बुधवार, 5 जनवरी 2011

विजय वर्मा की हास्य व्यंग्य कविता व ग़ज़ल

बदलती फिज़ा

माना कि पैसों की अहमियत बहुत है,

इस शहर में मगर आदमियत नहीं है.

 

विष-बुझे व्यंग्य -बाणों की होती है वर्षा

फिज़ा में इन्द्र-धनुषी रूमानियत नहीं है

 

कुछ मुस्कुराते  हुए चेहरे है इर्द-गिर्द

इन चेहरों के पीछे भली नियत नहीं है.

 

खुश रहें, मुस्कुराएँ,पर याद रहे ये सदा

खुशियों पर आपकी मिल्कियत नहीं है

 

अब  आप  भी  कहाँ रहे पहले  जैसे

आप के चेहरे पे भी वो मासूमियत नहीं है

 

उमर गुजरी जिन हम-.रकाबों के संग

वही कहते है मुझसे वाकफियत नहीं है.

 

जिसे भी यहाँ देखा बस खडग-हस्त देखा

किसी के होठों पे दुआ-सलामियत नहीं है..

 

मिलते ही तख़्त-ताज़ ,बदल जाते है रहनुमा

इस वतन में पहले-सी जम्हूरियत नहीं है.
--

व्यंग्य कविता

३ x ढाई
केंद्र से मिला पैसा मार्च में ही होते खर्च

११ महीने घूमते रहें, मंदिर-मस्जिद-चर्च.

कर लो गूगल -सर्च.

 

अब तो फोन टैपिंग की पी एम् ने भर दी हामी.

सत्ता-पक्ष की मत करो, करो इनकी गुलामी.

अब बोलो भईया स्वामी !

 

अपने अपने ज़िद में संसद-सत्र की बलि चढ़ा दी.

पक्ष -विपक्ष मिलकर जनता को अच्छी पाठ पढ़ा दी.

फूँक दी जनता की कमाई गाढ़ी.

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v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

1 blogger-facebook:

  1. ख़ुशियों पर आपकी मिल्कियत नहीं है ।

    बेहतरीन अभिव्यक्ति , बधाई वर्मा जी।

    उत्तर देंहटाएं

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