बुद्धिजीवी तो उन्हें मच्छर के बराबर भी नहीं समझते। एक माओवादी के लिए जो आसमान सिर पर उठाने को तैयार है, वे सैकड़ों पुलिसवालों की हत्या पर मौनी बाबा का बाना धारण कर लेते हैं।

कौन हैं ये लोग? असल में ये ही ‘बाबा लोग’ हैं। अंग्रेजीवाले बाबा! इनकी पहचान क्या है? शहरी हैं, ऊंची जात हैं, मालदार हैं और अंग्रेजीदां हैं। आम लोगों से कटे हुए, लेकिन देश और विदेश के अंग्रेजी अखबारों और चैनलों से जुड़े हुए। इन्हें महान बौद्धिक और देश का ठेकेदार कहकर प्रचारित किया जाता है। ये देखने में भारतीय लगते हैं, लेकिन इनके दिलो-दिमाग विदेशों में ढले हुए होते हैं। इनकी बानी भी विदेशी ही होती है। भारतीय रोगों के लिए ये विदेशी नुस्खे खोज लाने में बड़े प्रवीण होते हैं। इसीलिए शोषण और अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए गांधी, लोहिया और जयप्रकाश इन्हें बेकार लगते हैं। ये अपना समाधान लेनिन, माओ, चे ग्वारा और हो ची मिन्ह में देखते हैं। अहिंसा को ये नपुंसकता समझते हैं, लेकिन इनकी हिंसा जब प्रतिहिंसा के जबड़े में फंसती है तो वह कायरता में बदल जाती है। इसी मृग-मरीचिका में बिनायक, सान्याल, गुहा, चारु मजूमदार, कोबाद गांधी - जैसे समझदार लोग भी फंस जाते हैं। ऐसे लोगों के प्रति मूल रूप से सहानुभूति रखने के बावजूद मैं उनसे बहादुरी और सत्यनिष्ठा की आशा करता हूं। ऐसे लोगों को अगर अदालतें छोड़ भी दें तो यह छूटना उनके जीवन-भर के करे-कराए पर पानी फेरना ही है। क्या वामपंथी बुद्धिजीवी यही करने पर उतारू हैं?

वेदप्रताप वैदिक

लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं।

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साभार - दैनिक भास्कर

—निरंजन कुमार ‘निराकार’, रतलाम

जरूरत के जबड़े में

आदमी के सामने—

जरूरत का विशाल पहाड़ खड़ा है।

आदमी परेशान है

जरूरत की एक पूर्ति के बाद

दूसरी सिर उठाती है।

टक्कर लेने इसे

नित्य तनाव भरी दौड़ में व्यस्त।

संताप पाले/गाफिल रहता है आदमी/

जरूरत /सुरसा का मुँह खोले।

आदमी को भस्मसात करने में व्यग्र/तत्पर

बेहतर यही है/अच्छी समझ के आदमी के लिए

कठोर निर्णय ले/निर्ममता से कुचले/

धकेले/धकेलता जाये— ‘जरूरत’

संयम/धैर्य सादगी के शस्त्र से

विवेक शून्य न हो—

भौतिकता की चकाचौंध में

जरूरत के/ जबड़े में फंसा आदमी

पछाड़ खा, कहीं का न रहता है।

वजूद अपना

खो देता है/ आदमी।

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मान भी लो

— बाबुभाई हरिभाई कापड़िया, रतलाम

बंद हो अब ये तकरार

सच्चाइयों को करें, स्वीकार

साठ साल बीत गए कल

अब छोड़ो...

बचपन वाली वैसी चाल

अब बात कुछ यों बनी है—

सिर्फ बात तीनों जजों की होगी

फैसला तीनों ने, तीनों का दिया

तारीख ३० में, तीन को गिनो

आगे कदम का अन्तराल भी माह तीन है

अतः मामला अब एक—दो—तीन करो

जरा सोचो—

फैसला है विधि और विधान का

तीसरा है विद्वान का

तो—अब मान भी लो

या कहीं, ऐसा न हो कि—

जो पाया—वो भी खो बैठो

और अभी जो मिला , वह भी तो तुम्हारा नहीं

उदारता का अर्थ अपनाओ

मानवता का मर्म पहचानो

अपने ग्रंथों की बात को जानों

इतिहास बनाओ नाम कमाओ

इबारत के पन्नों को स्याही चूस न बनाओ

हम रोशन रहें, रोशनी हो पहचान हमारी

बनी रहे बुनियाद तवारिख में

करें दुआ हम ऐसी,

कामयाब बात हो हमारी।

‘अमन की जुस्तुजू’

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— फरीद खान, रतलाम

चमन को

चमन ही रहने दो,

इस चमन में

अमन रहने दो,

अमन से ही

चमन का वजूद है,

बहारें ठहर नहीं पाएंगी

अमन के बिना

इस चमन में,

न गुल खिलेंगे

न फ़िजा महकेगी

न बुलबुलें रहेंगी

न चमन की जीनत बचेंगी

न पंछियों की महफिलें सजेंगी

वीरान हो जाएगा चमन

अमन के बिना,

अमन के दुश्मन

चमन को उजाड़ने वाले,

और सैयाद ही बचेंगे

इस वीराने चमन में

अमन के दुश्मनों से

बचालो, इस चमन को

हरा—भरा, फूलता—फलता

रहने दो,

इस गुलिस्तान को

मेरे हिन्दुस्तान को।

****************************

— वीरेन्द्र जैन, मंदसौर

वोट परस्ती जिनकी फितरत,

कुर्सी के हित करते कसरत !

अमन चैन की उड़ा धज्जियाँ,

करते रहते बेजा हरकत।

उनकी बेजा करतूतों से,

कैसे मिले चमन को बरकत?

ढ़ंग बदलते, दलबदलू ये,

जैसे रंग बदलता गिरगट।

अपने सत्ता सुख की खातिर,

बना रहे, हर बस्ती मरघट।

उनका नाम, मुलायम जानो,

सोच में जिनके, कूड़ा—करकट ।

ऐसे छुटभैयों को क्योंकर

मिल जाता, जनता का बहुमत ?

घृणा द्वेष फैलाने वालों,

वतन कर रहा तुमसे नफ़रत।

हमें चैन से, अब जीने दो,

हो जाओ धरती से रूख़सत।

मन में हो संकल्प शक्ति तो...

****************************

—श्याम झँवर ‘श्याम’, नीमच

ईश्वर में विश्वास बढ़ा है, जीवन में प्रतिघातों से,

कुछ हमने भी सीख लिया है, दुनिया में संतापों से।

जीवन का उद्देश्य हो गया, भागो पैसे के पीछे,

सुधरा नहीं एक भी अब तक, भाषण, मंचों नारों से।

कैसे हैं संस्कार, कहाँ है दोष, समझ न पाये हम,

दादा—दादी हुए तिरस्कृत, आज यहाँ परिवारों से।

हुए नहीं हैं बन्द अभी भी, सब दरवाजे पुण्यों के,

ईश्वर प्राप्त नहीं होते हैं, माला मनकों जापों से।

कुछ भी मिलता नहीं मुफ्त में, दुनियाँ का दस्तूर यही,

कुछ पाया है ठोकर से तो, कुछ — कुछ मिला दुलारों से।

कोई नहीं समझ पाया है, यह दुनियाँ किस ओर चली,

सदाचार—सद्भाव खो गये, कर्मों और जुबानों से।

मन में हो संकल्प शक्ति तो, कर सकते हो कुछ भी तुम,

कोई फर्क नहीं पड़ता है, दुनियाँ के अंगारों से ।

****************************

सर्वशक्तिमान

— लालबहादुर श्रीवास्तव, मंदसौर

सूरज तुम ना

दम्भ भरो

शक्ति का अपनी

ना भरो स्वांग

अपने तेज का

तुम तो देते हो

केवल दिनभर

रोशनी धूप की

पर नन्हें दीपक

को भी ना कम

आंको अपने से

जब तुम सो जाते हो

थककर, चूर—चूर होकर

नील गगन में

तब एक अकेला

नन्हा दीपक

‘सर्वशक्तिमान’

बनकर लड़ता है

निरन्तर

अंधियारे से ....

---

 

सोचो... खूब.... सोचो

— संजय परसाई, रतलाम

क्या तुमने महसूस की

अपनों की पीड़ा ?

तुम देख सकते हो

अपनों की मौत ?

यदि नहीं

तो क्यों करते हो वार

अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी से।

क्या तुमने सोचा है ?

जब नहीं रहेंगे पेड़

तो तुम भी बच पाओगे

सोचो.. खूब.. सोचो

पेड़ों के बारे में न सही

अपने बारे में।

****************************

जीने का हौंसला

— जनेश्वर

दमघोंट हवाओं में जीते हुए

जहर कराए दिए पानी को

पीते हुए लगातार

महामारियों से लड़ते

जूझते हुए जीवन—रक्षक

दवाओं के ऊँचे दामों से

हर क्षण सीखते हुए

आत्महत्याओं के कारगर नुस्खे

वह शताब्दियों तक

जीने का हौंसला रखता है।

--

साभार - साप्ताहिक उपग्रह , दीपावली विशेषांक से.

asghar wajahat

लोकप्रिय कथाकार असग़र वजाहत का नया कहानी संग्रह है - यही तो डेमोक्रेसिया है भइया. इस कथा संग्रह की एक ख़ास कहानी दिल की दुनिया आप पढ़ें ई-स्निप पर असग़र वजाहत की अपनी स्वयं की पांडुलिपि में -यहाँ पर.

असग़र वजाहत ने इस कहानी संग्रह के लिए एक लंबी भूमिका भी लिखी है. इसे भी आप उनकी स्वयं की पांडुलिपि में ई-स्निप पर यहाँ पढ़ सकते हैं.

असग़र वजाहत के दो अन्य ताज़ा आलेख - मुसलमानों की पीड़ा यहाँ पर पढ़ें तथा शहरयार पर लिखा उनका संस्मरणात्मक आलेख यहाँ पर पढ़ें.

आप चाहें तो इन पीडीएफ़ ई-किताबों को उन्हीं कड़ियों में दिए  डाउनलोड  लिंक से डाउनलोड कर अपने कंप्यूटर / मोबाइल / आई-पैड पर भी पढ़ सकते हैं.

टीप : यदि कोई पाठक इनमें से किसी पांडुलिपि को यूनिकोड हिंदी अथवा हिंदी के किसी भी फ़ॉन्ट में टाइप कर सकते हों तो इस उत्तम कार्य हेतु उनका स्वागत है.

भाग्य विधायक ‌

नेता गुंडा दादा तस्कर और पर पीड़ा दायक ‌

इन ‌ पांचों तत्वों से मिल ‌ कर ‌ बनता भाग्य विधायक ‌

 

इसी कड़ी में कुछ ‌ विशिष्ट ‌ और ‌ अधिक ‌ योग्य ‌ जो होते

जीत ‌ जीत ‌ कर ‌ के चुनाव ‌ वे ही संसद ‌ में होते

 

इनका जीवन ‌ अहा स्वर्ग ‌ है बड़े मजे से जीते

जितना खा सकते हैं खाते जो पी सकते पीते

 

ऐसे नर ‌ पुंग ‌ व ‌ श्रेष्ठों को करना रोज ‌ प्रणाम ‌

अपना सारा जीवन ‌ ही कर ‌ देना इनके नाम ‌

 

इनके पद ‌ चिन्हों पर ‌ चलकर ‌ तुम ‌ पद ‌ पा सकते हो

सारा स्वर्ग ‌ उठाकर ‌ अपने घर ‌ ला सकते हो

 

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बेटी का दर्जा मिले

सास ससुर रहते जहां कहलाती ससुराल ‌

साले , सरहज , सालियों का है मायाजाल |

 

है कोई षडयंत्र ये या समाज की चाल ‌

" स " से ही क्यों शुरू हैं संबंध ए ससुराल |

 

' स ' से चालू सास हैं ' स ' ससुरे की ढाल

साले , सरहज सालियां सब ' स ' की टकसाल |

 

क्यों इतना मजबूत है वर्चस्व ए ससुराल

सड़ू भाई भी शुरु ' स ' से यही सवा |

 

गुरू पढ़ाते क्यों नहीं ' स ' माने ससुराल ‌

' स ' के माने सरोता बंद करें तत्काल ‌ |

 

बार बार आता यही मेरे मन मैं ख्याल ‌

जहाँ सरोता काटता जुड़वाती ससुराल ‌ |

 

यदि सुसज्जित नहीं है साली से ससुराल ‌

जीजाश्री को जन्म भर रहता यही मलाल ‌ |

 

किंतु जहां पर सालियों वाली है ससुराल ‌

जीजा साली सरहजें साले सब खुश हाल ‌ |

 

होती है क्यों सिरफिरी बिटियों की ससुराल ‌

सासों नंदों से मिलें नहीं बहु के ख्याल ‌ |

 

होते रहते अनवरत हर दिन नये बवाल ‌

सास बहु के युद्ध से आ जाते भूचाल ‌ |

 

सास फुलाये मुंह ‍ पड़ी बहु फुलाये गाल ‌

कभी क्रोध में खींचते एक दूजे के बाल ‌ |

 

जहाँ कहीं टेढ़ी हुई नव ग्रहों की चाल ‌

सासों ने खिंचवाई है कुल वधुओं की खाल ‌ |

 

कहीं कहीं तो बहु भी करती बड़े धमाल ‌

न पकने दे सास की अपने चूल्हे दाल ‌ |

 

सासु मां दामाद को रखें सदा खुशहाल ‌

सास बहु संबंध क्यों होते खस्ताहाल ‌ |

 

बेटी के पति का जहां होता इतना ख्याल ‌

बेटे की पत्नी वहीं मानी गई जंजाल ‌ |

 

बेटी का दर्जा मिले बहुओं को तत्काल ‌

सास बहु संबंध पर फिर क्यों उठें बवाल ‌ |

 

यदि बहु भी सास को मां माने हर हाल ‌

क्यों न सासु प्रेम से चूमे उसका भाल ‌।

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नागेश

कौन आया ?

