शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

रचनाकार के पाठकों के पत्र

यूँ तो रचनकार की रचनाओं पर त्वरित टिप्पणियों की सुविधा है, मगर बहुत से पाठक इसे सब्सक्राइब कर पढ़ते हैं और ईमेल से भी इनकी रचनाओं को फारवर्ड करते हैं. ऐसे में कभी कभार होता यह है कि पाठकों की टिप्पणियाँ ईमेल के जरिए प्राप्त होती हैं, सीधे टिप्पणी बक्सों में दर्ज नहीं हो पातीं.

और, कभी कभार कुछ संदेश अथवा टिप्पणियाँ ऐसी मिल जाती हैं जिनसे लगता है कि मेहनत सफल हुई.

एक ऐसा ही संदेश हाल ही में प्राप्त हुआ जिसे नीचे प्रकाशित किया जा रहा है-

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नमस्कार। आपके आत्मीय संबोधन के लिए आभार। आजकल ऐसी उदार आत्मीयता मिलती कहाँ है!
आपके  सुझाव पर अमल करूँगा। रचनाकार हर रोज खोल कर देख लेता हूँ। वहाँ किस मेल आईडी पर भेजूँ? कृपया बताएँ।
वैसे अभिव्यक्ति (पूर्णिमा वर्मन संचालित) पर भी कुछ भेजा है। वे संपादित करते हैं। और जैसाकि अक्सर होता है, संपादित लेख में बहुत कुछ ऐसा आ जाता है, जिसकी लेखक ने वांछा नहीं की थी। उनका गेट अप अच्छा है। खोलने पर पत्रिका पढ़ने का अहसास होता है।रचनाएँ, खासकर कहानियाँ, आलेख आदि अच्छे आते हैं। हिंदी पत्रकारिता का यह नया रूप उभरकर सामने आ रहा है। प्रिंट मीडिया से बिलकुल जुदा। रचनाकार में संपादन जैसा कुछ नहीं है। रूपाकार भी सादा है। मास्ट भी अभी शायद नहीं बनाया है। अल्प प्रयास से संचालित उपक्रम है। सार-सार को गहि रहे वाली बात है यहाँ। यह भी अच्छा ही है।
अच्छी बात यह है कि यहाँ हर किसी के लिए थोड़ी-थोड़ी जगह है। ऐसा नहीं कि केवल प्रतिष्ठित लोग या अखबार-पत्रिका के संपादन से जुड़े लेखक-पत्रकार ही स्थान पाएं। और सब कुछ स्वांतः सुखाय। अर्थ न आएगा न जाएगा। जो मिलना-मिलाना है वह है केवल आत्मिक सुख।
आपने जिस तत्परता से मेरे संदेश का उत्तर दिया, उसके लिए पुनः आभार। संपर्क में रहेंगे।
सादर,
आर.वी.सिंह/R.V. Singh
उप महाप्रबन्धक (हिन्दी)/ Dy. G.M. (Hindi)
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक/ Small Inds. Dev. Bank of India
प्रधान कार्यालय/Head Office
लखनऊ/Lucknow- 226 001
ईमेल/email-rvsingh@sidbi.in

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2011/1/5 < rvsingh@sidbi.in >
यशवंत जी नमस्कार।
आपके आलेख अमर उजाला में अक्सर पढ़ता हूँ। रचनाकार -ई पत्रिका में सड़क पर मौत पढ़ा। आँकड़े तो हैं ही, आपने जो सुझाव दिए हैं, वे भी बहुत अच्छे हैं। क्या आप यातायात विभाग में उच्च अधिकारी हैं?
यकीनन नहीं होंगे। नहीं तो पत्रकार (या स्तंभकार) न होते। किन्तु जिस शिद्दत से आपने सड़क पर होनेवाली दुर्घटनाओं और तज्जनित मौत तथा उससे बचाव की सांगोपांग चर्चा की है, उससे यातायात पुलिस को सबक लेना चाहिए।
मैं जब दिल्ली के एक स्कूल में पढ़ता था, तब एक पुलिस वाले सज्जन हम सभी छात्रों को यातायात संचालन की जानकारी देने आते थे। उससे हमें बहुत कुछ सीखने को मिला। आजकल पता नहीं स्कूलों में ऐसे आयोजन होते हैं या नहीं।
सबसे बड़ी बीमारी तो शराब है। दूसरी अशिक्षा। बल्कि यह दूसरी वाली पहली से अधिक घातक है। मैंने शराब और किताब शीर्षक एक व्यंग्य लिखा है। आपको पढ़ने के लिए भेज रहा हूँ। थोड़ा लिख-पढ़ लेता हूँ। कुछ पत्रिकाओं में छपता भी हूँ।
व्यंग्य लेखों का एक संकलन आया है। पर आप लोगों जैसी न तो प्रतिभा है, न सौभाग्य। बहरहाल, मेरा यह संलग्न लेख पढ़कर यदि मार्गदर्शन करें तो बड़ी कृपया होगी।


सादर,
आर.वी.सिंह/R.V. Singh
उप महाप्रबन्धक (हिन्दी)/ Dy. G.M. (Hindi)
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक/ Small Inds. Dev. Bank of India
प्रधान कार्यालय/Head Office
लखनऊ/Lucknow- 226 001

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