गुरुवार, 20 जनवरी 2011

प्रमोद भार्गव का कहानी संग्रह - मुक्त होती औरत (9) : किराएदारिन

(पिछले अंक में प्रकाशित कहानी 'कहानी विधायक विद्याधर शर्मा की' से जारी...)

मुक्‍त होती औरत

 

pramod bhargava new

प्रमोद भार्गव

प्रकाशक

प्रकाशन संस्‍थान

4268. अंसारी रोड, दरियागंज

नयी दिल्‍ली-110002

मूल्‍य : 250.00 रुपये

प्रथम संस्‍करण : सन्‌ 2011

ISBN NO. 978-81-7714-291-4

आवरण : जगमोहन सिंह रावत

शब्‍द-संयोजन : कम्‍प्‍यूटेक सिस्‍टम, दिल्‍ली-110032

मुद्रक : बी. के. ऑफसेट, दिल्‍ली-110032

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जीवनसंगिनी...

आभा भार्गव को

जिसकी आभा से

मेरी चमक प्रदीप्‍त है...!

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प्रमोद भार्गव

जन्‍म 15 अगस्‍त, 1956, ग्राम अटलपुर, जिला-शिवपुरी (म.प्र.)

शिक्षा - स्‍नातकोत्तर (हिन्‍दी साहित्‍य)

रुचियाँ - लेखन, पत्रकारिता, पर्यटन, पर्यावरण, वन्‍य जीवन तथा इतिहास एवं पुरातत्त्वीय विषयों के अध्‍ययन में विशेष रुचि।

प्रकाशन प्‍यास भर पानी (उपन्‍यास), पहचाने हुए अजनबी, शपथ-पत्र एवं लौटते हुए (कहानी संग्रह), शहीद बालक (बाल उपन्‍यास); अनेक लेख एवं कहानियाँ प्रकाशित।

सम्‍मान 1. म.प्र. लेखक संघ, भोपाल द्वारा वर्ष 2008 का बाल साहित्‍य के क्षेत्र में चन्‍द्रप्रकाश जायसवाल सम्‍मान; 2. ग्‍वालियर साहित्‍य अकादमी द्वारा साहित्‍य एवं पत्रकारिता के लिए डॉ. धर्मवीर भारती सम्‍मान; 3. भवभूति शोध संस्‍थान डबरा (ग्‍वालियर) द्वारा ‘भवभूति अलंकरण'; 4. म.प्र. स्‍वतन्‍त्रता सेनानी उत्तराधिकारी संगठन भोपाल द्वारा ‘सेवा सिन्‍धु सम्‍मान'; 5. म.प्र. हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन, इकाई कोलारस (शिवपुरी) साहित्‍य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में दीर्घकालिक सेवाओं के लिए सम्‍मानित।

अनुभवजन सत्ता की शुरुआत से 2003 तक शिवपुरी जिला संवाददाता। नयी दुनिया ग्‍वालियर में 1 वर्ष ब्यूरो प्रमुख शिवपुरी। उत्तर साक्षरता अभियान में दो वर्ष निदेशक के पद पर।

सम्‍प्रति - जिला संवाददाता आज तक (टी.वी. समाचार चैनल) सम्‍पादक - शब्‍दिता संवाद सेवा, शिवपुरी।

पता शब्‍दार्थ, 49, श्रीराम कॉलोनी, शिवपुरी (मप्र)

दूरभाष 07492-232007, 233882, 9425488224

ई-सम्पर्क : pramod.bhargava15@gmail.com

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अनुक्रम

मुक्‍त होती औरत

पिता का मरना

दहशत

सती का ‘सत'

इन्‍तजार करती माँ

नकटू

गंगा बटाईदार

कहानी विधायक विद्याधर शर्मा की

किरायेदारिन

मुखबिर

भूतड़ी अमावस्‍या

शंका

छल

जूली

परखनली का आदमी

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कहानी

किरायेदारिन

अचानक मेरा ट्रान्‍सफर हो जाएगा यह उम्‍मीद मुझे कतई नहीं थी। राजनीतिज्ञों की पैंतरेबाजी कब राजधानी में बैठे हुए दुलत्ती दे मारे कोई पता नहीं। नेताओं की जी-हुजूरी, चापलूसी करके ट्रान्‍सफर कैंसिल कराना मेरे लिए सम्‍भव नहीं था। अतः चार्ज आदि देकर मैंने अपना सामान पैक किया और ऑफिस से अन्‍तिम विदा ले ली।

नये स्‍थान शिवपुरी का प्रवेश ही हृदयस्‍पर्शी था। कार्यालय में ज्‍वाइन होने के बाद मैंने शहर के सारे प्राकृतिक व दर्शनीय स्‍थल घूम डाले। बहुत सन्‍तोषप्रद लगा यह शहर। मौसम की अनुकूलता पाकर मैं यहाँ बहुत कुछ पढ़-लिख सकता था।

