शनिवार, 1 जनवरी 2011

शशांक मिश्र ‘‘भारती'' की रचनाएँ

एकः-

विश्‍वास रूपी दीपक जो जलाते रहें,
मंजिल की समीपता आप पाते रहें।

गीत विश्‍वासों के निःस्‍वर होते नहीं,
सुबह के प्रिय दृश्‍य आप गाते रहें।

हृदय की कुण्‍ठा का पास आना क्‍या,
सत्‍य पर निष्‍ठा जब तक बनायें रहें।

तृष्‍णा के बढ़ने से होता भी क्‍या है,
सिन्‍धु सच का जब तक लहराता रहे।

छोड़ सभी मनोविकारों को अपने,
राग विश्‍वासों के यूं ही गाते रहें॥


दो:-
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गैर जो कभी थे वे अपने लगे हैं,
   बिछुड़े हुए साथी भी मिलने लगे हैं।

   जैसा कि कुछ किसी से मैंने न चाहा,
           वह दोष अपने बताने लगे हैं।

उनके तरफ की जो अड़चनें हैं,
मित्रों में भेदभाव मिटने लगे हैं।

   गैर जो कभी थे यहां तक आ गए,
  खुशियों के सपने सजने लगे हैं।

    दुश्‍मनी भुलाने का मौका जो देखा,
    कई लोग मौके पर बढ़ने लगे हैं।

    बढ़ते कदमों को इनके जो देखा,
    स्‍वजन भी मन में हंसने लगे हैं।

       आने के वायदे किये जिसने भारती',
       दोस्‍ती के रिश्ते भी फलने लगे हैं॥
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शशांक मिश्र ‘‘भारती''
दुबौला-रामेश्‍वर
पिथौरागढ़

2 blogger-facebook:

  1. राग विश्वास के यूं ही गाते रहे।
    आच्छी रचनायें , बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. आच्छी रचनायें , बधाई। ho

    उत्तर देंहटाएं

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