सोमवार, 10 जनवरी 2011

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - शराब और किताब

हर की सड़कों से गुजरते हुए मैं अक्सर सोचता हूँ कि इस शहर में किस मद की दुकानें ज्यादा हैं, शराब की या किताब की? और मुझे बड़ा फख्र होता है कि अपने हर शहर में पहली मद दूसरी की तुलना में बड़ी सहजता से उपलब्ध है। इससे हमारी उच्च-स्तरीय प्राथमिकताओं का पता चलता है। हम चाहते हैं कि लोग पढ़ें-लिखें। उससे भी ज्यादा हम चाहते हैं कि लोग खाएं। और सबसे बढ़कर हमारी चाहते है कि लोग पिएँ। देश में चाहे पीने का स्वच्छ पानी न मिले, पर लोगों को खाँटी शराब जरूर मिले। हमारे सोच में कितनी दयानतदारी है, कैसी अद्भुत उदारता है! कभी इस सोच के कारणों पर गौर फरमाया है?

कारण साफ है। इस व्यवस्था में सबको पैसा बनाना है, रसूख बढ़ाना है। जिसकी उतनी कूवत नहीं उसे किसी न किसी तरह अपना काम निकलवाना है। इस लिहाज से चौबीस करोड़ भुखमर्रों की आबादी वाला अपना भारत बड़ा खाता-पीता देश है। यहाँ जो काम किसी भी तरह न हो, वह खिला-पिला कर निकलवा लिया जाता है। खाना-पीना, इस क्रियापद में आधी हिस्सेदारी पीने की है। खिलाइए चाहे जो कुछ, किन्तु पीने की तो एक ही मद है। काजू खिलाइए या कलेजी, मुर्गा खिलाइए या बकरा, पिज्जा खिलाइए या पिस्ता-बादाम, पर पिलाने की बारी आएगी तो मदिरा ही चलेगी। यहाँ एप्पल जूस, मुसम्बी के रस, कोल्ड ड्रिंक और लस्सी से बात नहीं बनने वाली। अपना काम निकलवाने के लिए आपको उपहार देना है तो बढिया शराब जरूर देनी होगी। पार्टी करनी है तो शराब उसमें जरूर शामिल है। शराब से देश को अरबों का राजस्व मिलता है। उस राजस्व से बड़े-बड़े खेल होते हैं, भारी-भारी परियोजनाएं चलती हैं और उनसे भी भारी महकमे। पूरी मशीनरी मदिरा-आधारित राजस्व पर टिकी है। इसीलिए शराब के ठेके लेने-देने में न जाने क्या-क्या होता है! गोलियाँ चलती हैं, लोगों को जान देनी पड़ती है। अरबों रुपये का खेला है।

इसके बरक्स किताब को देखें। पहले पढ़े-लिखे लोग किताबें उपहार में लेते-देते थे। किताबों को सबसे अच्छा मित्र कहा जाता था। अब भी कुछ लोगों को ऐसी गलतफहमी है। मुहावरा तो अब भी चल ही रहा है। लेकिन सच्चाई यही है कि शहर में यदि सौ दुकानें शराब की हैं तो कहीं किसी अंधेरे कोने में इक्का-दुक्का दुकान किताब की मिल जाती है, अपनी बेनूरी और बदहाली पर रोती-बिसूरती। सरकारी पुस्तकालयों में किताबें बेचनी हो तो प्रकाशक को कई टोटके करने पड़ेंगे, जिनमें सबसे प्रचलित टोटका वही है, जिसका जिक्र हम ऊपर कर आए, यानी खिलाओ, भाँति-भाँति की गिजा खिलाओ और साथ में पिलाओ, हलक भर-भरके मदिरा पिलाओ। तब तक पिलाओ जब तक आपके काम की संविदा, ऑर्डर या आदेश उस पीने वाले के हलक से बाहर न निकल आए।

किताब के बूते यह सब नहीं होने वाला। बल्कि सच्चाई तो यह है कि किताब पढ़ने से आदमी दुनिया के किसी काम का नहीं रह जाता। अधिक पढ़ने-लिखनेवाला भीरु और दब्बू हो जाता है, जबकि कुछ पेग चढ़ा लेने पर आदमी शेर-दिल बन जाता है। फिर तो उसे किसी का भी डर नहीं सताता। किताब और पढ़ने-लिखने से अपना नाता सिर्फ तब तक का है जब तक नौकरी नहीं मिल जाती। शराब से तो मरते दम तक का संबंध है। अरब-फारस के लोग सदियों से शराब ब रोज यानी हर रोज शराब पीने के सिद्धान्त पर अमल करते आए हैं और जगह-जगह शराब की दुकानें खोलकर अपना शासन भी चाहता है कि सब लोग इस सिद्धान्त को अपनी जिन्दगी का हिस्सा बना लें।