कार्यालय के सहकर्मियों ने ही एक बड़े से मकान में कमरा दिला दिया। मकान में और भी कई किरायेदार थे। किन्‍तु मेरा कमरा एक तरह से स्‍वतन्‍त्र था। मुख्‍य मार्ग पर कमरे का दरवाजा होने की वजह से मैं कभी भी रात-बिरात आ-जा सकता था।

रात को कुछ ज्‍यादा पढ़ा नहीं, वैसे ही पत्रिका के पन्‍ने पलटता रहा और साहित्‍यिक गतिविधियों की खबरें पढ़कर जल्‍दी सो गया। एकाएक चिल्‍ल-पों सुनकर नींद उचट गई। कई दिनों बाद गहरी नींद आई थी। ध्‍यान से अनुमान लगाने के बाद अन्‍दाज हुआ कि इसी मकान के आँगन से किसी महिला का स्‍वर गुर्रा रहा है। घड़ी में समय देखा, पाँच बज रहे थे। बाहर झाँककर देखा, गहरा अँधेरा शनैः-शनैः छँट रहा था। सर्द हवा चल रही थी। किवाड़ खोलकर आँगन में पहुँच गया। गैलरी का शटर सुबह चार बजे खुल जाता था और रात को ग्‍यारह बजे बन्‍द होता था। ये सब बातें मुझे मकान मालिक, जो कर्मकाण्‍डी ब्राह्मण थे, ने बताई थीं। वे सुबह नियमित रूप से बारह महीने उठकर मन्‍दिर पर जाकर पूजा-पाठ करते थे। मांस-मदिरा पी-खाकर आना या मकान में पीना-खाना सख्‍त वर्जित था। इसलिए वे अव्‍वल तो किसी सिंगल मेन को मकान देते ही नहीं थे, फिर भी निकटतम व्‍यक्‍ति की सिफारिश आने पर देते, तो तमाम शर्तों से भरे किरायेनामा पर दस रुपये के रेवेन्‍यू स्‍टैम्‍प चिपकाकर हस्‍ताक्षर करा लेते। रुपये भी अग्रिम किराए के साथ वसूल लेते।

आँगन में पहुँचकर मैं सन्‍न रह गया। मकान की ही एक किरायेदारिन अपने कमरे के द्वार पर खड़ी थी। किसी महिला पुलिस की तरह तैनात, सतर्क। उसके सामने तीन नादान बच्‍चे थे, दो लड़के और एक लड़की। सबसे बड़ा लड़का था, जो बारह वर्ष का रहा होगा, फिर लड़की लगभग नौ-दस वर्ष की, फिर लड़का सातेक साल का। तीनों बच्‍चों को सख्‍त हिदायतें देती हुई वह पुलिसनुमा औरत यातना दे रही थी। हालाँकि उसके सम्‍बोधन और सन्‍दर्भ से मैं यह भाँप गया था कि वह औरत इन बच्‍चों की माँ है और यह अपनी नजर में बच्‍चों को यातना नहीं दे रही बल्‍कि ठीक रास्‍ते पर लाने के लिए डाँट रही है, दण्‍ड दे रही है। लेकिन मेरी दृष्‍टि में यह बर्ताव जुल्‍म था, बर्बरता थी, चाहे वह माँ द्वारा अपनी सन्‍तानों पर ही क्‍यों न किया जा रहा हो।

बड़ा लड़का आँगन में कपड़े से रगड़-रगड़कर पोंछा लगा रहा था। छोटा लड़का नल से पानी ला-लाकर आँगन में डाल रहा था और लड़की आँगन के एक कोने से सिमटी राख से मल-मलकर बरतन माँज रही थी। वह औरत - उसकी आँखों में लाल-पीला गुस्‍सा था। डाँट पिलाते-पिलाते बीच-बीच में एक क्षण के लिए सख्‍ती से दाँत भींच लेती थी, जैसे कच्‍चे मांस को चबाने की असफल कोशिश कर रही हो। बार-बार यान्‍त्रिक तरीके से उसके हाथ हवा में उछल-उछलकर विचित्र संकेत दर्शाने लगते, ‘‘तुम समझते क्‍या हो? जितना तुम मुझे परेशान करोगे उतना ही मैं तुम्‍हारी हड्‌डी-पसली तोड़ दूँगी। खा-खा के साँड़ हुए जा रहे हैं। धुआँलगे, जब अपना कमाओगे-खाओगे तब पता लगेगा, बेटों दाल-रोटी का भाव। जाओ निकलो घर से, होटल में नौकरी-चाकरी करो, कप-प्‍लेट धोओ...हमें कोई मतलब नहीं है तुमसे...? न तुम हमारे बेटे...! न हम तुम्‍हारी माँ! तुम कल बगैर पूछे पिक्‍चर गए तो कैसे गए?''