 

द्वार पर आहट हुई है,

देख तो लो, कौन आया ?

 

तड़पते मन की कसक की

गंध शायद पा गया वह,

उसे आना ही नहीं था

मगर शायद आ गया वह।

मुझे घबराहट हुई है,

देख तो लो, कौन आया ?

 

ज्योति यह कैसी ? बुझाने पर

अधिक ही जगमगाई।

यह फसल कैसी ? कि जितनी

कटी, उतनी लहलहाई।

प्रीति अक्षयवट हुई है,

देख तो लो, कौन आया ?

 

थम गईं शीतल हवाएँ,

दग्ध उर बेहाल हैं जी।

प्यास अब भी तीव्रतम है,

पर नदी पर जाल है जी।

आस सूना तट हुई है,

देख तो लो, कौन आया ?

 

क्यों जगत की वेदनाएँ

पल रहीं मन के निलय में ?

मधुर सपनों की चिताएँ

जल रहीं जर्जर हृदय में।

जिंदगी मरघट हुई है,

देख तो लो, कौन आया ?

 

जिंदगी की देहरी पर,

मौत को रोके खड़ा हूँ।

नयन तुझको देख भर लें,

बस इसी जिद पर अड़ा हूँ।

एक ही अब रट हुई है,

देख तो लो, कौन आया ?

dr.nagesh.pandey.sanjay@gmail.com>

--
डॉ. नागेश पांडेय "संजय"
शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश (भारत) - 242001.

तलाक

प्रश्न चिन्ह जब सम्‍बंधों पर लग जाते हैं,

सात जन्‍म के जीवन साथी पल में दूर चले जाते हैं।

शंका के अंकुश से उपजे,

बीज कहां फल पाते हैं।

सदियों के संस्‍कार हमारे,

पल में रूप बदल जाते हैं।

सात जन्‍म के जीवन साथी...

मन पर हावी इच्‍छाएं,

जब हो जाती हैं।

सही गलत की सब सीमाएं,

जाने कहां खो जाती हैं।

सात जन्‍म के जीवन साथी...

विश्‍वासों की आधारशिला,

जब हिल जाती है।

एक नीड़ के दो पंछी,

अलग दिशा को उड़ जाते हैं।

सात जन्‍म के जीवन साथी...

 

आशादीप

दुःख अक्‍सर सिरहाने आकर,

चुपके से कह जाता है।

जिस पत्‍थर ने ठोकर मारी,

गले उसे लगाकर देख।

दुःख के बादल जब घिर आये,

साथ अपनों ने छोड़ दिया।

जीवन की आपाधापी में,

गैरों को तू अपनाकर देख।

उम्‍मीदों के अंधियारे में,

आशादीप जलाकर देख।

मंजिल कितनी दूर हो तेरी,

पंखों को फैलाकर देख।

सागर तट से टकराकर,

लहरें, हरदम ये समझाती हैं।

पीछे हटने वाले मुसाफिर,

आगे कदम बढ़कर देख।

 

बचपन

ऐ लौट के आ बचपन मेरे,

जब तारों को गिनते गिनते,

बेसुध होकर सो जाते थे।

छोटी छोटी बातों पर हम,

कभी हसंते थे कभी रोते थे।

ऐ लौट के आ बचपन मेरे...

जब दर्द दवा का पता ना था,

मां की झोली बस दुनिया थी।

चंदा को मामा कहते थे,

तारों में हम खो जाते थे।

ऐ लौट के आ बचपन मेरे...

जुगनू का पीछा करते करते,

घंटों हम भागा करते थे।

गुडडे गुड़िया की शादी में,

दिन रात जश्‍न मनाते थे,

ऐ लौट के आ बचपन मेरे...

रिश्‍तों की दुनिया छोटी थी,

हर रिश्‍ते से प्‍यार निभाते थे।

तेरे मेरे का भेद ना था,

मिल बांट के सब कुछ खाते थे।

ऐ लौट के आ बचपन मेरे...

 

आदमी और जानवर

चिड़िया अपने नवजात को,

शेरनी अपने शावक को,

जलचर, थलचर, नभचर सभी,

सिखाते हैं, अपनी संतानों को,

शिकार के गुर, बचाव के उपाय,

जीवित रहने के लिए,

वंश और परम्‍परा को जीवित सौंपते हैं,

एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को,

बिना किसी विद्यालय के,

शिक्षण या प्रशिक्षण के,

एक मनुष्‍य को छोड़कर।

 

मनुष्‍य संतानों के लालन पालन में,

भूल जाता है उनको सिखाना,

समाज के नियमों को,

कर्तव्य को, दायित्‍व को,

प्रेम को, बलिदान को,

और उसकी भूल जन्‍म देती है।

स्‍वार्थी को, भ्रष्‍टाचारी को,

अपराधी को, आतंकी को,

मानवता रहित मानव को।

 

जीवन क्रम

'

बचपन गुजारा

खेले में, मेले में,

मां की झोली में

बाप की बाहों में

यौवन गुजारा

प्‍यार की मस्‍ती में

वंश की वृद्धि में

आर्थिक समृद्धि में

अधेड़ अवस्‍था गुजारी

बच्‍चों के विवाह में

उनके परिवार में

घर के संसार में

वृद्धावस्‍था गुजारी

अवहेलना में, उपेक्षा में

दर्द में इलाज में

गुजरे हुए इतिहास में

भूल गये हम

नश्‍वर संसार को

प्रभु के नाम को

मृत्‍यु के सत्‍य को

जीवन के अंत को

मोक्ष की राह को

 

प्‍यार

प्‍यार का कोई भी मजहब नहीं होता

प्‍यार की कोई भी भाषा नहीं होती

प्‍यार में कुछ भी असंभव नहीं होता

प्‍यार में कोई भी बंधन नहीं होता

प्‍यार मौत से कभी डरता नहीं

प्‍यार मौत से कभी मरता नहीं

प्‍यार में लुट जाती है सल्‍तनतें

प्‍यार में बन जाते है ताजमहल

प्‍यार जीवन का सुरीला गीत है

प्‍यार सांसों का मधुर संगीत है

प्‍यार यौवन का मधुमास है

प्‍यार ईश्वर का एक वरदान है

 

मैंने देखा है

धर्म के नाम पर मैंने

धर्म को ही मिटते देखा है

जातिवाद के विषधर को मैंने

देश की अखंडता को डसते देखा है

एक संतान की चाहत में मैंने

रात भर, बांझ को, सिसकते देखा है

आतंक की दहशत में मैंने

बंद तालों में खौफ देखा है

ताजमहल के कब्रखाने में मैंने

हथकटे मजदूरों की रूहों को देखा है

सात फेरों की पवित्र कसमों को

व्‍यापार में बदलते देखा है

देश के रहनुमों के हाथों मैंने

देश को ही बिकते देखा है

गुनाह की दुनिया के दरिंदों को

ऊंची कुर्सियों पर बैठे देखा है

मेहनतकश फौलादी हाथों में मैंने

मेरा भारत महान देखा है

 

हम तुम न बन सके

हम तुम न बन सके

तुम हम न बन सके

फासलों की दूरियाँ कभी न कम हुईं

ना तुम बदल सके, ना हम बदल सके

वफा तेरी पे हम

गिला न कर सके

वफा मेरी पे तुम यकीं न कर सके

ना हम तुम्‍हें समझ सके, ना तुम हमें समझ सके

यूं जिंदगी भर हम

साथ साथ चले

विश्‍वास के आधार को शक ने निगल लिया

ना तुम संभल सके, ना हम संभल सके

समझौतों का प्‍यार

कभी न टिक सका

प्‍यार की दूरियाँ कभी ना कम हुईं

ना तुम निभा सके, ना हम निभा सके

 

पक्षी

चल पंछी कहीं दूर चलें

आदमी जिस बस्‍ती में रहता हो

चैन से तुम कहां रह पाओगे

जड़ से ही जब काट देंगे पेड़ को

घोंसले तेरे कहां बच पायेंगे

हर पल कोलाहल हो जहां

प्‍यार के फिर गीत कहां गा पाओगे

बंधनों में आ गये एक बार तुम

फिर कहां आजाद तुम रह पाओगे

सीख लोगे शैतानियत इंसान से

मासूमियत वसीयत में नहीं दे पाओगे

मजहबी सरहदों में बंट गया जंगल तेरा

चैन से तुम मर भी नहीं पाओगे

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-सम्‍पर्क सूत्र

5/3 तेग बहादुर रोड, देहरादून

Devi Nagrani (Custom)

ग़ज़लः 100

 

पहचानता है यारों, हमको जहान सारा

हिंदोस्ताँ के हम है,  हिंदोस्ताँ हमारा

 

यह जंग है हमारी, लड़ना इसे हमें है

यादें शहादतों की देगी हमें सहारा

 

इस मुल्क के जवाँ सब, अपने ही भाई बेटे

करते हैं जान कुर्बाँ, जब देश ने पुकारा

 

जो भेंट चढ़ गए हैं, चौखट पे ज़ुल्मतों की

बलिदान से ही उनके, ऊंचा है सर हमारा

 

लड़ते हुए मरे जो, उनको सलाम देवी

निकला जुलूस उनका, वो याद है नज़ारा

 

मिट्टी के इस वतन की, देकर लहू की ख़ुशबू

ममता का क़र्ज़ देवी, वीरों ने है उतारा

 

**

ग़ज़लः 68

 

दिल की दिल से हुई बग़ावत है

प्यार भी क्या हसीं रक़ाबत है

 

जो सुकूँ-चैन था, वही छीना

दुश्मनों की यही रवायत है

 

हौसले हार कर भी कब टूटे

जीत की आस अब सलामत है

 

दूर क्यों मुझसे है मेरा साया

मुझको उसकी बड़ी ज़रूरत है.

 

इस तरह दिल को चूर-चूर किया

क्या बतायें कि कैसी हालत है.

 

कैसे साँझा कहूँ इसे लोगो

दर्द मेरा, मेरी अमानत है

 

इतनी क़ाबिल न थी कभी 'देवी'

दोस्तों की बड़ी इनायत है.

 

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यशवन्त कोठारी (Custom)

जाता हुआ बरस बहुत सी यादें छोड़ कर जा रहा है। सरकार ने नित नये घोटाले दिये, और सब कुछ बस ऐसे ही चलता रहा। सरकार है यह अहसास भी खतम हो गया। आन्‍दोलनों, घोटालों हड़तालों से बचे तो टेप-काण्‍डों में उलझ गये। पी․ए․सी․ से बचे तो जे․पी․सी में फंसो। दोनों से बचो तो विकीलीक्‍स में उलझो। बेचारी सरकार भी क्‍या करें। युवा लोग नौकरियों को तरसते रहे। राजपथ की रोशनी में अन्‍धेरों की पगडंडियां ढूंढते ढूंढते आम आदमी खो गया। बचपन खो गया। कामनवेल्‍थ में कुछ पदक आये, मगर भ्रष्टाचार के पदकों के सामने सोने, चांदी के तमगे बौने सिद्ध हो गये। नीरा राडि़या, प्रभु चावला, वीर सांघवी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में नयी संभावनाओं की खोज की। टाटा तक के दामन में दाग लग गये। दामन किसी का भी उजला नहीं या बचा।

फोन टेपिंग से देश में खूब हल्‍ला मचा। मगर क्‍या किसी सामान्‍य व्‍यक्‍ति को लाभ मिला। साल गुजर रहा है और महंगाई बढ़ रही है। मानसून खूब आया जम कर बरसा मगर सड़कों पर गड्‌ढे ऐसे ही बने रहे सरकार ने मानसून, मावट की चर्चा की, मगर अफसरों के कानों पर जूं नहीं रेंगी वे वैसे ही सफेद हाथी बने रहे। कानून का मखौल पूरे वर्ष उड़ाया जाता रहा। अफसरों, व्‍यापारियों और नेताओं ने मिल कर देश को लूटना जारी रखा। यदि दो व्‍यक्‍तियों की फोन पर वार्ता से ऐसा हो सकता है तो देश में साठ करोड़ मोबाइल फोन है पता नहीं क्‍या होगा।

पत्रकार एक दूसरे से पूछते है, तुम्‍हें राडिया का फोन आया क्‍या ? अफसर एक दूसरे से फोन पर बात करने में शरमा रहे है। उद्योगपति सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगा रहे है, हमें बचाओ ये तो निजी वार्ता है। मैं किसी को रिश्‍वत नहीं देता कहने वाले बगलें झांक रहे हैं।

जाता वर्ष बहुत याद आ रहा है अकादमियों को अध्‍यक्ष नहीं मिले। मेले खूब लगे। अधिकारियों की पत्‍नियों, प्रेमिकाओं, सालियों ने खूब मजे लिये। पुस्‍तक मेलों में पुस्‍तकों से ज्‍यादा पकोड़ियां बिकीं। कला मेलों में कला से ज्‍यादा कलाकार बिके। आकाशवाणी-दूरदर्शन पर ऐसे लोगों ने बहस में हिस्‍सा लिया जिनका विषय से कोई सरोकार नहीं था वर्ष बीत गया है, मगर यादें अभी भी चल रही है। सफलता के शॉर्ट कट की तलाश जारी है।