किताब ब रोज, यानी रोज किताब पढ़ना- क्या ऐसा भी कहीं लिखा है? सच कहें तो ऊपर वाले चाहते ही यह हैं कि लोग ज्यादा पढ़ने-लिखने के चक्कर में न पड़ें। पढ़-लिखकर क्या करना है? यदि लड़की है तो चौका-बासन संभालना है, बच्चे पैदा करके उन्हें पालना है। और पुरुष है तो आजीविका कमानी है। बस इतना-सा तो काम है किताब का। वैसे किताब है भी बड़ी वाहियात शै। कितनी ही किताबें ऐसी हैं, जिनको उनकी प्रेस के साथ ही जब्त कर लिया गया। ढेरों किताबों की बिक्री पर पाबंदी लगाई गई और उनके लेखक को जेल हो गई। बहुत-सी किताबों के लिखने वाले जलावतन कर दिए गए। बहुतों की जान लेने के फतवे जारी हो गए। शराब के मामले में इसका उल्टा है। दुश्मन को भी शराब पिला कर दोस्त बनाया जा सकता है। जेल जाने की नौबत आ रही हो तो थोड़ी पिला दीजिए, बच जाएँगे। यदि पुलिस-दरोगा पकड़े लिए जा रहे हों, तो उनको पिला दीजिए, वे भागने का मौका दे देंगे। इसलिए सच कहें तो आदमी को बस इतना ही पढ़ना-लिखना चाहिए कि परीक्षा पास कर लें, नौकरी मिल जाए। उसके बाद तो किताब की ओर देखना भी पाप है। शराब के साथ ऐसा कुछ नहीं। शराब पीना तो हर समय बड़े पुण्य का काम है।

अपने देश के लोग इस सिद्धान्त को पूरी तरह अमल में लाते हैं। इसीलिए अपने सरकारी स्कूल का बच्चा आठवीं पास कर लेता है किन्तु अपने बप्पा का नाम भी ठीक से नहीं लिख पाता। सरकारी शालाओं में गुरु लोग पढ़ाने जैसा फिजूल काम बिलकुल नहीं करते और पगार पर ध्यान देते हैं, क्योंकि मोटी पगार पाना उनका जन्म-सिद्ध अधिकार है। यदि किसी को इस पर आपत्ति हो तो गुरुजी उसे पिलाकर टुन्न किए रहते हैं। यही कारण है कि पहले जहाँ शाला के सौ मीटर के दायरे में मदिरालय खोलना वर्जित था, वहीं अब विद्यालय और मदिरालय काफी नजदीक-नजदीक देखे जा सकते हैं और दोनों में सहजीविता का संबंध कायम हो गया है।

अपुन ने खुद को इस नए सिस्टम के माफिक बना लिएला है। पहले अपुन एट पीएम यानी रात को आठ बजे पढ़ने बैठ जाता था। इधर कई बरस से अपुन एट पीएम पर पीने बैठ जाता है। किताबें पढ़-पढ़कर अपुन की अक्खी जिन्दगी निकल गई और अपुन कभी किंग साइज नहीं फील किया, पन जबसे अपुन पीना चालू किएला है, लाइफ बोले तो किंग साइज हो गएली है बाप। अभी बहुत अच्छा लगता है, किताब की दुकान ढूँढने के लिए अक्खा शहर की खाक छाननी पड़ती थी, पन दारू तो बाजू में मिलेली है न। जब मन करो, पियो। पियो और जिओ। और पियो.. और पियो ..और एक दिन किसी गटर या नाली में गिरके मर जाओ। किताब पढ़ोगे तो किताब के कीड़े बन जाओगे और घुट-घुटकर मरोगे। शराब पियोगे तो नाले में गिरकर शेर की मौत मरोगे। और अपना तो सीधे-सीधे बस इतना मानना है कि मौत वही जो दुनिया देखे, घुट-घुटकर यों मरना क्या?

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डॉ. रामवृक्ष सिंह
आर.वी.सिंह/R.V. Singh
ईमेल/email-rvsingh@sidbi.in

3 blogger-facebook:

  1. किताबों की दुर्दशा पर हम जैसे पुस्तक प्रेमी खून के आंसू रोते हैं...छोटे शहरों की बात तो जाने दें बड़े शहरों में भी किताब की शायद ही कोई किताब दिखाई दे...मुंबई जैसे बड़े महानगर में जहाँ क्रास वर्ड और लैंड मार्क जैसे भव्य पुस्तक स्टोर हैं वहां हिंदी की किताब ढूढने में आपके पसीने छूट जायेंगे...दुःख होता है ये सब देख कर...शायद अब पहले जैसे पढने वाले लोग भी नहीं रहे...पहले टी.वी जैसे माध्यम नहीं थे इसलिए लोग मनोरंजन के लिए पुस्तकें पढ़ते थे..अब उन्हें वक्त ही नहीं मिलता...न लोगों के पास वक्त है और न पुस्तक पढने का सब्र...

    नीरज

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  2. बहुत अच्छी तुलना की है शराब और किताब में . अच्छा लिखते हो जी ................लिखना चाहिए लिखा करो

    उत्तर देंहटाएं
  3. अगर पुलिस की कार्य प्रणाली में सुधार आ जाए . तो पुरे भारतीय लोकतंत्र की काया पलट हो जाए ऐसा होना ही चाहिए .........

    उत्तर देंहटाएं

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