और उसने लपककर दोनों लड़कों को दो-दो थप्‍पड़ जड़ दिए। इस बीच एक क्षण मैंने सोचा कि मैं बीच-बचाव करूँ। पर मुझे इस मुँहफट औरत पर एकाएक विश्‍वास नहीं हुआ, गोया वह मुझसे ही अनर्गल बोल देती तो मैं क्‍या कर लेता।

अब लड़की की बारी आई...‘‘और तू राँड़ कल के बासन-बर्तन अब साफ कर रही है...! रात में जूठे बर्तन नहीं माँजने पर पाप लगता है, पाप! बासन ऐसे श्राप देंगे कि तू कण्‍डा (गोबर) पे कढ़ी धरे फिरेगी। खसम के यहाँ जाके ऐसेई नाम निकालेगी...! तोय का है सास-ससुर तो मुझे नाम रखेंगे। पूरे समाज में मेरी नाक कटाएगी, नकचढ़ी?''

उसके लम्‍बे-लम्‍बे बेहूदे संवाद लगभग एक घण्‍टे तक चलते रहे। अपनी ही सन्‍तान को बददुआ देकर कौन-सी कारगर सिद्धि प्राप्‍त होनेवाली थी, मैं नहीं समझ पा रहा था। मेरे सोच के स्‍तर पर उस सख्‍त औरत की डाँट-पिटाई बच्‍चों को ढीठ, हठी और बेशरम बना रही थी। शायद यही कारण था कि बच्‍चे क्रमशः बिगड़ते चले जा रहे थे।

मैं आँगन से आकर कम्‍बल ओढ़ उस औरत एवं उसके बच्‍चों के बारे में सोच-विचार करता पुनः सो गया।

शाम को कार्यालय से मुक्‍त होकर, निकला तो पानी बरस रहा था। सर्द-बर्फीली हवा चल रही थी। पान की दुकान पर सिगरेट लेने पहुँचा तो पता लगा ग्‍वालियर, इन्‍दौर, उज्‍जैन सम्‍भाग के सभी जिलों में भयंकर ओलावृष्‍टि हुई है। खेतों में ओलों की चादर-सी बिछ गई है। सारी फसल चौपट हो गई है। किसानों की सब उम्‍मीदों पर तुषारापात हुआ है। वर्षा मन्‍दी पड़ गई थी। बूँदाबाँदी शेष थी। सिगरेट जलाकर मैं कमरे की ओर चल दिया। मकान पर पहुँचकर देखा सारी कॉलोनी की बिजली गोल है। मेरे पास मोमबत्ती भी नहीं थी। कुछ व्‍यवस्‍था करने के लिए आँगन में पहुँचा। सारे मकान में सन्‍नाटा था। पर वह औरत अजीब बदहवासी एवं चिन्‍ता की हालत में मुझे देखकर बोली, ‘‘भाई साहब, आपने देखा मेरा छोटा लड़का?''

‘‘नहीं तो! कहाँ चला गया?''

‘‘मालूम नहीं...! पर्स में से तीस रुपये चुराकर दोपहर बारह बजे से गायब है...! अब तो शो भी खत्‍म हो गया होगा...? राम जाने कहाँ गया? मौसम भी ऐसा हो रहा है कि खोजूँ भी तो कहाँ खोजूँ...? हे राम!'

‘‘चौराहे वाली फिल्‍म तो छूट गई, मैं भी फिल्‍म देखने गया था। वह तो मुझे कहीं दिखा नहीं।''

‘‘मम्‍मी तुम तो यूँ ही परेशान हो रही हो उसने तीनों शो पिक्‍चर देखी होगी और अब आता ही होगा।'' बड़ा लड़का बोला था।

‘‘तू क्‍या जाने? यहाँ तो जी में से प्राण निकलने को हो रहे हैं। तुम क्‍या जानो माँ की ममता! तुम तो प्राण खाने पर तुले हो...? ला रानी छतरी दे, मैं ही उसे देखने जाती हूँ।''

उसकी लड़की का नाम शायद रानी ही था। वह छतरी लेने कमरे में घुस गई। पुलिसनुमा औरत की भावना इस समय करुणा और क्रोध के बीच बह रही थी। औरतपन की लाचारी उसकी आँखों में द्रष्‍टव्‍य थी। ऐसा लगा जैसे वह मुझसे कोई आग्रह करना चाहती हो। पर मेरे प्रति विश्‍वास निश्‍चित न होने के कारण टाल रही हो। जब वह छतरी लेकर चलने लगी तो मैं बोला, ‘‘आप रहने दीजिए। ऐसे खराब मौसम में आपका घर से बाहर निकलना ठीक नहीं। आप मुझे बताएँ, वह कहाँ मिल सकता है, मैं देख आता हूँ...।''

छतरी मेरे हाथ में पकड़ाते वक्‍त उसने मेरे प्रति किसी प्रकार की औपचारिकता अथवा सद्‌भावना प्रगट नहीं की, वह चुपचाप खड़ी रही जैसे मेरे प्रति उसका यही पूर्वग्रह हो।

बूँदाबाँदी अब भी जारी थी। मैंने छतरी तान ली थी। बस स्‍टैण्‍ड नजदीक ही था। वहाँ उसे कुछ देर खोजता रहा। इसी बीच बिजली भी आ गई। मैंने राहत की साँस ली। उसके लड़के को मैंने बहुत ढूँढ़ने की कोशिश की लेकिन मैं असफल रहा। जब मुझे विश्‍वास हो गया कि वह बस स्‍टैण्‍ड परिसर में नहीं है तो बैंक की ओर चल दिया। चलते वक्‍त मैंने एक सिगरेट और माचिस भी खरीदकर जेब में डाल ली थी। एक सिगरेट जलाकर मुँह में भी लगा ली।

