बुधवार, 12 जनवरी 2011

यशवन्‍त कोठारी का व्यंग्य : देश और बैलगाड़ी

 

जैसा कि शायद आप जानते होंगे, हमारे देश में बैलगाड़ियों की बहुतायत है। पिछले वर्षों में परिवहन के क्षेत्र में हम बैलगाड़ी से चलकर बैलगाड़ी तक ही पहुंच पाये। ईश्‍वर ने चाहा तो हम बैलगाड़ी में बैठ कर ही इक्‍कीसवीं शताब्‍दी में जायेंगे।

तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद अभी भी बैलगाड़ी से ही चल रहे हैं। देश में औद्योगिक क्रांति हुई, देश में राजनीतिक क्रांति हुई। देश में वैचारिक क्रांति हुई। पिछले दिनों सांस्‍कृतिक क्रांति भी हुई मगर बैलगाड़ी है कि इस विकासशील देश का पीछा ही नहीं छोड़ रही। हमारी कुल प्रगति बैलगाड़ी है।

वास्‍तव में हुआ यों कि पिछले दिनों मुझे गांवों में जाने का मौका मिला। कुछ दिन रह कर मैंने यह अनुभव किया कि जानवरों से चलने वाली गाड़ियां हमारी ग्रामीण अर्थ-व्‍यवस्‍था का प्रमुख आधार है। कौन कहता है कि रेलें, ट्रक, ट्रैक्‍टर ग्रामीण अर्थ-व्‍यवस्‍था के आधार हैं। आओ गांवों में, कस्‍बों में आओ और देखों कि वास्‍तविक आधार बैलगाड़ी, ऊंट गाड़ी, घोड़ा गाड़ी, गधा गाड़ी और भैंसा गाड़ी है। कुल मिलाकर इस देश की अर्थ व्‍यवस्‍था का भार जानवर ढो रहे हैं और हम समझ रहे हैं कि अर्थ-व्‍यवस्‍था का भार हम पर है। कुछ सोचिये, शायद आपको मेरी बात समझने में परेशानी हो रही है।

इस गरीब देश में करीब डेढ़ करोड़ बैलगाड़ियां हैं। ये बैलगाड़ियां एक वर्ष में करीब 50 अरब मैट्रिक टन माल को एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर लेकर जाती हैं जबकि विशाल पूंजी वाला भारतीय रेलवे केवल 18 करोड़ टन। अब कौन कह सकता है कि बैलगाड़ियां पिछड़ेपन की निशानी है।

ग्रामीण क्षेत्रों के अलावा बड़े शहरों और महानगरों में भी लगभग 20 लाख बैलगाड़िया, ठेले गाड़ियां है। महानगरों में भी इनकी संख्‍या में निरन्‍तर वृद्धि हो रही है। देश के गरीब तबके के लगभग 2 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी बैलगाड़ियों से जुड़ी हुई हैं।

कृषि के अलावा अन्‍य कार्यों में भी बैलगाड़ियों का भरपूर उपयोग होता है। मात्र एक हजार या आठ सौ रुपयों से बनी यह गाड़ी अर्थ-व्‍यवस्‍था को खींच रही है।

देश भर में बैलगाड़ियों के पहिये रबर की ओर ध्‍यान दिया है। लोहे की रिम वाले बीच के पहिये ने हमें हमारे गोधन से दूर कर दिया लेकिन आंकड़े गवाह है कि आज भी पशुधन उनसे चलने वाली गाड़ियों हमारे देश के लिए कितनी आवश्‍यक हैं।

प्राचीन लोक गीतों में तो बैलगाड़ी का बड़ा सुन्‍दर और सजीव चित्रण हुआ है। ‘धीरे हांक रे गाड़ी वाला गाड़ी, मारी चूंदड़ी उड़ उड़ जाये।‘ इस बैलगाड़ी का उपयोग शादी ब्‍याह अन्‍य अवसरों पर किया जाता था। टैक्‍ट्रर तो आज भी केवल बड़े किसानों को ही उपलब्‍ध हैं। छोटे और मंझोले किसानों को तो बैल और बैलगाड़ी ही मिल सकी है।

ऐसी स्‍थिति में बैलगाड़ी को आम आदमी के लिए और ज्‍यादा उपयोगी और ज्‍यादा काम करने वाला बनाया जा सके तो क्‍या बुरा है !

आने वाले वर्षों में विकसित बैलगाड़ी हमारी व्‍यवस्‍था का एक प्रमुख आधार होगा और देश में आर्थिक स्‍थिति को सही दिशा में हांकने में मदद करेगा।

पहियों का स्‍थान अब रबर के टायरनुमा पहियों ने ले लिया है। सड़कों पर ये पहिये ठीक से नहीं चल पा रहे हैं, इस कारण देश की सड़कों पर अब रबर के पहियों वाली बैलगाड़ियां चलने की कोशिश में हैं। लोग यदि लगे हाथ बैल और अन्‍य जानवरों की नस्‍ल सुधारने की ओर भी ध्‍यान दें तो शायद इनकी अर्थ-व्‍यवस्‍था को ओर ज्‍यादा लाभ होगा।

एक अच्‍छा ट्रक बनाने के लिए हम करोड़ों के कारखाने लगाते हैं, उनसे प्रदूषण फैलाते हैं लेकिन यदि बैलगाड़ियां बनाई जायें तो अवश्‍य ही प्रदूषण से भी बचा जा सकेगा। जो लोग ये सोचते हैं कि बैलगाड़ी पिछड़ेपन और अठारहवीं शताब्‍दी की निशानी है तो वे गलत सोचते हैं, वे शायद नहीं जानते कि आज भी बैलगाड़ी ही हमारी ग्रामीण अर्थ-व्‍यवस्‍था का प्रमुख आधार है जो पूर्ण रूप से प्रदूषण से मुक्‍त है, सस्‍ता है, आम आदमी की पहुंच में है तथा हमारे पशुधन का सर्वोत्त्‍ाम उपयोग है।

आज के इस वैज्ञानिक युग में यदि ऊंची ग्रामीण तकनीक के सहारे बैलगाड़ियों का विकास किया जाये तो हमारी अर्थ-व्‍यवस्‍था सामान विनिमय के क्षेत्र में एक नई क्रांति का सूत्रपात करने में सक्षम है।

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यशवन्‍त कोठारी,

86, लक्ष्‍मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर,

जयपुर-302002 फोनः-2670596

ykkothari3@gmail.com

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  1. बैलगाड़ियां एक वर्ष में करीब 50 अरब मैट्रिक टन माल को एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर लेकर जाती हैं जबकि विशाल पूंजी वाला भारतीय रेलवे केवल 18 करोड़ टन। ....

    ----बहुत शानदार बै्लगाडी पुराण, बधाई कोठारी जी---एक सार्थक व्यन्ग्य-व-आलेख ...
    ----लगे हाथ बैल और अन्‍य जानवरों की नस्‍ल सुधारने की ओर भी ध्‍यान दें ---और आदमी भी अपना सुधार करे....

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