सोमवार, 17 जनवरी 2011

सतीश चन्द्र श्रीवास्तव की कविता -

कविता
   kavita tapao
तपाओ,
मुझे इतना तपाओ
कि मैं गल जाऊँ
मैं नहीं चाहता
काँच की तरह  टूटना
टूट कर जुड़ना
जुड़ कर टूटना
और बदसूरत हो जाना
मुझे तपाओ और तपाओ
कि मैं एक नये सांचे में ढ़ल
मैं जुड़ती हुई मूरत नहीं
एक नई सूरत देखना चाहता हूँ.
सिर्फ अपने लिए ही नहीं
तुम्हारे लिए भी कुछ चाहता हूँ.

--
  Satish Chandra Srivastava

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