वह पुलिसनुमा औरत बैंक में चपरासिन थी। लिहाजा उसे आशा थी कि शायद उसका लड़का शो छूटने के बाद बैंक के बरामदे में कहीं छुप गया हो। बैंक पहुँचने पर निराशा ही हाथ लगी। कई बार माचिस की तीलियाँ जलाकर मैंने उसे देखा�बरामदे के कोने में दो कुत्ते पड़े हुए थे और बीच बरामदे में एक साँड़ और एक गाय खड़े थे। चौकीदार वगैरह कहीं नजर नहीं आए।

बैंक से लौटकर मकान के निकट पहुँचा तो ऐसा लगा जैसे छज्‍जे के नीचे कोई बच्‍चा-आकृति हिल-डुल रही है। छज्‍जे के नीचे से गन्‍दे पानी की नाली बहती थी। नाली के ऊपर लगभग एक फुट चौड़ी पट्‌टी थी जिस पर मैंने आज सुबह ही एक सूअर को आराम फरमाते देखा था। पर वह आकृति जो मैं देख रहा था, सूअर की नहीं हो सकती थी? हालाँकि सूअर अथवा बच्‍चा गुड़ी-मुड़ी होकर लेट जाएँ तो अँधेरे में पहचानना मुश्‍किल ही है।

छज्‍जे के निकट पहुँच, झुककर मैंने माचिस की तीली जलाकर देखा, वह पुलिसनुमा औरत का लड़का ही था। मुझे देखकर वह सिटपिटा गया था। उसकी आँखों में माँ द्वारा पीटे जाने का भय स्‍पष्‍ट दिखाई दे रहा था। मैंने आवाज दी, ‘‘रानी...।''

वह औरत और उसके दोनों बच्‍चे तुरन्‍त दौड़े आए।

‘‘मिला, भाई साहब!'' औरत बोली।

‘‘यह छुपा है, छज्‍जे के नीचे।''

उसकी भावना एकपक्षीय हो गई, तत्‍काल! पुलसिया क्रोध उसके शरीर में उमड़ आया। उसने हाथ बढ़ाकर छज्‍जे के नीचे से लड़के को खींचा और दूसरे हाथ में छतरी पकड़ के दनादन चाबुक की तरह उसे मारने लगी, ‘‘अब करेगा चोरी...! और जाएगा पिक्‍चर? नाक में दम कर रखा है। मुँह में कौर देना मुश्‍किल कर रखा है...। आज तेरी हड्‌डी-पसली तोड़ के एक नहीं की तो मैं भी अपने बाप की औलाद नहीं...''

वह लड़का अजीब तरह से छटपटा रहा था और माँ से क्षमा की गुहार लगाए जा रहा था, ‘‘छोड़ दो मम्‍मी...! अब कभी चोरी नहीं करूँगा...पिक्‍चर नहीं जाऊँगा। तुम्‍हारे हाथ जोड़ता हूँ...पैर पड़ता हूँ...बस मम्‍मी अब और मत मारो मर जाऊँगा...।''

उसका आर्तनाद मुझसे देखा नहीं गया। बीच-बचाव करते हुए मैं बोला, ‘‘अब रहने भी दीजिए। बहुत हो गया। बच्‍चे हैं, बच्‍चों से भूल हो ही जाती है।''

उसने मेरी बात सुनी और उसे घसीटते हुए कमरे में ले गई। उनके पीछे सहमे-सहमे दोनों बच्‍चे भी चले गए।

मैं भी कमरे में आकर कपड़े उतार बिस्‍तर पर लुढ़क गया। सिगरेट जलाई और पत्रिका पढ़ने लगा। एक पन्‍ना भी नहीं पढ़ पाया था कि उस पुलिसनुमा औरत की लड़की रानी आकर बोली, ‘‘अंकल जी चाय....।''

‘‘अरे....! इसकी क्‍या जरूरत थी?'' उस लड़की से इस तरह का संवाद करना बेहूदी बात थी क्‍योंकि उसने तो अपनी माँ के आदेश का पालन भर किया था। वह कुछ जवाब देती इसके पूर्व ही मैंने उसके हाथ से चाय का प्‍याला ले लिया। दरअसल मैं खुद बरसात में भीग जाने के कारण चाय की जरूरत महसूस कर रहा था।

मैं चाय पीने लगा। वह लड़की अब भी वहीं खड़ी थी, ‘‘बैठ जाओ।''

वह बिस्‍तर पर ही बैठ गई। ‘‘तुम्‍हारे पिताजी क्‍या करते हैं?'' ‘मैंने पूछा।

‘‘मर गए।''

अप्रत्‍याशित उत्तर सुनकर मैं अवाक्‌ रह गया। उस पुलिसनुमा औरत के प्रति मेरा नजरिया तब्‍दील होने लगा। उसके प्रति उदार भाव मेरे अन्‍दर भरता गया। उसकी कुण्‍ठा, हीनताबोध स्‍वाभाविक लगने लगे।

‘‘क्‍या करते थे?''