खुली अर्थ व्‍यवस्‍था के बन्‍द परिणाम आने लग गये है। सत्‍ता के शीर्ष पर भी थकान आ गई है, वर्ष ने बहुत कुछ देखा-भुगता। आगे भी यही हाल रहेगा। मीडिया ने बड़ा विकास किया। पेडन्‍यूज से आगे बढ़कर मीडिया ने राडिया को काम के साधन उपलब्‍ध करवाये। एक नई सामाजिक आर्थिक क्रान्‍ति का बिगुल बजा। देश बनाना रिपब्‍लिक बना। देश का भविष्य क्रोनी केपिटेलिज्‍म की गिरफ्‌त में आ गया। दो हजार दस चला गया। और मैं गा रहा हूँ कान्‍दे ने रुला दिया रे। लहसुन ने हृदय की धड़कनें बढ़ा दी रे, चीनी ने उच्‍च रक्‍तचाप दे दिया रे। 'कान्‍दा रुला रहा है, लहसुन चिढ़ा रहा है, और नीरा और नीरो बंसरी बजा रहे है। नया वर्ष शुभ हो। और सबको हंसायें।

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर-302002 फोनः-2670596

ykkothari3@gmail.com

हमारे देश में रोटी और रोजगार का सबसे बड़ा संसाधन बनी भूमि की गुणवत्ता अथवा उसकी बिगड़ती सेहत को जांचने का अब तक कोई राष्‍ट्रव्‍यापी पैमाना नहीं है। जबकि देश की कुल आबादी में से सत्तर फीसदी आबादी कृषि और प्राकृतिक संपदा से रोजी-रोटी जुटाती है। भूमि की उर्वरता और क्षरण को लेकर टुकड़ों में तो आकलन आते रहते हैं लेकिन इस स्‍थिति की वास्‍तविक हालत का खुलासा करने वाला कोई एक मानचित्र देश की जनता के सामने पेश नहीं किया गया। हालांकि अशासकीय स्‍तर पर इस मांग की आपूर्ति अहमदाबाद की संस्‍था ‘स्‍पेस एप्‍लिकेशन सेंटर' ने सत्रह अन्‍य इसी काम से जुड़ी एजेंसियों के साथ मिलकर की है। जमीन की सेहत से जुड़ा यह शोध बताता है कि आधुनिक व औद्योगिक विकास, जल व वायु प्रदूषण और कृषि भूमि में खाद व कीटनाशकों के बढ़ते चलन ने किस तरह से उपयोगी भूमि को रेगिस्‍तान में तब्‍दील करने का सिलसिला जारी रखा हुआ है। यदि जमीन की गुणवत्ता और क्षरण रोकने के उपाय राष्‍ट्रीय स्‍तर पर जल्‍दी एक अभियान के रुप में शुरु नहीं किये गये तो देश की एक बड़ी आबादी आजीविका का संकट के दायरे में तो आएगी ही देश की जैव-विविधता भी खतरे में पड़ जाएगी।

‘स्‍पेस एप्‍लिकेशन सेंटर' द्वारा किए शोध के मुताबिक राजस्‍थान का 21.77 प्रतिशत, जम्‍मू और कश्‍मीर का 12.79 प्रतिशत और गुजरात में 12.72 प्रतिशत क्षेत्र रेगिस्‍तान में बदल चुका है। मध्‍यप्रदेश में चंबल के बीहड़ पिछले 60 साल में 45 प्रतिशत बढ़े हैं। महाराष्‍ट्र में विदर्भ और उत्तरप्रदेश व मध्‍यप्रदेश में बुंदेलखण्‍ड क्षेत्र की कृषि का अनावृष्‍टि के कारण तेजी से क्षरण हो रहा है। वहीं भू-जल के बेतहाशा दोहन और अल्‍पवर्षा के चलते खेतों में दस सेंटीमीटर नीचे एक ऐसी कठोर परत बनती जा रही है जो कालांतर में फसल की उत्‍पादन क्षमता को प्रभावित करेगी।

रेगिस्‍तान के विस्‍तार की तह में अतिवृष्‍टि और अनावृष्‍टि का चक्र तो है ही 1999 के बाद से मानसून की दगाबाजी ने उपजाऊ भूमि को बंजर भूमि में बदल देने का काम किया है। इन्‍हीं वजहों से देश के पश्‍चिमी और उत्तरी क्षेत्र भूमिक्षरण के प्रभाव में आए। जंगलों का विनाश, चरनोई की भूमि को कृषि व आवासीय भूमि में तब्‍दील करना और एक तरह की फसल पैदा करने के बढ़ते चलन से भूमि की सेहत बिगड़ी। कुछ ऐसी ही वजहों के चलते बर्फीली वादियों से लेकर घने वनों वाले क्षेत्र भी फैलते रेगिस्‍तान की गिरफ्त में आ गए।

जिस हरित क्रांति के बूते पंजाब को भारत का अनाज भंडार का दर्जा हासिल हुआ, वही पंजाब आज रासायनिक खादों का बेतहाशा उपयोग करने के कारण बड़ी तादाद में अपनी कृषि भूमि बरबाद कर चुका है। देश के कुल कृषि क्षेत्र का 1.5 प्रतिशत भाग पंजाब के हिस्‍से में है जबकि देश में कीटनाशकों की कुल खपत का 18 फीसदी उपयोग पंजाब के किसान करते हैं। इसी तरह पंजाब के मालवा क्षेत्र का कपास क्षेत्र पूरे पंजाब का केवल 15 फीसदी है, जबकि यहां पंजाब के कुल कीटनाशकों की खपत 70 फीसदी है। पंजाब के मालवा का क्षेत्र देश के कुल भू-भाग का मात्र 0.5 भाग है, जबकि यहां देश में कुल खपत होने वाले कीटनाशकों की 10 फीसदी खपत होती है। जिस भांखड़ा नांगल बांध को हम पंजाब की उन्‍नत खेती का आधार मानते हैं, इस बांध से जल रिसाव के चलते पंजाब की अब तक ढ़ाई लाख हेक्‍टेयर कृषि भूमि दलदल में तब्‍दील हो चुकी है।

कृषि के आधुनिकीकरण व यांत्रिकीकरण ने भी भूमि की सेहत को बिगाड़ने का काम किया है। इस बाबत ग्‍वालियर चंबल क्षेत्र में किए गए एक शोध के मुताबिक इस अंचल की भूमि में दो तरह के विकार पैदा हुए हैं। एक कृषि भूमि की सतह में दस सेंटीमीटर नीचे एक कठोर परत (हार्ड-लेयर) बन गई है। दूसरे, भू-गर्भ में करीब एक सौ मीटर की गहराई पर पानी से भरी रहने वाली जगह (पोर-स्‍पेस) रिक्‍त पड़ी है। क्षेत्रीय पर्यावरण में आए ये परिवर्तन भू-गर्भीय अथवा सतह पर भूकंप जैसी हलचल की वजह भी बन सकते हैं। डिस्‍कवरी चैनल द्वारा इस क्षेत्र में किए गए एक अध्‍ययन के प्रस्‍तुतिकरण ने भी दावा किया है कि चंबल व ग्‍वालियर अंचल में तेजी से रेगिस्‍तान का विस्‍तार हो रहा है।

इस अध्‍ययन से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा परंपरागत खेती को नकारने से हुआ। पहले हलों से खेतों की जुताई होती थी लेकिन अब हैरो, कल्‍टीवेटर और प्‍लाऊ जैसे उपकरणों से जुताई हो रही है। ये जमीन को आठ से बारह सेंटीमीटर तक गहरा जोत कर भूमि की उपरी परत को उधेड़ कर पलट देते हैं। नतीजतन मिट्‌टी सूख कर शुष्‍क होती जा रही है और वहीं इसके नीचे की परत कठोर। यह परत अब इतनी कठोर हो गई है कि खेतों की मिट्‌टी का आनुपातिक कुदरती जैविक समीकरण ही गड़बड़ा गया है।

इस अंचल की उस कृषि भूमि में ये लक्षण देखने में आए हैं जो सबसे ज्‍यादा उपजाऊ मानी जाती है। ये इलाके तंवरघार के मैदानी खेत, चंबल के पठारी क्षेत्र और डबरा-भितरवार की उपजाऊ पट्‌टी हैं। इसी क्षेत्र में जल संकट भी बढ़ता जा रहा है। जबकि इस क्षेत्र में नदियों और नहरों का जाल बिछा होने के बावजूद जल संरक्षण नहीं हो पा रहा है। कठोर परत जल को नीचे नहीं उतरने देती। इस कारण अतिरिक्‍त पानी बहकर बरबाद हो जाता है। कुछ ऐसी ही वजहों से भूमि व जल संरक्षण की खेत व तालाब जैसी वैज्ञानिक योजनाएं भी अवैज्ञानिक साबित हो रही हैं। मिट्‌टी की उर्वरता प्रभावित हो रही है। इसके विपरीत फसल को नुकसान पहुंचाने वाली खरपतवार नष्‍ट नहीं हो रही।

इन हालातों से भी बड़ा संकट इस क्षेत्र में यह उपजा है कि वे स्‍थल जो कुछ समय पहले तक पानी से लबालब भरे रहते थे, वे तीस से एक सौ मीटर तक खाली हो चुके हैं। ये खाली स्‍थान (एक्‍वीफर) अब प्राकृतिक भू-गर्भीय संरचना के लिए संकट बन रहे हैं। वैज्ञानिक तो यहां तक आशंका जता रहे हैं कि ये विकराल स्‍थितियां भूकंप को भी आमंत्रण दे सकती हैं। कठोर परत के वजूद में आ जाने से जलभरण के सभी उपाय खारिज होते चले जा रहे हैं।

इधर चंबल क्षेत्र में भूमि के लगातार बिगड़ रहे पर्यावरण ने बीहड़ों के विस्‍तार का ऐसा भयावह सिलसिला जारी रखा हुआ है जो गांव के गांव लीलता जा रहा है। इस अंचल के भिण्‍ड, मुरैना और श्‍योपुर जिलों में हर साल पन्‍द्रह सौ एकड़ भूमि बीहड़ में तब्‍दील हो रही है। इन जिलों की कुल भूमि का 25 फीसदी हिस्‍सा बीहड़ों का है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक चंबल नदी घाटी क्षेत्र में 3000 वर्ग किलोमीटर इलाके में बीहड़ों का विस्‍तार है। इन तीनों जिलों के क्षेत्र में जितनी भी छोटी-बड़ी नदियां बहती हैं, वे जैसे बीहड़ों के निर्माण के लिए अभिशप्‍त हैं। चंबल में 80 हजार, कुआंरी में 75, आसन में 2036, सीप में 1100, बैसाली में 1000, कूनों में 8072, पार्वती में 700, सांक में 2122 और सिंध में 2032 हेक्‍टेयर बीहड़ हैं। बीते आठ सालों में करीब 45 प्रतिशत बीहड़ों में वृद्धि दर्ज की गई है। इन बीहड़ों का जिस गति से विस्‍तार हो रहा है, उसके मुताबिक 2050 तक 55 हजार हेक्‍टेयर कृषि भूमि बीहड़ों में तब्‍दील हो जाएगी। नतीजतन करीब दो हजार आबाद गांव बीहड़ लील लेंगे। इन बीहड़ों का विस्‍तार एक बड़ी आबादी के लिए विस्‍थापन का संकट पैदा करेगा।

जमीन की सेहत अब प्राकृतिक कारणों की तुलना में मानव उत्‍सर्जित कारणों से ज्‍यादा बिगड़ रही है। पहले भूमि का उपयोग रहवास और कृषि कार्यों के लिए होता था, लेकिन अब औद्योगीकरण, शहरीकरण बड़े बांध और बढ़ती आबादी के दबाव भी भूमि को संकट में डाल रहे हैं। जमीन का खनन करके जहां उसे छलनी बनाया जा रहा है, वहीं जंगलों का विनाश करके जमीन को बंजर बनाए जाने का सिलसिला जारी है। जमीन की सतह पर ज्‍यादा फसल उपजाने का दबाव है तो भू-गर्भ से जल, तेल व गैसों के अंधाधुंध दोहन के हालात भी भूमि पर नकारात्‍मक प्रभाव डाल रहे हैं। पंजाब और हरियाणा में सिंचाईं के जो आधुनिक संसाधन हरित क्रांति के उपाय साबित हुए थे, वही उपाय खेतों में पानी ज्‍यादा मात्रा में छोड़े जाने के कारण कृषि भूमि को क्षारीय भूमि में बदलने के कारक सिद्ध हो रहे हैं। दरअसल अलग-अलग क्षेत्रों में भूमि की सेहत अलग-अलग कारणों से प्रभावित हो रही है। जिसकी देशव्‍यापी पड़ताल अब तक नहीं हुई है। धरती की बिगड़ती इस सेहत को मानचित्र पर लाना जरुरी है। जिससे आजीविका के संकट से जूझने जा रही आबादी को बचाने के माकूल उपाय तलाशे जा सकें ?

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प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी म.प्र.

pramodsvp997@rediffmail.com

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है ।

तेरे तस्व्वुर ने किया पागल मुझे,
कोई दवा भी है नहीं हासिल मुझे।

किरदार मेरा हो चुका दरवेश सा,
अपनी  ग़मों की पहना दे पायल मुझे।

ज़ख्मों की बारिश से बचूं कैसे सनम,
प्यारा है तेरी गलियों का दलदल मुझे।

कश्ती मेरी, लहरों की दीवानी हुई,
मदमस्त साहिल ने किया घायल मुझे ।

तेरी अदाओं ने मुझे मारा है पर,
दुनिया समझती, अपना ही क़ातिल मुझे।

या मेरी तू चारागरी कर ठीक से,
साबूत लौटा दे, या मेरा दिल मुझे ।

झुकना सिखाया वीर पोरष ने मुझे,
दंभी सिकन्दर,ना समझ असफ़ल मुझे।

मन्ज़ूर है तेरी ग़ुलामी बा-अदब,
है जान से प्यारा तेरा जंगल मुझे ।

तू खुदगरज़ सैयाद दानी, इश्क़ में  
तू मत समझना बेवफ़ा बुलबुल मुझे।

देखने दीजिये.


