रविवार, 23 जनवरी 2011

यशवन्त कोठारी का आलेख - पतंग-दर-पतंग

अब दिल थाम कर बैठ जाइए पाठकों, पतंगों के दिन चल रहे हैं । बसन्‍त आ रहा है । मनोरम पछुआ हवा बह रही है । आसमान पर बादल लहरा रहे हैं । यही तो है ऋतु वासन्‍ती और मौसमी पतंगी । आसमान का नीला रंग दूर कहीं खो गया है । और आकाश सतरंगी पतंगों से ढंक गया है । प्रेमियों ने अपनी टकटकी प्रेमिकाओं की छतों पर लगा रखी है और ‘वो काटा' का शोर हर तरफ व्‍याप रहा है ।

हर तरफ चौपड़तारा, मंगलदारा, चांदतारा, दढि़यल, तिलपट्‌टा, पट्‌टीतारा, टोकियल, गिलासतारा, गेसपतंग, लालटेनपतंग उड़ रही है । दिशाओं में शोर है और मौसम रंगीन ।

पास पड़ोस के इस रंगीन समय को देखते अपने राम का दिमाग व्‍यंग्‍य की डोर से बन्‍धकर आसमान की ओर उड़ चला, चर्खी पर साहित्‍य लपेटने का चक्‍कर शुरू हुआ ।

देश के गगन में रोज नई और शानदार पतंग बाजी दिखने लगी है । आसाम की पतंग अलग, गोरखालैण्‍ड की अलग और श्रीलंका के जाफनालैण्‍ड की अलग ।

यह केन्‍द्र में जो सबसे ऊंची पतंग उड़ रही है, खूब बड़ी सी और केसरिया रंग की यह पंजाब की पतंग है । हरियाणा भी अपना दढि़यल धीरे-धीरे उसके पास तक पहुंचा रहा है ।

इस पतंग बाजी के समय में कोई पीछे नहीं रहना चाहता । देखिए वो जो तिलपट्‌टा उड़ रहा है, वो दिल्‍ली से उड़ता हुआ ठेठ बिहार तक चला गया है ।

भोपाल से उड़ी संस्‍कृति की पतंगे दिल्‍ली नागपुर तक चली जा रही है । भोपाली पतंगों की डोर अशोक वाजपेयी के हाथों में है । मंजा मजबूत और सद्दे का काम नहीं।

सतों सांस्‍कृतिक केन्‍द्रों के निदेशकों ने भी सात पतंगे उड़ाई हैं जो दिल्‍ली के अपना उत्‍सव कार्यक्रम में दिखाई दी थी । वास्‍तव में देखा जाये तो संस्‍कृति की पतंग बहुत बड़ी है, बाजार में आसानी से मिलती नहीं है, इसे विशेष आर्डर देकर बनवाना पड़ता है और चूंकि यह बड़ी पतंग है, इसमें कारीगरों को काफी कमाल दिखाने का मौका मिलता है ।

इस पतंग के बीच में कुछ आदमी नाचते हुए दिखाई दे रहे हैं, और किनारे पर एक बच्‍चा बिलख रहा है । संस्‍कृति की इस पतंग के बगल में जो हल्‍के लाल रंग की पतंग उड़ रही है, यह प्रगतिशील पतंग है, इसकी डोर, मंजा, चर्खी यहां तक कि सद्दा तक लाल है, आजकल खतरे में है, क्‍योंकि ऊपर से चील की तरह जनवादी पतंग झटके से काट रही है, पता नहीं कब यह लाल पतंग कट जाये । नीचे कई भूतपूर्व प्रगतिशील इस पतंग के कटने का इन्‍तजार कर रहे हैं ।

वे अपने बांस, कांटेदार झाडू उछाल-उछाल कर इस पतंग के कटने का जश्‍न मनाने को तैयार खड़े हैं ।

तो पाठकों । चारों तरफ आसमान में पतंगे और बस पतंगे ही दिखाई दे रही हैं । पचास वर्षों से हम साहित्‍य, संस्‍कृति, कला और राजनीति की पतंगे उड़ा रहे हैं, और अपने अपने क्षेत्र में पतंग काट देने की कोशिश कर रहे हैं । मगर अफसोस पतंगे काटने के बजाय क्‍या हम और कुछ नहीं कर सकते ।

क्‍या पतंगों को लूटने से ज्‍यादा जरूरी काम नहीं है हम लोगों के पास । अपनी टांग टूटने का खतरा उठाते हुए भी हम और ज्‍यादा पतंगों के आसमान की ओर बढ़ रहे हैं ऐसा क्‍यों ?

राजनीति की पतंगे तो दल बदल लेती है, साहित्‍य की पतंगों को यह भी नसीब नहीं ।

बड़ी पतंगे बड़ी मछलियों की तरह छोटी पतंगों को खा रही है, काट रही है, फाड़ रही है, लपेट रही है, और बेचारी छोटी पतंगे और उनको उड़ाने वाले, उनका कोई भविष्‍य इस देश के गगन में नहीं हैं ।

देशवासी इस पतंग प्रतियोगिता का मजा ले रहे हैं । कुछ लोग है जो पतंग लड़ाने वालों को जोश चढ़ा रहे हैं । पीपे, झालर, घन्‍टा, लाउडस्‍पीकर बजा रहे हैं । खुश हो रहे हैं । तिल्‍ली, पकोड़ी, घेवर और फीणी का आनन्‍द ले रहे हैं । जो उड़ा नहीं सकते वे फटी फटी आंखों से आसमान निहार रहे हैं । या तंग डाल रहे हैं ।

और कुछ लोग मांझा इकट्ठा कर रहे हैं ।

चर्खी पकड़ कर खड़े हैं, हंस रहे हैं, पैबन्‍द लगी पतंगों को इकट्‌ठा कर रहे हैं । लेकिन समझदार लोग जानते हैं कि गांठदार मांझा और पैबन्‍द लगी पतंग ज्‍यादा देर तक आसमान में नहीं टिक सकती । वहां तो चाहिए एक साफ सुथरी बड़ी और खूब सूरत पतंग, जिसे केन्‍द्र मानकर अन्‍य पतंगे इठलाए, हंसे, नाचे और उससे लिपट जायें।

समय आ गया है कि हम साम्‍प्रदायिकता, भाई-भतीजावाद, जातिवाद, दहेज और बाल विवाह की पतंगों को काट कर एक नई सुन्‍दर और आलीशान राष्‍ट्रीय एकता की तिलपट्‌टी पतंग उड़ायें ।

0 0 0

यशवन्‍त कोठारी

86,लक्ष्‍मीनगर ब्रह्मपुरी बाहर

जयपुर 302002

फोन 2670596

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------