‘‘कोऑपरेटिव बैंक में एजेन्‍ट थे।''

‘‘जब तुम्‍हारे पिता थे, तब भी तुम्‍हारी माँ नौकरी करती थीं?''

‘‘नहीं। पापाजी के मरने के कारण उन्‍हें नौकरी करनी पड़ी।''

‘‘तुम्‍हें अपने पापा याद हैं?''

‘‘हाँ याद हैं...! जब मैं पाँच बरस की थी तब पापा मरे थे। पापा हमें बहुत प्‍यार करते थे।''

‘‘और मम्‍मी....?''

‘‘तब मम्‍मी भी बहुत प्‍यार करती थीं। अब भी करती हैं। पर पापा के मरने के बाद मम्‍मी को जाने क्‍या हो गया कि वे वे गुस्‍सा भी करने लगीं।''

उसकी बातें मुझे बड़ी दिलचस्‍प लग रही थीं। उस औरत के प्रति, उसके बच्‍चों के प्रति, उसके पति के प्रति मेरी जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी। मेरी इसी जिज्ञासा के प्रतिफलस्‍वरूप मुझे तमाम जानकारियाँ मकान के दूसरे किरायेदारों से उसके बारे में प्राप्‍त हुईं। वह अव्‍वल दर्जे की बुलकर और परिस्‍थितियों की विकट मार खाई हुई थी। चार वर्ष पहले उसका पति कैंसर की बीमारी से लड़ता हुआ मृत्‍यु को प्राप्‍त हो गया था। किसी कर्मचारी की मृत्‍यु हो जाने पर बैंक में उसकी सन्‍तान अथवा पत्‍नी को नौकरी दिए जाने का विधान था। उस औरत की कोई बालिग सन्‍तान नहीं थी। वह ज्‍यादा पढ़ी-लिखी भी नहीं थी। पाँचवीं पास थी। अतः बैंक में उसकी चपरासी के पद पर अनुकम्‍पा नियुक्‍ति कर दी गई। अब इस वर्ष उसने हायर सेकेण्‍डरी का फार्म भरा है। यदि वह पास हो जाती है तो उसे पदोन्‍नत कर क्‍लर्कियल जॉब दे दिया जाएगा।

उस पुलिसनुमा कम पढ़ी-लिखी औरत में असाधारण निडरता, आत्‍मबल एवं आत्‍मविश्‍वास था। पति की मृत्‍यु के बाद वह किसी पर अवलम्‍बित नहीं रही। ससुराल और मायकेवालों के सहारे से भी दरकिनार रही। जबकि उसे ससुराल पक्ष से बँटवारे में अचल सम्‍पत्ति मिल सकती थी, पर यहाँ उसने धैर्य एवं निजत्‍व का परिचय दिया। अपने हिस्‍से की जमीन-जायदाद जेठ के नाम कर दी। जेठ किसान थे। अतः जमीन पर ही आश्रित थे, जिस पर उनके चार लड़कियाँ थीं। हिस्‍सा-कसा होने के पूर्व वे अपनी रोजी-रोटी और लड़कियों की दुहाई लेकर किसी मजबूर अदना शख्‍स की तरह उसके सामने गिड़गिड़ाए थे। तब उसने उन्‍हें अभयदान दिया, ‘‘जाओ मुझे कुछ नहीं चाहिए। मेरे हाथ-पैर सलामत हैं। मैं इतनी बड़ी दुनिया में कहीं भी मेहनत-मजदूरी कर खाऊँगी।''

यह उसके अद्‌भुत चरित्र का उदात्त पहलू था। उसकी चरित्रहीनता की बातें भी लोगों ने चटखारे ले-लेकर बताईं। पर इन बातों के प्रमाणित होने का कोई निश्‍चित प्रमाण नहीं था। सारी बातें हवा में तैर रहे उस गुब्‍बारे की तरह थीं जो अपने वजूद में वजन नहीं होने के कारण निश्‍चित दिशा निर्धारण नहीं कर पाता और हवा के मामूली थपेड़े से बार-बार दिशा भ्रमित होता रहता है।

वह पुलिसनुमा औरत अव्‍वल दर्जे की बदमाश, बेशर्म और चरित्रहीन है। मैनेजर से शारीरिक सम्‍पर्क स्‍थापित करने के बाद ही उसे बैंक में नौकरी मिली वरना बैंकों के तमाम कर्मचारी आए दिन मरते रहते हैं, बैंकवालों ने किस-किस की बीवियों को नौकरियाँ दीं? जब बैंक अध्‍यक्ष चेकिंग वगैरह के लिए साल में एकाध बार आते हैं तो ‘अध्‍यक्ष महोदय' को प्रसन्‍न करने के लिए मैनेजर मांस और मदिरा के साथ शबाब के रूप में उसे ही पेश करते हैं। इसीलिए तो उसे हायर सेकेण्‍डरी पास करने के बाद पदोन्‍नति प्राप्‍त हो जाने की उम्‍मीद है। जरूर अध्‍यक्ष महोदय ने उसका उपभोग करते समय उसे प्रमोशन दे देने का आश्‍वासन दे दिया होगा। एक धारणा जरूर लोगों में उसके प्रति निश्‍चित थी कि उसका यह क्रियाकलाप बैंक और बैंकवालों तक ही सीमित है। बाहर वह बिलकुल शरीफ औरतों की तरह मान-मर्यादा और इज्‍जत-आबरू से रहती है। इस मकान में कभी उसे किसी ने भी संदिग्‍ध अवस्‍था में नहीं देखा।