इंसानियत के ख्वाब हैं, देखने दीजिये

जाड़े की धूप है ,जरा सेंकने  दीजिये.

 

हम तो आज सच बात ही कहेंगे,

लोग पत्थर फेंकते है, फेंकने दीजिये.

 

उनकी आत्मा तो बहुत पहले बिकी थी.

अब झूठे सपने बेचते है, बेचने दीजिये.

 

आज दिखा हूँ मै आपको जलता हुआ

वर्षों से जल रहा हूँ, जलने दीजिये.

 

ये रास्ता किसी मंदिर-मस्जिद को नहीं जाता

हम इसी पर चलेंगे, हमें चलने दीजिये.

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बरखा तेरे कितने रूप

नभ के आँचल से

पानी की फुहार जब,

धरा को अपने आगोश में,

लेती है,तो बरखा कहलाती है,

बरखा कई रूपों में आती है!

 

"प्रेम"रूप में बरखा

पिया मिलन की चाह,

जागती है, मन में प्रेम धुन,

बज उठती है, और जी करता है,

घर की मुंडेर पे, पी संग बैठ कर,

आस्मां से गिरते मोतियों को ,

घंटे निहारते रहे,

ये है"आनंदमयी बरखा"

"नटखट" रूप मैं बरखा

बच्चों को पुकारती है,

और बच्चे ,नंगे पांव बाहर आ जाते हैं,

और बरखा की बूँदों के साथ खेलते हैं,

उनके चेहरे पे जो भाव आते हैं,

वो बरखा ही ला सकती है,

ये है "एक प्यारी दोस्त बरखा"!

 

"उम्मीद" के रूप में बरखा

किसानों की आशाओं को,

पूरा करती है,उनकी मेहनत को

अंजाम देती है,उनका महीनों का इंतज़ार

ख़तम होता है,और हर तरफ बारिश के गीत

फ़िज़ा में घुल जाते हैं,

ये है"अन्नपूर्णा जैसी बरखा"!

 

'आनंद के रूप में बरखा,

तपती गर्मी से निजात दिलाती है,

परिवेश में हर तरफ शीतलता,

और मन में सुकून का अहसास,

आँखें आसमान को देख

सुकून के लिए शुक्रिया करती है,

और फिर "चाय और पकौड़े"

इनका बारिश के साथ,कुछ

और ही आनंद है,

ये है"राहत भरी बरखा"!

 

"चिंता" के रूप मे बरखा

घर में क़ैद कर देती है,

जिसका गम कई लोगों के

चेहरे पे साफ दिखता है,

और वो हर तरफ कीचड़

उफ़ ये बरखा ,अब बंद भी हो

जाओ ना,बहुत हो गया,

ये है"परेशान" करती बरखा"!

 

"भय" के रूप में बरखा

आँखें आस्मां पे टिकी रहती है

और रोज बढ़ रहा जलस्तर

बेचैनी बढ़ा देता है, मन में हर पल

ख़तरे का अहसास, वो बेघर हो जाने

का डर,बरखा ऐसा गजब मत करना!

ये है "खौफ़नाक' बरखा!

 

"काल" के रूप में बरखा

एक भयावह मंज़र ले कर आती है

और शुरू होता है तांडव

हर तरफ त्राहि-त्राहि, हर

तरफ चीख -पुकार, सब

कुछ तहस-नहस

,पानी से डर लगता है, और एक ही प्रार्थना

प्रभु रहम करो, रोक दो इस विनाश को,

नहीं चाहिए कभी बरखा,

ये है "दैत्यरूपी" बरखा!

 

जिस तरह जिंदगी खुशी

और गम लिए आती है

उसी तरह बरखा भी कई

रूपों में आती है!

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सज़ा --मौत-(भ्रूणहत्या)

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कोख रूपी कटघरे में बैठी ,

एक अर्धविकसित बच्ची लाचार,

बाहर आने का बेसब्री से

कर रही थी इंतज़ार!

 

इंतज़ार एक नयी दुनिया ,

में अपनी आँख खोलने का,

इंतज़ार कुछ नये चेहरों ,

से अपना रिश्ता जोड़ने का!

पर जनम से पहले ही,

हो गयी ये बेचारी बर्बाद,

किसी ने इसका लिंग बताया,

और कर दिया अपराध!

 

समाज के इस कोर्ट में,

आज मुक़र्रर होगी सज़ा,

खुदा की इस देन पे,

इंसान देगा अपनी रज़ा!

 

माँ कर रही खूब प्रयास,

इसके मन में है एक आस,

कहा की ये जननी है,

इससे ही श्रृष्टि चलनी है!

 

कुछ लोगों ने ज़ोर लगाया,

स्त्री को एक बोझ बताया,

ग़रीबी और बेबसी बतलाई,

दहेज-प्रथा की याद दिलाई!

कभी जिंदगी जीत रही थी,

कभी मौत हावी हो रही,

अंत में माँ -बाप का टूटा हौसला,

और सज़ा-ए-मौत का किया फ़ैसला!

 

इस तरह एक और कन्या,

भ्रूणहत्या का हो गयी शिकार,

तरह-तरह के प्रयास कर रही,

फिर भी बेबस दिख रही सरकार!

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मेरी जान मुझको गले से लगा लो एक गीत !

मेरी जान मुझको गले से लगा लो

बहुत हो चुका अब मुझे अपना लो !

 

कुंदन के कंगन में आशा के मोती

लिए बैठा हूँ अरमानों के ज्योति

उठा लो इन्हें हाथों में सज़ा लो !

मेरी जान मुझको गले से लगा लो

बहुत हो चुका अब मुझे अपना लो !

 

ये माथे का टीका है चंदा सरीखा

इसमें धड़कता है एक दिल किसी का

ये टीका उठा के माँग सज़ा लो !

मेरी जान मुझको गले से लगा लो

बहुत हो चुका अब मुझे अपना लो !

 

गजरे में लिपटी ये चंपा -चमेली

तुम बिन रहती है ये भी अकेली

इन्हें तुम उठा के केशों में छुपा लो !

मेरी जान मुझको गले से लगा लो

बहुत हो चुका अब मुझे अपना लो !

 

पायल की छम-छम से निकले मेरा दम

कही इनकी सरगम ना हो जाए अब कम

इन्हें पैरों में जगह दो,मेरा घर सज़ा लो !

मेरी जान मुझको गले से लगा लो

बहुत हो चुका अब मुझे अपना लो !

 

ये दीवाने की तड़प है ,हँसी में ना लेना

इस बार भी ना ये दिल तोड़ देना

अब मेरे नाम से अपनी माँग सज़ा लो !

मेरी जान मुझको गले से लगा लो

बहुत हो चुका अब मुझे अपना लो !

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डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

 

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अपने ही घर में अपमानित हो कर, तुम कैसे रह लेती हो,

दिन में कई बार तिरस्कृत होती हो,ये सब कैसे सब हेती हो!

 

अपने नर्म हाथों से रोटी बनाती हो,फिर पत्थर भी तोड़ लेती हो,

ठेकेदार की गालियाँ खाती हो,ये सब कैसे सह लेती हो!

 

कई तरह के रिश्तों को कितनी कुशलता से निभा लेती हो ,

हर रिश्ते में ठुकराई जाती हो ये सब कैसे सह लेती हो !

 

अपने बच्चों की खातिर अपनी हर खुशी त्याग देती हो,

वही बच्चे फिर आँख दिखाते है,ये सब कैसे सह लेती हो!

 

पति को परमेश्वर कहती हो,पूरा जीवन अर्पण कर देती हो,

तुझे दासी समझ लज्जित करता है, ये सब कैसे सह लेती हो!

 

सृष्टि को नया जीवन देने को प्रसव पीड़ा तुम सह लेती हो,

उसी समाज में अबला कहलाती हो,ये सब कैसे सह लेती हो!

 

पुरुषों को जन्म देती हो,छाती से लगा बड़ा करती हो

उन्हीं के द्वारा सताई जाती हो ये सब कैसे सह लेती हो!

 

अपने कुटुम्ब की खातिर ,दिन भर चक्की में पिसती हो

फिर भूखे पेट सोना पड़ता है ये सब कैसे सह लेती हो!

 

डॉक्टर राजीव श्रीवास्तवा

विकीलीक्‍स द्वारा अमेरिका जैसे शक्‍तिशाली देश से जुड़ी एक साथ ढाई लाख गोपनीय सूचनाओं को उजागर करने की घटना को एक ऐसे विचार के रूप में देखने की शुरूआत बुद्धिजीवियों द्वारा की जा रही है, जो कभी मरने वाला नहीं है। इस विचार को इसलिए भी बल और समर्थन मिल रहा है क्‍योंकि विकीलीक्‍स के संस्‍थापक-संपादक जूलियन अंसाजे को संदिग्‍ध और पुराने मामलों में तब गिरफ्‍तार किया गया जब वे सूचनाओं से जुड़ी फाइल पर क्‍लिक कर चुके थे। इस गिरफ्‍तारी से यह संदेश जनमानस में फैल रहा है कि वैश्‍विक चौधरी बना जो अमेरिका भूमण्‍डलीय विस्‍तार के दृष्‍टिगत जिस उदारवाद के विस्‍तार और मानवाधिकारों के हनन की पैरवी करता था वह खुद बौखलाकर दमन पर उतर आया है। अब तो अंसाजे के बैंक खातों को भी सील कर दिया गया है। जिस ब्रितानी साम्राज्‍य को कभी न डूबने वाले सूरज की संज्ञा मिली हुई थी, उसको परतंत्र भारत के एक सिपाही मंगल पाण्‍डे ने चुनौती तकनीक से ही आविष्‍कृत बंदूक का घोड़ा दबाकर दी थी। और फिर इस गोली से उपजे शहीदी विचार ने ब्रितानी हुकूमत को आने वाले सौ सालों में पूरे एशिया में नेस्‍तनाबूद कर दिया था।

कथित आर्थिक उदारवाद के दौर में अमेरिका भी कमोबेश ब्रिटेन जैसा ही एक ऐसा देश है, जिस पर अंगुली उठाना अथवा उसके विरूद्ध जाना कोई आसान काम नहीं है ? कुटिल चतुराई से अमेरिका ने अपनी दोगली कूटनीतिक रणनीतियों को अदृश्‍य रहने वाली तकनीकी सुरक्षा तंत्र से ढंक लिया, ताकि सवाल उठाने वाले और अमेरिकी नीतियों को चुनौती देने वाले विरोधी तथा असामाजिक तत्‍व दूर ही रहें। परंतु ये लौह कवच कालांतर में इतने निर्मम और कठोर साबित हुए कि विकासशील देशों के वंचित समाजों की आबादी की भलाई, असमानता की खाई को बढ़ाने के साथ अन्‍य तमाम आसन्‍न संकटों के दायरे में आती चली गई। इस संकट निवारण में अंसाजे ने खुद को खतरे में डालकर विश्‍वहित में अनूठा व अद्वितीय काम किया है। यहां अमेरिका को आत्‍ममंथन करने की जरूरत है कि शुतुरमुर्ग की तरह मुलायम रेत में आंखें चुरा लेने की बजाय अमेरिका और अन्‍य मानवाधिकारों के हनन से जुड़े देश अपनी अलोकतांत्रिक नीतियों को थोपने की बजाय स्‍वयं को लोकतंत्र की कसौटी पर कसकर खरा बनाएं और नीतियों को पारदर्शी बनाते हुए मानवीय सरोकारों व परिणामों के प्रति ज्‍यादा संवेदनशील बनें। अन्‍यथा जिस कंप्‍यूटर और इंटरनेट तकनीक का वह आविष्‍कारी देश है, वही तकनीक उसे भस्मासुरी भी सिद्ध हो सकती है। यह संकेत अंसाजे की एक मात्र क्‍लिक से दुनिया को मिल गया है।

कोई विचार शाब्‍दिक रूपों में अवतरित होने से पहले किसी घटना के रूप में रूबरू होकर मनुष्‍य की संवेदनशील अंतश्‍चेतना को झकझोरता है, तब कहीं जाकर अवचेतन में एक नई मौलिक दृष्‍टि के बीज पनपते हैं और फिर विचार, काल और परिस्‍थियों के सह अस्‍तित्‍व से आत्‍मसात होता हुए, आक्रोश और प्रतिकार को अभिव्‍यक्‍त करते अनन्‍य रूपों अथवा विधाओं में सामने आते हैं।

आदि ऋषि वाल्‍मीकि ने जब एक पक्षी युगल क्रोंच को एक पल प्रेम में निमग्‍न देखा, फिर दूसरे पल बहेलिये के बाण से मादा क्रोंच के वध की क्रूरता देखी और तीसरे पल प्रेयसी के वियोग की व्‍याकुलता में नर पक्षी को प्राण त्‍यागते देखा। इस छोटी सी कारूणिक घटना ने वाल्‍मीकि की जीवन दृष्‍टि को आद्योपांत बदल दिया। इस क्रूर और कारूणिक साक्षात्‍कार के बाद वे संस्‍कृति के उदात्त चरित्रों के अनुपम रचयिता के रूप में सामने आए और ‘रामायण' जैसे महाकाव्‍य का सृजन कर दुनिया के पहले कवि कहलाए।

