प्रभुदयाल श्रीवास्तव का एक हास्य व्यंग्य‌ गीत - चमचापुराण

सभी चमचों को नव वर्ष की शुभ कामनाओं सहित उनके श्री चरणों में पेश है

एक हास्य व्यंग्य‌ गीत

चमचापुराण
मेरे नेता के दरबार में सब चमचों का खाता
जो जितनी चमचागिरी करता वैसी पदवी पाता।

उसने चमचागिरी करके इतना उँचा पद पाया
दादागिरी और रिश्वत देकर ही मंत्री बन पाया।

जो जितना ज्यादा खाता उतनी ही इज्जत पाता
मेरे नेता के दरबार में सब चमचों का खाता।

इसीलिये अपने लोगों को चमचागिरी सिखाई
चमचागिरी करने वालों ने कैसी शौहरत पाई।

बार बार अपने चमचों को यही बात बतलाता
मेरे नेता के दरबार में सब चमचों का खाता।

छोटे बड़े सभी शहरों में चमचा गिरि विद्यालय
चमचे पढ़ते पढ़ते सीखें नेताओं की जय जय।

बेईमानी और मक्कारी के सारे गुण सिखलाता
मेरे नेता के दरबार में सब चमचों का खाता।

सब चमचों का एक सिलेबस सबके विषय समान
लूटो मारो चीथो नोचो तभी मिलेगा मान।

खुदा सदा नंगों से डरता सबको यह समझाता
मेरे नेता के दरबार में सब चमचों का खाता।

जब चुनाव सिर पर होते, होती चमचों की जय जय
सुबह रोज नोटों मय होती शाम रोज दारुमय।

देसी कट्टा लेकर चमचा वोट मांगने जाता
मेरे नेता के दरबार में सब चमचों का खाता।

अब तो मैंने सोच लिया मैं भी चमचा बन जाऊँ
बजा बजा कर रोज खंजीरा नेता के गुण गाऊँ।

पता नहीं किस कारण से यह कुछ भी न कर पाता
मेरे नेता के दरबार में सब चमचों का खाता।

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1 टिप्पणी "प्रभुदयाल श्रीवास्तव का एक हास्य व्यंग्य‌ गीत - चमचापुराण"

  1. मेरे नेता के दरबार में सब चमचों का खाता।
    अच्छी अभिव्यक्ति, बधाई।

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