मकान मालिक पंडितजी के कानों में भी इन सब बातों की भनक लग गई है इसीलिए वे उससे जोर देकर मकान खाली करने का अनुरोध करने लगे हैं। इसी महीने की पन्‍द्रह तारीख तक मकान खाली कर देने का उसने आश्‍वासन भी दे दिया था। दुर्भाग्‍य से इसी माह उसे एक तारीख को तनखा नहीं मिली। लिहाजा वह एक...दो...तीन तारीख तक भी पंडितजी को किराया नहीं दे पाई। पंडितजी किराये के मामले में कुछ ज्‍यादा ही सख्‍त थे। यदि उन्‍हें नियत तारीख को किराया न मिले तो किरायेदार के प्रति उनमें अविश्‍वास भर जाता था। ऐसी स्‍थिति में वे बेमुरव्‍वत हो जाते। लिहाजा और सम्‍बन्‍ध की सब दलीलें तोड़कर किराया देने के लिए बार-बार टोकने लगते। तीन तारीख की शाम तक भी जब पंडितजी के हाथों में किराया नहीं पहुँचा तो पंडितजी के सब्र का बाँध टूट गया। उन्‍होंने उससे मकान खाली करने के लिए पहले ही कह रखा था, इस वजह से भी उसके प्रति कुछ ज्‍यादा शंकालु हो उठे। उन्‍हें यह भ्रम हो गया कि यह पुलिसनुमा औरत इस माह का किराया दिए बगैर ही मकान खाली कर चलती न बने? हालाँकि किराया माँगने पर उसने भरोसा दिलाया था कि उसकी तनखा नहीं मिली है,

इसीलिए किराया नहीं दे पा रही है। फिर भी यदि परसों तक तनखा नहीं मिली तो वह किसी से उधार लेकर पूरा किराया चुकता कर देगी। अगर मकान नहीं मिला तो भी वह मकान खाली करेगी चाहे उसे धर्मशाला में ही सामान रखकर क्‍यों न कुछ दिन गुजारने पड़ें? वह जबान की पक्‍की है। मर्द औरत है।

परसों यानी, पाँच तारीख को उसे किराया देना था।

पाँच तारीख की शाम तक भी जब वह किराया न दे पाई तो पंडितजी ने उसका नल से पानी भरना बन्‍द कर दिया। यह उसको नाहक परेशान किए जाने की शुरुआत थी। पर वह मर्द औरत विचलित नहीं हुई, उसने दोनों लड़कों को बाल्‍टियाँ पकड़ाकर नगरपालिका के सार्वजनिक नल से पानी मँगा लिया।

अब वह औरत अक्‍सर शान्‍त रहती। सम्‍भवतः उसकी कुन्‍द मानसिकता मकान खाली करने से लेकर नया मकान खोज लेने तक केन्‍द्रित होकर रह गई थी। वह अब मकान के अन्‍य किरायेदारों से भी कम बोलती-बतियाती या उन्‍होंने ही उसके चरित्र के प्रति गलत सम्‍भावनाओं को लेकर ऐसा रुख अपना लिया था।

रात को मैं जब कमरे में पहुँचा तो वह एकाएक ही उपस्‍थित हो गई। शायद मेरे आने की ही प्रतीक्षा कर रही हो। उसने आते ही अपने भूत और वर्तमान जीवन की विवादास्‍पद स्‍थितियों की तफसील बयान कर दी, ‘‘आजकल भलमनसाहत का कतई जमाना नहीं है। इस महीने का किराया समय पर न देने से पंडितजी ने नाक में दम कर रखा है। जबकि पूरे एक बरस से मैं निरन्‍तर एक तारीख को किराया देती आ रही हूँ। मैं भी अव्‍वल दर्जे की कमीन औरत हूँ...।''

निर्वाक्‌, मैं चौंक पड़ा। उस पुलिसनुमा औरत का रहस्‍य क्‍या किसी तिलिस्‍मी चुडै़ल की तरह मेरे सामने उद्‌घाटित हो रहा है...

‘‘भले के संग निहायत भली और बुरे के संग निहायत बुरी। गरीबा हलवाई ने भी मुझे इसी तरह परेशान करके मकान खाली कराने की कोशिश की थी! बेटा, पर मैंने ऐसा चक्‍कर डाला कि पाँच-दस हजार तो रुपयों से टूटा और मेरे हाथ-पैर, जोड़कर माफी माँगी, तब कहीं जाकर बचा साला, हरामजादा! बनेटा की औलाद?''

