मंगलवार, 11 जनवरी 2011

राकेश शर्मा की रचनाएँ

gazal

ग़ज़ल

बाद रहज़नी के कुछ यूं सफ़र का समा निकला
फ़िर लूटा के शुकुं जिस्त का कारवां निकला ॥

सिवा कत्ल के कोई न थी रज़ा तेरी मगर
दर्द से ज्यादा हर दर्द का सामां निकला ॥

बिक गया निशात-ए-जि़गर यूं सरे शहर
कुछ इस कदर इस बेकद्र का कद्रदां निकला ॥

लिखते थे दर्द कि वज़ा न हो बेअसर
बहुत बेदर्द मगर मेरा दर्द ख्वां निकला ॥

जब्ज़-ए-जख्म से यूं नशर हुआ ज़िगर
बहुत बदबख्त बशर तेरा दौरे जमां निकला ॥

यूं सर-ए-मकतल तेरा रू बेबयां निकला
बेदिल जुबां निकली, दिल बेजुबां निकला ॥

बेबयां इशरत था जीस्त-ए-तनहा का सफ़र
तंग तो बहुत था पर तेरे कूचे से आसां निकला ॥

उलझ गए ये दर्द के पुरज़े दिल में कुछ इस कदर
कि मर्ज से मुश्किल मर्ज का दरमां निकला ॥

दाग-ए-रू धुले अश्कों से तो निखरा है चैहेरा कुछ यूं
बाद बदली के ज्यों खुलकर आसमां निकला ॥
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कविता
कितना आज़ तृषित मन मेरा....

दुःख के बादल, सुख की छईंया
चिनगी चिनगी मन की बगिया
प्रियतम तेरे रूप दरश को
कितना आज़ तृषित मन मेरा....

पीली फूलों की क्यारी सा
मेरा मन उमग ही जाता
सांझ दुआरे जब तम लाती
जल जाती तब प्रिय मन बाती
मधुर पीर की रस बूंदों से
कितना आज़ सिंचित मन मेरा....

बीती अनबीती जो मन पर
धूप छांव सी कथा रही वो
मनाकाश पर दुःख की बदली
नैन नीर की व्यथा रही जो
प्रिय तेरे कर नेह किरणों से
कितना आज़ वंचित मन मेरा....

अंतर के महाकाश पर
उर का झिलमिल दूर सितारा
समय गति की निहारिका में
भटक भटक कर यह मन हारा
तृष्णा के अदृश्य रंग में
कितना आज़ रंजित मन मेरा.....


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राकेश शर्मा
हिंदी अधिकारी
रा.स.वि.सं.
दोना पावला, गोवा

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