शनिवार, 15 जनवरी 2011

सत्येन्द्र गुप्ता की ग़ज़लें

S K Gupta

किसी को भूल जाऊं कैसे
याद दिल से मिटाऊं कैसे।


अपना अपना ही होता है
ये बात उसे बताऊँ कैसे।


समंदर आवाजें देता है
करीब उसके जाऊं कैसे।


किनारा बीच में पड़ता है
जी उसका बहलाऊं कैसे।


कोई बता दे मुझे इतना
मैं उसके घर जाऊं कैसे।


मैं इतना भी बे गैरत नहीं
नज़र से गिर जाऊं कैसे।

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नमक से नमक कभी खाया नहीं जाता
जबरदस्ती का बोझ उठाया नहीं जाता।


रूठ कर चला गया लम्हा जो अभी अभी
नज़दीक जाके उसे मनाया नहीं जाता।


कितना ही अन्दर में मचता रहे द्वंद
दर्दे ऐ दिल हर को सुनाया नहीं जाता।


मुहर बन कर लग गया है दिल पर
जख्मे निशाँ वो मिटाया नहीं जाता।


पहाड़ों का मौसम भले ही सुन्दर हो
सहरा में कभी ले जाया नहीं जाता।

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फलक टूटा तो बिखरेगा कैसे
गले ज़मीन के वो लगेगा कैसे।


गरूर खुद पर बहुत है उसको
गिर गया तो संभलेगा कैसे।


दीवारें शीशे की ही हैं सारी
लिबास अपना बदलेगा कैसे।


तिल तिल कर रोज़ मरता है
मौत न आयी तो मरेगा कैसे ।


कहानी प्यार की दो ही होती हैं
किताब अपनी लिखेगा कैसे।


ज़लज़ले बहुत आते हैं यहाँ
एक घरोंदा मेरा बनेगा कैसे।


हम तो दिल से चाहते हैं तुझे
इस बात से तू मुकरेगा कैसे

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      Satyendra Gupta

      Kallu ganj -Rui mandi

      Najibabad-Bijnor

      M-09837024900

3 blogger-facebook:

  1. दीवारें शीशे की हैं सारी, लिबास अपना बदलेगा कैसे।
    एक मुकम्मल , मजबूत शे,र सत्येन्द्र गुप्ता जी को मुबारकबाद।

    उत्तर देंहटाएं
  2. गरूर खुद पर बहुत है उसको
    गिर गया तो संभलेगा कैसे।

    vah

    उत्तर देंहटाएं

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