क्रूरता से भरी कटुता उसके चेहरे पर चढ़ गई। मैं उसे गौर से देखता रहा मेरी आँखों में भी शेष बात जानने की जिज्ञासा थी जिसे वह समझ गई थी।

‘‘जब गरीबा हलवाई मेरे सिर पर ही चढ़कर आ गया तो मैंने एक नाटक रचा। उस दिन शाम का समय था। गरीबा हलवाई के परिवार के अन्‍य लोग मन्‍दिर गए हुए थे। मैंने उसे सबक सिखाने के लिए मौके का फायदा उठाया।

तत्‍काल मैं उसके कमरे में पहुँची और साड़ी उतारकर वहीं फेंक दी। वह कुछ सोचता-समझता उसके पहले ही मैंने ब्‍लाउज के बटन तोड़ डाले फिर बचाओ-बचाओ चिल्‍लाती हुई मकान में से बाहर निकलकर दौड़ती हुई कोतवाली पहुँच, आबरू लूटने की कोशिश के आरोप में रिपोर्ट लिखा दी।''

एक क्रूर मुस्‍कान उसके होठों पर तैर गई थी। मैं भी भीतर तक सिहर उठा था।

‘‘पर पंडितजी के साथ मैं ऐसा नाटक नहीं कर सकती।''

‘‘क्‍यों?''

‘‘वे सोर्स-सिप्‍पे वाले उम्रदराज हैं। उनकी पहुँच ऊपर तक है। वे मुझे भी बेदखल करा सकते हैं।''

मेरी समझ में आ रहा था। अपना आगा-पीछा सोचने-समझने वाली यह औरत बेहद छाकटा है।

‘‘आप मकान खाली करके रोज-रोज की चिकचिक से छुट्‌टी क्‍यों नहीं पा लेतीं?''

‘‘भाई साहब, मैं ठहरी औरत जात, मुझे ऐसा मकान चाहिए जिसमें मेरी सुरक्षा रहे। ऐसे-वैसे नीच-कुर्रम का मकान तो मैं खड़े-खड़े ले लूँ...पर ऐसे लोगों के ईमान का क्‍या भरोसा, कब डोल जाए? रात-बिरात अकेली पाकर मुझ पर ही बन बैठे?''

उसकी निर्बन्‍ध मुखरता देखकर मैं उसे ताकता ही रह गया। मुझे लगा कि वह कुछ शान्‍त और संयत हो रही है।

‘‘आप पर पाँचेक सौ रुपये पड़े हों तो दे दीजिए। तनखा मिलते ही मैं आपको लौटा दूँगी।''

इस प्रश्‍न के लिए मैं कतई तैयार नहीं था। न ही मुझे यह उम्‍मीद थी कि चार दिन की मुलाकात में यह औरत मुझसे रुपये उधार माँग सकती है? वैसे भी वर्तमान में मेरी मुद्रा स्‍थिति ठीक नहीं थी। लेकिन मैं चाहता तो तुरन्‍त उसे पाँच सौ रुपये निकालकर दे सकता था। अभी भी मेरे सूटकेस में सौ-सौ के दस नोट पड़े हुए थे। जेबखर्च के लिए सौ-पचास रुपये पैंट की जेब में भी पड़े ही होंगे। लेकिन उसकी कतिपय तफसील ने उसके प्रति मेरे अन्‍दर भय और अविश्‍वास भर दिया था। मेरे दृष्‍टिकोण से ऐसे लोगों से राम-राम, श्‍याम-श्‍याम, के सम्‍बन्‍ध ही ठीक हो सकते हैं। फिर मकान छोड़कर जानेवाली किरायेदारिन को रुपये देकर मैं कहाँ उसके पीछे-पीछे रुपये वसूलता फिरूँगा, अतः मैंने बात को टालना ही ठीक समझा।

‘‘अभी तो मुझ पर हैं नहीं...।''

‘‘कल शाम तक दे देंगे...?'' वह टली नहीं।

‘‘कह नहीं सकता। कोशिश करूँगा।''

‘‘हो जाएँ तो जरूर इन्‍तजाम करिए, तनखा मिलते ही लौटा दूँगी।'' और जिस तरह से वह एकाएक आई थी, उसी तरह से एकाएक चली भी गई।

कल यानी अगले दिन मैं शाम को ऑफिस से छूटा तो कमरे पर नहीं गया। मुझे भय था कि वह पुलिसनुमा औरत मेरे कमरे पर पहुँचते ही आ धमकेगी और रुपये माँगेगी। जब तक उसे तनखा नहीं मिल जाती मैं उससे कटा रहना चाहता था। अतः मैं समय पास करने के लिए जिला पुस्‍तकालय में घुस गया। अखबार आदि पढ़कर पौने नौ बजे उठा और पिक्‍चर चला गया। बारह बजे जब टॉकीज से छूटकर मकान पर पहुँचा तो शटर में ताला डल चुका था। अब उसके कमरे में आने के भय से मुक्‍त होकर मैं निश्‍चिन्‍तता से सो गया।