दक्षिण अफ्रीका में जब मोहनदास करमचंद गांधी को ‘काले' होने के कारण रेल के डिब्‍बे से धक्‍के देकर प्‍लेटफार्म पर धकेल दिया गया, तब गांधी की सोई अस्‍मिता जागी और स्‍वदेश आकर गोरों के खिलाफ अहिंसा के सिद्धांत के साथ समय से मुठभेड़ करते हुए गांधी ने भारतीय स्‍वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में भरपूर हस्‍तक्षेप किया। तब कहीं गांधी, महात्‍मा गांधी कहलाए और आज पूरी दुनिया में अहिंसा का सिद्धांत एक विचार यात्रा के रूप में परवान चढ़ रहा है। गांधी के विचार अहिंसा और असंचय को हिंसा, ईर्ष्‍या, विद्वेष और वैमनस्यता की गुंजलक में जकड़ती जा रही वैश्‍विक दुनिया को मुक्‍ति के सार्थक उपाय के रूप में देखा जा रहा है।

हम फीचर फिल्‍मों के निर्माण में विश्‍व में अग्रणी देश हैं। हिन्‍दी फिल्‍मों की तूती पूरी दुनिया में बोलती है। दादा साहब फाल्‍के सम्‍मान फिल्‍मकार के लिए जीवन की एक बड़ी उपलब्‍धि है। फिल्‍म निर्माण के विचार के जनक घुंडिराज गोविन्‍दराज फाल्‍के 1910 में जब मुंबई के एक उद्यान में दोपहर का भोजन ले रहे थे, तब अनायास ही हवा में लहराता एक अखबार की चिंदी उनके टिफिन से अटक गई। अखबार के इसी हिस्‍से में ‘लाइफ ऑफ क्राइस्‍ट' नामक फिल्‍म के आने वाले शुक्रवार को प्रदर्शन होने का विज्ञापन था। अचानक घटे इस पल ने घुंडिराज फाल्‍के को विचार दिया कि क्‍यों न सिनेमा के माध्‍यम से कृष्‍ण के जीवन चरित्र पर एक फिल्‍म बनाई जाए। अकस्‍मात जेहन में कौंधे इस विचार ने फाल्‍के के जीवन को फिल्‍म निर्माण में झोंक दिया। एक अखबारी कागज के टुकड़े से अभिप्रेरित विचार बिन्दु ने भारत को दुनिया में सबसे ज्‍यादा फिल्‍में बनाने का इतिहास रचने का आधार बना दिया।

आस्‍ट्रेलियाई पत्रकार जूलियन अंसाजे भी बचपन से ही लोकतांत्रिक सत्ताओं की गोपनीयता भंग करने की जद्‌दोजहद से जूझते रहे। अंसाजे के अंतर्मन में गोपनीय अभिलेखों को सार्वजनिक करने का विचारी जुनून मन में कौंधा। उसी प्रबल-प्रखर प्रेरणा ने उन्‍हें अंतर्जाल तकनीक आधारित एक संस्‍थागत ढांचा खड़ा करने को मजबूर किया। उनका विचार है कि जब संवैधानिक रूप से गठित लोकतांत्रिक देशों की सरकारें वाकई में लोकतांत्रिक हैं तो अपने देश की प्रजा से गोपनीय रखने के लिए उनके पास ऐसे कोई विरोधाभासी साक्ष्‍य मौजूद नहीं होने चाहिए जिन्‍हें छिपाने की जरूरत पड़े ? लेकिन शक्‍तिशाली देशों द्वारा बरती जाने वाली मनमानी राजनीति का अहम्‌ हिस्‍सा बन चुकी है। इसके बिना विश्‍वमंच पर राजनीति शतरंज खेली नहीं जा सकती ? विकीलीक्‍स ने जो रहस्‍य जग-जाहिर किए हैं, उनसे स्‍पष्‍ट है कि अमेरिका की प्रजातांत्रिक राजनीति ऐसे ही जटिल व उलझे प्रश्‍नों की अजगरी गुंजलक में जकड़ी है। अमेरिका की कूटनीतिक विडंबनाएं काजल की कोठरी में किस तरह गूंथी गई हैं, इनका भयावह सच विकीलीक्‍स द्वारा उजागर किए गए वे ढाई लाख दस्‍तावेजी साक्ष्‍य हैं, जिनके तार अमेरिका द्वारा थोपी गई कथित भूमण्‍डलीय उदारवादी आर्थिक अवधारणा के विश्‍वग्राम से जुड़े हैं।

बिल गेट्‌स ने कहा था कि सशक्‍तीकरण के लिहाज से अंतरताना (इंटरनेट) सर्वाधिक प्रभावी तकनीक है। इस सूक्‍ति वाक्‍य से ही प्रेरित होकर और इसका सार्थक इस्‍तेमाल कर बराक ओबामा ने 2009 में राष्‍ट्रपति पद का चुनाव जीता। ओबामा ने फेसबुक और टि्‌वटर पर अनेक खाते खोलकर अपनी नीतियों से करोड़ों मतदाताओं को आकर्षित किया। परस्‍पर संवाद भी कायम किए। ओबामा को जब विजयश्री हासिल हुई तब सुनिश्‍चित हुआ कि निर्वाचन-प्रणाली में यह सूचना-जंजाल कितना प्रभावी व ताकतवर है। लेकिन ओबामा ने भी अंततः अमेरिका की रक्षा और विदेश मंत्रालय से जुड़ी उन्‍हीं नीतियों का अनुसरण किया जो अमेरिकी कूटनीतियों को टेक्‍नोक्रेसी के मार्फत अपारदर्शी व पुख्‍ता बनाते हुए विकासशील देशों का भयादोहन करती रही थीं। लिहाजा टेक्‍नोक्रेसी ने अमेरिकी चौहद्‌दी में ऐसी अभेद्य (विकीलीक्‍स के लीक सामने नहीं आने तक) दीवारें खड़ी कीं, ताकि शंकालु और विरोधी तत्‍व इन दीवारों को भेद न पाने के कारण बाहर ही रहें। लेकिन जब ये दीवारें गगनचुंबी होने को बेताब होने लगीं तो जूलियन अंसाजे जैसों ने दुनिया की भलाई और मानव जाति के मूलभूत अधिकारों को खतरे में पड़ते देखने का अनुभव किया। फिर मात्र चार साल पहले विकीलीक्‍स की स्‍थापना इस उद्‌देश्‍यपूर्ति के लिए की कि अमेरिका की दोमुंही कारगुजारियों का खुलासा विश्‍वमंच पर किया जा सके। और फिर अंसाजे के दुस्‍साहस ने अमेरिकी कूटनीति को विश्‍वसनीयता के गहरे संकट में धकेल दिया। दरअसल वैचारिक जज्‍बे और जुनून से लबरेज अंसाजे की मंशा थी कि लोकतांत्रिक सत्ताएं ज्‍यादा खुली और पारदर्शी होने के साथ आम जनता के प्रति परिणामोन्‍मुखी और संवेदी हों। क्‍योंकि परमाणु बम जैसे घातक हथियारों से संपन्‍न होते देशों में यदि परमाणु खतरों को समझने व नियंत्रित करने वाले लोगों की संख्‍या मुट्‌ठीभर होगी तो आसन्‍न संकट और गहराएंगे ही।

बहरहाल विकीलीक्‍स और जूलियन अंसाजे एक ऐसे अद्वितीय वैश्‍विक नागरिक पत्रकार साबित हुए हैं, जिन्‍होंने ‘सत्ता के समक्ष सिर झुकाओ और अनुकूल प्रवाह में तैरो' की बजाय विश्‍वहित में खुद को जोखिम में डाला। क्‍योंकि अब तक राष्‍ट्रभक्‍त स्‍वदेश की बलिवेदी पर ही शहीद होते रहे हैं। इस ‘विश्‍वभक्‍त' को जितने भी दमनकारी तरीकों से तोड़ने की कोशिशें की जाएंगी अमेरिका व ब्रिटेन जैसी शक्‍तिशाली और पूंजीवादी सरकारों के विरूद्ध अंसाजे का विचार एक संगठित वैचारिक पुंज के रूप में मजबूत होता चला जाएगा। कालांतर में ऐसे हालात भी निर्मित हो सकते हैं कि तकनीक को स्‍वतंत्रता, स्‍वायत्तता और समानता की संरचना का पर्याय माना जाने लगे ? तो क्‍या हम उम्‍मीद कर सकते हैं कि तकनीक वैचारिक आंदोलन का आधार बिंदु बनेगी ? वैसे भी सैद्धांतिक विचार धाराएं मानवीय मूल्‍य स्‍थापित करने में अब तक असफल ही रही हैं। फिर चाहे वह मार्क्‍सवाद की अवधारणा हो, गांधीवादी की हो अथवा फासीवाद की ! सभी प्रकार की विचार धाराएं धार्मिक व संप्रदायवादी चरमपंथों के समक्ष दम तोड़ती ही नजर आई हैं। ऐसे में क्‍या लोकतांत्रिक समावेशी समाजवाद के उभरने की उम्‍मीद तकनीकी क्‍लिक से की जा सकती है?

pramodsvp997@rediffmail.com

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी (म.प्र.) पिन-473-551

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मैंने भी वर्जिश की

यशवन्‍त कोठारी

आखिर मुझे गुस्‍सा आ ही गया, सहनशक्‍ति की भी हद होती है, रोज-रोज सवेरे उठते ही पत्‍नी टोकती है, तुम्‍हारा शरीर। इससे तो सींकिया पहलवान ही अच्‍छा होता है, दर्पण देखता तो उममें भी वही शरीर आखिर मैंने तय किया कि शरीर सुधार का राष्‍ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया जाय और इसी बीच मैं गुस्‍से में भरकर वर्जिश संबंधी साहित्‍य का पारायण करने लग गया।

योग, प्राकृतिक चिकित्‍सा, शरीर को स्‍वस्‍थ रखने के सौ उपाय, बुलवर्कर, स्‍प्रिंगों तथा कमर को कमरा बनने से रोकने के सौ उपायों आदि पुस्‍तकों से निपटकर मैंने तय किया, स्‍वस्‍थ शरीर के लिए आवश्‍यक है- नियमित वर्जिश।

और वर्जिश की शुरूआत में ही मेरी समझ में यह आ गया कि क्‍यों लोगबाग आराम कुर्सी पर पड़े-पड़े पुस्‍तक चाटना बेहतर समझते हैं लेकिन वर्जिश नहीं करते। क्‍यों लोग बाग वेट लिफ्‍टिंग के बजाय कैलोरियों की गणना करने में कोताही करते हैं। दरअसल, पड़े-पड़े सोते रहने से तथा अनियोजित विहार से शरीर बिल्‍कुल बेकार हो गया था। जाहिर है कि मुझे अपना शरीर पसन्‍द नहीं था, अन्‍य कई पाठक भी मेरी इस बात से सहमत होंगे कि उन्‍हें भी अपना शरीर पसन्‍द नहीं हैं लेकिन अब क्‍या किया जा सकता है। कुल मिलाकर अपन यही तो कर सकते है कि शरीर को सुधारने हेतु कुछ महत्‍वपूर्ण कसरतों के नियमित रूप से करे।

चुनांचे, मैंने भी वर्जिश करने की ठानी और परिणाम क्‍या रहा। आप शायद सोच रहे होंगे कि मैं बहुत जल्‍दी ही दारासिंह या किंगकांग को पछाड़ने काबिल हो गया होऊंगा, क्षमा करें आप गलती पर हैं मुझे चन्‍द रोज अस्‍पताल में रहना पड़ा और यह व्‍यंग्‍य आपकी खिदमत में अस्‍पताल से ही नजर कर रहा हूं।

अपनी चालीस साल की जिन्‍दगी में पहली बार मैंने अपने कसरत करने के निर्णय पर अमल करते हुए कभी वजन उठाया तो कभी दंड पेले, कभी कसरत की तो कभी ब्रह्मा मुहूर्त में दौड़ लगायी, लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात, शरीर को ना सुधरना था, न सुधरा मेरी स्‍थिति हास्‍यास्पद और हो गयी।

जब दण्‍ड बैठकों से कोई सुधार के संकेत दिखाई नहीं दिये तो मैंने तय किया कि अब मुझे पांवों में जूते बांध कर नेशनल हाइवे पर दौड़ लगानी चाहिए, लेकिन भारतीय सड़कें कैसी हैं सौ तो आप जानते ही हैं, उस कारण एक रोज ही दौड़ कर मैंने अपने इस निर्णय को बदल डाला।

अब मुझे बुलवर्कर वाला विज्ञापन आकर्षित कर रहा था, मांसल, सुदर्शन शरीर की तमन्‍ना मुझे ही हमेशा ही रही है, अतः मैंने स्‍प्रिगों की मदद से बुलवर्कर पर काम करने की कोशिश की।

इस क्रम में सबसे पहले मेरी मुठभेड़ पोस्‍टमैन से हुई, वह पूछ रहा था, आप ही ने ये काठ कबाड़ मंगवाया है, मेरे हां कहने पर उसने हिकारत से मेरी ओर देखा और उस जंजाल को वहीं बरामदे में डालकर यह जा, वह जा, मैंने सोचा, हे प्रभु तुम इसे माफ करना, यह नहीं जानता कि इसने क्‍या किया है। अब प्रश्‍न था इसे अपने कमरे में पहुँचाने का, मैंने और बच्‍चों ने मिलकर इसे ऊपर पहुँचाया। इसी क्रम में मैं और बच्‍चे इतने ज्‍यादा थक चुके थे कि अब वर्जिश की कोई गुंजाइश नहीं थी, मैंने तय किया कि कल सुबह जल्‍दी उठकर वर्जिश का काम करूंगा। दूसरे दिन सुबह उठ तो गया, लेकिन बिजली रानी ने सब गुड़ गोबर कर दिया, वह रात से ही गायब थी।