आज ही सुबह पाँच तारीख थी और आज शाम तक उस औरत को किराया देना था। सुबह जल्‍दी उठकर मैं कमरे से निकल गया। सवा दस बजे तक दर्शनीय स्‍थलों पर घूमता रहा। ठीक साढ़े दस बजे ऑफिस पहुँच गया। शाम को ऑफिस से छूटते ही लाइब्रेरी में घुस गया, वहाँ से नौ बजे निकलने के बाद कमरे पर पहुँचा। मैं सोच रहा था अब तक सम्‍भवतः उसे तनखा मिल गई होगी? नहीं भी मिली हो तो भी उसने कोई न कोई वैकल्‍पिक व्‍यवस्‍था कर ली होगी। उसका जुगाड़ नहीं बना होगा और यदि वह रुपया माँगने आएगी तो एन टाइम पर जैसा दिमाग में आएगा वैसा कर लूँगा।

कमरे में पहुँचे हुए दस ही मिनट हुए थे कि वह पुलिसनुमा औरत आ पहुँची। मैं उससे आँखें चुराने की कोशिश कर रहा था, पर उसने मेरी ओर बिना कोई ध्‍यान दिये अपनी बात प्रारम्‍भ कर दी। वह कुछ जोश में थी, उसकी साँस फूल रही थी, ‘‘आज अन्‍त कर दी भाई साहब!''

‘‘क्‍यों..., क्‍या हुआ?'' निर्लिप्‍त भाव था मेरा।

‘‘बगैर आदमी के जा जमाने में औरत की कुछ भी इज्‍जत नहीं है भाई साहब!''

उसका चेहरा जर्द पड़ गया था। आँखें नम हो आई थीं।

‘‘आपसे मुझे रुपया मिल जाने की पूरी आशा थी। पर दो दिन से आप कब आए, कब गए पता ही नहीं लगा...।''

‘‘ऑफिस में ऑडिट पार्टी आ गई थी इसीलिए मुझे रात बारह बजे तक ऑफिस में ही रुकना पड़ा और सुबह भी जल्‍दी जाना पड़ा।'' मैंने सरासर सफेद झूठ बोला था। अपराध बोध से उसकी अपलक आँखों से मेरी आँखें नहीं टकरा पा रही थीं।

‘‘आज भी मैं जब पंडितजी को किराया नहीं दे पाई तो उन्‍होंने कमरे की लाइट काट दी। एक मजबूर विधवा औरत को इस तरह परेशान करना कहाँ तक जायज है? मेरा आदमी होता तो ये मुझे कर लेते परेशान? ऐसी परेशानियों से तंग आकर कभी-कभी तो ऐसी मंशा होती है किसी आदमी को कर लूँ। राँड़ समझकर लोग-बागों की गलत निगाहों से भी बची रहूँगी और झंझटों से भी मुक्‍ति पा लूँगी?''

मैं चुप रहा।

‘‘पर क्‍या करूँ? खानदान की मान-मर्यादा और इन मोढ़ा-मोढ़ियों की नादान उम्र आड़े आ जाती है, नहीं तो न जाने अब तक मैं कब की ब्‍याह रचा चुकी होती? भगवान किसी के भाग में विधवा होना न लिखे। लिखे तो उसे ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर के घर में जन्‍म न दे...। नीच जाति में पैदा करे जिससे विधवा होते ही वह दूसरा खसम कर ले और खानदान की झूठी आनबान की आँच का सवाल ही न उठे...?''

‘‘आदमी के सोचे अनुसार सब कुछ कहाँ होता है? ऊपरवाले की भी अपनी कोई मर्जी होती है। आपके लिए रुपयों की व्‍यवस्‍था मैंने दोपहर में ही कर ली थी....यह लीजिए।''

मैं पैंट की जेब में हाथ डाल नोट निकालने लगा।

‘‘अब जरूरत नहीं है भाई साहब, आज पंडितजी के आगे मैं अपना मंगल-सूत्र फेंक आई। मैंने उनसे कह भी दिया जब तक एक-एक दिन का हिसाब चुकता न हो जाए तब तक मंगल-सूत्र नहीं लौटाना। आज मेरा बिल भी बन गया है, कल ग्‍यारह बजे तनखा मिल जाएगी।''

अनायास ही जेब के अन्‍दर अँगुलियों से नोट छूट गए और मुझे अहसास हुआ इस पुलिसनुमा खुद्‌दार औरत ने मेरी सारी हरकतें ताड़ ली हैं। उसने मेरे रुपये लेने से इनकार करते हुए यह भी साबित कर दिया कि इस जहान में मजबूर पीड़ित का हमदर्द कोई नहीं है, जो हमदर्दी जताते हैं, दरअसल वे हमदर्द होने का मात्र पाठ अदा करते हैं।

एक खुद्‌दार औरत के अस्‍तित्‍व के सामने मुझे अपना अस्‍तित्‍व, हीन और बौना लगने लगा था। मर्द औरत के सामने...।

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