मैंने इस मौके का फायदा उठाना उचित समझा, खूब डटकर खाया पीया और दोपहर तक सोया, शाम को उठने पर शरीर इतना ज्‍यादा अलसाया हुआ था कि मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सका, अतिरिक्‍त कैलोरी के कारण मैं फिर सो गया, उठने के बाद रेडियो, टी․वी․ फिर रात के भोजन का इंतजार करने लगा, बच्‍चों के गपशप की, पड़ोसी की बीमारी के बारे में सुना, उसे सांत्‍वना दी और फिर भी समय बच गया तो बरामदे में बैठ कर अखबार पढ़ने लग गया, कसरत का काम रविवार तक के लिए मुल्‍तवी हो गया।

रविवार आया। मैं फिर जल्‍दी उठा और कुछ करने के लिए जल्‍दी से बुलवर्कर ढूंढने लग गया, वह तो मिल गया, लेकिन उसे दबाने में जो ताकत लगी, उससे मांशपेशियां अकड़ गयी, मैं दर्द से दोहरा हो गया, बड़ी मुश्‍किल से एक स्‍थानीय पहलवान से मालिश कराने पर ही हाथ ठीक हो सका, अभी भी बादल होने पर दर्द बढ़ जाता है।

बुलवर्कर और स्‍प्रिंगों से हार चुकने के बाद मैंने वेटलिफ्‍टिंग की और ध्‍यान दिया, हिम्‍मत करके मैंने एक रोज सौ पाउन्‍ड वजन चढ़ा दिया और उसे एक झटके से ऊपर उठाने लगा, लेकिन आश्‍चर्य। महान्‌ आश्‍चर्य। वेट के पाये तो जैसे अंगद के पांव हो गये थे, मैंने भी हिम्‍मत नहीं हारी और अपनी कोशिश जारी रखी, मेरा पूरा शरीर पसीने से तरबतर था, होंठ सूख रहे थे, तालू चिपक गया था, वेट था कि जहां का तहां स्‍थिर था, आखिर मैं ही हारा और लस्‍तपस्‍त होकर कमरे से बाहर निकला, मेरी लंगड़ी चाल देखकर देवीजी कह उठी।

क्‍यों, क्‍या हुआ, कसरत, कैंसिल।

तुम मुझे समझती क्‍या हो, मैं अवश्‍य फौलादी बन जाऊंगा, इट इज ए स्‍लो प्रोसेस, अब पत्‍नी मजाक पर उतर आयी थी, कहो तो आर्थोपैडिक वार्ड में एक खाट सुरक्षित करवा लूँ।

मैंने इस बात का जवाब देना कतई जरूरी नहीं समझा और फिर शाम को कसरत के चक्‍कर में व्‍यस्‍त हो गया।

इस बार मैंने वजन उठाने का इरादा छोड़ दिया और कुछ मुग्‍दर घुमाने की कोशिश की, मैंने मिनी मुग्‍दर मंगाये और उनसे कुश्‍ती लड़ने लगा, लेकिन यह काम और भी कठिन था, एक बार जो घुमाया तो मेरा हाथ कंधे से उतर गया, लम्‍बे समय तक प्‍लास्‍टर रहा और अब वापस लिखने काबिल बना है।

कुल मिलाकर स्‍थिति वही है कि लौटकर बुद्धू घर को आये, मैं वैसे अभी भी आशावान हूँ, यह एक लम्‍बी योजना है और खोजबीन-शोध करने पर ही पूरी हो पाएगी, तब तक उत्तम स्‍वास्‍थ्‍य की चाह वाले अपना-अपना निष्‍कर्ष निकालने को स्‍वतंत्र हैं।

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यशवन्‍त कोठारी

86, लक्ष्‍मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर 302002 फोन 2670596

दोहे
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पहरे जबसे दे रहे, लोहे के इंसान।
राहजनी करने लगे,सड़कों के ईमान ।।


रहना मुश्किल है बहुत, छोड़ें कैसे गाँव।
छालों से लबरेज़ हैं नन्हें-नन्हें पाँव।।


पछुआ ऐसा कर गई ,धूल-धूसरित सोच।
कुर्ते की आभा गई,आँचल का संकोच।।


सेमल चुम्बन ले गया,खड़ा रहा कचनार ।
जींस पहन के गा रही,पुरवा मस्त मल्हार।।


बिन बरसे बदली गई,पड़ी न रंच फुहार।
घास ताकती रह गई ,मिलीं न बूँदें चार।।

महुआ टपके रात भर,खाते रहे सियार।
मस्ती में झूमा किए, सारे चौकीदार।।


बीच गाँव इज़्ज़त लुटी, भए विधाता बाम।
जमहाई लेते रहे ,सब हाकिम हुक्काम।।


सब पैसे की भूख में, लिखते रहे लिलार।
क्या देवी क्या देवता, बिकते बीच बज़ार।।

कौड़ी -कौड़ी पर जहाँ, बिकने को तैयार।।
कौन बड़ा -छोटा वहाँ, खोटा सब व्यापार।


ना नारद जी आए ही,   ना भेजे संदेश।
जब से भारत भूमि का,बदल गया गणवेश।।
                                                       

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कविता

बड़े होना जल्दी-जल्दी बेटा!
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अभी -अभी
देकर गई है दाई
यह खुशखबरी कि-
बेटा!
तुम आ गए हो
अपनी माँ के
आँसुओँ से भिगो-भिगो कर
छापे गए खुशबूदार फूलों वाले
गीले- गीले आँचल में
माँ से सुना है कि
तू घर भर में सुन्दरतम है
हो भी क्यों न
उसके बेटे का बेटा है जो
मैंने दाई को
छुप के कुछ देते हुए देखा है उसे
उसके आँचल के खूँट की ऐंठन
बता रही है उसकी चोरी


मैं,
पकड़ के हिला ही देता हूँ
माँ के दोनों कंधे
कबूल लेती है ममतामयी माँ
अपनी चोरी
खुशी की
कितना अच्छा लगेगा
कल को जब तुम काटोगे
अपनी चोर दँतियों से
जैसे,
मैं काटा करता था
कभी माँ को तो कभी बापू को


गीला कर देना बिस्तर
मैं सरक के सो लूँगा
और तुम्हारे नीचे कर दूँगा
सूखा-सूखा गरम बिछौना
गाहे-बगाहे, यही तो-
याद दिलाती रहती है मेरी माँ
तुझे तेरी माँ न भी दिलाए याद तो भी
याद रखना मेरे लाल!
माँ का क्या
गीली बहुत जल्दी हो जाती है
पर सूखती बहुत देर में है
बेटा! भिगोना मत कभी अपनी माँ को
पिता का क्या है
अव्वल तो वह भीगेगा ही नहीं
और भीग भी गया तो
माँ को गरिया के
झाड़ लेगा पल्ला
पर माँ मरते दम तक
नहीं झाड़ सकती अपना पल्लू
पड़ोसी का छोरा
जब चलाता है लात अपने बाप पर
और गरियाता है माँ को


मेरी माँ सहम जाती है
बाप के मरे बिना ही
जब विधवा हो जाती है
उसकी अधबयसू माँ
मेरी माँ भी
अपने माथे का सिंदूर
टटोलती है
तुम ऐसा मत करना कि
काँपे किसी पड़ोसी की माँ
माँ की कद्र ज़रूर करना बेटे!


बाप का क्या है लात खाकर भी
रह लेगा खुश
सह लेगा हज़ार दुख
धर लेगा बर्फ़ के शिलाखंड छाती पर
माँ, माँ फूट पड़ेगी
गंगोत्री की तरह
फिर,
फिर कौन सँभालेगा उसे
मैं कोई शंकर तो नहीं
जो भर लूँगा जटाओं में
बेटे!
बड़े होना जल्दी-जल्दी
पर, इतनी जल्दी भी नहीं कि
कि कुचल दो ममता की लता
और चला दो
पिता के वात्सल्य के बरगदी तने पर
तान-तान कर कुल्हाड़ा
बेटा इतनी तो रखना लाज
कि तुम्हारा बाप
जो काँप और काँख रहा था
अभी-अभी बारह बजे तक


दहक उठा है खुशी से उसका दिल
चहक उठा है उसका मन-पंछी
इस चहक को बनाए रखना मेरे लाल्
कभी सुनोगे तो जानोगे सच्चाई
कि न तो उसके पास कोई कंबल है न रजाई
फिर भी हिरनौटा-सा उछल रहा है
माह जनवरी है
और रात के बारह बजे हैं!
बेटा!


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दोहे


मरजादा याकउ नहीं, रहे हइँ जउ हम मानि।
का मनई भे फ़ाइदा, का कुतवा भए हानि।।


मनु मारे ते मानिहइ, अति चंचल सैतान।
जो काबू कइ लेइ ऊ, जीतइ सकल जहान।।


माने ते ममता बढ़इ, माने ते सम्मान।
माने ही ते बने हैं, पाथर भी भगवान।।


कोई काटइ राह तउ, लौटि काहे घर जाव।
ग्यान अउर अग्यान का, परखउ कुछु परभाव।।


बाढ़ आई तउ बूड़िगा, खेतु अउर खरिहानु।
कंगाली मा होइ गवा, हमरउ गील पिसानु।।


मनु मारे कुम्हल्याति हइ, मनु पाए बढ़ि जाय।
अजब प्रेम की बेलि या  , जब काटउ हरियाइ।।

द्वारे साधू देखि कइ, पट ना खोलेउ भाय।
ना जाने केहि भेस मा, रावनु घर घुसि जाय।।


या तउ कीन्हेन भूल हम, या कीन्हेन कुछु पापु ।
जेहि के कारन होइ गवा, लरिका हमरइ बापु।।


लरिकन खातिर धरति हउ, पेटु काटि जउ आजु।
बनि कइ दुखु द्याहैं बहुत ,कोढ़े मइका खाजु।।


पहिले रहइ सपूतु ऊ, का रजनी, परभात।
वहइ चलावइ लाग है, बात-बात पर लात।।


ना खाए ते कम परइ, ना भूखे भरि जाय।
पइसा- पइसा के बदे ,काहे तोबा-हाय।।


बाघु न तिनुका खाति हइ, हिरनु खाइ ना मासु।
मानुस, कुतवन, सुअरवनहिं, सब कुछु आवइ रासु।।

                                       -

पहेलियाँ

(1)

सारी बातें सुनकर सबकी,
पूरी चुगली खाता
फिर भी इसके बिना हमारा
काम नहीं चल पाता।
दुनिया भर से तार जुड़े हैं
बिना तार भी जाता।
भले हमारी जेब काटता
टूट न पाता नाता।।

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(2)

तोते को मैं प्यारी लगती
और सभी को लगती
रखते मेरा नाम जीभ पे
सौतन-दुनिया जलती
हरी,लाल के जोड़ विशेषण,
बनता सुंदर नाम
मेरे बिना रसोई कच्ची
सब्जी है बेकाम ।
अब तो यार! बताओ नाम।


(3)
आँख दिखाऊँ, आँख दिखाता
मुँह बिचकाऊँ, मुँह बिचकाता
सबकी नज़रें तोले डूब,
गूँगा है पर बोले खूब।
रूप दिखाए बिल्कुल सच्चा
निंदक इससे मिला न अच्छा।
अजब-गज़ब ये जिसके काम,
बच्चों! बताओ उसका नाम।
               (4)
सारी बातें सुनकर सबकी,
पूरी चुगली खाता
फिर भी इस के बिना हमारा
काम नहीं चल पाता।
दुनिया भर से तार जुड़े हैं
बिना तार भी जाता।
भले हमारी जेब काटता
टूट न पाता ।।


बाल कविताएं
जग से न्यारे दादा-दादी
जो भी माँगूँ उसे दिलाते
बड़े प्यार से बैठ खिलाते
पलकों पर हैं सदा बिठाते
मेरे प्यारे दादा-दादी।
कभी नाक के बाल उखाड़ें
कभी धड़ाधड़ थप्पड़ झाड़ें
कभी शर्ट की बटनें खोलें
हाथ डाल के जेब टटोलें
फिर भी खुश हैं दादा-दादी।
मेरे प्यारे दादा-दादी।
जब मम्मी मुझे सताती
दौड़ के दादी आगे आती
उनको जबरन पीछे करके
आँचल में है मुझे छिपाती।
मेरे प्यारे दादा-दादी।
इस दुनिया में जब तक वे हैं
हम बच्चों के बड़े मजे हैं
साथ हमारे ईश्वर! रखना
सौ वर्षों तक दादा-दादी।
ममता वाली साड़ी खादी।

मेरी प्यारी-प्यारी नानी
मेरी मम्मी की, मम्मी की
है कुछ अजब कहानी
किसी बात पर चिढ़ जाएं ,
तो,याद करा दें नानी।
मेरी प्यारी-प्यारी नानी।
संकेतों से पास बुलाके
बिना बात की बात बना के
थपकी दे-दे रोज़ सुनाएं
लोरी,कथा,कहानी।
मेरी प्यारी-प्यारी नानी।
उनको कोई बात बताना
भैंस के आगे बीन बजाना
किन्तु प्यार के दो बोलों से
हो जाएं पानी-पानी।
मेरी प्यारी-प्यारी नानी।
कभी लगें कविता की धारा
लगतीं कभी कहानी।
कभी-कभी चुटकुले सरीखी
फूटे मधुरिम बानी।
मेरी प्यारी-प्यारी नानी।
नानी के दो होंठ रसीले,
अमृत-से मधुमय औ गीले
बड़े प्यार से चुपके-चुपके
गालों पर लिख रहे कहानी।
मेरी प्यारी-प्यारी नानी।
----.

--डॉक्टर गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर'

Gauraiya

 

ओ गौरैया.....

ओ गौरैया
नहीं सुनी चहचहाहट तुम्हारी
इक अरसे से
ताक रहे ये नैन झरोखे
कुछ सूने और कुछ तरसे से।
फुदक फुदक के तुम्हारा
हौले से खिड़की पर आना,
जीवन का स्वर हर क्षण में
घोल निडर नभ में उड़ जाना।
धागे तिनके और फुनगियां
सपनों सी चुन चुन कर लाती,
उछलकूद कर इस धरती पर
अपना भी थी हक जतलाती।

खो गई तुम कहीं गौरेया

भौतिकता के अंध-जाल में

मानव के विकट स्वार्थ और

अतिवाद के मुख कराल में।
सिमट गई चिर्र-मिर्र तुम्हारी
मोबाइल के रिंग-टोन पर,
हँसता है अस्तित्व तुम्हारा
सभ्यता के निर्जीव मौन पर।

मोर-गिलहरी जो आंगन को
हरषाते थे सांझ-सकारे,
कंक्रीट के जंगल में हो गए
विलीन सभी अवशेष तुम्हारे।
तुलसी के चौरे से आंगन
हरा-भरा जो रहता था,
कुदरत के आंचल में मानव
हँसता भी था और रोता था।
भूल गये हम इस घरती पर
औरों का भी हक था बनता,
मानव बन पशु निर्दयी
मूक जीवों को क्यों हनता।

(The cheerful, gregarious house sparrows, once commonly seen flitting around the neighborhood, are in real trouble and are vanishing from the center of many cities and rural areas. Their recent decline has put them on the International Union for the Conservation of Nature (IUCN) Red List category)

प्रस्तुति : डॉ. राकेश शर्मा

डॉ. राकेश शर्मा

हिंदी अधिकारी

राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान

दोना पावला, गोवा-403004

लघुकथा

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अलाव

—डॉ. रामशंकर चंचल, झाबुआ

बरसाती सर्द रात, साँय—साँय करते वीरान जंगल, ऊँची पहाड़ियों पर बसी झोपड़ियों में निवास करते भोले—भाले आदिवासी। २५—३० झोपड़ियों का यह गाँव रोशन नगर कहलाता है। यद्यपि रोशनी के नाम पर इन सहृदय आदिवासियों ने सिर्फ चाँद—सूरज की रोशनी देखी है। पता नहीं क्या सोचकर वर्षौं से अँधेरे के श्राप में जी रहे इस गाँव का नाम रोशन नगर रख दिया? बरसाती सर्द रातों में कुछ खेतों में ही दिखाई देती है रोशनी।

वह रोशनी, जिसे जलाकर करते हैं सारी रात खेतों की रखवाली। वह अलाव (आग) उन्हें रोशनी भी देती है और ठंड से लड़ने का साहस भी। आज कड़कड़ाती ठंड से बचने के लिए मंगलिया ने अलाव जलाया और बैठ गया पास में अपना जिस्म गरमाने। दिनभर की मेहनत के बाद रात भर फिर जागना बहुत मुश्किल होता है। फिर भी मंगलिया बीड़ी जलाकर कुछ धुआँ उड़ाता, जैसे—तैसे नींद से लड़ रहा था। आखिर जब कुछ ज्यादा ही थकान महसूस की तो समीप रखी खटिया पर कुछ देर सुस्ताने के लिए लेट गया। पता नहीं कब नींद लग गई। इधर तूफानी हवा चली और अलाव की आग मंगलिया की झोपड़ी में लग गई। बस फिर क्या था। देखते ही देखते झोपड़ी भभक उठी, जिसे देख मंगलिया के बीवी—बच्चे चिल्लाने लगे।

शोर सुनकर मंगलिया की नींद में खलल पड़ी, वह उठा तो सामने देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसका घर जल रहा था। मंगलिया पागलों की तरह चिल्लाता हुआ दौड़ा, पर झोपड़ी आखिर कितना दम भरती। सब कुछ आग में भस्म हो गया। दिन—रात श्रम करके, मेहनत और ईमानदारी से बीवी—बच्चों का पोषण करने वाले सहृदय मंगलिया का सब कुछ स्वाहा हो गया था। अगले दिन वह काम पर जाने को तैयार था, फिर से झोपड़ी जो बसानी थी।

--

साभार - साप्ताहिक उपग्रह, रतलाम - दीपावली विशेषांक 2010

elderly people and their need

देश में बुजुर्गौं की बढ़ती संख्या और उनकी बढ़ती उपेक्षा

—डॉ. रामप्रताप गुप्ता, उज्जैन

समय के साथ—साथ चिकित्सा सुविधाओं और पोषण स्तर में बेहतरी के चलते देश की औसत आयु में वृद्धि होती जा रही है और इसी के साथ देश की आबादी में बुजुर्गौं (६० वर्ष या अधिक आयु वाले लोग) का प्रतिशत और उनकी संख्या भी बढ़ती जा रही है। सन् १९६१ में देश में बुजुर्गों की कुल संख्या २.४ करोड़ थी जो कि सन् १९८१ में ४.५ करोड़ और सन् २००१ में ७.७ करोड़ हो गई थी। इस समय उनकी संख्या १० करोड़ के लगभग होने का अनुमान है। अगर कुल आबादी में बुजुर्गौं के प्रतिशत पर नजर डालें तो यह १९६१ में ५.६३ प्रतिशत था जो कि सन् २००१ में बढ़कर ७.५ प्रतिशत हो गया। अर्थ यह हुआ कि देश की युवा और उत्पादक आबादी पर बुजुर्गौं की देखभाल का भार बढ़ता ही जा रहा है। उम्र के साथ शारीरिक और मानसिक असमर्थताएँ बढ़ती जाने से बुजुर्गौं की विशेष देखभाल की माँग रहती है। स्वास्थ्य संबंधी आँकड़े बताते हैं कि भारतीय बुजुर्गौं के २५—२७ प्रतिशत को दिखाई कम पड़ने लगता है, १२—१४ प्रतिशत को सुनाई कम देने लगता है। अनेक बुजुर्ग के लिए तो बढ़ती उम्र के साथ चलना—फिरना भी असंभव हो जाता है और वे बिस्तर पर पड़े रहने को बाध्य होते हैं। वे सम्पर्कजनित और जीवन शैली से संबंधित दोनों तरह की बीमारियों के भी अधिक शिकार होते हैं। ऐसे में उनकी देखभाल और उन्हें सुरक्षा देने की आवश्यकता बढ़ जाती है।

सन् १९७० तक हमारे यहाँ संयुक्त परिवार प्रणाली के चलते बुजुर्गौं की देखभाल कोई समस्या ही नहीं थी, बल्कि परिवार में उन्हें आदर और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। परिवार में उनकी उपस्थिति गौरव पूर्ण मानी जाती थी और उनकी समुचित देखभाल भी होती थी। अब समय के साथ संयुक्त परिवार प्रणाली विघटित होती जा रही है, युवा आबादी नौकरी और व्यवसाय के बेहतर अवसरों के फलस्वरूप शहरों की ओर जा रहे हैं और पीछे बुजुर्ग आबादी अकेले या दोनों पति—पत्नी ही रह जाते हैं। देश की ९० प्रतिशत से अधिक आबादी असंगठित क्षेत्र में कार्य करती है, जिनके रोजगार और आय चक्रीय और मौसमी उतार—चढ़ाव के शिकार होते हैं। ऐसे में ये अपनी वृद्धावस्था के लिए कुछ भी बचा कर नहीं रख पाते हैं। उनको प्राप्त निम्नस्तरीय मजदूरी से तो उनकी वर्तमान आवश्यकताएँ ही मुश्किल से पूरी हो पाती हैं। इस सारी पृष्ठभूमि में जब परिवार के युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर प्रवास कर जाते हैं और परिवार के बुजुर्गौं के लिए यदाकदा थोड़ी राशि ही भेजते हों तो उस स्थिति में बुजुर्गौं के लिए पेट की आग बुझाने के लिए मजदूरी करना बाध्यता बन जाती है, चाहे उससे उन्हें कितनी ही कम आय प्राप्त क्यों न होती हो। आजकल हर बड़े शहर में २—३ या अधिक स्थानों पर सब्जी, फल आदि के बाजार की तरह ही मजदूरों का बाजार भी लगता है, जहाँ वे रोजगार की तलाश में एकत्रित होते हैं, एकत्रित मजदूरों में बुजुर्गौं का प्रतिशत काफी अधिक होना भी इस बात का प्रमाण है कि देश में हमारे बुजुर्ग कितने असहाय, असुरक्षित हैं। संयुक्त परिवार प्रणाली के नष्ट हो जाने की प्रक्रिया ने उनकी असुरक्षा को और भी बढ़ा दिया है।

इस सारी पृष्ठभूमि में कल्याणकारी राजकीय व्यवस्था स्थापित करने का दावा करने वाली सरकार से देश के बुजुर्गों की सामाजिक सुरक्षा की अपेक्षा स्वाभाविक ही कही जावेगी परन्तु सरकार आजादी के पाँच दशक गुजर जाने के पश्चात ही राष्ट्रीय बुजुर्ग नीति की घोषणा कर सकी है। इस नीति के अंतर्गत बुजुर्गौं की सभी प्रकार की आवश्यकताओं को समाहित कर एक स्पष्ट कार्य योजना बनाई गई है। इस नीति के अंतर्गत बुजुर्गौं की देखभाल, उनके लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता, उनकी वित्तीय सुरक्षा आदि सरकार का दायित्व माना गया है। इतना सब होते हुए भी जमीनी स्तर पर ठोस कदमों की अपेक्षा आज भी अपेक्षा ही बनी हुई है। राज्य सरकारों ने गरीबी की रेखा के नीचे स्थित बुजुर्गौं के लिए तो वृद्धावस्था पेंशन की व्यवस्था तो की है, परन्तु अलग—अलग राज्यों में पेंशन की राशि भी अलग—अलग है। अपेक्षा है कि इस हेतु केन्द्र सरकार से जिस दर से पेंशन राशि प्राप्त होती है, राज्य सरकारें भी उतनी ही राशि उसमें मिलाकर वृद्धों को पेंशन देगी, परन्तु अनेक राज्य सरकारें केवल केन्द्र सरकार से प्राप्त पेंशन की राशि ही देती है, अन्य उसमें अलग—अलग दरों से राशि मिलाती हैं। इस वजह से देश के विभिन्न राज्यों में गरीबी की रेखा के नीचे स्थित बुजुर्गों को अलग—अलग दर से वृद्धावस्था पेंशन दी जा रही है। मध्यप्रदेश भी उन राज्यों में से एक है जो वृद्ध लोगों को केवल केन्द्र सरकार से प्राप्त राशि के बराबर ही पेंशन देता है। सबसे बड़ी समस्या तो यह है कि अनेक गरीब बुजुर्ग तो गरीबी रेखा के नीचे स्थित लोगों की सूची में शामिल ही नहीं हो पाते हैं जबकि अन्य बेहतर आर्थिक स्थिति वाले लोग भी उसमें शामिल कर लिए जाते हैं। अतः देश के आर्थिक सुरक्षा की आवश्यकता वाले बुजुर्गौं को आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर दी गई है, यह नहीं कहा जा सकता है।

आर्थिक सुरक्षा के पश्चात बुजुर्गौं की सबसे बड़ी आवश्यकता समुचित, पर्याप्त और सहज पहुँच वाली स्वास्थ्य सुविधाओं की है। सन् २००१ के सर्वे के अनुसार देश के दो—तिहाई बुजुर्ग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, उनमें से अधिकांश अशिक्षित हैं और उनमें से ९० प्रतिशत से अधिक के असंगठित क्षेत्र में कार्यरत रहने से वृद्धावस्था में किसी तरह की पेंशन आदि भी नहीं मिलती है और उन्हें पर्याप्त, संतुलित पोषण भी नहीं मिल पाता है। ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं के लगभग पूर्ण अभाव होने तथा आर्थिक संसाधनों के अभाव में इनके लिए महँगी, पहुँच से दूर आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएँ प्राप्त करना भी संभव नहीं होता है। राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के परिणाम बताते हैं कि १८—२० प्रतिशत वृद्ध तो ऐसे होते हैं जिन्हें अपने आखरी समय में समुचित चिकित्सा सुविधाएँ भी प्राप्त नहीं हो पाती हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं से सर्वाधिक वंचितों की तलाश की जाए तो बुजुर्गौं का, विशेषकर बुजुर्ग महिलाओं का नाम सबसे ऊपर होगा। स्वास्थ्य बीमा भी अभी तक बुजुर्ग महिलाओं एवं पुरुषों से दूर ही रहा है।

अंत में हमें हमारे बुजुर्गौं को भार स्वरूप लेने के स्थान पर उन्हें अनुभवों के खजाने के रूप में लेना होगा। उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने तथा परिवार के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जैसे—जैसे वे अपने जीवन के संध्याकाल की दिशा में बढ़ते जाते हैं, उनकी आय अर्जित करने की क्षमता कम होती जाती है, उनकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ बढ़ जाती हैं। शारीरिक असमर्थताएँ बढ़ती जाती हैं और वे परिवार के सदस्यों पर दिनोंदिन अधिक निर्भर होते जाते हैं। तमाम तरह की असमर्थताओं को जन्म देने वाली उनकी वृद्धावस्था परिवार एवं समाज को ऐसा अवसर प्रदान करती है कि समाज उनके ऋण को वापिस चुका सकता है। जहाँ परिवार को उनकी समुचित देखभाल करना ही चाहिए, उन्हें बोझ ना समझते हुए उनके अनुभवों का लाभ लेना चाहिए एवं समाज को उनके लिए समुचित स्वास्थ्य सुविधाओं को उपलब्ध कराना चाहिए। अनेक वृद्ध बढ़ती आयु के साथ स्मृति विनाश पार्किन्संस बीमारी जिसमें वे अपने शरीर पर नियंत्रण खो देते हैं, जैसी गंभीर बीमारियों के शिकार हो जाते हैं और उन्हें विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है जो कुछ परिवारों के लिए प्रदान करना संभव नहीं होता है। सरकार को ऐसे बुजुर्गों के लिए देखभाल की विशेष व्यवस्था करना चाहिए। बदलती सामाजिक परिस्थितियों में बुजुर्गौं की आर्थिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं की पूर्ति जैसे कार्यों को सरकारों को अपने मूलभूत दायित्वों में शामिल करना होगा। हर वर्ष हम २१ सितम्बर को ‘एल्जाइमर्स’ डे स्मृति विनाश रोगियों के दिवस के रूप में मनाते हैं, इसको हमें विस्तृत स्वरूप देकर बुजुर्ग दिवस के रूप में मनाना चाहिए, बुजुर्गौं के लिए चिकित्सा शिविरों का आयोजन करना चाहिए, इस तरह के शिविर ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से आयोजित करना चाहिए, इनमें महिला बुजुर्गौं की उपस्थिति अधिक से अधिक हो सके, इस हेतु प्रयास करना चाहिए, क्योंकि अनेक सर्वेक्षणों के माध्यम से यह ज्ञात हुआ है कि महिला बुजुर्गौं की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं की अधिक उपेक्षा होती है।

--

साभार - साप्ताहिक उपग्रह - रतलाम, दीपावली विशेषांक 2010.

लघुकहानी

हासिल

— डॉ. जयकुमार जलज, रतलाम

उस तरफ नाला और उजाड़ मैदान होने से गली बंद हो गई थी। लोगों ने काँटेदार तार लगाकर उसे और भी बंद कर लिया था। दोनों तरफ बने मकानों के लिए अब वह एक आँगन जैसी थी। खेलकूद, सगाई, मुंडन जैसे कार्य उसी में हो लेते थे। आबादी अधिक नहीं थी। पर उच्च, मध्यम और साधारण आय वर्ग के कई परिवार रहते थे। एक तरफ एक बड़ा सरकारी दफ्तर, दूसरी तरफ एक कारखाना होने से भी गली अपने में ही सौहार्द्रपूर्वक सिमटी हुई थी। रहवासियों के दैनिक सरोकारों को बाहर निकलने के कम ही अवसर थे। बच्चे मिलकर खेलते। मिलकर स्कूल जाते। त्यौहारों पर अपनत्व और बढ़ जाता। दिवाली के दूसरे दिन सुबह से ही एक — दूसरे के यहाँ पकवान पहुँचाए जाते।

किराए के छोटे से मकान में उस परिवार को आए अधिक दिन नहीं हुए थे। गली में यह उसकी पहली दिवाली थी। पकवानों के आदान—प्रदान में शामिल होना ही था। पहला मौका और उम्र में अपेक्षाकृत छोटे होने से उसके तीनों बच्चों में बेहद उत्साह था। माँ को जरूर डर था, कहीं बच्चों की नीयत बिगड़ गई । कहीं प्लेट लाते— ले जाते वे उस पर हाथ साफ कर बैठे। नया मुहल्ला, क्या मुँह दिखाएगी ? सो रात को खाए घर के पकवान अभी हजम भी नहीं हुए थे कि उसने उन्हें और खिलाकर ही बाहर भेजा।

आंटियाँ अधिकतर इन्हीं बच्चों को आवाज देने लगीं। एक घर में प्लेट पहुँचाते, वहाँ से उसकी प्लेट लेकर निकलते कि किसी और घर से आवाज लगती। ये दौड़े जाते। जिस घर में प्लेट आती उस घर की आंटी उसकी

सामग्री में कुछ घटातीं, बढ़ातीं, बदलतीं। कभी अंकल से पूछतीं। कभी अंकल खुद ही हस्तक्षेप करते। इस प्रकार किसी अन्य के यहाँ भेजने के लिए उस घर की प्लेट तैयार हो जाती। बच्चे उसे यथाघर पहुँचाने के लिए दौड़ पड़ते। कब पहले घर के कुछ पकवान दूसरे घर, दूसरे के तीसरे, तीसरे के चौथे, चौथे के फिर पहले घर आ पहुँचे, पता ही नहीं चला। प्लेट्स को निर्देशानुसार पहुँचाते रहकर बच्चे घर लौटे तो सूरज सिर पर आ गया था।

माँ ने ज्यादा ही पकवान बनाए थे। अब भी आधा भगौना भरा पड़ा था। लेकिन बच्चे उनकी तरफ देखना भी नहीं चाहते थे। उन्हें तो धनी परिवारों के पकवानों का इंतजार था। प्लेटों को लाते—ले जाते उनकी सुगंध उनके नथनों में समा चुकी थी। मुँह में आते पानी को रोकना मुश्किल हो रहा था। वे उन पकवानों की तरफ बढ़े जो विनिमय के तहत उनके रसोईघर में जमा हो गए थे। दोनों बेटियाँ उन्हें अलग—अलग छाँटने लगीं। बेटा झपट्टा मारने के मूड़ में टकटकी लगाए खड़ा था।

पर यह क्या ? इनमें से कुछ तो उन्हीं के पकवान हैं। जो उनके नहीं हैं वे भी उन्हीं के पकवानों की तरह हैं। बच्चे रूआँसे हो आए। मायूसी में दीवार से टिककर जा बैठे। माँ के लिए यह पहला मौका नहीं था जब उसने देखा कि सिर्फ पानी ही नहीं और भी बहुत कुछ अपनी सतह ढूँढता है। फिर भी बच्चों का सामना करने की हिम्मत वह नहीं जुटा पाई। उसे उनके फैले हुए थके पैर दिखाई देते रहे।

--

साभार - साप्ताहिक उपग्रह - रतलाम, दीपावली विशेषांक.

हम गधे हैं.

हमारे देश आकर

सबके उल्लू सधे हैं,

हाँ ,जी ,हाँ !हम गधे हैं.

 

'अंकल सैम'भी आयें

अपना व्यापार बढ़ाएं

जबतक W T C नहीं गिरा था

आतंकवाद पर कुछ कह नहीं पायें

यहाँ आकर सबने सिर्फ

मीठे-मीठे भाषण पढ़े हैं.

हाँ ,जी,हाँ! हम गधे हैं.

 

तुम भी आओ,! जिआबाओ

अपनी डिप्लोमेसी दिखलाओ.

बिना कुछ ठोस वादा किये

१०० अरब तक व्यापार बढाओ .

हम पर तो 'अतिथि देवो भव;'के

कब से नशे चढ़े हैं.

हाँ ,जी ,हाँ!हम गधे हैं.

 

एक staple वीसा का तो

मसला अब तक हल हुआ नहीं

उनके होठों पर इस देश की खातिर

रहती है कभी दुआ नहीं.

शह देना हो या शस्त्र-नाभकिये

दुश्मन को तो भरपूर दिए

इनकी शह पर ही तो

दुश्मनों के हौसले बढे हैं.

हाँ,जी,हाँ! हम गधे हैं.

 

छीनी जिसने हजारों मील जमीन

भूल गए ,यह वही है चीन

इसने ही मानचित्र पे गलत

कश्मीर के नक़्शे गढ़े हैं

हाँ,जी,हाँ! हम गधे हैं

 

'६५' के आक्रमण की जिम्मेवारी

हमारे सर पर मढ़े हैं.

हाँ,जी हाँ!हम गधे हैं.

 

हे! निति-निर्धारक नेतागण

गाँठ बाँध लो अपने मन

जिसने इस पर विश्वास किया--

उसके आगे बस गड्ढे हैं.

हाँ,जी,हाँ! हम गधे हैं.

.--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,btps
vijayvermavijay560@gmail.com


भ्रष्ट तंत्र को मार भगाओ

सड़क सड़क पर
गिट्टी गिट्टी
गली गली में
मिट्टी मिट्टी
देखो मेरे गाँव में आकर
नहीं एक भी सड़क है पक्की|

नेता आते
वोट माँगते
सौ सौ वाले
नोट बाँटते
हाथ जोड़कर कहते सबसे
मेरी जीत करोजी पक्की|

दारु लाते
मुर्गा लाते
ग्राम प्रमुख को
खूब पटाते
घर घर जा सबको ललचाता
ग्राम प्रमुख है बड़ा मदक्की|

सड़क फंड का
पैसा आता
सरकारी कुनबा
खा जाता
भरे पेट भूखों के कारण
सड़क पड़ी वैसी ही कच्ची|

ग्राम प्रमुख भी
बतलाता है
मंत्री तक
हिस्सा जाता है
लोकतंत्र के मंत्री देखो
हैं पाखंडी ढोंगी झक्की|

बच्चों तुम
तलवार उठाओ
भ्रष्ट तंत्र को
मार भगाओ
उन्हें हटा दो अब कुर्सी से
जो सरकारें चोर उचक्की|

 

---

चलो सब मिलकर काम करें

मुक्तक पंड्या कक्षा 8


चलो सब मिलकर काम करें।

पेड़ लगाकर तापमान का काम तमाम करें!!
ओज़ोन परत हो रही क्षीण

औ’बढ़ा रही है गर्मी

पेड़ लगाकर तापमान में

ले आयें हम नरमी
“ग्लोबल वॉर्मिंग” के दानव का काम तमाम करें

चलो सब मिलकर काम करें!!

 

“एसिड वर्षा” नें कर डाला

वनस्पति का नाश

नाइट्रिक एसिड से

होता है जीवों का विनाश

“एसिड वर्षा” खत्म करें, आराम-हराम करें!

चलो सब मिलकर काम करें!!

आग जंगलों में सुलगी तो

co2 निकलेगी

”ग्रीन हाउस” के प्रभाव से

यह धरती मचलेगी

“ग्रीन हाउस” की वायु पर पूर्ण-विराम करें!

चलो सब मिलकर काम करें!!
”ग्लोबल वॉर्मिंग” शुरू रहा तो

हिम नदियाँ पिघलेगीं
सागर तट के जन जीवन को

झटपट वे निगलेगीं


तापमान कम हो, प्रयास हम आठों याम करें!

चलो सब मिलकर काम करें!!

हर बीमारी का इलाज है

शुद्ध हवा औ’ पानी

कर न सकेगी यों कोई भी

बीमारी मनमानी
फैले नहीं प्रदूषण ऐसे काम प्रकाम करें

चलो सब मिलकर काम करें!!

धरती माँ का आँचल कर दें

हरा-भरा धानी-धानी

पेड़ लगाकर ले आयें

रेगिस्तानों में पानी
दोस्त बनें हम धरती माँ के उन्हें प्रणाम करें

चलो सब मिलकर काम करें!!

 

मुक्तक पंड्या
कक्षा 8 जवाहर नवोदय विद्यालय वेजलपुर गुजरात

---

nat-23

नटों के लिए नहीं आया फरमान,

अधूरे रह गये बस सभी अरमान,

खेल प्रतिभा को नहीं मिली पहचान,

जिन्‍दगी ठोकर खाने को हलकान,

किलों की फतह के लिए सेंधमारी,

चस्‍पा ताजिन्‍दगी की बनी लाचारी,

पेचीदगी भरा कला बाजी का खेल,

सामंती सोच से नहीं खा पाया मेल,

जो नहीं थे खेल में कभी शामिल,

उन्‍हें सुविधा के लिए माना काबिल॥

--

surender agnihotri (Custom)

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री

राजसदन-120/132 बेलदारीलेन, लालबाग, लखनऊ

गीत

जाने कितनी छवियों से

 

जाने कितनी छवियों से
संपृक्त लगी हो तुम!
गरम थपेड़ों में तुम मुझको
शीतल हवा लगीं,
रोगग्रस्त जब हुआ, मुझे तुम
मीठी दवा लगीं,
अंधकार में एक दिये-सी
जलती मुझे दिखीं,
दुर्निवार में आशाओं-सी
पलती मुझे दिखीं।
निस्पृह-सी तुम दिखीं
कभी आसक्त लगी हो तुम।

अगर भूलकर भी रोया तो
माँ-सा पुचकारा,
लिया सँभाल मुझे वामा-सा,
अगर कभी हारा,
कभी सुता-सी जिद कर तुमने
मन में मोद भरा,
और बहन-सा नेह लुटाया,
जब भी हृदय डरा।
संबंधों को जीने में
अभ्यस्त लगी हो तुम।

कभी प्रभाती लगीं मुझे
तुम लोरी कभी लगीं,
कच्ची होकर भी दृढ़,
ऐसी डोरी मुझे लगीं।
प्रीति-खजाना जिससे खाली
होगा नहीं कभी,
ना जाने क्यों ऐसी
भरी तिजोरी मुझे लगीं।
मनचाही रेखाओं वाला
हस्त लगी हो तुम!

रसभीनी मुरली, अमृत की
गागर कभी लगीं,
कभी लगीं आकाश सरीखी,
सागर कभी लगीं।
मगहर में वृंदावन का
अनुमान लगी हो तुम
थकती श्वासों में प्राणों का
दान लगी हो तुम।
देवी जैसी दिखीं, तो कभी
भक्त लगी हो तुम।

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e-mail - dr.nagesh.pandey.sanjay@gmail.com
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डॉ. नागेश पांडेय "संजय"
शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश (भारत) - 242001.

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